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अमेरिका में सरकारी नौकरी और ट्रंप की वफादारी का सवाल, कोर्ट ने ‘लॉयल्टी टेस्ट’ पर लगाई रोक

वाशिंगटन अमेरिका में सरकारी नौकरी के लिए राजनीतिक वफादारी साबित नहीं करनी होगी. बोस्टन की अदालत ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के उस नियम पर रोक लगा दी है, जिसमें आवेदकों से उनकी सोच पूछी जा रही थी. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी उम्मीदवार से उसकी राजनीतिक राय जानने का सरकार को कोई हक नहीं है।  यह मामला उन सरकारी नौकरियों से जुड़ा है, जिन्हें राजनीतिक पद नहीं माना जाता. इसके बावजूद आवेदकों से पूछा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों और उनके कार्यकारी आदेशों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. कर्मचारी संगठनों ने इसे राजनीतिक सोच जानने वाला सवाल बताया था. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी उम्मीदवार से राजनीतिक निष्ठा साबित करने को नहीं कहा जा सकता।  न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, बोस्टन की संघीय अदालत के जज जॉर्ज ओ'टूल ने तीन कर्मचारी यूनियनों का पक्ष माना. इन संगठनों ने पिछले साल ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया था. कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रशासन ऐसे सवाल को सरकारी नौकरी के आवेदन में जारी नहीं रख सकेगा।  ट्रंप के आदेश के बाद शुरू हुआ था सवाल मामला दरअसल ट्रंप प्रशासन के एक कार्यकारी आदेश से जुड़ा है. इसी आदेश को लागू करने के लिए सरकारी नौकरी के आवेदन में 'लॉयल्टी' से जुड़ा सवाल शामिल किया गया था. आवेदकों से एक तरह का जवाब मांगा जा रहा था कि वे ट्रंप की नीतियों को आगे बढ़ाने में किस तरह मदद करेंगे. सरकार के स्तर पर यह प्रक्रिया सरकारी कर्मचारियों की भूमिका से जुड़ी बताई गई थी. मगर कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि जिन नौकरियों का काम राजनीतिक दल या किसी नेता के प्रति वफादारी से तय नहीं होता, वहां उम्मीदवार की राजनीतिक सोच जानना सही नहीं है।  जज बोले- राजनीतिक सोच पूछने की जरूरत नहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक, जज जॉर्ज ओ'टूल ने अपने फैसले में कहा कि सरकार के पास आवेदकों की राजनीतिक मान्यताओं के बारे में इस तरह की जानकारी मांगने का कोई वैध हित नहीं है. यानी सिर्फ सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति से यह जानना जरूरी नहीं है कि वह किसी राष्ट्रपति की राजनीतिक नीतियों के बारे में क्या सोचता है।  इस फैसले से ट्रंप प्रशासन की भर्ती प्रक्रिया को बड़ा झटका लगा है. कर्मचारी संगठनों के मुताबिक, देशभर में 70 हजार से ज्यादा संघीय सरकारी नौकरियों के विज्ञापनों में यह सवाल शामिल किया गया था।  तीन कर्मचारी संगठनों ने किया था मुकदमा तीन सरकारी कर्मचारी यूनियनों ने पिछले साल इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दी थी. उनका कहना था कि सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों को अपनी योग्यता के आधार पर चुना जाना चाहिए, न कि उनकी राजनीतिक सोच के आधार पर।  अब अदालत के आदेश के बाद ट्रंप प्रशासन के लिए सरकारी नौकरियों के आवेदकों से इस तरह की 'लॉयल्टी' जानकारी मांगना रोक दिया गया है. मामला सिर्फ एक सवाल का नहीं है. इसके जरिए यह बहस भी सामने आई है कि सरकारी नौकरी में उम्मीदवार की योग्यता देखी जाए या उसकी राजनीतिक सोच। 

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! 8वां वेतन आयोग इस स्कीम में कर सकता है बदलाव, जानें असर

