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निवेशकों से ठगी का खेल खत्म! 2 करोड़ के चिट फंड फ्रॉड में तन्मय मिर्धा गिरफ्तार

नई दिल्ली केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 2 करोड़ रुपए से अधिक के चिट फंड घोटाले में फरार चल रहे आरोपी तन्मय मिर्धा को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी 29 जनवरी को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के ब्रह्म नगर इलाके से की गई। सीबीआई ने यह मामला 23 जून 2020 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद दर्ज किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में सक्रिय चिट फंड कंपनियों से जुड़े मामलों की गहन जांच के आदेश दिए थे। सीबीआई को जांच के दौरान पता चला कि आरोपी तन्मय मिर्धा एक्सप्रेस कल्टीवेशन लिमिटेड, कोलकाता का डायरेक्टर था और उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आम जनता से निवेश के नाम पर भारी धनराशि एकत्र की। आरोपी ने आकर्षक रिटर्न का लालच देकर निवेशकों से करीब 2.1 करोड़ रुपए जुटाए और बाद में इस धन का गलत इस्तेमाल किया। निवेशकों को न तो तय समय पर वापस मिला और न ही उनकी मूल राशि वापस की गई, जिससे बड़ी संख्या में लोग आर्थिक नुकसान का शिकार हुए। सीबीआई ने विस्तृत जांच पूरी करने के बाद 4 फरवरी 2022 को इस मामले में चार्जशीट दाखिल की थी, हालांकि आरोपी जांच के दौरान एजेंसी के समक्ष पेश नहीं हुआ और लगातार फरार बना रहा। इसके बाद कोलकाता स्थित एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत ने उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया। लगातार फील्ड वेरिफिकेशन, तकनीकी इनपुट और खुफिया जानकारी के आधार पर सीबीआई ने 29 जनवरी को आरोपी की लोकेशन का पता लगाया, जिसके बाद सीबीआई ने इलाके में घेराबंदी कर आरोपी तन्मया मिर्धा को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को संबंधित अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया जा सकता है जिससे इस मामले में और जानकारी मिल सके। सीबीआई के अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि चिट फंड घोटालों में शामिल किसी भी आरोपी को छोड़ा नहीं जाएगा। जो भी इसमें दोषी पाए जाएंगे, जल्द से जल्द उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। तन्मय मिर्धा के बयान के आधार पर पता चलेगा कि इसमें कितने लोग शामिल हैं और किस तरह से आम जनता का पैसा लिया गया है।

निजी जानकारी साझा करने से इनकार पर राहत: CBI नोटिस के खिलाफ रिटायर्ड जज के पक्ष में HC

