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कस्टम हायरिंग स्कीम से प्रतीक ने आसान बनाया खेती का काम, बढ़ी उत्पादकता

कस्टम हायरिंग स्कीम से प्रतीक ने अपने कृषि कार्य को बनाया आसान टिटगांवकलां के किसानों को मिल रही है कृषि यंत्रों की सुविधा आधुनिकता एवं तकनीक से जुड़ाव के साथ ही हुई समय की बचत भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश सरकार किसानों और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिये संकल्पित है। कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक और यंत्रीकरण के माध्यम से न केवल उत्पादन बढ़ रहा है, बल्कि गांवों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे है। ऐसी ही कहानी बुरहानपुर जिले के ग्राम टिटगाँवकलां के युवा प्रतीक पाटील की है। प्रतीक के पिता किसान है। प्रतीक अपने पिताजी के साथ कई वर्षों से कृषि कार्य कर रहे है, वे मुख्य रूप से केला, चना, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, तुअर, गेहूँ, केला, प्याज आदि फसल लगाते हैं। प्रतीक बताते हैं कि खेती के दौरान महसूस किया कि गांवों में समय पर ट्रेक्टर और आधुनिक कृषि यंत्रों की अनुपलब्धता किसानों की सबसे बड़ी समस्या है। इससे न केवल खेती में देरी होती है, बल्कि उत्पादन भी प्रभावित होता है। उन्होंने सोचा क्यों न मैं कृषि यंत्रों की मदद से अपने कार्य को आसान और सुविधाजनक बना पाऊँ। प्रतीक ने कृषि कार्य में आधुनिक तकनीकियों को जोड़कर आजीविका और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का इरादा बनाया। कंप्यूटराइज्ड लॉटरी के माध्यम से हुआ चयन प्रतीक बताते है कि, मुझे कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा संचालित निजी कस्टम हायरिंग स्कीम की जानकारी सहायक कृषि यंत्री कार्यालय, बुरहानपुर से प्राप्त हुई। इस योजना ने प्रतीक के सपनों को नई दिशा दी। योजना का लाभ लेने के लिये प्रतीक ने ऑनलाइन आवेदन किया और कंप्यूटराइज्ड लॉटरी प्रक्रिया के माध्यम से चयनित हुये।  योजना से मिला स्वरोजगार का अवसर  प्रतीक पाटील ने बताया कि मुझे योजना के तहत करीबन 20.5 लाख की परियोजना लागत पर ऋण  स्वीकृत हुआ। इससे मैंने अक्टूबर, 2025 में ‘‘गुरूकृपा कस्टम हायरिंग केन्द्र’’ नाम से ट्रेक्टर सहित आधुनिक  कृषि यंत्र क्रय कर निजी कस्टम हायरिंग केन्द्र की स्थापना की है। अब प्रतीक पाटील अपने गांव एवं आसपास के क्षेत्र के लगभग 40 किसानों को किराये पर कृषि यंत्र उपलब्ध करा रहे हैं। प्रतीक बताते है कि केन्द्र से वह किसानों को ट्रेक्टर, कल्टीवेटर, रोटावेटर, मल्चिंग मशीन, मल्टिक्रोप थ्रेशर, चापकटर, सीडाकम फर्टिलाईजर इत्यादि यंत्र उपलब्ध कराते है। बीते दो महीनों में प्रतीक ने करीबन 2.6 लाख से अधिक का कार्य किया है। कस्टम हायरिंग योजना से न केवल प्रतीक को लाभ मिला है बल्कि क्षेत्र के किसानों को भी फायदा हुआ है। कस्टम हायरिंग की सुविधा के लिये प्रतीक पाटील कहते हैं कि शासन की इस योजना ने उन्हें स्वरोजगार का अवसर दिया और गांव के अन्य किसानों को भी सशक्त बनाया है। ऐसी योजनाएं ग्रामीण युवाओं को खेती से जोड़कर आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत करती हैं। उन्होंने योजना का लाभ मिलने पर शासन एवं प्रशासन को धन्यवाद ज्ञापित किया है। कस्टम हायरिंग स्कीम क्या है मध्यप्रदेश में निजी कस्टम हायरिंग स्कीम अंतर्गत कृषकों को कृषि फसलों हेतु किराये पर ट्रेक्टर एवं आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराकर सेवाएं देने के उद्देश्य से बैंक ऋण आधार पर केन्द्र स्थापित करवाये जाते हैं। यह योजना वर्ष 2012-13 से संचालनालय कृषि अभियांत्रिकी, मध्यप्रदेश के तहत संचालित है और इसका उद्देश्य छोटे व सीमांत किसानों को उचित दरों पर कृषि उपकरण उपलब्ध कराना, उत्पादकता बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के लिये कृषि क्षेत्र में रोजगार सृजन करना है। ट्रेक्टर एवं कृषि यंत्रों के क्रय की लागत अधिकतम 25 लाख एवं सभी श्रेणी के आवेदकों हेतु लगभग 40 प्रतिशत, अधिकतम 10 लाख तक का अनुदान देय है। योजना के तहत ऑनलाइन आवेदन आंमत्रित किये जाते हैं एवं कंप्यूटराइज्ड लाटरी के माध्यम से आवेदकों का चयन किया जाता है। योजना का लाभ लेने के लिये निर्धारित दस्तावेजों में आवेदक के पास जमीन का कागज बी-1 या मूल निवासी प्रमाण पत्र, 12वी पास, आयु 18 से 40 वर्ष, जाति प्रमाण-पत्र (आरक्षित श्रेणी के लिये), आधार कार्ड होना आवश्यक है वहीं आवेदक के नाम से राशि रूपये 10,000 का डिमांड ड्राफ्ट देय है।  

