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कौन हैं जज रंजना प्रकाश देसाई? जिनकी निगरानी में तैयार होगा UCC का ड्राफ्ट, कई अहम जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं

भोपाल  मध्य प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की प्रक्रिया तेज हो गई है. राज्य सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने और इसकी व्यवहार्यता का अध्ययन करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है. सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में UCC का ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा. इसके लिए न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई को जिम्मेदारी सौंपी गई है. उनकी अध्यक्षता में बनी कमेटी भोपाल पहुंच चुकी है. 22 जून से कमेटी ने काम शुरू भी कर दिया है. अब सवाल है कि न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई को यूसीसी ड्राफ्ट के लिए क्यों चुना गया है. जानते हैं कौन है न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई जिनकी निगरानी में तैयारी हो रही है? वहीं, कांग्रेस यूसीसी को लेकर बीजेपी पर लगातार हमले कर रही है।  न्यायमूर्ति रंजना की अध्यक्षता में बनी कमेटी प्रदेश की एससी, एसटी और महिला सहित सभी आयोग के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग करेंगी. इसके अलावा मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, धर्म गुरुओं के साथ चर्चा की जाएगी. छह सदस्यों वाली इस कमेटी में जस्टिस (रिटायर्ड) रंजना प्रसाद देसाई के साथ रिटायर्ड IAS अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और समाजसेवी बुधपाल सिंह शामिल हैं. सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त सचिव अजय कटेसरिया को कमिटी का सचिव नियुक्त किया गया है।  कौन हैं जस्टिस रंजना प्रसाद देसाई न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई देश की सबसे अनुभवी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में मानी जाती हैं और कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समितियों का नेतृत्व कर चुकी हैं. उनका जन्म 30 अक्टूबर 1949 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज से बीए और साल 1973 में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज मुंबई से LLB की पढ़ाई पूरी की. उनके पिता एक मशहूर आपराधिक वकील थे।  30 जुलाई 1973 से उन्होंने वकालत शुरू की. शुरुआत में उन्होंने न्यायमूर्ति प्रताप के सहायक के तौर पर काम किया. 1979 में वह सरकारी वकील बनी और 1 नवंबर 1995 को उन्हें मुंबई हाईकोर्ट में सरकारी वकील नियुक्त किया गया. वह 1996 में बॉम्बे हाई कोर्ट की जज बनीं और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की न्यायाधीश नियुक्त हुईं. 29 अक्टूबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुईं।  रिटायरमेंट के बाद मिली जिम्मेदारियां लोकपाल चयन समिति की सदस्य डिलिमिटेशन कमीशन (सीमांकन आयोग) की अध्यक्ष प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की अध्यक्ष उत्तराखंड UCC समिति की अध्यक्ष गुजरात UCC समिति की अध्यक्ष 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Pay Commission) की अध्यक्ष

Ken-Betwa Link Project: नहरों के लिए जमीन देने वाले किसानों को 4 गुना मुआवजा, सर्वे का काम पूरा

 छतरपुर  देश की पहली नदी जोड़ परियोजना छतरपुर में आकार ले रही है। पहले चरण में करीब 3400 करोड़ का ढोडन बांध बनाया जा रहा है। इस बांध से जिलेभर में नहरें बनाई जाएंगी। जिससे जिले के गांव सिंचाई क्षेत्र से जुड़ सकें। नहरें कहां से डाली जानी हैं और कौन से गांवों से होकर गुजरेंगी इसकी पूरी प्लानिंग की जा चुकी है। जिन किसानों की जमीनें नहरों के दायरे में आएंगी उनको भी सरकार जमीन की कीमत से चार गुना मुआवजा देगी। जिससे किसानों को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं आए। जिलेभर के 54 गांवों से होकर केन बेतवा की नहरें निकलेंगी। जिसका सर्वे भी किया जा चुका है। केन बेतवा लिंक परियोजना का ढोड़न बांध बनने से 14 गांव डूब में आए थे। इन गांवों को सरकार ने दूसरी जगहों पर विस्थापित किया है। साथ ही उनके लिए कालोनियों बनाई गई हैं। मुआजवा के तौर पर साढ़े बारह लाख रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा दिया गया है। अब सरकार ने मुआवजा नीति को बदलते हुए ग्रामीण क्षेत्र की जमीनों का मआवजा चार गुना तक कर दिया गया है। बांध के डूब क्षेत्र में करीब पांच हजार परिवार प्रभावित हुए। पहले चरण में बांध बनने के बाद दूसरा चरण नहरों का होगा। बांध से बरूआसागर तक बनेगी 218 किमी लंबी कैनाल सरकार का लक्ष्य केन बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड को सिंचाई से जोड़ना है। ढोड़न बांध से यूपी के बरुआसागर तक करीब 218 किमी लंबी केनाल बनाई जाएगी। इस लंबी कैनाल से छोटी टोटी माइनर नहरें निकाली जाएंगी। जिले में सबसे ज्यादा नौगांव के गांव आ रहे हैं जो करीब 21 गांव हैं। जहां से होकर नहरें गुजरेंगी। सरकार ने अपडेट किया मुआवजे का प्रविधान जमीन अधिग्रहण के तहत सरकार अधिग्रहण पर कलेक्टर रेट से दोगुना मुआवजा दिया जाता था लेकिन अब सरकार ने नया आदेश जारी कर मुआवजा राशि को चार गुना कर दिया है। अगर किसी किसान की जमीन की कीमत एक लाख होगी तो सरकार किसान को 4 लाख का मुआवजा देगी। भू अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो गई है। अब सिर्फ किसानों को भुगतान होना है। यह भुगतान 54 गांव के चिन्हित किसानों को किया जाएगा। सरकार ने जमीन अधिग्रहण को लेकर नया आदेश दिया है। इस आदेश के तहत किसानों को उनकी जमीन का सरकारी रेट से चार गुना मुआवजा दिया जाएगा। जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो गई है अब सिर्फ किसानों को पैसा दिया जाना है। बांध से लेकर बरुआसागर तक बड़ी कैनाल बनेगी उससे माइनर नहरें जोड़ी जाएंगी।- उमा गुप्ता, ईई, केन बेतवा लिंक परियोजना  

