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एमपी में इस तारीख को ‘प्री-मानसून’ की एंट्री, अगले 72 घंटे आंधी और बारिश का अलर्ट

ग्वालियर बीते एक सप्ताह से झुलसा रही गर्मी के बीच मौसम ने राहत की ठंडी सांस दी। हल्के बादलों और धूल भरी हवा के असर से सूरज की तपिश फीकी पड़ गई और अधिकतम तापमान 39.4 डिग्री सेल्सियस पर आ गया, जो सामान्य से 1.9 डिग्री कम रहा। लंबे समय बाद पारा 40 डिग्री से नीचे आने से दिन में गर्मी का असर कमजोर पड़ा और लोगों ने राहत महसूस की। सुबह से आसमान में बादलों की आवाजाही और बदली हवा ने मौसम का मिजाज बदल दिया। राजस्थान से आने वाली गर्म हवाओं पर ब्रेक लगने से लू जैसे हालात नहीं बने। भीषण गर्मी से मिलेगी राहत पश्चिमी हवा का रुख उत्तर की ओर मुडऩे और अरब सागर से नमी आने से शहर के मौसम में नरमी घुल गई। न्यूनतम तापमान 25.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग के अनुसार जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ और उत्तर भारत में बने चक्रवातीय घेरे के असर से अगले तीन दिन आंधी और तेज बारिश की संभावना बनी हुई है।  यदि यह सिस्टम सक्रिय रहा तो मई की शुरुआत राहतभरी हो सकती है। दोपहर में तापमान 38.4 डिग्री तक पहुंचा, लेकिन तपिश चुभन नहीं बन सकी। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि नमी और बादलों की मौजूदगी से फिलहाल भीषण गर्मी से कुछ राहत बनी रह सकती है। रीवा में हुई तेज बारिश प्रदेश में रीवा शहर के मौसम में बड़ा बदलाव आया है। सुबह से ठंड हवाओं के साथ हल्की बारिश शुरू हो गई। भीषण गर्मी के बीच ठंडक ने दी बड़ी राहत। इसी सप्ताह रीवा में तापमान 44.5 डिग्री तक पहुंच गया था लेकिन बारिश और ठंड हवाओं के कारण इसमें तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। आगे भी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। सीधी में भी हुई बारिश सीधी में भी भीषण गर्मी के बीच अचानक मौसम का मिजाज बदल गया। कुछ ही मिनटों में आए अंधड़ ने मौसम बदल दिया। जिसके बाद साथ झमाझम बारिश शुरु हो गई। लगातार चल रही रिमझिम बारिश होने के कारण लोगों को ठंड से राहत मिल गई। कब आएगा प्री मानसून जानकारी के लिए बता दें कि मौसम विभाग ने संकेत दिए हैं कि 16 जून के आसपास प्रदेश में प्री-मानसून सक्रिय हो जाएगा, जिसके बाद कई जिलों में झमाझम बारिश की संभावना है। पिछले कुछ हफ्तों से गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है, लेकिन अब एमपी के कई जिलों में मौसम में बड़ा बदलाव आने जा रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर और सागर संभाग में प्री-मानसून की बौछारें सबसे पहले पहुंचेंगी। इन इलाकों में तेज हवाओं के साथ गरज-चमक और बारिश के आसार हैं। धीरे-धीरे यह असर पूरे प्रदेश में दिखाई देगा।  

