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सरकार कर सकती है मोबाइल डेटा पर नया टैक्स, हर GB डेटा के लिए एक्स्ट्रा चार्ज का सुझाव

 नई दिल्ली सरकार इंटरनेट को महंगा करने की तैयारी में है। दरअसल रिपोर्ट्स की मानें, तो अब हर GB डेटा के इस्तेमाल के साथ आपकी जेब से ज्यादा पैसे कट सकते हैं। फिलहाल सरकार में इस पर मंथन किया जा रहा है। गौरतलब है कि सरकार की कमाई को बढ़ाने के अनोखे तरीके के रूप में 'डेटा यूसेज टैक्स' लाने का प्रस्ताव चर्चा में है। पीएम मोदी की अध्यक्षता में हुई एक हालिया समीक्षा बैठक में इस पर चर्चा हुई। इस बारे में पता चलते ही टेक जगत में हलचल मच गई है। एक्सपर्ट्स का दावा है कि इसका सीधा असर लोगों के मोबाइल रिचार्ज प्लान के बजट पर पड़ सकता है। भारत में आने वाले समय में मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करना महंगा हो सकता है. सरकार मोबाइल डेटा के इस्तेमाल पर नया टैक्स लगाने के विकल्प को देख रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले में Department of Telecommunications (DoT) से कहा गया है कि वह इस पर स्टडी करे और बताए कि क्या डेटा यूज़ पर टैक्स लगाना संभव है या नहीं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हाल ही में टेलीकॉम सेक्टर की एक रिव्यू मीटिंग में यह मुद्दा सामने आया. इसके बाद DoT को कहा गया कि वह यह जांच करे कि मोबाइल डेटा के इस्तेमाल पर टैक्स लगाया जा सकता है या नहीं और अगर लगाया जाए तो उसका मॉडल क्या होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार जिस विकल्प को देख रही है उसमें ₹1 प्रति GB डेटा पर टैक्स लगाया जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो हर बार जब कोई यूजर मोबाइल डेटा इस्तेमाल करेगा तो उस पर यह अतिरिक्त चार्ज जुड़ सकता है। बताया जा रहा है कि अगर ₹1 प्रति GB का टैक्स लागू होता है तो इससे सरकार को हर साल लगभग ₹22,900 करोड़ तक की कमाई हो सकती है. हालांकि अभी यह सिर्फ एक प्रस्ताव है और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। भारत दुनिया के उन देशों में है जहां मोबाइल डेटा काफी सस्ता है. सस्ते इंटरनेट की वजह से भारत में डेटा की खपत बहुत तेजी से बढ़ी है. वीडियो स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और रील्स देखने की वजह से मोबाइल डेटा का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। एक और अहम बात यह है कि अभी भी मोबाइल रिचार्ज और पोस्टपेड बिल पर 18% GST लिया जाता है. यानी यूजर्स पहले से ही टेलीकॉम सर्विस पर टैक्स दे रहे हैं. अगर भविष्य में डेटा पर अलग से टैक्स लगाया जाता है तो यह मौजूदा टैक्स के अलावा एक नया चार्ज हो सकता है। सरकार यह प्रस्ताव इस मकसद से ला रही है कि इंटरनेट का इस्तेमाल सकारात्मक कामों के लिए हो। दूरसंचार विभाग DoT को सितंबर 2026 तक रिपोर्ट सबमिट कर यह बताने के लिए कहा गया है कि ऐसा कर पाना संभव है या नहीं? इस टैक्स का एक मकसद बच्चों और युवाओं में बढ़ते 'स्क्रीन टाइम' को कम करना है। सरकार एक ऐसा मॉडल बनाना चाह रही है जिससे पॉजिटिव डेटा कंजम्पशन बढ़े। इस टैक्स के जरिए सरकार इंटरनेट की लत और बढ़ते स्क्रीन-ऑन टाइम पर काबू पाना चाहती है। हालांकि यह देखना होगा कि सरकार शिक्षा और मनोरंजन के बीच डेटा के इस्तेमाल पर अंतर कैसे तय करेगी। क्या ऐसा कर पाना मुमकिन है? भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण TRAI के पूर्व प्रधान सलाहकार सत्या एन. गुप्ता ने इस प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि डेटा पर टैक्स लगा पाना न सिर्फ नामुमकिन है बल्कि यह देश में डिजिटल सेवाओं को बाधित भी कर सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार,(REF.) इससे डिजिटल इनोवेशन रुक जाएंगे और डिजिटल क्षेत्र में भारत की वैश्विक बढ़त खतरे में पड़ सकती है। गौर करने वाली बात है कि फिलहाल मोबाइल रिचार्ज पर 18% GST लगता है, ऐसे में डेटा पर अलग से कर लगाना यूजर्स के लिए दोहरी मार जैसा साबित हो सकता है। अगर टैक्स लगा, तो होगी कितनी कमाई? रिपोर्ट्स के अनुसार अब स्पेक्ट्रम नीलामी और लाइसेंस फीस के अलावा सरकार कमाई का नया तरीका तलाश रही है। आंकड़ों के अनुसार 2025 में भारत की मोबाइल डेटा खपत लगभग 229 अरब GB थी। ऐसे में अगर हर GB पर सरकार 1 रुपये का मामूली टैक्स भी लगाती है, तो इससे सरकार को सीधे 22,900 करोड़ रुपये का फायदा होगा। ऐसे में एक तर्क है कि यह रकम देश के विकास के काम आ सकती है, वहीं सच ये भी है कि इससे महंगे इंटरनेट का बोझ आम लोगों पर पड़ सकता है। फिलहाल सरकार ने DoT से कहा है कि वह इस प्रस्ताव की पूरी स्टडी करे और इसके फायदे-नुकसान को समझे. रिपोर्ट आने के बाद ही सरकार तय करेगी कि भारत में मोबाइल डेटा के इस्तेमाल पर नया टैक्स लगाया जाएगा या नहीं। सराकर की तरफ से हालांकि अभी इसे लेकर कोई भी ऑफिशियल स्टेटमेंट नहीं आया है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से रेडिट से लेकर तमाम सोशल मीडिया पर सूत्रों के हवालें से ये खबर चल रही है। 

