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एक गोली में लंबी जिंदगी का राज! क्या सच में रुक सकता है बुढ़ापा?

जुटे वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिलने का दावा किया गया है। चीन के शेनझेन स्थित एक स्टार्टअप ने एक ऐसी प्रयोगात्मक दवा विकसित करने का दावा किया है, जो इंसानी शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर उसे 150 वर्ष तक जीवित रहने में मदद कर सकती है। यह शोध मुख्य रूप से शरीर के भीतर मौजूद उन 'घातक' कोशिकाओं को निशाना बनाता है, जो बुढ़ापे और बीमारियों की जड़ मानी जाती हैं। क्या है 'जॉम्बी सेल्स' का रहस्य? वैज्ञानिक भाषा में इन्हें सेनेसेंट सेल्स कहा जाता है, लेकिन अपनी प्रकृति के कारण ये 'जॉम्बी सेल्स' के नाम से मशहूर हैं। ये वे कोशिकाएं हैं जो बूढ़ी हो चुकी हैं और अब विभाजित नहीं होतीं। ये खत्म होने के बजाय शरीर में जमा रहती हैं और जहरीले रसायनों का स्राव करती हैं, जिससे सूजन बढ़ती है। यही कोशिकाएं हृदय रोग, गठिया और अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देती हैं। अंगूर के बीज से निकलेगा 'जवानी का अर्क' रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रयोगात्मक दवा में अंगूर के बीज से निकाले गए विशेष तत्वों का उपयोग किया गया है। यह दवा 'सेनोलिटिक' (Senolytic) श्रेणी की है, जिसका मुख्य कार्य शरीर को स्कैन करके इन 'जॉम्बी कोशिकाओं' को चुन-चुनकर नष्ट करना है। कैसे काम करेगी यह गोली? कंपनी का दावा है कि जब शरीर से खराब कोशिकाएं हट जाएंगी, तो:     ऊतकों (Tissues) को होने वाला नुकसान कम होगा।     शरीर की आंतरिक सूजन में भारी गिरावट आएगी।     अंगों की कार्यक्षमता फिर से युवा जैसी होने लगेगी। शुरुआती जानवरों के परीक्षण में इसके उत्साहजनक परिणाम मिले हैं, जहां जीवों की शारीरिक शक्ति में सुधार और उम्र के लक्षणों में कमी देखी गई है। विशेषज्ञों की चेतावनी: अभी राह लंबी है भले ही यह खबर सुनने में क्रांतिकारी लगे, लेकिन वैश्विक विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। लैब के नतीजों को इंसानों पर प्रभावी साबित करने के लिए कई चरणों के कड़े परीक्षणों की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि ये दवाएं स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान न पहुंचाएं। किसी भी ऐसी दवा को आम जनता के लिए उपलब्ध होने में अभी कई वर्षों का समय लग सकता है।