पाकिस्तान की हालत हुई दयनीय, सऊदी मदद भी नाकाम, ईरान युद्ध ने किया बर्बाद

करांची  अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से पाकिस्तान पर बड़ा असर दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कैबिनेट बैठक में खुद ये बात कही है और चेतावनी दी है कि महंगे होते तेल और क्षेत्रीय अस्थिरता ने देश की आर्थिक हालत पतली कर दी है. कैबिनेट बैठक में उन्होंने बताया कि युद्ध से पहले पाकिस्तान का साप्ताहिक तेल बिल करीब 300 मिलियन डॉलर था, जो अब बढ़कर 800 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. ऐसे में हालात पर नजर रखने के लिए सरकार ने एक टास्क फोर्स भी बनाई है. आपको बता दें कि पाकिस्तान इस वक्त महंगाई का सबसे ऊंचा स्तर देख रहा है और तेल-गैस के लिए यहां त्राहिमाम मचा हुआ है।  शहबाज शरीफ ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक प्रगति को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.पाकिस्तान महंगाई की मार तो झेल ही रहा है, लेकिन शांति बनाने में भी वो सक्रिय है. शहबाज शरीफ ने बताया कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराई गई, जो 21 घंटे तक चली. इसके बाद दूसरे दौर की वार्ता हो ही नहीं पाई. फिलहाल संघर्ष विराम बना हुआ है और पाकिस्तान किसी भी तरह से वार्ता को फिर से शुरू करना चाहता है।  तेल के बढ़ते दाम ने रुलाया प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि इस समय कच्चे तेल की कीमतें फिर आसमान छू रही हैं, इसलिए नए दाम तय करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सामूहिक प्रयासों से हालात पर काबू पाने की कोशिश जारी है. इस बीच उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री के काम की सराहना करते हुए कहा कि उनकी ओर से उठाए गए कदमों के कारण पाकिस्तान में स्थिति अन्य देशों की तुलना में संतोषजनक है और कहीं भी लंबी कतारें नहीं हैं. हालांकि युद्ध से पहले और बाद की तुलना में 500 मिलियन डॉलर का उछाल आया है, जो अर्थव्यवस्था को की रीढ़ तोड़ रहा है. सरकार मितव्ययिता और बचत के जरिए हालात संभालने की कोशिश कर रही है, इसके लिए एक टास्क फोर्स भी बनाई गई है. सरकारी उपायों के चलते ईंधन की खपत में काफी कमी आई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी, लेकिन युद्ध के कारण प्रगति को नुकसान पहुंचा है।  ईरान-अमेरिका युद्ध में पाकिस्तान कर रहा मध्यस्थता     पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और तेल संकट के बीच इस पहल को काफी अहम माना जा रहा है, हालांकि ये कुछ खास परिणाम नहीं दे पाई है।      पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू कराने की कोशिश की है. जानकारी के मुताबिक दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिसमें युद्धविराम और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की गई. फिलहाल एक अस्थायी संघर्ष विराम बना हुआ है, जिसे बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।      पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था से परेशान है और शांति चाहता है और दोनों देशों के बीच संवाद को आगे बढ़ाने के लिए खूब उठापटक कर रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि ईरान के विदेश मंत्री के साथ संपर्क में रहकर आगे की रणनीति पर काम किया जा रहा है।   

