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राष्ट्रपति ट्रंप का बयान- इनकम टैक्स के बदले टैरिफ आ रहा है, विदेशी कर रहे हैं भुगतान

 वाशिंगटन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में पहली बार अमेरिकी कांग्रेस में वार्षिक 'स्टेट ऑफ द यूनियन' संबोधन दे रहे हैं. ट्रंप ने अपने कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का दावा किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था पहले कभी इतनी तेजी से नहीं बढ़ी और दावा किया कि देश को पहले डेड कहा जाता था, अब हम सबसे आगे हैं. ट्रंप ने यह भी दोहराया कि उन्होंने 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' का अपना वादा निभाया है. यह नारा अमेरिकी राष्ट्रपति और अन्य रिपब्लिकन नेताओं द्वारा अमेरिका में तेल और गैस ड्रिलिंग को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूसरे देशों पर लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक बताकर खारिज करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप अपने फैसले को जायज ठहराने के लिए तरह-तरह के पैंतरे आजमा रहे हैं. यूएस सुप्रीम कोर्ट ने स्वीपिंग टैरिफ खत्म किया तो ट्रंप ने 15% ग्लोबल टैरिफ का एलान कर दिया. अब यूएस कांग्रेस में अपने संबोधन में उन्होंने टैरिफ को इनकम टैक्स का सब्सिट्यूट बता दिया. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, 'मेरा मानना ​​है कि विदेशी देशों द्वारा चुकाए जा रहे ये टैरिफ, हमारे देश में इनकम टैक्स की आधुनिक प्रणाली को काफी हद तक प्रतिस्थापित कर देंगे, जिससे मेरे देशवासियों पर से एक बड़ा वित्तीय बोझ कम हो जाएगा.' स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी पुरुष हॉकी के ओलंपिक हीरो कॉनर हेलेब्यूक को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम' से सम्मानित करने की घोषणा की. अमेरिकी पुरुष हॉकी टीम के खिलाड़ी ट्रंप के संबोधन के दौरान यूएस कैपिटल में मौजूद थे. अमेरिका ने 2026 विंटर ओलंपिक के फाइनल में कनाडा को हराकर 46 साल बाद हॉकी में स्वर्ण पदक जीता. अमेरिकी सीमा अब सुरक्षित और दुश्मन डरे हुए हैं: ट्रंप डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिकी सीमा अब सुरक्षित है और दुश्मन डरे हुए हैं. उन्होंने कहा, 'हमारी सेना और पुलिस पहले से कहीं अधिक मजबूत है, और वैश्विक मंच पर अमेरिका को एक बार फिर सम्मान प्राप्त है.'अमेरिकी राष्ट्रपति ने इमिग्रेशन का मुद्दा उठाया, जो उनके चुनाव अभियान के प्रमुख मुद्दों में से एक था, और अपने प्रशासन के दौरान इसमें महत्वपूर्ण बदलाव का दावा किया. उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले एक साल में अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर घातक फेंटानिल की तस्करी में रिकॉर्ड 56 प्रतिशत की गिरावट आई है. ट्रंप ने कहा कि अवैध आव्रजन और मादक पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाने के प्रयासों से परिणाम मिले हैं, और उन्होंने दावा किया कि चार साल तक बेरोकटोक सीमा पार करने के बाद, अब अमेरिका के पास देश के इतिहास की 'सबसे मजबूत और सुरक्षित सीमा' है. उन्होंने कहा कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल के अंत तक मेक्सिको के साथ लगने वाली अमेरिकी सीमा पर अवैध घुसपैठ रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई थी. महंगाई पिछले पांच वर्षों में सबसे निचले स्तर पर: ट्रंप ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान महंगाई पर काबू पाने का दावा किया. उन्होंने अपने पूर्ववर्ती, जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान देश के इतिहास में सबसे भीषण महंगाई होने का आरोप लगाया. अमेरिकी संसद को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनके प्रशासन ने 12 महीनों के भीतर महंगाई को पिछले पांच वर्षों में सबसे निचले स्तर पर ला दिया है. उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनाव के बाद से शेयर बाजार ने 53 बार सर्वकालिक उच्च स्तर दर्ज किया है और कहा कि उनकी सरकार ने अपने पहले वर्ष में 18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश आकर्षित किया है.