Android और iPhone के लिए 5 शानदार ऐप्स जो आपको ज़रूर इस्तेमाल करने चाहिए

यदि आप बोरिंग एप्स की लिस्ट से अलग कुछ चाहते हैं तो पेश है कुछ ऐसे ही शानदार एप्स, इनमें सें कुछ गेम्स के लिए हैं और बाकि के आपके मनोरंजन के लिए। एंड्रायड के लिए चीजबर्गर चीजबर्गर एप के साथ आप फनी इमेज, जिफ, वीडियोज को फॉलो कर सकते हैं। ये कूल और फनी इमेज डिवाइस में सेव भी किए जा सकते हैं और दोस्तों के साथ शेयर भी कर सकते हैं। रिंगड्रोईड एंड्रायड के लिए रिंगड्रोईड एक ओपन सोर्स रिंगटोन एडिटर है, इसकी मदद से आप डिवाइस में मौजूद मयुजिकध्ऑडियो फाइल्स और नया रिकार्ड कर पर्सनल रिंगटोंस, अलार्म और नोटिफिकेशन साउंट बना सकते हैं। स्काई मैप अपने एंड्रायड फोन का उपयोग कर गूगल स्काई मैप की मदद से आप यूनिवर्स को खंगाल सकते हैं। इस एप की मदद से आप तारों, ग्रहों और अन्य खगोलिय पिंडों के सटीक स्थिति का पजा लगा पाएंगे। इसके लिए बस आपको आसमान की तरफ अपने फोन को प्वाइंट करना होगा और इसके बाद आसमान में मौजूद सभी चीजों को आप गूगल स्काई मैप पर आसानी से देख सकेंगे। मोविज बाय फ्लिक्स्टर मोविज बाय फ्लिक्स्टर एक सरल और शानदार एप है जिससे कौन सी मूवी चल रही है इसका पता लग जाएगा। इसमें मीडिया स्ट्रीमिंग और न्यूज जैसे कई रोचक टूल्स भी हैं, जो काफी शिक्षाप्रद है। ड्रोप कांटैक्स्ट एंड डिलर्स यह एप आपके पुराने फोनबुक एप की जगह ले सकता है। यह एप कंटैक्ट्स व कम्युनिकेशन एप्स को एक साथ लाता है, जो आपके स्क्रीन से एक्सेस किया जा सकता है। अब आईओएस एप्स फिश फूड फ्रैंजी फन यह काफी साधारण गेम है और कभी कभी यह चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है। इस गेम में ज्यादा से ज्यादा बराबर या अपने से छोटी मछलियों को खाना है। जितनी अधिक मछलियों को खाएंगे आप बड़े होते जाएंगे। हाॅरिजोन कैमरा वीडियो लवर्स के लिए यह पसंदीदा एप साबित होगा। हाॅरिजोन कैमरा हमेशा पोट्रेट रिकार्डिंग लेता है। एप में आयताकार इंडिकेटर है जो हमेशा स्क्रीन के केंद्र में होता है और रिकार्ड वीडियोज को क्लिक करना आसान बनाता है। अमेरिकन इंटीरियर अमेरिकन इंटीरियर एप को पेंगुइन ने बनाया है। यह एक ऐसा एप है जो कहानी सुनाता है। इस एप में 100 अलग अलग एंट्री हैं, इसमें आर्टवर्क, एनिमेशन, कहानियां, फिल्म क्लिप और ऑरिजिनल म्युजिक है। हेज कई वेदर एप्स में से हेज भी एक है। इस एप के साथ आप अपने फोरकास्ट में कुछ रंग डाल सकते हैं। आप इसमें तापमान, बारिश आदि देख सकते हैं और मौसम के विवरण का हाल भी ले सकते हैं। स्लीप बैटर स्लीप बैटर एप के साथ आप अपनी नींद को ट्रैक कर सकते हैं, सपनों को मॉनिटर कर सकते हैं, अपने बेडटाइम आदतों को और अच्छा बना सकते हैं।  

बच्चों के लिए कितनी नींद है जरूरी? उम्र के अनुसार जानें सही स्लीप टाइम

कई पेरेंट्स अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके पर्याप्त सोते नहीं है। वहीं, कुछ इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके बच्चे ज्यादा सोते हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि हेल्दी रहने के लिए अच्छी नींद जरूरी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बच्चों के लिए पर्याप्त नींद क्या होती है। इसका जवाब आपकी सोच से परे है। आज इस आर्टिकल में हम इसी के बारे में जानेंगे कि किस उम्र के बच्चे को कितनी देर सोना जरूरी है। क्या आपका बच्चा पूरी नींद ले रहा है? नींद सिर्फ थकान मिटाने के लिए नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए भी बेहद जरूरी है। नेशनल स्लीप फाउंडेशन (NSF) के अनुसार, बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से अलग-अलग घंटों की नींद चाहिए होती है। हालांकि, अमेरिका में हुए एक नए सर्व में यह पता चलता है कि लगभग 44% बच्चे (खासकर छोटे बच्चे) अपनी उम्र के हिसाब से पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं। नींद सिर्फ एक बच्चे की नहीं, पूरे परिवार की समस्या है बचपन की नींद यह तय करती है कि बड़े होने पर इंसान का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य कैसा रहेगा। जॉन हॉप्किंस यूनिवर्सिटी की डॉ. लौरा स्टर्नी भी यह मानती हैं कि अगर बच्चा ठीक से नहीं सोता, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। सर्वे में शामिल 80% माता-पिता ने माना कि बच्चे की नींद खराब होने से उनकी खुद की नींद और रूटीन भी बिगड़ जाता है। वहीं, 86% का मानना है कि अच्छी नींद से बच्चे का मूड और व्यवहार दोनों बेहतर होते हैं। बच्चों में क्यों हो रही नींद की समस्या?     टेंशन ज्यादा, नींद कम: 74% माता-पिता रोजाना औसतन दो घंटे सिर्फ इस बात की चिंता में बिता देते हैं कि उनका बच्चा ठीक से सो रहा है या नहीं।     नींद का गलत अनुमान: अक्सर माता-पिता को लगता है कि उनके बच्चे को कम नींद की जरूरत है। खासकर 0 से 3 महीने के बच्चों के मामले में 78% माता-पिता यह गलती करते हैं और बच्चों को जरूरत से एक घंटा कम सुलाते हैं।     बातचीत की कमी: माता-पिता बच्चों की नींद को लेकर चिंतित तो हैं, लेकिन वे बच्चों से 'अच्छी नींद क्यों जरूरी है' इस बारे में कभी बात नहीं करते। बच्चों में अच्छी नींद की आदत कैसे डालें?     सिर्फ लाइट बंद करने का समय फिक्स न करें, बल्कि सोने से पहले का एक रूटीन बनाएं। जैसे- कमरे की रोशनी कम करना, पर्दे गिराना या कहानी सुनाना। इससे बच्चे के दिमाग को सिग्नल मिलता है कि अब सोने का समय हो गया है।     सोने से पहले टीवी, मोबाइल या वीडियो गेम्स पूरी तरह बंद कर दें। इसकी जगह शांत संगीत सुनें या किताबें पढ़ें।     सुबह उठते ही बच्चे को नेचुरल लाइट (धूप) दिखाएं। इससे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक (सर्कैडियन रिदम) सेट होती है।     बच्चों को दिन में अच्छी तरह खेलने-कूदने दें, लेकिन सोने से ठीक पहले हेवी एक्सरसाइज या उछल-कूद से बचाएं।  