रायपुर दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में CBI द्वारा रिटायर्ड छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जज, जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को जारी की गई नोटिस को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 91 CrPC का इस्तेमाल आरोपी या गवाह से उसकी निजी जानकारी जबरदस्ती मंगवाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य केवल साक्ष्य जुटाने और जांच में सहयोग सुनिश्चित करने तक सीमित है, और इसे मोबाइल नंबर, बैंक अकाउंट डिटेल्स या घरेलू स्टाफ के नाम जैसी निजी जानकारियां जबरदस्ती हासिल करने के लिए नहीं प्रयोग किया जा सकता। क्यों नहीं चलेगा आरोपी पर ‘टेस्टिमोनियल कम्पल्शन‘? दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई द्वारा रिटायर्ड जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को नोटिस जारी करने को रद्द करते हुए धारा 91 CrPC के दायरे पर महत्वपूर्ण स्पष्टता दी है। कोर्ट ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य केवल पहले से मौजूद दस्तावेज़ या चीज़ों को पेश करवाना है, न कि आरोपी को अपनी याददाश्त से जानकारी निकालकर लिखित रूप में देने के लिए मजबूर करना। हाईकोर्ट की बेंच ने सख्त लहजे में कहा कि ऐसा करने पर आरोपी पर सेल्फ-इनक्रिमिनेशन (खुद को दोषी ठहराने की मजबूरी) का खतरा बनता है, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) के खिलाफ है। अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी भी व्यक्ति को अपने खिलाफ कानूनी रूप से बोलने या लिखित में देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, चाहे वह जांच के किसी भी स्टेज पर क्यों न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 91 CrPC का प्रयोग केवल उन चीज़ों या दस्तावेजों के लिए किया जा सकता है, जो पहले से मौजूद हैं, और जांच एजेंसियां आरोपी को अपनी याददाश्त या व्याख्या से जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं। वैकल्पिक रास्ते भी हैं CBI के पास कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर जांच एजेंसी को किसी जानकारी की आवश्यकता है, तो इसके लिए उसे विकल्प उपलब्ध हैं धारा 161 CrPC के तहत पूछताछ करना, जिसमें आरोपी के पास चुप रहने का अधिकार होता है। बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और अन्य संस्थानों से सीधे रिकॉर्ड मंगवाना। अदालत ने कहा कि जांच की सुविधा के नाम पर संवैधानिक सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों को ताक पर नहीं रखा जा सकता। पुराने फैसलों का हवाला कोर्ट ने कहा कि धारा 91 CrPC का प्रयोग आरोपी पर व्यक्तिगत जानकारी जबरदस्ती मंगवाने के लिए नहीं किया जा सकता, जैसा CBI चाह रही थी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 91 का मकसद केवल पहले से मौजूद दस्तावेज या वस्तुएँ पेश करवाना है, न कि आरोपी को खुद के खिलाफ सबूत देने के लिए मजबूर करना। क्या था पूरा मामला? यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी से जुड़ा है। भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच के दौरान CBI ने उन्हें नोटिस जारी किया और उनके मोबाइल नंबर, बैंक खातों के विवरण (स्टेटमेंट सहित), ड्राइवर और घरेलू सहायकों की जानकारी मांगी। जांच एजेंसी का तर्क था कि यह जानकारी जांच के लिए जरूरी है। लेकिन रिटायर्ड जज ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ट्रायल कोर्ट में चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने उनकी बात मानते हुए नोटिस को खारिज कर दिया। CBI ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

झारखंड शराब घोटाले में CBI का हाथ खींचना, रायपुर जोनल ऑफिस ने किया इंकार, HCमें सुनवाई होगी अगले हफ्ते

रायपुर झारखंड में सामने आए करोड़ों रुपये के शराब घोटाले की जांच को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। छत्तीसगढ़ की तर्ज पर दर्ज इस मामले की जांच से केंद्रीय जांच ब्यूरो ने हाथ खींच लिए हैं। सीबीआइ के रायपुर जोनल कार्यालय ने इस प्रकरण की जांच करने से इन्कार कर दिया है। इससे संबंधित सीबीआइ का पत्र छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान पेश किया गया, जिसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह तय की है। यह मामला रांची निवासी विकास सिंह की शिकायत से जुड़ा है, जिसके आधार पर झारखंड-छत्तीसगढ़ शराब घोटाले को लेकर छत्तीसगढ़ में प्रकरण दर्ज किया गया था। वर्तमान में इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय और छत्तीसगढ़ आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा की जा रही है। हाई कोर्ट में तीन याचिकाएं लंबित ईओडब्ल्यू द्वारा दर्ज प्राथमिकी से संबंधित इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में तीन याचिकाएं विचाराधीन हैं। इनमें झारखंड के तत्कालीन उत्पाद सचिव विनय कुमार चौबे, संयुक्त उत्पाद आयुक्त गजेंद्र सिंह और शिकायतकर्ता विकास सिंह की याचिकाएं शामिल हैं। इन याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में सुनवाई हुई। महाधिवक्ता ने कोर्ट में रखा सीबीआइ का पत्र सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने न्यायालय के समक्ष सीबीआइ रायपुर के हेड ऑफ ब्रांच द्वारा भेजे गए पत्र की प्रति प्रस्तुत की। पत्र में बताया गया कि छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव की ओर से भेजा गया जांच संबंधी पत्र सीबीआइ ने वापस कर दिया है, क्योंकि एजेंसी इस मामले की जांच करने के लिए इच्छुक नहीं है। महाधिवक्ता ने कहा कि वे मामले के मेरिट पर अदालत के समक्ष पक्ष रखना चाहते हैं। इस पर कोर्ट ने अगली सुनवाई में दलीलें सुनने का निर्णय लिया।  

