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इंदौर एयरपोर्ट विस्तार पर ब्रेक! 143 एकड़ जमीन की जरूरत, एक दशक से अटका मामला

इंदौर देश के सबसे स्वच्छ शहर और मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा मिले लंबा समय बीत चुका है। इसके बावजूद, शहर को आज भी सीधी वैश्विक कनेक्टिविटी नहीं मिल पा रही है। इस गतिरोध की मुख्य वजह एयरपोर्ट विस्तार के लिए आवश्यक महज 143 एकड़ जमीन का आवंटन रुकना है। सालाना 40 लाख यात्री और 80 फ्लाइट्स का दबाव झेल रहे इस एयरपोर्ट का विस्तार बेहद जरूरी हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा भेजा गया भूमि अधिग्रहण का यह प्रस्ताव लंबे समय से विचाराधीन है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय इस संबंध में कई बार पत्र भी लिख चुका है, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर अंतिम मंजूरी का इंतजार है। यदि यह जमीन मिल जाए, तो इंदौर से सीधे बड़े अंतरराष्ट्रीय विमान उड़ान भर सकेंगे और यात्रियों को दिल्ली-मुंबई की कनेक्टिंग फ्लाइट्स के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी। विलंब के कारण संरक्षित जमीन पर अतिक्रमण और अन्य प्रोजेक्ट के लिए आवंटन का डर है। कुछ जमीन मेट्रो के स्टेशन के लिए दी जा चुकी है। हालांकि, अफसरों का दावा है कि इस पर तेजी से काम चल रहा है। विस्तार का गणित: दो चरणों में बदलना है नक्शा एयरपोर्ट प्रबंधन और प्रशासन ने वर्तमान आवश्यकताओं को देखते हुए विस्तार के मूल प्लान को दो चरणों में रीडिजाइन किया है:     पहला चरण (89 एकड़ की जरूरत): रनवे की लंबाई 2700 मीटर से बढ़ाकर 3500 और फिर 4000 मीटर करना है। इससे प्रति घंटे 15 के बजाय 24 फ्लाइट आ-जा सकेंगी।     दूसरा चरण (54 एकड़ की जरूरत): नया आधुनिक टर्मिनल बनाया जाएगा। विमान पार्किंग की क्षमता 26 से बढ़कर 54 हो जाएगी, जिससे रात में भी बड़े विमान पार्क हो सकेंगे। विजन 2047: जब 729 एकड़ का परिसर तीन गुना होगा इंदौर एयरपोर्ट वर्तमान में केवल 729 एकड़ में है। वर्ष 2047 तक की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आसपास के गांवों—सिंहासा और कोड़िया बड़ी की 1100 एकड़ जमीन मिलाकर 1950 एकड़ का मास्टर प्लान तैयार किया गया है। तब तक यात्री क्षमता 10 से 12 गुना बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, आरक्षित जमीन की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, बड़े हिस्से पर अतिक्रमण हो चुका है, जिससे फनल और लाइट एरिया भी प्रभावित हुआ है। चापड़ा योजना निरस्त, अब उज्जैन भी रेस में आगे जमीन की उपलब्धता में आ रही दिक्कतों को देखते हुए पूर्व में इंदौर से 45 किलोमीटर दूर चापड़ा में एक नया 'ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट' बनाने की योजना तैयार की गई थी। इसके चलते इंदौर एयरपोर्ट के मूल विस्तार प्लान को सीमित कर दिया गया था, लेकिन अब चापड़ा का प्रस्ताव पूरी तरह निरस्त हो चुका है। वहीं, उज्जैन में नया प्रोजेक्ट मंजूर किया गया है। सबसे बड़ा पेंच… भूमि अधिग्रहण का मुआवजा मेट्रोपॉलिटन रीजन के विकास के तहत पड़ोसी धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ के मद्देनजर नए एयरपोर्ट की प्लानिंग तेजी से आगे बढ़ी है, जिसके लिए 45 करोड़ की राशि भी स्वीकृत हो चुकी है। इंदौर के विस्तार प्रस्ताव में सबसे बड़ा पेंच भूमि अधिग्रहण के मुआवजे की राशि को लेकर फंसा है, जिसकी व्यवस्था राज्य सरकार को करनी है। देरी का खामियाजा… मेट्रो को दी 20 एकड़ जमीन पूर्व में जिला प्रशासन ने एयरपोर्ट प्रबंधन को सुविधा विस्तार के लिए 20 एकड़ जमीन सौंपी थी। लंबे समय तक उपयोग नहीं किया गया और योजनाएं कागजों में ही घूमती रहीं। परिणाम यह हुआ कि अब उस आवंटित जमीन पर मेट्रो ट्रेन का स्टेशन बनाया जा रहा है, जिससे एयरपोर्ट के पास उपलब्ध आंतरिक स्पेस और कम हो गया है।