महिला अधिकारियों का वर्चस्व बढ़ा मोहन सरकार में, अब उन्हें मिल रही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

भोपाल  मध्य प्रदेश की मोहन सरकार में महिला अफसरों पर भी खासा भरोसा जताया जा रहा है। प्रदेश में उन्हें अहम जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। प्रशासनिक ढांचे में महिला अफसरों का दबदबा बढ़ रहा है। ये बात ऐसी ही नहीं कही जा रही है बल्कि आंकड़े इसकी गवाही दे रहे है। मध्य प्रदेश राज्य में पहली बार बड़ी संख्या में महिला आईएएस अधिकारियों को जिलों का दायित्व सौंपा गया है। मध्य  प्रदेश के 55 जिलों में से 17 की कमान महिला IAS अधिकारियों के पास अगर हम वर्तमान स्थिति की बात करें तो प्रदेश के 55 जिलों में 17 जिलों की कमान महिला आईएएस अधिकारियों के पास अगर गौर किया जाए तो पहले कभी भी प्रदेश में ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली है।जब इतने बड़े स्तर पर महिला अफसरो को कमान सौंपी गई हो। स्थिति ये है कि  मोहन यादव सरकार में महिला अधिकारियों पर भरोसा जताकर कई जिलों में उन्हें कलेक्टर के तौर पर भी नियुक्त किया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि महिला अधिकारियों पर भरोसा बढ़ा है। बात करें बड़वानी, झाबुआ और डिंडोरी की तो यहां पर लगातार महिला कलेक्टर को जिम्मेवारी सौंपी जा रही है। प्रदेश में महिला कलेक्टरों का बढ़ा दबदवा  मध्य प्रदेश  के खरगोन, बड़वानी, झाबुआ आलीराजपुर ऐसे जिले हैं जो ये मुहर लगा रहे हैं, इंदौर संभाग में महिला अधिकारियों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। उज्जैन संभाग के रतलाम, शाजापुर, आगर मालवा मंदसौर में भी महिला आईएएस अधिकारियों का जलवा है। रीवा, पन्ना, निवाड़ी, नर्मदापुरम, नरसिंहपुर, सिवनी जिलों में महिला कलेक्टर अपनी योग्यता का बखूबी प्रदर्शन कर रही है।वहीं उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में कई दूसरी महिला आईएएस अधिकारियों को भी पहली बार कलेक्टर बनने का मौका मिल सकता है। आने वाले समय में 2011 से 2017 बैच तक की महिला अधिकारियों को मौके की उम्मीद बात करें तो वर्ष 2014 बैच की महिला अधिकारियों की संख्या सबसे अधिक है। 2016 बैच की भी कई अधिकारी जिलों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। अब उम्मीद है कि 2011 से 2017 बैच तक की दूसरी महिला आईएएस अधिकारियों को पहली बार कलेक्टर बनने का अवसर मिल सकता है। लिहाजा महिला अधिकारियों को मोहन सरकार में काफी महत्व दिया जा रहा है।

