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आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में बहस: सिब्बल बोले– नसबंदी जरूरी, जज साहब ने ली चुटकी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को 'मराठी मानुस' और 'पशु प्रेम' जैसे भावुक मुद्दों से ऊपर उठकर जन सुरक्षा पर जोर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने दोटूक कहा कि सड़कों, स्कूलों और सरकारी संस्थानों को कुत्तों से मुक्त करना जरूरी है। सुनवाई के दौरान जब वकीलों ने कुत्तों के अधिकारों और उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ने की बात की तो बेंच ने कहा, "कोई नहीं जान सकता कि कुत्ते का मूड कब काटने का है और कब नहीं। इलाज से बेहतर बचाव है।" कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अगर कोई ऐसा कुत्ता है जो शरारती है और किसी को काट सकता है तो लोग एक सेंटर पर कॉल कर सकते हैं जहां कुत्ते को ले जाकर उसकी नसबंदी की जा सकती है और फिर उसे उसी इलाके में वापस छोड़ दिया जाएगा। इस पर कोर्ट ने कहा, “बस एक ही चीज की कमी है, वह है कुत्तों को काउंसलिंग देना ताकि वापस छोड़े जाने पर वे काटें नहीं।” अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि हर कुत्ता नहीं काटता, लेकिन कोर्ट ने एक नया पहलू सामने रखा। बेंच ने कहा, 'सड़कों पर गाड़ियों के सामने अचानक कुत्तों का आना गंभीर हादसों का कारण बनता है। सड़कों को कुत्तों से साफ और मुक्त रखना होगा ताकि वाहन चालक सुरक्षित रहें। स्कूल, अस्पताल और सार्वजनिक संस्थानों में कुत्तों की मौजूदगी की कोई जरूरत नहीं है।' सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रिहाइशी सोसायटियों (RWA) को अधिकार देने की वकालत की। उन्होंने मजाकिया लेकिन तार्किक अंदाज में कहा, "हम सब पशु प्रेमी हैं, लेकिन इंसानों से भी प्यार करना चाहिए। कल को कोई ताजा दूध पीने के लिए सोसाइटी में भैंस लाना चाहेगा, तो क्या उसे अनुमति मिलनी चाहिए? इससे दूसरों को परेशानी होगी।" सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने रुख को और कड़ा करते हुए कहा कि दिल्ली और एनसीआर में बढ़ते रेबीज के मामलों को देखते हुए आवारा कुत्तों को रिहाइशी इलाकों से हटाकर शेल्टर होम भेजना अनिवार्य है। सड़कों या सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों को खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी। इसके लिए नगर निकायों को अलग से फीडिंग स्पेस बनाना होगा। जो भी व्यक्ति या संस्था नगर निगम को कुत्ते पकड़ने से रोकेगी, उसके खिलाफ कोर्ट सख्त कार्रवाई करेगा। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक सुस्ती से ज्यादा सिस्टम की विफलता माना है। बेंच ने आदेश दिया कि नगर निगमों को नियमित जांच करनी चाहिए कि किसी संस्थान के भीतर कुत्तों का जमावड़ा तो नहीं है। आक्रामक और रेबीज संदिग्ध कुत्तों को किसी भी हाल में वापस नहीं छोड़ा जाएगा।  

