नई दिल्ली लोधी रोड पर कैंप में रहने वाली 52 साल की उमा खुश हैं कि ' दिल्ली लक्ष्मी योजना' की वजह से उनकी बचत में हर महीने कुछ पैसे जुड़ेंगे। उनकी बेटी ने अभी कॉलेज जाना शुरू किया है, और उमा को उसकी शादी के लिए पैसे जुटाने की चिंता थी। 29 साल की प्रीति के लिए, हर महीने मिलने वाले 2,500 रुपये का मतलब सिर्फ एक है- अपनी 10 साल की बेटी की पढ़ाई में रुचि को बढ़ावा देना। उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी के नाथूपुरा में रहने वाली प्रीति के परिवार के भविष्य का सपना उनकी बेटी की पढ़ाई पर टिका है। उन्होंने गर्व से TOI को बताया कि वह टीचर बनना चाहती हैं। और प्रीति क्या चाहती हैं? अपने तीन साल के शरारती बेटे को संभालते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों के बाद, मेरी अपनी इच्छाएं खत्म हो गईं। क्या कह रहीं दिल्ली की महिलाएं? कोटला मुबारकपुर के पास रहने वाली सुमित्रा (35) के मन में भी लंबे समय से यही बात थी। उनकी जिंदगी अपने 15 और 13 साल के बेटों की परवरिश और पति की मदद करने के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन मिलने वाले स्टाइपेंड (भत्ते) की उम्मीद ने जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी एक पुरानी इच्छा को फिर से उनके दिल में जगा दिया। सुमित्रा सिलाई सीखना चाहती थीं। लेकिन छह महीने के कोर्स की फीस 4,000-5,000 रुपये है। पति की 20,000 रुपये महीने की सैलरी में सुमित्रा का घर बहुत सीमित बजट में चलता है। 5,000 रुपये किराए में, लगभग 10,000 रुपये खाने-पीने और राशन में, और बाकी पैसे बेटों की पढ़ाई और घर के दूसरे खर्चों में चले जाते हैं। 2500 रुपये की मदद से कितना असर हालांकि, अब, सुमित्रा घर तक सीमित भूमिकाओं से आगे की सोच रही हैं। वह सिलाई सीखना चाहती हैं, अपना कुछ शुरू करना चाहती हैं और घर में ज्यादा योगदान देना चाहती हैं। उनके पति, जो चपरासी का काम करते हैं, ने कहा कि अगर वह अपने पैसे खुद कमाएंगी तो मुझे बहुत खुशी होगी। 2025 के विधानसभा चुनावों के दौरान, बीजेपी के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने घोषणा की थी कि वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की सहायता देगी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा था कि इस कदम का मकसद ऐसी महिलाओं को ज्यादा आर्थिक सुरक्षा देना और उन्हें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करना है। कुछ राहत, लेकिन आय की शर्तें 'पहले इंडिया फाउंडेशन' के चेयरमैन और नीति आयोग के पूर्व वाइस-चेयरमैन, अर्थशास्त्री राजीव कुमार के अनुसार, हालांकि यह योजना महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण बचत का अवसर देती है, लेकिन आय की पात्रता की शर्त कई लोगों को इससे बाहर कर सकती है। राजीव कुमार ने कहा कि कोई भी अतिरिक्त आय कुछ राहत तो देती ही है। लेकिन सालाना 2.5 लाख रुपये से कम पारिवारिक आय का मानदंड थोड़ा कड़ा है। इसका मतलब है कि प्रति परिवार मासिक आय 21,000 रुपये से कम या प्रतिदिन 700 रुपये से कम होनी चाहिए। क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट उन्होंने आगे कहा कि इसका मतलब चार लोगों के परिवार के लिए प्रति व्यक्ति आय प्रतिदिन 200 रुपये से कम है। राजीव कुमार ने बताया कि मार्च में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 के लिए दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय 5.3 लाख रुपये रहने का अनुमान था। हम इससे ज्यादा आय सीमा (कट-ऑफ) चुन सकते थे। अंजली ने बताया कैसे चलता है घर खर्च करोल बाग के शिदीपुरा की रहने वाली अंजली (38) अपने घर के पास एक गोदाम में पेन और अन्य सामान पैक करके महीने के 7,000 रुपये कमाती हैं। उनके पति की न तो कोई पक्की नौकरी है और न ही कोई निश्चित वेतन। हालांकि, आय के अनिश्चित स्रोतों के बावजूद, वह घर संभालने में माहिर हैं और यह जोड़ा मिलकर अगले महीने की योजना बनाता है। उन्होंने कहा कि बहुत सारी परेशानियां हैं, लेकिन हम उनका सामना करते हैं और आगे बढ़ते रहते हैं। 'लक्ष्मी योजना जरूर मिलेगी कुछ राहत' अंजली ने कहा कि उनके घर में एक ऐसा खर्च है जिसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती, और वह है उनके 15 साल के बेटे की स्कूल और ट्यूशन फीस- जो महीने में 2,000 से 3,000 रुपये है। उनके 70 से ज्यादा उम्र के सास-ससुर, जिनके घर में पूरा परिवार रहता है, उनका साथ देते हैं और उन्हें राहत भी मिलती है। महंगाई का असर इस इनकम ग्रुप वाले परिवारों के लिए, जिन्हें जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ने की उम्मीद नहीं होती, 'लक्ष्मी योजना' जैसी वेलफेयर स्कीम कितनी मददगार होती है? डीयू के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में इकोनॉमिक्स की एसोसिएट प्रोफेसर शिरीन अख्तर ने कहा कि दिल्ली में औसत प्रति व्यक्ति आय इतनी ज्यादा है, फिर भी बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनकी सालाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है। यह भारी असमानता को दिखाता है। यह बंटवारे से जुड़ा मुद्दा है। 2500 रुपये का ट्रांसफर बेहद अहम शिरीन अख्तर ने आगे कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी पर गौर करें। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पूरे भारत में चीनी की औसत खुदरा कीमत जुलाई में लगभग 48 रुपये प्रति किलो थी, जो 26 अगस्त तक 65 रुपये से ज्यादा हो गई। जो परिवार बमुश्किल अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर पा रहे हैं, उनके लिए कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी का मतलब है कि उन्हें अपनी खपत में असल बदलाव करने पड़ सकते हैं। ऐसे में, 2,500 रुपये का ट्रांसफर अहम हो जाता है। हालांकि, अख्तर ने कहा कि सबसे गरीब परिवारों के मामले में, 'खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा जरूरी चीजों पर ही होता है।' महिलाओं की जिंदगी बदलेगी ये योजना! शिरीन अख्तर ने कहा कि यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि परिवार क्या खरीदना बंद कर देता है? यदि यह फल, दूध, दालें हैं, तो आज की मुद्रास्फीति कल की पोषण संबंधी कमी बन जाती है। यदि यह दवाएं हैं, तो यह स्वास्थ्य की कमी बन जाती है। यदि यह ट्यूशन, किताबें या स्कूली शिक्षा है, तो यह मानव-पूंजी की कमी बन जाती है। यदि परिवार केवल आवश्यक उपभोग को बनाए रखने के लिए उधार लेता है, तो आज की … Read more