UAE का OPEC से अलगााव, पश्चिमी एशिया की जियोपॉलिटिक्स में आया बड़ा बदलाव

नई दिल्ली फारस की खाड़ी की चमकती सतह पर सब कुछ हमेशा शांत दिखता है- ऊपर से. लेकिन उसी पानी के नीचे कई परतों में तनाव, शक और रणनीतिक करंट बहते रहते हैं. संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बाहर से यह दुनिया का सबसे चमकदार बिजनेस हब लगता है, लेकिन इसके भीतर एक बड़ा फैसला पक रहा था- OPEC (तेल निर्यातक देशों का संगठन) से बाहर निकलने का।  पहली नजर में यह फैसला एक छोटे से विवाद जैसा लगता है कि, UAE पांच मिलियन बैरल रोज़ तेल बेचना चाहता था, जबकि उसे करीब साढ़े तीन मिलियन बैरल का कोटा दिया गया था. लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है, खत्म नहीं. यह डेढ़ मिलियन बैरल का झगड़ा नहीं, बल्कि दशकों पुरानी रीजनल लीडरशिप को चुनौती देने का एलान है. जिसमें बताया गया है कि यूएई महज कोई छोटा-सा खाड़ी देश नहीं, बल्कि ग्लोबल पावर सेंटर है।  UAE का फैसला, अमेरिकी चाहत भी! अबू धाबी में जब OPEC से बाहर होने का फैसला लिया जा रहा था, तब इसकी गूंज सिर्फ खाड़ी तक सीमित नहीं थी. वॉशिंगटन भी इसे ध्यान से देख रहा था. अमेरिका लंबे समय से OPEC को एक “कार्टेल” मानता रहा है. एक ऐसा समूह जो तेल की कीमतों को अपने हिसाब से नियंत्रित करता है और कई बार रूस जैसे देशों के साथ मिलकर ग्लोबल ऑयल मार्केट को प्रभावित करता है।  ऐसे में UAE का OPEC से बाहर निकलना अमेरिका के लिए एक रणनीतिक मौका है. इससे OPEC की सामूहिक ताकत कमजोर होगी, अरब-रूस की तेल साझेदारी में दरार आएगी और तेल को “पॉलिटिकल वेपन” की तरह इस्तेमाल करने की क्षमता घटेगी. इसलिए भले ही यह फैसला UAE का हो, लेकिन इसकी गूंज अमेरिकी विदेश नीति की जीत के तौर पर भी सुनाई देती है।  विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस बड़े कदम के पीछे अमेरिका के साथ हुआ एक खास समझौता भी है, जिसे 'डॉलर-दिरहम स्वैप एग्रीमेंट' कहा जा रहा है. आसान शब्दों में कहें तो इस समझौते के तहत अमेरिका ने यूएई को जरूरत पड़ने पर सीधे और तुरंत अमेरिकी डॉलर मुहैया कराने की गारंटी दी है. जब ईरान के साथ युद्ध जैसे हालात बने, तो यूएई की मुद्रा 'दिरहम' पर खतरा मंडराने लगा था. ऐसे में अमेरिका के साथ हुए इस स्वैप डील ने यूएई की तिजोरी को एक सुरक्षा कवच दे दिया. अभी तक यूएई ओपेक के कड़े नियमों से बंधा था, जिसकी वजह से वह अपनी मर्जी से तेल उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहा था. अमेरिका से मिली 'डॉलर की गारंटी' ने यूएई को यह भरोसा दिलाया कि अगर वह ओपेक से अलग होता है और तेल बाजार में कोई उतार-चढ़ाव आता है, तो भी उसकी अर्थव्यवस्था नहीं डगमगाएगी. यदि यूएई की करेंसी डॉलर के समकक्ष रहती है, तो इससे वहां बिजनेस करने वालों को भी भरोसा रहेगा. इसी भरोसे के दम पर यूएई ने ओपेक की बंदिशों को अलविदा कह दिया और अपनी स्वतंत्र आर्थिक राह चुन ली।  ’UAE एप’ का हैंग होना UAE को अगर आप सिर्फ एक देश समझते हैं, तो आप उसकी असली ताकत को मिस कर रहे हैं. यह एक “एप” है- एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जहां दुनिया के कारोबार बिना ज्यादा सवालों के चलते हैं।  ईरान पर प्रतिबंध लगे, तो उसका व्यापार यहीं से घूमकर दुनिया तक पहुंचा. भारत और पाकिस्तान के बीच कई बिजनेस डील्स UAE के रास्ते पूरी होती रहीं. यहां तक कि प्रतिबंधित रूसी तेल भी “शैडो टैंकर” के जरिए यहीं से बाजार तक पहुंचा।  दुबई और अबू धाबी ने खुद को न्यूट्रल, स्थिर और सुरक्षित हब के रूप में स्थापित किया था. यही वजह थी कि यूरोप और अमेरिका की बड़ी कंपनियां यहां से ऑपरेट करती थीं. रियल एस्टेट बूम पर था, टूरिज्म चरम पर था और UAE एक “परफेक्ट बिजनेस मशीन” बन चुका था।  लेकिन फिर ईरान के साथ संघर्ष ने इस मशीन में झटका दे दिया. हमलों ने सिर्फ तेल ठिकानों को नहीं, बल्कि उस भरोसे को भी चोट पहुंचाई जिस पर UAE की पूरी ब्रांडिंग टिकी थी. अचानक कॉर्पोरेट्स ने अपने विकल्प तलाशने शुरू कर दिए-सिंगापुर, हांगकांग और कुछ मामलों में यूरोप वापसी।  जो UAE खुद को न्यूट्रल बताता था, वह अब अमेरिकी-इजरायली खेमे में दिखने लगा. और यहीं से उसकी सबसे बड़ी चुनौती शुरू हुई-“क्या वह अब भी उतना ही सुरक्षित और स्थिर है?” सऊदी विजन 2030 का पिछड़ना इस कहानी में एक और किरदार है- सऊदी अरब. कभी UAE का सबसे करीबी सहयोगी, अब उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी।  सऊदी अरब का पूरा दांव उसके महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ पर लगा है. इस प्रोजेक्ट को फंड करने के लिए उसे तेल की ऊंची कीमतें चाहिए. इसलिए वह उत्पादन कम रखकर कीमतें ऊपर बनाए रखने की रणनीति पर चलता है।  दूसरी ओर UAE का मॉडल अलग है. उसने अपनी इकोनॉमी को डायवर्सिफाई किया हुआ है. प्रोडक्शन कॉस्ट यहां बेहद कम है, और उसने 2030 तक 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन उत्पादन क्षमता हासिल करने के लिए 122 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश किया है. लेकिन OPEC के कोटे उसे 2.6 से 3.1 मिलियन बैरल के बीच सीमित रखते रहे।  अबू धाबी के लिए यह “अंडरग्राउंड पड़ा तेल” एक जोखिम है-क्योंकि 2040 तक फॉसिल फ्यूल की डिमांड घटने की आशंका है. यानी अगर अभी नहीं बेचा, तो बाद में शायद बेचना ही संभव न हो. यही सोच सऊदी और UAE के बीच की दूरी को टकराव में बदल देती है।  यमन, सोमालीलैंड में बिल्डअप तेल का विवाद तो सिर्फ एक हिस्सा है. असली दरार कई मोर्चों पर एक साथ बनी. यमन में UAE ने सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल का समर्थन किया-एक अलगाववादी गुट, जो सऊदी के सहयोगियों के खिलाफ खड़ा था. हालात इतने बिगड़े कि सऊदी अरब ने UAE समर्थित ठिकानों और सैन्य संसाधनों पर एयरस्ट्राइक तक कर दी, खासकर मुकल्ला पोर्ट के आसपास।  उधर सोमालीलैंड को लेकर भी तनाव बढ़ा. जब इजरायल ने उसे मान्यता दी, तो सऊदी को यह कदम अस्थिरता फैलाने वाला लगा-और उसे UAE की भूमिका पर भी शक हुआ।  इसके बाद दोनों देशों के बीच दो महीने तक सोशल मीडिया, कूटनीतिक चैनलों और वॉशिंगटन में लॉबिंग के जरिए आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला।  ईरान वॉर में सऊदी ‘मांडवाली’ फिर … Read more