कब आएगी 33वीं किस्त? लाडली बहना योजना की लाभार्थी महिलाओं की बढ़ी उम्मीदें

भोपाल मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी लाडली बहना योजना को लेकर लाखों महिलाओं के लिए अहम अपडेट सामने आया है। योजना की 32वीं किस्त 16 जनवरी 2026 को जारी की जा चुकी है और अब लाभार्थी महिलाएं 33वीं किस्त का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं। सरकारी नियमों के अनुसार, लाडली बहना योजना की किस्त हर महीने 1 से 10 तारीख के बीच जारी की जाती है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि फरवरी 2026 की 33वीं किस्त 10 से 15 फरवरी के बीच महिलाओं के खातों में ट्रांसफर की जा सकती है। हालांकि, फिलहाल सरकार की ओर से कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है। ऐसे करें अपना नाम लाभार्थी सूची में चेक महिलाएं यह आसानी से जांच सकती हैं कि उनका नाम लाभार्थी सूची में है या नहीं सबसे पहले cmladlibahna.mp.gov.in वेबसाइट पर जाएं .. मोबाइल नंबर डालकर OTP से लॉगिन करें.. होमपेज पर फाइनल लिस्ट के विकल्प पर क्लिक करें..जिला, लोकल बॉडी, ग्राम पंचायत या वार्ड चुनें स्क्रीन पर पूरी लिस्ट दिखाई दे जाएगी.. इन महिलाओं को नहीं मिलेगा 1500 रुपये का लाभ लाडली बहना योजना का लाभ केवल उन्हीं महिलाओं को मिलेगा जो तय पात्रता शर्तों को पूरा करती है.. महिला मध्य प्रदेश की निवासी हो विवाहित, तलाकशुदा या विधवा हो परिवार की सालाना आय ₹2.5 लाख से अधिक न हो जिन महिलाओं की उम्र 60 वर्ष पूरी हो चुकी है, वे योजना के दायरे से बाहर होंगी यदि इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती है, तो 33वीं किस्त का लाभ नहीं मिलेगा। राशि बढ़ाकर 3000 रुपये करने का ऐलान मुख्यमंत्री मोहन यादव पहले ही यह घोषणा कर चुके हैं कि भविष्य में लाडली बहना योजना की राशि ₹1500 से बढ़ाकर ₹3000 की जाएगी। हालांकि, यह बढ़ोतरी कब लागू होगी, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।  फिलहाल लाभार्थी महिलाओं को सलाह दी जाती है कि वे अपनी पात्रता और नाम सूची में जरूर चेक कर लें, ताकि किस्त मिलने में कोई दिक्कत न हो।

Aadhaar ऐप का नया वर्जन लॉन्च, अब मोबाइल ही बनेगा आपकी डिजिटल ID

 ग्वालियर  केंद्र सरकार डिजिटल इंडिया अभियान को एक नए पायदान पर ले जाने के लिए तैयार है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) ने आधार एप का फुल वर्जन लॉन्च कर दिया है। इस नए एप के सक्रिय होने से करोड़ों आधार धारकों को आधार केंद्रों की लंबी कतारों से मुक्ति मिल जाएगी। अब मोबाइल नंबर अपडेट करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए घर से बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं होगी। यूआइडीएआइ ने इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक्स के माध्यम से जानकारी दी कि एप के पुराने वर्जन में जो फीचर्स अब तक लॉक थे, वे आज से सक्रिय हो जाएंगे। अब यूजर्स घर बैठे अपने आधार से लिंक मोबाइल नंबर को बदल सकेंगे। पता और ई-मेल निवास का पता अपडेट करना अब बेहद आसान होगा। आगामी अपडेट्स में नाम और ई-मेल सुधार की सुविधा भी जोड़ी जाएगी। सुरक्षित डेटा फिजिकल फोटोकॉपी के बजाय डिजिटल वेरिफिकेशन होने से डेटा के गलत इस्तेमाल का खतरा न्यूनतम हो जाएगा। फिजिकल कार्ड की जरूरत खत्म अब आपको पर्स में प्लास्टिक का आधार कार्ड रखने की मजबूरी नहीं रहेगी। नए एप के बाद होटल चेक-इन, ऑफिस एंट्री या किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में केवल एप का क्यूआर कोड दिखाकर पहचान का सत्यापन किया जा सकेगा। यह प्रक्रिया न केवल तेज है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी अधिक विश्वसनीय है। यात्रियों और परिवारों के लिए डिजिटल वॉलेट अक्सर यात्रा के दौरान पूरे परिवार के आधार कार्ड संभालना एक चुनौती होती है। नए आधार एप में एक ही प्रोफाइल के भीतर परिवार के सदस्यों की डिजिटल पहचान को जोड़ा जा सकेगा। इससे एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और यात्रा के दौरान पहचान पत्र दिखाने की परेशानी खत्म हो जाएगी। ऐसे करें सक्रिय और डाउनलोड     गूगल प्ले स्टोर से आधिकारिक आधार एप इंस्टाल करें।     लॉग-इन कर अपना आधार नंबर और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर दर्ज करें।     मोबाइल पर प्राप्त ओटीपी दर्ज कर बुनियादी जानकारी भरें।     वेरिफिकेशन पूरा होते ही सभी सेवाएं सक्रिय हो जाएंगी और आपका फोन आपकी डिजिटल पहचान बन जाएगा।  