8वां वेतन आयोग 2026: फिटमेंट फैक्टर, OPS बहाली और अन्य अहम अपडेट

नई दिल्ली 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के गठन के बाद से केंद्रीय कर्मचारियों की उम्मीदें आसमान पर हैं। इसी बीच देश के प्रमुख ट्रेड यूनियन संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) ने आयोग की अध्यक्ष जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को एक विस्तृत पत्र लिखकर कर्मचारियों के हितों से जुड़ी 12 अहम मांगें रखी हैं। इन मांगों में फिटमेंट फैक्टर 3.0, ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की बहाली और सालाना इंक्रीमेंट दोगुना करने जैसे प्रमुख सुझाव शामिल हैं। आइए जानते हैं इन मांगों के बारे में विस्तार से। वेतन और भत्तों से जुड़ी प्रमुख मांगें 1. फिटमेंट फैक्टर 3.0: सैलरी बढ़ोतरी की मुख्य कुंजी AITUC ने सबसे अहम मांग के तौर पर 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर कम से कम 3.0 रखने की बात कही है। फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक है, जिसके आधार पर कर्मचारियों की मौजूदा सैलरी को नए स्ट्रक्चर में बदला जाता है। यूनियन का मानना है कि 3.0 का फिटमेंट फैक्टर लागू होने से कर्मचारियों के सैलरी में पर्याप्त इजाफा होगा और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। 2. सैलरी कैलकुलेशन के लिए फैमिली यूनिट बढ़ाने का प्रस्ताव एनडीटीवी की खबर के मुताबिक वेतन निर्धारण में इस्तेमाल होने वाली फैमिली यूनिट को बढ़ाने की भी मांग उठाई गई है। 7वें वेतन आयोग में परिवार की इकाई तीन सदस्यों (पति, पत्नी और दो बच्चे) पर आधारित थी। AITUC ने इसे बढ़ाकर पांच सदस्यीय इकाई करने का सुझाव दिया है, जिसमें माता-पिता को भी शामिल किया जाए। इससे कर्मचारियों की बढ़ती जिम्मेदारियों को आर्थिक समर्थन मिल सकेगा। 3. सालाना इंक्रीमेंट 3% से बढ़ाकर 6% करने की मांग फिलहाल 7वें वेतन आयोग के तहत सभी 18 पे-लेवल के कर्मचारियों को हर साल उनके बेसिक सैलरी का 3% इंक्रीमेंट मिलता है। AITUC का तर्क है कि बढ़ती महंगाई और जीवन स्तर को देखते हुए 8वें वेतन आयोग में इसे बढ़ाकर कम से कम 6% सालाना किया जाना चाहिए। 4. न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:10 हो यूनियन ने सैलरी स्ट्रक्चर में समानता लाने पर जोर देते हुए कहा कि न्यूनतम और अधिकतम वेतन का अनुपात 1:10 होना चाहिए। मौजूदा 7वें वेतन आयोग में यह अनुपात लगभग 1:14 है, जहां न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये और अधिकतम वेतन 2,50,000 रुपये है। AITUC का मानना है कि अनुपात कम होने से वेतन में असमानता कम होगी। पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों से जुड़ी मांगें 5. NPS और UPS खत्म कर OPS बहाल करने की मांग AITUC ने केंद्र सररी के कर्मचारियों के लिए नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को समाप्त करने की मांग की है। संगठन ने पुरानी पेंशन योजना (OPS) को फिर से लागू करने पर जोर दिया है, क्योंकि वह पेंशन को कर्मचारी की "डिफर्ड सैलरी" (स्थगित वेतन) मानता है। साथ ही, हर पांच साल में पेंशन में 5% की वृद्धि का भी सुझाव दिया गया है। 6. पेंशन कम्यूटेशन बहाली की अवधि घटाने का प्रस्ताव फिलहाल पेंशन के कम्यूटेशन (अग्रिम भुगतान) के बाद उस राशि को 15 साल में बहाल किया जाता है। AITUC ने इस अवधि को घटाकर 11 से 12 साल करने की मांग की है, जिससे पेंशनभोगियों को जल्द पूरी पेंशन मिलना शुरू हो सके। 7. लीव एनकैशमेंट की सीमा 300 से बढ़ाकर 450 दिन करें रिटायरमेंट के समय मिलने वाले लीव एनकैशमेंट की अधिकतम सीमा को 300 दिनों से बढ़ाकर 450 दिन करने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद एक बड़ी राशि एकमुश्त मिल सकेगी। सेवा शर्तों और अन्य सुविधाओं से जुड़ी मांगें 8. करियर में कम से कम 5 प्रमोशन की गारंटी सरकारी नौकरी में 30 साल के करियर के दौरान कर्मचारियों को कम से कम पांच प्रमोशन मिलने चाहिए। यूनियन का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कर्मचारी लंबे समय तक एक ही पद पर अटके रहते हैं, जिससे उनके करियर ग्रोथ में रुकावट आती है। 9. जोखिम भत्ता, चिकित्सा सुविधा और अवकाश में बढ़ोतरी AITUC ने अतिरिक्त सुविधाओं के तौर पर रिस्क और हार्डशिप अलाउंस बढ़ाने, कैशलेस मेडिकल ट्रीटमेंट, महिलाओं के लिए मेंस्ट्रुअल लीव और पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) देने की मांग उठाई है। 10. रेलवे, CAPF और डिफेंस कर्मियों के लिए विशेष मुआवजा रेलवे, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और रक्षा क्षेत्र के सिविल कर्मचारियों के लिए अलग से बढ़ा हुआ मुआवजा देने की मांग की गई है। प्रस्ताव के अनुसार, ड्यूटी के दौरान मौत पर 2 करोड़ रुपये, बड़े हादसे पर 1.5 करोड़ रुपये और छोटे हादसों पर 10 से 25 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाए। रोजगार नीति और बोनस से जुड़ी मांगें 11. कॉन्ट्रैक्ट जॉब और आउटसोर्सिंग खत्म करें, 15 लाख पद भरें AITUC ने केंद्र सरकार की नौकरियों में कॉन्ट्रैक्ट जॉब, आउटसोर्सिंग और लैटरल एंट्री का विरोध किया है। साथ ही सरकार में करीब 15 लाख खाली पदों को नियमित भर्ती के जरिए जल्द से जल्द भरने की मांग की है, ताकि रोजगार के अवसर बढ़ सकें और कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा मिले। 12. बोनस की सीमा समाप्त करें, वास्तविक वेतन के बराबर करें प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस (PLB) को कर्मचारियों के वास्तविक बेसिक सैलरी के बराबर करने की मांग की गई है। फिलहाल यह बोनस अधिकतम 30 दिनों के लिए 7,000 रुपये तक सीमित है। AITUC ने इस सीमा को हटाने और इसे कम से कम 18,000 रुपये या 30 दिनों की मूल सैलरी के बराबर करने का सुझाव दिया है।