नई दिल्ली  केंद्रीय कर्मचारियों के लिए गठित आठवां वेतन आयोग मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन' (MACP) स्कीम की समीक्षा कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इस योजना में बदलाव की मांग की गई है। अब वेतन आयोग इस मांग पर गंभीरता से विचार कर रहा है। क्या है मामला? मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन (MSA), सर्वे ऑफ इंडिया ने अपने ज्ञापन में मांग की है कि MACP के तहत फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (वित्तीय लाभ) केवल अगले पे मैट्रिक्स लेवल पर नहीं, बल्कि कर्मचारी के अगले प्रमोशनल पद के पे लेवल के हिसाब से दिया जाना चाहिए। MSA ने यह भी कहा कि अपग्रेडेशन की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच की जानी चाहिए, जो नौकरी के 8, 15, 22, 28 और 32 साल पूरे होने पर मिलें। MSA के अनुसार, मौजूदा नियमों के तहत MACP में असल 'प्रमोशनल हायरार्की' के अगले वेतनमान के बजाय 'पे मैट्रिक्स' में अगला लेवल दिया जाता है। इसके अलावा, फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स (FNPO) ने 6, 12, 18, 24 और 30 वर्षों में पांच बार प्रमोशन का प्रस्ताव रखा। FNPO ने एक और अहम बदलाव की मांग की है। संगठन के मुताबिक अगर कोई कर्मचारी किसी प्रमोशन को स्वीकार नहीं करता है, तो उसके MACP लाभ को रोका या टाला नहीं जाना चाहिए। यानी MACP का लाभ प्रमोशन से अलग रखा जाना चाहिए। उदाहरण से समझें मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई कर्मचारी लेवल-7 पर है और उसका अगला प्रमोशनल पद लेवल-10 का है, तो मौजूदा व्यवस्था में उसे MACP के तहत केवल लेवल-8 मिल सकता है। इससे वास्तविक प्रमोशन और वित्तीय लाभ के बीच बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। एसोसिएशन ने कहा कि इससे कर्मचारियों का मनोबल गिरा है। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहाँ ज्यादा जिम्मेदारियों (जैसे ऑफिस सुपरिटेंडेंट) पर प्रमोट किए गए जूनियर स्टाफ लेवल 6 में ही बने रहते हैं जबकि उनके जूनियर, जिन्हें प्रमोशन नहीं मिला, उन्हें MACP के तहत लेवल 7 मिल जाता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय परिषद-जेसीएम स्टाफ साइड ने मांग की है कि प्रमोशन क्रम में MACP प्रोवाइड किया जाए, जिसका समर्थन कई अन्य यूनियनों ने भी किया है। रेलवे वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति ने 10 साल के अंतराल के मानवीय नुकसान को उजागर करते हुए कहा कि फाइनेंशियल अपग्रेडेशन के बीच 10 साल का लंबा अंतराल लंबे समय तक गतिरोध का कारण बनता है, खासकर उन कैडरों में जहां प्रमोशन के पद सीमित हैं। बता दें कि पिछले साल आठवें वेतन आयोग का गठन हुआ था। वेतन आयोग को 18 महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने की डेडलाइन मिली हुई है।

लाल सागर में हूतियों की बढ़त से बढ़ा Bab-el-Mandeb पर खतरा, भारत के Oil Trade पर पड़ेगा बड़ा असर