पैसों की तंगी से परेशान हैं? लॉकर में रखें ये एक चीज़, बढ़ेगा धन

भारतीय वास्तु शास्त्र और टोने-टोटकों की परंपरा में फिटकरी को एक अत्यंत शक्तिशाली और शुभ वस्तु माना गया है। आमतौर पर फिटकरी का उपयोग जल शुद्धिकरण, त्वचा की देखभाल और दांतों की सफाई के लिए होता है लेकिन वास्तु शास्त्र में इसका एक गूढ़ और चमत्कारी पक्ष भी है विशेष रूप से धन-संबंधित समस्याओं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में। इस आर्टिकल में जानेंगे कि फिटकरी को लॉकर या तिजोरी में रखने से क्या प्रभाव पड़ता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, फिटकरी में नकारात्मक ऊर्जा को सोखने की अद्भुत क्षमता होती है। इसे एक प्रकार का ऊर्जा फिल्टर माना जाता है। यदि घर या ऑफिस के लॉकर में निगेटिव वाइब्स या किसी तरह की दोषपूर्ण ऊर्जा है, तो फिटकरी उसे धीरे-धीरे सोख लेती है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।  फिटकरी से जुड़े उपाय करने से मनोबल बढ़ता है और निर्णय क्षमता सुधरती है। तिजोरी में फिटकरी रखने के लाभ वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की तिजोरी या लॉकर को धन का मुख्य केंद्र माना जाता है, जहां मां लक्ष्मी का वास होता है। ऐसे में तिजोरी का वास्तु के अनुसार संतुलित और सकारात्मक होना बहुत जरूरी है। फिटकरी को प्राचीन मान्यताओं में एक ऐसा तत्व माना गया है जो नकारात्मक ऊर्जा को सोखने की क्षमता रखता है और वातावरण में सकारात्मकता फैलाता है। जब इसे तिजोरी में रखा जाता है, तो यह आर्थिक मामलों में आने वाली रुकावटों को दूर करने में सहायक माना जाता है। लॉकर या तिजोरी में रखने की विधि यदि आप फिटकरी को अपने लॉकर या तिजोरी में रखना चाहते हैं, तो इसे कुछ नियमों के अनुसार रखें- लाल या पीले कपड़े में फिटकरी का एक साफ टुकड़ा लपेट लें। यह टुकड़ा शुक्रवार या पूर्णिमा के दिन सुबह रखें, जब घर में साफ-सफाई और सकारात्मक वातावरण हो। लॉकर के दक्षिण-पश्चिम कोने में रखें क्योंकि यह दिशा धन-संचय की मानी जाती है। हर 15 से 30 दिनों में इस फिटकरी को बदलें क्योंकि यह नकारात्मकता सोखकर भारी हो जाती है।

भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती, वित्त वर्ष 2026 में 7.4% विकास का अनुमान

 नई दिल्‍ली भारत की अर्थव्‍यवस्‍था तेजी से भाग रही है . 7 जनवरी को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था पिछले वित्त वर्ष के 6.5% की तुलना में 7.4% की दर से बढ़ने का अनुमान है. यह उछाल वैश्विक दबाव और अमेरिकी निर्यात में रुकावट के बीच है. अर्थव्‍यवस्‍था में यह उछाल भारत के मजबूत निवेश और निवेशकों के भरोसे को दिखाता है. साथ ही देश के नीतिगत बदलाव, कंजम्‍पशन और घरेलू इंफ्रा के मजबूती को भी दिखाता है.  अर्थव्‍यस्‍था में इस तेजी को मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर ने सपोर्ट किया है, जिसने इस वित्त वर्ष में शानदार प्रदर्शन किया है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी राष्ट्रीय आय के पहले एडवांस अनुमानों के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में 7 प्रतिशत की ग्रोथ रेट हासिल होने का अनुमान है.  इन सेक्‍टर्स में सामान्‍य ग्रोथ का अनुमान  MoSPI ने कहा कि सर्विस सेक्टर में अच्छी ग्रोथ FY 2025-26 में अनुमानित रियल GVA (ग्रॉस वैल्‍यू असेट) ग्रोथ रेट 7.3 प्रतिशत का एक प्रमुख कारण रही है. हालांकि, एग्रीकल्‍चर और संबंधित क्षेत्र और 'बिजली, गैस, पानी की सप्लाई और अन्य यूटिलिटी सेवाओं के क्षेत्रों में 31 मार्च को खत्म होने वाले मौजूदा वित्त वर्ष में सामान्य ग्रोथ रेट रहने का अनुमान है. नॉमिनल जीडीपी 8 फीसदी से ग्रो करेगी मंत्रालय ने आगे कहा कि नॉमिनल GDP या मौजूदा कीमतों पर GDP में 2025-26 के दौरान 8 प्रतिशत की ग्रोथ होने का अनुमान है. एडवांस अनुमानों के डेटा का इस्तेमाल केंद्रीय बजट तैयार करने में किया जाता है, जिसे 1 फरवरी को पेश किए जाने की संभावना है.  निवेश से मजबूत हुई ग्रोथ  आर्थिक उछाल का एक प्रमुख कारण निवेश गतिविधि थी.सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) वित्त वर्ष 2026 में 7.8% बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 7.1% से अधिक है. यह व्यवसायों द्वारा बुनियादी ढांचे, मशीनरी और दीर्घकालिक परियोजनाओं पर अधिक खर्च को दर्शाता है. पॉलिसी चेंज से बढ़ी मांग  विकास को गति देने में सरकारी उपायों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है . आयकर में राहत और जीएसटी दरों को युक्तिसंगत बनाने के फैसले ने  उपभोक्ता मांग को बढ़ाने में मदद की, भले ही वैश्विक परिस्थितियां अनिश्चित बनी रहीं. वैश्विक व्यापार तनाव और टैरिफ संबंधी चुनौतियों के कारण निर्यात की संभावनाएं भले ही प्रभावित हुईं, लेकिन मजबूत घरेलू मांग ने इस प्रभाव को कम करने और विकास को पटरी पर लाने में मदद की है. 