रिश्वतखोरी पर बड़ी कार्रवाई: रामगढ़ में CBI ने डाक ओवरसियर को रंगेहाथ पकड़ा

रामगढ़ झारखंड के रामगढ़ जिले में सीबीआई ने बड़ी कारर्वाई करते हुए डाक विभाग के ओवरसियर  प्रभु मुंडा को 15 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। आरोपी पर एक ग्रामीण डाक सेवक से रामगढ़ मुख्यालय में योगदान (ज्वाइनिंग) कराने के एवज में 30 हजार रुपये घूस मांगने का आरोप है। 30 हजार रुपये रिश्वत की मांग कर रहा था डाक ओवरसियर प्रभु मुंडा सीबीआई सूत्रों के अनुसार, इस मामले में एक ग्रामीण डाक सेवक ने एजेंसी से लिखित शिकायत की थी। शिकायत में बताया गया था कि डाक ओवरसियर प्रभु मुंडा उससे रामगढ़ मुख्यालय में योगदान कराने के लिए लगातार 30 हजार रुपये रिश्वत की मांग कर रहा है। शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने प्रारंभिक जांच की, जिसमें आरोप सही पाए गए। 15 हजार रुपए घूस लेते रंगे हाथ दबोचा जांच के दौरान बातचीत में यह बात सामने आई कि प्रभु मुंडा ने 30 हजार रुपये में से 15 हजार रुपये पहले और शेष 15 हजार रुपये बाद में लेने पर सहमति जताई थी। इसके बाद सीबीआई ने आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कर जाल बिछाने की योजना बनाई। आठ जनवरी को सीबीआई की टीम ने सुनियोजित तरीके से जाल बिछाया। जैसे ही शिकायतकर्ता ने प्रभु मुंडा को तयशुदा स्थान पर 15 हजार रुपये घूस के रूप में दिए, सीबीआई की टीम ने तत्काल कारर्वाई करते हुए उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। आरोपी के पास से रिश्वत की रकम भी बरामद कर ली गई। गिरफ्तारी के बाद सीबीआई अधिकारियों का दल प्रभु मुंडा को रांची ले आया, जहां उससे गहन पूछताछ की जा रही है। सीबीआई यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस मामले में कोई और अधिकारी या कर्मचारी भी शामिल था या नहीं, और क्या इससे पहले भी प्रभु मुंडा इस तरह की गतिविधियों में संलिप्त रहा है।