ग्वालियर एवं शिवपुरी सहित अब 10 जिलों में संचालित हो रहे आधार सेवा केंद्र

भोपाल  भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा मध्यप्रदेश में आधार सेवाओं को नागरिकों तक अधिक सुगमता, पारदर्शिता और दक्षता के साथ पहुंचाने के लिए आधार सेवा अधोसंरचना का लगातार विस्तार किया जा रहा है। इस पहल से प्रदेश के नागरिकों को आधार नामांकन एवं अद्यतन संबंधी सेवाएं अपने निकट ही उपलब्ध हो सकेंगी। वर्तमान में यूआईडीएआई द्वारा संचालित आधार सेवा केंद्र (एएसके) प्रदेश में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, उज्जैन, राजगढ़, रायसेन, विदिशा एवं भिण्ड में संचालित हैं। ग्वालियर और शिवपुरी में मंगलवार से आधार सेवा केंद्रों का संचालन प्रारंभ हो गया है। इस प्रकार प्रदेश के 10 जिलों में आधार सेवा केन्द्र संचालित किये जा रहे हैं। आधार केंद्रों पर नागरिकों को आधार नामांकन, डेमोग्राफिक एवं बायोमेट्रिक अपडेट सहित विभिन्न आधार सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। नागरिकों की सुविधा के लिए इन केन्द्रों पर ऑनलाइन अपॉइंटमेंट की व्यवस्था भी उपलब्ध कराई गई है। प्रदेश में आधार सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से 26 अन्य जिलों में नए आधार सेवा केंद्र स्थापित किए जाने की प्रक्रिया प्रगति पर है। इन केंद्रों के शुरू होने से नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं अपने निकट ही उपलब्ध होंगी और आधार संबंधी कार्यों में समय और संसाधनों की बचत होगी। यूआईडीएआई द्वारा संचालित आधार सेवा केंद्रों के अतिरिक्त प्रदेश में लगभग सभी लोक सेवा केंद्र, राज्य सरकार के विभिन्न कार्यालय जैसे नगर निगम, कलेक्टर कार्यालय, महिला एवं बाल विकास विभाग के परियोजना कार्यालय, जनपद पंचायत, शिक्षा विभाग के ब्लॉक संसाधन केंद्र, डाकघर, कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) और चयनित बैंक शाखाओं के माध्यम से भी आधार सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यूआईडीएआई राज्य कार्यालय, भोपाल के निदेशक  सुमित मिश्रा ने बताया कि वर्तमान में मध्यप्रदेश में 2 हजार 800 से अधिक आधार नामांकन केंद्र कार्य कर रहे हैं। नागरिक यूआईडीएआई की वेबसाइट के माध्यम से अपने निकटतम आधार केंद्र की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे अपने आधार में मोबाइल नंबर सहित अन्य विवरण अपडेट रखें। आधार संबंधी किसी भी जानकारी अथवा सहायता के लिए यूआईडीएआई हेल्पलाइन 1947 पर संपर्क किया जा सकता है।  