इलेक्ट्रिक कारों की कीमत जल्द होगी पेट्रोल-डीजल कारों के बराबर, दावा देश की प्रमुख कंपनी का

मुंबई   भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है और अब यह ऑटो उद्योग के लिए एक अहम बदलाव का दौर बनता जा रहा है। खासतौर पर चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों के सेगमेंट में कुछ कंपनियों ने मजबूत पकड़ बना ली है। इसी कड़ी में देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कारों की कीमतें पेट्रोल और डीजल से चलने वाली पारंपरिक कारों के बराबर पहुंच सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो भारतीय ऑटो बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार और तेज हो सकती है।  इलेक्ट्रिक कार बाजार में तेजी से बढ़ती हिस्सेदारी भारत के इलेक्ट्रिक फोर-व्हीलर सेगमेंट में फिलहाल एक प्रमुख कंपनी का दबदबा बना हुआ है, जिसके पास लगभग 40 प्रतिशत तक बाजार हिस्सेदारी बताई जाती है। कंपनी की सफलता के पीछे उसके इलेक्ट्रिक मॉडल्स की लंबी श्रृंखला भी एक बड़ी वजह है। उसके पोर्टफोलियो में नेक्सन EV, पंच EV, टियागो EV, टिगोर EV, कर्व EV और हैरियर EV जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। इन मॉडलों के कारण अलग-अलग बजट और जरूरतों वाले ग्राहकों को विकल्प मिल रहे हैं। हालांकि सबसे किफायती इलेक्ट्रिक कार का खिताब अभी किसी अन्य कंपनी के पास है, जबकि इस कंपनी की सबसे सस्ती इलेक्ट्रिक कार टियागो EV मानी जाती है, जिसकी शुरुआती कीमत करीब आठ लाख रुपये के आसपास है। तकनीक में सुधार से घट सकती है लागत कंपनी के इलेक्ट्रिक पैसेंजर वाहनों से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इलेक्ट्रिक वाहनों की तकनीक तेजी से विकसित हो रही है। उनका कहना है कि बैटरी तकनीक में लगातार सुधार हो रहा है और नई बैटरियां पहले के मुकाबले अधिक ऊर्जा संग्रह करने में सक्षम हैं। इसके साथ ही चार्जिंग की गति भी तेज हुई है और सुरक्षा के लिहाज से भी नई तकनीक अधिक भरोसेमंद मानी जा रही है। इन बदलावों के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों की कुल लागत पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। प्रोपल्शन सिस्टम के इंटीग्रेशन से बढ़ेगी दक्षता वाहनों के इलेक्ट्रिक सिस्टम में भी तेजी से बदलाव हो रहे हैं। मोटर, इन्वर्टर, ऑनबोर्ड चार्जर और अन्य पावर इलेक्ट्रॉनिक्स को अब पहले की तरह अलग-अलग यूनिट के रूप में नहीं रखा जा रहा है। इन्हें एकीकृत सिस्टम के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे गाड़ी का कुल वजन कम होता है और डिजाइन अधिक प्रभावी बनता है। पहले जहां इन हिस्सों को अलग-अलग लगाया जाता था, वहीं अब इन्हें एक कॉम्पैक्ट सिस्टम में बदला जा रहा है। इससे वाहन हल्का होने के साथ-साथ बैटरी की क्षमता बढ़ाने की गुंजाइश भी बनती है और बिना बड़े ढांचे में बदलाव किए गाड़ी की ड्राइविंग रेंज को बेहतर बनाया जा सकता है। बैटरी कीमतों में नरमी से मिल सकता है फायदा वैश्विक स्तर पर बैटरी की कीमतों में धीरे-धीरे कमी आने और तकनीक के बेहतर होने से कंपनियों को उम्मीद है कि इलेक्ट्रिक कारें बेहतर रेंज और प्रदर्शन के साथ बाजार में आएंगी। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ मॉडलों में कीमत का अंतर अब पारंपरिक इंजन वाली कारों से बहुत कम रह गया है। यदि यह अंतर और घटता है तो ग्राहक इलेक्ट्रिक कारों को ज्यादा तेजी से अपनाने लगेंगे। 10 लाख रुपये से कम का सेगमेंट बना फोकस भारतीय यात्री वाहन बाजार में दस लाख रुपये से कम कीमत वाली कारों की मांग काफी अधिक है और यही वजह है कि कंपनियां इस सेगमेंट पर खास ध्यान दे रही हैं। हाल ही में एक लोकप्रिय इलेक्ट्रिक मॉडल को बैटरी-एज-ए-सर्विस विकल्प के साथ पेश किया गया, जिससे उसकी शुरुआती कीमत और कम कर दी गई। इस व्यवस्था में ग्राहक बैटरी को अलग से सेवा के रूप में ले सकते हैं, जिससे शुरुआती लागत कम हो जाती है। हालांकि बैटरी सेल अभी भी विदेशों से मंगाए जाते हैं, लेकिन बैटरी पैक का डिजाइन और असेंबली देश में ही की जा रही है और धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने की कोशिश भी जारी है। सस्ती और व्यावहारिक EV से बढ़ेगा अपनाने का चलन ऑटो उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सबसे बड़ा अवसर कम कीमत वाले सेगमेंट में ही है। यदि दस लाख रुपये से कम कीमत में भरोसेमंद और पर्याप्त रेंज देने वाली इलेक्ट्रिक कारें उपलब्ध होती हैं, तो परिवार इन्हें अपनी मुख्य कार के रूप में भी इस्तेमाल करना शुरू कर सकते हैं। जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहन सुलभ, किफायती और रोजमर्रा के उपयोग के लिए सुविधाजनक बनेंगे, वैसे-वैसे इनके प्रति लोगों का भरोसा और बाजार में इनकी हिस्सेदारी दोनों बढ़ती जाएंगी।

