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प्रदर्शन के आधार पर होगा फैसला! Mohan Yadav कैबिनेट में नए चेहरों की एंट्री की चर्चा तेज

भोपाल  मध्य प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के नेतृत्व वाली सरकार 13 जून को अपने ढाई साल पूरे करने जा रही है, लेकिन उससे पहले सत्ता के गलियारों में कैबिनेट फेरबदल की चर्चाओं ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। खबर है कि बीजेपी आलाकमान ने सरकार और संगठन दोनों की परफॉर्मेंस का फीडबैक लेना शुरू कर दिया है। 17 और 18 मई को पार्टी के केंद्रीय समीक्षक भोपाल पहुंचेंगे, जहां मंत्रियों के कामकाज का विस्तृत रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो इस बार समीक्षा सिर्फ औपचारिक नहीं होगी, बल्कि मंत्रियों के विभागीय प्रदर्शन, जिलों में पकड़, संगठन के साथ तालमेल और जनता के बीच उनकी छवि तक का आकलन किया जाएगा। माना जा रहा है कि जिन मंत्रियों का प्रदर्शन कमजोर पाया जाएगा, उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस संभावित फेरबदल की जद में कुछ बड़े और वरिष्ठ चेहरे भी आ सकते हैं। आमने-सामने होगी जवाबदेही की परीक्षा पार्टी सूत्र बताते हैं कि मंत्रियों को व्यक्तिगत रूप से बैठाकर उनसे सवाल-जवाब किए जाएंगे। चर्चा का फोकस सिर्फ योजनाओं की फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों में कितने सक्रिय हैं, संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यवहार कैसा है और जनता के बीच सरकार की छवि मजबूत करने में उनकी भूमिका कितनी प्रभावी रही है। समीक्षक मंत्रियों द्वारा पेश किए गए दावों की जमीनी हकीकत भी जांचेंगे। यही रिपोर्ट आगे कैबिनेट में बने रहने या बाहर होने का आधार बन सकती है। मॉनसून सत्र से पहले हो सकता है बड़ा बदलाव राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जुलाई में प्रस्तावित मॉनसून सत्र से पहले कैबिनेट में बड़ा बदलाव संभव है। वर्तमान में मोहन कैबिनेट में चार पद खाली हैं। ऐसे में सिर्फ विस्तार ही नहीं, बल्कि कई मंत्रियों की छुट्टी और नए चेहरों की एंट्री का रास्ता भी साफ हो सकता है। बताया जा रहा है कि पार्टी 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अभी से नई रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे नेताओं को मौका देने की तैयारी है, जिन्हें संगठन और सरकार दोनों में संतुलन बनाने वाला माना जाता है। पुराने दिग्गजों की वापसी के संकेत कैबिनेट विस्तार को लेकर जिन नामों की चर्चा है, उनमें कुछ पूर्व मंत्री और लंबे समय से संगठन में सक्रिय चेहरे भी शामिल बताए जा रहे हैं। पिछले ढाई साल से कई नेता सत्ता और संगठन में बड़ी जिम्मेदारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब उन्हें मौका देकर पार्टी क्षेत्रीय और जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर सकती है। बीजेपी के भीतर यह भी माना जा रहा है कि अगर अभी बदलाव होता है, तो नए मंत्रियों को 2028 चुनाव से पहले करीब दो साल का पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे वे अपने क्षेत्रों में सरकार की पकड़ मजबूत कर सकें। सत्ता और संगठन दोनों की अग्निपरीक्षा मध्य प्रदेश बीजेपी के लिए आने वाले महीने बेहद अहम माने जा रहे हैं। एक तरफ संगठन सरकार के प्रदर्शन को कसौटी पर कस रहा है, तो दूसरी तरफ विपक्ष भी सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में मोहन कैबिनेट का संभावित फेरबदल सिर्फ मंत्रियों की अदला-बदली नहीं, बल्कि 2028 के चुनावी रण की शुरुआती बिसात माना जा रहा है।

