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किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी! पीएम मोदी ने जारी की 24वीं किस्त, खाते में आए 2,000 रुपये

जयपुर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज शुक्रवार 30 अक्टूबर को गुजरात के बनासकांठा से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) की 24वीं किस्त जारी की। इस किस्त के तहत राजस्थान समेत देशभर के 9 करोड़ से भी ज़्यादा किसानों के बैंक खातों में 18 हज़ार 690 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि सीधे जमा हो गई। सरकार के अनुसार ये राशि किसानों के कल्याण और आर्थिक सशक्तिकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। केंद्र सरकार की ओर से जानकारी देते हुए बताया गया है कि प्रधानमंत्री ने कृषि भंडारण, प्रसंस्करण और संबंधित अवसंरचना को मजबूत करने के लिए कृषि अवसंरचना कोष के तहत स्थापित 521 इकाइयों को भी राष्ट्र को समर्पित की। साथ ही उच्च-मूल्य वाली बागवानी फसलों को बढ़ावा देने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए 12 बागवानी क्लस्टरों का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री के गुजरात में हुए कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में किसान शामिल रहे। यह आयोजन किसानों के कल्याण, समृद्धि और सशक्तिकरण के प्रति सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को दोहराने के साथ-साथ पीएम-किसान और विभाग की अन्य प्रमुख पहल के महत्व को एक महत्वपूर्ण मंच देना रहा। बता दें कि पीएम-किसान की इससे पहले अब तक 23 किस्तें जारो हो चुकीं थीं, जिसके माध्यम से पात्र किसानों को 447 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहले ही वितरित की जा चुकी है। यह योजना प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से पात्र किसान परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिससे उन्हें कृषि और घरेलू खर्चों को पूरा करने में मदद मिलती है तथा उनकी आजीविका सुरक्षा को संबल मिलता है। विकसित भारत के सबसे मजबूत स्तंभ हैं किसान : पीएम मोदी प्रधानमंत्री मोदी ने संबोधन में कहा कि देश के करोड़ों छोटे किसानों के खाते में पीएम किसान सम्मान निधि की नई किस्त भी पहुंची है। हमारे किसान विकसित भारत के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक हैं और हमारी सरकार ने हमेशा किसानों के कल्याण को, किसानों को सशक्त करने को प्राथमिकता दी है। 2013-14 की तुलना में देश का कृषि बजट अब 5 गुना से अधिक हो गया है। पीएम किसान सम्मान निधि अब करोड़ों छोटे किसानों के जीवन का हिस्सा बन गई है। आज करीब 10 करोड़ किसानों के खातों में 18,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि भेजी गई है। प्रधानमंत्री ने आगे कहा, 'पिछले कुछ सालों में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच खाद की कीमतों में बहुत उछाल आया लेकिन किसानों को समर्पित हमारी सरकार ने इसका बोझ किसानों पर नहीं पड़ने दिया। इसपर सरकार ने करीब 16 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं। हमारा निरंतर प्रयास है कि सिंचाई पर किसान की लागत भी कम हो, इसमें पीएम-कुसुम योजना की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसके तहत अभी तक करीब 12 लाख सोलर पंप दिए जा चुके हैं। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध सरकार का मानना है कि कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो करोड़ों किसानों की आजीविका का आधार है और देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में सरकार ने पिछले 12 वर्षों के दौरान किसानों की आय बढ़ाने, आधुनिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने और कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। प्रमुख पहल में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), और 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ शामिल हैं। इन उपायों का उद्देश्य वित्तीय सहायता प्रदान करना, जोखिम सुरक्षा को मजबूत करना, कृषि ऋण तक पहुंच में सुधार करना और किसानों के समग्र सशक्तिकरण के लिए प्रौद्योगिकी-आधारित कृषि शासन को बढ़ावा देना है। टिकाऊ कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन सरकार खाद्य तेलों पर राष्ट्रीय मिशन और दालों में आत्मनिर्भरता मिशन जैसी पहल के माध्यम से कृषि में आत्मनिर्भरता को भी आगे बढ़ा रही है। इसके अलावा, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन देशभर में क्लस्टरों के विकास के माध्यम से किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने में कटाई-उपरांत प्रबंधन (पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट) और कृषि अवसंरचना के महत्व को पहचानते हुए, कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) गोदामों, कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं, प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों और अन्य आवश्यक कृषि अवसंरचना में निवेश को बढ़ावा देता है। एआईएफ के तहत 2.28 लाख से अधिक परियोजनाओं में लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जिसने देशभर में महत्वपूर्ण कृषि अवसंरचना के विकास को समर्थन दिया है। इन निवेशों से भंडारण और प्रसंस्करण क्षमताओं के मजबूत होने, कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आने, बाजार तक पहुंच में सुधार होने और किसानों को उनकी उपज का बेहतर प्रतिफल मिलने की उम्मीद है। सरकार उच्च-मूल्य वाली कृषि गतिविधियों, विशेष रूप से बागवानी, की ओर विविधीकरण को भी बढ़ावा दे रही है ताकि आय के अवसर बढ़ें और खेती अधिक लाभकारी बने। बागवानी क्लस्टरों का विकास बागवानी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने और उच्च-मूल्य वाली फसलों के उत्पादन और विपणन को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ये पहल किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करने, कृषि अवसंरचना का आधुनिकीकरण करने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप एक समृद्ध, सशक्त और आत्मनिर्भर कृषि क्षेत्र के निर्माण के सरकारी प्रयासों को और गति प्रदान करेंगी।