 नई दिल्‍ली दुनिया भर में एनर्जी का संकट बढ़ता ही जा रहा है, क्‍योंकि होर्मुज पहले से ही प्रभावित है और अब सऊदी अरब ने इराकी क्षेत्र से किए गए कई ड्रोन हमलों के बाद अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. इसके साथ यमन के लाल सागर तट पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले में हूती विद्रोही बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कंट्रोल करने के कगार पर पहुंच चुके हैं।  ये तीनों रास्‍ते दुनिया की तेल सप्‍लाई के लिए काफी महत्‍वपूर्ण माने जाते हैं. स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का 20 फीसदी तेल आयात करता था, जबकि सऊदी अरब के पाइपलाइन से हर दिन 40 से 50 लाख बैरल तेल सप्‍लाई होती थी. वहीं बाब अल-मंडेब से भी दुनिया के कुल समुद्री तेल और गैस व्यापार का लगभग 5% से 12% हिस्सा यानी 4 से 5 मिलियन बैरल हर दिन तेल सप्‍लाई होता है।  इसका मतलब है कि इन तीनों रास्‍ते से करीब 30 फीसदी सप्‍लाई प्रभावित होगी, क्‍योंकि होर्मुज और बाब अल मंडेब के बाद ईरान तेल सप्‍लाई को अपने तरीके से चला सकता है और वह मिडिल ईस्‍ट से आने वाले तेल-गैस को रोक सकता है।  भारत के ऑयल ट्रेड पर बढ़ेगा खतरा भारत से  3,000 किलोमीटर दूर मौजूद बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर अगर हूतियों का पूरी तरह कंट्रोल हो जाता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, यूरोप को होने वाले एक्सपोर्ट और सामान की ढुलाई पर पड़ सकता है।  बाब-अल-मंदेब लाल सागर और गल्फ ऑफ एडन को जोड़ने वाला करीब 29 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है. यह रास्ता सुएज नहर के जरिए यूरोप को हिंद महासागर और एशिया से जोड़ता है. भारत के लिए यह रास्ता इसलिए अहम है क्योंकि कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के साथ-साथ दवाइयां, मशीनरी, टेक्सटाइल और दूसरे सामान भी इसी रूट से यूरोप पहुंचते हैं।  कैसे बढ़ा हूतियों का कंट्रोल? हूती संगठन अंसार अल्लाह ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में अपना कंट्रोल मजबूत किया. लाल सागर का बड़ा हिस्सा भी उनके प्रभाव में आया. 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हुई, लेकिन उन्हें पूरी तरह पीछे नहीं हटाया जा सका।  अब हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और दूसरे आधुनिक हथियार हैं. ताजा घटनाक्रम में स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने करीब 18 घंटे में यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़त बनाई।  रॉयटर्स के मुताबिक हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जा किया और हनिश द्वीपों की ओर बढ़े. एपी ने मायून यानी पेरिम द्वीप पर हूतियों के कब्जे की खबर दी. फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक हूती जूकर और हनिश द्वीपों तक भी पहुंचे हैं. हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा कि उन्होंने बाब-अल-मंदेब पर कंट्रोल कर लिया है. हालांकि ईरान ने हूतियों को ताजा मदद देने और ईरानी अधिकारियों को यमन भेजने की खबरों का खंडन किया है।  रास्ता बंद हुआ तो भारत पर क्या असर? अगर बाब-अल-मंदेब से जहाजों का आना-जाना मुश्किल होता है तो शिपिंग और इंश्योरेंस का खर्च तेजी से बढ़ सकता है. 2023 के आखिर में हूती हमलों के बाद करीब 2,000 जहाजों ने सुएज नहर से बचते हुए अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप का रास्ता अपनाया था. इससे भारत आने वाले सामान की सप्लाई में देरी हुई।  भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल की कीमतों को लेकर है. बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मात्रा 2023 में करीब 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी, जो 2025 की पहली छमाही में घटकर करीब 4.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई. हूतियों की ताजा बढ़त की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया और बाद में करीब 99 डॉलर के आसपास रहा. भारत रूस जैसे दूसरे स्रोतों से तेल खरीद सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत पर भी पड़ेगा।  एक्सपोर्ट पर भी पड़ेगा असर भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता यूरोप को होने वाला एक्सपोर्ट है. अगर जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ जाना पड़ा तो मुंबई से रॉटरडैम की दूरी करीब 15,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 23,000 किलोमीटर हो सकती है. इससे ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और भारतीय सामान यूरोप में महंगा हो सकता है।  ऐसे में 3,000 किलोमीटर दूर यमन में बाब-अल-मंदेब पर बढ़ता हूती कंट्रोल भारत के लिए सिर्फ पश्चिम एशिया का संकट नहीं है. इसका असर तेल की कीमत, शिपिंग खर्च और यूरोप के साथ भारत के कारोबार पर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट पर पहले से दबाव के बीच बाब-अल-मंदेब का संकट भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और एक्सपोर्ट, दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बन सकता है।  ये तीनों रास्‍ते पूरी तरह बंद हुए तो कितना बड़ा संकट?  अब अगर इन तीनों रास्‍तों को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है तो दुनिया की लगभग 30 फीसदी सप्‍लाई पूरी तरह ठप हो जाएगी. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूरोप, भारत और चीन जैसे देशों को जाने वाली एनर्जी सप्‍लाई ज्‍यादा प्रभावित हो जाएंगी और अगर ये लंबे समय तक बंद रहता है तो दुनिया भर को एक भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है।  जैसे पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम तेजी से बढ़ेंगे. सप्‍लाई चेन प्रभावित होने से अंतरराष्‍ट्रीय बाजारों से आने वाली चीजें काफी महंगी हो जाएंगी, भारत से इन देशों को निर्यात भी प्रभावित होगा. कच्‍चा माल महंगा होने से प्रोडक्‍ट्स की कीमतें बढ़ जाएंगी, जिससे बाजार में खरीदारी कम होगी और महंगाई के कारण इकोनॉमी प्रभावित होगी।  शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहेगा. जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी. कंपनियों की कमाई भी तेजी से घट सकती है, जिससे इनके शेयरों पर असर होगा. ऐसे में भारत से लेकर ग्‍लोबल लेवल पर बाजारों में मंदी की स्थिति आ सकती है. आइए समझते हैं कौन सा रास्‍ता कितना अहमियत रखता है…  सऊदी पाइपलाइन का रास्‍ता सबसे पहले सऊदी अरब का तेल, उसके पूर्वी क्षेत्र से होते हुए Arabian Peninsula के अंदर से पश्चिम की ओर Yanbu Port की ओर जाता है, फिर यहां से लाल सागर में जाकर मिलता है और वहां … Read more

