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IPL 2026 में एमएस धोनी की वापसी की संभावना, CSK को मिली दोहरी खुशी

चेन्नई चेन्नई सुपर किंग्स के पूर्व कप्तान एमएस धोनी को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। धोनी की आईपीएल 2026 में वापसी हो सकती है, मगर उसके लिए एक शर्त है। बता दें, 44 साल के एमएस धोनी आईपीएल 2026 में अपना पहला मैच खेलने के लिए इंतजार कर रहे हैं। टूर्नामेंट के शुरू होने से पहले धोनी का काफ इंजरी (पिंडली की चोट) हुई थी, जिस वजह से वह अभी तक एक भी मैच नहीं खेल पाए हैं। माही की गैरमौजूदगी में सीएसके की हालत काफी पतली है। अभी तक खेले तीनों मुकाबलों में चेन्नई सुपर किंग्स को हार का सामना करना पड़ा है और आईपीएल 2026 पॉइंट्स टेबल में टीम सबसे नीचे 10वें पायदान पर लगी हुई है। सीएसके के लिए डबल खुशखबरी यह है कि डेवाल्ड ब्रेविस भी फिट होने की कगार पर हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चेन्नई सुपर किंग्स को शनिवार (11 अप्रैल) को दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ अपने अगले मुकाबले से पहले चोटिल एमएस धोनी और डेवाल्ड ब्रेविस के पूर्ण फिटनेस के करीब पहुंचने से भारी बढ़ावा मिलने की संभावना है। अगले कुछ दिनों में धोनी का फिटनेस टेस्ट होने की संभावना है और अगर वह इसमें पास हो गए तो चेपॉक में दिल्ली के खिलाफ मैदान पर उतरेंगे। चोटिल होने की वजह से धोनी टीम के साथ ट्रैवल नहीं कर रहे हैं। पिछले शुक्रवार को पंजाब किंग्स के खिलाफ होम मैच के लिए चेपॉक में भी अनुपस्थित थे। हालांकि वह नियमित रूप से टीम के साथ ट्रेनिंग सेशन सत्र में भाग ले रहे हैं, लेकिन प्रोटोकॉल के कारण वह मैच के दिनों में स्टेडियम नहीं गए हैं। CSK को एमएस धोनी की सबसे ज्यादा जरूरत आईपीएल के इतिहास में एमएस धोनी ने सिर्फ 8 मुकाबले ही मिस किए हैं। 3 मुकाबले 2010 में, 2 मुकाबले 2019 में और 3 मुकाबले अब तक 2026 में उन्होंने सीएसके के लिए मिस किए हैं। हैरानी की बात ये है कि जिन 8 मैचों में एमएस धोनी प्लेइंग इलेवन का हिस्सा नहीं रहे हैं, उनमें से सिर्फ एक ही मैच में चेन्नई सुपर किंग्स को जीत मिली है। 7 मैचों में टीम को हार का सामना करना पड़ा है। इन आंकड़ों को देखकर साफ कहा जा सकता है कि माही के बिना सीएसके के लिए मामला नामुमकिन ही है।

कोर्ट का अहम फैसला: 19 साल की पत्नी को प्रेमी के साथ रहने की मिली इजाजत, पति से रिश्ते में नहीं आया सामंजस्य