भागलपुर के केलांचल में लहलहा रहे केले के बागान, हजारों किसान परिवारों को मिल रहा रोजगार

भागलपुर बिहार की पावन धरती अपनी समृद्ध कृषि परंपरा, लोकआस्था और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए विख्यात है। इसी कृषि गौरव का सबसे सशक्त अध्याय लिख रहा है भागलपुर जिले का नवगछिया अनुमंडल। गंगा और कोसी नदियों के कछार में फैला यह इलाका आज केवल एक सामान्य कृषि क्षेत्र नहीं, बल्कि हजारों किसान परिवारों की आजीविका की रीढ़ और समूचे बिहार की आर्थिक पहचान बन चुका है। अपनी व्यापक पैदावार और मीठे स्वाद के कारण इस पूरे इलाके को आम बोलचाल में ‘केलांचल’ के नाम से जाना जाता है। खरीक, नवगछिया, गोपालपुर, इस्माईलपुर, रंगरा और बिहपुर प्रखंडों में जिधर भी नजर दौड़ाइए, मीलों तक लहलहाते केले के बागान इस क्षेत्र की असीम कृषि क्षमता की कहानी बयां करते हैं। यहां का उत्पादित केला न केवल स्थानीय और प्रांतीय बाजारों की मांग पूरी करता है, बल्कि ट्रकों और ट्रेनों के जरिए झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और मध्य प्रदेश की थोक मंडियों तक अपनी धमक बनाए हुए है। गंगा-कोसी की मिट्टी और किसान का अटूट रिश्ता गंगा और कोसी की बाढ़ अपने साथ जो सिल्ट (बारीक जलोढ़ मिट्टी) लेकर आती है, वह केले के पौधों के लिए प्राकृतिक उर्वरक का काम करती है। क्षेत्र का समशीतोष्ण तापमान और पर्याप्त नमी केले की व्यावसायिक बागवानी के लिए आदर्श वातावरण तैयार करते हैं। हालांकि, यह सफर चुनौतियों से मुक्त नहीं है। हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़, जलजमाव और आंधी-तूफान कई बार तैयार खड़ी फसलों को तबाह कर देते हैं। इसके बावजूद किसान पीढ़ियों के पारंपरिक तजुर्बे और आधुनिक जल निकासी व स्टेकिंग (पौधों को बांस का सहारा देना) तकनीकों के दम पर इस 'पीले सोने' की खेती को लगातार विस्तार दे रहे हैं। 11 से 17 महीने की अनवरत साधना, तैयार होता है संसार केले की खेती धैर्य और निरंतर निगरानी की मांग करती है। खरीक के तुलसीपुर, ध्रुवगंज, गोट खरीक और तेलघी जैसे गांवों के किसान खेत की तैयारी से लेकर जैविक खाद, संतुलित पोषण और कीट प्रबंधन में महीनों पसीना बहाते हैं। सामान्य सकर (जड़ के पौधे) से फसल तैयार होने में करीब 16 से 17 महीने का वक्त लगता है। वहीं, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर द्वारा अनुशंसित टिश्यू कल्चर पद्धति से तैयार चिनिया व जी-9 पौधों में यह फसल 13 से 15 महीने में कटाई के योग्य हो जाती है। यह पूरी व्यवस्था पौध नर्सरी से लेकर कटाई, छंटाई, ढुलाई और परिवहन तक स्थानीय स्तर पर लाखों मानव दिवस का रोजगार सृजित करती है। नवगछिया के बागानों में बाजार की नब्ज के हिसाब से किस्में उगाई जाती हैं:     मालभोग: अपनी भीनी खुशबू, उत्कृष्ट मिठास और पूजा-पाठ में अनिवार्य उपयोग के कारण यह किस्म सबसे अधिक प्रीमियम मानी जाती है।     चिनिया: छोटे आकार का यह केला अपने खास स्वाद और सुपाच्यता के लिए घरेलू स्तर पर खूब पसंद किया जाता है।     सिंगापुरी व कावेन्डिश: लंबे फल और मोटी त्वचा के कारण लंबी दूरी के परिवहन में खराब नहीं होते, इसलिए दूसरे राज्यों के व्यापारियों की पहली पसंद हैं।     ग्रैंड नैन (G-9): टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार यह किस्म एक समान फल और भारी घौद (बंच) के कारण किसानों को अधिकतम मुनाफा देती है। हाजीपुर का ऐतिहासिक नाम, नवगछिया का व्यावसायिक परचम बिहार में केले के परिदृश्य पर नजर डालें तो वैशाली के हाजीपुर का चिनिया केला अपनी ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान के लिए जाना जाता है। वहीं, भागलपुर का नवगछिया क्षेत्र बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन और अंतरराज्यीय व्यापार के मामले में सिरमौर है। हाजीपुर और नवगछिया मिलकर बिहार की फलोत्पादन क्षमता को राष्ट्रीय पटल पर मजबूती से स्थापित करते हैं। लोकआस्था के महापर्व छठ में केले का पवित्र महत्व सूर्य उपासना के महापर्व छठ में केला महज एक फल नहीं, बल्कि प्रकृति, पवित्रता और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। भगवान भास्कर और छठी मइया को अर्घ्य दान करते समय पूजा के सूप और दौरा में साबुत केले का घौद अर्पित करने की अटूट परंपरा है। छठ के दिनों में नवगछिया का पूरा बाजार 'केलामय' हो जाता है। किसान जब खेतों से काटकर घौद मंडियों में लाते हैं, तो उनका यह कठिन परिश्रम सीधे लोकआस्था और घर-घर के अनुष्ठान से जुड़ जाता है। चुनौतियां और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की दरकार विशाल उत्पादन के बावजूद केलांचल के किसान अभी भी कई मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। अक्सर आंधी और स्थानीय बिचौलियों (आढ़तियों) के सिंडिकेट के चलते किसानों को फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता। क्षेत्र के किसानों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नवगछिया में आधुनिक वातानुकूलित स्टोरेज, टर्मिनल फ्रूट मार्केट और केले से चिप्स, आटा तथा तने से प्राकृतिक रेशा (फाइबर) बनाने वाली प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित की जाएं, तो किसानों की आमदनी दोगुनी हो सकती है। उद्यान विभाग की फल विकास योजनाओं और सबौर कृषि विश्वविद्यालय के तकनीकी मार्गदर्शन से अगर इस क्षेत्र को संस्थागत मदद मिले, तो अंगभूमि का यह 'पीला सोना' राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है।