26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन-2026 में उत्कृष्ट केस स्टडी के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने पर डीजीपी ने दी बधाई

भोपाल  राष्ट्रीय अपराध रकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नई दिल्ली में आयोजित 26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन-2026 में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त करने वाले जिला विदिशा के निरीक्षक (फिंगरप्रिंट)  योगेन्द्र साहू ने आज पुलिस मुख्यालय भोपाल में पुलिस महानिदेशक  कैलाश मकवाणा से सौजन्य भेंट की। इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक  कैलाश मकवाणा ने निरीक्षक  योगेन्द्र साहू को उनकी उल्लेखनीय उपलब्धि पर बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान एवं आधुनिक तकनीकों का प्रभावी उपयोग वर्तमान पुलिसिंग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि मध्यप्रदेश पुलिस की तकनीकी दक्षता, अनुसंधान क्षमता एवं पेशेवर उत्कृष्टता का राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाण है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस उपलब्धि से प्रदेश के अन्य पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी भी वैज्ञानिक अनुसंधान तथा तकनीक आधारित अपराध विवेचना के लिए प्रेरित होंगे। उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली में 19 एवं 20 जून 2026 को आयोजित 26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन-2026 में देशभर के फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों, फोरेंसिक वैज्ञानिकों एवं पुलिस अधिकारियों ने सहभागिता की थी। सम्मेलन का उद्घाटन माननीय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री  अमित शाह द्वारा किया गया था। सम्मेलन में मध्यप्रदेश पुलिस के निरीक्षक (फिंगरप्रिंट)  योगेन्द्र साहू को “Smart Use of Fingerprint Science in Investigation” विषय पर प्रस्तुत उत्कृष्ट केस स्टडी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया। उनकी प्रस्तुति जिला विदिशा के थाना शमशाबाद में दर्ज एक जघन्य ब्लाइंड मर्डर प्रकरण पर आधारित थी, जिसमें घटनास्थल से प्राप्त फिंगरप्रिंट साक्ष्यों एवं नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (NAFIS) के प्रभावी उपयोग के माध्यम से आरोपी की पहचान कर प्रकरण का सफल निराकरण किया गया था। केस स्टडी में वैज्ञानिक साक्ष्य संकलन, तकनीकी विश्लेषण, आधुनिक फिंगरप्रिंट विज्ञान तथा NAFIS प्रणाली के प्रभावी उपयोग को विस्तार से प्रदर्शित किया गया, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा विशेष सराहना की गई। प्रतियोगी मूल्यांकन में देशभर से प्राप्त प्रविष्टियों के मध्य इस प्रस्तुति को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा वैज्ञानिक एवं तकनीक आधारित पुलिसिंग को सशक्त बनाने के निरंतर प्रयासों का परिणाम है। इस अवसर पर अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (SCRB)  जयदीप प्रसाद, संचालक फिंगरप्रिंट ब्यूरो मध्यप्रदेश  मनोज राजपूत उपस्थित थे।  

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को बड़ा सम्मान: राष्ट्रपति मुर्मू ने परिवार को सौंपा पद्म भूषण