बाल नहीं बढ़ रहे? दही के इन 5 हेयर मास्क से पाएँ तेजी से लंबी और घनी हेयर ग्रोथ

बालों की खूबसूरती और मजबूती के लिए हम अक्सर महंगे प्रोडक्ट्स पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन असली खजाना हमारी रसोई में ही छिपा है। दही न केवल स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि यह बालों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड, प्रोटीन और विटामिन बालों की जड़ों को पोषण देते हैं। साथ ही, यह स्कैल्प को एक्सफोलिएट करके डेड सेल्स और गंदगी साफ करता है। इसलिए अगर आप गिरते बालों या रुकी हुई हेयर ग्रोथ से परेशान हैं, तो दही से बने ये 5 हेयर मास्क आपके लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। दही और करी पत्ता मास्क करी पत्ता बीटा-कैरोटीन और प्रोटीन से भरपूर होता है, जो बालों को झड़ने से रोकता है। इस हेयर मास्क को बनाने के लिए आधा कप दही में एक मुट्ठी करी पत्तों का पेस्ट मिलाएं। इसे स्कैल्प पर लगाकर 30 मिनट छोड़ दें और फिर माइल्ड शैम्पू से धो लें। दही, शहद और नींबू अगर डैंड्रफ की वजह से आपके बाल नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह मास्क सबसे बेस्ट है। नींबू के एंटी-बैक्टीरियल गुण और शहद की नमी बालों को रेशमी बनाती है। इसके लिए एक कटोरी दही में एक चम्मच शहद और आधा नींबू का रस मिलाएं। इसे बालों की जड़ों में लगाएं और 20 मिनट बाद धो लें। यह स्कैल्प के pH लेवल को बैलेंस करता है। दही और अंडा मास्क बाल मुख्य रूप से केराटिन से बने होते हैं। अंडा और दही मिलकर बालों को जबरदस्त प्रोटीन डोज देते हैं। इसे बनाने के लिए एक अंडा फेंटें और उसमें 2-3 चम्मच दही मिलाएं। इसे पूरे बालों में लगाएं। 30 मिनट बाद ठंडे पानी से धोएं। गर्म पानी का इस्तेमाल न करें, वरना अंडा बालों में चिपक सकता है। यह मास्क बालों को घना बनाता है। दही और मेथी दाना मेथी में निकोटिनिक एसिड होता है जो बालों की री-ग्रोथ में मदद करता है। इसे बनाने के लिए रात भर भीगी हुई मेथी को पीसकर पेस्ट बना लें और इसे दही में मिलाएं। इसे स्कैल्प पर लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें और 45 मिनट बाद धो लें। यह बालों को जड़ों से मजबूती देता है। दही और एलोवेरा रूखे और बेजान बालों की ग्रोथ अक्सर रुक जाती है। एलोवेरा दही के साथ मिलकर स्कैल्प को हाइड्रेट करता है। इसे बनाने के लिए ताजे एलोवेरा जेल को दही के साथ बराबर मात्रा में मिलाएं। इसे बालों की लंबाई और जड़ों पर लगाएं। 1 घंटे बाद धो लें। इससे बाल उलझना कम होंगे और टूटना बंद हो जाएंगे। इन बातों का रखें ध्यान     ताजा दही- हमेशा ताजे और सादे दही का ही इस्तेमाल करें।     नियमितता- अच्छे परिणाम के लिए इनमें से कोई भी मास्क हफ्ते में कम से कम एक बार जरूर लगाएं।     पैच टेस्ट- अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है, तो इस्तेमाल से पहले एक छोटा पैच टेस्ट जरूर कर लें।  

क्या घर में रहकर भी लगानी चाहिए सनस्क्रीन? एक्सपर्ट्स बताते हैं क्यों है ये जरूरी