धार की भोजशाला से लंदन तक पहुंची मां सरस्वती की मूर्ति, जानिए क्यों अलग है यह विवाद

धार सौ बात की एक बात ये कि भोजशाला पर कोर्ट के फ़ैसले की ख़बर तो पब्लिक ने सुन ली कि हाई कोर्ट ने उसको मां सरस्वती का मंदिर माना है, लेकिन ज़्यादातर लोग मां सरस्वती की उस मूर्ती का रहस्य नहीं जानते जो माना जाता है कि वहां हुआ करती थी. कहां और क्या है वो मूर्ति जो मिली भोजशाला में? धार के लोग भले ही कहानी जानते हों लेकिन बाक़ी जगहों के लोगों को ज़्यादा नहीं पता है. और ये भी ज़्यादा जानकारी नहीं है कि ये केस अयोध्या, काशी या मथुरा वाले मामले से अलग था. अब भी वैसे ये हाई कोर्ट का फ़ैसला है और मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट तो शायद जाएगा ही. तो अभी हाई कोर्ट ने इसे मां सरस्वती का मंदिर बता दिया है, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां से भी फ़ैसला आ जाएगा, लेकिन क्या राजा भोज की स्थापित मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति अब भी है? है तो कहां है? वो कहानी भी जाननी ज़रूरी है।  धार से लंदन तक की कहानी मध्य प्रदेश का धार परमार राजवंश की राजधानी हुआ करती थी आज से कोई 1000 साल पहले. वहां पर है ये भोजशाला जिसको लेकर सारा विवाद था. भोजशाला भी कहते हैं, मां वाग्देवी का मंदिर भी कहते हैं और मुसलमान इसको कमाल मौला की मस्जिद कहते आ रहे थे. लेकिन ये इमारत बाक़ी मंदिरों-मस्जिदों की तरह नहीं है क्योंकि ये प्राचीन धरोहरों का संरक्षण करने वाली एजेंजी ASI के अधीन है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के संरक्षण में है. यानी पुरातत्व विभाग. वो इसकी देखरेख करता है. और आज से नहीं. 1909 से. यानी 100 साल से भी ज़्यादा पहले से, अंग्रेज़ों के ज़माने से।  राजभोज और भोजशाला की कहानी इसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने की इजाज़त थी और शुक्रवार को मुसलमानों को. लेकिन विवाद बना हुआ था और फिर एक सायंटिफ़िक सर्वे करवाया गया था जिसकी रिपोर्ट दो साल पहले कोर्ट को दी गई थी और उसी के आधार पर फ़ैसला आया है. इमारत जो है वो 11वीं सदी की मानी जाती है. हिंदू पक्ष का मानना है कि ये सरस्वती मंदिर था जो परमार राजवंश के राजा भोज ने बनवाया था. राजा भोज का शासन था साल 1000 से 1055 तक. और राजा भोज के राज में संस्कृत का बहुत अध्ययन होता है. तो हिंदू पक्ष मानता है कि यहां मां वागदेवी यानी सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया था और ये जो पूरा कॉम्प्लेक्स जो था जिसको भोजशाला कहते हैं, ये संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र हुआ करता था. जिसको बाद में 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी से लेकर 15वीं सदी में महमूद शाह खिलजी तक ने तोड़ा और बर्बाद किया और मंदिर की जगह पर कमाल मौला मस्जिद बना दी गई थी।  भोजशाला पर मुसलमानों की क्या दलील मुसलमानों का पक्ष ये था कि ये सूफ़ी संत कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी, जिनकी मृत्यु 13वीं सदी में धार में ही हुई थी और उनकी मज़ार के पास ही ये मस्जिद बन गई थी. ब्रिटिश राज के टाइम धार एक रियासत हुआ करती थी और महाराजा सर उदाजी राव पुआर द्वितीय के शासनकाल में 1909 में इस कॉम्प्लेक्स को अंग्रेज़ों की ASI के संरक्षण में दे दिया गया था. आज़ादी के बाद 1951 में इसको मॉन्युमेंट ऑफ़ नैशनल इंपॉर्टेंस, राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था. और फिर इस घटनाक्रम में सबसे अहम फ़ैसला जो हुआ था वो हुआ था 2003 में जब ASI ने ये व्यवस्था की कि मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकेंगे और शुक्रवार को मुसलमान. इस व्यवस्था से दोनों पक्ष ख़ुश नहीं थे और मामला अदालत में चल रहा था जिसपर हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि ये मंदिर ही था और मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने का अधिकार नहीं होगा. लेकिन जो समझने वाली बात है वो ये कि ये केस बाक़ी मामलों से अलग कैसे था।  