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ममता बनर्जी के लिए चुनौती: बंगाल में हुमायूं कबीर समेत तीन मुस्लिम नेताओं की सक्रियता

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति तेजी से गरमा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होना है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यहां सत्ता बचाने की चुनौती है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) यहां पहली बार सरकार बनाने तमन्ना लिए बैठी है। इस सबके बीच चुनावी बिसात पर बागी विधायक हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की दिक्कतें बढ़ा दी है। कबीर के एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन औवेसी और इंडिया सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के प्रमुख पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से संपर्क साधने से राज्य की राजनीति में गरमाहट आ गई है। दूसरी तरफ तो भाजपा ने अपने मजबूत बूथ प्रबंधन से बदलाव की स्थिति बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच लगभग सीधा मुकाबला है। कांग्रेस और तीन दशक तक राज्य में सत्ता पर काबिज रही माकपा और उसके सहयोगी दल हाशिए पर जा चुके हैं। ऐसे में तृणमूल से बाहर निकले हुमायूं तीसरी ताकत के रूप में उभरने की कोशिश में है। हालांकि वह अकेले एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है पर यदि उनको औवेसी व पीरजादा का साथ मिला तो कई सीटों पर समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। तीन मुस्लिम नेता एक साथ औवेसी ने हाल में बिहार में जो सफलता हासिल की है उससे साफ हुआ है कि मुस्लिम मतदाताओं ने इस पार्टी को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। आईएसएफ ने पिछले चुनाव में ही अपनी स्थिति साफ कर दी थी, जब उसने एक सीट जीत ली थी। ऐसे में अगर तीन प्रमुख मुस्लिम नेता एक मंच पर आते हैं तो मुसलमानों के बीच वह अपनी पैठ बढ़ा सकते हैं। ध्रुवीकरण से ममता को नुकसान बंगाल की लगभग 30% मुस्लिम आबादी है। हुमायूं कबीर जिस तरह से माहौल बना रहे हैं उसमें वह अगर मुस्लिम मतों का थोड़ा भी ध्रुवीकरण करने में सफल रहते हैं तो ममता बनर्जी को काफी नुकसान हो सकता है। इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। भाजपा विधायक भी मैदान में डटे भाजपा ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपना विस्तार किया है। उसके विधायक मैदान में डटे रहे हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पहले से ही आक्रामक और राज्य की मौजूदा स्थितियों में और ज्यादा आक्रामकता दिखाकर ममता बनर्जी की दिक्कतें बढ़ाएगा। पिछली बार भाजपा अपने बूथ प्रबंधन में कमजोर रही थी, इसलिए पार्टी ने इस बार पूरा जोर बूथ प्रबंधन पर लगाया है।

