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बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर बड़ी खबर, पीएम मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह प्रस्तावक बनेंगे

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के संबंध में नई जानकारी सामने आई है. सूत्रों से जानकारी के मुताबिक बीजेपी (BJP) के नेताओं ने आज मंगलवार को इसको लेकर एक बैठक की. यह बैठक इसलिए की गई ताकि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चुनने के प्रॉसेस की रूपरेखा को तय किया जा सके. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इसकी आधिकारिक तौर पर घोषणा की जाएगी. बता दें, यह बैठक भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में हुई. इस बैठक में मीटिंग में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए बनी कमिटी के संयोजक के. लक्ष्मण शामिल हुए. इनके अलावा सह संयोजक संबित पात्रा और नरेश बंसल ने भी हिस्सा लिया. सूत्रों से यह भी पता चला है कि कमेटी ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी खास बातों पर चर्चा की, जिसमें प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं, समयसीमा और संगठनात्मक समन्वय शामिल हैं. चर्चा का मकसद पार्टी के संवैधानिक ढांचे के हिसाब से एक आसान, पारदर्शी और समय पर चुनाव पक्का करना है. सूत्रों से पता चला है कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव सोमवार 19 जनवरी को हो सकता है. अगले दिन 20 तारीख को चुनाव कराए जाएंगे. पार्टी के वर्किंग प्रेसिडेंट नितिन नबीन 19 जनवरी को अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करेंगे. वहीं, यह भी पता चला है कि पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत पार्टी के सीनियर नेता प्रस्तावक बनेंगे. पार्टी के सीनियर नेता इस बैठक पर करीब से नजर रख रहे हैं, और बातचीत खत्म होने के बाद इसकी आधिकारिक बातचीत या घोषणा होने की उम्मीद है. बीजेपी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव एक अहम संगठनात्मक कदम खासकर पार्टी के भविष्य के राजनीतिक और चुनावी रोडमैप के तौर पर देखा जा रहा है. इससे पहले दिसंबर में, बीजेपी ने बिहार के पांच बार के विधायक नितिन नबीन को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था. अभी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा नेशनल पार्टी की कमान संभाल रहे हैं. नवीन की नियुक्ति को पार्टी के युवा लीडरशिप पर फोकस करने के तौर पर देखा जा रहा है. बीजेपी हेडक्वार्टर में मीटिंग जारी है, इसलिए आगे की जानकारी का इंतजार है. ऐसे होता है भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव जानकारी के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी के संविधान और नियम की धारा-19 के मुताबिक राष्ट्रीय और प्रदेश परिषद के सदस्यों का एक इलेक्टोरल कॉलेज बनाया जाता है. यही पूरा चुनाव संपन्न कराता है. चुनाव पार्टी के नियमों और कार्यकारिणी के अनुसार ही कराया जाता है. इसके लिए दो शर्ते होती हैं. पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए कम से कम 15 साल से प्राथमिल सदस्य होना आवश्यक है. इलेक्टोरल कॉलेज के कम से कम 20 सदस्यों का प्रस्तावक होना जरूरी है.     बात चुनाव की करें तो पहले नामांकर फॉर्म भरना होता है.     इसके बाद वोटिंग की जाती है.     बैलेट बॉक्स की गिनती होती है.     सबसे आखिरी में नए अध्यक्ष को चुना जाता है.     सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को 3 साल के लिए चुना जाता है. यह कार्यकाल बढ़ाया भी जाता है.   