भारत ने दिखाई मजबूती, रूस के साथ खड़े होकर दुश्मनों को किया पीछे

नई दिल्ली रूस-यूक्रेन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ था, तो पश्चिमी देशों ने कसम खा ली थी कि वे रूस को दुनिया में बिल्कुल अकेला कर देंगे. उस पर पाबंदियों की ऐसी झड़ी लगाई गई कि लगा रूस की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी. लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल उलट चुकी है. रूस को अलग-थलग करने चले देश आज खुद बंटे हुए नजर आ रहे हैं और रूस की तो मानो चांदी हो गई है. इस पूरी कहानी में गेमचेंजर बना है भारत. भारत ने जिस तरह पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, उसने दुनिया के कई अन्य देशों को भी हिम्मत दी है. अब भारत की तरह ही कई और देश रूस के साथ डटकर खड़े हो गए हैं. स्थिति यह आ गई है कि जो देश कल तक रूस के पक्के दुश्मन बने हुए थे और हर दिन नई पाबंदियां लगाने की वकालत करते थे, वे भी अब पीछे हटते दिख रहे हैं. भारत का दांव- हम वहीं से खरीदेंगे, जहां फायदा होगा रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआत से ही अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारत पर भारी दबाव बनाया था कि वह रूस से तेल न खरीदे. उनका तर्क था कि रूस से तेल खरीदकर भारत एक तरह से इस युद्ध को फंड कर रहा है. लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को बिल्कुल साफ रखा. भारत सरकार का सीधा सा स्टैंड था, हमारे लिए हमारे देश की 140 करोड़ की आबादी सबसे पहले है. अगर हमें कहीं से सस्ता तेल मिलेगा, जिससे हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम काबू में रहें और महंगाई न बढ़े, तो हम वहीं से तेल खरीदेंगे. आज भी यही खबर आ रही कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर रहा है. भारत के इस नेशन फर्स्ट वाले रवैये ने दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया. दुनिया को समझ आ गया कि एनर्जी स‍िक्‍योर‍िटी किसी भी देश का पहला अधिकार है और इसके लिए किसी महाशक्ति के आगे झुकने की जरूरत नहीं है. भारत का यही स्टैंड अब दुनिया के कई देशों के लिए रोल मॉडल बन गया है. अब हंगरी बोला- दबाव के आगे नहीं झुकेंगे भारत ने जो रास्ता दिखाया, अब यूरोपीय देश हंगरी भी उसी पर पूरी ताकत से चल पड़ा है. हंगरी ने यूरोपीय यूनियन की आंखों में आंखें डालकर साफ कह दिया है कि वह रूस से तेल खरीदने के मामले में किसी के दबाव में नहीं आएगा. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो ने दो टूक कहा, हम मौजूदा विकल्पों से ज्यादा महंगे और कम भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत खरीदने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं. उनका सीधा सा मतलब था कि जब रूस हमें सस्ता और भरोसेमंद तेल और गैस दे रहा है, तो हम सिर्फ यूरोप की राजनीति के चक्कर में कहीं और से महंगा तेल क्यों खरीदें? सिज्जार्टो ने इसे देश का अध‍िकार बताया. यानी यह हंगरी का अपना फैसला है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करे, इसमें कोई दूसरा देश दखल नहीं दे सकता. हंगरी के इस रुख ने यूरोप के उन देशों की नींद उड़ा दी है जो रूस की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना चाहते थे. हंगरी यह बात अच्छे से जानता है कि अगर उसने रूस से तेल और गैस लेना बंद कर दिया, तो उसके देश में हाहाकार मच जाएगा, महंगाई आसमान छूने लगेगी और इंडस्ट्रीज बंद होने की कगार पर आ जाएंगी. इसलिए उसने कूटनीति से ज्यादा अपने देश की अर्थव्यवस्था को चुना है. यूरोपीय यूनियन में फूट: पाबंदियों पर नहीं बन पा रही बात एक समय था जब यूरोपीय यूनियन रूस के खिलाफ पाबंदियों का नया पैकेज लाने के लिए बस एक इशारे का इंतजार करता था. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. खुद यूरोपीय यूनियन ने मान लिया है कि फिलहाल रूस पर नई पाबंदियां लगाने के मामले में कोई फैसला नहीं हो पाएगा. ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने सोमवार को ब्रसेल्स में अपनी बेबसी जाहिर की. उन्होंने कहा, यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस के खिलाफ प्रस्तावित नए पाबंदियों के पैकेज पर सहमति नहीं बन पाएगी. इसका सबसे बड़ा कारण हंगरी का लगातार विरोध है. नियम के मुताबिक, यूरोपीय यूनियन में कोई भी बड़ा फैसला तभी लागू होता है जब सभी सदस्य देश उस पर सहमत हों. हंगरी ने वीटो पावर का इस्तेमाल करके ईयू के मंसूबों पर पानी फेर दिया है. जर्मनी की छटपटाहट: ‘हंगरी को मनाएंगे’ हंगरी के इस कड़े रुख से जर्मनी जैसे बड़े यूरोपीय देश काफी नाराज और परेशान हैं. जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा कि वे हंगरी से अपनी जिद छोड़ने की अपील करेंगे. वाडेफुल ने कहा, मुझे नहीं लगता कि हंगरी के लिए अपनी आजादी और यूरोपीय संप्रभुता के संघर्ष को धोखा देना सही है. हम एक बार फिर से बुडापेस्ट और ब्रसेल्स में हंगरी के सामने अपनी दलीलें रखेंगे और उनसे अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहेंगे. लेकिन कूटनीति के जानकार मानते हैं कि जर्मनी की यह अपील शायद ही कोई असर दिखाए. यूरोप के कई देश अब अंदर ही अंदर यह समझ चुके हैं कि बिना रूसी ऊर्जा के उनका गुजारा मुश्किल है. ऊपर से वे आदर्शवाद की बातें करते हैं, लेकिन अंदर से उनकी अर्थव्यवस्थाएं भी सस्ते ईंधन के लिए तरस रही हैं. ट्रंप फैक्टर ने यूरोप को भारत के करीब ला दिया इस पूरी कहानी में एक और बहुत बड़ा और दिलचस्प एंगल है, और वो है अमेरिका का ट्रंप फैक्टर. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां हमेशा से अमेरिका फर्स्ट की रही हैं. उनका अंदाज मनमानी भरा रहा है. वे कब किस देश से कैसा व्यवहार करेंगे, यह कोई नहीं जानता. ट्रंप कई बार यूरोपीय देशों को धमका चुके हैं कि वे अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाएं, अमेरिका हमेशा उनका बिल नहीं भरेगा. ट्रंप की इसी मनमानी और अनिश्चितता ने यूरोपीय देशों को डरा दिया है. यूरोप को अब लगने लगा है कि अमेरिका के भरोसे बैठकर रूस से पूरी तरह दुश्मनी मोल लेना अक्लमंदी नहीं है. अगर कल को अमेरिका ने हाथ खींच लिया, तो यूरोप बीच मझधार में फंस जाएगा. यही वजह है कि अब … Read more