पेंडिंग केसों का गंभीर हाल, MP हाई कोर्ट में जजों की संख्या न बढ़ी तो 40 साल लग सकते हैं निपटान में

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर और खंडपीठ इंदौर व ग्वालियर में यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या 42 से बढ़कर 75 या 85 नहीं होती है, तो साढ़े चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बैकलाग खत्म करने में पांच या दस साल नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय लग सकता है। एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण इस संबंध में एरियर कमेटी की रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी लंबित मामलों के बढ़ने का प्रमुख कारण है। ऐसे में हाई कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति और उनके समाधान पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक हो गया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का यह दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाए। लेकिन यदि न्याय मिलने में दशकों का समय लगे, तो यह संवैधानिक प्रावधान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। वर्तमान स्थिति इसी ओर संकेत करती है। आंकड़ों की जुबानी: सुधार की आहट या लंबी चुनौती हालिया आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में वर्तमान में 4,80,592 मामले लंबित हैं। अगस्त 2025 से कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या औसतन 42–43 हो गई है, जो पिछले 20 वर्षों के औसत 30 न्यायाधीशों की तुलना में बेहतर स्थिति मानी जा रही है। इसका परिणाम यह रहा कि अगस्त 2025 से अब तक 84,455 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 90,045 मामलों का निपटारा किया गया। इस अवधि में कुल 5,590 मामलों की शुद्ध कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गति के बावजूद लंबित मामलों को पूरी तरह खत्म करने में 39 से 40 वर्ष का समय लग सकता है। वर्ष 2024 में इंदौर बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न्याय तक पहुंच को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। न्यायालय ने कहा था कि न्याय तक पहुंच तभी एक संवैधानिक मूल्य है, जब न्याय त्वरित रूप से मिले। यदि न्याय प्रक्रिया अत्यधिक धीमी या महंगी हो जाए, तो यह अधिकार निरर्थक बन जाता है। हाई कोर्ट में मामलों के अत्यधिक लंबित होने का प्रमुख कारण न्यायाधीशों की रिक्तियां हैं। 1989–90 की एरियर कमेटी ने भी यह स्पष्ट किया था कि उच्च न्यायालयों में मामलों के जमा होने का मुख्य कारण न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी है। 53 से बढ़ाकर 85 न्यायाधीश करने की अनुशंसा हाई कोर्ट ने अपनी स्वीकृत क्षमता 53 से बढ़ाकर 85 न्यायाधीश करने की अनुशंसा की है, जो वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार के पास वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति के लिए लंबित है। लक्ष्य यह है कि अगले पांच वर्षों में लंबित मामलों को खत्म करने के लिए प्रतिमाह 22,000 से 23,000 मामलों का निपटारा किया जाए। इसके लिए कम से कम 75 कार्यरत न्यायाधीशों की तत्काल आवश्यकता है। 2026 में मुख्य न्यायाधीश सहित कम से कम सात न्यायाधीश सेवानिवृत्त चुनौती यह भी है कि वर्ष 2026 में मुख्य न्यायाधीश सहित कम से कम सात न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। यदि समय पर नई नियुक्तियां नहीं हुईं, तो स्थिति फिर यथावत हो सकती है। निष्कर्ष के तौर पर कहा गया है कि केवल मामलों का निपटारा पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्याय न्यायपूर्ण और तर्कसंगत भी होना चाहिए। इसके लिए पर्याप्त न्यायिक शक्ति, आधुनिक डिजिटाइजेशन और विशेष बेंचों का गठन आवश्यक है। मध्य प्रदेश में पिछले दो दशकों के बाद शुरू हुआ सुधार तभी कायम रह सकता है, जब 85 न्यायाधीशों की स्वीकृति जैसे ऐतिहासिक कदम को अमल में लाया जाए। सरकार को अनुच्छेद 39-ए के तहत अपनी जवाबदेही निभाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए, ताकि आम जनता का न्यायपालिका पर भरोसा बना रहे।  

कीमती धातुओं की उछाल, जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर की वित्त मंत्री से मांगें क्या हैं

