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कोमा में मोजतबा खामेनेई: युद्ध और सीजफायर से बेखबर, लोकेशन के बारे में चौंकाने वाली जानकारी

तेहरान   ब्रिटेन के अखबार द टाइम्स ने एक महत्वपूर्ण खुलासा किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मोजतबा खामेनेई अचेत हैं और गंभीर हालत में उनका इलाज कराया जा रहा है. पहले भी ये खबरें आई थीं कि वे उसी अमेरिका-इजरायल एयर स्ट्राइक में घायल हुए थे, जिसमें उनके पिता और ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई थी. एक डिप्लोमैटिक मेमो में ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के बरे में ये जानकारी दी गई है. यह मेमो अमेरिकी और इजरायली खुफिया एजेंसियों पर आधारित है. इसे खाड़ी देशों के सहयोगी देशों के साथ साझा किया गया है।  द टाइम्स की खबर के मुताबिक मोजतबा खामेनी फिलहाल अचेत अवस्था में हैं और गंभीर हालत में उनका इलाज कराया जा रहा है. उनकी लोकेशन के बारे में बताते हुए कहा गया है कि उनका इलाज ईरान की राजधानी तेहरान से करीब 140 किलोमीटर दक्षिण में स्थित कोम शहर में चल रहा है. पहले कहा जा रहा था कि उन्हें युद्ध के बीच रूस ले जाया गया है और मॉस्को में उनका इलाज किया जा रहा है. हालांकि बाद में रूस के राजदूत ने बताया था कि वे ईरान के अंदर ही हैं और अब ब्रिटिश अखबार द टाइम् ने भी इसकी पुष्टि की है।  कैसे अमेरिकी हमले से बचे मोजतबा खामेनेई? ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों से इसलिए बच गए, क्योंकि मिसाइलों से उनके घर पर हमला होने से कुछ मिनट पहले ही वह अपने बगीचे में टहलने के लिए बाहर निकल गए थे. जिस अमेरिकी-इजरायली अटैक में उनके पिता अली खामेनेई और अन्य परिवार को मारा गया, उसी में मोजतबा खामेनेई को भी टारगेट किया गया था. हालांकि उसी वक्त बाहर निकलने की वजह से वह मिसाइल अटैक में सेंकेड के अंतर से बाल-बाल बच गए. ‘द टेलीग्राफ’ को मिले एक लीक ऑडियो से पता चलता है कि 28 फरवरी को स्थानीय समयानुसार सुबह 9:32 बजे जब इजरायली ‘ब्लू स्पैरो’ बैलिस्टिक मिसाइलों ने उनके आवास पर हमला किया, उससे कुछ ही पल पहले वह ‘कुछ काम से’ बाहर चले गए थे।  अब शासन करने के काबिल नहीं मोजतबा     मोजतबा खामेनेई को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार दावा किया कि वो या तो अमेरिकी हमलों में मारे जा चुके हैं या फिर बेहद जख्मी हालत में हैं. उन्होंने ये भी कहा कि वो सार्वजनिक तौर पर दिखते नहीं, जिसकी वजह से ये संदेह और गहरा हो जाता है।      मोजतबा खामेनेई को युद्ध की शुरुआत में ही ईरान का सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया गया था लेकिन वे कभी दिखाई नहीं दिए. उनके संदेश में कभी-कभी आते हैं और ज्यादातर मामलों में ईरान की सैन्य इकाई आईआरजीसी ही बयान देती है।      मोजतबा खामेनेई का आखिर संदेश सोमवार को डोनाल्ड ट्रंप के होर्मुज खोलने और सीजफायर के बयान के बाद आया था. इस संदेश में कहा गया था कि ईरान झुकेगा नहीं और सेनाएं अमेरिका पर पलटवार करेंगी।      अब द टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि मोजतबा खामेनेई के संदेश भी उनके नहीं हैं क्योंकि वे अचेत अवस्था में हैं और शासन करने के काबिल नहीं बचे हैं. जिस मेमो का जिक्र अखबार में किया गया है, वो इजरायल और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों की जानकारी पर आधारित है. इसमें ये भी बताया गया है, कि मोजतबा खामेनेई किसी भी फैसले या युद्ध संचालन में शामिल होने की स्थिति में नहीं हैं. ईरान की ओर से अब तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।   

ईरान पर तेज हुए हमले: ट्रंप की डेडलाइन से पहले ही पुलों पर स्ट्राइक, जानें अब तक कहां-कहां बरपा कहर

ईरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी यानी डेडलाइन आज मंगलवार रात आठ बजे समाप्त होने वाली है लेकिन उससे पहले ही अमेरिकी और इजरायली फौजों ने ईरान के रेलवे स्टेशनों और पुलों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इजरायली सुरक्षा बलों (IDF) ने कहा है कि उसने ईरान पर एक साथ कई जगहों पर हमले किए हैं। IDF के मुताबिक, ईरान के कोम शहर में कोम ब्रिज पर हमला किया गया है। इसके अलावा याह्याबाद रेलवे ब्रिज पर भी हमले किए गए हैं। ईरान के शहरियार में नागरिक ठिकानों पर भी हमले हुए हैं। इजरायल के इन हमलों में दो की मौत हुई है, जबकि तीन लोग घायल हुए हैं। IDF ने कहा है कि उसने ईरान के काशान रेलवे ब्रिज को भी उड़ा दिया है। इसके अलावा कजविन में भी रेलवे पुल पर हमला कर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया है। हमलों को देखते हुए ईरानी सरकार ने मशहद रेलवे स्टेशन बंद कर दिया है। दूसरी तरफ, मेहर न्यूज की रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के ऑयल हब खार्ग द्वीप पर भी ताबड़तोड़ हवाई हमले किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, खार्ग पर एक के बाद एक हमले किए जा रहे हैं।   ईरान ने UAE पर मिसाइल दागे इन हमलों के जवाब में ईरान ने UAE पर मिसाइल दागे हैं। ईरान के सरकारी मीडिया ने रिवोल्यूशनरी गार्ड के एक बयान की रिपोर्ट दी है, जिसमें कहा गया है कि अगर US ने आम नागरिकों से जुड़ी जगहों पर हमला किया, तो वे भी वैसा ही जवाब देने में जरा भी नहीं हिचकिचाएँगे। इजरायली हमलों के जवाब में ईरान ने भी सेट्रल इजरायल पर रॉकेटों की बौछार की है। इससे पेटाह टिकवा में एक इमारत ढह गई। इसके अलावा गिवत शमुएल में भी नागरिक ठिकानों को नुकसान पहुंचने की खबरें मिली हैं। ट्रंप की डेडलाइन हो रही खत्म बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को धमकी दी है कि यदि मंगलवार रात आठ बजे तक होर्मुज समुद्री मार्ग को नहीं खोला जाता है, तो ईरान को भारी बमबारी और भीषण हमलों का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप ने धमकी दी है कि यदि ईरान समय सीमा से पहले समुद्री परिवहन के लिए होर्मुज नहीं खोलता है, या कोई 'स्वीकार्य' समझौता नहीं करता है, तो वह 'एक ही रात में' उसे खत्म कर देंगे।  

आंध्र प्रदेश की स्थाई राजधानी बनी अमरावती, राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद CM चंद्रबाबू नायडू का ऐलान

अमरावती  आंध्र प्रदेश के विकास और पहचान के लिए आज का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। वहां के सीएम एन. चंद्रबाबू नायडू ने मंगलवार को अमरावती को राज्य की एकमात्र स्थाई राजधानी की बनाया है। यह घोषणा 'आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) अधिनियम, 2026' को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिलने के बाद की गई है। जानकारी के लिए बता दें कि पहले हैदराबाद, प्रदेश की राजधानी थी।   संसद से राष्ट्रपति तक का सफर हाल ही में संपन्न हुए संसद के बजट सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने 'आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम संशोधन विधेयक 2026' पेश किया था। इस विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में भारी बहुमत से पारित किया गया। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अब अमरावती को राजधानी के रूप में कानूनी और संवैधानिक वैधता प्राप्त हो गई है। सीएम नायडू ने जताया आभार मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी खुशी साझा करते हुए लिखा "आंध्र प्रदेश की जनता की ओर से, मैं माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। उनकी मंजूरी से हमारी राजधानी का बरसों पुराना सपना आज हकीकत बन गया है।" उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और विधेयक का समर्थन करने वाले सभी सांसदों को धन्यवाद दिया। नायडू ने विशेष रूप से उन किसानों को इस जीत का श्रेय दिया, जिन्होंने राजधानी के निर्माण के लिए अपनी जमीनें दी थीं। 'तीन राजधानी' का विवाद खत्म पिछली सरकार के दौरान आंध्र प्रदेश में तीन राजधानियों (विशाखापत्तनम, अमरावती और कुरनूल) का प्रस्ताव लाया गया था, जिससे राज्य में प्रशासनिक असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। नायडू के नेतृत्व वाली TDP-NDA सरकार ने अब यह साफ कर दिया है कि राज्य का पूर्ण प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक केंद्र केवल अमरावती ही होगा। अमरावती को अब एक अत्याधुनिक 'सिंगापुर मॉडल' शहर के रूप में विकसित करने की तैयारी है, जो राज्य के समग्र विकास और निवेश का मुख्य केंद्र बनेगा। 

मणिपुर: कुकी उग्रवादियों के हमले में मां के साथ सो रहे दो बच्चों की दर्दनाक मौत

बिष्णुपुर  हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर में उग्रवादी संगठन भी सक्रिय हो गए हैं. हिंसाग्रस्त सूबे में उग्रवादी हमले की नई घटना सामने आई है. इस घटना में दो छोटे बच्चों की मौत हो गई है और इन बच्चों की मां घायल हो गई है. घायल महिला को उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उपचार चल रहा है. घटना बिष्णुपुर जिले की है।  जानकारी के मुताबिक बिष्णुपुर जिले में कुकी उग्रवादियों ने 6 और 7 अप्रैल की रात करीब एक बजे एक घर पर बम से हमला कर दिया. इस हमले में पांच साल के एक बच्चे और छह माह की एक बच्ची की जान चली गई. इन बच्चों की मां घायल बताई जा रही है. जिस समय बम हमला हुआ, महिला अपने दोनों बच्चों के साथ घर में सो रही थी।  तीनों नींद में ही थे कि घर पर गिरा बम फट गया. आनन-फानन में तीनों को अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया. घटना बिष्णुपुर जिले के मोइरांग त्रोंग्लाओबी गांव की बताई जा रही है. यह गांव चूराचांदपुर के पास स्थित है. मणिपुर हिंसा के समय से ही यह सीमावर्ती इलाका कुकी उग्रवादियों के निशाने पर रहा है।  मोइरांग त्रोंग्लाओबी गांव में गोलीबारी की घटनाएं लगातार होती आई हैं. इस इलाके से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के विधायक टीएच शांति सिंह ने त्रोंग्लाओबी में हुए उग्रवादी हमले की निंदा की है. उन्होंने दावा किया कि हमला कुकी नार्को आतंकियों ने किया है. विधायक ने कहा कि यह जघन्य घटना आतंकी कृत्य है. ऐसी घटनाओं के लिए समाज में कोई जगह नहीं है।  जेपी विधायक ने घटना की कड़ी निंदा की और मृत बच्चों को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की. उन्होंने कहा है कि इस असहनीय दुख की घड़ी में मेरी संवेदनाएं शोकाकुल परिवार के साथ हैं। 