व्हाइट हाउस का बयान: ‘भारत टेक्नोलॉजी का पावरहाउस’, लेकिन AI पर दी चेतावनी

वाशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रमुख विज्ञान सलाहकार ने कहा है कि भारत एक ‘तकनीकी महाशक्ति’ है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को आगे बढ़ाने की व्हाइट हाउस की योजना में उसकी अहम भूमिका है. उन्होंने भारत की इंजीनियरिंग क्षमता और तेजी से बढ़ते इकोसिस्टम की सराहना की. राष्ट्रपति के सहायक और व्हाइट हाउस के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति कार्यालय के निदेशक माइकल क्रैटसिओस ने फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में कहा, ‘भारत एक तकनीकी महाशक्ति है.’ विकासशील देशों को क्या चेतावनी दे रहे? हाल ही में इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में शामिल होकर लौटे टॉप अमेरिकन साइंटिफिक एडवाइजर ने कहा, ‘भारत हर साल बड़ी संख्या में इंजीनियर तैयार करता है, उसके पास मजबूत घरेलू प्रतिभा है और वह अच्छे उत्पाद और एप्लिकेशन विकसित कर रहा है.’ उन्होंने कहा कि विकसित और विकासशील देशों के बीच AI अपनाने की रफ्तार में अंतर हर दिन बढ़ रहा है. उनके मुताबिक दुनिया को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में देखा जा सकता है और दोनों के लिए अलग तरह के उपायों की जरूरत है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर विकासशील देश स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा ढांचा, कृषि और आम नागरिकों से जुड़ी सरकारी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में AI को प्राथमिकता नहीं देंगे, तो वे एक अहम मोड़ पर पीछे छूट सकते हैं. व्हाइट हाउस इस दिशा में ‘अमेरिकन AI एक्सपोर्ट्स प्रोग्राम’ को आगे बढ़ा रहा है. क्रैटसिओस ने कहा कि अब तक विकासशील देशों के सामने एक कठिन विकल्प होता था, लेकिन यह कार्यक्रम उन्हें बेहतर तकनीक, वित्तीय सहायता और लागू करने में सहयोग का नया रास्ता देता है. उन्होंने ‘वास्तविक AI स्वायत्तता’ का मतलब समझाते हुए कहा कि इसका अर्थ है सर्वोत्तम तकनीक का अपने लोगों के हित में उपयोग करना और वैश्विक बदलावों के बीच अपने देश की दिशा खुद तय करना. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रणनीति किसी एक प्रतिस्पर्धी देश के खिलाफ नहीं है. उन्होंने कहा, ‘यह इस बात के बारे में है कि यूनाइटेड स्टेट्स के पास दुनिया की सबसे अच्छी एआई टेक्नोलॉजी है और कई देश इसे अपने इकोसिस्टम में चाहते हैं.’ भारत को बताया मजबूत पार्टनर मानकों के बारे में उन्होंने कहा कि एआई के अगले चरण में ‘एजेंट’ महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. ये एजेंट किस तरह आपस में संवाद करें और मिलकर काम करें, इसके लिए एक समान मानकों की जरूरत होगी. इसके लिए अमेरिकी संस्थान NIST ने पहल शुरू की है, ताकि ये सिस्टम्स सुरक्षित और प्रभावी तरीके से साथ काम कर सकें. वित्तीय संसाधन भी एक बड़ी चुनौती हैं, खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए. क्रैटसिओस ने कहा कि एआई का पूरा ढांचा महंगा होता है. इसमें ‘डेटा सेंटर्स, सेमीकंडक्टर्स, पावर जेनरेशन’ जैसी बुनियादी सुविधाएं जरूरी होती हैं. उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन यूएस इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन, एक्सपोर्ट इंपोर्ट बैंक और दूसरी एजेंसियों के ज़रिए सपोर्ट जुटा रहा है. उन्होंने एक यूएस टेक कॉर्प्स की भी घोषणा की. उन्होंने कहा, ‘ये पीस कॉर्प्स वॉलंटियर्स की तरह होंगे, बस फोकस टेक्नोलॉजी पर होगा. हम टेक्निकल बैकग्राउंड वाले ऐसे लोगों की तलाश कर रहे हैं जो एआई सॉल्यूशन्स को इम्प्लीमेंट करने में मदद करना चाहते हैं.’ क्रैट्सियोस ने कहा कि भारत ‘लंबे समय से इस मामले में एक मजबूत पार्टनर रहा है कि यूनाइटेड स्टेट्स विदेशों में टेक्नोलॉजी कैसे शेयर करता है.’ उन्होंने बताया कि अमेरिकी बड़ी तकनीकी कंपनियों के भारत में डाटा सेंटर और शोध केंद्र मौजूद हैं, जिससे दोनों देशों के बीच एआई क्षेत्र में सहयोग और गहरा हो रहा है.

SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल का TMC ने किया स्वागत, EC पर लगाए बड़े आरोप

कोलकाता पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव को लेकर सरगर्मियां जारी है। इसी कड़ी में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने भारत निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगाया है। तृणमूल कांग्रेस ने एक्स पर लिखा है, भारत निर्वाचन आयोग ने बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के संचालन पर अपना नियंत्रण प्रभावी रूप से खो दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा लगातार आग्रह किए जाने पर इसके नियम और शर्तें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित की जा रही हैं। आज एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय को चुनाव आयोग की घोर अक्षमता और प्रशासनिक विफलता के कारण उत्पन्न भारी गतिरोध को दूर करने के लिए पड़ोसी राज्यों के न्यायाधीशों की तैनाती की अनुमति देने के लिए विवश होना पड़ा। यह हस्तक्षेप अपने आप में बहुत कुछ कहता है। कोर्ट ने दोहराया कि चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित या बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृत सभी दस्तावेज, जिनमें आधार और माध्यमिक प्रवेश पत्र शामिल हैं, लंबित दावों और आपत्तियों के निपटान के लिए स्वीकार किए जाने चाहिए। यह स्पष्ट निर्देश भाजपा-चुनाव आयोग द्वारा मनमाने ढंग से नियमों को बदलने और दस्तावेजी मानकों में हेरफेर करने के प्रयास को विफल कर देता है। बंगाल में मतदाताओं को चुनिंदा रूप से निशाना बनाने, डराने-धमकाने और परेशान करने की साजिश एक बार फिर न्यायिक बाधा से टकरा गई है। चुनाव आयोग जैसे संस्थानों को कानून की सीमाओं के भीतर कार्य करना चाहिए, न कि पक्षपातपूर्ण हितों के इशारे पर। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में जारी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की प्रक्रिया में ओडिशा और झारखंड के न्यायिक अफसर शामिल किए जाने के आदेश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर विवाद पर जारी सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इनके खर्च का वहन निर्वाचन आयोग को करने का आदेश भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी है। कोर्ट के इस फैसले का तृणमूल कांग्रेस ने स्वागत किया है।