पंजाब यूनिवर्सिटी में वाहन प्रतिबंध की मांग तेज, छात्रों ने दी आंदोलन की चेतावनी

चंडीगढ़. पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) में गाड़ियों की एंट्री पर रोक की मांग तेज हो गई है। पीयू में घूमने वाली गाड़ियों को लेकर स्टूडेंट्स ने आपत्ति जताई है। उन्होंने प्रदर्शन किया। स्टूडेंट्स ने चेतावनी दी है कि जल्द फोर व्हीलर की एंट्री पर रोक नहीं लगी तो वे बड़ा आंदोलन करेंगे और वीसी ऑफिस का घेराव करेंगे। स्टूडेंट्स का कहना है कि पीयू में गाड़ियों की वजह से आए दिन जाम, प्रदूषण और सुरक्षा की समस्या बढ़ रही है। गेड़ी कल्चर के नाम पर कैंपस में घूमने वाली गाड़ियों से छात्राओं को परेशानी होती है। गाड़ियों में सवार कुछ लोग कमेंट करते हैं और पीछा करते हैं, जिससे असुरक्षा महसूस होती है। हर गेट पर गाड़ियों का जमावड़ा लगता है तो पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। छात्रों ने कहा कि कई बार बाहरी लोग भी बिना स्टिकर के गाड़ियां लेकर कैंपस में आ जाते हैं।

चक्रवात ‘अर्नब’ से प्रभावित किसानों को राहत, CM साय ने शीघ्र मुआवजा देने के दिए निर्देश

रायपुर. चक्रवात ‘अर्नब’ की वजह से नुकसान झेलने वाले प्रदेश के किसानों के लिए बड़ी खबर है. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने तमाम कलेक्टरों को फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण कर प्रभावित किसानों को शीघ्र सहायता राशि उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सोशल मीडिया में किए अपने पोस्ट में कहा कि चक्रवात ‘अर्नब’ से फसलों को हुए नुकसान के कारण हमारे अन्नदाताओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ कार्य कर रही है. प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों को फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण कराने और प्रभावित किसानों को आर.बी.सी. 6-4 के प्रावधानों एवं निर्धारित मानदंडों के अनुसार शीघ्र सहायता राशि उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. सर्वेक्षण कराने के निर्देश दिए हैं – चक्रवात ‘अर्नब’ से फसलों को हुए नुकसान के कारण हमारे अन्नदाता भाइयों को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए हमारी सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ कार्य कर रही है। प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों को फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण कराने और प्रभावित किसानों को आर.बी.सी. 6-4 के प्रावधानों एवं निर्धारित मानदंडों के अनुसार शीघ्र सहायता राशि उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। प्राकृतिक आपदा की इस घड़ी में हम हर प्रभावित किसान के साथ मजबूती से खड़े हैं। हमारे अन्नदाताओं की मेहनत और उनके हितों की रक्षा के लिए हमारी सरकार सदैव प्रतिबद्ध है। – Vishnu Deo Sai (@vishnudsai) October 30, 2026