पहली बार EC ने बंगाल के 90 लाख से ज्यादा वोटरों का जिलेवार डेटा जारी किया

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच वोटर लिस्ट को लेकर नया अपडेट आ गया है। चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर बड़ा और अहम डेटा जारी किया है। इस बार खास बात यह रही कि आयोग ने पहली बार जिलावार तरीके से नाम जोड़ने और हटाने की पूरी जानकारी सार्वजनिक की है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी बड़ी और जटिल दिखती है। आयोग के मुताबिक, अब तक कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह बड़ा डेटा माना जा रहा है। अबतक 90.66 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए  चुनाव आयोग ने पहली बार जिलेवार तरीके से नाम जोड़ने और हटाने की भी जानकारी शेयर की है. आयोग के अनुसार पश्चिम बंगाल में एसआईआर की इस प्रक्रिया में अब तक कुल 90.66 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. पहले चरण में दिसंबर 2025 में ड्राफ्ट लिस्ट के दौरान 58.2 लाख नाम हटाए गए थे, जबकि फरवरी 2026 की अंतिम सूची तक 5.46 लाख अतिरिक्त नाम हटाए गए हैं।  चुनाव आयोग के मुताबिक लॉजिकल विसंगति यानी डेटा में तकनीकी गड़बड़ियों के आधार पर 60 लाख से ज्यादा वोटरों को जांच के दायरे में रखा गया था. इन मामलों को अंडर एडजुडिकेशन की कैटेगरी में रखा गया था ताकि अधिकारी गहराई से इनकी जांच कर सकें. आयोग के मुताबिक, अब तक लगभग 59.84 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है. इस जांच के बाद करीब 32.68 लाख पात्र लोगों के नाम दोबारा जोड़े गए हैं, जबकि अपात्र मिले 27.16 लाख लोगों के नाम काटे गए।  ECI के इतिहास में पहली बार हुआ ये काम इलेक्शन कमीशन के इतिहास में ये पहली बार है जब पश्चिम बंगाल को लेकर एसआईआर के संबंध में जिलेवार नाम जोड़ने और हटाने का डेटा सार्वजनिक किया गया है. आयोग का मकसद पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और चुनावी सूचियों की विश्वसनीयता को बढ़ाना है. बता दें कि ये डेटा अब सार्वजनिक तौर पर भी उपलब्ध है।  न्यायिक अधिकारियों के ई-हस्ताक्षर होते ही जारी होंगे आंकड़े जबकि पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक निर्णय के लिए भेजे गए कुल 60,06,675 मामलों में से 59,84,512 मामलों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जिन पर न्यायिक अधिकारियों के ई-हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। इसके अलावा, 59,84,512 मामलों में से, जिन मतदाताओं को न्यायिक अधिकारियों द्वारा हटाए जाने योग्य माना गया है। उनके नामों को हटा दिया गया है। उनकी संख्या 27,16,393 है। 91 लाख वोटरों के कट जाएंगे नाम इसका मतलब यह है कि पश्चिम बंगाल में हटाए गए मतदाताओं की कुल संख्या वर्तमान में 90,83,345 है। मालूम हो कि पिछले साल नवंबर में पश्चिम बंगाल के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की अधिसूचना जारी होने से पहले, राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या 7,66,37,529 थी। पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित मतदाताओं की मसौदा सूची में, कुल 58,20,899 नाम हटाए गए थे। 28 फरवरी को जारी की गई अंतिम वोटर लिस्ट में, हटाए गए नामों की संख्या बढ़कर 63,66,952 हो गई। अब, न्यायिक अधिकारियों ने 27,16,393 मामलों को हटाने लायक पाया है। इसके बाद, पूरे SIR प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल में हटाए गए वोटरों की कुल संख्या बढ़कर 90,83,345 हो गई है। इसके अलावा CEO कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि जिन वोटरों के नाम न्यायिक जांच प्रक्रिया में "हटाने लायक" पाए गए हैं। उन्हें अपनी बात रखने का और अपील करने का एक अवसर मिलेगा। वहीं, विपक्षी दल (खासकर तृणमूल कांग्रेस) इस बड़े पैमाने पर नाम हटाने को वोटरों को बाहर करने की साजिश बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि अल्पसंख्यक और सीमावर्ती इलाकों पर ज्यादा असर पड़ा है. वहीं, बीजेपी और चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने का जरूरी कदम बता रहे हैं।  दो चरणों में मतदान पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों- 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है. ऐसे में इस SIR प्रक्रिया और नाम हटाने के आंकड़ों पर सियासी घमासान तेज हो गया है।  एक बार अपील करने का मिलेगा मौका CEO कार्यालय से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक जांच अभ्यास के दौरान "हटाने लायक" पाए गए मामलों की सबसे अधिक संख्या अल्पसंख्यक-बहुल मुर्शिदाबाद जिले से थी। मुर्शिदाबाद से हटाए गए नामों की कुल संख्या 4,55,137 है। इसके बाद उत्तर 24 परगना का नंबर आता है। जहां 3,25,666 नाम हटाए गए। बता दे कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगे। पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होगा और दूसरे चरण में बाकी 142 सीटों पर मतदान होगा। इसके बाद चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर डेटा जारी बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट आज मंगलवार तक हर हाल में पब्लिश करने के आदेश दिए थे. साथ ही यह भी कहा था कि अगर सभी दस्तावेजों पर डिजिटल साइन नहीं भी हुए तो भी लिस्ट निकाली जाए. इसके अलावा कलकत्ता हाईकोर्ट को 3 पूर्व जजों की एक कमेटी बनाने के आदेश दिए. वोटर लिस्ट पब्लिश करने की आखिरी तारीख सोमवार थी, लेकिन काम न पूरा होने के चलते संभव नहीं सका. लिहाजा आज मंगलवार को चुनाव आयोग ने डेटा जारी किया है। 