इंदौर एयरपोर्ट विस्तार पर ब्रेक! 143 एकड़ जमीन की जरूरत, एक दशक से अटका मामला

इंदौर देश के सबसे स्वच्छ शहर और मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा मिले लंबा समय बीत चुका है। इसके बावजूद, शहर को आज भी सीधी वैश्विक कनेक्टिविटी नहीं मिल पा रही है। इस गतिरोध की मुख्य वजह एयरपोर्ट विस्तार के लिए आवश्यक महज 143 एकड़ जमीन का आवंटन रुकना है। सालाना 40 लाख यात्री और 80 फ्लाइट्स का दबाव झेल रहे इस एयरपोर्ट का विस्तार बेहद जरूरी हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा भेजा गया भूमि अधिग्रहण का यह प्रस्ताव लंबे समय से विचाराधीन है। केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय इस संबंध में कई बार पत्र भी लिख चुका है, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक स्तर पर अंतिम मंजूरी का इंतजार है। यदि यह जमीन मिल जाए, तो इंदौर से सीधे बड़े अंतरराष्ट्रीय विमान उड़ान भर सकेंगे और यात्रियों को दिल्ली-मुंबई की कनेक्टिंग फ्लाइट्स के झंझट से मुक्ति मिल जाएगी। विलंब के कारण संरक्षित जमीन पर अतिक्रमण और अन्य प्रोजेक्ट के लिए आवंटन का डर है। कुछ जमीन मेट्रो के स्टेशन के लिए दी जा चुकी है। हालांकि, अफसरों का दावा है कि इस पर तेजी से काम चल रहा है। विस्तार का गणित: दो चरणों में बदलना है नक्शा एयरपोर्ट प्रबंधन और प्रशासन ने वर्तमान आवश्यकताओं को देखते हुए विस्तार के मूल प्लान को दो चरणों में रीडिजाइन किया है:     पहला चरण (89 एकड़ की जरूरत): रनवे की लंबाई 2700 मीटर से बढ़ाकर 3500 और फिर 4000 मीटर करना है। इससे प्रति घंटे 15 के बजाय 24 फ्लाइट आ-जा सकेंगी।     दूसरा चरण (54 एकड़ की जरूरत): नया आधुनिक टर्मिनल बनाया जाएगा। विमान पार्किंग की क्षमता 26 से बढ़कर 54 हो जाएगी, जिससे रात में भी बड़े विमान पार्क हो सकेंगे। विजन 2047: जब 729 एकड़ का परिसर तीन गुना होगा इंदौर एयरपोर्ट वर्तमान में केवल 729 एकड़ में है। वर्ष 2047 तक की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आसपास के गांवों—सिंहासा और कोड़िया बड़ी की 1100 एकड़ जमीन मिलाकर 1950 एकड़ का मास्टर प्लान तैयार किया गया है। तब तक यात्री क्षमता 10 से 12 गुना बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, आरक्षित जमीन की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, बड़े हिस्से पर अतिक्रमण हो चुका है, जिससे फनल और लाइट एरिया भी प्रभावित हुआ है। चापड़ा योजना निरस्त, अब उज्जैन भी रेस में आगे जमीन की उपलब्धता में आ रही दिक्कतों को देखते हुए पूर्व में इंदौर से 45 किलोमीटर दूर चापड़ा में एक नया 'ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट' बनाने की योजना तैयार की गई थी। इसके चलते इंदौर एयरपोर्ट के मूल विस्तार प्लान को सीमित कर दिया गया था, लेकिन अब चापड़ा का प्रस्ताव पूरी तरह निरस्त हो चुका है। वहीं, उज्जैन में नया प्रोजेक्ट मंजूर किया गया है। सबसे बड़ा पेंच… भूमि अधिग्रहण का मुआवजा मेट्रोपॉलिटन रीजन के विकास के तहत पड़ोसी धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ के मद्देनजर नए एयरपोर्ट की प्लानिंग तेजी से आगे बढ़ी है, जिसके लिए 45 करोड़ की राशि भी स्वीकृत हो चुकी है। इंदौर के विस्तार प्रस्ताव में सबसे बड़ा पेंच भूमि अधिग्रहण के मुआवजे की राशि को लेकर फंसा है, जिसकी व्यवस्था राज्य सरकार को करनी है। देरी का खामियाजा… मेट्रो को दी 20 एकड़ जमीन पूर्व में जिला प्रशासन ने एयरपोर्ट प्रबंधन को सुविधा विस्तार के लिए 20 एकड़ जमीन सौंपी थी। लंबे समय तक उपयोग नहीं किया गया और योजनाएं कागजों में ही घूमती रहीं। परिणाम यह हुआ कि अब उस आवंटित जमीन पर मेट्रो ट्रेन का स्टेशन बनाया जा रहा है, जिससे एयरपोर्ट के पास उपलब्ध आंतरिक स्पेस और कम हो गया है।