नई दिल्ली भारत का जेम्स एंड ज्वेलरी उद्योग बजट 2026-27 से कुछ ठोस कदमों की उम्मीद कर रहा है ताकि बढ़ती कीमतों, वैश्विक अनिश्चितता और बदलती ग्राहक पसंद के दौर में इस क्षेत्र को मजबूती मिल सके। सोने और चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं, जिससे गहने आम उपभोक्ता की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं। सोने-चांदी की कीमतों में तेज उछाल इस साल अब तक सोने की कीमतों में लगभग 17% की बढ़ोतरी हुई है, जो पिछले साल 64% के उछाल के बाद आई है। चांदी की कीमतों में पिछले साल 147% का भारी उछाल देखा गया। इसका कारण सुरक्षित निवेश की मांग, केंद्रीय बैंकों की खरीद, अमेरिकी मौद्रिक नीति में ढील और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स में रिकॉर्ड निवेश है। उपभोक्ता मांग स्थिर, लेकिन सतर्क सोने-चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद उपभोक्ताओं की मांग बनी हुई है, हालांकि अब वे ज्यादा सोच-समझकर खरीदारी कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि भारत में गहने सिर्फ एक भावनात्मक खरीद ही नहीं, बल्कि पैसे जमा करने का एक जरिया भी हैं। सेंको गोल्ड के सीईओ की सलाह सेंको गोल्ड के एमडी एवं सीईओ सुवांकर सेन का कहना है कि आने वाले साल में गहनों की किफायती पहुंच अहम होगी। उन्होंने छोटे टिकट वाले ईएमआई विकल्पों को विनियमित करने और ज्वेलरी पर मौजूदा 3% जीएसटी दर की समीक्षा का सुझाव दिया है। साथ ही, 6% सोना आयात शुल्क पर पुनर्विचार, कारीगरों के लिए प्रशिक्षण, तकनीक अपनाने और घरेलू मांग पूरी करने के लिए एसईजी इकाइयों को लचीलेपन की जरूरत बताई है। निर्यातकों की चिंता और मांग स्काई गोल्ड एंड डायमंड्स के एमडी मंगेश चौहान के मुताबिक, उद्योग वैश्विक चुनौतियों के बीच लागत कम करने और व्यवसाय में आसानी के लिए समझदारी भरी सुधारों की मांग कर रहा है। आयात शुल्क में तर्कसंगत कमी, सीमा शुल्क प्रक्रिया को आसान बनाने, जीएसटी को घटाकर 1 से 1.25% करना और टूरिस्ट जीएसटी रिफंड स्कीम को जल्द लागू करना उनकी प्रमुख मांगें हैं। मलाबार ग्रुप के अध्यक्ष का नजरिया मलाबार ग्रुप के चेयरमैन एम.पी. अहमद उम्मीद जताते हैं कि पिछले साल सोने के आयात शुल्क में कटौती के बाद इस बार भी नीतिगत निरंतरता बनी रहेगी। वह सोने के मुद्रीकरण योजना को और आकर्षक बनाने पर जोर देते हैं ताकि घरों में पड़े सोने को अर्थव्यवस्था में लगाया जा सके और आयात निर्भरता घटे। हीरे के कारोबार की अपेक्षाएं डिवाइन सॉलिटेयर्स के एमडी जिग्नेश मेहता कहते हैं कि नेचुरल डायमंड पर 5% आयात शुल्क घटाकर 2.5% किया जाना चाहिए, जिससे निर्यात, रोजगार और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, प्राकृतिक और लैब-ग्रोन डायमंड में अंतर स्पष्ट करने वाली बीआईएस अधिसूचना एक सही कदम थी। लैब-ग्रोन डायमंड को बढ़ावा लुकसन के सीईओ आनंद लुखी मानते हैं कि बजट में लैब-ग्रोन डायमंड को एक रणनीतिक क्षेत्र के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। कच्चे माल और मशीनरी पर शुल्क में कमी, अपग्रेडेड मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोत्साहन और एमएसएमई को आसान कर्ज मुहैया कराना इसके विकास के लिए जरूरी है। भविष्य की राह जेन डायमंड के चेयरमैन नील सोनावाला आशा करते हैं कि बजट में समकालीन और हल्के डिजाइन वाले हीरे के गहनों की बढ़ती मांग को देखते हुए संगठित खुदरा कारोबार को प्रोत्साहन मिलेगा। एक ऐसा बजट जो डिजिटल समर्थन, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता विश्वास को बढ़ाए, ज्वेरी सेक्टर के अगले चरण के विकास का रास्ता खोलेगा। कुल मिलाकर, उद्योग एक संतुलित बजट की उम्मीद कर रहा है जो गहनों को किफायती बनाए, निर्माण और निर्यात को मजबूत करे और भारत को वैश्विक गहना बाजार में एक ताकत के रूप में स्थापित करने में मदद करे।