रांची झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. मंगलवार को संसद भवन में आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया. इस अवसर पर गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, अंजनी सोरेन और परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे. शिबू सोरेन को यह सम्मान आदिवासी समाज, झारखंड आंदोलन और सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे योगदान के लिए दिया गया है. नेमरा गांव से शुरू हुआ था संघर्ष का सफर शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. बचपन में उनका नाम शिवलाल था, लेकिन बाद में वे शिबू सोरेन के नाम से देशभर में पहचान बनाने लगे. उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा नेमरा गांव के स्कूल और बाद में गोला हाई स्कूल से प्राप्त की. उनके पिता सोबरन सोरेन शिक्षक होने के साथ गांधीवादी विचारधारा के समर्थक थे. 27 नवंबर 1957 को महाजनों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई. जमीन कब्जे और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के कारण हुई इस घटना ने किशोरावस्था में ही शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना. महाजनों के खिलाफ आंदोलन से मिली पहचान युवा अवस्था में उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित करने का काम शुरू किया. उन्होंने संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज का गठन किया. इसके बाद धनकटनी आंदोलन चलाकर आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा दी. गोला, बोकारो, जैनामोड़ और टुंडी क्षेत्र में आंदोलन को मजबूत करने के दौरान उनकी मुलाकात विनोद बिहारी महतो से हुई. बाद में पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी क्षेत्र को उन्होंने अपने आंदोलन का केंद्र बनाया. टुंडी में बनाई सामाजिक व्यवस्था की नई मिसाल टुंडी और आसपास के इलाकों में शिबू सोरेन ने सामूहिक खेती, पशुपालन और रात्रि पाठशालाओं की शुरुआत कर ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया. उस समय क्षेत्र में उनकी एक तरह की समानांतर सामाजिक व्यवस्था भी चलती थी, जहां स्थानीय विवादों का निपटारा किया जाता था. इन्हीं प्रयासों के कारण आदिवासी और मूलवासी समाज में उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और वे “दिशोम गुरु” के नाम से पहचाने जाने लगे. झारखंड आंदोलन को दी नई दिशा साल 1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की. पार्टी में विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव बने. अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन आने वाले वर्षों में व्यापक जन आंदोलन में बदल गया. आपातकाल के दौरान वर्ष 1975 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 1977 में उन्होंने टुंडी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर 1980 में वे पहली बार दुमका से लोकसभा सांसद चुने गए. इसके बाद कई बार संसद पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद उन्होंने झामुमो की कमान संभाली और पार्टी अध्यक्ष बने. 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ, लेकिन वे पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके. हालांकि बाद के वर्षों में उन्होंने तीन बार राज्य की कमान संभाली.     2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर सके.     2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने.     2009 में तमाड़ विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद इस्तीफा देना पड़ा.     दिसंबर 2009 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने.     वर्ष 2010 में उनकी सरकार गिर गई. मोदी लहर में भी बरकरार रखा जनाधार 2014 के लोकसभा चुनाव में देशभर में भाजपा और नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद शिबू सोरेन दुमका से सांसद चुने गए. 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया और वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय बने रहे. 15 अप्रैल 2025 को झामुमो के महाधिवेशन में हेमंत सोरेन को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि शिबू सोरेन को संस्थापक संरक्षक की जिम्मेदारी सौंपी गई. लंबी बीमारी के बाद हुआ निधन लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में नई दिल्ली स्थित सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया. उनके निधन से झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के एक युग का अंत माना गया. संघर्ष से सम्मान तक की यात्रा शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने दशकों तक आदिवासियों, वंचितों और झारखंड की पहचान के लिए संघर्ष किया. यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि “दिशोम गुरु” के रूप में याद करते हैं. अब मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान के साथ उनके सार्वजनिक जीवन और योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी औपचारिक मान्यता मिली है. नेमरा गांव के एक साधारण परिवार से निकलकर देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान तक पहुंचने की यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र और जन आंदोलनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज रहेगी.

कानपुर में कोचिंग सेंटरों पर छापा: 26 प्रतिष्ठान सील, सुरक्षा नियमों पर सख्त कार्रवाई