जम्मू रेलवे स्टेशन की भीड़ से राहत, अमरनाथ यात्रा के लिए तवी फ्रंट बना नया हब

जम्मू  श्री अमरनाथ जी की वार्षिक यात्रा 2026 को लेकर जम्मू शहर में तैयारियां अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। इस बार श्रद्धालुओं की सुविधा और भीड़ प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए प्रशासन द्वारा तवी रिवर फ्रंट को एक मुख्य केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।तवी रिवर फ्रंट पर करंट पंजीकरण, आरएफआईडी कार्ड जारी करने और देश-विदेश से आने वाले भक्तों के लिए अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए युद्ध स्तर पर टेंट सिटी तैयार की जा रही है। भगवती नगर चौथे पुल से लेकर वेयर हाउस के नजदीक तक टेंट सिटी बन रही है। तवी किनारे पर जगह-जगह सुरक्षाबलों की तैनाती करने के साथ मोबाइल शौचालय भी तैनात कर दिए गए हैं। लाइटिंग की व्यवस्था की जा रही है। जोर-शोर से यहां टेंट लगाने के साथ अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाने की कवायद जारी है। इस नए केंद्र के बनने से रेलवे स्टेशन और अन्य जगहों पर होने वाली भारी भीड़ से राहत मिलेगी। अमरनाथ यात्रा आगामी 3 जुलाई से औपचारिक रूप से शुरू होने जा रही है, जिसे लेकर पूरा जम्मू शहर बम-बम भोले के जयकारों से गूंजने के लिए तैयार है। सुरक्षा के कड़े इंतजाम, पुलिस ने संभाला मोर्चा यात्रा की संवेदनशीलता को देखते हुए जम्मू पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त कर दी है। सुरक्षा कारणों के चलते तवी रिवर फ्रंट के पूरे इलाके को पुलिस द्वारा सील कर दिया गया है। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है और बिना आधिकारिक अनुमति के किसी भी बाहरी व्यक्ति या वाहन को क्षेत्र में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी जा रही है। श्रद्धालुओं के लिए मिलेंगी विश्वस्तरीय सुविधाएं प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, इस बार तवी रिवर फ्रंट पर आने वाले श्रद्धालुओं को न केवल करंट पंजीकरण और टोकन की सुविधा मिलेगी, बल्कि उनके ठहरने, खान-पान और चिकित्सा की भी उत्तम व्यवस्था की जा रही है। इसके साथ ही इस बार तवी तट पर तीर्थयात्रियों के लिए विशेष आकर्षण भी तैयार किए जा रहे हैं ताकि जम्मू पहुंचने वाले भोले के भक्त यहां से एक दिव्य और सुखद स्मृति लेकर लौटें। करंट पंजीकरण के लिए टोकन वितरण 30 जून को शुरू होगा और उसके बाद नान केवाईसी पंजीकरण को ईकेवाईसी पंजीरकण में बदलने का काम 1 जुलाई से शुरू होगा।  

Vande Bharat Special Offer: सफर के दौरान फ्री मील और पानी, लेकिन यात्रियों को माननी होगी ये शर्त

भोपाल   इंडियन रेलवे की सबसे आधुनिक ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस में सफर को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाएं यात्रियों को दी जा रही हैं. ये ट्रेन तूफानी स्पीड और बेहतरीन सुविधाओं के साथ फिक्स टाइमिंग के लिए जान जाती है. अब रेलवे ने वंदे भारत एक्सप्रेस में सफर करने वाले यात्रियों के लिए और खुशखबरी दी है।  2 घंटे लेट होने पर यात्रियों को ऑफर इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) के अनुसार वंदे भारत एक्सप्रेस अगर अपने फिक्स टाइम से लेट आती है या स्टेशन से देरी से रवाना होती है तो यात्रा के दौरान यात्रियों को फ्री में भोजन उपलब्ध कराया जाएगा. रेलवे के इस ऑफर से यात्रियों का भरोसा वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन पर और बढ़ेगा. इस ऑफर का मकसद यात्रियों को सफर के दौरान होने वाली असुविधा से बचाना है. रेलवे के अनुसार अगर वंदे भारत एक्सप्रेस अपने तय समय से 2 घंटे या उससे अधिक की देरी से चल रही है, तो यात्रियों को आईआरसीटीसी की तरफ से मुफ्त में खाना, नाश्ता और पीने का पानी दिया जाएगा।  सुबह और रात के हिसाब से खाने का मेनू तय रेलवे ने साफ किया है कि इसके तहत यात्रियों से एक भी पैसा नहीं लिया जाएगा. बुकिंग के समय भी इस मद का कोई चार्ज नहीं जोड़ा जाएगा. ट्रेन के लेटलतीफ होने पर समय के अनुसार खाने का मेन्यू तय होगा. अगर ट्रेन सुबह 2 घंटे से ज्यादा लेट है तो चाय-कॉफी के साथ हेवी ब्रेफास्ट पैसेंजर्स को सर्व किया जाएगा. यदि ट्रेन दोपहर या रात के भोजन के समय लेट होती है, तो यात्रियों को पूरा शाकाहारी भोजन मिलेगा. यात्रियों को रेल नीर (पीने का पानी) भी अतिरिक्त रूप से मुफ्त दिया जाएगा।  बुकिंग के समय नो फूड विकल्प चुनने पर भी सुविधा इस ऑफर में ध्यान रखने योग्य बात ये है कि अगर आपने बुकिंग के दौरान नो फूड का ऑप्शन चुना है तो भी ट्रेन के लेट होने पर फ्री में भोजन व पानी मिलेगा. रेलवे ने साफ किया है कि फ्री मील सर्विस सभी यात्रियों के लिए होगी. टिकट बुक कराते समय आपने फूड का विकल्प चुना हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।  मध्य प्रदेश से चलती है 5 वंदे भारत एक्सप्रेस मध्य प्रदेश को कुल 5 वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों की सौगात मिल चुकी है. ये ट्रेनें राज्य के प्रमुख शहरों जैसे भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रीवा और खजुराहो को आपस में और देश के अन्य हिस्सों से जोड़ती हैं. ये हैं रानी कमलापति (भोपाल)- हजरत निजामुद्दीन (दिल्ली), भोपाल- इंदौर-नागपुर ट्रेन, भोपाल-जबलपुर-रीवा वंदे भारत ट्रेन, खजुराहो- हजरत निजामुद्दीन (दिल्ली) वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन, वाराणसी से खजुराहो के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस।  भोपाल रेल मंडल के जनसम्पर्क अधिकारी नवल अग्रवाल ने बताया "वंदे भारत एक्सप्रेस के 2 घंटे या उससे अधिक लेट होने पर यात्रियों को होने वाली असुविधा से बचाने के लिए रेलवे द्वारा बिल्कुल मुफ्त भोजन, नाश्ता और रेल नीर की सुविधा दी जाएगी. ट्रेन के देरी से चलने के समय के आधार पर यात्रियों को भारी नाश्ता या पूरा शाकाहारी भोजन निःशुल्क परोसा जाएगा. यह रेलवे की तरफ से मिलने वाली पूरी तरह से काम्प्लीमेंट्री सेवा है। 