गधों की वजह से बदली रेगिस्तान की तस्वीर, 44 साल में बंजर जमीन पर फिर लौटी हरियाली

यरुशलम गधों को लेकर जितनी तरह का कहावतें प्रचलित हैं उनसे लगता है कि यह दुनिया के बहुत ही सुस्त और अनुपयोगी जीव है। हालांकि गधे हमेशा से ही इंसानों के लिए उपयोगी रहे हैं। बोझा ढोने के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी गधों के अंदर अद्वितीय क्षमता होती है। सबसे बड़ी बात यह ऐसा जीव है जिसमें खूब सहनशक्ति और धैर्य होता है। रेमन क्रेटर के रेगिस्तान में तो 28 जंगली गधों ने ऐसा कमाल किया कि रेत में भी हलियाली लौट आई। आज यहां 500 से 600 गधे कुलाचे भर रहे हैं। जरूरत के हिसाब से गधों का शरीर भी परिवर्तित हो गया। आज ये गधे देखने मे छोटे-छोटे घोड़ों की तरह नजर आते हैं। ईरान से मंगवाए गए गधे लगभग 44 साल पहले इजरायल ने नेगेव रेगिस्तान में ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के जंगली गधों को छोड़ा था। दरअसल 20 शताब्दी में शिकार की वजह से यहां गधों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी। ईरान और इजरायल में अब भले ही दुश्मनी हो लेकिन उस समय इजरायल ने पर्यावरण बचाने के लिए तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी से बात की। 1968 में ईरान से 28 गधे भेजे गए। इन्हें पहले योतवाता वाइल्डलाइफ रिजर्व में लाया गया और कुछ दिन यहां रखा गया। 1982 में 28 गधे सूखे रेगिस्तान में छोड़ दिए गए। आज इस इलाके के नक्शा बदल चुका है। यहां कई तरह की वनस्पतियां विकसित होने लगी हैं। वहीं गधे भी इस माहौल में अच्छी तरह सर्वाइव कर गए। इजरायली अधइकारियों का कहना था कि इस इलाके में गधों को छोड़ने से एक तो इस प्रजाति की सुरक्षा होगी दूसरा रेगिस्तान में फिर से जीवन लौट आएगा। जिन दो नस्लों को यहां छोड़ा गया था, दोनों ही खत्म होने की कगार पर थीं। ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान इजरायल के साथ संबंध अच्छे थे। इसीदौरान शाह ने इजरायल को गधे गिफ्ट किए थे। इन्हें हवाई जहाज से इजरायल लाया गया था। इसके बाद कुछ गधे इथियोपिया से मंगवाए गए। जब इन्हें रामोन क्रेटर में छोड़ा गया तो यहीं उनका पसंदीदा अड्डा बन गया। गधों ने यहां भयंकर गर्मी और शुष्क जलवायु का सामना किया। इन गधों के आकार में परिवर्तन हो गया और ये छोटे-छोटे घोड़े जैसे दिखने लगे। गधे अब सुस्त जीव नहीं बल्कि 70 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले घोड़ बन गए थे। अब ये यहां 45 डिग्री के तापमान में भी सर्वाइव कर लेते हैं और बिना पानी के भी कई दिनों तक रह सकते हैं। इसके अलावा इन गधों को अब गड्ढा खोदने की कला भी आ गई है। गड्ढे में पानी भर जाता है तो दूसरे जीव भी पानी पीते हैं। इसके अलावा गड्ढे के आसपास हरियाली भी हो जाती है।  