लखनऊ लखनऊ में आग की घटना के बाद हरकत में आए केडीए ने समूचे शहर में अवैध बेसमेंट, बेसमेंट में हो रहे नियम विपरीत व्यावसायिक कार्य और अग्निशमन संयंत्रों के बिना संचालित किए जा रहे प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की। लखनऊ अग्निकांड के बाद जागी सरकारी मशीनरी ने सोमवार की शाम से ही शहर में छापेमारी जारी रखी है। मंगलवार को भी दोपहर बाद तक 10 और कोचिंग सेंटरों को सील कर दिया गया। इसके साथ ही 20 और कोचिंग सेंटर कार्रवाई के लिए चिन्हित किए गए हैं। कानपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष अंकुर कौशिक के निर्देश पर यह अभियान चल रहा है। सोमवार को भी 16 कोचिंग सेंटर सील किए गए थे। अब तक इसकी संख्या 26 पहुंच चुकी है। दूसरी ओर पुलिस कमिश्नर ने कोचिंग सेंटर संचालकों के साथ बैठक की है, जिसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने के आसार हैं। सूत्रों के मुताबिक शहर के अधिकांश कोचिंग सेंटर बंद कर दिए गए हैं। कुछ सेंटरों में अग्नि शमन से जुड़ी सेवाएं शुरू की जा रही हैं। जिन कोचिंग सेंटर में क्लासेस चल रहे थे उनमें से छात्र-छात्राओं को पहले बाहर किया गया उसके बाद विकास प्राधिकरण द्वारा सील लगाई गई। इस दौरान विकास प्राधिकरण के सचिव अभय कुमार पांडेय ने बताया कि छात्र-छात्राओं की जन की सुरक्षा के लिए ही यह कदम उठाए गए हैं। अग्निशमन सुरक्षा संबंधी उपकरण और इंतजाम करने के बाद सेंटरों से सील हटाई जा सकती है। सोमवार को कोचिंग सेंटरों समेत 16 प्रतिष्ठान सील सोमवार को भी कानपुर में कोचिंग सेंटर समेत 16 प्रतिष्ठानों को सील कर दिया। इसके साथ ही अन्य प्रतिष्ठानों को भी कार्रवाई के लिए चिह्नित किया गया है। शासन के निर्देश पर केडीए उपाध्यक्ष अंकुर कौशिक ने सभी प्रवर्तन जोन के प्रभारियों को निर्देश दिया कि तत्काल जोन में जाएं और नियमों के विपरीत संचालित प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करें। इसमें कोचिंग संस्थान, गेमिंग सेंटर और काम्प्लेक्स में संचालित शो रूम को भी सूचीबद्ध किया गया। इससे पहले दिल्ली में आग की घटना के बाद भी केडीए ने अभियान चलाया था और प्रतिष्ठानों की सूची तैयार की थी। ऐसे में अभियान चलाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। सोमवार को केडीए सबसे पहले बड़े कोचिंग सेंटरों पर धावा बोला। विद्यापीठ, फिजिक्स वाला, संजीव राठौर कोचिंग सेंटर, फिजिक्स स्टाइल ऑफ विवेक और अंकित सर क्लासेज के कोचिंग सेंटर को सील किया। केडीए के विधि, जनसंपर्क अधिकारी एवं ओएसडी सत शुक्ला के मुताबिक प्रवर्तन जोन-1ए में तीन, जोन-2बी में पांच, जोन-3 में तीन तथा जोन-4 में पांच प्रतिष्ठानों के विरुद्ध सीलबंदी की कार्यवाही की गई।

यमुना जल परियोजना को मिली रफ्तार, राजस्थान में पाइपलाइन से पानी सप्लाई का फॉर्मूला तय

जयपुर राजस्थान में पानी के पुराने और पेचीदा विवाद अब सुलझने के नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। मध्य प्रदेश के साथ पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) का विवाद सुलझाने के ठीक बाद, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अब पड़ोसी राज्य हरियाणा के साथ दोस्ती का नया हाथ बढ़ाया है। मंगलवार को देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय अंतर्राज्यीय बैठक में शेखावाटी अंचल को यमुना का पानी देने के ऐतिहासिक फॉर्मूले पर सहमति बन गई है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी में हुई इस त्रिपक्षीय बैठक में 'यमुना जल परियोजना' को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबी और निर्णायक चर्चा हुई। तैयार हुआ 'पाइपलाइन फॉर्मूला', केंद्रीय जल आयोग पहुंची DPR इस बैठक का मुख्य फोकस यमुना नदी के पानी को राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनूं (शेखावाटी क्षेत्र) तक पहुंचाने के लिए तैयार किए जा रहे 'मेमोरेन्डम ऑफ एग्रीमेंट' के विधिक और तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप देना था। तकनीकी विकास को लेकर सबसे बड़ी खबर यह है कि राजस्थान तक पानी लाने के लिए अंडरग्राउंड पाइपलाइन बिछाने की संयुक्त विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पूरी तरह तैयार कर ली गई है। दोनों राज्यों के जल संसाधन विभागों ने इसे आपसी सहमति के बाद केंद्रीय जल आयोग को अंतिम विधिक स्वीकृति के लिए सौंप दिया है। 'खत्म हो रहा है पानी पर लड़ने का दौर'- सीएम भजनलाल बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस मुलाकात को राज्य के सुनहरे भविष्य के लिए मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा- देश में अब राज्यों के बीच पानी को लेकर चलने वाले पुराने विवादों का दौर खत्म हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में सभी राज्य अब विवाद नहीं, बल्कि समाधान की राह पर बढ़ रहे हैं। उन्होंने ERCP का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे एमपी और राजस्थान ने मिलकर राह निकाली, वैसे ही अब हरियाणा और राजस्थान मिलकर समाधान की ओर बढ़ चुके हैं। बहुत जल्द ही प्रधानमंत्री की गरिमामयी उपस्थिति में दोनों राज्यों के बीच अंतिम समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए जाएंगे। शेखावाटी के अन्नदाता और जनता को मिलेगा भरपूर पानी यह परियोजना शेखावाटी के लिए 'लाइफलाइन' साबित होने वाली है। इस फॉर्मूले के तहत न केवल आम जनता को पीने का मीठा पानी मिलेगा, बल्कि क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के लिए भी पर्याप्त जल उपलब्ध होगा। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृतियों की प्रक्रिया भी समानांतर रूप से चलाई जा रही है ताकि MoU होते ही धरातल पर काम शुरू किया जा सके। सीएम ने साफ किया कि 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुदृढ़ जल प्रबंधन बेहद आवश्यक है।