मां सरस्वती के सबूत एक तो इस मामले में कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं था. दूसरा ये अग्रेज़ों के ज़माने से ही पुरातत्व विभाग के पास था. और तीसरा ये कि इस विवाद ने भले ही 1992 में अयोध्या में ढांचा गिराये जाने के बाद तूल पकड़ा हो लेकिन ये विवाद 1902 से चला आ रहा था. 2024 में जो ASI का सर्वे हुआ उसकी रिपोर्ट कहती है कि ये जो खंभों पर खड़ा हुआ बड़ा हॉल है ये एक पुराने मंदिर के अवशेषों से बना हुआ दिखता है. खंभों पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां नज़र आती हैं, मां सरस्वती की स्तुति में संस्कृत में शिलालेख दिखते हैं, परमार राजवंश के समय के पत्थर मिलने की बात है और हवन कुंड दिखता है. साथ ही कमाल मौला की दरगाह भी दिखती है और फ़ारसी में लिखी हुई भी पंक्तियां नज़र आती हैं. 1902 में धार रियासत जो थी उसमें शिक्षा के अधीक्षक होते थे के. के. लेले. कहते हैं उस टाइम वहां अग्रेज़ वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न को धार आना था तो उनकी यात्रा के लिए इस जगह पर एक दस्तावेज़ तैयार किया था के. के. लेले साहब ने. और भोजशाला नाम इस दस्तावेज़ में पहली बार मिलता है।  भोजशाला, धार और अंग्रेजों की एंट्री उससे पहले जो अंग्रेज़ आए 1822 में, जॉन मैल्कम 1888 में विलियम किनकेड, उन्होंने इस जगह के बारे में लिखते हुए भोजशाला नाम का इस्तेमाल नहीं किया था. लेकिन पास ही में राजा भोज के महल से कई चीज़ें विलियम किनकेड को मिल चुकी थीं. राजा भोज परमार वंश के बहुत बड़े और विद्वान राजा माने जाते थे. वो ज्ञान, कला, विज्ञान और साहित्य के बहुत बड़े प्रेमी थे. और सबसी बड़ी बात तो ये कि उन्होंने खुद 84 किताबें लिखी थीं और 100 से ज्यादा मंदिर बनवाए. राजा भोज मां सरस्वती, जिन्हें मां वाग्देवी भी कहते हैं, उनके के बहुत बड़े भक्त माने जाते थे. ये तो आप जानते ही हैं कि सरस्वती ज्ञान, विद्या, वाणी और कला की देवी हैं. इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी धार में एक बड़ा शिक्षा केंद्र बनवाया. इसी को के. के. लेले ने अपने दस्तावेज़ में भोजशाला नाम दिया था. कहते हैं कि ये 1035 में वसंत पंचमी के दिन बनकर तैयार हुआ. भोजशाला सिर्फ एक शाला नहीं … Read more

300 साल पुराना पेड़, 8 एकड़ में फैला विस्तार… पंजाब की इस अनोखी धरोहर के आगे किसान भी छोड़ देते हैं हक

फतेहगढ़ साहिब फतेहगढ़ साहिब के छोटे से गांव चोलटी खेड़ी में स्थित लगभग 300 वर्ष पुरानी विशाल बरोटी (बरगद का पेड़) आज भी प्रकृति, आस्था और पर्यावरण संरक्षण की अनोखी मिसाल बना हुआ है। करीब आठ एकड़ क्षेत्र में फैला यह विशाल वृक्ष पंजाब का सबसे बड़ा पेड़ माना जाता है। इसकी फैली शाखाएं और जमीन में उतरती नई जड़ें इसे छोटे जंगल का रूप देती हैं।  गांव के लोगों के अनुसार यह बरोटी हर दिन और फैलती जा रही है। इसकी जड़ें लगातार धरती में आगे बढ़ रही हैं और जहां तक यह फैलती हैं, वहां किसान अपनी जमीन पर ट्रैक्टर और हल चलाना छोड़ देते हैं। गांव वाले उस हिस्से को खाली छोड़कर पेड़ को आगे बढ़ने देते हैं। गांव के लोग इसे “बाबा जी के अंग-पैर” मानते हैं और इसकी एक टहनी तक तोड़ने से डरते हैं। लोगों का विश्वास है कि यह बरोटी मनोकामनाएं पूरी करती है और जो व्यक्ति इसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, उसे भारी हानि उठानी पड़ती है।  