20 साल का रिवाज खत्म, रेलवे रिटायरों को गोल्ड-प्लेटेड चांदी का मेडल नहीं देगा

नई दिल्ली  भारतीय रेलवे में सामने आए चांदी के नकली सिक्के (मेडल) घोटाले के बाद बड़ा असर देखने को मिला है। रेलवे बोर्ड ने इस मामले में एक अहम फैसला लेते हुए सेवानिवृत्त कर्मचारियों को चांदी के सिक्के देने की 20 साल पुरानी परंपरा को तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया है। रेलवे की ओर से अब रिटायर होने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों को विदाई उपहार के रूप में गोल्ड प्लेटेड सिल्वर मेडल नहीं दिया जाएगा। रेलवे बोर्ड की प्रधान कार्यकारी निदेशक रेनू शर्मा ने इस संबंध में  औपचारिक आदेश जारी किया। आदेश में साफ तौर पर लिखा गया है कि रिटायर होने वाले रेलवे अधिकारियों को सोने की परत वाले चांदी के मेडल देने की प्रथा को बंद करना है। यानी, सेवानिवृत्त रेलवे अधिकारियों को गोल्ड प्लेटेड सिल्वर मेडल देने की प्रथा को समाप्त किया जाता है।  दरअसल, रेलवे ने मार्च 2006 से अपने रिटायर होने वाले कर्मचारियों को सम्मान स्वरूप लगभग 20 ग्राम वजन का स्वर्ण मढ़ा चांदी का सिक्का देना शुरू किया था। बीते करीब 20 वर्षों में हजारों कर्मचारियों को यह चांदी का सिक्का विदाई उपहार के रूप में दिया गया। यह परंपरा रेलवे में सम्मान और सेवा के प्रतीक के तौर पर देखी जाती रही है। हालांकि, इस फैसले के पीछे भोपाल मंडल में सामने आया मेडल घोटाला एक बड़ी वजह माना जा रहा है। जांच में खुलासा हुआ कि रिटायरमेंट पर कर्मचारियों को दिए गए कई मेडल नकली थे और उनमें चांदी की मात्रा महज 0.23 प्रतिशत पाई गई। यानी जिन सिक्कों को चांदी का बताकर दिया गया, वे नाम मात्र के लिए भी चांदी के नहीं थे। मामला सामने आने के बाद रेलवे ने संबंधित सप्लायर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है और उसे ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। साथ ही, रेलवे के पास मौजूद मौजूदा मेडल स्टॉक का उपयोग अब रिटायरमेंट उपहार के तौर पर नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें अन्य प्रशासनिक या वैकल्पिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाएगा। रेलवे बोर्ड के आदेश के अनुसार, यह नया नियम 31 जनवरी 2026 को रिटायर होने वाले अधिकारियों पर भी लागू होगा। यानी अब जो कर्मचारी इस तारीख या इसके बाद सेवानिवृत्त होंगे, उन्हें यह गोल्ड प्लेटेड सिल्वर मेडल नहीं मिलेगा।

विजयपुर सीट विवाद का फैसला करीब, हाईकोर्ट में 17 तारीख को आखिरी बहस

श्योपुर  विजयपुर विधानसभा सीट को लेकर छिड़ी कानूनी लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुंच गई है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच में पूर्व मंत्री रामनिवास रावत की चुनाव याचिका पर सुनवाई के दौरान नया अपडेट सामने आया है। कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी गवाहों की गवाही दर्ज कर ली है। अब इस हाई-प्रोफाइल चुनावी याचिका पर 17 फरवरी को अंतिम बहस होगी, जिसके बाद कोर्ट फैसला सुरक्षित कर सकता है। कांग्रेस विधायक के निर्वाचन को चुनौती देने से जुड़ा है मामला दरअसल यह मामला विजयपुर से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा के निर्वाचन को चुनौती देने से जुड़ा है। पूर्व मंत्री रामनिवास रावत ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि नामांकन दाखिल करते वक्त मुकेश मल्होत्रा ने अपने आपराधिक रिकॉर्ड से संबंधित अहम जानकारी छुपाई। याचिका में दावा किया गया कि यदि सही और पूरी जानकारी सार्वजनिक होती, तो चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकता था। सभी गवाहों की गवाही दर्ज हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई बीते कई महीनों से चल रही है। दोनों पक्षों की ओर से गवाह पेश किए गए, दस्तावेज रखे गए और तथ्यों पर तीखी बहस हुई। कोर्ट ने एक-एक कर सभी गवाहों की गवाही दर्ज की। क्या कह रहे हैं कानून के जानकार? चुनाव कानून के जानकारों की मानें तो इस केस का असर सिर्फ विजयपुर सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में नामांकन प्रक्रिया को लेकर सख्ती बढ़ सकती है। विजयपुर की राजनीति पर नजर रखने वालों के लिए 17 फरवरी की तारीख बेहद अहम मानी जा रही है। यदि कोर्ट आरोपों को गंभीर मानता है, तो विधायक की विधानसभा की सदस्यता पर संकट खड़ा हो सकता है। वहीं, फैसला याचिकाकर्ता के खिलाफ गया तो सियासी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। फिलहाल हाई कोर्ट में गवाही का अध्याय बंद हो चुका है। अब सबकी नजरें अंतिम बहस पर टिकी हैं। 

छह माह पहले भस्म हुआ जहरीला कचरा, अब 900 टन राख को सुरक्षित दफन कर पर्यावरण की रक्षा