वाईफाई राउटर से हो सकती है हैकिंग और जासूसी, घर में इन गलतियों से बचें

  नई दिल्ली भारत सरकार ने हाल ही में चीनी CCTV कैमरों को लेकर सख्त कदम उठाया है और STQC सर्टिफिकेशन मैंडेटरी कर दिया है. इसका असर मोस्टली चीनी सीसीसीटीवी कैमरा कंपनियों पर पड़ा. इनमे Dahua और Hikvision हैं. साथ ही TP-Link के कैमरों पर भी शिकंज कसा जा सकता है. लेकिन इसी बहस के बीच एक और बड़ा खतरा चुपचाप हमारे घरों में मौजूद है, जिस पर अभी तक उतना ध्यान नहीं गया है. WiFi राउटर।  वाईफाई राउटर की सिक्योरिटी पर सवाल आज भारत में करोड़ों घरों में इंटरनेट कनेक्शन है. हर घर में एक राउटर है, जो सिर्फ इंटरनेट नहीं देता, बल्कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम का गेटवे होता है. आपके फोन से लेकर लैपटॉप, बैंकिंग ऐप से लेकर स्मार्ट टीवी और CCTV तक. सब कुछ इसी एक डिवाइस से होकर गुजरता है. ऐसे में अगर यही डिवाइस कमजोर हो, तो पूरा सिस्टम खुला हुआ दरवाजा बन जाता है।  अमेरिका ने बाहर के राउटर को अमेरिका में बैन किया इंटरनेशनल लेवल पर भी राउटर को लेकर खतरा तेजी से बढ़ा है. अमेरिका में हाल ही में फेडरल कम्युनिकेशन कमिशन (FCC) ने विदेशी इलेक्ट्रोनिक्स, खासकर चीन में बने नेटवर्क डिवाइसेज़ को लेकर चिंता जताई है. FCC ने बार बने हुए राउटर्स पर रोक लगाने का भी फैसला किया है।  रिपोर्ट्स में बताया गया कि मलेशियस एक्टर्स राउटर्स में मौजूद सिक्योरिटी गैप का फायदा उठाकर पूरे नेटवर्क को एक्सेस कर लेते हैं. यह सिर्फ डेटा चोरी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बड़े स्तर पर नेटवर्क डिसरप्शन और जासूसी तक पहुंच जाता है।  पिछले कुछ सालों में Volt Typhoon और Flax Typhoon जैसे साइबर ऑपरेशंस में राउटर और नेटवर्क डिवाइसेज़ को टारगेट किया गया, जिससे यह साफ हो गया कि अब युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि नेटवर्क पर भी लड़ा जा रहा है।  भारत में चीनी राउटर्स की भरमार भारत में समस्या और भी बड़ी है. यहां ज्यादातर लोग सस्ते और बजट राउटर खरीदते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या चीन या चीनी सप्लाई चेन से जुड़े ब्रांड्स की होती है।  इन डिवाइसेज़ में अक्सर सिक्योरिटी अपडेट्स समय पर नहीं मिलते, और कई बार फर्मवेयर में ही कमजोरियां होती हैं. यूज़र को इस बारे में जानकारी तक नहीं होती।  लोगों में राउटर सिक्योरिटी अवेयरनेस की कमी इससे भी बड़ी बात यह है कि इन राउटर्स को इंस्टॉल करने वाले टेक्निशियन ही कई बार डिफॉल्ट यूज़रनेम और पासवर्ड सेट करके छोड़ देते हैं. और वही क्रेडेंशियल्स उनके पास भी रहते हैं. यानी आपके घर का इंटरनेट सिर्फ आपका नहीं होता, बल्कि किसी तीसरे व्यक्ति के पास भी उसकी चाबी हो सकती है।  भारत में आम यूज़र राउटर की सेटिंग्स तक पहुंचना भी नहीं जानता. IP एड्रेस क्या होता है, एडमिन पैनल कैसे खुलता है, फर्मवेयर अपडेट कैसे किया जाता है. ये सब चीजें ज्यादातर लोगों के लिए तकनीकी और जटिल लगती हैं।  नतीजा यह होता है कि सालों तक एक ही पासवर्ड चलता रहता है, और सिक्योरिटी सेटिंग्स कभी बदली ही नहीं जातीं. लोगों को अक्सर ये लगता है कि अगर उनका वाईफाई कोई यूज कर भी ले तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता।  लेकिन यहां प्रॉब्लम ये है कि अगर कोई आपका वाईफाई ऐक्सेस कर सकता है तो मुमकिन है आपके राउटर का कंट्रोल पैनल भी ओपन कर सकता है. अगर इसका ऐक्सेस मिल गया तो समझिए की वो आपको ब्लैकमेल आसानी से कर सकता है और नेटवर्क से जुड़े दूसरे डिवाइसेज को भी नुकसान पहुंचा चा सकता है या हैक कर सकता है।  हैकर्स के लिए सॉफ्ट टार्गेट होते हैं वाईफाई राउटर्स हैकर्स के लिए ऐसे राउटर सोने की खान होते हैं. वे इंटरनेट पर ऐसे डिवाइसेज़ को स्कैन करते हैं जिनमें डिफॉल्ट क्रेडेंशियल्स होते हैं या जिनका फर्मवेयर आउटडेटेड होता है।  एक बार एक्सेस मिलते ही वे राउटर को अपने कंट्रोल में लेकर उसे बॉटनेट का हिस्सा बना सकते हैं. इसका इस्तेमाल बड़े साइबर अटैक में किया जाता है. जैसे DDoS अटैक, जहां लाखों डिवाइसेज़ एक साथ किसी सर्वर पर ट्रैफिक भेजते हैं।  दरअसल 2016 में सामने आया Mirai बॉटनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण था, जिसमें दुनिया भर के लाखों IoT डिवाइसेज़ और राउटर हैक करके बड़े पैमाने पर इंटरनेट सर्विसेज ठप कर दी गई थीं।  उसके बाद से ऐसे हमले और ज्यादा एडवांस हो गए हैं. अब अटैकर्स सिर्फ ट्रैफिक जाम नहीं करते, बल्कि लंबे समय तक नेटवर्क के अंदर छिपे रहते हैं और डेटा चुराते रहते हैं।  यूजर को मिलना चाहिए राउटर का पूरा कंट्रोल भारत के कॉन्टेक्स्ट में एक और गंभीर पहलू सामने आता है. यहां ISP (इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर) द्वारा दिए जाने वाले राउटर अक्सर कस्टम फर्मवेयर पर चलते हैं, जिनमें यूज़र को पूरा कंट्रोल नहीं मिलता।  कई बार रिमोट एक्सेस फीचर ऑन रहता है, जिससे कंपनी या टेक्नीशियन दूर से भी राउटर में लॉगिन कर सकते हैं. अगर यही एक्सेस गलत हाथों में चला जाए, तो यह एक बड़ा बैकडोर बन सकता है।  हाल के सालों में साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स ने यह भी पाया है कि कई राउटर में हार्डकोडेड क्रेडेंशियल्स होते हैं, जिन्हें बदला ही नहीं जा सकता. यानी भले ही यूज़र अपना पासवर्ड बदल दे, लेकिन डिवाइस के अंदर एक मास्टर एक्सेस पहले से मौजूद रहता है. यही वजह है कि कई देश अब टेलीकॉम और नेटवर्क उपकरणों के लिए सख्त टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन लागू कर रहे हैं।  आपका वाईफाई राउटर हैक हो गया तो क्या होगा? अगर राउटर कम्प्रोमाइज हो गया, तो हैकर आपके नेटवर्क के अंदर मौजूद हर डिवाइस को मॉनिटर कर सकता है. कौन सी वेबसाइट खुल रही है, कौन सा डेटा ट्रांसफर हो रहा है, यहां तक कि बैंकिंग डिटेल्स तक लीक हो सकती हैं. कई मामलों में DNS सेटिंग्स बदलकर यूज़र को फेक वेबसाइट पर रीडायरेक्ट किया जाता है, जहां से सीधे फ्रॉड होता है।  सिर्फ इतना ही नहीं, कई बार राउटर का इस्तेमाल जासूसी के लिए भी किया जा सकता है. अगर किसी घर या ऑफिस का नेटवर्क टारगेट हो जाए, तो बिना किसी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किए पूरे डेटा ट्रैफिक को इंटरसेप्ट किया जा सकता है. यह तरीका पारंपरिक हैकिंग से ज्यादा खतरनाक माना जाता है, क्योंकि यूज़र को इसका पता तक नहीं चलता।  नेशनल सिक्योरिटी के लिए भी अहम है सेफ राउटर यह खतरा सिर्फ … Read more