पश्चिम बंगाल की 6 कोर्ट को उड़ाने की धमकी, अफरातफरी के बीच सर्च ऑपरेशन जारी

कोलकाता पश्चिम बंगाल की 6 जिला अदालतों में मंगलवार दोपहर बम की धमकी से हड़कंप मच गया। कोलकाता के सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट, बैंकशॉल कोर्ट सहित हुगली जिले के चिनसुराह, पश्चिम बर्दवान के आसनसोल व दुर्गापुर और मुर्शिदाबाद के बेरहामपुर अदालतों को ई-मेल के जरिए बम प्लांट होने की सूचना मिली। इन धमकियों के कारण अदालतों को तुरंत खाली कराया गया और न्यायिक कार्य प्रभावित हुआ। पुलिस ने स्निफर डॉग्स, बम डिस्पोजल स्क्वाड और अन्य सुरक्षा टीमों को मौके पर भेजा। दोपहर 2 बजे तक की तलाशी में कहीं भी कोई विस्फोटक सामग्री नहीं मिली, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि ये धमकियां फर्जी या हूक ई-मेल थीं। हालांकि, कई अन्य अदालतों में सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त कर दिया गया ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। यह घटना ठीक उसी समय हुई जब राज्य के न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभ्यास में शामिल हो रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच मतदाता सूची संशोधन को लेकर उत्पन्न विवाद और अविश्वास की स्थिति में असाधारण कदम उठाया। इसने आदेश दिया था कि ओडिशा और झारखंड के कुछ न्यायिक अधिकारियों को बंगाल के लगभग 250 कार्यरत और सेवानिवृत्त जिला स्तर के न्यायाधीशों के साथ मिलाकर SIR प्रक्रिया में लगाया जाए। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में करीब 60 लाख मतदाताओं से जुड़े विवादित दावों (जैसे लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी या अनमैप्ड कैटगरी) का समयबद्ध निपटारा करना है। अदालतों में जजों की व्यस्तता और सुरक्षा की जिम्मेदारी इसी अभ्यास से जुड़ी हुई मानी जा रही है। ई-मेल की जांच के लिए साइबर क्राइम विंग सक्रिय पुलिस और प्रशासन ने इन धमकियों को गंभीरता से लिया और ई-मेल के स्रोत की जांच के लिए साइबर क्राइम विंग को सक्रिय किया। दुर्गापुर कोर्ट के जिला जज देवप्रसाद नाथ ने इसे संभावित हूक बताया और कहा कि सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत ही अदालत खाली की गई। राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती, डीजीपी पीयूष पांडे और कोलकाता पुलिस कमिश्नर सुप्रतिम सरकार ने नबन्ना में बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आश्वासन दिया कि SIR अभ्यास किसी भी कीमत पर प्रभावित नहीं होगा। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया। राज्य सरकार पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सुरक्षा प्रदान करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। SIR को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर यह घटना पश्चिम बंगाल में SIR अभ्यास के दौरान बढ़ते तनाव को दर्शाती है, जहां राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। फर्जी बम धमकियां शायद SIR प्रक्रिया को बाधित करने या न्यायिक अधिकारियों को डराने की कोशिश हो सकती हैं। हालांकि कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इससे सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती और सतर्कता की आवश्यकता उजागर हुई है। SIR का कार्य समय पर पूरा करने के लिए सभी पक्षों को सहयोग करना होगा ताकि मतदाता सूची का निष्पक्ष संशोधन सुनिश्चित हो सके।  

भारत की बड़ी तैयारी से ड्रैगन और पाक में हलचल, Su-57 से बदलेगा ताकत का संतुलन?

वाशिंगटन ऑपरेशन सिंदूर के महज कुछ महीनों बाद ही भारतीय रक्षा गलियारों में नई हलचल देखने को मिल रही है। 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ यह ऑपरेशन भारत-पाकिस्तान के बीच हवाई संघर्ष का एक बड़ा सबक बन गया, जहां स्टील्थ और डिटेक्शन की क्षमता ने युद्ध की दिशा तय की। अब सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि भारतीय वायु सेना अपनी ताकत को अगले स्तर पर ले जाने के लिए रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट सुखोई Su-57 की खरीद पर गंभीरता से विचार कर रही है। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, अगर डील आगे बढ़ी तो वायु सेना शुरुआत में 36 से 40 Su-57 जेट्स का ऑर्डर दे सकती है। यह कदम चीन के J-20 और संभावित पाकिस्तान को मिलने वाले स्टील्थ जेट्स के जवाब में एक मजबूत ब्रिज कैपेबिलिटी के रूप में देखा जा रहा है, खासकर जब भारत का अपना एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) 2035 के आसपास ही सेवा में आएगा। दरअसल, हवाई युद्ध अब एक ऐसे दौर में पहुंच चुका है जहां युद्ध क्षमता से ज्यादा पता लगने (डिटेक्शन) की क्षमता निर्णायक साबित हो गई है। सुखोई Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान उन्नत स्टील्थ क्षमताओं से युक्त हैं, जिससे दुश्मन सेनाओं के लिए इनका पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में कई स्टील्थ फीचर्स होते हैं, जैसे रडार से बचाव के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया एयरफ्रेम। यह फ्रेम रडार, अवशोषक सामग्री से बना होता है। इन अत्याधुनिक विमानों में 'कम दृश्यता' के लिए विशेष हथियार, उन्नत सेंसर फ्यूजन और सुपरक्रूज क्षमताएं भी शामिल होती हैं। क्यों खास है 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर Su-57? सुखोई की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, Su-57 में कई विशेषताएं हैं। वेबसाइट में कहा गया है कि यह पांचवीं पीढ़ी का विमान एक पूरी तरह नए, गहन रूप से एकीकृत एवियोनिक्स सिस्टम से लैस है, जिसमें युद्ध उपयोग और बुद्धिमान चालक दल सहायता के लिए उच्च स्तर का स्वचालन है। विमान के ऑन-बोर्ड उपकरण इसे न केवल स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम बनाते हैं, बल्कि जमीनी नियंत्रण प्रणालियों के साथ तथा टास्क फोर्स के हिस्से के रूप में वास्तविक समय में डेटा का आदान-प्रदान करने में भी सक्षम बनाते हैं। सुखोई के अनुसार, यह जेट हवा से हवा और हवा से सतह पर मार करने वाले विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल कर सकता है, जिससे यह लड़ाकू और हमलावर दोनों भूमिकाएं निभा सकता है। रडार, इन्फ्रारेड और दृश्य तरंगदैर्ध्य में कम दृश्यता के कारण Su-57 गुप्त (स्टील्थ) कार्रवाई करने में सक्षम है। Su-57 की सहायक विद्युत इकाई के बारे में बताया गया है कि यह उच्च तैनाती स्वायत्तता प्रदान करती है, जमीनी परीक्षण के दौरान कम ईंधन खपत करती है और मुख्य इंजनों के जीवनकाल को बचाती है। सुखोई ने कहा है कि विमान में लगी ऑक्सीजन निष्कर्षण इकाई भी विमान के संचालन की उच्च स्वायत्तता सुनिश्चित करती है। जनरेटर-प्रकार की तटस्थ गैस प्रणाली वाली विस्फोट-रोधी ईंधन टैंक प्रणाली अन्य उपायों के साथ मिलकर विमान की उच्च स्तरीय युद्ध क्षमता सुनिश्चित करती है।  