कर्मचारी विहीन होने के कारण केंद्रीय संचार ब्यूरो का दफ्तर बंद

केंद्रीय संचार ब्यूरो का कर्मचारी विहीन दफ्तर बंद   भोपाल    केन्द्रीय संचार ब्यूरो, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के क्षेत्रीय कार्यालयों का केन्द्र में  कांग्रेस की सरकार थी तब पूरे भारत में 1955 में स्थापित कर, जनहित में आमजनों के विकास को देखते हुए संचालित किया गया था। मध्यप्रदेश में बालाघाट, छिंदवाडा, मंदसौर, झाबूआ, छतरपुर, रीवा, इन्दौर, ग्वालियर, शहडोल, मण्डला, सागर, जबलपुर इकाईयां एवं भोपाल में प्रादेशिक कार्यालय संचालित हो रहा है, जो पूरे मध्यप्रदेश में 55 जिलों में भारत सरकार व राज्य सरकार के जनकल्याणकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक विभिन्न गतिविधियों के माध्यमों से सुदूर क्षेत्रों के आमजन के बीच जाकर समस्याओं को सुनकर समाधान व उचित मार्ग दर्शन कर जनजागरूकता किया जा रहा था, जो अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण विभाग होने के कारण सरकार और आम जनों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। केन्द्र सरकार के कूटनीतियों के कारण आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के उक्त कार्यालयों में से मण्डला बालाघाट, छिंदवाडा, छत्तरपुर, शहडोल, मंदसौर एवं सागर क्षेत्रीय कार्यालय / इकाईयों में विगत 17 दिवस से ताला लगा हुआ है जानकारी मिला है कि कार्यालय बंद कर दिया गया है। जो आम जनों के लिए बहुत ही दुखद गंभीर विषय है. उक्त जिलों के कार्यालय के बंद होने से जो कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में आते है. आज भी पिछड़ा है जन जागरूता की कमी है, इन कार्यालयों को बंद न करते हुए यथावत रखें। ताकि आमजन तक सरकार के महत्वपूर्व योजना अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया जा सके। यदि केन्द्र सरकार अपने कूटनीतियों कारण आमजन के हित के लिए सुधार नहीं करती है तो आंदोलन के लिए घेराव करना पड सकता है 2029 चुनाव में भी असर पड़ेगा जो देखा जा सकता है । क्षेत्रीय कार्यालय- गुलाबरा स्थित कार्यालय के अतिरिक्त प्रभार में बेतुल एवं हरदा जिले है। चूंकि छिन्दवाड़ा आदिवासी बहुल्य क्षेत्र है केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के योजनाओं से आमजनों को जोडने से विभाग बंद होने से विभाग से मिलने वाले लाभों  से  वंचित रहेंगे ।

दिल्ली नगर निगम में घोटाला उजागर: CBI ने JE को 10 लाख की रिश्वत संग पकड़ा

नई दिल्ली  सीबीआई ने गुरुवार को दिल्ली नगर निगम के नजफगढ़ क्षेत्र के एक कनिष्ठ अभियंता को बिल पास करने के एवज में दस लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार किया। सीबीआई ने इस बाबत 11 नवंबर को नजफगढ़ जोन के कार्यकारी अभियंता, सहायक अभियंता और कनिष्ठ अभियंता के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था। शिकायतकर्ता एक ठेकेदार है, जिसके लगभग तीन करोड़ रुपए के बिल लंबित थे। आरोपियों ने इन बिलों को पास करने के लिए कुल 25.42 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। शिकायत मिलते ही सीबीआई ने जाल बिछाया और कनिष्ठ अभियंता को शिकायतकर्ता से दस लाख रुपए की किस्त लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया। उसे तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद सीबीआई ने आरोपियों के घरों और कार्यालयों पर छापे मारे। तलाशी में भारी मात्रा में कैश, सोने-चांदी के आभूषण और संपत्ति से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज बरामद हुए। इन दस्तावेजों से पता चलता है कि आरोपी लंबे समय से गलत तरीके से धन कमा रहे थे। जांच अभी जारी है और जल्द ही अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी हो सकती है। यह मामला दिल्ली नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार की गंभीर तस्वीर पेश करता है। ठेकेदारों से बिल पास करने के नाम पर रिश्वत लेना आम बात हो गई थी। शिकायतकर्ता ने हिम्मत दिखाकर सीबीआई से संपर्क किया, जिसके बाद यह कार्रवाई हुई। सीबीआई का कहना है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। सीबीआई ने लोगों से अपील की है कि अगर कोई सरकारी अधिकारी रिश्वत मांगे या भ्रष्टाचार करे तो बिना डरे शिकायत करें। सीबीआई की इस सख्त कार्रवाई से सरकारी विभागों में हड़कंप मच गया है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और ईमानदार काम करने वालों को प्रोत्साहन मिलेगा। जांच पूरी होने पर दोषियों को कड़ी सजा मिलने की संभावना है।