गुजारा-भत्ता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘पुरुष पल्ला नहीं झाड़ सकता’

ग्वालियर  शादी के बाद पत्नी का भरण-पोषण करना पति का न केवल नैतिक, बल्कि अनिवार्य कानूनी दायित्व है। हाईकोर्ट ने एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति स्वस्थ और काम करने में सक्षम है, तो वह यह कहकर गुजारा भत्ता देने से नहीं बच सकता कि उसकी आय कम है या वह बेरोजगार है। जस्टिस अमित सेठ की एकल पीठ ने पति और पत्नी दोनों की ओर से दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को यथावत रखा है। मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर दरअसल शबीना व शाहिद (दोनों के परिवर्तित नाम) का निकाह नवंबर 2019 में मुस्लिम रीति-रिवाजों से हुआ था। पत्नी का आरोप था कि निकाह के बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण उसे मायके में शरण लेनी पड़ी। पत्नी ने फैमिली कोर्ट में आवेदन देकर बताया कि उसका पति मैकेनिक है और 30 हजार रुपए महीना कमाता है, इसलिए उसे भरण पोषण दिलाया जाए।  दूसरी ओर पति ने कोर्ट में दलील दी कि वह मैकेनिक नहीं बल्कि एक गैराज में महज हेल्पर है और उसकी मासिक आय केवल 5,000 रुपए है। उसने दलील दी कि इतनी कम आय में वह 4,000 रुपए गुजारा भत्ता नहीं दे सकता। वहीं पत्नी ने गुजारा भत्ता की राशि बढ़ाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दिक्कतें अपनी जगह, हक अपनी जगह     कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125 सीआरपीसी का उद्देश्य महिला को दर-दर भटकने से बचाना और उसे गरिमापूर्ण जीवन देना है। यदि पति शारीरिक रूप से स्वस्थ है, तो उसे एक 'अकुशल श्रमिक' के बराबर कमाकर पत्नी को पैसा देना ही होगा।     पति ने अपनी सही आय के पुख्ता सबूत नहीं दिए, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा कलेक्टर रेट (न्यूनतम मजदूरी) के आधार पर 4,000 रुपए का अंतरिम गुजारा भत्ता तय करना पूरी तरह उचित है। क्या होता है गुजारा भत्ता जानकारी के लिए बता दें कि गुजारा भत्ता (Alimony/Maintenance) तलाक या अलग होने के बाद एक पति/पत्नी द्वारा दूसरे को दी जाने वाली कानूनी और वित्तीय सहायता है। इस सहायता का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर साथी को विवाह के दौरान की जीवनशैली बनाए रखने में मदद करना है। यह राशि अदालत द्वारा या आपसी सहमति से तय की जा सकती है। ये भी जानें -मुख्य उद्देश्य तलाक के बाद आर्थिक असमानता को दूर करना।-यह स्थायी (जीवनभर) या अस्थायी (पुनर्वास के लिए) हो सकता है। -यह आमतौर पर पति की आय का 25-33% हो सकता है, जो पति-पत्नी की संपत्ति, उम्र और वैवाहिक अवधि पर निर्भर करता है। -यह आमतौर पर प्राप्तकर्ता के पुनर्विवाह करने या मौत होने तक जारी रहता है।