15 साल का सबसे बुरा वित्तीय साल, निवेशकों ने ढाई महीने में खोए 48 लाख करोड़

 नई दिल्‍ली  शेयर बाजार निवेशकों के लिए कोरोना महामारी के दौर से भी ज्यादा भयानक साल 2026 गुजरा है. इस साल अभी महज ढाई महीने ही बीते हैं, लेकिन जितना नुकसान इतने कम समय में उठाया है, उतना पिछले 15 साल में किसी भी समय नहीं उठाया. भारतीय शेयर बाजार के लिए साल 2026 की शुरुआत तो ठीक रही थी, लेकिन उसके बाद से लगातार दबाव और बिकवाली का ही समय रहा है. आलम यह रहा कि ढाई महीने से भी कम समय में निवेशकों ने 533 अरब डॉलर (48.50 लाख करोड़ रुपये) बाजार में गंवा दिए. आंकड़ों में झांकें तो पता चलता है कि साल 2011 के बाद से अब भारतीय निवेशकों को सबसे ज्‍यादा नुकसान हुआ है. इस साल अभी तक बीएसई पर लिस्‍टेड कंपनयिों का मार्केट कैप 533 अरब डॉलर नीचे आ चुका है, जो 2011 में करीब 625 अरब डॉलर गिरा था. खास बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार को हुआ नुकसान मैक्सिको, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, नॉर्वे, फिनलैंड, वियतनाम और पोलैंड के बाजारों को हुए कुल नुकसान से भी ज्‍यादा है. इतना ही नहीं, भारतीय शेयर बाजार के नुकसान का आंकड़ा चिली, ऑस्ट्रिया, फिलीपींस, कतर और कुवैत को हुए नुकसान से भी दोगुना रहा है. मार्केट कैप एक साल में सबसे कम भारतीय शेयर बाजार में लिस्‍टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप अभी करीब 4.77 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है, जो अप्रैल 2025 के बाद से सबसे निचला स्‍तर है. यह साल 2026 की शुरुआत में करीब 5.3 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया था. लिहाजा इसमें सीधे 10 फीसदी की गिरावट दिख रही है. यह गिरावट दिखाती है कि भारतीय शेयर बाजार में साल 2026 की शुरुआत से अब तक किस कदर बिकवाली हावी रही है. जनवरी से ही यहां लगातार उतार-चढ़ाव दिख रहा है. विदेशी निवेशकों की बेरुखी कायम भारतीय शेयर बाजार पर सबसे ज्‍यादा असर डालने वाले विदेशी निवेशकों की बेरुखी 2025 के बाद इस साल भी कायम है. साल 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने लगातार अपने पैसे निकाले हैं. इसके अलावा कंपनियों की कमाई और ट्रेड वॉर की वजह से भी बाजार पर खासा असर दिखा है. टैरिफ से लेकर मिसाइल तक के युद्ध ने पूरी दुनिया के बाजार को हिला दिया है, जिसका भारतीय बाजार पर कुछ ज्‍यादा ही असर दिखा. ईरान युद्ध ने आग में डाला घी. अभी अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के टैरिफ वॉर से दुनिया संभली भी नहीं थी कि ईरान के साथ-साथ खाड़ी देशों में शुरू हुए युद्ध ने ग्‍लोबल मार्केट को हिलाकर रख दिया. कच्‍चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा पहुंचा है, जिससे भारत में महंगाई और चालू खाते के घाटे के बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है. आयात बिल में होने वाला इजाफा देश की अर्थव्‍यवस्‍था पर भी दबाव डाल रहा है. बार्कलेस का कहना है कि क्रूड में 10 डॉलर प्रति बैरल का भी इजाफा होता है तो भारत के चालू खाते का घाटा 9 अरब डॉलर बढ़ जाता है.  