Cyber Slavery Racket का भंडाफोड़! CBI ने दो एजेंट पकड़े, फर्जी नौकरी के नाम पर युवाओं को म्यांमार भेजा

नई दिल्ली केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी रैकेट का पर्दाफाश करते हुए म्यांमार में स्थित साइबर अपराध घोटाले के परिसरों (Cyber Crime Scam Compounds) में अवैध रूप से भारतीय नागरिकों की तस्करी से संबंधित दो मामले दर्ज किए हैं। इस मामले में दो मुख्य एजेंटों को गिरफ्तार किया गया है। ये मामले मानव तस्करी और गलत तरीके से बंधक बनाने (Wrongful Confinement) जैसे गंभीर अपराधों से संबंधित हैं, जिनके लिए आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। हाल ही में, भारत सरकार ने म्यांमार से साइबर गुलामी (Cyber Slavery) के शिकार हुए कई पीड़ितों को छुड़ाने में मदद की थी। सीबीआई की जाँच में पता चला कि विदेशी स्कैम कंपाउंडों की ओर से कई एजेंट भारत में सक्रिय थे। सीबीआई ने ऐसे ही दो एजेंटों की पहचान की, जिन्होंने राजस्थान और गुजरात से पीड़ितों को फंसाकर इन कंपाउंडों में भेजा था। इन दोनों आरोपियों को बचाए गए पीड़ितों के साथ भारत लौटते ही तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। थाईलैंड के रास्ते म्यांमार तक जालः जाँच से पता चला है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठित सिंडिकेट भोले-भाले भारतीय नागरिकों को विदेशों में उच्च-वेतन वाली नौकरियों और आकर्षक रोजगार के अवसरों का झूठा वादा करके फंसाता है। उन्हें अक्सर थाईलैंड के रास्ते म्यांमार ले जाया जाता है। एक बार देश से बाहर ले जाने के बाद, उन्हें म्यांमार में एक जगह पर गलत तरीके से बंधक बना लिया जाता है और बड़े पैमाने पर साइबर धोखाधड़ी (Cyber Fraud) अभियानों में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाता है। इन धोखाधड़ियों में डिजिटल अरेस्ट स्कैम, निवेश घोटाले और रोमांस फ्रॉड शामिल हैं, जो दुनिया भर के लोगों, यहाँ तक कि भारतीय नागरिकों को भी निशाना बनाते हैं। तस्करी के शिकार लोगों को धमकी, कैद और शारीरिक शोषण का शिकार बनाया जाता है, और उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध अवैध साइबर अपराध गतिविधियों में शामिल होने के लिए विवश किया जाता है। इन पीड़ितों को ही आमतौर पर "साइबर गुलाम" (Cyber Slaves) कहा जाता है। सीबीआई ने कहा है कि वह घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समन्वय से साइबर गुलामी और अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी के इस उभरते खतरे का मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्ध है। सीबीआई ने सभी नागरिकों, विशेषकर युवा नौकरी तलाशने वालों से आग्रह किया है कि वे सोशल मीडिया, ऑनलाइन विज्ञापनों या अनधिकृत एजेंटों के माध्यम से दिए जा रहे विदेशी रोजगार के किसी भी प्रस्ताव के खिलाफ अत्यधिक सावधानी बरतें।