अच्छी नौकरी, मोटी सैलरी फिर भी डिप्रेशन! ‘बोरआउट’ ने बढ़ाई कर्मचारियों की चिंता

नई दिल्ली  अब तक आपने सुना होगा कि ऑफिस में काम का दबाव ज्यादा होने के कारण लोग बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं। यानी काम का प्रेशर उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थका रहा है, लेकिन अब एक दूसरी समस्या सामने आ रही है।  अब कर्मचारी ऑफिस में बर्नआउट से ज्यादा बोरियत का शिकार हो रहे हैं, जिसे बोरआउट कहते हैं। इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि दफ्तरों में करने के लिए काम नहीं बचा है, बल्कि लोगों को अब उस काम का कोई मकसद नजर नहीं आ रहा है। जब काम में कोई नया चैलेंज नहीं मिलता या वो दिनभर खाली बैठे रहते हैं, तो ये खालीपन उन्हें अंदर से तोड़ने लगता है।  बाहर से देखने पर सबकुछ बिल्कुल ठीक दिखाई देता है। अच्छी नौकरी, सैलेरी, एसी की हवा और आरामदायक कुर्सी, लेकिन भारी बोरियत की वजह से अंदर ही अंदर कर्मचारियों का आत्मविश्वास डगमगा जाता है।  बोरआउट कर्मचारियों को कैसे प्रभावित कर रहा है? इस शब्द का सबसे पहली बार इस्तेमाल यूरोप के एक वर्कप्लेस रिसर्च में किया गया था। इस रिसर्च के अनुसार, लगातार काम कम मिलना, एक ही तरह का काम रोज-रोज करना या अपने स्किन का इस्तेमाल न कर पाना, कर्मचारियों को स्ट्रेस, एंग्जायटी और डिप्रेशन की तरफ धकेल रहा है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने बर्नआउट को काम से जुड़े सिंड्रोम के रूप में डिफाइन किया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऑफिस में कोई मकसद न होने की वजह से पैदा होने वाला स्ट्रेस मेंटल हेल्थ के लिए काफी नुकसानेह है।  बिजी दिखने की मजबूरी एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉर्पोरेट ऑफिसेज में ऐसे कर्मचारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिन्हें सैलेरी तो अच्छी मिल रही है, लेकिन उनका काम बहुत कम है या काफी बिखरा हुआ है। ऐसे कर्मचारी दिनभर सिर्फ बिजी दिखने की कोशिश करते हैं। मीटिंग्स, ई-मेल और स्क्रीन के सामने खुद को बेकार महसूस करना ही बोरआउट की असली वजह है।  वर्कप्लेस से जुड़ी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा अपने काम से कनेक्टेड महसूस नहीं करता। काम में कोई चैलेंज न होने से स्ट्रेस, आत्मसम्मान में कमी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं पैदा होती है, क्योंकि कर्मचारियों को अपनी प्रोडक्टिविटी और काबिलियत पर शक होने लगता है।  आईटी, बैंकिंग और सरकारी दफ्तरों पर सबसे ज्यादा असर ग्लोबल सर्वे और एचआर ट्रेंड्स के मुताबिक, दुनिया भर के करीब 15 से 20 प्रतिशत कर्मचारी किसी न किसी स्तर पर इस बोरियत का सामना कर रहे हैं। खासतौर से आईटी, बैंकिंग और सरकारी दफ्तरों में यह समस्या बहुत ज्यादा देखी जा रही है, क्योंकि इन जगहों पर एक ही काम को बार-बार दोहराने का चलन ज्यादा है। क्यों बढ़ रहा है यह खतरा? हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के अनुसार, काम के मशीनीकरण के कारण नयापन खत्म हो रहा है। साथ ही, योग्यता के अनुसार जिम्मेदार न मिलना, जरूरत से ज्यादा स्टाफ होना, काम का गलत डिस्क्रिप्शन भी बोरआउट की वजह है। इसके पीछे मैनेजर का रवैया भी जिम्मेदार है कि वे केवल इस बात का ध्यान रखते हैं कि कर्मचारी काम करते हुए दिखे।   