ISRO की 2040 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की योजना, पूर्व प्रमुख ने किया खुलासा

अहमदाबाद भारत 2040 तक चंद्रमा पर अपने अंतरिक्ष यात्री भेजने की योजना बना रहा है, यह जानकारी पूर्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) प्रमुख ए. एस. किरण कुमार ने बुधवार को दी।कुमार, जो वर्तमान में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) के प्रबंधन परिषद के अध्यक्ष हैं, यह बयान 5वें भारतीय खगोलशास्त्र समाज (ASI) सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान दे रहे थे। कुमार ने कहा, "अब से 2040 तक कई अंतरिक्ष मिशन होंगे। 2040 तक हमारा लक्ष्य भारतीयों को चंद्रमा पर भेजना और सुरक्षित रूप से वापस लाना है। इसके अलावा, भारत 2040 तक एक अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है।" इस कार्यक्रम के दौरान, कुमार ने मीडिया से बात करते हुए भारत के अंतरिक्ष रोडमैप के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा, "निकट भविष्य में चंद्रयान का एक अनुसरण मिशन होगा, और जापान के साथ मिलकर लैंडर और रोवर पर काम चल रहा है। हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में कुछ विशिष्ट जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यह केवल शुरुआत है, इसके बाद कई गतिविधियाँ होंगी। भारत अंतरिक्ष अवलोकन और ब्रह्मांड को समझने के लिए प्रतिबद्ध है।" उन्होंने आगे कहा कि यह मिशन भारतीय शैक्षिक संस्थानों, इंजीनियरिंग संस्थानों और निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण में योगदान देने के कई अवसर खोलेगा।कुमार ने अपने उद्घाटन भाषण में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में कहा, "भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसने मुख्य रूप से समाजिक लाभ के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का निर्माण किया और न कि सैन्य उपयोग के लिए।" उन्होंने डॉ. विक्रम साराभाई के योगदान की भी सराहना की, जिनके प्रयासों से देश के स्वतंत्रता के 10 वर्षों बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास हुआ था। साराभाई ने यह समझने की कोशिश की कि कैसे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से प्रसारण संचार और मौसम निगरानी में सुधार किया जा सकता है। यह तीन दिवसीय सत्र खगोलशास्त्र, अंतरिक्ष विज्ञान, ग्रह विज्ञान, वायुमंडलीय विज्ञान और उभरते हुए क्षेत्रों, जैसे क्वांटम विज्ञान और प्रौद्योगिकियों में ऑप्टिक्स और उन्नत उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित है। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय रेडियो एस्टोफिजिक्स केंद्र के निदेशक प्रोफेसर यशवंत गुप्ता, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बैंगलोर की निदेशक प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमणियम और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के निदेशक प्रोफेसर अनिल भारद्वाज भी उपस्थित थे।  