ट्रंप की धमकी के बीच चीन-ईरान गठजोड़ मजबूत, बढ़ी वैश्विक चिंता

वाशिंगटन अमेरिका से लगातार बढ़ते तनाव और युद्ध की धमकी के बीच चीन ने ईरान की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है। दोनों देशों के बीच एक अहम डील लगभग पूरी होने वाली है। इसके तहत ईरान को चीन में बनी सीएम-302 मिसाइल मिलने वाली है। यह एक सुपरसोनिक मिसाइल है जो दुश्मन की वॉरशिप को तबाह करने की क्षमता रखती है। इस मिसाइल की रेंज 290 किलोमीटर है। यह काफी तेजी से और नीचे रहते हुए उड़ान भरती है और सटीक निशाना लगाती है। ऐसे समय में जब अमेरिका, ईरान के तटीय इलाकों में अपनी वॉरशिप्स को तैनात कर रहा है, यह डील ईरान के लिए काफी अहम होगी। इन मिसाइलों की तैनाती ईरान की हमला करने की क्षमता में निर्णायक बढ़ोत्तरी करेगी। गेमचेंजर बनेंगी चीनी मिसाइलें ईरान ने चीन से यह मिसाइलें खरीदने के लिए दो साल पहले बातचीत शुरू की थी। लेकिन जानकारों के मुताबिक जब पिछले साल जून महीने में इजरायल और ईरान के बीच 12 दिन तक युद्ध चला तो दोनों देशों के बीच बातचीत ने रफ्तार पकड़ी। पिछली गर्मियों में बातचीत फाइनल स्टेज में पहुंची थी। तब ईरानी सेना और सरकार के वरिष्ठ अधिकारी चीन की यात्रा पर गए थे। इन लोगों में ईरान के डिप्टी डिफेंस मिनिस्टरी मसूद ओरेई भी शामिल थी। इजरायल के पूर्व इंटेलीजेंस ऑफिसर डैनी सिट्रीनोविच ने कहाकि अगर ईरान जहाजों पर हमला करने की सुपरसोनिक क्षमता हासिल कर लेता है तो यह पूरी तरह से गेमचेंजर होगा। उन्होंने कहाकि इन मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना बहुत मुश्किल है। डिलीवरी की तारीख कब? हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस डील के तहत ईरान को कितनी मिसाइलें मिलेंगी और डिलीवरी डेट क्या होगी। इसके अलावा यह भी जानकारी नहीं है कि ईरान इन सुपरसोनिक मिसाइलों के लिए कितनी कीमत चुका रहा है। ईरानी विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहाकि ईरान अपने सहयोगी देशों के साथ सैन्य और सुरक्षा समझौता है। फिलहाल यह सबसे उपयुक्त समय है कि इन समझौतों का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाए। अमेरिका ने क्या कहा इन समझौतों पर चीन या अमेरिका की तरफ से फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं आई है। अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा हालात को लेकर डोनाल्ड ट्रंप काफी सख्त हैं। वाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहाकि ट्रंप का कहना है कि या तो ईरान समझौता करेगा नहीं तो पिछली बार की तरह उसके खिलाफ सख्त कदम उठाया जाएगा। बता दें कि चीन द्वारा ईरान को दी जा रही यह मिसाइलें सबसे उन्नत हथियारों में से एक हैं। हालांकि यह संयुक्त राष्ट्र के उस हथियार प्रतिबंध का उल्लंघन है, जिसे 2006 में पहली बार लगाया गया था। हालांकि 2015 में प्रतिबंधों को 2015 में अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ एक परमाणु समझौते के हिस्से के रूप में निलंबित कर दिया गया था। लेकिन फिर सितंबर में इसे लागू कर दिया गया था। क्या हैं मौजूदा हालात बता दें कि चीन और ईरान की यह डील ऐसे समय में हो रही है, जब अमेरिका ईरान की पहुंच के भीतर एक नौसेना बेड़े को इकट्ठा कर रहा है। इसमें एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसका स्ट्राइक ग्रुप शामिल है। यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड और उसके एस्कॉर्ट भी इस क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं। ये दोनों जहाज मिलकर 5,000 से अधिक कर्मियों और 150 विमानों को ले जा सकते हैं। अमेरिका अब इस तैयारी में जुटा है कि अगर ट्रंप हमले का आदेश देते हैं कि वह ईरान के खिलाफ हफ्तों तक अभियान जारी रख सके। इजरायली विशेषज्ञ सिट्रीनोविच ने कहाकि चीन ईरान में एक पश्चिम समर्थक शासन को नहीं देखना चाहता। यह उनके हितों के लिए खतरा होगा। वे उम्मीद कर रहे हैं कि खामेनेई सत्ता में बने रहेंगे। ट्रंप ने 19 फरवरी को कहाकि वह ईरान को उसके परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने के लिए 10 दिन दे रहे हैं। ऐसा न होने पर सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।  