 ग्वालियर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक महत्वपूर्ण मामले में 19 साल की युवती को उसकी इच्छा के अनुसार प्रेमी के साथ रहने की अनुमति दी है. अदालत ने साफ किया कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है और उसकी मर्जी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।  ग्वालियर से सामने आए इस मामले में एक पति ने अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए 'कोर्ट में पेश कराने की याचिका (हेबियस कॉर्पस)' दायर की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी को एक युवक ने अपने पास अवैध रूप से रखा हुआ है. मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस ने युवती को बरामद कर वन स्टॉप सेंटर में रखा और बाद में उसे कोर्ट में पेश किया गया. सुनवाई के समय युवती के माता-पिता, पति और कथित प्रेमी भी अदालत में मौजूद थे. अदालत ने जब युवती से उसकी इच्छा पूछी तो उसने साफ तौर पर कहा कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से रह रही है. उसने यह भी कहा कि वह न तो अपने पति के साथ रहना चाहती है और न ही अपने माता-पिता के साथ. युवती ने अदालत को बताया कि उसका वैवाहिक जीवन ठीक नहीं चल रहा था।  युवती ने कहा कि उसकी उम्र 19 साल है, जबकि उसके पति की उम्र 40 साल है. दोनों के बीच 21 साल का अंतर है, जिसके कारण उनके रिश्ते में सामंजस्य नहीं बन पाया. उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ है. अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए युवती की काउंसलिंग कराई. इसके बावजूद युवती अपने फैसले पर कायम रही और उसने दोबारा कहा कि वह अपनी इच्छा से अपने प्रेमी के साथ रहना चाहती है. युवती के प्रेमी ने भी अदालत को भरोसा दिलाया कि वह उसकी देखभाल करेगा और उसके साथ किसी तरह का गलत व्यवहार नहीं करेगा. सभी पक्षों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि युवती बालिग है और अपनी इच्छा से निर्णय ले रही है. ऐसे में उसे उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।  अदालत ने युवती को उसके प्रेमी के साथ जाने की अनुमति दे दी. साथ ही उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए छह महीने के लिए निगरानी व्यवस्था भी तय की गई है. इसके तहत संबंधित अधिकारी समय-समय पर युवती से संपर्क में रहेंगे और उसकी स्थिति पर नजर रखेंगे. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद युवती को वन स्टॉप सेंटर से मुक्त किया जाए। 

PMJAY के पैनल से 300 कैंसर विशेषज्ञ बाहर, मरीजों के लिए क्या होगा असर?

नई दिल्ली देश भर में हर साल करीब 15 लाख कैंसर के मामले सामने आते हैं। यह संख्या किसी टू या थ्री टियर सिटी की कुल आबादी के जितनी है। भारत में कैंसर एक बड़े स्वास्थ्य संकट के तौर पर सामने आ रहा है। इस बीच कई राज्यों में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की सूची से सैकड़ों कैंसर स्पेशलिस्ट्स को ही बाहर कर दिया गया है। इससे देश में एक संकट पैदा हो सकता है और आम लोगों को कैंसर के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का भी सामना करना पड़ सकता है। अब सवाल यह है कि ऐसा फैसला क्यों लिया गया है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इन डॉक्टरों के पास पर्याप्त अनुभव और ट्रेनिंग तो है, लेकिन उनके पास नेशनल मेडिकल कमिशन से मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं है। इन डिग्रियों में एमडी की डिग्री भी शामिल है। पैनल से हटाए गए डॉक्टरों को इस आधार पर बाहर किया गया है कि उन्होंने फेलोशिप लेकर प्राइवेट सेक्टर से प्रशिक्षण लिया है। इस पर डॉक्टरों का कहना है कि यह फैसला गलत है। उन्होंने कहा कि कुछ दशक पहले तक ऑन्कोलॉजी के लिए फेलोशिप ही एक तरीका होती थी। तब कोई औपचारिक कोर्स नहीं होते थे। यही नहीं आज भी डिग्रियां लेने के बाद इस बात को प्राथमिकता दी जाती है कि पोस्टग्रैजुएशन के बाद डॉक्टर किसी कैंसर अस्पताल में दो से तीन साल फेलोशिप पर काम करें। इस दौरान वे सर्जरी आदि के बारे में जानते हैं और उनकी पर्याप्त ट्रेनिंग होती है। यह फैसला खासतौर पर ऐसे लोगों की परेशानी बढ़ा देगा, जो इलाज के लिए केंद्र सरकार की जन आरोग्य योजना के तहत बनने वाले आयुष्मान कार्ड पर निर्भर हैं। इस प्रकार कमजोर तबके के लोगों को ही करारा झटका लगेगा। बता दें कि भारत में पहले ही कैंसर के डॉक्टरों की कमी है। 2018 के एक अनुमान के मुताबिक देश में 10 लाख की आबादी पर एक कैंसर डॉक्टर है। पैनल से बाहर होने वालों में कई नामी डॉक्टर भी शामिल टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक PM जन आरोग्य योजना के पैनल से जिन डॉक्टरों को बाहर किया गया है, उनमें कई नामी चिकित्सक भी हैं। कई तो कैंसर से जुड़े विभागों के हेड हैं। इसके अलावा कुछ डॉक्टर तो मेडिकल डायरेक्टर, टीचर और सीनियर सर्जन आदि भी हैं। देश भर में करीब 300 ऐसे डॉक्टरों के पैनल से हटने की बात सामने आ रही है। देश में कुल 4000 ही कैंसर डॉक्टर और 300 बाहर देश भर में कुल 4000 कैंसर डॉक्टर हैं और यदि उनमें से तीन को पीएम जन आरोग्य योजना के पैनल से ही बाहर कर दिया गया है तो यह बड़ा झटका है। इस फैसले से खासतौर पर टियर-टू और थ्री शहरों में मरीजों को बड़ा नुकसान होगा। यहां विकल्पों की पहले ही कमी रहती है और डॉक्टरों के एक वर्ग को पैनल से बाहर कर देने के बाद समस्या और बढ़ जाएगी।