UPI पेमेंट में पिन डालने की परेशानी खत्म, अब ऐसे करें पेमेंट—पूरी जानकारी जानें

  नई दिल्‍ली  भारत के यूपीआई इकोसिस्‍टम में आए दिन बदलाव होता रहा है, जिस कारण यूपीआई का दायरा बढ़ता जा रहा है. अब एक और बड़ा बदलाव देखने को मिला है. ICICI बैंक, फोनपे और क्रेड जैसे फिनटेक प्लेटफॉर्म ऐसे फीचर्स पेश कर रहे हैं, जिसके तहत यूजर्स बिना यूपीआई पिन डाले UPI पेमेंट कर सकते हैं।  नए फीचर्स यूजर्स को यूपीआई पिन की जगह फिंगरप्रिंट या फेस की पहचान का उपयोग करके पेमेंट करने की मंजूरी देते हैं. इस बदलाव का उद्देश्य डिजिटल लेनदेन को तेज, अधिक आसान और सुरक्षित बनाना है. खासकर डेली पेमेंट के लिए।  क्‍या है ये नया फीचर?  बायोमेट्रिक UPI अथेंटिफिकेशन से छोटे लेन-देन के लिए यूपीआई पिन दर्ज करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है. इसके बजाय, यूजर्स फिंगरप्रिंट स्कैन या चेहरे की पहचान जैसी चीजों का उपयोग करके पेमेंट कर सकते हैं. हालांकि, नियामक मानदंडों के अनुसार, यह सुविधा ₹5,000 तक के लेनदेन के लिए सीमित है. इससे अधिक राशि के लिए, पिन-दर्ज करना अनिवार्य होगा।  ICICI बैंक ने किया रोलआउट ICICI बैंक ने अपने iMobile ऐप पर यह फीचर शुरू कर दिया है, जिससे कस्‍टमर्स बायोमेट्रिक्स का इस्तेमाल करके पर्सनल लेन-देन, QR कोड बेस्‍ड पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी कर सकते हैं. यह फ़ीचर ऐप के अपडेटेड वर्ज़न (Android वर्ज़न 30+ और iOS 28.2+) पर उपलब्ध है और यह नए डेटा को इकट्ठा करने के बजाय यूज़र के डिवाइस पर पहले से सेफ स्टोर किए गए बायोमेट्रिक डेटा पर निर्भर करता है. ये फीचर ऐसा है, जिसके तहत आप जब चाहे बायोमेट्रिक अथेंटिफिकेशन को चालू या बंद कर सकते हैं. जरूरत पड़ी तो पिन अथेंटिफिकेशन फिर से शुरू कर सकते हैं।  PhonePe और CRED PhonePe ने UPI पेमेंट के लिए बायोमेट्रिक अथेंटिफिकेशन भी शुरू किया है, जिससे एक टच में पेमेंट का अनुभव मिलता है. यह सुविधा पिन भूल जाने और गलत इनपुट जैसी आम समस्याओं में काम आती है. स्मार्टफोन की अंतर्निहित सुरक्षा का लाभ उठाते हुए, यह भीड़भाड़ वाले स्थानों में पिन लीक होने जैसे रिस्‍क को कम करता है।  महत्वपूर्ण बात यह है कि PhonePe यूजर्स को बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन फेल होने की स्थिति में पिन अथेंटिफिकेशन का विकल्प देता है. यह सुविधा व्यापारी भुगतान, क्यूआर स्कैन और यहां तक ​​कि बैलेंस चेक समेत कई उपयोगों में काम करती है. CRED ने NPCI के साथ साझेदारी में इसी तरह की बायोमेट्रिक UPI सुविधा शुरू की है, जो निर्बाध और सुरक्षित भुगतान की दिशा में व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तार का संकेत देती है। 