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल की

रायपुर की IPHL देश की पहली NQAS प्रमाणित प्रयोगशाला बनी – छत्तीसगढ़ ने स्थापित किया राष्ट्रीय मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने ऐतिहासिक उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ को दी बधाई: मुख्यमंत्री  साय ने आभार व्यक्त किया, राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ बनाने का संकल्प दोहराया रायपुर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने जिला अस्पताल रायपुर स्थित इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लेबोरेटरी (IPHL) को नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड्स (NQAS) का प्रमाणन प्राप्त होने पर छत्तीसगढ़ सरकार को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल करने के लिए बधाई दी है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को लिखे  पत्र में नड्डा ने उल्लेख किया कि रायपुर IPHL देश में अपनी तरह की पहली प्रयोगशाला बन गई है, जिसे यह प्रतिष्ठित प्रमाणन प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि राज्य की विश्वसनीय एवं क्वालिटी-अश्योर्ड डायग्नोस्टिक सेवाएँ प्रदान करने की बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने इस उपलब्धि को राज्य सरकार की प्रतिबद्धता और रायपुर जिला अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों के समर्पण का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में जनविश्वास को मजबूत किया है और सेवा-प्रदाय के नए मानक स्थापित किए हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने आगे कहा कि IPHL की स्थापना प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अधोसंरचना मिशन (PM-ABHIM) का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह मिशन पूरे देश में स्वास्थ्य निगरानी, प्रयोगशाला नेटवर्क और आपदा तैयारी तंत्र को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस मिशन का मूल उद्देश्य गुणवत्ता-सुनिश्चित, अस्पताल-विशिष्ट एवं रोग-विशिष्ट प्रयोगशाला निदान उपलब्ध कराना है। रायपुर IPHL को प्रदान किया गया यह प्रमाणन इस बात की पुष्टि करता है कि प्रयोगशाला ने अपने मानव संसाधन, अत्याधुनिक उपकरणों और उन्नत अधो संरचना का सफलतापूर्वक एकीकरण करते हुए राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को प्राप्त किया है। केन्द्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि यह उपलब्धि अन्य राज्यों के लिए एक राष्ट्रीय मानक स्थापित करती है। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से आग्रह किया कि वह रायपुर मॉडल को श्रेष्ठ अभ्यास (बेस्ट प्रैक्टिस) के रूप में अपनाते हुए राज्य के अन्य जिलों और क्षेत्रों में भी उच्च गुणवत्ता वाली डायग्नोस्टिक सेवाओं का विस्तार सुनिश्चित करे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ बनाने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। मुख्यमंत्री साय ने आश्वस्त किया कि राज्य सरकार  जिलों में गुणवत्तापूर्ण प्रयोगशाला एवं डायग्नोस्टिक सेवाओं का निरंतर विस्तार करती रहेगी। उन्होंने कहा कि  यह उपलब्धि प्रौद्योगिकी-सक्षम और मानक-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की दिशा में छत्तीसगढ़ के प्रयासों को भी दर्शाती है। यह प्रमाणन संस्थागत परिपक्वता और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं में गुणवत्ता आश्वासन की सुदृढ़ होती संस्कृति का परिचायक है। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि रायपुर IPHL को प्राप्त NQAS प्रमाणन छत्तीसगढ़ की संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि यह सफलता दर्शाती है कि राज्य में प्रयोगशाला सेवाओं के मानकीकरण, गुणवत्ता आश्वासन, प्रशिक्षित मानव संसाधन, आधुनिक उपकरणों और मजबूत अवसंरचना के क्षेत्र में सतत एवं परिणाममूलक सुधार किए गए हैं। जायसवाल ने कहा कि यह प्रमाणन केवल एक संस्थान की उपलब्धि नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के डॉक्टरों, लैब तकनीशियनों, पैरामेडिकल स्टाफ और जिला अस्पताल रायपुर की समर्पित टीम के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने आश्वस्त किया कि राज्य के अन्य जिलों में भी IPHL को इसी मॉडल पर विकसित किया जाएगा, ताकि प्रत्येक नागरिक को समयबद्ध, सटीक और विश्वसनीय जांच सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने पुनः आश्वस्त किया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार और गुणवत्ता संवर्धन के लिए निरंतर सहयोग प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य परिवर्तन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में अपना स्थान सुदृढ़ करेगा।