‘Stella Juva’ – दुनिया की पहली सोलर एंबुलेंस, पेट्रोल और बिजली के बिना चलेगी

 नई दिल्ली कई बार जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक एंबुलेंस का फासला होता है. दूर-दराज के इलाकों में पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रिसिटी सहित तमाम संसाधनों की कमी इस मुश्किल को और भी बढ़ा देती है. सोचिए… एक ऐसी एंबुलेंस जो बिना तेल, बिना बिजली के और बिना किसी एक्सटर्नल सपोर्ट सिस्टम के सिर्फ सूरज की रोशनी से चलती हो. और इतना ही नहीं, उसी रोशनी से मिलने वाले एनर्जी से एंबुलेंस के अंदर मरीज का इलाज भी होता हो. यह साइंस-फिक्शन कहानी की कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत बनने जा रही एक नई तकनीक है. इसका नाम है 'स्टेला जुवा' (Stella Juva), जो आने वाले समय में मेडिकल साइंस की दुनिया ही बदल सकती है।  हम सभी जानते हैं कि, समय रहते इलाज न मिल पाने के कारण कई लोगों की मौत हो जाती है. इसमें एक बड़ा कारण सही समय पर मरीज तक एंबुलेंस का न पहुंच पाना भी है. नीदरलैंड के एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने इसी सवाल का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की. उन्होंने सोचा कि दुनिया के उन हिस्सों में जहां सड़क तो है, लेकिन बिजली और अस्पताल नहीं हैं, वहां मरीजों तक इलाज कैसे पहुंचाया जाए. इसी सोच से जन्म हुआ एक ऐसी एंबुलेंस का, जो खुद ही अपनी एनर्जी पैदा करे और हर हाल में मरीज तक पहुंचे।  उन्होंने दिन-रात मेहनत करके एक ऐसी गाड़ी तैयार की, जो पूरी तरह सौर उर्जा पर चलती है. इस गाड़ी का नाम रखा गया 'स्टेला जुवा'. यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि चलता-फिरता छोटा सा अस्पताल है. इस सपने को हकीकत बनाने में एक बड़ी सौर ऊर्जा कंपनी ने भी साथ दिया. इस कंपनी ने ऐसे खास सौर पैनल दिए, जो सामान्य पैनलों से कहीं ज्यादा पावरफुल और सस्टेनेबल हैं. इन पैनलों को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वे सूरज की रोशनी का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा ऑब्जर्व करते हैं।  क्या है स्टेला जुवा? स्टेला जुवा को नीदरलैंड की आइंडहोवेन यूनिर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों ने तैयार किया है. यह एंबुलेंस पूरी तरह सोलर एनर्जी पर चलेगी और इसके अंदर लगे मेडिकल डिवाइसेज भी उसी से चलेंगे. इस प्रोजेक्ट को जुलाई 2026 तक सड़क पर उतारने की योजना है. इसका मकसद ऐसे इलाकों में इलाज पहुंचाना है जहां बिजली या फ्यूल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।  इस प्रोजेक्ट में दुनिया की मशहूर सोलर पैनल बनाने वाली कंपनी AIKO ने सोलर टीम आइंडहोवेन के साथ मिलकर काम किया है. AIKO अपने हाई एफिशिएंसी ABC यानी ऑल ब्लैक कॉन्टैक्ट सोलर सेल्स के लिए जानी जाती है, जिसका इस्तेमाल इस एंबुलेंस में भी किया जा रहा है. ये नई सोलर तकनीक ही इस एंबुलेंस की सबसे बड़ी ताकत है. इसमें सोलर सेल्स का डिजाइन ऐसा है कि ज्यादा से ज्यादा धूप को आब्जर्व कर सके. इसमें फ्रंट साइड पर कोई मेटल नहीं होता, जिससे रोशनी ज्यादा मिलती है।  इन पैनल्स में सिल्वर का इस्तेमाल नहीं किया गया है, जिससे सेल्स ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले बनते हैं. इसके अलावा, यह तकनीक अलग-अलग मौसम और तापमान में भी अच्छी परफॉर्मेंस देती है. यानी गर्मी, ठंड या मुश्किल हालात में भी एंबुलेंस ठीक से काम करेगी. स्टेला जुवा एक मूविंग पावर सप्लाई की तरह भी काम करती है. जहां बिजली नहीं है, वहां भी यह मेडिकल डिवाइसेज चला सकती है. इसका मतलब है कि अब दूर-दराज के गांवों और मुश्किल इलाकों में भी समय पर इलाज पहुंचाया जा सकता है।  यह प्रोजेक्ट क्लीन एनर्जी, बेहतर ट्रांसपोर्ट और हेल्थकेयर को एक साथ जोड़ता है. आइंडहोवेन सोलर टीम पहले भी कई बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स बना चुकी है. इस टीम ने वर्ल्ड सोलर चैलेंज क्रूजर क्लास को लगातार चार बार जीता है. इससे पहले यह टीम Stella Vita नाम की सोलर कैंपर वैन और Stella Terra नाम की ऑफ-रोड सोलर गाड़ी भी बना चुकी है, जो खराब रास्तों और दुर्गम इलाकों में भी आसानी से दौड़ सकती है। 