वक्फ और बागी हुमायूं: ममता के ‘खेला’ में BJP को मदद करेगी ये तीन शक्तियां

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अब तक के सबसे मुश्किल हालात का सामना कर रही हैं. उनकी हालत सांप-छछुंदर जैसी हो गई है. न निगलते बन रहा है और न उगलते. हिन्दू तो पहले से ही साथ छोड़ने लगे थे, अब उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भी खत्म होती दिख रही है. हिन्दू वोटर भाजपा की ओर मुखातिब हो गए हैं. पिछली बार 77 भाजपा विधायकों का निर्वाचन बंगाल में उसके प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण का स्पष्ट संकेत था. अव्वल तो गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) ने वैसे मुसलमानों में उनकी छवि को गहरी चोट पहुंचाई है, जो बांग्लादेश और म्यांमार से आकर पश्चिम बंगाल को सुरक्षित ठिकाना बनाए हुए थे. दूसरा संकट बन कर उभरे हैं उनके ही निलंबित विधायक हुमायूं कबीर. कबीर का खेल कामयाब हुआ तो ममता बनर्जी का सारा खेल चौपट हो सकता है. कबीर का कहना है कि ममता बनर्जी अल्पसंख्यक वोटों के बूते 15 साल से सत्ता में बनी हुई हैं. इस बार अल्पसंख्यक उन्हें सबक सिखाएंगे. हुमायूं कबीर राज्य की अल्पसंख्यक बहुल 90 सीटों पर नजर गड़ाए हुए हैं. वक्फ पर अपने स्टैंड से मुकरीं ममता ममता बनर्जी ने पहले कहा था कि बंगाल में वे वक्फ कानून लागू नहीं होने देंगी. इसे लेकर सड़क से लेकर संसद तक उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बवाल मचाया था. बंगाल के मुस्लिम इस बात से आह्लादित थे कि उनके मुद्दे पर ममता का साथ मिल गया है. पर, ममता अपने स्टैंड से अब मुकर गई हैं. उन्होंने बड़ी आसानी से इसे बंगाल में लागू करा दिया. उन्होंने वक्फ संपत्ति का ब्योरा इसके लिए भारत सरकार द्वारा बनाए गए पोर्टल पर अपलोड करने की इजाजत दे दी. बंगाल के मुसलमानों में उनके प्रति नफरत की यह बड़ी वजह बन गई है. उन्हें लगने लगा है कि ममता भी अब उनके लिए भाजपा से कम खतरनाक नहीं रह गई हैं. बिहार में चुनाव के दौरान आरजेडी नेता और महागठबंधन के मुख्यमंत्री चेहरा तेजस्वी यादव भी वक्फ कानून को डस्टबिन में डालने की बात कहते थे. चुनाव में महागठबंधन की जैसी दुर्गति हुई, शायद ममता के रुख में उसे देख कर ही बदलाव आया है. SIR से बिगड़ गया है ममता का खेल बंगाल में SIR की चर्चा शुरू होते ही ममता बनर्जी ने आसमान सिर पर उठा लिया था. इसे रोकने के लिए उन्होंने तरह-तरह के हथकंडे अपनाए. उनके विरोध का सिलसिला अब भी जारी है. SIR के भय से बांग्लादेश भाग रहे घुसपैठियों को वे सांत्वना दे रही हैं कि उन्हें घबराने की जरूरत नहीं. उन्हें वे वापस बुलाएंगी. ममता बनर्जी तो पहले यहां तक कहती थीं कि बंगाल में कोई घुसपैठिया नहीं. आश्चर्य होता है कि अब से ठीक 20 वर्ष पहले ममता बनर्जी ने लोकसभा में घुसपैठियों की बढ़ती आबादी पर जिस तरह बवाल काटा था, वह अब उसके उलट कैसे बोल रही हैं. दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठिए बंगाल की राजनीति की रीढ़ रहे हैं. माल्दा, मुर्शिदाबाद जैसे सीमावर्ती जिलों में इनकी भरमार है. किसी की विधायकी-सांसदी चुने जाने की चाबी बांग्लादेशी घुपैठियों के ही हाथ में है. बहरहाल ममता की लाख बाधा पहुंचाने की कोशिशों पर चुनाव आयोग ने पानी फेर दिया है. ममता कुछ कर नहीं पाईं. अब हुमायूं से पड़ा है ममता का पाला अल्पसंख्यक वोटरों को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. इमामों को तनख्वाह तय करना हो या धार्मिक जुलूसों का आयोजन हो; ममता हमेशा उनके साथ खड़ी रही हैं. लेकिन, अब स्थिति बदल गई है. ममता बनर्जी की ही पार्टी के एक विधायक हैं हुमायूं कबीर. उन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मसिजद का राग छेड़ कर ममता को हलकान कर दिया है. ममता बनर्जी ने उनके इस आचरण के लिए पार्टी से निलंबित तो कर दिया है, लेकिन वे कितने दिनों तक इस पर अमल कर पाएंगी, यह देखने वाली बात होगी. इसलिए कि मूल रूप से कांग्रेसी रहे हुमायूं कबीर के लिए यह दूसरा मौका है, जब उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया है. इससे पहले भी उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित किया गया था. फिर 2021 में उनकी वापसी हो गई. टीएमसी ने हुमायूं कबीर के निलंबन पर सफाई दी है कि उन्हें बाबरी मसिजद निर्माण के लिए नहीं, बल्कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निलंबित किया गया है. कौन हैं निलंबित MLA हुमायूं कबीर? हुमायूं कबीर 2021में टीएमसी के टिकट पर मुर्शिदाबाद जिले के भरतपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए. वे बनर्जी के मंत्रिमंडल में भी शामिल होते रहे हैं. उन्हें पार्टी ने हाल ही में निलंबित किया है. इसके पहले भी उन पर निलंबन की कार्रवाई हो चुकी है. इस बार बाबरी मस्जिद प्रकरण को लेकर उन्हें निलंबित किया गया है. पहली बार 2011 में ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद वे उनके मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने थे. वे अक्सर विवादों का केंद्र बनते रहे हैं. 2015 में उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता ममता बनर्जी पर आरोप लगाया था कि वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को ‘राजा’ बनाना चाहती हैं. इसकी प्रतिक्रिया इस रूप में सामने आई कि उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निलंबित कर दिया गया. 2021 में उनका वनवास खत्म हुआ और टीएमसी ने उन्हें भरतपुर से चुनाव लड़ने का मौका दिया. वे विधायक निर्वाचित हुए. हुमायूं ने बाबरी मस्जिद बनाने की ठानी हुमायूं कबीर ने ऐलान किया था कि मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति बनाई जाएगी. उन्होंने इसके लिए आज (6 दिसंबर 2025) का दिन भी मुकर्रर कर दिया था. बाबरी विध्वंस की वर्षगांठ पर नींव रखने की उनकी घोषणा को टीएमसी ने सांप्रदायिक राजनीति करार दिया और इस आरोप में उन्हें सस्पेंड कर दिया है. ममता बनर्जी ने उन्हें आरएसएस का मुखौटा करार दिया है. लोकसभा चुनाव के दौरान भी हुमायूं कबीर को बोल बिगड़े थे. उन्होंने कहा था- ‘हिंदुओं को भागीरथी नदी में डुबो देंगे, क्योंकि मुर्शिदाबाद में 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. उन्होंने तो अब यह भी कहा है कि मुस्लिम बहुल सीटों पर अल्पसंख्यक ममता बनर्जी को पाठ पढ़ा देंगे. वे नई पार्टी बनाने का ऐलान भी कर चुके हैं. बंगाल में सांप्रदायिक राजनीति की नींव वर्ष 2011 में हुई जनगणना के अनुसार बंगाल की 9.13 करोड़ … Read more