MP में कुत्तों और मवेशियों का ‘आतंक’ खत्म होगा, स्कूल और अस्पतालों के बाहर बनाई जाएगी ‘किलानुमा’ दीवार

भोपाल  मध्यप्रदेश की गलियों और मुख्य सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे आवारा कुत्तों और बेसहारा मवेशियों के खिलाफ मोहन सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा 'डेथ वारंट' जारी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार और जनता के बढ़ते आक्रोश के बीच नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने एक ऐसी एसओपी (SOP) तैयार की है, जो शहरों की तस्वीर बदल देगी। अब आवारा जानवरों का खुलेआम घूमना बीते दिनों की बात होगी। खूनी आंकड़ों ने हिलाया प्रशासन: 6 महीने, 14 हजार शिकार प्रदेश के छह बड़े शहरों—भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन और रतलाम को पूरी तरह 'रैबीज मुक्त' करने का महाभियान शुरू हो रहा है। यह फैसला बेवजह नहीं है; साल 2025 के शुरुआती छह महीनों में ही इन शहरों में 13,947 निर्दोष लोग खूंखार कुत्तों का शिकार बन चुके हैं। किलानुमा बाउंड्रीवाल से सुरक्षित होंगे सार्वजनिक स्थल नई एसओपी के तहत अब स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और रेलवे स्टेशन जैसे संवेदनशील इलाकों के चारों ओर ऊंची बाउंड्रीवाल खड़ी की जाएगी। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इन 'सेफ जोन' में एक भी कुत्ता या मवेशी नजर नहीं आना चाहिए। स्थानीय निकायों को आदेश दिए गए हैं कि वे उन 'हॉटस्पॉट्स' को तुरंत चिह्नित करें जहां कुत्तों का आतंक सबसे ज्यादा है। बनेगा आश्रय, मवेशियों पर भी होगा कड़ा पहरा सड़कों पर यमराज की तरह घूमने वाले बेसहारा मवेशियों को अब गौशालाओं और शेल्टर होम्स का रास्ता दिखाया जाएगा। सरकार का लक्ष्य साफ है: आम आदमी की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा और बेसहारा जानवरों को भी व्यवस्थित ठिकाना मिलेगा।  

AIIMS रिसर्च: योग अपनाने से घटता है मानसिक तनाव, स्टडी में हुआ खुलासा

भोपाल  ब्रेस्ट कैंसर के ऑपरेशन के बाद महिला मरीजों में मानसिक तनाव, चिंता और दर्द सामान्य रूप से देखने को मिलता है। एम्स भोपाल के हालिया अध्ययन में सामने आया है कि नियमित योग अभ्यास से मरीजों का मानसिक संतुलन बेहतर होता है और दर्द के प्रति सहनशीलता बढ़ती है। इससे मरीजों की रिकवरी में तेजी आती है और उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है। बढ़ता है आत्मविश्वास भोपाल और इसके आसपास के जिलों कई महिलाएं अपने पहले वाली जीवन में लौट गई है। अध्ययन में शामिल मरीजों ने ऑपरेशन के बाद तनाव और भय में स्पष्ट कमी देखी। विशेषज्ञों का कहना है कि योग मानसिक स्थिरता बढ़ाकर मरीजों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। तनाव और चिंता में कमी से रोगियों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।  एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि दर्द निवारक दवा बुप्रेनॉर्फिन के साथ योग करने से मरीज लगभग दो गुना तेजी से ओपिओइड वापसी से उबरते हैं। योग तनाव को कम करता है, नींद सुधारता है और दर्द को घटाता है। योग करने से औसत रिकवरी समय पांच दिन था, जबकि सिर्फ दवा लेने वाले का नौ दिन था। भविष्य में संभावनाएं अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों में योग को नियमित अभ्यास के रूप में शामिल किया जा सकता है। इससे मानसिक तनाव घटेगा, दर्द में कमी आएगी और दवाओं पर निर्भरता कम होगी। सुरक्षित और प्रभावी उपाय एम्स भोपाल की योग विशेषज्ञ डॉ. मुद्दा सोफिया बताते हैं कि योग एक सुरक्षित और किफायती उपाय है। यह मन और शरीर, दोनों को मजबूत बनाता है। एक हजार से अधिक महिलाओं पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि ब्रेस्ट सर्जरी के बाद जो महिलाएं मानसिक तनाव में थी वे नियमित योग करने बाद मानसिक तनाव से मुक्त हो गई।