बांगलादेश बॉर्डर पर सख्ती बढ़ी, अब भारत में घुसने की कोशिश करने वाले घुसपैठिये डरेंगे

कलकत्ता भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर घुसपैठ और तस्करी पर लगाम कसने के लिए अब एक अनोखी और चौंकाने वाली रणनीति पर विचार किया जा रहा है. अब यहां सीमावर्ती इलाकों पर पारंपरिक बाड़ और टेक्नोलॉजी के अलावा प्रकृति का खतरनाक हथियार इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है. खबर है कि सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ ने अपने फील्ड यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे नदी और दलदली इलाकों में सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के इस्तेमाल की संभावनाओं का अध्ययन करें।  भारत-बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा में करीब 175 किलोमीटर नदी और दलदली इलाका है, जहां बाढ़ और भौगोलिक स्थिति के कारण सामान्य बाड़ लगाना संभव नहीं होता. ऐसे में BSF अब प्रकृति को ही सुरक्षा का हथियार बनाने की सोच रही है. माना जा रहा है कि अगर यह योजना लागू होती है, तो घुसपैठियों के लिए सीमा पार करना पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है।  खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों के बाद यह विचार सामने आया है. 26 मार्च को BSF मुख्यालय से भेजे गए एक आंतरिक संदेश में कहा गया है कि जिन नदी वाले इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां ‘प्राकृतिक अवरोध’ के तौर पर सांप और मगरमच्छ जैसे जीवों का उपयोग किया जा सकता है. हालांकि, फिलहाल यह योजना केवल चर्चा और व्यवहार्यता जांच के स्तर पर है, इसे लागू करने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।  बीएसएफ के प्लान में कहां रुकावट? इसी साल फरवरी में दिल्ली स्थित बीएसएफ मुख्यालय में हुई एक बैठक के बाद यह कम्युनिकेशन जारी किया गया. संदेश में सीमा चौकियों (BOPs) को ‘डार्क जोन’ (जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है) के रूप में चिन्हित करने और वहां रहने वाले गांववालों के खिलाफ दर्ज मामलों की रिपोर्ट मांगी गई है।  हालांकि द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, BSF के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अभी यह सिर्फ चर्चा का विषय है. ‘अभी तक सांप-मगरमच्छ तैनात करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है. सिर्फ संभावना तलाशने को कहा गया है. इसमें कई चुनौतियां हैं… सरीसृपों को कहां से लाया जाए, उनका रखरखाव कैसे हो और नदी किनारे रहने वाले स्थानीय लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा।  घुसपैठियों के लिए डर का माहौल अगर यह योजना लागू हुई तो घुसपैठिए और तस्करों के लिए भारत में घुसने का ख्याल आते ही कांप उठना तय है. नदी के पानी में मगरमच्छ और घने जंगलों में जहरीले सांप है… यह सोचकर ही कोई भी गैरकानूनी तरीके से सीमा पार करने से पहले सौ बार सोचेगा।  विशेषज्ञों का मानना है कि नदी वाले इलाकों में जहां फेंसिंग नहीं लग पाती, वहां प्राकृतिक बाधाएं काफी प्रभावी साबित हो सकती हैं. लेकिन साथ ही यह भी चिंता जताई जा रही है कि बाढ़ के समय ये सरीसृप दोनों तरफ के गांवों के लिए खतरा बन सकते हैं।  बॉर्डर पर फेंसिंग अभी भी अधूरी संसदीय स्थायी समिति की 17 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश सीमा की कुल 4,096.7 किमी में से सिर्फ 2,954.56 किमी ही फेंसिंग हो पाई है. अभी भी 371 किमी फेंसिंग बाकी है. कठिन भौगोलिक स्थिति, नदियां, पहाड़ियां और स्थानीय विरोध के कारण फेंसिंग कार्य धीमा चल रहा है।  गृह मंत्रालय की 2024-25 वार्षिक रिपोर्ट भी मानती है कि नदी और निचले इलाकों में फेंसिंग लगाना चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में BSF अब टेक्नोलॉजी (ड्रोन, सेंसर, कैमरा) के साथ-साथ प्राकृतिक तरीकों पर भी विचार कर रही है।  BSF अधिकारी मानते हैं कि सांप और मगरमच्छ तैनात करना आसान नहीं होगा. इनकी खरीद, रखरखाव, प्रजनन और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा. साथ ही बाढ़ के मौसम में इनके गांवों में घुस आने का खतरा भी बना रहेगा. फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा के चरण में है. BSF पूर्वी कमांड को डार्क जोन की मैपिंग करने और रिपोर्ट देने को कहा गया है।   