पीथमपुर 42 साल पहले भोपाल में पांच हजार लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली यूनियन कार्बाइड फैक्टरी का 337 टन विषैला कचरा तो इंदौर के समीप पीथमपुर में दफन हो गया। अब उसकी बची 900 टन राख को भी हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिया गया है। फैक्टरी से निकली गैस के कारण हजारों प्रभावित हुए थे। जिन गर्भवतियों की सांसों में यह गैस गई थी, उनकी संतानों पर भी इसका असर देखने को मिला था। इस त्रासदी के अवशेष राख के रूप में जिंदा थे और हाईकोर्ट के निर्देश पर राख को लैंडफिल किया गया है। यह हिस्सा आबादी क्षेत्र से आधा किलोमीटर दूर है। पीथमपुर में रामकी कंपनी ने अपने प्लांट में 337 टन जहरीला कचरा छह माह में जलाया। उसके बाद बची राख को जुलाई माह से कंपनी के परिसर में एक प्लेटफॉर्म पर रखा गया है। उस राख की भी विशेषज्ञों ने जांच की। राख को दफनाने के लिए एक तालाबनुमा गड्ढा खोदा गया था। जमीन से चार फीट ऊंचाई पर एक प्लेटफॉर्म बनाया गया है। उस पर एचडीपीई लाइनर बिछाया गया। उसमें राख के विशेष पैकेट को रखा गया है। अब उसे मिट्टी से ढक दिया जाएगा और उस पर पौधारोपण किया जाएगा। बची हुई राख में मरकरी, निकल, जिंक, कोबाल्ट, मैंगनीज सहित अन्य तत्व हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा कि यह राख पानी के संपर्क में नहीं आएगी और भूजल इससे प्रभावित नहीं होगा। सोलह साल पहले भी 30 टन से ज्यादा राख पीथमपुर में लैंडफिल की गई थी। उस कारण भस्मक के समीप से निकलने वाली नदी का पानी काला हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि उस पानी का उपयोग खेतों में नहीं करते, इससे फसल खराब हो जाती है। अब उसी फैक्टरी की 900 टन राख को भी पीथमपुर में दफन किया गया है। अब इसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की जाएगी।  