PMJAY के पैनल से 300 कैंसर विशेषज्ञ बाहर, मरीजों के लिए क्या होगा असर?

नई दिल्ली देश भर में हर साल करीब 15 लाख कैंसर के मामले सामने आते हैं। यह संख्या किसी टू या थ्री टियर सिटी की कुल आबादी के जितनी है। भारत में कैंसर एक बड़े स्वास्थ्य संकट के तौर पर सामने आ रहा है। इस बीच कई राज्यों में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की सूची से सैकड़ों कैंसर स्पेशलिस्ट्स को ही बाहर कर दिया गया है। इससे देश में एक संकट पैदा हो सकता है और आम लोगों को कैंसर के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का भी सामना करना पड़ सकता है। अब सवाल यह है कि ऐसा फैसला क्यों लिया गया है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इन डॉक्टरों के पास पर्याप्त अनुभव और ट्रेनिंग तो है, लेकिन उनके पास नेशनल मेडिकल कमिशन से मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं है। इन डिग्रियों में एमडी की डिग्री भी शामिल है। पैनल से हटाए गए डॉक्टरों को इस आधार पर बाहर किया गया है कि उन्होंने फेलोशिप लेकर प्राइवेट सेक्टर से प्रशिक्षण लिया है। इस पर डॉक्टरों का कहना है कि यह फैसला गलत है। उन्होंने कहा कि कुछ दशक पहले तक ऑन्कोलॉजी के लिए फेलोशिप ही एक तरीका होती थी। तब कोई औपचारिक कोर्स नहीं होते थे। यही नहीं आज भी डिग्रियां लेने के बाद इस बात को प्राथमिकता दी जाती है कि पोस्टग्रैजुएशन के बाद डॉक्टर किसी कैंसर अस्पताल में दो से तीन साल फेलोशिप पर काम करें। इस दौरान वे सर्जरी आदि के बारे में जानते हैं और उनकी पर्याप्त ट्रेनिंग होती है। यह फैसला खासतौर पर ऐसे लोगों की परेशानी बढ़ा देगा, जो इलाज के लिए केंद्र सरकार की जन आरोग्य योजना के तहत बनने वाले आयुष्मान कार्ड पर निर्भर हैं। इस प्रकार कमजोर तबके के लोगों को ही करारा झटका लगेगा। बता दें कि भारत में पहले ही कैंसर के डॉक्टरों की कमी है। 2018 के एक अनुमान के मुताबिक देश में 10 लाख की आबादी पर एक कैंसर डॉक्टर है। पैनल से बाहर होने वालों में कई नामी डॉक्टर भी शामिल टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक PM जन आरोग्य योजना के पैनल से जिन डॉक्टरों को बाहर किया गया है, उनमें कई नामी चिकित्सक भी हैं। कई तो कैंसर से जुड़े विभागों के हेड हैं। इसके अलावा कुछ डॉक्टर तो मेडिकल डायरेक्टर, टीचर और सीनियर सर्जन आदि भी हैं। देश भर में करीब 300 ऐसे डॉक्टरों के पैनल से हटने की बात सामने आ रही है। देश में कुल 4000 ही कैंसर डॉक्टर और 300 बाहर देश भर में कुल 4000 कैंसर डॉक्टर हैं और यदि उनमें से तीन को पीएम जन आरोग्य योजना के पैनल से ही बाहर कर दिया गया है तो यह बड़ा झटका है। इस फैसले से खासतौर पर टियर-टू और थ्री शहरों में मरीजों को बड़ा नुकसान होगा। यहां विकल्पों की पहले ही कमी रहती है और डॉक्टरों के एक वर्ग को पैनल से बाहर कर देने के बाद समस्या और बढ़ जाएगी।

‘Stella Juva’ – दुनिया की पहली सोलर एंबुलेंस, पेट्रोल और बिजली के बिना चलेगी

 नई दिल्ली कई बार जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक एंबुलेंस का फासला होता है. दूर-दराज के इलाकों में पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रिसिटी सहित तमाम संसाधनों की कमी इस मुश्किल को और भी बढ़ा देती है. सोचिए… एक ऐसी एंबुलेंस जो बिना तेल, बिना बिजली के और बिना किसी एक्सटर्नल सपोर्ट सिस्टम के सिर्फ सूरज की रोशनी से चलती हो. और इतना ही नहीं, उसी रोशनी से मिलने वाले एनर्जी से एंबुलेंस के अंदर मरीज का इलाज भी होता हो. यह साइंस-फिक्शन कहानी की कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत बनने जा रही एक नई तकनीक है. इसका नाम है 'स्टेला जुवा' (Stella Juva), जो आने वाले समय में मेडिकल साइंस की दुनिया ही बदल सकती है।  