झांसी सदर्न बायपास फोर लेन परियोजना को मिली मंजूरी, 631 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत

भोपाल  प्रदेश के निवाड़ी जिले और उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में 15.5 किलोमीटर लंबे 4-लेन सदर्न बायपास के निर्माण की केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी है। इस परियोजना की कुल लागत 631.73 करोड़ रुपये तय की गई है। सीएम मोहन यादव ने कहा कि दो राज्यों को सांस्कृतिक डोर से जोड़ेगा नया फोर लेन बायपास जोड़ेगा। उन्होंने प्रदेश को नई नई सौगाते देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का आभार जताया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि यह बायपास बंगाय खास से ओरछा तिगेला तक राष्ट्रीय राजमार्ग-44 और राष्ट्रीय राजमार्ग-39 को जोड़ेगा। इससे एमपी से होकर झांसी जाने वाला भारी ट्रैफिक अब शहर के अंदर नहीं जाएगा, जिससे सीमा क्षेत्र में जाम और दबाव कम होगा। यह बायपास ओरछा तिगेला पर खत्म होता है, जो UNESCO की संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल है और जहां जहांगीर महल, राम राजा मंदिर और बेतवा वन्यजीव अभयारण्य स्थित हैं। हाईवे तक बेहतर पहुंच से इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और विकास को गति मिलेगी।   इसके अलावा इस परियोजना से मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के बीच माल ढुलाई तेज होगी। ट्रांसपोर्ट लागत और समय दोनों कम होंगे, जिससे व्यापारियों को फायदा मिलेगा। बेहतर कनेक्टिविटी के कारण निवाड़ी और आसपास के क्षेत्रों में छोटे उद्योग, होटल, ढाबे, ट्रांसपोर्ट सर्विस जैसे नए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही झांसी में विकसित हो रहे औद्योगिक क्षेत्र (BIDA) से एमपी के जिलों को सीधा फायदा मिलेगा, क्योंकि वहां तक पहुंच आसान और तेज हो जाएगी। झांसी पांच बड़े राष्ट्रीय राजमार्गों एनएच-27, एनएच-44, एनएच-39, एनएच-539 और एनएच-552 का प्रमुख जंक्शन है। इस कारण शहर के भीतर ट्रैफिक काफी बढ़ जाता है, जिससे लोगों को रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ता है। 