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कुत्ते के काटने से हुई मौत पर राज्य सरकार को भरना होगा भारी मुआवजा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  कहा कि कुत्ते के काटने और किसी बच्चे, बड़े या बूढ़े, कमजोर व्यक्ति की मौत या चोट लगने पर, वह भारी मुआवजा तय कर सकता है, जिसका भुगतान राज्य सरकार करेगी. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले में सुनवाई की. पीठ ने कहा कि 75 साल से सरकारों ने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए कुछ नहीं किया. अदालत ने कहा कि वह इस लापरवाही के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराना चाहती है. पीठ ने कहा कि "इसके लिए उनसे जवाब तलब करें." जस्टिस नाथ ने कहा, "हर कुत्ते के काटने और बच्चे, बड़े या बूढ़े, कमजोर व्यक्ति की मौत या चोट के लिए, हम सरकार की तरफ से भारी मुआवजा तय कर सकते हैं. पिछले 75 वर्षों से कुछ नहीं किया गया." एक पशु कल्याण संगठन की तरफ से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा, माय लॉर्ड्स, आपको ऐसा करना चाहिए, आपको बिल्कुल करना चाहिए. जस्टिस नाथ ने कहा, "साथ ही, उन सभी लोगों की जिम्मेदारी और जवाबदेही है जो दावा करते हैं कि वे कुत्तों को खाना खिला रहे हैं… उनकी रक्षा करें, उन्हें घर ले जाएं. उन्हें अपने परिसर में, अपने घर में रखें. उन्हें हर जगह कूड़ा क्यों फैलाना चाहिए और लोगों को डराना और काटना, जिससे मौत हो." जस्टिस मेहता ने कुत्तों द्वारा लोगों का पीछा करने के बारे में भी कहा. जस्टिस नाथ ने कहा कि कुत्ते के काटने का प्रभाव जिंदगी भर रहता है. गुरुस्वामी ने कहा कि वह भी कुत्ते के हमले का शिकार हो चुकी हैं. जस्टिस मेहता ने कहा कि भावनाएं और चिंताएं सिर्फ कुत्तों के लिए होती हैं. गुरुस्वामी ने जवाब दिया कि उन्हें इंसानों की भी उतनी ही चिंता है. गुरुस्वामी ने कहा कि जो तरीके काम करेंगे, वे हैं कुत्तों का रोगाणुनाशन (Sterilization) और उनके साथ मानव व्यवहार. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि नियामक अपना काम करने में विफल रहे. पीठ के सामने यह तर्क दिया गया कि ऐसे नियामक या केंद्र फंड का कम इस्तेमाल कर रहे हैं, और ABC रूल्स सिर्फ कुत्तों की जनसंख्या नियंत्रण के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये जानवरों को बंद रखने के खिलाफ एक कोशिश है. सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा, जब नौ साल के बच्चे को आवारा कुत्ते मार देते हैं, जिन्हें कुत्ता प्रेमी संगठन खाना खिला रहे हैं, तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? पीठ ने आगे पूछा, क्या इस कोर्ट को अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए और चीजों को होने देना चाहिए? पीठ ने कहा कि उसके पास केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से गंभीर सवाल हैं, वह उन्हें कब सुनेगी. पीठ ने यह भी कहा कि जानवरों से इंसानों को होने वाले दर्द का क्या, अगर जानवर इंसानों पर हमला कर दे तो कौन जिम्मेदार होगा?