हालैंड का जलवा और ‘वाइकिंग रो’ का जश्न—नॉर्वे की जीत बना स्टेडियम का यादगार नजारा

नई दिल्ली  नॉर्वे ने सोमवार को न्यू जर्सी में सेनेगल को 3-2 से हराकर फीफा वर्ल्ड कप 2026 के नॉकआउट चरण में अपनी जगह पक्की कर ली। जीत के बाद खिलाड़ियों ने कप्तान मार्टिन ओडेगार्ड के नेतृत्व में समर्थकों के साथ पारंपरिक "वाइकिंग रो" के जरिए जश्न मनाया। वाइकिंग रो वर्ल्ड कप के दौरान नॉर्वे के प्रशंसकों के बीच एक लोकप्रिय परंपरा बन गई है। इसमें समर्थक वाइकिंग्स की लंबी नाव जैसी आकृति में बैठते हैं और ढोल की ताल पर चप्पू चलाने जैसी गतिविधि करते हैं। इसकी तुलना अक्सर आइसलैंड के प्रसिद्ध "वाइकिंग क्लैप" से की जाती है। खिलाड़ी और कोचिंग स्टाफ ने साथ मनाया जश्न नॉर्वे के समर्थक अपने दोनों वर्ल्ड कप मुकाबलों के दौरान और मेजबान शहरों बोस्टन और न्यूयॉर्क सिटी में इस नारे और उत्सव का प्रदर्शन कर चुके हैं। सोमवार की जीत के बाद खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने भी प्रशंसकों के साथ इस जश्न में भाग लिया मैच में शानदार प्रदर्शन करने वाले एरलिंग हालैंड ने कहा कि अगर नॉर्वे जीत हासिल करता है तो वह इस उत्सव को मनाने के लिए उत्सुक थे। हालैंड ने फॉक्स स्पोर्ट्स से कहा, 'मैंने इसे इंटरनेट पर देखा था यह पूरी तरह वायरल हो चुका है। मैच से पहले मार्टिन ओडेगार्ड ने मुझसे पूछा, क्या तुम्हें लगता है कि हमें भी इसमें शामिल होना चाहिए?' मैंने कहा, 'अगर हम जीतते हैं, तो जरूर करेंगे।' क्या होता है वाइकिंग रो? कहा जाता है कि वाइकिंग रो एकता शक्ति और टीमवर्क का प्रतीक है। यह परंपरा युद्ध से पहले एक साथ चप्पू चलाने वाले वाइकिंग योद्धाओं की छवि से प्रेरित है। राष्ट्रीय टीम के प्रति समर्थन दिखाने के लिए प्रशंसक एक साथ तालमेल में यह गतिविधि करते हैं। फुटबॉल कै मैदान पर भी खिलाड़ी एकता के साथ खेलते हैं। इसीलिए खेल में भी इस सेलिब्रेशन का खास महत्व है। कैसा रह मैच का हाल इसके साथ ही बात की जाए मैच की तो नॉर्वे ने 43वें मिनट में मार्कस होल्मग्रेन पेडरसन के गोल की बदौलत बढ़त हासिल की। इसके बाद एरलिंग हालैंड ने 48वें और 58वें मिनट में गोल दागकर विपक्षी खेमे पर दबाव बना दिया। इस परिणाम के साथ नॉर्वे ने ग्रुप I में कम से कम दूसरा स्थान सुनिश्चित कर लिया है। शुक्रवार को मैसाचुसेट्स के फॉक्सबोरो में फ्रांस के खिलाफ होने वाला उनका अंतिम ग्रुप-स्टेज मुकाबला यह तय करेगा कि ग्रुप में शीर्ष स्थान किस टीम के पास जाएगा।

छात्रों की सुरक्षा पर प्रशासन का एक्शन: जयपुर में कोचिंग सेंटरों की फायर सेफ्टी जांच तेज