₹2.80 करोड़ पर टैक्स ‘0’: क्या आप भी इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं? जानें धारा 54F के बारे में

हैदराबाद  हैदराबाद के आयकर अपीलीय न्‍यायाधिकरण (ITAT) ने एक खास फैसले में आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत एक टैक्‍सपेयर को बड़ी राहत दी है. अब उसे 2.80 करोड़ रुपये की टैक्‍सेबल इनकम नहीं देनी पड़ेगी।    ब्रिटेन में रह रहे व्‍यक्ति से जुड़ा मामला आइए जानते क्‍या आप ले सकते हैं ये लाभ और आयकर अधिनियम की धारा 54F क्‍या है, जिसके तहत इतनी बड़ी टैक्‍स छूट मिल सकती है? हालांकि, पहले इससे जुड़ा मामला समझ लेते हैं कि आखिर किस मामले के तहत इतनी बड़ी टैक्‍स छूट दी गई है. दरअसल, ये मामला एक NRI से जुड़ा हुआ है, जो ब्रिटेन में रहता है।  2.80 करोड़ पर 0 टैक्‍स 2.80 करोड़ पर 0 टैक्‍स: टैक्स सलाहकार प्लेटफॉर्म टैक्स बडी के अनुसार, ब्रिटेन में रहने वाले टैक्‍सपेयर रेवंत ने वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान पांच विला 5.26 करोड़ रुपये में बेचे. अधिग्रहण की लागत को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने 3.41 करोड़ रुपये का लॉन्‍ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) दिखाया. इसके मुकाबले, उन्होंने धारा 54F के तहत 2.80 करोड़ रुपये की टैक्‍स छूट का दावा किया, जिसमें उन्होंने एक नई आवासीय संपत्ति में निवेश का दिखाया था।  क्‍या था पूरा विवाद?              क्‍या था पूरा विवाद: हालांकि, विवाद इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि एक्वा स्पेस डेवलपर्स से खरीदी गई नई प्रॉपर्टी 10 अप्रैल, 2023 को उनकी बहन श्रेया के नाम पर रजिस्‍ट्रर्ड की गई थी.अधिकारी ने धारा 54F के तहत किए गए पूरे दावे को सख्त कानून के आधार पर खारिज कर दिया. जिसका तर्क था कि मकान रेवंत के नाम पर रजिस्‍टर्ड नहीं था. इसलिए, उन्हें कानूनी मालिक नहीं माना जा सकता था. धारा 54F के तहत दी गई छूट पूरी तरह से अस्वीकार कर दी गई।  रेवंत ने क्‍या दिया तर्क? रेवंत ने क्‍या दिया तर्क? : टैक्‍सपेयर के 3.41 करोड़ रुपये के पूरे LTCG को टैक्‍स के लायक समझा गया. रेवंत ने तर्क दिया कि प्रॉपर्टी का रजिस्‍ट्रेशन उनकी बहन के नाम पर केवल लॉजिस्टिकल संबधी समस्‍याओं के कारण किया गया था, क्योंकि वह विदेश में रह रहे थे और रजिस्‍ट्रेशन के समय भारत आने में असमर्थ थे।  सभी दस्‍तावेज सब्मिट किए         इसके बाद उन्‍होंने यह साबित करने के लिए कई दस्‍तावेज दिए. इसमें बिल्डर द्वारा जारी आवंटन पत्र उनके नाम पर था. 65 लाख रुपये की बुकिंग एडवांस अमाउंट सीधे उनके बैंक खाते से जमा की गई थी. 4.31 करोड़ रुपये की कुल खरीद अमाउंट उनके पिता के साथ संयुक्त बैंक खाते के माध्यम से भुगतान की गई थी. उनकी बहन ने लिखित पुष्टि दी कि वह संपत्ति की वास्तविक मालिक नहीं हैं।  कोर्ट ने सुनाया खास फैसला कोर्ट ने सुनाया खास फैसला: इन सभी दस्‍तावेजों के पेश करने के बाद हैदराबाद के आयकर अपीलीय न्‍यायाधिकरण (ITAT) ने माना कि न्यायिक मिसालें आम तौर पर धारा 54एफ के तहत आती हैं, जब संपत्तियां पति या पत्नी या अविवाहित बच्चों के नाम पर खरीदी जाती हैं. इसके बाद रेवंत के हक में फैसला आया है और उनका 2.80 करोड़ टैक्‍सेबल इनकम शून्‍य हो गया।  धारा 54एफ क्या है? आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत व्यक्ति और अविभाजित परिवार (HUF) गैर-आवासीय संपत्तियों जैसे शेयर या सोना की बिक्री से मिले लॉन्‍गटर्म कैपिटल गेन पर छूट का दावा कर सकते हैं, बशर्ते बिक्री से मिला नेट अमाउंट को भारत में किसी एक आवासीय संपत्ति में फिर से निवेश किया जाए. निवेश तय समय सीमा के भीतर किया जाना चाहिए. खरीद बिक्री से एक साल पहले या दो वर्ष बाद, या निर्माण तीन वर्ष के भीतर होना चाहिए. छूट की अधिकतम सीमा ₹10 करोड़ है। 