हम सभी जानते हैं कि, समय रहते इलाज न मिल पाने के कारण कई लोगों की मौत हो जाती है. इसमें एक बड़ा कारण सही समय पर मरीज तक एंबुलेंस का न पहुंच पाना भी है. नीदरलैंड के एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने इसी सवाल का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की. उन्होंने सोचा कि दुनिया के उन हिस्सों में जहां सड़क तो है, लेकिन बिजली और अस्पताल नहीं हैं, वहां मरीजों तक इलाज कैसे पहुंचाया जाए. इसी सोच से जन्म हुआ एक ऐसी एंबुलेंस का, जो खुद ही अपनी एनर्जी पैदा करे और हर हाल में मरीज तक पहुंचे।  उन्होंने दिन-रात मेहनत करके एक ऐसी गाड़ी तैयार की, जो पूरी तरह सौर उर्जा पर चलती है. इस गाड़ी का नाम रखा गया 'स्टेला जुवा'. यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि चलता-फिरता छोटा सा अस्पताल है. इस सपने को हकीकत बनाने में एक बड़ी सौर ऊर्जा कंपनी ने भी साथ दिया. इस कंपनी ने ऐसे खास सौर पैनल दिए, जो सामान्य पैनलों से कहीं ज्यादा पावरफुल और सस्टेनेबल हैं. इन पैनलों को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वे सूरज की रोशनी का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा ऑब्जर्व करते हैं।  क्या है स्टेला जुवा? स्टेला जुवा को नीदरलैंड की आइंडहोवेन यूनिर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों ने तैयार किया है. यह एंबुलेंस पूरी तरह सोलर एनर्जी पर चलेगी और इसके अंदर लगे मेडिकल डिवाइसेज भी उसी से चलेंगे. इस प्रोजेक्ट को जुलाई 2026 तक सड़क पर उतारने की योजना है. इसका मकसद ऐसे इलाकों में इलाज पहुंचाना है जहां बिजली या फ्यूल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।  इस प्रोजेक्ट में दुनिया की मशहूर सोलर पैनल बनाने वाली कंपनी AIKO ने सोलर टीम आइंडहोवेन के साथ मिलकर काम किया है. AIKO अपने हाई एफिशिएंसी ABC यानी ऑल ब्लैक कॉन्टैक्ट सोलर सेल्स के लिए जानी जाती है, जिसका इस्तेमाल इस एंबुलेंस में भी किया जा रहा है. ये नई सोलर तकनीक ही इस एंबुलेंस की सबसे बड़ी ताकत है. इसमें सोलर सेल्स का डिजाइन ऐसा है कि ज्यादा से ज्यादा धूप को आब्जर्व कर सके. इसमें फ्रंट साइड पर कोई मेटल नहीं होता, जिससे रोशनी ज्यादा मिलती है।  इन पैनल्स में सिल्वर का इस्तेमाल नहीं किया गया है, जिससे सेल्स ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले बनते हैं. इसके अलावा, यह तकनीक अलग-अलग मौसम और तापमान में भी अच्छी परफॉर्मेंस देती है. यानी गर्मी, ठंड या मुश्किल हालात में भी एंबुलेंस ठीक से काम करेगी. स्टेला जुवा एक मूविंग पावर सप्लाई की तरह भी काम करती है. जहां बिजली नहीं है, वहां भी यह मेडिकल डिवाइसेज चला सकती है. इसका मतलब है कि अब दूर-दराज के गांवों और मुश्किल इलाकों में भी समय पर इलाज पहुंचाया जा सकता है।  यह प्रोजेक्ट क्लीन एनर्जी, बेहतर ट्रांसपोर्ट और हेल्थकेयर को एक साथ जोड़ता है. आइंडहोवेन सोलर टीम पहले भी कई बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स बना चुकी है. इस टीम ने वर्ल्ड सोलर चैलेंज क्रूजर क्लास को लगातार चार बार जीता है. इससे पहले यह टीम Stella Vita नाम की सोलर कैंपर वैन और Stella Terra नाम की ऑफ-रोड सोलर गाड़ी भी बना चुकी है, जो खराब रास्तों और दुर्गम इलाकों में भी आसानी से दौड़ सकती है। 