SC का बड़ा आदेश: ED, CBI और पुलिस को गिरफ्तारी से पहले बताना होगा कारण

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए कहा कि अब किसी भी नागरिक की गिरफ्तारी से पहले पुलिस, ED, CBI या कोई भी जांच एजेंसी आरोपी को लिखित रूप से गिरफ्तारी का कारण बताएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी मनमाने ढंग से नहीं हो सकती, बल्कि उसके पीछे ठोस, स्पष्ट और कानूनी आधार होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि उसे किस मामले में और किस धारा के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है। इसके साथ ही एजेंसी को गिरफ्तारी के समय लिखित नोटिस/गिरफ्तारी मेमो देना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पुलिस, ईडी, सीबीआई सहित सभी जांच एजेंसियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले या गिरफ्तार करने के तुरंत बाद, उसे उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित रूप से गिरफ्तारी का कारण बताना अनिवार्य होगा। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि यदि गिरफ्तारी की वजह आरोपी को उसकी भाषा में लिखित रूप से नहीं बताई गई, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड दोनों को अवैध माना जाएगा। बता दें कि यह फैसला जुलाई 2024 में मुंबई में हुए बहुचर्चित बीएमडब्ल्यू हिट-एंड-रन केस से जुड़े ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र सरकार’ मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी से पहले या तुरंत बाद उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित रूप से गिरफ्तारी का कारण बताना आवश्यक है। इस फैसले में न्यायमूर्ति मसीह ने 52 पन्नों का विस्तृत निर्णय लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मौलिक सुरक्षा है।अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को कारणों की जानकारी ‘यथाशीघ्र’ दी जानी चाहिए, ताकि आरोपी को अपने अधिकारों और कानूनी स्थिति का स्पष्ट ज्ञान हो सके। अदालत ने अपने फैसले में निम्न प्रमुख बिंदु निर्धारित किए हैं गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना संविधान का आदेश है, और यह किसी भी परिस्थिति में टाला नहीं जा सकता। गिरफ्तारी का कारण लिखित रूप में दिया जाना अनिवार्य होगा, और वह भाषा वही होनी चाहिए जिसे आरोपी समझ सके। यदि गिरफ्तारी के समय अधिकारी तत्काल लिखित कारण देने में असमर्थ हो, तो पहले मौखिक रूप से कारण बताए जाएं, और बाद में लिखित नोटिस, रिमांड के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने से कम से कम दो घंटे पहले, आरोपी को सौंपा जाना चाहिए। यदि गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए गए, तो गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड दोनों को अवैध माना जाएगा, और आरोपी को रिहा होने का अधिकार होगा। देशभर में लागू होगा आदेश सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस आदेश की प्रति देश के सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल, तथा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजी जाएगी। इससे सुनिश्चित होगा कि यह फैसला पूरे भारत में तुरंत प्रभाव से लागू हो।

बिहार चुनाव की सरगर्मी में लालू परिवार की मुश्किलें बढ़ीं, CBI ने दर्जनों गवाह किए पेश