मैक्सिको की खाड़ी को मिडिल ईस्ट जैसा बनाना है, LPG और पेट्रोल को दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाने की योजना

वॉशिंगटन   ईरान और अमेरिका जंग के बीच ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ ब्लॉक हुआ पड़ा है. ईरान ने दोस्त देशों को यहां से निकलने की इजाजत तो देदी है लेकिन तेल की सप्लाई पहले की तरह नहीं चल रही है. इस बीच अमेरिका के ‘मैक्सिको की खाड़ी’ (US Gulf) को लेकर एक बड़ा दांव खेला जा रहा है. बताया जा रहा है कि इसे दूसरा मिडिल ईस्ट बनाने की तैयारी की जा रही है, जहां से भर-भर कर LPG, पेट्रोल दुनिया के कोने-कोने में पहुंचाया जाएगा. भारत के लिए ये सबसे आसान और सस्ता रास्ता होगा. दावा किया जा रहा है कि अमेरिका के इस गल्फ पर अभी से ही बड़े-बड़े बिजनेसमैन पैसों की बरसात करने लगे हैं।  तेल कंपनियों की लगी लाइन दुनिया की सबसे बड़ी एनर्जी कंपनियां अमेरिका के इस अल्ट्रा-डीपवाटर प्रोजेक्ट में बड़ी हिस्सेदारी खरीदने के लिए लाइन लगाकर खड़ी हैं. यूरोप की दिग्गज कंपनी TotalEnergies और Shell के साथ-साथ लंदन की BP और स्पेन की Repsol भी इस रेस में शामिल हैं।  ‘शेननडोह’ फील्ड के मौजूदा मालिक अपनी 51% हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं. इसके लिए आने वाले कुछ ही हफ्तों में बिड्स लगाई जा सकती हैं. सूत्रों का कहना है कि मिडिल ईस्ट और एशिया के बड़े तेल उत्पादक भी इस रेस में शामिल हो सकते हैं, जिससे भारत के लिए भविष्य में तेल और LPG की सप्लाई का एक नया रास्ता खुल सकता है।  यहां से निकलेगा कितना तेल? ये कोई मामूली ऑयल फील्ड नहीं है. ये समंदर की उस गहराई में है जहां जाना किसी चुनौती से कम नहीं. यहां तेल और गैस के भंडार करीब 30,000 फीट नीचे हैं।  यहां का प्रेशर 20,000 पाउंड प्रति वर्ग इंच तक पहुंच जाता है. इसके बावजूद, यहां से जुलाई में उत्पादन शुरू हो चुका है और रोजाना 1,00,000 बैरल तेल निकाला जा रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह इलाका युद्ध क्षेत्र से कोसों दूर है. यहां से तेल की सप्लाई के लिए होर्मुज जैसे खतरनाक रास्तों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।  भारत के लिए क्यों है ये गेम चेंजर मिडिल ईस्ट के संकट ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. होर्मुज में जारी समुद्री ब्लॉकेड के बीच अमेरिका का यह इलाका दुनिया के लिए तेल का नया केंद्र बन रहा है।  जब मिडिल ईस्ट में तनाव से कीमतें बढ़ती हैं, तब अमेरिका से होने वाला अधिक उत्पादन मार्केट को संतुलित रखने में मदद करेगा. भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और ऐसे में LPG से लेकर पेट्रोल तक भारी मात्रा में ईंधन चाहिए. अमेरिका जैसे स्थिर देश से सप्लाई मिलना भारत के लिए ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ की सबसे बड़ी गारंटी हो सकता है। 