आयुर्वेद हमारी सांस्कृतिक विरासत और स्वस्थ जीवन का आधार: उप मुख्यमंत्री देवड़ा

आयुर्वेद हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्वस्थ जीवन का आधार : उप मुख्यमंत्री देवड़ा आयुर्वेद चिकित्सकों को किया सम्मानित आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के संरक्षण, संवर्धन और अनुसंधान को प्रोत्साहित करना है जरूरी अखिल भारतीय आयुर्वेद पीजी निबंध प्रतियोगिता के विजेता विद्यार्थियों को किया पुरस्कृत भोपाल  उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा है कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और स्वस्थ जीवनशैली का आधार है। आयुर्वेद ने सदियों से मानव जीवन को निरोगी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज पूरी दुनिया भारतीय आयुर्वेद की वैज्ञानिकता और उपयोगिता को स्वीकार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार के लिए प्रतिबद्ध है। उप मुख्यमंत्री देवड़ा शुक्रवार को भोपाल के पं. खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के रजत जयंती सभागृह में भाई उद्धवदास मेहता स्मृति न्यास द्वारा आयोजित धन्वंतरि पूजन, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सक सम्मान एवं वैद्य उद्धवदास मेहता अखिल भारतीय आयुर्वेद पीजी निबंध प्रतियोगिता-2026 के पुरस्कार वितरण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने भगवान धन्वंतरि का पूजन कर प्रदेशवासियों के स्वस्थ एवं निरोगी जीवन की कामना की। इस अवसर पर उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रतिष्ठित चिकित्सकों को सम्मानित किया तथा प्रतियोगिता के विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कार प्रदान किए। उप मुख्यमंत्री देवड़ा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सर्वोच्च धन माना गया है। आयुर्वेद हमें रोगों के उपचार के साथ संतुलित आहार, अनुशासित दिनचर्या और प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वर्तमान समय में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की बढ़ती चुनौतियों के बीच आयुर्वेद की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ आयुर्वेद के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और वैज्ञानिक अध्ययन को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। उप मुख्यमंत्री देवड़ा ने कहा कि आयुर्वेद के वरिष्ठ चिकित्सकों का अनुभव और युवा विद्यार्थियों की शोध क्षमता मिलकर भारतीय चिकित्सा पद्धति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। उन्होंने भाई उद्धवदास मेहता स्मृति न्यास द्वारा आयुर्वेद चिकित्सकों के सम्मान और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन न केवल हमारी प्राचीन चिकित्सा विरासत को सहेजने का कार्य करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को आयुर्वेद के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। भाई उद्धवदास मेहता स्मृति न्यास द्वारा विगत 29 वर्षों से आयुर्वेद के प्रतिष्ठित चिकित्सकों को सम्मानित किया जा रहा है। साथ ही पिछले 13 वर्षों से विश्व आयुर्वेद परिषद के सहयोग से अखिल भारतीय आयुर्वेद पीजी निबंध प्रतियोगिता आयोजित कर विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त विद्यार्थी को 21 हजार रुपये, द्वितीय स्थान प्राप्त विद्यार्थी को 11 हजार रुपये तथा तृतीय स्थान प्राप्त विद्यार्थी को 7 हजार रुपये की पुरस्कार राशि के साथ शॉल, श्रीफल एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान किए गए। समारोह की अध्यक्षता आरोग्य भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री अशोक वार्ष्णेय ने की। राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (एनसीआईएसएम), नई दिल्ली की अध्यक्ष वैद्य मनीषा उपेन्द्र कोठेकर, विधायक भगवानदास सबनानी तथा पूर्व मंत्री एवं भाई उद्धवदास न्यास के अध्यक्ष उमाशंकर गुप्ता उपस्थित रहे।  

योगी सरकार के प्रयासों से ग्रामीण जल गुणवत्ता जांच में तेजी, राष्ट्रीय स्तर पर यूपी को दूसरा स्थान मिला