पटना  बिहार विधानसभा चुनावों से पहले लालू परिवार पर संकट गहरा गया है। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने IRCTC होटल मामले में करीब एक दर्जन गवाहों की सूची अदालत को सौंपी है, जो पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और अन्य के खिलाफ मामले में उनकी कथित संलिप्तता के बारे में गवाही देंगे। CBI पहले ही इन गवाहों को औपचारिक नोटिस जारी कर चुकी है और उन्हें 27 अक्टूबर को कोर्ट में पेश होने को कहा है। उस दिन से इस मामले में ट्रायल शुरू होना है। सूत्रों के हवाले से ET की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि CBI इन गवाहों की गवाही बिना किसी सबूत के आधार पर जल्दी से पूरा करने की कोशिश करेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि उक्त गवाहों से पूछताछ के बाद, सीबीआई आरोपियों के खिलाफ अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए कुछ और गवाह भी पेश करेगी। इसी महीने आरोप तय हुए हैं बता दें कि इस महीने की शुरुआत में ही एक विशेष सीबीआई अदालत ने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और अन्य के खिलाफ आईआरसीटीसी होटल मामले में उनकी कथित संलिप्तता के लिए आरोप तय किए हैं। अदालत ने लालू प्रसाद के खिलाफ भ्रष्टाचार (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत), आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और अन्य आरोप तय किए हैं। राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और अन्य पर षड्यंत्र और धोखाधड़ी सहित कई अपराधों का आरोप है। हालांकि, तीनों ने अदालत में खुद को निर्दोष बताया है। मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, आरोपी इस आदेश को चुनौती दे सकते हैं। लालू को पूरी प्रक्रिया की जानकारी थी 13 अक्टूबर को आरोप तय करते हुए विशेष सीबीआई कोर्ट के जज विशाल गोगने ने कहा था कि वे प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि लालू को पूरी प्रक्रिया की जानकारी थी और उन्होंने होटलों के हस्तांतरण को प्रभावित करने के लिए हस्तक्षेप किया था। अपने आदेश में जज ने कहा, "निविदा प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए थे… यह स्पष्ट संभावना के रूप में सामने आया है कि बिक्री के समय, ज़मीन के टुकड़ों का कम मूल्यांकन किया गया था और फिर वे लालू के हाथों में आ गए।" न्यायाधीश ने 244 पृष्ठ के आदेश में मामले में “मिलीभगत’’ के पहलू को चिह्नित किया। अवैध भूमि हस्तांतरण में हेरफेर करने का आरोप बता दें कि सीबीआई ने यादव परिवार पर भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) की निविदाओं और अवैध भूमि हस्तांतरण में हेरफेर करने का आरोप लगाया था। लालू प्रसाद यादव पर रेल मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कोचर बंधुओं- विजय कोचर, विनय कोचर (दोनों मेसर्स सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक, होटल चाणक्य, पटना के मालिक) और अन्य के साथ मिलकर आपराधिक षड्यंत्र रचने के आरोप हैं, ताकि रांची और पुरी में रेलवे के बीएनआर होटलों को उप-पट्टे पर देने के लिए ठेके देने में फर्म को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके। ठेके के बदले दिए भूखंड सीबीआई के आरोपपत्र के अनुसार, ठेके के बदले में कोचर ने कथित तौर पर पटना में एक प्रमुख भूखंड लालू प्रसाद के करीबी सहयोगी प्रेम चंद गुप्ता और उनके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित एक कंपनी को बेच दिया और बाद में इस कंपनी को यादव के परिवार के सदस्यों ने अपने नियंत्रण में ले लिया और यह मूल्यवान संपत्ति मामूली कीमत पर उन्हें हस्तांतरित कर दी। न्यायाधीश द्वारा आरोप पढ़े जाने के बाद लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, तेजस्वी ने निर्दोष होने की दलील दी और मुकदमे का सामना करने की बात कही।

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट घोटाले पर खुद लिया संज्ञान, सरकारों से मांगा जवाब

नई दिल्ली देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम के मामलों पर अब सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार (MHA सेक्रेटरी), सीबीआई, हरियाणा सरकार और अंबाला के साइबर क्राइम विभाग को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीशों के फर्जी हस्ताक्षरों के साथ जारी किए गए फर्जी न्यायिक आदेश न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास की नींव को हिला देते हैं। यह कार्य न केवल कानून के शासन पर हमला है बल्कि न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा प्रहार भी है। वरिष्ठ नागरिक दंपति की शिकायत से शुरू हुआ मामला यह कार्रवाई उस शिकायत के बाद हुई जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक दंपति से पिछले महीने डिजिटल अरेस्ट स्कैम के जरिए उनकी जीवनभर की बचत ठगी गई थी। इस गंभीर घटना को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर संज्ञान लिया। जांच की स्थिति रिपोर्ट मांगी सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार और अंबाला साइबर क्राइम के एसपी से अब तक हुई जांच की स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के साइबर अपराधों पर सख्त कदम जरूरी हैं ताकि लोगों का भरोसा डिजिटल व्यवस्था पर बना रहे।