सोनम रघुवंशी को जमानत दिलाने वाली पुलिस की गलती, कोर्ट में सवाल उठे

इंदौर   राजा रघुवंशी हत्याकांड (Raja Raghuvanshi Murder Case) को एक साल पूरे होने वाले है लेकिन इस हाईप्रोफाइल केस में अभी भी कई ट्विस्ट सामने आ रहे है। इस हत्याकांड की मुख्य आरोपी और मृतक राजा रघुवंशी की पत्नी सोनम रघुवंशी को कोर्ट ने शर्तों के आधार और 50 हजार के मुचलके पर जमानत दे दी है। सोनम रघुवंशी के पिता देवी सिंह ने उसकी जमानत कराई। सोनम की जमानत की खबर सामने आने के बाद से सोशल मीडिया पर लोग एक ही सवाल गूंज रहा है- 'आखिर सोनम को जमानत कैसे मिली? बताया जा रहा है कि सोनम रघुवंशी को जमानत शिलॉन्ग पुलिस की एक गलती के कारण मिली है। बता दें कि, इससे पहले सोनम की 3 बार जमानत रद्द हो चुकी है। पुलिस की एक गलती और सोनम को मिली जमानत मिली जानकारी के अनुसार, राजा रघुवंशी हत्याकांड की मुख्य आरोपी सोनम शिलॉन्ग पुलिस की कमजोर विवेचना के चलते इतने कम समय में जेल से बाहर आने में सफल हुई है। पूर्वी खासी हिल्स जिला न्यायालय ने शिलॉन्ग पुलिस की विवेचना पर सवाल उठाए हैं। पुलिस ने चालान में धाराएं अलग-अलग लिखी थीं। बताया जा रहा कि यह पुलिस की टाइपिंग मिस्टेक थी। इसके अलावा गिरफ्तारी की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ और ट्रायल में भी देरी की गई। शिलांग के सत्र न्यायालय ने जमानत देते हुए अपनी टिप्पणी में कहा- पुलिस ने गिरफ्तारी का कारण बताने वाला फार्म सही तरीके से नहीं भरा था। कई जगह अलग-अलग धाराएं लिखी गई थीं। ट्रायल में भी पुलिस ने देरी की है। पुलिस ने और कहा कि गलती? जिला कोर्ट ने ये भी पाया कि ,गिरफ्तारी के कारण स्पष्ट नहीं बताए गए हैं। कोर्ट ने पाया कि, आरोपी को गिरफ्तारी के समय जिन धाराओं और तथ्यों के आधार पर पकड़ा गया, उनकी सही और स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। दस्तावेज़ों में भी ये साफ नहीं था कि, किन धाराओं के तहत गिरफ्तारी की गई है, जिससे आरोपी को अपने बचाव का पूरा मौका नहीं मिल गया। बता दें कि, गिरफ्तारी के कारण न बताना संविधान के अनुच्छेद 22 (1) का उल्लंघन माना गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, ये आरोपी का मौलिक अधिकार है कि उसे तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताया जाए। कोर्ट ने पकड़ी एक और बड़ी गलती इसके अलावा जिला कोर्ट ने एक और बड़ी गलती पकड़ी। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी मौजूद नहीं है जिससे ये पता चल सके की जिस समय सोनम को गाजीपुर कोर्ट ने पेश किया गया तब उसकी तरफ से कोई वकील मौजूद था। कोर्ट ने कहा कि उस समय अगर वकील मौजूद होता तो ये आपत्ति पहले ही उठाई जा सकती थी। इन शर्तों के आधार पर मिली जमानत     सोनम किसी सबूत के साथ छेडख़ानी नहीं करेगी।     हर तारीख पर कोर्ट में उपलब्ध होगी।     कोर्ट के क्षेत्राधिकार (शिलांग से बाहर) से बिना कोर्ट की इजाजत नहीं जा सकेगी।     50 हजार रुपए के बांड कोर्ट में जमा करेगी। क्या है मामला इंदौर के सहकार नगर, कैट रोड निवासी राजा रघुवंशी की 23 मई 2025 को शिलांग के टूरिस्ट प्लेस में हत्या हुई थी। ऑपरेशन हनीमून के तहत स्थानीय पुलिस ने आरोपी सोनम रघुवंशी, उसके कथित प्रेमी राज कुशवाह, उसके साथी विशाल चौहान, आकाश राजपूत, आनंद कुर्मी सभी निवासी नंदबाग को गिरफ्तार किया था। केस में कई माह से आरोपी जेल में हैं। 

जल गंगा संवर्धन अभियान: जनसहभागिता से गोचा नदी के स्टॉप डैम की तस्वीर हुई बदल

सफलता की कहानी जल गंगा संवर्धन अभियान: जनसहभागिता से बदली गोचा नदी स्टॉप डैम की तस्वीर भोपाल मध्यप्रदेश में संचालित ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ जल संरक्षण की दिशा में एक प्रभावी जनआंदोलन के रूप में उभर रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में 19 मार्च से 30 जून 2026 तक चल रहे इस अभियान ने प्रदेशभर में जल संरचनाओं के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन को नई गति दी है। इसी अभियान के अंतर्गत गुना जिले के जनपद पंचायत राघौगढ़ की ग्राम पंचायत मोररवास में जनसहभागिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण सामने आया है, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि सामूहिक प्रयासों से जल संकट जैसी चुनौती का समाधान संभव है। सूखे स्टॉप डैम में लौटी जीवन की धारा गोचा नदी पर स्थित स्टॉप डैम में पूर्व में पानी का ठहराव नहीं हो पाता था और वर्षा जल बहकर अन्य स्थानों पर चला जाता था। परिणामस्वरूप ग्रामीणों एवं पशुधन को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा था। स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से 50 हजार रुपये की जनसहयोग राशि से बोरी बंधान का कार्य 6 से 11 अप्रैल के बीच पूर्ण किया गया। इस छोटे लेकिन प्रभावी प्रयास से अब स्टॉप डैम में जल ठहराव बढ़ा है और जल संग्रहण की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। श्रमदान से बना जनआंदोलन इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता ग्रामवासियों की सक्रिय भागीदारी रही। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक श्रमदान कर जल संरक्षण का संदेश दिया और जल की प्रत्येक बूंद को सहेजने का संकल्प लिया। जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में यह कार्य सामूहिक रूप से पूर्ण किया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में सकारात्मक संदेश प्रसारित हुआ। मवेशियों एवं वन्य जीवों को मिला सहारा बोरी बंधान से जल उपलब्धता में वृद्धि हुई है, जिससे अब मवेशियों एवं वन्य जीवों के लिए भी पानी की नियमित व्यवस्था सुनिश्चित हो सकी है। जो स्थान पहले सूखा रहता था, वह अब जीवनदायी जल स्रोत के रूप में विकसित हो रहा है। प्रेरणादायक मॉडल गोचा नदी स्टॉप डैम का यह परिवर्तन ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के अंतर्गत जनसहभागिता आधारित कार्यों की प्रभावशीलता को दर्शाता है। यह पहल प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में उभरी है और यह संदेश देती है कि सामूहिक प्रयास, जनसहयोग एवं सकारात्मक सोच से जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जा सकता है।  

मोहन सरकार में मंत्रिमंडल में बदलाव, इन नामों को मिल सकता है मौका!