गांवों में जल गुणवत्ता जांच में देश में दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश, योगी सरकार के प्रयासों से रफ्तार तेज फील्ड टेस्टिंग किट के जरिए की जा रही पानी की निगरानी, 97 हजार से अधिक गांवों में जल जांच का लक्ष्य योगी सरकार में ग्रामीण जल गुणवत्ता जांच अभियान को रफ्तार, 4.85 लाख महिलाओं को भी मिला रोजगार यूपी जल निगम ग्रामीण के लिए प्रदेश के गावों में 11.64 लाख जल गुणवत्ता जांच का है वार्षिक टारगेट लखनऊ  ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और लोगों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने की दिशा में योगी सरकार के प्रयासों को महत्वपूर्ण उपलब्धि मिली है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में गांवों में फील्ड टेस्टिंग किट (एफटीके) के माध्यम से जल गुणवत्ता की जांच के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। 27 अक्टूबर 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक 69.32 प्रतिशत उपलब्धि के साथ पहले स्थान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश ने 33.95 प्रतिशत उपलब्धि हासिल की है। तमिलनाडु 28.42 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर है। इसके साथ ही यूपी में एफटीके जांच के जरिए 4.85 लाख महिलाओं को रोजगार भी मिला है, जिससे वह आत्मनिर्भर बन रही हैं। विभाग के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 97,071 गांव हैं। इनमें जल गुणवत्ता जांच के लिए सालाना 11,64,852 जांच का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके सापेक्ष प्रदेश ने अब तक 33.95 प्रतिशत वार्षिक लक्ष्य हासिल किया है। यह राष्ट्रीय औसत 12.83 प्रतिशत से काफी अधिक है। इस तरह उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए जल गुणवत्ता परीक्षण के क्षेत्र में अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई है। 97 हजार से अधिक गांवों में जांच का लक्ष्य यूपी जल निगम ग्रामीण के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 97,071 गांवों के लिए वार्षिक रूप से 11,64,852 जल गुणवत्ता जांच का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 27 अक्टूबर तक उपलब्ध आंकड़ों में प्रदेश की वार्षिक लक्ष्य प्राप्ति 33.95 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह प्रक्रिया अभी आगे भी तेजी से जारी है। इस फील्ड टेस्टिंग किट के जरिए जल की जांच से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता का आकलन करने में मदद मिल रही है। इससे पानी की गुणवत्ता से जुड़ी संभावित समस्याओं की पहचान कर आगे आवश्यक कदम उठाने का आधार तैयार हो रहा है। जल गुणवत्ता जांच में पांच प्रमुख राज्यों में यूपी 27 अक्टूबर की राज्यवार रैंकिंग में कर्नाटक 69.32 प्रतिशत के साथ पहले, उत्तर प्रदेश 33.95 प्रतिशत के साथ दूसरे, तमिलनाडु 28.43 प्रतिशत के साथ तीसरे, आंध्र प्रदेश 24.39 प्रतिशत के साथ चौथे और असम 7.30 प्रतिशत के साथ पांचवें स्थान पर है। उत्तर प्रदेश की उपलब्धि राष्ट्रीय औसत से अधिक होने के साथ इन प्रमुख राज्यों की सूची में उसकी बेहतर स्थिति को भी दर्शाती है। 4.85 लाख महिलाओं को मिला रोजगार उत्तर प्रदेश में जल गुणवत्ता जांच को जनभागीदारी से जोड़ते हुए प्रत्येक राजस्व गांव में पांच महिलाओं को जिम्मेदारी दी गई है। प्रदेश की लगभग 4.85 लाख महिलाएं केंद्र सरकार के डब्ल्यूक्यूएमआईएस पोर्टल पर एफटीके आधारित जल परीक्षण के लिए पंजीकृत हैं। इससे महिलाओं को रोजगार के अवसर मिलने के साथ उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मजबूत हो रही है।

भूटान की शिंताफू झील पर वैज्ञानिकों की चेतावनी सच हुई, संकोश नदी में बाढ़ का खतरा