गांव की बुजुर्ग महिलाओं और किसानों ने बताया कि वर्षों पहले कुछ लोगों ने इस बरोटी को काटने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में उनके साथ दुर्घटनाएं हुईं और कई लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इसी कारण आज भी कोई व्यक्ति इसकी टहनी काटने या पत्ता तोड़ने की हिम्मत नहीं करता।   साधु और “भभूति” से जुड़ी है बरोटी की कथा  गांव में प्रचलित मान्यता के अनुसार कई दशक पहले एक साधु यहां खेतों में आकर ठहरे थे। उस समय एक किसान दंपती निसंतान था। साधु ने किसान की पत्नी को भभूति दी और आशीर्वाद दिया, लेकिन किसान ने उस पर विश्वास नहीं किया और वह भभूति साधुओं की धूनी में डाल दी गई। गांव वालों के अनुसार कुछ समय बाद उसी स्थान पर एक छोटा पौधा उग आया, जो धीरे-धीरे विशाल बरोटी में बदल गया। लोगों का कहना है कि जिस तरह किसान का परिवार बढ़ा, उसी तरह यह बरोटी भी लगातार फैलती चली गई। आज भी गांव के लोग इस कथा को श्रद्धा के साथ सुनाते हैं और बरोटी को चमत्कारी मानते हैं।  किसान छोड़ देते हैं जमीन  गांव वालों के अनुसार बरोटी की जड़ें और शाखाएं लगातार खेतों तक फैलती जा रही हैं। जिस खेत तक इसकी जड़ें पहुंचती हैं, वहां किसान ट्रैक्टर और हल चलाना बंद कर देते हैं। कई किसानों ने अपनी जमीन का हिस्सा पेड़ के लिए छोड़ दिया है, ताकि बरोटी बिना रोक-टोक आगे बढ़ सके।    “यह पेड़ नहीं पूरा जंगल है”  करीब आठ एकड़ में पहले इस पेड़ को लोग प्यार से बरोटी कहते हैं। जिसकी शाखाएं जमीन तक झुककर नई जड़ें बना लेती हैं। यही जड़ें आगे चलकर नए तनों का रूप लेती हैं और पेड़ लगातार फैलता जाता है। दूर से देखने पर यह किसी घने जंगल जैसा दिखाई देता है।  पक्षियों और जीव-जंतुओं का सुरक्षित आश्रय बरोटी के भीतर सैकड़ों पक्षी, मोर और अन्य जीव-जंतु रहते हैं। गांव वालों का कहना है कि गर्मियों में भी यहां ठंडक बनी रहती है। पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह स्थान किसी प्राकृतिक धरोहर से कम नहीं है।  “विकास” के दौर में पर्यावरण बचाने की मिसाल  जहां एक ओर विकास के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं, वहीं चोलटी खेड़ी की यह बरोटी लोगों को प्रकृति बचाने का संदेश दे रही है। गांव वालों का कहना है कि पंजाब में ऐसे और अधिक प्राकृतिक क्षेत्र और जंगल होने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण मिल सके।  विदेशी शोधकर्ताओं ने भी किया अध्ययन  गांव के निवासी डॉ. मोहनलाल के अनुसार करीब चार वर्ष पहले पेरिस से एक विशेष टीम यहां पहुंची थी। उनके साथ मुंबई और चंडीगढ़ के कई शोधकर्ता भी आए थे। टीम ने इस विशाल बरोटी का इतिहास तैयार किया और इस पर शोध कार्य भी किया। डॉ. मोहनलाल ने बताया कि पंजाब सरकार का जंगलात विभाग भी समय-समय पर इस वृक्ष का निरीक्षण करता है। विभाग की ओर से इसकी जड़ों में दवाई डाली जाती है ताकि दीमक या अन्य बीमारी से पेड़ को नुकसान न पहुंचे।    25 साल पहले बनवाया गया था मंदिर  डॉ. मोहनलाल ने बताया कि करीब 25 वर्ष पहले फतेहगढ़ साहिब के तत्कालीन एडिशनल डिप्टी कमिश्नर दविंदर वालिया द्वारा यहां एक मंदिर का निर्माण करवाया गया था। उन्होंने बताया कि बरोटी के नीचे बना प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां साधु-संत निवास करते हैं।  