सूरज की यूवी किरणों से बचने के लिए सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना जरूरी है। इसलिए  ज्यादातर लोग मानते हैं कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल केवल तभी करना चाहिए जब हम तेज धूप में बाहर जा रहे हों, लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। क्या आपने कभी सोचा है कि घर की चारदीवारी में रहते हुए भी आपकी स्किन पर टैनिंग, हाइपरपिग्मेंटेशन या फाइन लाइन्स क्यों नजर आने लगते हैं? इसका जवाब हो सकता है घर के अंदर सनस्क्रीन का इस्तेमाल न करना। आइए समझते हैं क्यों घर के अंदर भी सनस्क्रीन लगाना जरूरी है। खिड़कियों से आने वाली यूवी किरणें सूरज की किरणें मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं- यूवीए और यूवीबी     यूवीबी किरणें स्किन बर्न का कारण बनती हैं, लेकिन ये कांच को पार नहीं कर पातीं। इसलिए घर के अंदर आपको सनबर्न नहीं होता।     यूवीए किरणें ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि ये बादलों और खिड़की के कांच को आसानी से पार कर सकती हैं। ये किरणें त्वचा की गहराई तक जाती हैं और कोलेजन को डैमेज कर देती हैं। इसलिए अगर आप घर में ऐसी जगह बैठते हैं, जहां खिड़की से रोशनी आती है, तो आपकी त्वचा लगातार यूवीए किरणों के संपर्क में रहती है। इससे चेहरे पर काले धब्बे और झुर्रियां पड़ने का खतरा बना रहता है। डिजिटल स्क्रीन और ब्लू लाइट आज के दौर में हम अपना ज्यादातर समय स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन के सामने बिताते हैं। इन डिजिटल उपकरणों से हाई एनर्जी विजिबल लाइट निकलती है, जिसे हम ब्लू लाइट कहते हैं। लंबे समय तक ब्लू लाइट के संपर्क में रहने से त्वचा में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। यह स्ट्रेस त्वचा की रंगत को असमान बना सकता है और पिगमेंटेशन की समस्या को बढ़ा सकता है। इसलिए भी घर के अंदर सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना जरूरी है।   सही सनस्क्रीन कैसे चुनें? घर के अंदर आपको बहुत भारी या चिपचिपी सनस्क्रीन लगाने की जरूरत नहीं है। आप इन बातों का ध्यान रख सकते हैं-     SPF 30- घर के अंदर के लिए भी कम से कम SPF 30 वाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करें।     ब्रॉड स्पेक्ट्रम- चेक करें कि आपकी सनस्क्रीन UVA और UVB दोनों से सुरक्षा दे।     लाइटवेट फॉर्मूला- जेल या लोशन बेस्ड सनस्क्रीन घर में लगाने के लिए बेहतर हैं, क्योंकि ये लाइट वेट होते हैं।  

Xiaomi ने फैक्ट्री में इंसान जैसे ह्यूमनॉइड रोबोट्स उतारे, अब इंसानों की जरूरत नहीं होगी!