MP कैबिनेट विस्तार जल्द! 5 नामों पर मंथन, सिंधिया गुट के इस दिग्गज की एंट्री लगभग तय

भोपाल  मध्य प्रदेश की मोहन सरकार अपने मंत्रिमंडल में बहुत बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। दरअसल, हाल ही में सीएम मोहन यादव ने बड़े संकेत दिए हैं जिसके बाद से मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें तेज हो गई है। 20 जुलाई से विधानसभा के  मानसून सत्र से पहले ही नई मोहन टीम के गठन की पूरी संभावना है। सूत्रों की मानें तो 4-6 मंत्री सीएम की रडार पर हैं जिन्हें मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है। वहीं खबर है कि 4-5 विधायकों को मंत्रीमंडल में जगह मिल सकती है। जिनमें दो महिला विधायकों का जिक्र है। वर्तमान में मोहन कैबिनेट में शामिल होने वाले मंत्रियों की संख्या के गणित की बात करें तो मुख्यमंत्री और दो उपमुख्यमंत्रियों सहित कुल 31 सदस्य हैं। चूंकि विधानसभा की सदस्य संख्या के हिसाब से राज्य में अधिकतम 35 मंत्री बनाए जा सकते हैं, इसलिए इस समय चार पद पूरी तरह खाली हैं। ऐसे में मोहन सरकार के पहले कैबिनेट विस्तार में इन खाली पदों को भरा जा सकता है। इसके साथ ही नॉन परफॉर्मर मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। सूत्रों की मानें तो कैबिनेट विस्तार में  4 से 6 मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है और 7 से 8 नए चेहरों को मौका मिल सकता है। सीएम मोहन यादव ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि मंत्रियों के कामकाज की समीक्षी और उनके रिपोर्ट कार्ड के आधार पर मंत्रिमंडल विस्तार किया जाएगा। गौरतलब है कि इसके लिए उन्होंने खुद विभागों की समीक्षा कर मंत्रियों के कामकाज की पूरी रिपोर्ट ली है। अटकलें है कि मंत्री विजय शाह, वन राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार, राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी, पंचायत विभाग की राज्यमंत्री राधा सिंह, संपतिया उइके और कृषि मंत्री एंदल सिंह कंषाना की शिकायतों के बाद उनपर गाज गिरना लगभग तय है। तीन सीनियर मंत्रियों के बदले जा सकते हैं विभाग अटकलें है कि मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान सरकार के दिग्गज मंत्रियों के विभागों में बड़ा बदलाव भी देखने को मिल सकता है। दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और राकेश सिंह जैसे सीनियर मंत्रियों की कैबिनेट विस्तार के बाद नई भूमिका में देखें जा सकते हैं। इन विधायकों को मिल सकती है एंट्री कैबिनेट विस्तार में कई सीनियर विधायकों को मंत्रीमंडल में जगह मिल सकती है। वहीं महिला प्रतिनिधित्व को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। महिला वोट बैंक और क्षेत्रीय समीकरण को साधने के लिए सांसद से विधायक बनी रीति पाठक, अर्चना चिटनीस और मालिनी गौड़ को कैबिनेट में शामिल किया जा सकता  है। इनके अलावा सागर से प्रदीप लारिया, पन्ना से पूर्व मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। सिंधिया खेमे से पूर्व स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी की मंत्रिमंडल में वापसी की अटकलें लगाई जा रही हैं।

डिफेंस सेक्टर के लिए सुनहरा अवसर: इजरायल से सहयोग, UAE को ब्रह्मोस से भारत को मिल सकती है बढ़त