 नई दिल्ली भूटान में गासा जिले के लुंगो इलाके में वाकिला पर्वत के नीचे समुद्र तल से करीब 4480 मीटर की ऊंचाई पर शिंताफू झील (Sintaphu Tsho या Shintaphu Lake) है. यह मो छू (Mo Chu) नदी के ऊपरी हिस्से में बनी एक ग्लेशियल झील है. मो छू नीचे जाकर फो छू से मिलती है. पुनाखा के पास से पुनात्सांगछू बन जाती है।  भारत में पहुंचकर यही नदी संकोश के नाम से जानी जाती है. आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है. इसी वजह से भूटान में झील फटने का असर सीधे पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और असम के धुबरी जैसे इलाकों तक पहुंच सकता है. यह झील मोरेन (ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई मिट्टी-पत्थर की दीवार) से बंधी हुई है।  इसका क्षेत्रफल लगभग 2.38 लाख वर्ग मीटर और पानी की मात्रा करीब 62 लाख घन मीटर बताई जाती है. 2021 की स्टडी में इसे संभावित खतरनाक ग्लेशियल झील (Potentially Dangerous Glacial Lake) की श्रेणी में रखा गया था. भूटान की नेशनल सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी एंड मेटियोरोलॉजी (NCHM) ने भी इसे 17 संभावित खतरनाक झीलों में शामिल किया है।  2021 की स्टडी ने क्या चेतावनी दी थी 2021 में विल्फ्राइड हैग और उनके सहयोगियों ने Applied Sciences जर्नल में “Hazard Assessment for a Glacier Lake Outburst Flood in the Mo Chu River Basin, Bhutan” नाम की स्टडी प्रकाशित की. उन्होंने हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग के जरिए 9 अलग-अलग परिदृश्यों का सिमुलेशन किया. स्टडी में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं. नई झीलें बन रही हैं. पुरानी झीलें बड़ी हो रही हैं. इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की आशंका बढ़ रही है।  स्टडी के मुताबिक शिंताफू झील का आकार और ग्लेशियर से नजदीकी इसे खतरनाक बनाते हैं. मॉडलिंग से पता चला कि सबसे खराब स्थिति में भी आवासीय इमारतों को ज्यादा नुकसान नहीं होगा, लेकिन सड़कें, पुल, खेत और इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो सकते हैं. इससे 120 किलोमीटर से ज्यादा दूर स्थित जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन पर भी असर पड़ सकता है. सोलर प्लांट डैमेज हुआ।  स्टडी ने यह भी चेताया कि कम रिजोल्यूशन वाले ऊंचाई मॉडल से बाढ़ का अनुमान गलत हो सकता है, इसलिए हाई रिजोल्यूशन डेटा जरूरी है. यह स्टडी आज की घटना को समझने का आधार बन गया है क्योंकि उसी झील से पानी निकलने की खबर आई है. ग्लेशियल झील तब बनती है जब ग्लेशियर पीछे हटता है. गड्ढे में पिघला पानी जमा होता है. यह पानी अक्सर कमजोर मोरैन डैम से रोका जाता है।  जब भारी बारिश, बर्फ पिघलना, भूकंप, हिमस्खलन या अंदरूनी दबाव से डैम टूटता है तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर दौड़ पड़ता है. इसे GLOF कहते हैं. पानी की रफ्तार बहुत तेज होती है और यह मलबा, पेड़, पत्थर और मिट्टी साथ लेकर चलता है. हिमालय क्षेत्र में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. भूटान में पहले भी 1994 में लुग्गे त्सो झील फटने से 21 लोगों की मौत हो चुकी है. 2015 में भी एक घटना हुई थी।  शिंताफू झील के मामले में गुरुवार 29 अक्टूबर 2026 की शाम पानी निकलने की रिपोर्ट आई. पानी मो छू नदी के रास्ते नीचे की ओर बढ़ा. भूटान में कुछ जगहों पर सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, बेली ब्रिज गिरे और लाया क्षेत्र का संपर्क टूटा. गासा की हॉट स्प्रिंग्स भी प्रभावित हुईं. पानी की मात्रा कुछ रिपोर्टों में 74 लाख घन मीटर तक बताई गई, जो झील की मूल क्षमता के आसपास है।  भारत में अलर्ट और प्रशासन की तैयारियां भारत में सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) ने विशेष सलाह जारी की. पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में संकोश नदी के किनारे कुमारग्राम, पाकरीगुड़ी, भोल्का, चेंगमाड़ी और आसपास के चाय बागानों तथा वन गांवों में अलर्ट जारी किया गया. वन मंत्री मनोज कुमार उरांव ने लोगों से सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट होने की अपील की।  अलीपुरद्वार पुलिस अधीक्षक के अनुसार करीब 4 से 5 हजार लोग स्कूलों जैसे राहत शिविरों में पहुंचाए गए. छह हजार से ज्यादा लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गए. कुल मिलाकर दस हजार से ज्यादा लोगों को शिफ्ट किया गया. NDRF और SDRF की टीमें तैनात हैं. सिविल डिफेंस टीम भी सक्रिय है. प्रशासन भूटान अधिकारियों के संपर्क में है।  संकोश नदी सिस्टम पर रेड अलर्ट जारी है. असम के धुबरी और पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, कूचबिहार तथा दार्जिलिंग पहाड़ी इलाकों में भी सतर्कता बरती जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है, घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सावधानी जरूरी है. पानी के साथ मृत मछलियां, लकड़ी और मलबा आने की आशंका जताई गई है।  जलवायु परिवर्तन और हिमालय की बढ़ती चुनौती यह घटना सिर्फ एक झील की नहीं बल्कि पूरे हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र की समस्या को उजागर करती है. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. 1980 से 2018 के बीच दुनिया भर में ग्लेशियल झीलों की संख्या और क्षेत्रफल करीब 50 प्रतिशत बढ़ गया. भूटान में ग्लेशियर क्षेत्र 1980 से 2010 के बीच 23 प्रतिशत से ज्यादा घटा।  मो छू बेसिन में भी यही रुझान देखा गया. नई झीलें बन रही हैं. पुरानी बड़ी हो रही हैं. इससे GLOF का खतरा बढ़ रहा है. 2021 की स्टडी और NCHM के आकलन ने पहले ही चेताया था. वैज्ञानिक मॉडलिंग से पता चलता है कि बाढ़ का असर दूर तक पहुंच सकता है. जलविद्युत परियोजनाएं, खेती और गांव प्रभावित हो सकते हैं।   इसलिए नियमित निगरानी, हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और समुदाय आधारित तैयारियां जरूरी हैं. भारत और भूटान के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था इस बार काम आई, जिससे समय पर अलर्ट जारी हो सका और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सका।  शिंताफू झील की घटना हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रह गए हैं. नीचे मैदानों में भी असर पहुंच रहा है. 2021 की स्टडी में सुझाया गया था कि आपातकालीन कार्य योजनाएं तैयार रखी जाएं. अब जरूरत है कि ऐसी योजनाओं को अपडेट किया जाए, संवेदनशील क्षेत्रों में निकासी मार्ग साफ रखे जाएं और लोगों को जागरूक किया जाए।  अधिकारियों का फोकस अभी पानी के बहाव की निगरानी पर है. आने वाले घंटों में स्थिति और साफ होगी. … Read more