नई दिल्ली चीन की टेक कंपनी Xiaomi अब स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक कार के बाद एक और बड़ी टेक्नोलॉजी रेस में उतर चुकी है. कंपनी के मुताबिक आने वाले कुछ सालों में उनकी फैक्ट्रियों में इंसानों की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट बड़ी संख्या में काम करते दिखाई दे सकते हैं। Xiaomi के CEO ली जुन ने बताया है कि कंपनी अगले पांच साल के भीतर अपने प्रोडक्शन प्लांट्स में बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट तैनात करने की योजना बना रही है. कंपनी के वीडियो में ह्यूमनॉइड रोबोट्स को फैक्ट्री में काम करते हुए देखा जा सकता है। दरअसल Xiaomi ने हाल ही में अपने ऑटोमोबाइल फैक्ट्री में ह्यूमनॉइड रोबोट का ट्रायल शुरू किया है. इस टेस्ट के दौरान रोबोट ने बिना किसी इंसानी मदद के करीब तीन घंटे तक लगातार काम किया और कार असेंबली से जुड़े कई काम पूरे किए। इन रोबोट्स को कार के फ्लोर पर स्क्रू लगाना और छोटे-छोटे पार्ट्स फिट करने जैसे काम दिए गए थे, जिनमें करीब 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर देखने को मिली। Xiaomi के मुताबिक इन रोबोट्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे फैक्ट्री के तेज प्रोडक्शन सिस्टम के साथ तालमेल बिठा सकें. कंपनी की कार फैक्ट्री में एक गाड़ी बनाने में लगभग 76 सेकंड लगते हैं, और रोबोट को उसी गति के साथ काम करने के लिए ट्रेन किया जा रहा है। इन रोबोट्स के पीछे Xiaomi का अपना AI सिस्टम और रोबोटिक्स प्लेटफॉर्म काम करता है. कंपनी ने इसके लिए विज़न-लैंग्वेज-एक्शन मॉडल और मल्टीमॉडल AI टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इससे रोबोट न सिर्फ चीजों को पहचान सकता है बल्कि यह भी समझ सकता है कि उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है. इसी वजह से रोबोट असेंबली लाइन में छोटे-छोटे जटिल काम भी कर पा रहा है। Xiaomi की स्ट्रैटिजी फिलहाल फैक्ट्री-फर्स्ट मानी जा रही है. यानी कंपनी पहले कंट्रोल्ड माहौल वाले इंडस्ट्रियल प्लांट में रोबोट को ट्रेन करेगी, ताकि वे असली दुनिया के काम सीख सकें. बाद में इसी तकनीक को घरों और सर्विस सेक्टर में इस्तेमाल करने की योजना है। दरअसल चीन इस समय आर्टिफिशियल इ्ंटेलिजेंस और रोबोटिक्स को लेकर काफी आक्रामक रणनीति अपना रहा है. कई टेक कंपनियां और स्टार्टअप ह्यूमनॉइड रोबोट विकसित कर रही हैं, जिन्हें मैन्युफैक्चरिंग से लेकर लॉजिस्टिक्स तक के कामों में लगाया जा सकता है। सरकार भी इस सेक्टर को भविष्य की इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी मानकर तेजी से बढ़ावा दे रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह तकनीक सफल होती है तो आने वाले दशक में फैक्ट्रियों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. कई जगहों पर इंसानों की जगह रोबोट काम करते दिखाई देंगे, जिससे उत्पादन तेज और सस्ता हो सकता है। हालांकि इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि बड़े पैमाने पर रोबोट के इस्तेमाल से मानव नौकरियों पर कितना असर पड़ेगा. फिलहाल Xiaomi का यह एक्सपेरिमेंट से ये तो क्लियर है कि आने वाले समय में स्मार्टफोन कंपनियां सिर्फ गैजेट्स नहीं बनाएंगी, बल्कि AI और रोबोटिक्स के जरिए पूरी इंडस्ट्रियल दुनिया को बदलने की कोशिश करेंगी।

ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में 2050 तक भारी बढ़ोतरी, 3.5 मिलियन केस तक पहुंचने का खतरा

नई दिल्ली भारत समेत दुनियाभर में लगातार कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है. इस सिलसिले में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी सामने आई है. दरअसल मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट के अनुसार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर की व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.56 मिलियन तक पहुंच सकती है. वही अनुमानित आंकड़े 2.29 मिलियन से 4.83 मिलियन के बीच बताए गए हैं. सिर्फ मामले ही नहीं बल्कि मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक है, रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली वैश्विक मौतें 1.37 मिलियन तक पहुंच सकती है. यह अनुमान 8.41 लाख से लेकर 20.2 लाख तक के दायरे में है. वहीं मौजूदा समय में हर साल करीब 7.64 लाख मौतें हो रही है जो आने वाले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। अगले 25 साल में 44 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं मौतें इस रिसर्च में बताया गया है कि अगर ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग और इलाज की व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो 2050 तक सालाना मौतों की संख्या लगभग 14 लाख तक पहुंच सकती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मेडिकल साइंस में प्रगति के बाद भी कई देश बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार नहीं है. वहीं कमजोर स्वास्थ्य ढांचे वाले देशों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है। भारत में 1990 के बाद बढ़े मामले रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भारत में पिछले 3 दशकों में देश में ब्रेस्ट कैंसर का बोझ 5 गुना बढ़ा है. बदलती लाइफस्टाइल, शहरीकरण, देश में मातृत्व, ब्रेस्टफीडिंग में कमी, मोटापे और शुरुआती जांच की कमी को इसके प्रमुख कारणों में गिना गया है. वहीं भारत में अब यह कैंसर महिलाओं में सबसे आम कैंसर में से एक बन चुका है, खासकर शहरी इलाकों में. इसे लेकर डॉक्टरों का कहना है कि बड़ी संख्या में महिलाओं की पहचान बीमारी के लास्ट स्टेज में होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है। अमीर और गरीब देशों के बीच भी साफ अंतर वहीं इस रिपोर्ट में यह भी साफ बताया गया है कि हाई आय वाले देशों में नए मामलों की दर स्थिर है और मृत्यु दर में कमी आई है. इसका कारण बेहतर स्क्रीनिंग, समय पर जांच और आधुनिक उपचार व्यवस्थाएं हैं. वहीं कम और मिडिल आय वाले देशों में नए मामलों और मौतों दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इन देशों में रेडियोथेरेपी मशीनों की कमी, कीमोथेरेपी दवाइयों तक सीमित पहुंच और इलाज का ज्यादा खर्च बड़ी समस्या है. वहीं वैश्विक स्तर पर नए मामलों में इन देशों की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है, लेकिन ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी कुल बीमारियों और समय से पहले मौतों में इनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत से ज्यादा है।