नर्सिंग कॉलेजों में अब महिलाओं को नहीं मिलेगा 100% आरक्षण, पुरुष उम्मीदवारों को 13 जनवरी तक करने होंगे आवेदन

जबलपुर  मध्य प्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और ट्यूटर के कुल 286 पदों पर अब महिला उम्मीदवारों को 100% आरक्षण नहीं मिलेगा। एमपी हाईकोर्ट ने पुरुष उम्मीदवारों की याचिका पर बुधवार को सुनवाई की। मध्य प्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों में विभिन्न फैकल्टी की भर्ती में पुरुष अभ्यर्थियों को शामिल किया जाएगा। यह जानकारी मंगलवार को हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान मप्र कर्मचारी चयन मंडल (ईएसबी) की ओर से दी गई। ईएसबी के अधिवक्ता राहुल दिवाकर ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में पुरुष उम्मीदवारों को शामिल करने का निर्णय लिया गया है, किंतु लिखित निर्देश की कॉपी अभी नहीं मिली। जबलपुर निवासी याचिकाकर्ता नौशाद अली द्वारा इस भर्ती में महिला अभ्यर्थियों को दिए जा रहे 100 फीसद आरक्षण को चुनौती दी गई है। सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में 286 पदों पर सीधी भर्ती वकील विशाल बघेल ने कहा- 16 दिसंबर को प्रदेश के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में 286 अकादमिक पदों पर सीधी भर्ती के जरिए विज्ञापन जारी किया गया था। इसमें 40 एसोसिएट प्रोफेसर, 28 असिस्टेंट प्रोफेसर और 218 सिस्टर ट्यूटर के सभी पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए थे। आवेदन की अंतिम तिथि 7 जनवरी थी। पुरुष उम्मीदवारों को पूरी तरह बाहर किया गया था बघेल ने बताया कि इस मामले में जितने भी पुरुष उम्मीदवार हैं, जो मध्य प्रदेश से डिग्रीधारी हैं और वो महिलाओं के बराबर ही योग्यता रखते हैं। उन्हें सिर्फ इस आधार पर पूरी भर्ती प्रक्रिया से बाहर किया गया था कि वह पुरुष हैं। जबलपुर निवासी नौशाद अली और अन्य याचिकाकर्ताओं ने याचिका दाखिल की। कोर्ट को बताया गया कि प्रदेश के सरकारी नर्सिंग कॉलेजों में इन भर्तियों में पुरुष उम्मीदवारों को पूरी तरह बाहर कर दिया गया। जबकि भर्ती नियम और अपेक्स काउंसिल आईएनसी के सभी मापदंड लिंग भेद की अनुमति नहीं देते हैं। इन सबके बाद भी लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की ओर से की जा रही भर्ती में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 (2) और भर्ती के नियमों की अनदेखी की जा रही है। याचिका में आरोप- 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन हुआ याचिका में आरोप लगाया गया कि सरकार की इस भर्ती प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले के 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 16(2) के तहत यह सीधे-सीधे लिंग भेदभाव है। इसके अलावा मध्य प्रदेश शासन ने आरक्षण नीति बनाई हुई है। महिलाओं को आरक्षण देने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। उसके साथ-साथ भर्ती नियम-2023 बनाया है। इनमें भी कहीं ये नहीं लिखा है कि पुरुषों को सिर्फ पुरुष होने के आधार पर भर्ती प्रक्रिया से बाहर किया जाएगा। इस मामले में 29 दिसंबर को हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया था। मंगलवार को भी प्रिंसिपल बेंच में सुनवाई हुई। सरकार ने मौखिक रूप से कहा कि अब भर्ती प्रक्रिया में पुरुष उम्मीदवारों को भी शामिल किया जाएगा। 68 पदों पर भर्ती में पुरुषों को अपात्र करार दिया था बता दें मामला सामने आने के बाद सरकार ने ट्यूटर के 218 विज्ञापित पदों को भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर दिया था, लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के कुल 68 पदों पर भर्ती में पुरुषों को अपात्र करार देते हुए भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी। उनकी ओर से बताया गया कि आवेदन की अंतिम तिथि सात जनवरी है। ऐसे में कोर्ट ने अगली सुनवाई सात जनवरी को निर्धारित कर सरकार को लिखित जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विशाल बघेल ने पक्ष रखा। उनका आरोप है कि 16 दिसंबर को ईएसबी द्वारा जारी ग्रुप-1 सब ग्रुप-2 संयुक्त भर्ती परीक्षा 2025 के विज्ञापन में 40 एसोसिएट प्रोफेसर, 28 असिस्टेंट प्रोफेसर और 218 सिस्टर ट्यूटर सहित कुल 286 पदों पर महिला उम्मीदवारों को 100 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इनमें पुरुष उम्मीदवारों को पूरी तरह बाहर किया जाना न सिर्फ भर्ती नियम तथा इंडियन नेशनल काउंसिल के मापदंडों का उल्लंघन है। बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 और सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले के 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का भी उल्लंघन है। विज्ञापन के अनुसार, आवेदन 24 दिसंबर से आमंत्रित किए गए थे। सात जनवरी, 2026 इसकी अंतिम तिथि है।