अतिक्रमण के कारण रोक: गोविंदपुरा-मंडीदीप-पीथमपुर में 6000 एकड़ औद्योगिक जमीन पर कब्जा, निवेश रुके हुए

इंदौर /भोपाल  मप्र में कागजों पर उद्योगों के लिए डेढ़ लाख एकड़ जमीन उपलब्ध है लेकिन हकीकत उलट है। प्रदेशभर के औद्योगिक क्षेत्रों की 5-6 हजार एकड़ जमीन अवैध कब्जों से घिरी है। इनमें अवैध कॉलोनियां, गोदाम और व्यावसायिक कब्जे शामिल हैं। नए उद्योगों के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही है। इसे मुक्त करा लिया जाए तो 90 हजार लोगों को रोजगार मिल सकता है, वहीं, 4 से 5 हजार करोड़ निवेश भी आ सकता है। लेकिन, राजनीतिक दखल के चलते ये प्रयास सफल नहीं हो पा रहे। भोपाल में 700 एकड़ में फैले गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र में 180 एकड़ से अधिक अतिक्रमण है। 141 एकड़ जमीन का विवाद एक बिल्डर समूह से हाई कोर्ट में सालों से लंबित है तो 10-15 एकड़ क्षेत्र में 3 झुग्गी बस्तियां बसी हुई हैं। ​पीथमपुर में ही 50 एकड़ जमीन मुक्त कराई गई है। इधर, मप्र औद्योगिक विकास निगम के एमडी चंद्रमौलि शुक्ला कहते हैं, भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के औद्योगिक क्षेत्रों में महिला हॉस्टल बन रहे हैं। अवैध कॉलोनियों और झुग्गियों में रह रही महिला श्रमिकों को इनमें बसाया जाएगा। प्रति एकड़ निवेश टेक्सटाइल में एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ से लेकर फार्मा में 6 करोड़ तक निवेश आता है। मल्टी स्टोरी क्लस्टर में 10-12 करोड़ तक है। वहीं, प्रति एकड़ निवेश पर अलग-अलग सेक्टर में 20 से 150 लोगों को नौकरियां मिलती हैं। 15 साल बाद प्रस्ताव पर पहल मंडीदीप इंडस्ट्री एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजीव अग्रवाल ने कहा, 15 साल पहले हमने पास में खाली पड़ी सरकारी जमीन पर इंडस्ट्रियल टाउनशिप बनाने का प्रस्ताव दिया था ताकि कब्जे न हों और श्रमिकों को आवास मिलें। अब ये पहल हुई है। श्रमिकों के आवास बनेंगे पीएम आवास योजना के तहत निजी बिल्डरों की मदद से औद्योगिक क्षेत्रों के पास श्रमिकों के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट और रेंटल प्रोजेक्ट के तहत आवास बनेंगे। -संकेत भोंडवे, आयुक्त नगरीय विकास एवं आवास किस तरह के अतिक्रमण…     40% गुमठियां, पार्किंग     35% झुग्गी बस्तियां     25% भूखंड धारकों के अवैध निर्माण  

भारत-अमेरिका समझौते की संभावना बढ़ी, ट्रंप के प्रतिनिधि ने साझा की सकारात्मक जानकारी