क्या आपको ऐपल का सबसे सस्ता मैकबुक लेना चाहिए? जानिए 4 फायदे और 3 नुकसान

नई दिल्ली होली की रात 4 मार्च को ऐपल ने भारतीय ग्राहकों के लिए बहुत बड़ी पेशकश कर दी। उसने अपना अबतक का सबसे सस्‍ता मैकबुक (MacBook Neo) लॉन्‍च कर दिया, जिसकी शुरुआती कीमत 69,900 रुपये है। आज के जमाने में इस कीमत में नॉर्मल विंडोज लैपटॉप आ रहे हैं। अगर कोई प्रीमियम एंड्रॉयड टैबलेट खरीदने जाए तो टैब+कीबोर्ड लेने में उसके भी 60 से 65 हजार रुपये चल जाएंगे। MacBook Neo इन सभी के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे भारतीय ग्राहक जिन्‍हें मैकबुक खरीदने की चाहत है, लेकिन बजट टाइट है, उनके लिए MacBook Neo तोहफे जैसा होने वाला है। लेकिन क्‍या इसमें वो सब फीचर्स हैं जो मैकबुक एयर में मिलते हैं? MacBook Neo लेने की योजना बना रहे लोगों को इसे खरीदने के 4 कारण और ना खरीदने के 3 कारण जान लेने चाहिए। MacBook Neo मेटल बिल्‍ड MacBook Neo को ऐपल ने उसी तरह से डिजाइन और बिल्‍ड किया है जैसे वह मैकबुक एयर को करती है। यह देखने में ब‍िलकुल भी चीप या सस्‍ते नहीं लगेंगे। उसी प्रीमियनेस का एहसास होगा। एल्‍युमीनियम बिल्‍ड होने के कारण गिरने पर लैपटॉप में डेंट आ सकता है, लेकिन यह टूटेगा नहीं। इसके चारों तरफ से राउंडेड ऐज हैं तो मैकबुक निओ को पकड़ने में हैंडी बनाते हैं। इन्‍हें इस तरह से बनाया गया है कि सामने वालों को यह पता ही नहीं चलेगा कि आप कौन सा मैकबुक इस्‍तेमाल कर रहे हैं बशर्ते कि उसे कलर वेरिएंट की जानकारी ना हो। कलर ऑप्‍शंस बिलकुल अलग MacBook Neo के कलर ऑप्‍शंस एकदम अलग हैं। इसे सिल्‍वर, ब्‍लश, सिटरस और इंडिगो कलर्स में लाया गया है। वो यूजर्स जिन्‍हें चटख रंगों वाली डिवाइस पसंद हैं, उनके लिए MacBook Neo एक ट्रेंडी गैजेट बन सकता है। ऐसा लगता है क‍ि ऐपल ने यूथ और कॉलेज गोइंड स्‍टूडेंट्स को ध्‍यान में रखकर मैकबुक निओ के कलर ऑप्‍शंस का चुनाव किया है। आज तक नहीं चलाया मैकबुक तो बनेगा ग्रेट डील भारत में बहुत बड़ी आबादी अभी ऐपल के इकोसिस्‍टम से जुड़ी नहीं है। ऐसे यूजर्स जिन्‍होंने आज तक मैकबुक इस्‍तेमाल नहीं किया, लेकिन उसे चलाने की दिली ख्‍वाहिश है, उनके लिए लिए MacBook Neo ग्रेट डील बनेगा। फर्स्‍ट टाइम बायर्स मैकबुक निओ के साथ इसके यूजर इंटरफेस से परिच‍ित हो सकते हैं और भविष्‍य में एयर या प्रो मॉडल लेने के बारे में फैसला ले सकते हैं। लंबे समय तक अपडेट, परफॉर्मेंस भी बरकरार ऐपल अपने प्रोडक्‍ट्स को लंबे समय तक अपडेट देती है। मैकबुक निओ को लंबे समय तक अपडेट मिलने से यह नया बना रहेगा और खास बात है कि मैकबुक की परफॉर्मेंस जल्‍दी कमजोर नहीं पड़ती। वह कई साल तक भी पूरी क्षमता के साथ काम करते हैं। MacBook Neo में लगा A18 Pro चिपसेट सबसे पहले साल 2024 में आए आईफोन्‍स में देखा गया था। यह मैकबुक को चलाने के लिए भी पर्याप्‍त है। अगर आप बहुत हैवी यूजर नहीं हैं। बिजनेस जरूरतों के लिए मैकबुक चलाना चाहते हैं तो MacBook Neo निराश नहीं करेगा। इन 3 वजहों से कर सकते हैं रिजेक्‍ट     MacBook Neo में बैकलिट कीबोर्ड नहीं है। जिन्‍हें बैकलिट की आदत है यह जरूरी फीचर है, उन्‍हें इसे नहीं लेना चाहिए।     मैकबुक के लोकप्र‍िय फीचर्स में शामिल टच आईडी, MacBook Neo में सिर्फ 512 जीबी वेरिएंट में मिलती है। 256 जीबी वेरिएंट में यह नहीं मिलेगी।     MacBook Neo को लाइट वर्क के लिए लाया गया है। स्‍टूडेंट्स और बिजनेसेस के लिए यह बना है। बहुत ज्‍यादा हैवी टास्‍क करने हैं तो इसे खरीदने की योजना ना बनाएं। MacBook Neo Vs MacBook Air एक्‍सपर्ट के अनुसार, MacBook Neo और MacBook Air का डिस्‍प्‍ले लगभग एक जैसा है। प्रमुख फर्क चिपसेट का है। मैकबुक एयर में M सीरीज डेस्कटॉप-लेवल चिप इस्तेमाल की गई है। जबकि Neo में A18 Pro चिपसेट है, जिसे हमने आईफोन्‍स में देखा है। हालांकि दोनों ही Mac ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं। Neo में बैकलिट कीबोर्ड कीज नहीं हैं। 512GB ऑप्शन में फिंगरप्रिंट स्कैनर यानी टच आईडी मिलती है। इसमें कम स्पीकर्स और माइक्रोफोन्स हैं। निओ में 3.5mm हेडफोन जैक तो है, लेकिन चार्जिंग के लिए कोई खास MagSafe पोर्ट नहीं है।