जयपुर लखनऊ के कोचिंग संस्थान में लगी भीषण आग में 15 लोगों की मौत के बाद जयपुर प्रशासन अलर्ट मोड पर आ गया है। शहर में हजारों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों पर निर्भर हैं। ऐसे में किसी भी तरह की सुरक्षा चूक को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़े पैमाने पर जांच अभियान शुरू किया है। मंगलवार को नगर निगम और पुलिस प्रशासन की संयुक्त टीमों ने शहर के विभिन्न कोचिंग संस्थानों में फायर सेफ्टी व्यवस्थाओं की पड़ताल की, जिसमें कई गंभीर खामियां सामने आईं। 13 कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई फायर सेफ्टी मानकों का पालन नहीं करने और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्थाओं में कमी पाए जाने पर नगर निगम ने अब तक 13 कोचिंग संस्थानों को सील कर दिया है। इनमें रिद्धि सिद्धि क्षेत्र, गोपालपुरा बाइपास, त्रिवेणी चौराहा और गोपालपुरा चौराहे के आसपास संचालित कई संस्थान शामिल हैं। प्रशासन का कहना है कि जहां भी छात्रों की सुरक्षा से समझौता होता दिखाई देगा, वहां बिना किसी रियायत के कार्रवाई की जाएगी। 24 से ज्यादा संस्थानों को नोटिस जांच के दौरान कई ऐसे कोचिंग सेंटर भी मिले जहां सुरक्षा व्यवस्था अधूरी या नियमों के अनुरूप नहीं पाई गई। ऐसे 24 से अधिक संस्थानों को नोटिस जारी कर निर्धारित समय में कमियां दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि नोटिस के बावजूद सुधार नहीं होने पर इन संस्थानों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाए जाएंगे फायर सिस्टम और इमरजेंसी एग्जिट पर खास नजर निरीक्षण के दौरान अधिकारी यह जांच रहे हैं कि भवनों में लगे फायर फाइटिंग सिस्टम काम कर रहे हैं या नहीं। अग्निशमन यंत्रों की वैधता, आपातकालीन निकास मार्गों की उपलब्धता, भवन की संरचना और किसी दुर्घटना की स्थिति में छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था की भी बारीकी से जांच की जा रही है। साथ ही संस्थानों से फायर एनओसी से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए हैं। कोचिंग हब होने के कारण बढ़ी जिम्मेदारी जयपुर प्रदेश का प्रमुख कोचिंग केंद्र माना जाता है। यहां हर साल हजारों छात्र मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। ऐसे में किसी भी दुर्घटना का असर केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सैकड़ों परिवारों की उम्मीदों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि प्रशासन इस बार किसी भी तरह की लापरवाही को नजरअंदाज करने के मूड में नहीं है। 35 से ज्यादा संस्थानों का हो चुका निरीक्षण नगर निगम और पुलिस प्रशासन की टीमें अब तक 35 से अधिक कोचिंग संस्थानों का निरीक्षण कर चुकी हैं। गोपालपुरा बाइपास, रामगढ़ मोड़, मानसरोवर, मालवीय नगर और अन्य प्रमुख क्षेत्रों में लगातार जांच अभियान चलाया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार आने वाले दिनों में यह अभियान और तेज किया जाएगा। जारी रहेगा अभियान प्रशासन का कहना है कि यह केवल शुरुआती कार्रवाई है। आगामी दिनों में शहर के अन्य कोचिंग सेंटरों, शैक्षणिक संस्थानों और भीड़भाड़ वाले भवनों की भी जांच की जाएगी। लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी आपात स्थिति में छात्रों और कर्मचारियों की सुरक्षा से समझौता न हो। लखनऊ की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे शैक्षणिक संस्थान आपदा से निपटने के लिए तैयार हैं। जयपुर में चल रही यह कार्रवाई उसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है, ताकि किसी हादसे के बाद पछताने की नौबत न आए।