इंदौर   मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निवास पर दो दिन पहले हुई एक महत्वपूर्ण बैठक को लेकर कवायद शुरू हो गई है जिसे मंत्रिमंडल के विस्तार से भी जोड़ा जा रहा है। माना जा रहा है कि सरकार में मंत्रियों का कोरम पूरा हो जाएगा। इसमें बड़ा फेरबदल होने की भी संभावनाएं जताई जा रही है जिसमें नई मंत्री बनाए जाने के साथ कुछ की छुट्टी भी तय मानी जा रही है। मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार को ढाई साल होने जा रहे हैं। इस बीच मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया है। वर्तमान में 31 मंत्री हैं, जबकि 35 बनाए जा सकते हैं। चार पदों को भरा जाएगा जिसके साथ कुछ मंत्रियो को मुक्त करके नए बनाए जाने की भी बात सामने आ रही है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की भी मंजूरी इस बात को मजबूत यूं भी माना जा रहा है कि दो दिन पहले डॉ. मोहन यादव के निवास पर एक समन्वय समिति की बैठक हुई थी जिसमें संघ के कई बड़े दिग्गज नेता मौजूद थे और माना जाता है कि कोई भी बड़े फैसले से पहले समिति में बात रखी जाती है। इस बात से मुख्यमंत्री डॉ. यादव के पिछले दिनों दिल्ली के लगातार दौरे को भी जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की भी मंजूरी मानी जा रही है।  रिपोर्ट के मुताबिक ये भी कहानी सामने आ रही है कि मंत्रिमंडल विस्तार में इंदौर का नाम भी है जिसमें मालिनी गौड़ प्रमुखता से है तो दूसरे पायदान पर मनोज पटेल है। हालांकि विधायक उषा ठाकुर भी खासा प्रयास कर रही हैं जिसके लिए उन्होंने भोपाल-दिल्ली एक कर रखा है। उनके अलावा संभाग से अर्चना चिटनीस का नाम भी है। वहीं भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, बृजेंद्र सिंह यादव और रीति पाठक के नाम भी मंत्री बनने वाले विधायकों की फेहरिस्त में हैं। ये नाम तो मंत्री बनने के दावेदारों के है, लेकिन कुछ नाम ऐसे दिग्गजों के भी हैं जिनके इस्तीफे भी हो सकते हैं। संतुलन बनाने का होगा प्रयास मंत्रिमंडल विस्तार में जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन बनाने का भी प्रयास किया जाएगा। हालांकि निगम मंडल और प्राधिकरणों में जो नियुक्ति हो रही है जिसमें मोहन सरकार व भाजपा का संगठन इस बात का बारीकी से ध्यान रख रहा है। भविष्य में होने वाले चुनाव को लेकर भी अभी से बिसात जमाई जा रही है ताकि सभी वर्गों की नाराजगी को दूर किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सरकार को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते

नईदिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने  हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कुछ बेहद अहम टिप्पणियां की हैं। SC ने कहा है कि कोर्ट सरकार को इस मामले में कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय ने इस दौरान देश भर में नफरती भाषण पर रोक लगाने के लिए कोई भी नई दिशा-निर्देश जारी करने से मना कर दिया। SC ने कहा कि अदालतें संसद या राज्य विधानसभाओं को नए कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं। वे ज्यादा से ज्यादा सुधार की जरूरत की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन कानून बनाने का फैसला सरकार का ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई चल रही थी। इनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच के लिए लागू मौजूदा कानून की जांच करने और इन्हें और ज्यादा असरदार बनाने का निर्देश देने की मांग वाली याचिकाएं भी थीं। याचिका खारिज करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा, "हालांकि अदालत कार्रवाई की जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है, लेकिन वह विधायिका को कानून बनाने का काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।” पीठ ने आगे इस बात पर जोर दिया कि कानून बनाना और उसे लागू करना पूरी तरह से लेजिस्लेचर के अधिकार क्षेत्र में आता है। बेंच ने कहा, “ज्यादा से ज्यादा, कोर्ट विधायिका का ध्यान बढ़ती हुई चिंता की ओर दिला सकती है और यह सिफारिश कर सकती है कि उचित उपायों पर विचार किया जाए। लेकिन सरकार इन टिप्पणियों पर कार्रवाई करती है या नहीं, और किस तरीके से करती है, यह पूरी तरह से उनके विवेक पर निर्भर करता है।” हेट स्पीच पर पहले से कानून कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि हेट स्पीच की समस्या से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है या मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कोई सिस्टम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली चिंता कानून का अभाव नहीं, बल्कि उसे लागू करने को लेकर है। पीठ ने कहा कि कई स्तरों पर कानन बनाए गए हैं। अगर पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती है, तो पीड़ित व्यक्ति वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर सकता है और उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास गुहार लगा सकता है। पीठ ने आगे कहा कि समस्या कानूनी प्रावधानों की कमी से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके लागू न होने से पैदा होती है।