झारखंड में रांची के विकास की नई तैयारी, 258 गांवों को लेकर बनेगा संशोधित मास्टर प्लान

 रांची  राजधानी के अनियोजित विस्तार और भवन निर्माण से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए रांची मास्टर प्लान 2015-2037 में व्यापक बदलाव की तैयारी है। नगर विकास एवं आवास विभाग इस बार शहर के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को भी नियोजित विकास के दायरे में लाने की योजना बना रहा है। इसके तहत रांची क्षेत्रीय विकास प्राधिकार (आरआरडीए) के 12 से 15 किलोमीटर दायरे में छूटे हुए 148 गांवों को मास्टर प्लान में शामिल किया जाएगा। साथ ही जमीन के उपयोग (लैंड यूज) में बदलाव का विकल्प भी दिया जा सकता है। संशोधित मास्टर प्लान तैयार करने के लिए कंसल्टेंट एजेंसी के चयन की प्रक्रिया शुरू होगी। विभाग दिवाली से पहले इसके लिए निविदा जारी करने की तैयारी में है। वर्तमान मास्टर प्लान की सबसे बड़ी कमी यह है कि आरआरडीए क्षेत्र के सभी गांव इसमें शामिल नहीं हैं। आरआरडीए के अधीन कुल 258 गांव हैं, लेकिन 2015-2037 के मास्टर प्लान में केवल 110 गांवों को जगह मिली है। शेष 148 गांव नियोजित विकास की रूपरेखा से बाहर हैं। इनमें रांची रिंग रोड के आसपास तेजी से विकसित हो रहे गांव भी शामिल हैं। नतीजा यह है कि इन इलाकों में भवन निर्माण और नक्शा स्वीकृति की एक समान व्यवस्था नहीं है। कई जगहों पर नक्शे जिला परिषद से स्वीकृत कराए जाते हैं। इससे निर्माण कार्यों में नियोजन संबंधी स्पष्टता का अभाव रहता है। संशोधन के बाद इन गांवों को भी मास्टर प्लान में शामिल करने से आरआरडीए क्षेत्र में विकास और भवन निर्माण के लिए एकीकृत व्यवस्था बनाने का रास्ता खुलेगा। जमीन के उपयोग में बदलाव का रास्ता खुलेगा नए मास्टर प्लान में भूमि उपयोग की मौजूदा श्रेणियों को भी व्यावहारिक बनाने की तैयारी है। वर्तमान व्यवस्था में किसी भूखंड को आवासीय या व्यावसायिक श्रेणी में चिह्नित किए जाने के बाद उसका उपयोग बदलना आसान नहीं है। जबकि समय के साथ कई इलाकों का स्वरूप बदल चुका है। आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी हैं तो कई व्यावसायिक इलाकों में आवासीय जरूरतें भी विकसित हुई हैं। ऐसे में जमीन की स्थिति, आसपास के विकास, सड़क संपर्क और क्षेत्र की जरूरतों के आधार पर लैंड यूज बदलने का विकल्प देने पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत आवासीय जमीन को व्यावसायिक और व्यावसायिक जमीन को आवासीय उपयोग में बदलने का प्रावधान हो सकता है। इसके लिए निर्धारित मानक और स्वीकृति की प्रक्रिया तय की जाएगी। पुराने मास्टर प्लान की खामियां होंगी दूर मौजूदा मास्टर प्लान में प्रस्तावित सड़कों की चौड़ाई, राजस्व नक्शे, प्लाट संख्या और वास्तविक भौगोलिक स्थिति के बीच कई जगह विसंगतियां सामने आई हैं। कुछ भूखंडों पर प्रस्तावित सड़क के कारण भवन निर्माण में परेशानी होती है, वहीं नक्शों में दर्ज जलस्रोतों और वास्तविक स्थिति में अंतर की शिकायतें भी रही हैं। इन विसंगतियों के कारण जमीन मालिकों को नक्शा पास कराने और निर्माण की योजना बनाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। संशोधित मास्टर प्लान में इन व्यावहारिक समस्याओं को दूर कर जमीन के वास्तविक स्वरूप और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप नियोजन करने की चुनौती होगी। कंसल्टेंट एजेंसी के चयन के बाद विभाग विभिन्न स्टेकहोल्डरों, स्थानीय निकायों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विशेषज्ञों के साथ रायशुमारी करेगा। उनके सुझावों के आधार पर संशोधित मास्टर प्लान तैयार होगा। इस बार कोशिश होगी कि रांची के शहरी और ग्रामीण विस्तार, सड़क नेटवर्क, आवासीय एवं व्यावसायिक क्षेत्रों तथा आधारभूत सुविधाओं को एक ही विकास योजना में शामिल किया जाए।