मिडिल ईस्ट की नई रणनीति: नेतन्याहू का ‘हेक्सागन एलायंस’ क्या बदल देगा समीकरण?

नई दिल्ली   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार से दो दिनों के आधिकारिक दौरे पर इजरायल जा रहे हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले सप्ताह इस खबर पर मुहर लगाई थी, जिसके बाद भारत ने भी इसकी पुष्टि की है। यहां पीएम मोदी नेतन्याहू और राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से मुलाकात करेंगे। वहीं इस दौरान उनका 'नेसेट' (इजरायली संसद) को संबोधित करने का भी कार्यक्रम है। दौरे से पहले नेतन्याहू ने भारत और इजरायल के बीच मजबूत रिश्तों पर जोर देते हुए कहा है कि पीएम की यह यात्रा कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ एक नया गठबंधन बनाने में मदद करेगी। नेतन्याहू ने एक नए वैश्विक संगठन ‘हेक्सागन एलायंस’ का जिक्र किया है। क्या बोले बेंजामिन नेतन्याहू? नेतन्याहू ने रविवार को कैबिनेट मीटिंग की शुरुआत में इजरायल की संसद का जिक्र करते हुए कहा, "बुधवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां पहुंचेंगे। वह नेसेट में भाषण देंगे।" नेतन्याहू ने दोनों देशों के बीच बढ़ती साझेदारी की तारीफ की। उन्होंने कहा, "रिश्तों का ताना-बाना और मजबूत हुआ है, और मोदी यहां इसलिए आ रहे हैं ताकि हम इसे और भी मजबूत कर सकें।" नेतन्याहू ने आगे कहा कि इजरायल-भारत धुरी एक बड़े क्षेत्रीय गठबंधन का हिस्सा होगी, जिसे उन्होंने ‘हेक्सागन’ नाम दिया है। क्या है हेक्सागन एलायंस? ‘हेक्सागन ऑफ एलायंस’ छह देशों की एक रणनीतिक समूह होगी, जिसकी पहल नेतन्याहू ने की है। इसका मकसद पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर क्षेत्र में आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाना है। इसे ईरान के प्रभाव और क्षेत्रीय खतरों का जवाब माना जा रहा है। इस प्रस्तावित समूह में इजरायल, भारत, ग्रीस और साइप्रस का नाम लिया गया है। वहीं कुछ अरब और अफ्रीकी देशों का जिक्र किया गया है, लेकिन उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। नेतन्याहू ने कहा कि वे मध्य पूर्व के आसपास या भीतर एक पूरा हेक्सागन गठबंधन बनाना चाहते हैं, जिसमें भारत, अरब देश, अफ्रीकी देश, भूमध्यसागर के देश जैसे ग्रीस और साइप्रस तथा एशिया के कुछ अन्य देश शामिल होंगे, जिनका विवरण वे बाद में देंगे। क्या मकसद? नेतन्याहू के मुताबिक इस गठबंधन का मकसद कट्टर धुरियों के खिलाफ समान सोच रखने वाले देशों को एक साथ लाना है। उन्होंने कट्टर ‘शिया धुरी’ के जिक्र के साथ ही उभरती ‘कट्टर सुन्नी धुरी’ का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक नेतन्याहू का यह दांव ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ को सीधी चुनौती है। हालांकि अब तक किसी भी देश ने इस प्रस्ताव को आधिकारिक समर्थन नहीं दिया है। इतना ही नहीं ग्रीस और साइप्रस उसी इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के सदस्य हैं, जिस आईसीसी ने गाजा में युद्ध अपराधों के आरोप में नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। अगर वे इन देशों में जाते हैं तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में नेतन्याहू का सपना अभी दूर है।