तेन्दूपत्ता से बदली जिंदगी, बढ़ी आय और सम्मान बढ़ी आय और सम्मान

रायपुर तेन्दूपत्ता से बदली जिंदगी, बढ़ी आय और सम्मान तेन्दूपत्ता संग्रहण आदिवासी और वनवासी परिवारों के लिए आजीविका का एक अत्यंत सशक्त और महत्वपूर्ण आधार है। इसे जंगलों का हरा सोना भी कहा जाता है। यह कार्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है और विशेष रूप से भीषण गर्मी के महीनों में जब अन्य रोजगार के साधन कम होते हैं, तब यह आय का एक बड़ा जरिया बनता है। छत्तीसगढ़ में तेन्दूपत्ता संग्रहण आदिवासी और वनवासी परिवारों के लिए आजीविका का एक मजबूत आधार है। यहां उत्पादित तेन्दूपत्ता अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।  कटघोरा वनमण्डल में यह कार्य संगठित रूप से संचालित हो रहा है, जहां 7 परिक्षेत्रों में 44 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियां सक्रिय हैं। हर वर्ष मई के पहले सप्ताह से तेन्दूपत्ता संग्रहण शुरू होता है। इससे पहले फड़ों (संग्रहण केंद्रों) का चयन और शाखा कर्तन का कार्य किया जाता है, जिससे अच्छी गुणवत्ता के पत्ते प्राप्त हों। वर्ष 2026 में केवल शाखा कर्तन कार्य के लिए ही 47 लाख 54 हजार रूपए से अधिक का भुगतान किया गया, जिससे स्थानीय लोगों को अतिरिक्त रोजगार मिला।     वर्ष 2025 में कटघोरा वनमण्डल के 486 फड़ों में 78, हजार 300 मानक बोरा संग्रहण का लक्ष्य रखा गया था। इसमें से 71,737 मानक बोरा (94.02 प्रतिशत) तेन्दूपत्ता संग्रहण किया गया। इस कार्य में 66 हजार 331 संग्राहकों ने भाग लिया, जिन्हें 5 हजार 500 रूपए प्रति मानक बोरा की दर से कुल 39 करोड़ 45 लाख रूपए से अधिक पारिश्रमिक सीधे उनके बैंक खातों में ऑनलाइन (डीबीटी) के माध्यम से भुगतान किया गया। इससे भुगतान में पारदर्शिता और भरोसा दोनों बढ़े हैं। सरकार की पहल से तेन्दूपत्ता का संग्रहण दर भी बढ़ा है। वर्ष 2023 में 4 हजार  रूपए प्रति मानक बोरा मिलने वाली दर को वर्ष 2024 से बढ़ाकर 5 हजार 500 रूपए कर दिया गया, जो वर्ष 2026 में भी लागू है। इसके साथ ही तेन्दूपत्ता व्यापार से होने वाली आय का 80 प्रतिशत हिस्सा संग्राहकों को बोनस के रूप में दिया जाता है। वर्ष 2019 से 2022 के बीच करोड़ों रूपए का बोनस सीधे हजारों संग्राहकों के खातों में पहुंचाया गया, जिससे उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया। तेन्दूपत्ता संग्राहकों के कल्याण के लिए कई जनहितकारी योजनाएं  चरणपादुका योजना के तहत वर्ष 2025 में 63 हजार 636 महिला संग्राहकों को निःशुल्क जूते प्रदान किए गए। राजमोहिनी देवी सामाजिक सुरक्षा योजना में 84 संग्राहकों को 1.07 करोड़ रूपए से अधिक की सहायता दी गई। समूह बीमा योजना के तहत 90 हितग्राहियों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई और शिक्षा प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से सैकड़ों बच्चों को लाखों रूपए की छात्रवृत्ति दी गई, जिससे उनके भविष्य को नई दिशा मिली।  इन योजनाओं का प्रभाव यह है कि अब तेन्दूपत्ता संग्रहण केवल एक मौसमी काम नहीं रहा, बल्कि यह स्थायी आय और सामाजिक सुरक्षा का माध्यम बन गया है। संग्राहकों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है और जीवन स्तर में स्पष्ट सुधार दिखाई दे रहा है। यह सफलता दिखाती है कि जब शासकीय योजनाएं सही तरीके से लागू होती हैं, तो जंगल से जुड़ी आजीविका भी सम्मान, सुरक्षा और समृद्धि का मार्ग बन सकती है।