MP में पानी का संकट गहराया: गांवों में भी सप्लाई हो रहा दूषित पानी, रिपोर्ट ने खोली पोल

भोपाल इंदौर के भागीरथपुरा में काल बने पीने के पानी ने अब तक 20 लोगों की जिंदगियां लील ली हैं और जो इससे बच गए, उनका अस्पताल में इलाज जारी है। सरकार कटघरे में है तो विपक्ष भी इस मुद्दे पर हावी है। इस बीच मध्य प्रदेश के गांवों में पीने के पानी पर आई एक रिपोर्ट आपको भी हैरान कर देगी। केंद्र सरकार के 'जल जीवन मिशन' की एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से अधिक पीने का पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं है, जिससे लाखों लोग अनदेखे लेकिन जानलेवा खतरों की चपेट में हैं।   रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े 4 जनवरी 2026 को जारी 'फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट' (कार्यक्षमता मूल्यांकन रिपोर्ट) के अनुसार मध्य प्रदेश में पानी के केवल 63.3% नमूने ही गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरे, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 76% है। इसका मतलब है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में 36.7% पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें हानिकारक बैक्टीरिया (कीटाणु) या रासायनिक मिलावट पाई गई है। ये नमूने सितंबर-अक्टूबर 2024 के दौरान मध्य प्रदेश के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से इकट्ठा किए गए थे। यह स्थिति उन जगहों पर और भी अधिक चिंताजनक है जो सुरक्षा और इलाज के लिए बनी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में पानी के केवल 12% नमूने ही सूक्ष्मजीवविज्ञानी (microbiological) सुरक्षा जांच में पास हो पाए, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 83.1% है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के लगभग 88% अस्पतालों में मरीजों को असुरक्षित पानी दिया जा रहा है। स्कूलों में 26.7% नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट में फेल हो गए, जिससे बच्चे हर दिन दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इन जिलों की हालत सबसे खराब अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे खराब है, जहां एक भी पानी का नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया। बालाघाट, बैतुल और छिंदवाड़ा में 50% से अधिक पानी के नमूने दूषित मिले हैं। मध्य प्रदेश में केवल 31.5% घरों में नल के कनेक्शन हैं, जो कि 70.9% के राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। जहां पाइपलाइन बिछी भी है, वहां व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है; राज्य के 99.1% गांवों में पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था तो है, लेकिन केवल 76.6% घरों में ही चालू हालत में नल लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि हर चौथे घर में या तो नल खराब है या पानी ही नहीं आता। इससे भी बदतर बात यह है कि नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं है। इंदौर जिला, जिसे आधिकारिक तौर पर 100% नल कनेक्शन वाला घोषित किया गया है, वहां भी केवल 33% घरों को ही सुरक्षित पीने का पानी मिल रहा है। पूरे राज्य में 33% पानी के नमूने गुणवत्ता जांच में फेल हो गए, जो इस बात की पुष्टि करता है कि संकट केवल पानी की पहुंच का नहीं, बल्कि 'जहरीली सप्लाई' का है। केंद्र सरकार ने इस स्थिति को "सिस्टम की ओर से पैदा की गई आपदा" करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल फंड (बजट) में कटौती की जा सकती है। यह चेतावनी एक बड़ी त्रासदी के बाद आई है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 20 लोगों की मौत हो गई। 429 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिनमें से 16 आईसीयू (ICU) में हैं और तीन वेंटिलेटर पर हैं। अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने औपचारिक रूप से इस संकट को 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी' (सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल) घोषित कर दिया है। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि "अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में साफ पीने का पानी पाने का अधिकार भी शामिल है" और वर्तमान स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दायरे में आती है।  