 नई दिल्ली हाल के वर्षों में भारत ने अपनी रक्षा नीति और निर्यात क्षमता में जबरदस्त बदलाव देखा है. UAE के साथ ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित डील और इजरायल के साथ गहरी हथियार उत्पादन साझेदारी इसका ताजा उदाहरण है. ईरान-इजरायल संघर्ष ने मध्य पूर्व में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है, जिससे कई देश नए और विश्वसनीय हथियार आपूर्तिकर्ताओं की तलाश में हैं. भारत ठीक इसी जगह पर मजबूती से खड़ा हुआ है. पुराना आयातक देश अब निर्यातक के रूप में उभर रहा है।  ईरान संघर्ष का असर और अवसर ईरान-इजरायल तनाव और उससे जुड़े युद्ध ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति बदल दी. यूएई और अन्य गल्फ देशों ने महसूस किया कि अमेरिकी हथियारों पर अंधाधुंध निर्भरता पर्याप्त नहीं है. उन्हें तेज, सटीक और विश्वसनीय सिस्टम चाहिए जो क्षेत्रीय खतरों का सामना कर सकें. ब्रह्मोस मिसाइल और अकाशतीर एयर डिफेंस सिस्टम ठीक इन्हीं जरूरतों को पूरा करते हैं।  भारत इन वार्ताओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है. ब्रह्मोस मिसाइल मैक 3 की स्पीड से दुश्मन को चौंका देती है. 2025 के ऑपरेशन सिंदूर में इसकी भूमिका ने कई देशों का ध्यान खींचा. यूएई अब नई नीति अपना रहा है. भारत को विश्वसनीय पार्टनर मान रहा है. यह डील सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है।  इजरायल के साथ गहराती साझेदारी इजरायल की रक्षा मंत्रालय की उच्च स्तरीय टीम भारत दौरे पर है. डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल (रि.) अमीर बराम ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य अधिकारियों से मुलाकात की है. दोनों पक्षों ने संयुक्त उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, AI, साइबर सुरक्षा और सह-विकास पर चर्चा की. फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित MoU ने इस रास्ते को और मजबूत किया।  दोनों देश अब सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहते. वे संयुक्त हथियार बनाने, भारत में उत्पादन स्थापित करने और तीसरे देशों में निर्यात करने की दिशा में काम कर रहे हैं. इजरायल की तकनीक और भारत की निर्माण क्षमता का यह कॉम्बिनेशन गेम चेंजर साबित हो सकता है. Barak-8 मिसाइल, Heron ड्रोन और अन्य सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना में सफल हैं. अब आगे का फोकस को-प्रोडक्शन पर है।  भारत का रक्षा निर्यात कैसे बढ़ा? पिछले दशक में भारत के रक्षा निर्यात में भारी उछाल आया है. FY 2025-26 में यह आंकड़ा 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष से 62% ज्यादा है. सरकार का लक्ष्य 2030 तक 50,000 करोड़ रुपये का है. आत्मनिर्भर भारत अभियान, नई डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी ने इस बदलाव को संभव बनाया।  ईरान संघर्ष ने दुनिया की सप्लाई लाइन को प्रभावित किया. कई देशों ने देखा कि भारत न केवल हथियार दे सकता है बल्कि समय पर और विश्वसनीय तरीके से सप्लाई भी कर सकता है. फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस ले चुका है. अब UAE, सऊदी अरब जैसे देश भी रुचि दिखा रहे हैं. भारत की तटस्थ विदेश नीति भी फायदेमंद साबित हो रही है. वह न तो पूर्ण रूप से किसी एक ब्लॉक का हिस्सा है और न ही दूसरे का।  रणनीतिक महत्व यह विकास भारत को ग्लोबल डिफेंस प्लेयर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. पहले भारत मुख्य रूप से रूस, इजरायल और कुछ पश्चिमी देशों से हथियार खरीदता था. अब वही भारत ब्रह्मोस जैसी स्वदेशी मिसाइल निर्यात कर रहा है. MUM-T (Manned-Unmanned Teaming) और ऑटोनॉमस सिस्टम में भी प्रगति हो रही है।  UAE और इजरायल दोनों के साथ मजबूत संबंध भारत की मध्य पूर्व नीति को संतुलित बनाते हैं. एक तरफ इजरायल के साथ तकनीकी गहराई, दूसरी तरफ अरब देशों के साथ आर्थिक और सुरक्षा साझेदारी. ईरान संघर्ष ने इन अवसरों को तेज किया है क्योंकि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने से हर देश अपनी सुरक्षा मजबूत करना चाहता है।  हालांकि सफलता के साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं. ब्रह्मोस में रूस का हिस्सा होने से कुछ डील्स में उसकी मंजूरी जरूरी है. भू-राजनीतिक संवेदनशीलता को संभालना भी मुश्किल है. फिर भी, भारत की बढ़ती क्षमता और डिप्लोमेसी इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम दिख रही है।  UAE को ब्रह्मोस देने की बातचीत और इजरायल के साथ संयुक्त उत्पादन साझेदारी भारत के रक्षा क्षेत्र की नई कहानी लिख रही है. ईरान-इजरायल युद्ध ने दुनिया को अस्थिर किया, लेकिन भारत ने इसे अवसर में बदल लिया. आज भारत न सिर्फ अपनी सेना को मजबूत कर रहा है बल्कि दुनिया को विश्वसनीय हथियार और प्रौद्योगिकी भी दे रहा है. यह बदलाव भारत को 21वीं सदी का रक्षा निर्यातक बनाने की राह पर ले जा रहा है। 

अमेरिका ने कर दिया 300 अरब डॉलर का ऐलान, अब खाड़ी देशों की जेब पर नजर! जवाब देंगे मार्को रुबियो?