पश्चिम बंगाल में अधिकारी तबादलों के 24 घंटे बाद चुनाव आयोग हुआ सक्रिय, SIR पर बड़ी मीटिंग

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में विशेष गहन संशोधन (SIR) की घोषणा के ठीक पहले ममता बनर्जी सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर बड़ा ‘खेला’ खेला है. राज्य सरकार ने 527 अधिकारियों का एक साथ स्थानांतरण कर दिया, जिसमें 67 आईएएस और 460 राज्य सिविल सेवा अधिकारी शामिल हैं. यह कदम चुनाव आयोग के SIR अभियान से ठीक पहले उठाया गया, जिसे विपक्ष ने चुनावी हेरफेर का प्रयास करार दिया. अब आयोग ने तुरंत एक्शन लेते हुए सभी जिलाधिकारियों (DM) के साथ बैठक बुलाई है, जबकि सभी राजनीतिक दलों के साथ भी चर्चा मंगलवार से ही होनी है. ये बैठकें मंगलवार सुबह 10 बजे ही शुरू हो गई . सीनियर उप चुनाव आयुक्त सभी जिलाधिकारियों के साथ सुबह 10 बजे से मीटिंग शुरू करेंगे. यह मीटिंग वर्चुअल होगी और इसमें राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी और सभी जिलों के डीएम शामिल होंगे. इसके बाद आज ही सभी राजनीतिक दलों के साथ मीटिंग होगी. इस कवायद ने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर तनाव को बढ़ा दिया है. चुनाव आयोग ने सोमवार को SIR के दूसरे चरण की घोषणा की, जिसमें पश्चिम बंगाल सहित 12 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं. SIR का उद्देश्य वोटर लिस्ट से फर्जी नाम हटाना, मृत वोटरों को डिलीट करना, दोहरी एंट्री को दूर करना और प्रवासी वोटरों को अपडेट करना है. प्रक्रिया 28 अक्टूबर से तीन नवंबर तक ट्रेनिंग और प्रिंटिंग के साथ शुरू होगी, जबकि घर-घर सर्वे चार नवंबर से चार दिसंबर तक चलेगा. ड्राफ्ट लिस्ट नौ दिसंबर को जारी होगी, दावा-आपत्ति आठ जनवरी 2026 तक और अंतिम लिस्ट सात फरवरी 2026 को प्रकाशित होगी. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि यह एक्सरसाइज हर योग्य वोटर को शामिल करने और अयोग्य को हटाने के लिए है. बंगाल में कोई विवाद नहीं है, राज्य सरकार अपना सहयोग देगी. ममता बनर्जी ने किया विरोध हालांकि, ममता बनर्जी ने SIR को ‘NRC जैसा अभ्यास’ बताते हुए कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने आयोग पर राजनीतिक दबाव में काम करने का आरोप लगाया और कहा कि आयोग के अधिकारी हमारे अधिकारियों को धमकियां दे रहे हैं. यह ‘लॉलीपॉप सरकार’ का खेल है. बंगाल में दंगे भड़क सकते हैं. जुलाई से ही ममता का रुख आक्रामक रहा है. उन्होंने बीएलओ की मीटिंग पर नाराजगी जताई कि यह राज्य सरकार को सूचित किए बिना हुई. अक्टूबर में उन्होंने कहा कि आयोग आग के साथ खेल रहा है. उत्तर बंगाल में बाढ़ प्रभावित परिवार दस्तावेज कैसे देंगे. टीएमसी का दावा है कि SIR से 1.2 करोड़ वोटरों को हटाने की साजिश है, जो उनके वोट बैंक को नुकसान पहुंचाएगी. इन आरोपों के बीच राज्य सरकार ने 14 जिलाधिकारियों समेत प्रमुख अधिकारियों का तबादला कर दिया. प्रभावित जिलों में उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कूच बिहार, मुर्शिदाबाद, पुरुलिया, दार्जिलिंग, मालदा, बीरभूम, झारग्राम और पूर्व मिदनापुर शामिल हैं. कई अधिकारी ढाई से चार साल से पद पर थे, जो ECI के तीन साल के नियम का उल्लंघन कर रहे थे. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह रूटीन तबादला है, लेकिन SIR शुरू होने के बाद जटिल हो जाता. भाजपा ने इसे ‘अवैध हेरफेर’ बताते हुए आयोग से शिकायत की है. प्रदेश बीजेपी नेता सिसिर बाजोरिया ने कहा कि आयोग की अनुमति के बिना 235 अधिकारियों का तबादला SIR का उल्लंघन है. 17 डीएम, 22 एडीएम, 45 एसडीओ और 151 बीडीओ का तबादला किया गया है. इसे रद्द किया जाए.