नई दिल्ली भारत और अमेरिका एक और समझौते पर मुहर लगाने के बेहद करीब हैं। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को यह खुशखबरी देते हुए कहा है कि दोनों देश क्रिटिकल मिनरल्स से जुड़े अहम समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और आने वाले कुछ महीनों में इस पर बड़ी घोषणा हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा है कि दोनों देश मैन्युफैक्चरिंग और नई तकनीकों के लिए जरूरी दुर्लभ खनिज की सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए इस समझौते पर तेजी से काम कर रहे हैं। सर्जियो गोर ने इस पर खुशी जताते हुए कहा, “मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि हम क्रिटिकल मिनरल्स समझौते को अंतिम रूप देने के बहुत करीब पहुंच गए हैं। यह समझौता एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, एनर्जी सिस्टम और उभरती तकनीकों के लिए जरूरी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने में मदद करेगा। अगले कुछ महीनों में इस पर बड़ी घोषणा होने की उम्मीद है।” सर्जियो गोर ने कहा कि आने वाले महीनों में दोनों देश ठोस नतीजे दिखा सकते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों सरकारों में इस साझेदारी को आगे बढ़ाने की मजबूत राजनीतिक इच्छा दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा, “हम कुछ अलग देख रहे हैं। जहां पहले रुकावटें होती थीं, अब वहां प्रगति दिखाई दे रही है। अमेरिका और भारत की साझेदारी की ताकत और गति को बढ़ाने वाली कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां सामने आई हैं।” भारत-अमेरिका के रिश्तों पर क्या बोले? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूत ने यह भी कहा है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते ऐतिहासिक ऊंचाइयों तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने हाल में हुए कई महत्वपूर्ण समझौतों और प्रगति का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस साझेदारी में तीन बड़ी प्रगति हुई है। पहली व्यापार के क्षेत्र में, दूसरी भरोसे और तकनीक के क्षेत्र में और तीसरी रणनीतिक समन्वय के क्षेत्र में। उनके अनुसार यह तीनों पहलू दिखाते हैं कि अमेरिका और भारत की साझेदारी किस दिशा में आगे बढ़ रही है। अंतरिम समझौते पर सहमति इस दौरान अमेरिका-भारत अंतरिम व्यापार समझौते के बारे में बोलते हुए गोर ने कहा कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का आकार, लोगों की प्रतिभा और समाज में मौजूद उद्यमशीलता की ऊर्जा यह साफ दिखाती है कि सहयोग की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं। उन्होंने कहा कि जरूरत सिर्फ गति और राजनीतिक इच्छाशक्ति की थी, ताकि इन अवसरों को ठोस परिणामों में बदला जा सके। गौरतलब है कि भारत और अमेरिका ने बीते 7 फरवरी को एक अंतरिम समझौते पर सहमति जताई थी।

अन्नदाताओं के खातों में पहुंची सम्मान की राशि: किसानों की समृद्धि के लिए निरंतर कार्यरत है डबल इंजन सरकार : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय

रायपुर  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने असम की राजधानी गुवाहाटी से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की 22वीं किश्त जारी की। इस दौरान देशभर के 9 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में लगभग 18 हजार 640 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे हस्तांतरित की गई। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के 24 लाख 71 हजार किसानों के खातों में 498.83 करोड़ रुपये की राशि अंतरित की गई। मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय ने राजधानी रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित प्रधानमंत्री किसान निधि सम्मान योजना राशि अंतरण एवं पीएम किसान उत्सव दिवस कार्यक्रम में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन प्रदेश के किसान भाइयों और बहनों के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के माध्यम से किसानों को हर वर्ष तीन किश्तों में कुल 6 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, जो किसानों के परिश्रम और उनके योगदान के सम्मान का प्रतीक है। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसानों को अब तक प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत 11 हजार 283 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार बनने के बाद सबसे पहले किसानों को बोनस राशि प्रदान की गई और 13 लाख किसानों के खातों में 3 हजार 716 करोड़ रुपये अंतरित किए गए। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है जहां प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी और 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया जा रहा है। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के 48 घंटे के भीतर किसानों के खातों में भुगतान सुनिश्चित किया गया। इसके साथ ही कृषक उन्नति योजना के तहत 25 लाख से अधिक किसानों के खातों में 10 हजार 324 करोड़ रुपये की राशि होली से पहले अंतरित की गई। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा दलहन, तिलहन, मक्का, कोदो-कुटकी, रागी और कपास जैसी फसलों की खेती को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। सिंचाई के लिए कृषि पंपों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जा रही है, जिसके लिए इस वर्ष के बजट में 5 हजार 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए 40 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के उद्देश्य से दो वर्षों में 10 हजार करोड़ रुपये की सिंचाई परियोजना भी शुरू की गई है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री  रामविचार नेताम ने कहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना किसानों के लिए बड़ी मदद साबित हो रही है। उन्होंने किसानों से धान के साथ-साथ अन्य फसलों की खेती की ओर भी ध्यान देने की अपील की, जिससे पानी की बचत होगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी। धरसीवां विधायक  अनुज शर्मा ने भी किसानों को संबोधित करते हुए बधाई दी। इस अवसर पर विधायक  अनुज शर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष  नवीन अग्रवाल, छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष  चंद्रहास चंद्राकर, कृषि विभाग के संचालक  राहुल देव,  छत्तीसगढ़ बीज विकास निगम के एमडी  अजय अग्रवाल, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल सहित जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे।