बांगलादेश बॉर्डर पर सख्ती बढ़ी, अब भारत में घुसने की कोशिश करने वाले घुसपैठिये डरेंगे

कलकत्ता भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर घुसपैठ और तस्करी पर लगाम कसने के लिए अब एक अनोखी और चौंकाने वाली रणनीति पर विचार किया जा रहा है. अब यहां सीमावर्ती इलाकों पर पारंपरिक बाड़ और टेक्नोलॉजी के अलावा प्रकृति का खतरनाक हथियार इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है. खबर है कि सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ ने अपने फील्ड यूनिट्स को निर्देश दिया है कि वे नदी और दलदली इलाकों में सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के इस्तेमाल की संभावनाओं का अध्ययन करें।  भारत-बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा में करीब 175 किलोमीटर नदी और दलदली इलाका है, जहां बाढ़ और भौगोलिक स्थिति के कारण सामान्य बाड़ लगाना संभव नहीं होता. ऐसे में BSF अब प्रकृति को ही सुरक्षा का हथियार बनाने की सोच रही है. माना जा रहा है कि अगर यह योजना लागू होती है, तो घुसपैठियों के लिए सीमा पार करना पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है।  खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों के बाद यह विचार सामने आया है. 26 मार्च को BSF मुख्यालय से भेजे गए एक आंतरिक संदेश में कहा गया है कि जिन नदी वाले इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां ‘प्राकृतिक अवरोध’ के तौर पर सांप और मगरमच्छ जैसे जीवों का उपयोग किया जा सकता है. हालांकि, फिलहाल यह योजना केवल चर्चा और व्यवहार्यता जांच के स्तर पर है, इसे लागू करने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।  बीएसएफ के प्लान में कहां रुकावट? इसी साल फरवरी में दिल्ली स्थित बीएसएफ मुख्यालय में हुई एक बैठक के बाद यह कम्युनिकेशन जारी किया गया. संदेश में सीमा चौकियों (BOPs) को ‘डार्क जोन’ (जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है) के रूप में चिन्हित करने और वहां रहने वाले गांववालों के खिलाफ दर्ज मामलों की रिपोर्ट मांगी गई है।  हालांकि द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, BSF के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अभी यह सिर्फ चर्चा का विषय है. ‘अभी तक सांप-मगरमच्छ तैनात करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है. सिर्फ संभावना तलाशने को कहा गया है. इसमें कई चुनौतियां हैं… सरीसृपों को कहां से लाया जाए, उनका रखरखाव कैसे हो और नदी किनारे रहने वाले स्थानीय लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा।  घुसपैठियों के लिए डर का माहौल अगर यह योजना लागू हुई तो घुसपैठिए और तस्करों के लिए भारत में घुसने का ख्याल आते ही कांप उठना तय है. नदी के पानी में मगरमच्छ और घने जंगलों में जहरीले सांप है… यह सोचकर ही कोई भी गैरकानूनी तरीके से सीमा पार करने से पहले सौ बार सोचेगा।  विशेषज्ञों का मानना है कि नदी वाले इलाकों में जहां फेंसिंग नहीं लग पाती, वहां प्राकृतिक बाधाएं काफी प्रभावी साबित हो सकती हैं. लेकिन साथ ही यह भी चिंता जताई जा रही है कि बाढ़ के समय ये सरीसृप दोनों तरफ के गांवों के लिए खतरा बन सकते हैं।  बॉर्डर पर फेंसिंग अभी भी अधूरी संसदीय स्थायी समिति की 17 मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश सीमा की कुल 4,096.7 किमी में से सिर्फ 2,954.56 किमी ही फेंसिंग हो पाई है. अभी भी 371 किमी फेंसिंग बाकी है. कठिन भौगोलिक स्थिति, नदियां, पहाड़ियां और स्थानीय विरोध के कारण फेंसिंग कार्य धीमा चल रहा है।  गृह मंत्रालय की 2024-25 वार्षिक रिपोर्ट भी मानती है कि नदी और निचले इलाकों में फेंसिंग लगाना चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में BSF अब टेक्नोलॉजी (ड्रोन, सेंसर, कैमरा) के साथ-साथ प्राकृतिक तरीकों पर भी विचार कर रही है।  BSF अधिकारी मानते हैं कि सांप और मगरमच्छ तैनात करना आसान नहीं होगा. इनकी खरीद, रखरखाव, प्रजनन और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखना होगा. साथ ही बाढ़ के मौसम में इनके गांवों में घुस आने का खतरा भी बना रहेगा. फिलहाल यह प्रस्ताव चर्चा के चरण में है. BSF पूर्वी कमांड को डार्क जोन की मैपिंग करने और रिपोर्ट देने को कहा गया है।   