महिलाओं को क्यों चाहिए पुरुषों से ज्यादा नींद? वैज्ञानिक कारण जानकर चौंक जाएंगे

अक्सर घरों में देखा जाता है कि दिनभर की भागदौड़ के बाद महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा थकान महसूस करती हैं। यह सच भी है और साइंस इस बात की पुष्टि भी करती है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है। यह केवल आलस या आराम का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अहम कारण छिपे हैं। आइए समझते हैं कि क्यों महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है।    मल्टीटास्किंग और दिमाग की जटिलता नींद के दौरान सबसे जरूरी फंक्शन दिमाग को रिपेयर करने और रिजुविनेट करने का अवसर देना है। रिसर्च बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में मल्टीटास्किंग ज्यादा करती हैं। वे एक ही समय में घर, बच्चों, ऑफिस और भविष्य की योजनाओं के बारे में सोचती हैं। जब दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा जटिल तरीके से और लंबे समय तक किया जाता है, तो उसे रिकवरी के लिए ज्यादा समय की जरूरत होती है। महिलाओं का दिमाग दिन भर में अधिक ऊर्जा खर्च करता है, इसलिए उन्हें गहरी नींद की ज्यादा जरूरत होती है। हार्मोनल बदलाव महिलाओं का शरीर जीवन के अलग-अलग स्टेज में बड़े हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स का स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है।     प्रेग्नेंसी- इस दौरान शरीर का वजन बढ़ना और शारीरिक बदलाव थकान को बढ़ा देते हैं।     मेनोपॉज- इस अवस्था में हॉट फ्लैशेस और पसीना आने जैसी समस्याओं के कारण नींद बार-बार टूटती है, जिससे शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता है। नींद की खराब गुणवत्ता महिलाओं की नींद पुरुषों की तुलना में ज्यादा कच्ची होती है। वे घर की आहटों, बच्चों के रोने या किसी भी छोटी हलचल पर जल्दी जाग जाती हैं। इसके अलावा, महिलाएं इनसोम्निया और रेस्टलेस लेग सिंड्रोम जैसी समस्याओं से ज्यादा प्रभावित होती हैं। बार-बार नींद टूटने के कारण उन्हें उस डीप स्लीप का फायदा नहीं मिल पाता, जो शरीर की मरम्मत के लिए जरूरी है। इसीलिए, वे सुबह उठकर भी थकान महसूस करती हैं और उन्हें ज्यादा समय तक सोने की जरूरत महसूस होती है। मानसिक स्वास्थ्य और तनाव सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते महिलाएं अक्सर मानसिक स्ट्रेस और एंग्जायटी का ज्यादा अनुभव करती हैं। तनाव सीधे तौर पर नींद को प्रभावित करता है। जब दिमाग शांत नहीं होता, तो शरीर को रिलैक्स होने में ज्यादा समय लगता है। पूरी नींद न मिलने पर यह तनाव और बढ़ जाता है, जो एक साइकिल की तरह चलता रहता है। बेहतर नींद के लिए क्या करें? महिलाओं के लिए नींद की कमी केवल थकान तक सीमित नहीं है, यह दिल की बीमारियां, एंग्जायटी और डिप्रेशन के खतरे को भी बढ़ा सकती है। इसलिए-     सोने और जागने का एक समय फिक्स करें।     सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद कर दें।     चाय या कॉफी दोपहर के बाद न पिएं।  