पराली से प्रगति तक: कृषि अपशिष्ट पर नितिन गडकरी का बड़ा बयान

नई दिल्ली केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि खेतों में बचने वाले कृषि अपशिष्ट को देश का एक उपयोगी राष्ट्रीय संसाधन बनाया जा सकता है। उन्होंने यह बात बुधवार को वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सेरेमनी' में कही। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि बायो-बिटुमेन बनाना 'विकसित भारत 2047' के सपने को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। खेती से निकलने वाले कचरे का उपयोग करने से खेतों में पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण कम होगा और पुनः उपयोग वाली अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। उन्होंने कहा कि यदि सड़कों में 15 प्रतिशत बायो-बिटुमेन मिलाया जाए, तो भारत को करीब 4,500 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। इससे देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता भी कम होगी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज भारत ने सड़क निर्माण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त की है। देश दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया है। उन्होंने इस उपलब्धि के लिए वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों को बधाई दी और सहयोग के लिए राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह का धन्यवाद किया। गडकरी ने कहा कि यह नई तकनीक किसानों को सशक्त बनाएगी, गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। उन्होंने बताया कि चावल की पराली से बने जैव बिटुमेन का सफल परीक्षण किया गया है, जो पेट्रोल से बने बिटुमेन से बेहतर साबित हुआ है। इससे पराली जलाने की समस्या भी कम होगी। अब समय आ गया है कि कृषि अपशिष्ट, फसल अवशेष, बांस और जैव पदार्थों को हरित ईंधन और उपयोगी उत्पादों में बदला जाए। पिछले साल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि भारत को हर साल 22 लाख करोड़ रुपए का जीवाश्म ईंधन आयात करना पड़ता है। पराली जलाने और वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण बढ़ा रहा है, इसलिए भारत को ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक देश बनना चाहिए। इंडियन बायोगैस एसोसिएशन (आईबीए) द्वारा हाल ही में जारी एक बयान के अनुसार, किसानों द्वारा हर साल 73 लाख टन धान की पराली जलाई जाती है। अगर इसे संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) और बायोएथेनॉल में बदला जाए, तो देश को 1,600 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और प्रदूषण भी कम होगा। बयान में आगे कहा गया है कि इस नीति से देश में करीब 37,500 करोड़ रुपए का निवेश आने की उम्मीद है और 2028-29 तक 750 सीबीजी परियोजनाएं शुरू हो सकती हैं।