कर्मचारियों की सुरक्षा पर सख्त पुष्कर सिंह धामी, लापरवाही पर होगी कड़ी कार्रवाई

हरिद्वार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकारी कार्यालयों और कार्यस्थलों पर अधिकारी- कर्मचारी और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए मुख्य सचिव को SOP बनाने के निर्देश दिए हैं।  उत्तराखण्ड अधिकारी कर्मचारी शिक्षक मोर्चा के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री आवास में मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी से भेंट की। पदाधिकारियों ने 21 फरवरी को प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय में हुई घटना के साथ ही हाल के समय में अन्य स्थानों पर सरकारी अधिकारी- कर्मचारियों के साथ हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए, ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने की मांग की। मुख्यमंत्री ने उनकी बातों को गंभीरता से सुनते हुए कहा कि सरकार कार्मिकों के मान – सम्मान और सुरक्षा को लेकर हमेशा गंभीर रही है। मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को फोन कर अधिकारी,  कर्मचारियों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए SOP तैयार करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने DGP को भी निर्देश दिए हैं कि सरकारी कार्यालयों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं, साथ ही इस तरह की घटनाओं पर त्वरित कानूनी कार्रवाई की जाए, उन्होंने SSP देहरादून को भी शिक्षा निदेशालय में हुई घटना में शामिल दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए। इस मौके पर राज्य औषधीय पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष श्री प्रताप सिंह पंवार, उत्तराखण्ड अधिकारी कर्मचारी शिक्षक मोर्चा के अध्यक्ष  राम सिंह चौहान, महामंत्री  मुकेश बहुगुणा एवं अन्य पदाधिकारी मौजूद थे।  

सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, CJI की अगुवाई वाली पीठ भाजपा नेता पर भड़की

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो टूक कहा है कि वह आधार कार्ड के गलत इस्तेमाल या धोखाधड़ी से जारी होने के दावों की जांच नहीं कर सकता, और ऐसे मामलों को केंद्र सरकार को देखना चाहिए। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह बात कही। पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या शरणार्थियों को कथित रूप से फर्जी आधार कार्ड जारी किए जाने के आरोपों पर सुनवाई करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों की जांच अदालत के दायरे में नहीं आती और इस विषय पर केंद्र सरकार से संपर्क किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा हो सकता है, लेकिन इसके लिए विस्तृत जांच और नीतिगत निर्णय की आवश्यकता है, जो न्यायालय के बजाय सरकार के स्तर पर ही संभव है। भाजपा नेता ने क्या मुद्दा उठाया था? भाजपा नेता और एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने SIR प्रक्रिया में आधार कार्ड की स्वीकृति और इस्तेमाल के बारे में कोर्ट द्वारा जारी एक क्लैरिफिकेशन के संबंध में यह मुद्दा उठाया गया था। इस मामले में कोर्ट से और स्पष्टीकरण की मांग करते हुए उपाध्याय ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में, खासकर रोहिंग्याओं को, आधार कार्ड धोखाधड़ी से जारी किए जा रहे हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि उपाध्याय रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट सहित कानून में बदलाव के लिए भारत संघ को रिप्रेजेंटेशन दे सकते हैं। आधार को हमें मानना होगा: SC बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक,जस्टिस बागची ने आगे कहा, “अगर आधार को इंडस्ट्रियल लेवल पर धोखे से खरीदा जाता है, तो इसे कानूनी तौर पर रेगुलेट किया जाना चाहिए। आधार को पहचान के सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए एक डॉक्यूमेंट के तौर पर लाया गया था और हमें यह मानना ​​होगा। आधार पर नागरिकता का पता लगाने का कोई सवाल ही नहीं है।” CJI सूर्यकांत ने क्या कहा? CJI सूर्यकांत ने भी इसी तरह की बात कही। उन्होंने कहा, "इसकी गहरी जांच की जरूरत है और कोर्ट इसके लिए कोई फोरम नहीं है।" मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि इस तरह के आरोपों की गहराई से जांच की जरूरत है और अदालत इस तरह के मामलों के लिए उपयुक्त मंच नहीं है। अदालत का यह रुख साफ संकेत देता है कि आधार कार्ड के दुरुपयोग जैसे संवेदनशील मामलों में नीति निर्माण और कार्रवाई का दायित्व कार्यपालिका पर ही है। मामला क्या है? सितंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) और उसकी अथॉरिटीज को बिहार राज्य की रिवाइज़्ड वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने या हटाने के मकसद से पहचान के सबूत के तौर पर आधार कार्ड को स्वीकार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट, 1950 के सेक्शन 23(4) के मुताबिक, आधार कार्ड किसी व्यक्ति की पहचान साबित करने के मकसद से बताए गए डॉक्यूमेंट्स में से एक है। कोर्ट ने तब आदेश दिया था, "इस मकसद के लिए, अथॉरिटीज़ आधार कार्ड को 12वां डॉक्यूमेंट मानेंगी। हालांकि, यह साफ़ किया जाता है कि अथॉरिटीज़ को दूसरे बताए गए डॉक्यूमेंट्स की तरह, आधार कार्ड के असली होने और असली होने को वेरिफ़ाई करने का अधिकार होगा, और इसके लिए वे और सबूत/डॉक्यूमेंट्स मांगेंगे।"