झुकी शाखा फिर खुद खड़ी हो गई  डॉ. मोहनलाल के अनुसार करीब दो वर्ष पहले बरोटी का एक बड़ा हिस्सा झुक गया था। लोगों को लगा कि अब यह हिस्सा सूख जाएगा, लेकिन कुछ समय बाद वहीं से नई मजबूती के साथ वह दोबारा खड़ा हो गया। गांव के लोग इसे चमत्कार के रूप में देखते हैं।  हर साल लगता है विशाल भंडारा  हर वर्ष अगस्त महीने में यहां विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है। दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें लेकर यहां पहुंचते हैं और बरोटी के नीचे बने शिव मंदिर में माथा टेकते हैं। भंडारे में दाल, रोटी, सब्जी, जलेबी और अन्य मिष्ठान वितरित किए जाते हैं। गांव वालों के अनुसार इस दौरान हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।   बुजुर्ग महिला ने सुनाई मान्यता गांव की एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि कई साल पहले एक व्यक्ति बरोटी की शाखा काटने के लिए हथियार लेकर आया था। उन्होंने उसे रोकते हुए कहा था कि यह “बाबा जी के अंग-पैर” हैं और इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। महिला के अनुसार उस व्यक्ति ने उनकी बात नहीं मानी और बाद में उसका दुर्घटना में बड़ा नुकसान हो गया। महिला ने बताया कि आज भी आसपास के गांवों से लोग यहां श्रद्धा के साथ आते हैं और इस बरोटी को प्रणाम करते हैं।  प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम  चोलटी खेड़ी की यह बरोटी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की जीवंत मिसाल भी है। जिस समय दुनिया पेड़ों को बचाने की मुहिम चला रही है, उस समय पंजाब के इस छोटे से गांव के लोग पीढ़ियों से एक विशाल वृक्ष को अपने परिवार की तरह संभाल रहे हैं।  

गर्मी से मिलेगी राहत! तय हुई मॉनसून की दस्तक की तारीख, बादल बरसाने को तैयार

नई दिल्ली  उत्तर भारत समेत पूरे देशभर में भीषण गर्मी पड़ रही है। सभी लोग मॉनसून का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इस बीच, केरल में मॉनसून की एंट्री की खबर ने सबके लिए बड़ी खुशखबरी दी है। केरल में इस बार समय से पहले मॉनसून की एंट्री होने जा रही है। यह 26 मई को दस्तक देगा। हालांकि, इस मॉडल में प्लस माइनस चार दिन का गैप हो सकता है। इस हफ्ते कई दिनों तक उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में हीटवेव से लेकर भीषण हीटवेव की स्थिति रहने वाली है। वहीं, सप्ताह के दौरान उत्तर-पूर्वी भारत में और अगले तीन चार दिनों के दौरान तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, केरल, माहे, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में भी छिटपुट से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। उत्तर पश्चिम भारत के मौसम की बात करें तो 15 और 16 मई को जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड में छिटपुट से हल्की से मध्यम बारिश, गरज, बिजली और तेज हवाएं चलने की संभावना है। 15 मई को पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, पश्चिमी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में और पूर्वी राजस्थान में 15 और 16 मई को छिटपुट हल्की से मध्यम बारिश, गरज, बिजली चलने की संभावना है। 15 मई को पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में गरज के साथ आंधी चलने की संभावना है। इस दौरान आंधी की स्पीड 70 किमी प्रति घंटे हो सकती है। वहीं, 15 मई को पश्चिम राजस्थान के कुछ इलाकों में धूलभरी आंधी चल सकती है। पूर्वोत्तर भारत में 15 से 17 मई के दौरान नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा में छिटपुट से लेकर काफी व्यापक स्तर पर बारिश होगी। 