₹2.80 करोड़ पर टैक्स ‘0’: क्या आप भी इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं? जानें धारा 54F के बारे में

हैदराबाद  हैदराबाद के आयकर अपीलीय न्‍यायाधिकरण (ITAT) ने एक खास फैसले में आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत एक टैक्‍सपेयर को बड़ी राहत दी है. अब उसे 2.80 करोड़ रुपये की टैक्‍सेबल इनकम नहीं देनी पड़ेगी।    ब्रिटेन में रह रहे व्‍यक्ति से जुड़ा मामला आइए जानते क्‍या आप ले सकते हैं ये लाभ और आयकर अधिनियम की धारा 54F क्‍या है, जिसके तहत इतनी बड़ी टैक्‍स छूट मिल सकती है? हालांकि, पहले इससे जुड़ा मामला समझ लेते हैं कि आखिर किस मामले के तहत इतनी बड़ी टैक्‍स छूट दी गई है. दरअसल, ये मामला एक NRI से जुड़ा हुआ है, जो ब्रिटेन में रहता है।  2.80 करोड़ पर 0 टैक्‍स 2.80 करोड़ पर 0 टैक्‍स: टैक्स सलाहकार प्लेटफॉर्म टैक्स बडी के अनुसार, ब्रिटेन में रहने वाले टैक्‍सपेयर रेवंत ने वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान पांच विला 5.26 करोड़ रुपये में बेचे. अधिग्रहण की लागत को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने 3.41 करोड़ रुपये का लॉन्‍ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) दिखाया. इसके मुकाबले, उन्होंने धारा 54F के तहत 2.80 करोड़ रुपये की टैक्‍स छूट का दावा किया, जिसमें उन्होंने एक नई आवासीय संपत्ति में निवेश का दिखाया था।  क्‍या था पूरा विवाद?              क्‍या था पूरा विवाद: हालांकि, विवाद इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि एक्वा स्पेस डेवलपर्स से खरीदी गई नई प्रॉपर्टी 10 अप्रैल, 2023 को उनकी बहन श्रेया के नाम पर रजिस्‍ट्रर्ड की गई थी.अधिकारी ने धारा 54F के तहत किए गए पूरे दावे को सख्त कानून के आधार पर खारिज कर दिया. जिसका तर्क था कि मकान रेवंत के नाम पर रजिस्‍टर्ड नहीं था. इसलिए, उन्हें कानूनी मालिक नहीं माना जा सकता था. धारा 54F के तहत दी गई छूट पूरी तरह से अस्वीकार कर दी गई।  रेवंत ने क्‍या दिया तर्क? रेवंत ने क्‍या दिया तर्क? : टैक्‍सपेयर के 3.41 करोड़ रुपये के पूरे LTCG को टैक्‍स के लायक समझा गया. रेवंत ने तर्क दिया कि प्रॉपर्टी का रजिस्‍ट्रेशन उनकी बहन के नाम पर केवल लॉजिस्टिकल संबधी समस्‍याओं के कारण किया गया था, क्योंकि वह विदेश में रह रहे थे और रजिस्‍ट्रेशन के समय भारत आने में असमर्थ थे।  सभी दस्‍तावेज सब्मिट किए         इसके बाद उन्‍होंने यह साबित करने के लिए कई दस्‍तावेज दिए. इसमें बिल्डर द्वारा जारी आवंटन पत्र उनके नाम पर था. 65 लाख रुपये की बुकिंग एडवांस अमाउंट सीधे उनके बैंक खाते से जमा की गई थी. 4.31 करोड़ रुपये की कुल खरीद अमाउंट उनके पिता के साथ संयुक्त बैंक खाते के माध्यम से भुगतान की गई थी. उनकी बहन ने लिखित पुष्टि दी कि वह संपत्ति की वास्तविक मालिक नहीं हैं।  कोर्ट ने सुनाया खास फैसला कोर्ट ने सुनाया खास फैसला: इन सभी दस्‍तावेजों के पेश करने के बाद हैदराबाद के आयकर अपीलीय न्‍यायाधिकरण (ITAT) ने माना कि न्यायिक मिसालें आम तौर पर धारा 54एफ के तहत आती हैं, जब संपत्तियां पति या पत्नी या अविवाहित बच्चों के नाम पर खरीदी जाती हैं. इसके बाद रेवंत के हक में फैसला आया है और उनका 2.80 करोड़ टैक्‍सेबल इनकम शून्‍य हो गया।  धारा 54एफ क्या है? आयकर अधिनियम की धारा 54F के तहत व्यक्ति और अविभाजित परिवार (HUF) गैर-आवासीय संपत्तियों जैसे शेयर या सोना की बिक्री से मिले लॉन्‍गटर्म कैपिटल गेन पर छूट का दावा कर सकते हैं, बशर्ते बिक्री से मिला नेट अमाउंट को भारत में किसी एक आवासीय संपत्ति में फिर से निवेश किया जाए. निवेश तय समय सीमा के भीतर किया जाना चाहिए. खरीद बिक्री से एक साल पहले या दो वर्ष बाद, या निर्माण तीन वर्ष के भीतर होना चाहिए. छूट की अधिकतम सीमा ₹10 करोड़ है।