वाशिंगटन/तेहरान  मध्य पूर्व युद्ध को खत्म करने वाले समझौते की सबसे बड़ी शर्त रही- ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर के फंड की. ईरान को हुए नुकसान की भरपाई के लिए ये रकम काफी है लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि इस भारी-भरकम राशि का खर्चा कौन उठाएगा? इस्लामाबाद MoU में लिखा है कि अमेरिका अपने खाड़ी के साझेदारों के साथ मिलकर ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर का एक ठोस योजना तैयार करेगा. इस योजना को अंतिम समझौते के साथ 60 दिनों के अंदर लागू किया जाएगा।  इसके अलावा अमेरिका सभी जरूरी लाइसेंस, छूट और अनुमतियां भी देगा ताकि पैसे के लेन-देन में कोई रुकावट न आए. इस फंड के अलावा अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होते ही ईरान पर लगी सभी प्रकार की पाबंदियां हटा ली जाएंगी और उसे तुरंत तेल बेचने की छूट मिल जाएगी. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा है कि ईरान को ये सब पाने के लिए 60 दिनों में शर्तों का पालन करना होगा. उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स का एक भी डॉलर ईरान को नहीं जाएगा. तो फिर ईरान को इतने पैसे देगा कौन? कौन देगा ईरान को 300 बिलियन डॉलर?     ईरान की इस डील को लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अमेरिका इसके पैसे अपने अमीर खाड़ी देशों से वसूलेगा. आपको बता दें कि ये वही देश हैं, जहां अमेरिका के मिलिट्री बेसेज हैं और जिन पर युद्ध के दौरान ईरान ने हजारों ड्रोन और मिसाइलें दागी थीं. युद्ध के तबाह हो चुके ईरान को इस फंड की बहुत जरूरत है, लेकिन खाड़ी देश अभी तैयार नहीं दिख रहे।      सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने पिछले हफ्ते इस फंड पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि पहले विश्वास बहाल करना होगा. ईरान के हमलों के बाद रिश्ते सुधारने की बातचीत जरूरी है, उसके बाद ही आर्थिक सहयोग और निवेश की बात हो सकती है. सऊदी अरब अपनी घरेलू परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहा है।      वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पहले ही ईरान से युद्ध क्षतिपूर्ति मांगी थी, हालांकि समझौते से पहले उसका रुख कुछ नरम हुआ था. UAE युद्ध से पहले ईरान का प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी था, बावजूद इसके उसे ईरान के हमलों का सामना करना पड़ा।  मार्को रुबियो देंगे इस सवाल का जवाब? अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो इन सवालों के बीच तीन दिन के खाड़ी देशों के दौरे पर आ रहे हैं, जहां वे यूएई, कुवैत और बहरीन के नेताओं से मुलाकात करने वाले हैं. उनकी इस यात्रा का मकसद ही अपने साझेदार देशों में ये विश्वास जगाना है कि तेहरान के साथ अमेरिका की डील से उनका कोई नुकसान नहीं होगा. उन्होंने इस देशों को साफ करना होगा कि 300 अरब डॉलर का इंवेस्टमेंट पैकेज आएगा कहां से और उसे कैसे इस्तेमाल किया जाएगा. अमेरिका के लिए तो ये डील है लेकिन खाड़ी देशों के सर्वाइवल का सवाल है क्योंकि तेहरान ये रकम मिलने के बाद खुद को खड़ा तो करेगा लेकिन उनकी सेना और क्षेत्रीय प्रभाव भी मजबूत होगा. कतर, बहरीन, कुवैत, यूएई और सऊदी जैसे देश खाड़ी की सुरक्षा में अहम योगदान निभाते हैं, ऐसे में ईरान का मजबूत होना उनके लिए सिरदर्द है।  क्या-क्या आ रही हैं चुनौतियां?     खाड़ी देशों को डर है कि पैसा ईरान के हथियारों और प्रॉक्सी समूहों पर खर्च न हो जाए. इसलिए उन्हें मजबूत गारंटी चाहिए. जब तक उन्हें ये विश्वास मिल नहीं जाता, तब तक वे शायद ही अपना कोष ईरान के लिए खोलें।      समझौते में ईरान के फ्रोजन असेट्स को पूरी तरह उपलब्ध कराने का वादा है. जेडी वेंस ने कहा कि कतर और जेयर्ड कुश्नर ने इसके लिए एक दिलचस्प समाधान निकाला है. अमेरिका और कतर इस प्रक्रिया पर नजर रखेंगे।      वेंस के मुताबिक अगर पैसे छोड़े गए तो वे ईरानी लोगों को खाना खिलाने और अमेरिकी किसानों को फायदा पहुंचाने में लगाए जाएंगे. ईरान इस पैसे से अमेरिका से सोयाबीन, मक्का और गेहूं खरीद सकेगा. हालांकि तेहरान के केंद्रीय बैंक ने इससे इनकार कर दिया है।  समझौते की 60 दिनों का मियाद अब शुरू हो चुकी है. अगर इस दौरान अच्छी प्रगति हुई तो 300 अरब डॉलर का फंड ईरान को नया जीवन दे सकता है, लेकिन अगर विश्वास की कमी बनी रही तो यह सिर्फ कागजी वादा बनकर रह सकता है. यह फंड मध्य पूर्व में स्थायी शांति का आधार बन सकता है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को समझौता करना होगा. फिलहाल सवाल यह है कि क्या खाड़ी देश ईरान को फिर से खड़ा करने के लिए अपना खजाना खोलेंगे?