छोटे रनवे का बाहुबली सुपरजेट-100: रूस के साथ समझौते से भारत में बनेगा नया विमान

बेंगलुरु  फाइटर जेट ‘तेजस’ और ‘सुखोई-30 MKI’ से आसमान में अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) अब एक नई उड़ान भरने को तैयार है. एचएएल ने रूस की कंपनी यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (UAC) के साथ बड़ी डील की है. अब भारत रूस के साथ मिलकर सुखोई की ड‍िजाइन वाला ‘सुपरजेट-100’ बनाएगा. वही सुखोई, जिसका नाम सुनते ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं, लेकिन सुपरजेट-100 से लोग सफर कर सकेंगे. यह डील भारत में हवाई सफर की तस्‍वीर बदलने वाली है. क्‍योंक‍ि इस विमान को छोटे रनवे का ‘बाहुबली’ कहा जाता है. यह वहां भी उतर सकता है, जहां बड़े विदेशी विमानों के पहिए थम जाते हैं. इस मेगा डील पर UAC के सीईओ वादिम बादेहा और HAL के चेयरमैन डॉ. डी.के. सुनील ने हस्ताक्षर कर द‍िए हैं. इस समझौते के तहत एचएएल को भारत में सुपरजेट-100 बनाने का लाइसेंस मिलेगा. सिर्फ निर्माण ही नहीं, बल्कि बिक्री, मरम्मत और रखरखाव का जिम्मा भी एचएएल के पास होगा. रूसी कंपनी तकनीकी मदद और डिजाइन सर्विसेस देगी, ताकि एचएएल की फैक्ट्रियों में इस वर्ल्ड-क्लास विमान का उत्पादन हो सके. क्यों कहलाता है छोटे रनवे का ‘बाहुबली’?     मुश्किल जगहों पर लैंडिंग: भारत में शिमला, कुल्लू या पूर्वोत्तर के कई हवाई अड्डे ऐसे हैं जहां रनवे छोटे हैं और बड़े बोइंग या एयरबस वहां नहीं उतर सकते. सुपरजेट-100 को खासतौर पर छोटे रनवे से उड़ान भरने और उतरने के लिए डिजाइन किया गया है. यह पहाड़ी और कठिन इलाकों का असली ‘बाहुबली’ है.     फाइटर जेट वाला डीएनए: इसे उसी ‘सुखोई’ कंपनी ने डिजाइन किया है, जो दुनिया के बेहतरीन लड़ाकू विमान बनाती है. इसलिए इसकी बॉडी बेहद मजबूत और एयरोडायनामिक्स फाइटर जेट्स जैसी है. यानी हवा चीरकर आगे बढ़ने की क्षमता बिल्‍कुल फाइटर जेट की तरह होगी.     खराब मौसम का साथी: इसमें आधुनिक एवियोनिक्स लगे हैं जो इसे घने कोहरे और खराब विजिबिलिटी में भी सुरक्षित लैंडिंग करने में मदद करते हैं. साफ है क‍ि इसकी वजह से जो अक्‍सर हादसे हो जाते हैं, उनमें कमी आएगी. 100 सीटों वाले जेट की खूबि‍यां     भारत में अभी 70 सीटर वाले टर्बोप्रॉप यानी पंखे वाले विमान और 180 सीटर वाले बड़े जेट विमान चलते हैं. इनके बीच 100 सीटों वाले जेट की भारी कमी है.     यह विमान अधिकतम 0.81 मैक यानी लगभग 870 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है. यह स्पीड इसे अपने श्रेणी के अन्य विमानों से काफी तेज बनाती है. यानी दिल्ली से पटना या मुंबई से इंदौर का सफर अब और कम समय में पूरा होगा.     भारत में बनने के कारण इसकी लागत कम होगी, जिसका सीधा फायदा यात्रियों को सस्ती टिकट के रूप में मिल सकता है.     इकोनॉमी क्लास में ‘लग्जरी’ का अहसास अक्सर छोटे विमानों में यात्रियों को जगह की कमी महसूस होती है, लेकिन सुपरजेट-100 में ऐसा नहीं है.     इसका केबिन अपनी श्रेणी के अन्य विमानों से ज्यादा चौड़ा है. सीटें 18.3 इंच चौड़ी हैं, जो यात्रियों को खुला और आरामदायक सफर देती हैं. बड़े ओवरहेड डिब्बे हैं, ताकि भारतीय यात्री अपना सामान आसानी से रख सकें. व‍िमान पर ल‍िखा होगा मेड इन इंड‍िया यह समझौता सिर्फ एक विमान बनाने का नहीं, बल्कि तकनीक हासिल करने का है. अब तक हम पैसेंजर विमानों के लिए पूरी तरह अमेर‍िका की बोइंग या फ्रांस की एयरबस पर निर्भर थे. एचएएल की यह पहल भारत को सिविल एविएशन मैन्युफैक्चरिंग के ग्लोबल मैप पर खड़ा कर देगी. यानी जल्द ही वह दिन आएगा जब आप टिकट बुक करेंगे और विमान के दरवाजे पर लिखा होगा- मेड इन इंडिया. क‍िराया सस्‍ता होगा या महंगा? लेग स्‍पेस क‍ितना होगा? जान‍िए हर सवाल का जवाब सुपरजेट-100: आखिर क्यों खास है यह विमान? सुखोई सुपरजेट-100 दुनिया के सबसे आधुनिक रीजनल जेट्स में से एक है, जिसे रूस की मशहूर कंपनी ‘सुखोई’ ने डिजाइन किया है. इसे बनाने वाले इंजीनियर वही हैं जिन्होंने दुनिया के बेहतरीन फाइटर जेट्स डिजाइन किए हैं. लेकिन, सुपरजेट-100 एक सिविलियन विमान है. इस व‍िमान की रेंज क‍ितनी होगी? सुपरजेट-100 के दो वर्जन हैं… बेसिक और लॉन्ग रेंज. बेसिक वर्जन करीब 3,000 किलोमीटर और लॉन्ग रेंज वर्जन 4,500 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है. इसका मतलब है कि यह विमान दिल्ली से चेन्नई, मुंबई से कोलकाता या बेंगलुरु से गुवाहाटी तक बिना रुके उड़ान भर सकता है. क‍ितनी ऊंचाई तक उड़ने में माह‍िर यह 40,000 फीट की ऊंचाई पर क्रूज कर सकता है, जिससे यह खराब मौसम और टर्बुलेंस के ऊपर से निकल सकता है, जो यात्रियों को एक आरामदायक सफर देता है. पैसेंजर्स के ल‍िए इसमें नया क्‍या होगा? अक्सर रीजनल जेट्स यानी छोटे विमानों में यात्रियों को तंग जगह की शिकायत होती है, लेकिन सुपरजेट-100 को यात्रियों के आराम को ध्यान में रखकर बनाया गया है. इसकी केबिन की चौड़ाई 3.2 मीटर है, जो कि एम्ब्रेयर या बॉम्बार्डियर जैसे विमानों से ज्यादा है. सुपरजेट-100 में सीटिंग अरेंजमेंट कैसा है? इसमें आमतौर पर 2+3 की सीटिंग होती है. यानी एक तरफ दो सीटें और दूसरी तरफ तीन. इसका फायदा यह है कि बीच वाली सीट कम होती हैं. इसकी सीटें 18.3 इंच चौड़ी हैं, जो बड़े विमानों की इकोनॉमी क्लास के बराबर या उससे ज्यादा हैं. गलियारा इतना चौड़ा है कि केबिन क्रू और यात्री आसानी से आ-जा सकते हैं. एक साथ क‍ितने लोग बैठ सकते हैं? हमारे पास 70 सीटर टर्बोप्रॉप विमान हैं और सीधे 180 सीटर जेट हैं. इन दोनों के बीच 100 सीटों वाले जेट की भारी कमी है. लेकिन सुपरजेट-100 में 87 से 98 यात्रियों के बैठने की जगह है. एयरलाइन कंपन‍ियों के ल‍िए कैसे फायदे का सौदा? कई रूट्स पर 180 सीटर विमान उड़ाना एयरलाइंस के लिए घाटे का सौदा होता है क्योंकि सीटें नहीं भरतीं. वहीं, टर्बोप्रॉप विमान धीमे होते हैं. सुपरजेट-100, 100 यात्रियों को लेकर जेट की स्पीड से उड़ सकता है. यह एयरलाइंस के मुनाफे को बढ़ा सकता है. HAL और मेक इन इंडिया के लिए इसके क्‍या मायने? यह समझौता सिर्फ एक विमान खरीदने का नहीं, बल्कि तकनीक हासिल करने का है. UAC, HAL को डिजाइन और निर्माण की तकनीक देगा. इससे भारत में सिविल एविशन मैन्युफैक्चरिंग का इकोसिस्टम तैयार होगा. … Read more