TMC ने INDIA ब्लॉक से दूरी बनाई, उपराष्ट्रपति चुनाव में रखी ये मांग

कलकत्ता उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर NDA और विपक्षी INDIA गठबंधन के बीच सियासी हलचल तेज हो गई है. एनडीए ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि विपक्षी पार्टियों के बीच अब भी आखिरी सहमति नहीं बन पाई है. सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मानना है कि INDIA गठबंधन का उम्मीदवार तमिलनाडु से नहीं होना चाहिए, और साथ ही ममता बनर्जी की पार्टी ने उम्मीदवार को लेकर अपनी मंशा भी जाहिर की है. टीएमसी चाहती है कि विपक्ष एक नॉन-पॉलिटिकल उम्मीदवार उतारे, जो बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ लड़ाई को मज़बूत कर सके. टीएमसी का कहना है कि यह चुनाव सिर्फ पद की लड़ाई नहीं बल्कि संविधान और "आइडिया ऑफ इंडिया" को बचाने की जंग है. टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास से निकलते समय बताया था कि "कल (मंगलवार) दोपहर 12.30 बजे मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर INDIA गठबंधन की बैठक होगी." उन्होंने भरोसा जताया कि विपक्ष शाम तक एक मजबूत उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर देगा. एनडीए ने सीपी राधाकृष्णन को बनाया है अपना उम्मीदवार दूसरी तरफ, एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक करियर लंबा और प्रभावशाली रहा है. वह 31 जुलाई 2024 से महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. इससे पहले फरवरी 2023 से जुलाई 2024 तक उन्होंने झारखंड के राज्यपाल के रूप में काम किया. इस दौरान उन्हें राष्ट्रपति की तरफ से तेलंगाना के राज्यपाल और पुडुचेरी के लेफ्टिनेंट गवर्नर का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था. राधाकृष्णन तमिलनाडु से आने वाले वरिष्ठ बीजेपी नेता हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका अनुभव चार दशकों से भी अधिक का है. वे दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और कोयंबटूर से संसद पहुंचे थे. 2004 से 2007 तक उन्होंने तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई. उनकी पहचान आरएसएस विचारधारा से जुड़ी हुई है. सितंबर में होंगे उपराष्ट्रपति चुनाव उपराष्ट्रपति चुनाव 9 सितंबर 2025 को होना है. यह चुनाव पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफे के बाद कराया जा रहा है. अब देखना यह होगा कि INDIA गठबंधन किस उम्मीदवार को मैदान में उतारकर एनडीए के मुकाबले में खड़ा करता है.