15-17 मई और 20 से 21 मई को अरुणाचल प्रदेश में, 15-21 मई को असम, मेघालय में, 15, 20 और 21 मई को नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम में छिटपुट भारी बारिश होगी। लगातार तीसरे साल समय से पहले आ रहा मानसून आम तौर पर केरल में मानसून के आगमन की सामान्य तारीख 1 जून मानी जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसमें बदलाव देखा जा रहा है- 2024 में: मानसून 30 मई को पहुंचा था। 2025 में: मानसून ने 24 मई को ही दस्तक दे दी थी। 2026 का अनुमान: इस बार भी यह 26 मई तक पहुंच सकता है। यह भी सामान्य से जल्दी है। अंडमान में कल पहुंचेगा मानसून IMD के मुताबिक मानसून की प्रगति के लिए परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं। 16 मई (शनिवार) के आसपास दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मानसून के आगे बढ़ने की पूरी संभावना है। वर्तमान में बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में एक 'वेल-मार्क्ड लो प्रेशर' एरिया बना हुआ है, जो मानसून की गति में सहायक हो रहा है। इस साल 'सामान्य से कम' रह सकती है बारिश जहां एक तरफ मानसून जल्दी आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौसम विभाग ने बारिश की मात्रा को लेकर चिंता भी जताई है। अप्रैल में जारी पहले लॉन्ग रेंज फोरकास्ट के मुताबिक इस साल मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। यह लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत रह सकती है। एल नीनो का खतरा मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जुलाई के आसपास 'एल नीनो' (El Nino) की स्थिति बन सकती है। एल नीनो का भारतीय मानसून पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और इसे अक्सर कम बारिश या सूखे की स्थिति से जोड़कर देखा जाता है। क्यों महत्वपूर्ण है यह मानसून? भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए मानसून की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान है। देश की कुल वार्षिक वर्षा का 70% से अधिक हिस्सा इसी सीजन (जून से सितंबर) में प्राप्त होता है। यह न केवल धान जैसी फसलों की सिंचाई के लिए जरूरी है, बल्कि देश भर के जलाशयों के जल स्तर को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। इसके अलावा, मानसून ही भीषण गर्मी और लू से राहत दिलाता है। कैसे तय होती है तारीख? IMD मानसून की तारीख तय करने के लिए कई वैज्ञानिक कारकों का विश्लेषण करता है। इसमें उत्तर-पश्चिम भारत का न्यूनतम तापमान, दक्षिण भारत में मानसून पूर्व की बारिश, हवाओं का पैटर्न और हिंद महासागर व दक्षिण चीन सागर के ऊपर बादलों की हलचल शामिल है। अब मौसम विभाग मई के अंत तक मानसून के भौगोलिक विस्तार (किस राज्य में कब पहुंचेगा) को लेकर विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा। वहीं, दक्षिण भारत में भी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।  मॉनसून से पहले बारिश मौसम विभाग के अनुसार, मॉनसून के आगमन से पहले ही दक्षिण भारत में झमाझम बरसात हो रही है। 15-19 मई के दौरान केरल, माहे, तटीय आंध्र प्रदेश, यनम, रायलसीमा, आंतिरक कर्नाटक, लक्षद्वीप में 15-16 मई को छिअपुट से लेकर व्यापक स्तर पर गरज, बिजली और तेज हवाएं चलने वाली हैं। 

रेलवे का बड़ा प्रोजेक्ट! मालगाड़ियों के लिए अलग ट्रैक, बीना-जबलपुर रूट पर सफर होगा आसान