परीक्षा देने वालों को बड़ी राहत: 23 और 24 जून को दौड़ेंगी 13 विशेष ट्रेनें

 पटना बिहार में पुलिस भर्ती परीक्षा में शामिल होने वाले लाखों अभ्यर्थियों के सफर को आसान और सुरक्षित बनाने के लिए पूर्व मध्य रेलवे ने एक बड़ा फैसला लिया है। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ और सहूलियत को ध्यान में रखते हुए दानापुर मंडल द्वारा 23 और 24 जून को कुल 13 विशेष ट्रेनों का परिचालन करने का निर्णय लिया गया है। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इन परीक्षा स्पेशल ट्रेनों का संचालन मुख्य रूप से पटना जंक्शन, पाटलिपुत्र और दानापुर समेत मंडल के अन्य महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों से किया जाएगा। रेलवे प्रशासन की इस मुस्तैदी से दूर-दराज के परीक्षा केंद्रों पर जाने वाले छात्रों को बसों में होने वाली भारी धक्का-मुक्की और सीटों की किल्लत से बड़ी राहत मिलेगी। 23 जून को पटरी पर उतरेंगी छह विशेष ट्रेनें परीक्षा स्पेशल ट्रेनों के पहले चरण में 23 जून को कुल छह विशेष गाड़ियां चलाई जा रही हैं, जो अभ्यर्थियों को उनके परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाएंगी। टाइम टेबल के मुताबिक, पहली ट्रेन पाटलिपुत्र जंक्शन से रात 8 बजे खुलकर सुबह 5 बजे सहरसा पहुंचेगी। वहीं, पटना जंक्शन से रात 8:50 बजे भभुआ के लिए और रात 9 बजे बेतिया के लिए विशेष ट्रेनें रवाना होंगी। इसके अतिरिक्त, पाटलिपुत्र जंक्शन से रात 9:45 बजे पूर्णिया के लिए, दानापुर स्टेशन से रात 10 बजे अररिया के लिए और पटना जंक्शन से ही रात 11 बजे सीवान के लिए आखिरी स्पेशल ट्रेन खुलेगी। यह सभी ट्रेनें देर रात सफर तय कर सुबह तड़के ही अभ्यर्थियों को उनके गंतव्य स्टेशन पर पहुंचा देंगी। 24 जून को चलेंगी सात और परीक्षा स्पेशल गाड़ियां ट्रेन परिचालन के दूसरे दिन यानी 24 जून को परीक्षार्थियों की वापसी और सहूलियत के लिए सात और विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी। रिपोर्ट के अनुसार, 24 जून को बख्तियारपुर से सुबह 7 बजे राजगीर के लिए पहली ट्रेन खुलेगी। इसके बाद किउल से दोपहर 12:30 बजे गया के लिए, राजगीर से दोपहर 1 बजे बख्तियारपुर के लिए और नवादा से दोपहर 1 बजे झाझा के लिए ट्रेनें चलेंगी। दोपहर बाद बक्सर से दोपहर 1:30 बजे दानापुर के लिए विशेष गाड़ी रवाना होगी। शाम के वक्त झाझा से शाम 5 बजे पटना जंक्शन के लिए और गया से शाम 5:30 बजे किउल के लिए अंतिम ट्रेनें चलाई जाएंगी, जिससे परीक्षा देकर लौट रहे युवाओं का सफर बेहद सुगम और सुरक्षित हो जाएगा।

RPSC to get a new chairman soon: Four names under consideration, preparations for a major decision intensify

जयपुर राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) को जल्द नया अध्यक्ष (New Chairman) मिल सकता है. पूर्व अध्यक्ष यूआर साहू का कार्यकाल 19 जून को पूरा होने के बाद से आयोग का अध्यक्ष पद खाली है. ऐसे में राज्य सरकार ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति की प्रक्रिया तेज कर दी है. सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष पद के लिए चार वरिष्ठ अधिकारियों के नामों पर गंभीरता से मंथन चल रहा है. इनमें दो वर्तमान में कार्यरत और दो सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों के नाम शामिल बताए जा रहे हैं. हालांकि सरकार की ओर से अभी तक किसी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. फिलहाल आयोग के वरिष्ठ सदस्य लेफ्टिनेंट कर्नल केसरी सिंह राठौड़ को कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि आयोग की नियमित प्रशासनिक और भर्ती संबंधी गतिविधियां प्रभावित न हों. लेकिन सरकार स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति जल्द करना चाहती है. सरकार क्यों जल्द करेगी अध्यक्ष पर फैसला इस नियुक्ति को लेकर सरकार की जल्दबाजी की बड़ी वजह आगामी भर्ती परीक्षाएं हैं. आने वाले समय में आरएएस भर्ती-2026 समेत कई महत्वपूर्ण भर्तियों की प्रक्रिया शुरू होनी है. इसके अलावा विभिन्न विभागों में लंबित और प्रस्तावित भर्तियों को भी समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना है. ऐसे में आयोग में नियमित अध्यक्ष का होना जरूरी माना जा रहा है. कैसे अध्यक्ष की हो रही तलाश बताया जा रहा है कि सरकार ऐसे अधिकारी कि तलाश में है, जिसके पास लंबा प्रशासनिक अनुभव हो और जो भर्ती प्रक्रिया की जटिलताओं को समझते हुए आयोग की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बना सके. पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मामलों के कारण आयोग लगातार चर्चा में रहा है. ऐसे में नए अध्यक्ष के सामने आयोग की विश्वसनीयता को और मजबूत करने की चुनौती भी होगी. सीएम लगाएंगे अंतिम मुहर अध्यक्ष पद को लेकर दिल्ली से जयपुर तक लॉबिंग भी तेज हो गई है. प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर कई नामों को लेकर चर्चा चल रही है. लेकिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ऐसे अधिकारी के नाम पर अंतिम मुहर लगाना चाहते हैं, जिसकी प्रशासनिक छवि बेदाग रही हो और जिसे भर्ती प्रक्रिया तथा सुशासन का व्यापक अनुभव हो. सरकार ऐसे चेहरे की तलाश में है, जिसकी नियुक्ति से आयोग की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर सकारात्मक संदेश जाए. राजस्थान लोक सेवा आयोग राज्य की सबसे बड़ी भर्ती एजेंसी है. आयोग के माध्यम से आरएएस, राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं, शिक्षा, तकनीकी सेवाओं और विभिन्न विभागों की भर्ती परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं. लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य आयोग की कार्यप्रणाली और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया पर निर्भर करता है. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं. अध्यक्ष का कार्यकाल छह वर्ष या 62 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है.