लिवर फेलियर की समय से चेतावनी: एंटीबायोटिक्स पर वैज्ञानिकों की अहम खोज

एंटीबायोटिक्स जीवन रक्षक दवाएं हैं क्योंकि ये जानलेवा संक्रमणों से लड़ती हैं। फिर भी इनके कुछ अनचाहे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं । डाक्टरों ने लंबे समय से यह देखा है कि कुछ एंटीबायोटिक्स लिवर एंजाइम को बढ़ा देती हैं या सूजन पैदा करती हैं और कुछ मामलों में ये गंभीर क्षति भी पहुंचा सकती हैं, जिससे लिवर फेलियर हो सकता है। इसका कारण ये लिवर कोशिकाओं पर किस स्थान पर स्थित होती हैं और उनकी बाहरी परत के साथ कैसे प्रतिक्रिया करती हैं, यह भी मायने रखता है। दवाओं को लेकर नया नजरिया आईआईटी बांबे के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए नए अध्ययन में जिसमें बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने और मलेशिया के सनवे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वेत्रिसेलवन सुबरामणियन शामिल थे, ने यह दिखाया कि इसका जवाब शायद इस बात में नहीं है कि कोई दवा कितनी तेजी से काम करती है, बल्कि इस बात में है कि यह लिवर सेल्स की बाहरी परत (मेम्ब्रेन) के साथ कहां और कैसे इंटरैक्ट करती है। प्रोफेसर कुमार ने कहा कि परंपरागत रूप से लोगों का मानना था कि दवा का मालिक्यूल सेल्स को कितना नुकसान पहुंचाता है, इससे यह होता है कि यह सेल मेम्ब्रेन को कितना तोड़ता है । हमारे नतीजे इस नजरिए को बदल सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह अंतर्दृष्टि नई और सुरक्षित दवाओं के विकास के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ रखती है। लिवर की चोट चिंता का विषय दवाओं के कोशिका झिल्ली (सेल मेम्ब्रेन) के साथ मालिक्यूलर लेवल पर कैसे जुड़ते हैं, इसका अध्ययन करके वैज्ञानिक विषाक्तता के जोखिमों की भविष्यवाणी कर सकेंगे, इससे पहले कि क्लिनिकल ट्रायल शुरू हो। अध्ययन में यह भी पता चला कि दवा से होने वाली लिवर की चोट मेडिसिन में एक बड़ी चिंता का विषय है और यह एक मुख्य कारण है कि दवाओं को अप्रूवल के बाद मार्केट से वापस ले लिया जाता है या उन पर रोक लगा दी जाती है। चुनौती यह है कि लिवर की चोट की भविष्यवाणी करना कठिन है क्योंकि कई मरीजों में पहले कोई लक्षण नहीं होते, जबकि अन्य कई दवाओं पर होते हैं, जिससे असली दोषी की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यहां तक कि निकटता से संबंधित दवाएं भी अलग व्यवहार कर सकती हैं। पेपर के पहले लेखक आकाश कुमार झा ने कहा कि कोशिका की झिल्ली दवा और लिवर की कोशिकाओं के बीच संपर्क का पहला बिंदु है। रक्त में प्रवाहित होने वाली कोई भी दवा कोशिका में प्रवेश करने या कोशिकीय लक्ष्यों को प्रभावित करने से पहले कोशिका की झिल्ली के साथ इंटरैक्शन करनी चाहिए। विषाक्तता के खतरों का जल्द पता लगेगा इसने शोधकर्ताओं को यह विश्वास दिलाया कि प्रारंभिक विषाक्त प्रभाव अक्सर झिल्ली स्तर पर शुरू होते हैं, जो परिवहन, संकेत भेजने और मेटाबालिज्म के लिए जिम्मेदार कई प्रोटीन भी होते है। ये नतीजे दवा बनाने के प्रोसेस में विषाक्तता के खतरों का जल्दी पता लगाकर दवा की सुरक्षा का अनुमान लगाने का एक नया तरीका बताते हैं, यह ट्रैक करके कि लैब में दवाएं सेल मेम्ब्रेन के साथ कैसे इंटरैक्ट करती हैं। झा ने आगे कहा, इस झिल्ली केंद्रित दृष्टिकोण को लागू करके यह पता लगा सकते हैं कि कुछ उपचार से अप्रत्याशित दुष्प्रभाव क्यों पैदा होते हैं और उस ज्ञान का उपयोग कर कम विषैले यौगिकों को डिजाइन कर सकते हैं। चूंकि ये परीक्षण तेज व स्केलेबल हैं, इन्हें दवा बनाने के दौरान स्टैंडर्ड सेफ्टी चेक में जोड़ा जा सकता है।