भाषा बनी हिंसा की वजह? तमिलनाडु में बंगाली युवकों से मारपीट, पश्चिम बंगाल में केस

तिरुवल्लुर महाराष्ट्र में चल रहे भाषा विवाद की आग अब तमिलनाडु में भी पहुंच गई है। राज्य के तिरुवल्लुर जिले में पश्चिम बंगाल के चार युवकों को पीटने का मामला सामने आया है। चार युवकों बंगाली में बात करने के लिए पीटा गया है। बंगाली में बात कर रहे स्थानीय लोगों ने इन युवकों को बांग्लादेशी समझा और बेरहमी से पीट दिया। इस संबंध में पीड़ितों के परिवार ने मुर्शिदाबाद जिले में 17 जुलाई को पुलिस शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत के अनुसार, सुजान शेख, उनके भाई मिलन शेख, साहिल शेख और बाबू शेख तीन हफ्ते पहले चेन्नै गए थे। वहां पर वे निर्माण कार्य में लगे हुए थे। जहां उनकी पिटाई की गई। घटना 15 जुलाई की शाम की है, जब वे तिरुवल्लुर में थे। बंगाली में बात करते सुना तो पीट डाला सुजान के पिता द्वारा दर्ज शिकायत में कहा गया कि जब कुछ स्थानीय लोगों ने उनसे नाम और पता पूछा और बांग्ला में बात करते सुना, तो उन्होंने उन्हें बांग्लादेशी समझकर लोहे की छड़ों और लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। इस हमले में चारों घायल हो गए और सरकारी मेडिकल कॉलेज तिरुवल्लुर में प्राथमिक उपचार के बाद वे तुरंत मुर्शिदाबाद लौट आए। पीड़ित सुजान और मिलन के पिता आशाबुल शेख ने बताया कि मेरे छोटे बेटे का हाथ टूट गया। उसकी सर्जरी हुई है और वह अब भी नर्सिंग होम में भर्ती है। बड़े बेटे को भी गंभीर चोटें आई हैं और दोनों को कई हफ्तों तक बिस्तर पर रहना होगा। मजदूरी भी नहीं मिली इस हमले में घायल मिलन शेख ने बताया कि हम बहुत डरे हुए थे। हम पहली बार चेन्नै काम करने गए थे। 11 दिन की मजदूरी भी नहीं मिली। घर लौटने के लिए मैंने अपने पिता से 12 हजार रुपये मंगवाए। पीड़ितों के परिवार ने प्रशासन से इस मामले में कड़ी कार्रवाई और मुआवजे की मांग की है। षा युद्ध की बात कर माहौल बनाने लगीं ममता पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अब करीब 10 महीने का ही समय बचा है। अगले साल अप्रैल-मई में राज्य में इलेक्शन होने वाले हैं। इससे ठीक पहले उन्होंने बांग्ला भाषा का मसला उठाना तेज कर दिया है। देश के कई हिस्सों में अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा उठाए जाने को उन्होंने बंगालियों के उत्पीड़न से जोड़ दिया है। गुरुवार को कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि अब हमें फिर से एक भाषा आंदोलन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भाजपा शासित राज्यों में बांग्ला भाषी लोगों को बांग्लादेशी कहकर हिरासत में लिया जा रहा है। उन्हें काम करने से रोका जा रहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि यह स्थिति तो भाषाई आतंकवाद जैसी है। इस तरह भाषा को मुद्दा बनाना और एक नए आंदोलन की बात से ममता बनर्जी ने संदेश दे दिया है कि वह चुनाव तक इस मसले को खींचने की तैयारी में हैं। पहले भी ममता बनर्जी चुनावों में बांग्ला कार्ड चलती रही हैं। ऐसे में ममता बनर्जी का रुख एक बार फिर से उसी तरफ बढ़ता दिख रहा है। ममता दीदी ने कहा, 'बंगाली भाषा के खिलाफ जिस तरह का भाषायी आतंकवाद शुरू किया है, वह खतरनाक है। बंगाली भाषा दुनिया में 5वीं सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। देश में 30 करोड़ लोग बांग्लाभाषी हैं। फिर भी इन लोगों को जेल में डाला जा रहा है। हमें इसे स्वीकार नहीं कर सकते।' उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मेरी ही बात नहीं है बल्कि तमाम बांग्ला भाषी लोगों की है। इस तरह हम लोगों की भाषा पर हमला नहीं हो सकता। बंगाल हम लोगों के लिए सब कुछ है और हम अपनी जमीन बचाने के लिए कुछ भी करेंगे। उन्होंने कहा कि बांग्ला भाषा के नाम पर किसी को हिरासत में रखे जाने को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। दरअसल हाल ही में एनसीआर के गुरुग्राम में बांग्ला भाषी कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया था। बता दें कि बांग्ला भाषी लोगों की आबादी बंगाल के अलावा बड़ी संख्या में असम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में भी है।