MP में बिजली बिल पर बड़ा बदलाव: KW की जगह KVA से तय होगा बिल, उपभोक्ताओं को होगा 15% अधिक खर्च

भोपाल  मध्य प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ा झटका तय माना जा रहा है। प्रदेश में अब बिजली बिल किलोवाट (KW) नहीं बल्कि किलो-वोल्ट एम्पीयर (KVA) के आधार पर वसूले जाने की तैयारी है। मप्र मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने यह प्रस्ताव 2026-27 के टैरिफ प्लान के तहत मप्र विद्युत नियामक आयोग को भेज दिया है। मध्य प्रदेश में बिजली बिल बनाने का तरीके में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. अब तक जहां बिल किलोवाट के आधार पर बनाए जाते थे, लेकिन 2026 से इसे किलोवोल्ट एंपियर यानी केवीए के आधार पर बनाया जाएगा. यह फैसला मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने लिया है और इसे 2026-27 के प्रस्तावित टैरिफ में शामिल किया गया है. इसका सीधा असर मध्य प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं पर देखने को मिल सकता है. मिली जानकारी के मुताबिक, अकेले भोपाल में 33 हजार से ज्यादा उपभोक्ता इसके दायरे में हैं, जिनका बिजली बिल में 15 फीसदी तक इजाफा हो सकता है.  किलोवोल्ट एम्पियर के आधार पर बिलिंग को आसान भाषा में समझा जाए, तो यह केवल इस्तेमाल की गई बिजली ही नहीं बल्कि सप्लाई के दौरान होने वाली तकनीकी नुकसान को भी जोड़कर बिजली बनाती है. अभी तक किलोवाट में सिर्फ वास्तविक खपत ही दिखाई जाती थी, लेकिन किलोवोल्ट एम्पियर में वायरिंग, ट्रांसफार्मर और उपकरणों से होने वाला लॉस भी शामिल होगा. शुरुआत में यह व्यवस्था हाईटेंशन यानी एचटी उपभोक्ताओं पर लागू होगी, बाद में अन्य उपभोक्ताओं को भी इसमें शामिल किया जा सकता है. ऐसे काम करेगा ये सिस्टम बिजली कंपनी की तरफ से कहा गया है कि पिछले 15 सालों में लाइन लॉस घटाने के लिए भोपाल में करीब तीन हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. नई लाइनें बिछाने, एचवीडीएस सिस्टम, फीडर सेपरेशन और सब-स्टेशन की क्षमता बढ़ाने जैसे काम किए गए. अब जो औसतन 15 प्रतिशत तकनीकी नुकसान है, वह नए बिलिंग सिस्टम में सीधे उपभोक्ता के बिल में जुड़ जाएगा. यानी अब यह खर्च कंपनी की जगह उपभोक्ता की जेब से जाएगा. इन लोगों को होगा फायदा आगे बताया कि इस नई व्यवस्था में उन उपभोक्ताओं को फायदा होगा, जिनकी वायरिंग, ट्रांसफार्मर और बिजली उपकरण अच्छे और आधुनिक हैं. ऐसे मामलों में केवीए और किलोवाट लगभग बराबर रहेगा और बिल में ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. लेकिन जिन जगहों पर पुरानी वायरिंग, पुराने मोटर या खराब पावर फैक्टर वाले उपकरण लगे हैं, वहां लॉस ज्यादा होगा. इसका सीधा असर बिल पर पड़ेगा और रकम पहले से ज्यादा चुकानी होगी. ग्रिड ज्यादा मजबूत बनेगा बिजली कंपनी का कहना है कि किलोवोल्ट एम्पियर पर बिलिंग से सिस्टम पर दबाव कम होगा, लाइन लॉस घटेगा और ग्रिड ज्यादा मजबूत बनेगा. साथ ही उपभोक्ताओं को भी तकनीकी रूप से जिम्मेदार बनाया जा सकेगा. इस बदलाव का मकसद पावर फैक्टर सुधारना, अनावश्यक बिजली खपत रोकना और सप्लाई को ज्यादा कुशल बनाना है. हालांकि आम उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव समझना और अपनाना आसान नहीं होगा, लेकिन आने वाले समय में यही नया नियम बनाए जा सकते हैं.   अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो हजारों उपभोक्ताओं का बिजली बिल 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। क्या है पूरा मामला? अब तक बिजली बिल केवल वास्तविक खपत यानी KW के आधार पर बनता था, लेकिन KVA आधारित बिलिंग में उपभोक्ताओं से न सिर्फ इस्तेमाल की गई बिजली बल्कि तकनीकी नुकसान (लाइन लॉस, खराब पावर फैक्टर) का पैसा भी वसूला जाएगा। यानी जितनी बिजली सप्लाई होगी, उसका पूरा हिसाब अब उपभोक्ता के बिल में जुड़ेगा। सबसे पहले किन पर पड़ेगा असर? शुरुआत HT (हाई टेंशन) उपभोक्ताओं से होगी अकेले भोपाल जिले में करीब 33 हजार HT उपभोक्ता इसकी जद में बड़े उद्योग, संस्थान और कॉर्पोरेट उपभोक्ता होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित आगे चलकर आम उपभोक्ताओं पर भी लागू हो सकती है व्यवस्था क्यों बढ़ेगा बिजली बिल? पुरानी वायरिंग जर्जर ट्रांसफार्मर पुराने विद्युत उपकरण खराब पावर फैक्टर इन वजहों से KW और KVA का अंतर बढ़ेगा, और यही अंतर सीधे बिल को भारी बना देगा। पहले ही खर्च हो चुके हैं 3000 करोड़! भोपाल में तकनीकी नुकसान कम करने के लिए पिछले 15 सालों में करीब 3000 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। HVDs सिस्टम नई लाइनें फीडर सेपरेशन ट्रांसफार्मर व सब-स्टेशन क्षमता बढ़ाना इसके बावजूद आज भी औसतन 15% तकनीकी लॉस बना हुआ है, जिसका बोझ अब उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा। किसे मिलेगी राहत? जिनके यहां नई वायरिंग है आधुनिक मशीनें और उपकरण हैं पावर फैक्टर बेहतर है ऐसे उपभोक्ताओं के लिए KW और KVA लगभग बराबर रहेगा और बिल में ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। बिजली कंपनी को क्या फायदा? लाइन लॉस में कमी ट्रांसफार्मर पर दबाव कम ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ेगी सिस्टम ज्यादा कुशल बनेगा KVA बिलिंग का असली उद्देश्य पावर फैक्टर सुधारना अनावश्यक लोड घटाना बिजली आपूर्ति को स्मार्ट बनाना उपभोक्ताओं को तकनीकी रूप से जिम्मेदार बनाना MP में बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाले समय में बिजली सिर्फ रोशनी नहीं, बड़ा खर्च भी बन सकती है। सतर्क उपभोक्ता राहत में रहेंगे, जबकि लापरवाही सीधे जेब पर भारी पड़ेगी।

MP में किसानों को मिलेगा सूरज से खेती करने का मौका, हर किसान के लिए होगा सोलर पंप; मोहन सरकार का नया कदम

 भोपाल कृषक कल्याण वर्ष किसानों के लिए कई सौगातें लेकर आएगा. सौर ऊर्जा से संचालित सिंचाई पंपों से न केवल किसान दिन में ही खेतों में सिंचाई कर पाएंगे अपितु इससे बचने वाली बिजली से प्रदेश ऊर्जा में सरप्लस हो जाएगा. हर किसान के पास सोलर पंप होगा.किसान सौर ऊर्जा से खेती करेंगे प्रदेश में 52 हजार किसानों के खेत में सोलर पंप स्थापित करने की योजना प्रारंभ की गई है। सोलर पंप स्थापित हो जाने से अब प्रदेश का किसान अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता भी बनेगा। अब प्रदेश के किसान सूरज से खेती करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की इस अभिनव पहल के तहत 34 हजार 600 इकाइयों को लेटर ऑफ अवार्ड जारी कर 33 हजार कार्यदेश जारी किए जा चुके हैं। किसान के खेत में सोलर पम्प स्थापित होने से अब उन्हें विद्युत प्रदाय पर बिजली बिल का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। सोलर पम्प से उत्पादित अतिरिक्त ऊर्जा को किसान सरकार को बेच कर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर सकेंगे। नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग द्वारा लगातार किसानों को सोलर प्रोजेक्ट लगाने के लिए विभिन्न योजनाओं में लाभ प्रदान कर सक्षम बनाया जा रहा है। प्रदेश की सिंचाई क्षमता 100 लाख हैक्टयर तक बढ़ाएंगे किसान कल्याण वर्ष में प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा. विभिन्न सिंचाई परियोजना और सिंचाई की आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से सिंचाई का रकबा अधिक से अधिक बढ़ाने का प्रयास रहेगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का संकल्प है प्रदेश में सिंचाई क्षमता को आगामी वर्षों में 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना. प्रदेश में गत दो वर्ष में 7.31 लाख हैक्टयर क्षेत्र में नई सिंचाई क्षमता विकसित हुई है। प्रदेश की सिंचाई क्षमता में वर्ष 2026 तक 8.44 लाख हैक्टयर की वृद्धि होगी। प्रदेश की सिंचाई परियोजनाओं की समीक्षा प्रधानमंत्री गतिशक्ति पोर्टल का प्रयोग कर की जाएगी। पार्वती-काली-सिंध और चम्बल अंतर्राज्यीय लिंक परियोजना, केन-बेतवा अंतर्राज्यीय लिंक परियोजना की स्वीकृति केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि है. महाराष्ट्र राज्य के साथ क्रियान्वित होने वाली मेगा तापी भूजल भरण परियोजना विश्व की अनूठी परियोजना है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में भी विभिन्न नदियों को जोड़ने के लिए नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन के निर्देश दिए हैं। राज्य में नदी जोड़ो परियोजना अंतर्गत उज्जैन जिले में कान्ह-गंभीर, मंदसौर, नीमच और उज्जैन में कालीसिंध-चंबल, सतना जिले में केन और मंदाकिनी, सिवनी एवं छिंदवाड़ा जिले में शक्कर पेंच और दूधी तामिया, रायसेन जिले में जामनेर नेवन और नेवन-बीना नदियों का सर्वेक्षण किया गया है। इस सभी के क्रियान्वयन से कुल 5 लाख 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जा सकेगी। इनकी अनुमानित लागत 9870 करोड़ रुपए होगी। सात जिलों के हजारों किसान इन योजनाओं से लाभान्वित होंगे। राज्य की नदियों में बाढ़, जल प्रबंधन, जल के समुचित उपयोग नदी कछारों में पर्याप्त जल की उपलब्धता सुनिश्चित किए जाने के उद्देश्य से राज्य की नदियों को आपस में जोड़ने के लिए तकनीकी दल का गठन भी गया। भोपाल की झील की प्राचीन तकनीक का अध्ययन कर इस तर्ज पर कम लागत में सुरक्षित जलाशय एवं बांध निर्माण की अवधारणा पर भी कार्य किया जा रहा है. राज्य में जल संसाधन और नर्मदा घाटी विकास विभाग द्वारा सिंचाई सुविधाओं के विस्तार का कार्य निरंतर किया जा रहा है। सिंहस्थ- 2028 में दुनिया भर से उज्जैन में आने वाले श्रद्धालुओं को शिप्रा के शुद्ध जल में स्नान कराने के लिए निरंतर कार्य किए जा रहे हैं. सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी परियोजना उज्जैन निर्माणाधीन है, जिसकी लागत 614.53 करोड़ रुपए है। इसी तरह कान्ह डायवर्सन क्लोज डक्ट परियोजना उज्जैन की लागत 919.94 करोड़ है। सिंहस्थ: 2028 में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए घाट निर्माण एवं संबद्ध कार्य भी किए जा रहे हैं, जिनकी लागत 778.91 करोड़ है।

ट्रंप का 500% टैरिफ अगर लागू हुआ, तो अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी, भारत पर क्या असर पड़ेगा?

नई दिल्ली  डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा है, जो रूस से तेल खरीदते हैं. पहली नजर में यह फैसला दूसरे देशों को दबाव में लाने जैसा लगता है, लेकिन व्यापार आंकड़े बताते हैं कि इसका बोझ अमेरिकी ग्राहकों पर ज्यादा पड़ सकता है. अमेरिका कई रोजमर्रा के सामान के लिए भारत जैसे देशों पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में अगर अचानक भारी शुल्क लगा दिया गया, तो वहां के बाजार में सस्ते विकल्प मिलना आसान नहीं होगा. सितंबर के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने अमेरिका को ऐसे उत्पादों की आपूर्ति की, जिनकी कीमत 500 मिलियन डॉलर से ज्यादा थी. यह उस महीने अमेरिका को किए गए भारत के कुल निर्यात का लगभग 6 प्रतिशत था. कई श्रेणियों में भारत की पकड़ इतनी मजबूत है कि हाई टैरिफ लगने पर कंपनियां तुरंत किसी दूसरे देश से समान गुणवत्ता और