बिहार में थानों का अपग्रेडेशन: 425 थानों में इंस्पेक्टर होंगे थाना प्रभारी

पटना बिहार में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और अपराधों की जांच को ज्यादा असरदार बनाने के लिए पुलिस मुख्यालय ने एक बड़ा निर्णय लिया है। अब राज्य के 425 महत्वपूर्ण पुलिस थानों की कमान सब-इंस्पेक्टर (दरोगा) के हाथों में नहीं होगी, बल्कि इन थानों में केवल इंस्पेक्टर रैंक के सीनियर अधिकारियों को ही थानाध्यक्ष (थाना प्रभारी) बनाया जाएगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार, डीजीपी विनय कुमार ने सोमवार को यह नया आदेश जारी कर दिया है। इन अनुभवी इंस्पेक्टरों के पास अब अंचल निरीक्षक (सर्किल इंस्पेक्टर) जैसी शक्तियां होंगी। इनके आने से थानों के अंदर मुकदमों की जांच और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए दो अलग-अलग विशेष टीमें पूरी मुस्तैदी से काम करेंगी। 217 नए थाने किए गए अपग्रेड इस नई प्रशासनिक व्यवस्था को लागू करने के लिए पुलिस मुख्यालय ने थानों को चुनने का एक बहुत ही साफ-सुथरा पैमाना तय किया है। पहले से तय 208 थानों के अलावा अब राज्य के 217 और थानों को अपग्रेड किया गया है। इन थानों को उनके बड़े आकार, अपराध के लिहाज से संवेदनशीलता और वहां हर साल दर्ज होने वाले कम से कम 350 या उससे अधिक मुकदमों की संख्या को देखकर चुना गया है। डीजीपी के आदेश के बाद यह नया नियम तुरंत पूरे बिहार में लागू कर दिया गया है। रेलवे और जिला पुलिस को सख्त हिदायत दी गई है कि अगर कोई इंस्पेक्टर छुट्टी पर भी जाता है, तो उसकी जगह नीचे के रैंक के किसी अधिकारी को इन थानों का परमानेंट चार्ज नहीं दिया जाएगा। थानेदार के नीचे काम करेंगे दो सब-इंस्पेक्टर इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन थानों में इंस्पेक्टर स्तर के थाना प्रभारी के नीचे दो अलग-अलग सब-इंस्पेक्टर (SI) तैनात किए जाएंगे। इनमें से एक सब-इंस्पेक्टर का काम सिर्फ केसों की जांच करना होगा, जबकि दूसरे सब-इंस्पेक्टर का काम इलाके में शांति बनाए रखना होगा। पुलिस मुख्यालय ने स्पष्ट किया है कि 425 थानों में इस नए तरीके से अफसरों की तैनाती करने से बिहार सरकार की तिजोरी पर कोई भी अतिरिक्त नया आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और न ही इसके लिए किसी नए पद को बनाने की जरूरत होगी। इस बेहतर व्यवस्था से जहां पुलिस को काम करने में आसानी होगी, वहीं आम जनता की शिकायतों का निपटारा भी बिना किसी देरी के सीधे थानों में ही हो जाएगा।