केदारनाथ हेली सेवा की बुकिंग 10-12 अप्रैल से शुरू, IRCTC के जरिए होगी पूरी प्रक्रिया

देहरादून  उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) ने घोषणा की है कि केदारनाथ धाम के लिए हेली सेवा की बुकिंग 10 से 12 अप्रैल के बीच शुरू कर दी जाएगी। यूकाडा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डॉ. आशीष चौहान ने बताया कि इस बार यात्रा को सुरक्षित, पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए कई बड़े बदलाव किए गए हैं। टिकटों की कालाबाजारी और धोखाधड़ी को रोकने के लिए यूकाडा ने इस बार 100% ऑनलाइन टिकटिंग का निर्णय लिया है।शुरुआत में 20-20 दिनों के स्लॉट के लिए टिकट खोले जाएंगे। मौसम और यात्रियों के दबाव का आकलन करने के बाद ही अगले चरणों की बुकिंग शुरू की जाएगी। इस बार कुल आठ रूटों पर हेली सेवाओं का संचालन होगा, जिसके लिए अलग-अलग ऑपरेटरों का चयन किया जा चुका है। इनमें चिप्सन एविएशन, राजस एयरो स्पोर्ट्स, थम्बी एविएशन, पिलग्रिमेज एविएशन, यूनाइटेड हेली चार्टर्स, हिमालयन हेली सर्विसेज, ट्रांसभारत एविएशन और एरो एयरक्राफ्ट शामिल है। चरणबद्ध तरीके से होगी बुकिंग यात्रियों की भारी भीड़ और हिमालयी क्षेत्र के अनिश्चित मौसम को देखते हुए बुकिंग को स्लॉट में बांटा गया है। शुरूआत में 20-20 दिनों के स्लॉट के लिए टिकट खोले जाएंगे। मौसम और यात्रियों के दबाव का आकलन करने के बाद ही अगले चरणों की बुकिंग शुरू की जाएगी। 8 रूट और 8 ऑपरेटर, 3 कंपनियां पहली बार देंगी सेवा इस बार कुल आठ रूटों पर हेली सेवाओं का संचालन होगा, जिसके लिए अलग-अलग ऑपरेटरों का चयन किया जा चुका है। इनमें चिप्सन एविएशन, राजस एयरो स्पोर्ट्स, थम्बी एविएशन, पिलग्रिमेज एविएशन, यूनाइटेड हेली चार्टर्स, हिमालयन हेली सर्विसेज, ट्रांसभारत एविएशन और एरो एयरक्राफ्ट शामिल है। खास बात यह है कि इनमें से तीन कंपनियां पहली बार चारधाम रूट पर अपनी सेवाएं देने जा रही हैं। पिछली यात्राओं में यात्रियों को रिफंड मिलने में हुई देरी पर यूकाडा ने सख्त रुख अपनाया है।  डॉ. आशीष चौहान ने स्पष्ट किया कि क्लेम व्यवस्था में रिफंड की प्रक्रिया को पहले से अधिक आसान और तेज बनाया गया है। साथ ही जिन ऑपरेटरों के खिलाफ रिफंड या सेवा में लापरवाही की शिकायत मिलेगी, उन्हें तुरंत नोटिस जारी कर दंडित किया जाएगा।     क्लेम व्यवस्था: रिफंड की प्रक्रिया को पहले से अधिक आसान और तेज बनाया गया है।     कार्रवाई: जिन ऑपरेटरों के खिलाफ रिफंड या सेवा में लापरवाही की शिकायत मिलेगी, उन्हें तुरंत नोटिस जारी कर दंडित किया जाएगा।     एडवाइजरी: यात्रियों के अधिकारों और नियमों की जानकारी के लिए जल्द ही एक विस्तृत एडवाइजरी जारी की जाएगी।