FASTag में बदलाव: NHAI ने KYV का झंझट हटाया, 1 फरवरी से नए नियम लागू

  नई दिल्ली  FASTag KYV New Rule: टोल प्लाज़ा पर गाड़ी रुकी है, FASTag लगा है, पैसे भी हैं, फिर भी मशीन बीप करती है और आगे से आवाज आती है – KYV अपडेट कराइए. ड्राइवर भौंहें सिकोड़ता है, पीछे लाइन बढ़ती जाती है और मन में सवाल उठता है कि जब सब सही है तो यह झंझट क्यों. अब इसी झंझट पर NHAI ने कैंची चला दी है. नए FASTag वालों के लिए वह नियम हटा दिया गया है, जिसने लाखों निजी वाहन चालकों का बीपी बढ़ाया हुआ था. 1 फरवरी 2026 से टोल पर प्लाजाओं पर अब आसानी से गाड़ी दौड़ेगी. दरअसल नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी NHAI ने नए FASTag जारी करने के प्रोसेस को और आसान बनाने का फैसला लिया है. अथॉरिटी ने प्राइवेट वाहनों के लिए FASTag जारी होने के बाद होने वाली अनिवार्य Know Your Vehicle यानी KYV प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा. इसका सीधा फायदा यह होगा कि टोल प्लाज़ा पर रुकावटें कम होंगी, कागजी झंझट घटेगा और टोल भुगतान पहले से कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा. ये नया नियम 1 फरवरी 2026 से लागू होगा. क्या कहता है NHAI नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि,  1 फरवरी 2026 या उसके बाद जारी होने वाले सभी नए FASTag में KYV की जरूरत नहीं होगी. अथॉरिटी ने नए जारी किए गए फास्टैग वाली कारों (कार, जीप, वैन) के लिए 'नो योर व्हीकल' (केवाईवी) की प्रक्रिया को बंद करने का फैसला किया है. पहले ऐसा होता था कि FASTag चालू होने के बाद भी वाहन मालिकों से दोबारा दस्तावेज, फोटो या सत्यापन मांगा जाता था. इससे लोगों को बार-बार बैंक या कस्टमर केयर के कॉल झेलने पड़ते थे और कई बार सही डॉक्यूमेंट देने के बावजूद फास्टैग सस्पेंड कर दिया जाता था. अब यह परेशानी खत्म होने वाली है. नए नियमों के तहत FASTag जारी करने से पहले ही सारी जांच पूरी कर ली जाएगी. बैंक अब VAHAN डेटाबेस के जरिए वाहन के रजिस्ट्रेशन की पुष्टि करेंगे. यह प्रक्रिया अनिवार्य होगी. कुछ खास मामलों में आरसी का इस्तेमाल क्रॉस-वेरिफिकेशन के लिए किया जा सकता है. यानी जिम्मेदारी अब बैंकों की होगी कि टैग जारी करते वक्त सारी जानकारी सही हो. किन हालात में हो सकती है KYV हालांकि KYV को पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है. यह सिर्फ विशेष परिस्थितियों में लागू होगी. जैसे अगर FASTag किसी गलत वाहन से जुड़ा पाया जाता है, टैग सही तरीके से चिपका न हो, किसी तरह के दुरुपयोग या धोखाधड़ी की आशंका हो, या टोल प्लाज़ा पर कोई विवाद हो जाए. सामान्य हालात में वाहन मालिकों को किसी अतिरिक्त प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा. मौजूदा FASTag यूज़र्स पर नहीं होगा असर जो लोग पहले से FASTag इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके लिए नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. जब तक किसी तरह की गड़बड़ी सामने नहीं आती, तब तक उनसे भी रेगुलर KYV नहीं मांगी जाएगी. इससे टोल प्लाज़ा पर बेवजह की रुकावटें और परेशानियां नहीं होंगी. NHAI का मानना है कि इस बदलाव से निजी कार मालिकों का ड्राइविंग एक्सपीरिएंस काफी बेहतर होगा. पहले कई बार सही दस्तावेज देने के बाद भी बार-बार KYV की मांग की जाती थी, जिससे लोग परेशान हो जाते थे. नए सिस्टम से कागजी काम कम होगा, टोल पर विवाद घटेंगे, FASTag जल्दी जारी और एक्टिव होगा और नेशनल हाईवे पर सफर और भी आसान होगा. कमर्शियल वाहनों पर नहीं बदला नियम यह छूट सिर्फ प्राइवेट वाहनों जैसे कार, जीप और वैन के लिए है. बस, ट्रक और मल्टी-एक्सल जैसे कमर्शियल वाहनों के लिए KYV प्रक्रिया पहले की तरह लागू रहेगी. इसके अलावा FASTag की अनिवार्यता भी सभी वाहनों के लिए बनी रहेगी. NHAI का कहना है कि डिजिटल सिस्टम और VAHAN इंटीग्रेशन के मजबूत होने के बाद पुरानी KYV प्रक्रिया से लोग परेशान थे और शिकायत कर रहे थे. वाहन मालिकों को सलाह दी गई है कि वे अपना FASTag सही मोबाइल नंबर और बैंक खाते से लिंक रखें और समय पर रिचार्ज करें, ताकि ब्लैकलिस्टिंग या डबल टोल जैसी समस्याओं से बचा जा सके.