मध्यप्रदेश सरकार का बड़ा फैसला: जूनियर डॉक्टरों का स्टाइपेंड बढ़ा, PG से इंटर्न तक को फायदा

भोपाल प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत जूनियर डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की गई है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 2.94 के आधार पर यह वृद्धि करते हुए एक अप्रैल 2025 से संशोधित स्टाइपेंड लागू कर दिया गया है। कितने रुपये बढ़ाया गया नए संशोधन के अनुसार पीजी प्रथम वर्ष के डॉक्टरों का स्टाइपेंड 75,444 रुपये से बढ़ाकर 77,662 रुपये कर दिया गया है। वहीं पीजी द्वितीय वर्ष का स्टाइपेंड 77,764 रुपये से बढ़ाकर 80,050 रुपये और तृतीय वर्ष का स्टाइपेंड 80,086 रुपये से बढ़ाकर 82,441 रुपये निर्धारित किया गया है। इसी तरह मेडिकल इंटर्न का स्टाइपेंड भी बढ़ाया गया है। पहले जहां इंटर्न को 13,928 रुपये मिलते थे, वहीं अब उन्हें 14,337 रुपये स्टाइपेंड दिया जाएगा। इसके अलावा सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रम के प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष के डॉक्टरों का स्टाइपेंड भी बढ़ाकर 82,441 रुपये तय किया गया है। सीनियर रेजिडेंट का इतना बढ़ा सीनियर रेजिडेंट का स्टाइपेंड 88,210 रुपये से बढ़ाकर 90,803 रुपये कर दिया गया है, जबकि जूनियर रेजिडेंट का स्टाइपेंड 63,324 रुपये निर्धारित किया गया है। इस फैसले से प्रदेश के सभी शासकीय मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे और सेवाएं दे रहे जूनियर डॉक्टरों को सीधा लाभ मिलेगा।  

निवेश को बढ़ावा देने की तैयारी: पंजाब में 3 दिन चलेगी इन्वेस्टर्स समिट 2026

चंडीगढ़ पंजाब सरकार की ओर से मोहाली में तीन दिवसीय 'प्रोग्रेसिव पंजाब इन्वेस्टर्स समिट 2026' आयोजित किया जा रहा है। शुक्रवार को आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सम्मेलन का शुभारंभ करेंगे।'प्रोग्रेसिव पंजाब इन्वेस्टर्स समिट 2026' को भगवंत मान सरकार की ओर से पंजाब को 'रंगला पंजाब' बनाने की ओर बड़ा कदम माना जा रहा है। सम्मेलन 13 मार्च से 15 मार्च तक चलेगा, जिसमें यूनाइटेड किंगडम, जापान और दक्षिण कोरिया समेत अनेक देशों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट किया, "आज 'प्रोग्रेसिव पंजाब इन्वेस्टर्स समिट 2026' का शानदार आगाज हो रहा है। गुरुओं-पीरों की पावन धरती पर देश-दुनिया से पहुंचे नामचीन उद्योगपतियों का हार्दिक स्वागत है।" भगवंत मान ने पोस्ट में आगे लिखा, "चंडीगढ़ स्थित निवास पर विश्व प्रसिद्ध स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल के कार्यकारी अध्यक्ष लक्ष्मी एन. मित्तल से अहम मुलाकात हुई। पंजाब में बड़े पैमाने पर निवेश और हमारे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित करने को लेकर उनके साथ सार्थक चर्चा हुई।" उन्होंने कहा कि उद्योगों के लिए बेहतर माहौल तैयार करने की दिशा में आज पंजाब निवेशकों की पहली पसंद बनता जा रहा है। हमारी सरकार उद्योगों को हर संभव सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है। पंजाब सरकार ने पिछले हफ्ते भी अपनी औद्योगिक विकास की राह को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। सरकार ने राज्य में 'औद्योगिक और व्यापार विकास नीति-2026' लॉन्च की। इसका मकसद औद्योगिक विस्तार को तेज करना, बड़े निवेश को आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है। इस नीति का औपचारिक अनावरण मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पिछले शनिवार को लुधियाना में किया। इस अवसर पर राज्य के उद्योग और वाणिज्य मंत्री संजीव अरोड़ा भी मौजूद रहे। इस लॉन्च कार्यक्रम में लगभग 200 उद्योगपति, उद्योग जगत के दिग्गज और कई क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए। यह राज्य के औद्योगिक भविष्य में उद्योग जगत की गहरी दिलचस्पी और भरोसे को दिखाता है।