मात्रा में सामान नहीं मंगा पाएंगी. इसका सीधा असर अमेरिकी दुकानों में कीमत बढ़ने के रूप में दिख सकता है. घरेलू वस्त्र इसका बड़ा उदाहरण हैं. बिना छपी सूती बेडशीट के मामले में सितंबर में अमेरिका के कुल आयात का लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा भारत से आया, जिसकी कीमत करीब 66.9 मिलियन डॉलर थी. टेबल लिनन में तो भारत की हिस्सेदारी और भी ज्यादा, लगभग 81.5 प्रतिशत रही. पैकेजिंग सामग्री में इस्तेमाल होने वाले फ्लेक्सिबल इंटरमीडिएट बल्क कंटेनर में भी भारत ने करीब 69 प्रतिशत सप्लाई की. इतनी मजबूत हिस्सेदारी के कारण अमेरिका के लिए अचानक सप्लायर बदलना आसान नहीं होगा. तो रूस से यूरेनियम पर बात कौन करेगा? इस पूरे मसले में राजनीतिक पृष्ठभूमि भी अहम है. पिछले हफ्ते अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा कि ट्रंप ने एक ऐसे बिल को हरी झंडी दी है, जिसमें रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर सख्त दंडात्मक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है. इस बिल के तहत ऐसे देशों से आने वाले सभी सामान और सेवाओं पर शुल्क काफी बढ़ाया जाएगा, ताकि उन्हें रूस से दूरी बनाने के लिए मजबूर किया जा सके. विडंबना यह है कि खुद अमेरिका, यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे बड़े देश भी 2024 में रूस से यूरेनियम के बड़े आयातक रहे हैं. इससे यह साफ होता है कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार नेटवर्क कितने जटिल और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. सिर्फ नियम बनाकर इन रिश्तों को तुरंत बदल देना आसान नहीं है. कपड़े और पैकेजिंग में भारत का लगभग एकाधिकार कपड़ा और पैकेजिंग के अलावा कुछ खास उत्पादों में तो भारत की स्थिति लगभग एकाधिकार जैसी है. सितंबर में अरंडी के तेल के आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब 99 प्रतिशत थी. कुछ विशेष रसायनों और औद्योगिक इनपुट में भी भारत की पकड़ मजबूत बनी हुई है, जबकि अगस्त में अमेरिका ने इनमें से कुछ वस्तुओं पर पहले ही 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था. खाद्य उत्पादों में भी भारत की भूमिका अहम है. तैयार या संरक्षित खीरे और घेरकिन्स के मामले में सितंबर में अमेरिका के आधे से ज्यादा आयात भारत से आए. एयरटाइट पैकिंग में आने वाले झींगे जैसे समुद्री उत्पादों में भी भारत की हिस्सेदारी लगभग 56 प्रतिशत रही. ऐसे उत्पादों की सप्लाई चेन पहले से सीमित देशों पर निर्भर होती है, इसलिए जल्दी बदलाव करना मुश्किल होता है. भारत के लिए कितना डर? हालांकि आंकड़े भारत के लिए चेतावनी भी देते हैं. हर क्षेत्र में भारत की पकड़ समान नहीं रही है और कुछ जगहों पर हिस्सेदारी घटती दिख रही है. विग बनाने में इस्तेमाल होने वाले बालों के उत्पादों में सितंबर में भारत की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत रही, जबकि साल के पहले सात महीनों में यह लगभग 76 प्रतिशत थी. इसी तरह सिंथेटिक या पुनर्निर्मित हीरों में भी सितंबर की हिस्सेदारी करीब 69 प्रतिशत रही, जो पहले लगभग 93 प्रतिशत तक थी. कुछ बड़े क्षेत्रों में गिरावट और तेज रही. हीरों के आयात में भारत की हिस्सेदारी सितंबर में घटकर करीब 22 प्रतिशत रह गई, जबकि पहले सात महीनों में यह लगभग 51 प्रतिशत थी. ग्रेनाइट में यह हिस्सा लगभग 48 प्रतिशत से गिरकर 9 प्रतिशत तक आ गया. कुछ पत्थर से जुड़े उत्पादों में भी हिस्सेदारी 88 प्रतिशत से घटकर करीब 31 प्रतिशत रह गई. इससे संकेत मिलता है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और भारत को अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए सतर्क रहना होगा.