जबलपुर बुंदेलखंड और महाकौशल के रेल यात्रियों के लिए अच्छी खबर आई है. क्योंकि पश्चिम मध्य रेलवे के द्वारा बीना-जबलपुर को बाईपास करने की योजना बनाई गई है. इतना ही नहीं इसका सर्वे करने के लिए बजट की भी मंजूरी मिल गई है. करीब 83 लाख की लागत से इसकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसमें 166 किलोमीटर लंबे रूट का सर्वेक्षण होगा. अभी लोकेशन की तलाश चल रही है कि आखिर यह रेलवे बाईपास कहां से गुजरेगा? इसका सीधा फायदा बीना रेलवे जंक्शन को मिलने वाला है।  क्योंकि यह रेलवे जंक्शन वर्तमान समय में मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के अत्यधिक दबाव से जूझ रहा है. बाईपास रेलवे ट्रैक बनने से मालगाड़ियों को निकालने की योजना है, इससे यात्री गाड़ियों को आउटर सिग्नल पर रोकने की जरूरत नहीं पड़ेगी  बीना रेलवे स्टेशन से रोजाना गुजरती हैं 60 से 70 मालगाड़ी बुंदेलखंड का बीना रेलवे जंक्शन एक ऐसा सेंटर है जहां से बीना-कटनी, बीना-भोपाल, बीना-झांसी, जैसी दिशाओं में ट्रैक यानी रेलवे लाइन जाती है और रेलवे रिकॉर्ड के अनुसार यहां से रोजाना 60 से 70 मालगाड़ी गुजरती हैं. इतना ही नहीं मालगाड़ी के अलावा अगर यात्री ट्रेनों की बात करें तो उनकी संख्या भी 150 प्लस है. रेलवे के अनुसार बिना स्टेशन पर रुकने वाली और थ्रू निकलने वाली गाड़ियों की संख्या 155 है. आज की स्थिति की बात करें तो सभी मालगाड़ियां और यात्री ट्रेनें एक ही ट्रैक से निकाली जाती हैं।  ट्रेनों को सीधे बायपास से निकाला जाएगा इसकी वजह से प्लेटफॉर्म की लूप लाइन के साथ मैन अप और डाउन ट्रैक व्यस्त रहता है. इसके अलावा रेलवे यार्ड में मालगाड़ियों को प्लेस करने और चलाने में ट्रैक व्यस्त हो जाता है. ट्रैक क्लियर न मिलने के कारण सवारी गाड़ियों को स्टेशन के होम या आईबीएच सिग्नल पर रोकना पड़ता है. इसकी वजह से न सिर्फ यात्रियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, बल्कि ट्रेनें भी डिटेन होती हैं. इस दबाव को कम करने के उद्देश्य से रेलवे ने बाईपास ट्रैक बनाने का निर्णय लिया है. बाईपास बनाने के बाद मालगाड़ियों को यार्ड में लेकर चलाने के बजाए सीधे बाईपास से निकाला जाएगा।  फाइनल रिपोर्ट तैयार होने के बाद कैबिनेट को भेजी जाएगी रिपोर्ट रेलवे के इंजीनियरों के द्वारा सर्वे रिपोर्ट में यह चीज देखी जाएगी कि इसका रूट कहां से गुजरेगा. भू अर्जन करने के लिए कितनी मुआवजा राशि खर्च करनी पड़ सकती है. इस नए रेलवे ट्रैक से कितने गांव कितने शहर कनेक्ट होंगे. ट्रैफिक किस तरह का मिलेगा, इस रास्ते में नदी पर कहां पुल बनाने पड़ेंगे. कहां पहाड़ को काटकर ट्रैक बिछाना पड़ेगा. इनकी फाइनल रिपोर्ट तैयार होने के बाद उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी, जिसका प्रस्ताव कैबिनेट तक जाएगा. वहां से मोहर लगने के बाद ही बजट आवंटित किया जा सकता है।  यात्री ट्रेनों को आउटर पर रोकने की नहीं पड़ेगी जरूरत बीना के एक रेलवे अधिकारी ने बताया कि बाईपास बनने के बाद रेलवे स्टेशन के सभी प्लेटफॉर्म और ट्रैक खाली रहेंगे. इससे यात्री ट्रेनों को आउटर पर रोकने की जरूरत नहीं पड़ेगी और ट्रेनों को सीधे प्लेटफॉर्म पर ले सकेंगे. इसके साथ ही परियोजना का उद्देश्य न सिर्फ स्टेशन का ट्रैफिक कम करना है, बल्कि यात्री ट्रेनों की समयबद्धता में भी सुधार करना है।  बाईपास बनने से दूरी होगी कम बीना से जबलपुर जाने वाली रेलवे ट्रैक की दूरी की बात करें तो यह सागर, दमोह, कटनी होते हुए गुजरता है. जिसकी दूरी लगभग 351 किलोमीटर है और किसी भी ट्रेन से सफर करने के लिए कम से कम 6 घंटे का समय लगता है, लेकिन जब यह बाईपास बन जाएगा तो इसकी दूरी लगभग आदि कम होकर 166 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे समय की बचत होगी किराया भी कम लगने लगेगा।