सीएम योगी ने पूर्व राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा के निधन पर शोक जताया

सीएम योगी ने पूर्व राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा के निधन पर शोक जताया समाजसेवा व संगठन के प्रति श्री सिन्हा का योगदान भुलाया नहीं जा सकता: सीएम योगी मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मां के निधन पर भी जताया शोक लखनऊ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा के वरिष्ठ सदस्य एवं पूर्व राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा तथा केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मां के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है। समाजसेवा व संगठन के प्रति नहीं भुलाया जा सकता सिन्हा का योगदान उन्होंने कहा कि समाज सेवा और संगठन के प्रति श्री सिन्हा का अमूल्य योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। प्रभु श्रीराम दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों को यह अपार दुःख सहन करने की शक्ति दें। भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ के शुरुआती दौर के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे श्री सिन्हा ने शुक्रवार 30 अक्टूबर को 75 वर्ष की आयु में अपने नोएडा स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी माने जाते थे। वह साल 2014 से 2020 तक बिहार से राज्यसभा सदस्य रहे। शिवराज सिंह चौहान की मां के निधन पर भी जताया शोक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की पूज्य माता के निधन पर भी शोक जताया और उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्यमंत्री ने कहा कि मेरी संवेदनाएं शोक संतप्त परिजनों के साथ हैं। प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को सद्गति एवं शोकाकुल परिजनों को यह अथाह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति।

पीक ऑवर्स में जाम की वजह खोजेगी सरकार, दिल्ली की 1796 सड़कों की होगी डिजिटल स्टडी

नई दिल्ली दिल्ली में पीक ऑवर्स के दौरान लगने वाले जाम से राहत दिलाने के लिए पीडब्ल्यूडी और ट्रैफिक पुलिस सड़कों का डिजिटल सिमुलेशन मॉडल तैयार करेंगे। इसके जरिए हर सड़क के अलग-अलग स्ट्रेच पर ट्रैफिक की स्थिति की वर्चुअल स्टडी कर जाम की वजहें पहचानी जाएंगी। योजना के तहत दिल्ली की 2205.68 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़कों पर गाड़ियों की संख्या, टर्निंग मूवमेंट, पीक ऑवर में रफ्तार और पैदल यात्रियों की आवाजाही से जुड़ा डेटा जुटाया जाएगा। इस परियोजना पर 11.17 करोड़ रुपये खर्च होंगे और तीन महीने में स्टडी पूरी करने का टारगेट है। 11.17 करोड़ होंगे खर्च, तीन महीने में पूरी करनी होगी स्टडी पीडब्ल्यूडी अधिकारियों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में उन सड़कों पर भी जाम लगने लगा है, जहां पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। सड़क हादसों में बढ़ोतरी को देखते हुए हर स्ट्रेच का वैज्ञानिक अध्ययन करने का फैसला लिया गया है। जुटाए गए डेटा को स्पेशल सॉफ्टवेयर में डालकर डिजिटल मॉडल बनाया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, साउथ जोन की 270 सड़कों की कुल लंबाई 426.28 किलोमीटर है। नॉर्थ जोन में 1,137 सड़कें हैं, जिनकी लंबाई 1,374.76 किलोमीटर है। वहीं, ईस्ट जोन की 389 सड़कों की कुल लंबाई 404.64 किलोमीटर है। तीनों जोन की कुल 1,796 सड़कों की लंबाई 2,205.68 किलोमीटर है।