राजधानी और सासाराम एक्सप्रेस मेसरा-बरकाकाना के रास्ते चलेगी

रांची. कोयल नदी पर बने रेलवे पुल के स्पेन संख्या-5 में दरार आने के बाद लोहरदगा रेलवे स्टेशन को मार्च तक बंद कर दिया गया है। इसके चलते रांची राजधानी और रांची-सासाराम ट्रेनें अगले दो माह इस रूट से नहीं चलेंगी। रेलवे के अनुसार रांची-सासाराम एक्सप्रेस 8 जनवरी से मेसरा-बरकाकाना के रास्ते चलेगी। वहीं, रांची-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस भी परिवर्तित मार्ग रांची-टाटीसिलवे-मेसरा-बरकाकाना के रास्ते चलेगी। फिलहाल रांची से लोहरदगा के बीच किसी भी एक्सप्रेस ट्रेन का परिचालन नहीं होगा। अब क्षतिग्रस्त पिलर किया जाएगा ठीक मंगलवार को निरीक्षण के दौरान दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक अनिल कुमार मिश्र ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि मरम्मत कार्य चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा और सभी तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही ट्रेनों को हरी झंडी दी जाएगी। मरम्मत कार्य की शुरुआत सबसे पहले पिलर संख्या-5 से होगी। इसके बाद पिलर संख्या-6 और 7 की मरम्मत की जाएगी। इरगांव हॉल्ट तक जाएगी रांची मेमू रांची-लोहरदगा और अन्य मेमू पैसेंजर ट्रेन का परिचालन लोहरदगा स्टेशन के बजाय करीब 8 किलोमीटर दूर इरगांव हॉल्ट तक होगा। लोहरदगा से इरगांव के बीच बस सेवा उपलब्ध कराई जाएगी, हालांकि बसों की संख्या को लेकर अभी स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है। इसके अलावा लोहरदगा से टोरी के लिए कनेक्टिंग ट्रेन शुरू की जा रही है, ताकि यात्रियों को आगे की यात्रा में सहूलियत मिल सके। 15 फरवरी तक सॉइल टेस्टिंग होगी पूरी तकनीकी प्रक्रिया के तहत 15 फरवरी तक सॉइल टेस्टिंग पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। रेलवे का प्रयास है कि मार्च के अंतिम सप्ताह तक आंशिक रूप से ट्रेन परिचालन शुरू कर दिया जाए, जबकि पुल से जुड़ा संपूर्ण मरम्मत कार्य मई 2026 तक पूरा किया जाएगा। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुल के पिलर संख्या 4, 5, 6 और 7 पर जैकेटिंग और पाइलिंग की जाएगी। इसके साथ ही अस्थायी तौर पर परिचालन शुरू करने के लिए स्टील गार्डर लगाने की योजना भी बनाई गई है। फिलहाल, रांची से लोहरदगा के बीच किसी भी एक्सप्रेस ट्रेन का परिचालन नहीं होगा। नए पुल और डबल लाइन की योजना पर भी काम शुरू महाप्रबंधक ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखकर ही परिचालन का निर्णय लिया जाएगा। मरम्मत कार्य के लिए 3 से 4 तकनीकी टीमें 24 घंटे काम करेंगी। निरीक्षण के बाद उन्होंने मौके पर मौजूद अधिकारियों और एजेंसियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। साथ ही, कोयल नदी पर नए पुल के निर्माण को लेकर भी योजना पर काम किया जाएगा। इसके लिए डबल लाइन ट्रैक का सर्वे पहले ही किया जा चुका है।

बालोद में प्रथम नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी में शामिल होने 70 सदस्यीय दल रवाना

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही. प्रथम नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी में सहभागिता हेतु जीपीएम जिले से 70 सदस्यीय दल रवाना हो गए हैं। यह जंबूरी ग्राम दुधली, जिला बालोद में आयोजित की जा रही है, जिसमें पूरे देशभर से लगभग 10 हजार रोवर-रेंजर भाग ले रहे हैं। दल को विदा करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने सभी प्रतिभागियों को शुभकामनाएं दीं और अनुशासन, सेवा भावना एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ जिले का नाम गौरवान्वित करने का आह्वान किया। इस अवसर पर जिले से कुल 29 रोवर, 29 रेंजर एवं प्रभारी दल के सदस्यों को औपचारिक रूप से विदा किया गया। राज्य स्तर पर जिला प्रभारी के रूप में डीओसी स्काउट डॉ. एश्ले केनेथ डगलस एवं डीओसी गाइड अर्चना सैमुअल मसीह के नेतृत्व में जिले की टीम जंबूरी में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने हेतु रवाना हुई है। जिले से दल के प्रभारियों में राम कृष्ण कश्यप, विजय तिवारी, संगीता कैवर्त, गायित्री लहरे, मीनू देवांगन एवं प्रियंका विश्वकर्मा शामिल हैं। सभी के मार्गदर्शन में दल सुरक्षित एवं उत्साहपूर्वक ग्राम दुधली के लिए प्रस्थान कर गया। जिले के स्काउट-गाइड परिवार एवं शिक्षा विभाग ने दल की सफल सहभागिता की कामना करते हुए उज्ज्वल भविष्य की शुभेच्छाएं प्रेषित की हैं।