राफेल-F-35 पर भारी पड़ेगा ये फाइटर जेट? भारत को मिला बड़ा ऑफर, पाकिस्तान में मची खलबली

नई दिल्ली रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर ब्रिक्‍स समिट में हिस्‍सा लेने के लिए इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुतिन से मुलाकात भी हुई है. दोनों देशों ने आपसी संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया. दोनों नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्‍टम की 5 और यूनिट खरीदने का फैसला किया है. इस तरह भारत के पास इस अल्‍ट्रा मॉडर्न एयर डिफेंस सिस्‍टम के कुल 10 स्‍क्‍वाड्रन हो जाएंगे. ऑपरेशन सिंदूर में S-400 ने पाकिस्‍तान को नानी याद दिला थी. अब रूस ने भारत दो बड़े ऑफर दिए हैं. पहला, पांचवीं पीढ़ी का Su-57 फाइटर जेट और दूसरा बेहद ताकतवर 177S जेट इंजन. 177S फाइटर जेट इंजन दुनिया के ताकतवर इंजन में शुमार है. रूस की ओर से दिए गए ऑफर में Su-30MKI को 177S जेट इंजन के साथ अपग्रेड करने का ऑफर दिया गया है. यदि इसपर बात बनती है तो Su-30MKI रफ्तार के मामले में अमेरिका के 5th जेनरेशन जेट F-35 और राफेल लड़ाकू विमान से और भी ज्‍यादा ताकतवर हो जाएगा. बता दें कि Su-30MKI फाइटर जेट ने ही पाकिस्‍तान पर ब्रह्मोस बरसाया था।  रूस ने भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों के बेड़े के आधुनिकीकरण के लिए अपने एडवांस Izdeliye 177S इंजन की पेशकश की है. इस इंजन को मौजूदा Su-30MKI में बड़े ढांचागत बदलाव के बिना इंटीग्रेशन करने की संभावना जताई जा रही है. इससे भारत को पुराने इंजन की जगह अधिक क्षमता वाले पावरप्लांट को अपनाने का विकल्प मिल सकता है. रूसी प्रस्ताव के अनुसार, 177S इंजन 14.5 टन तक का थ्रस्ट दे सकता है. इसका आकार और वजन AL-31F/FP इंजन के समान बताया गया है, जिससे Su-30 परिवार के विमानों में इसके इंटीग्रेशन को अपेक्षाकृत आसान बनाने में मदद मिल सकती है. इंजन की सेवा अवधि करीब 6,000 घंटे और अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में ईंधन खपत में लगभग 7 प्रतिशत कमी का दावा किया गया है।  भारत के लिए क्‍यों अहम भारत के लिए इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) पहले से ही रूस के साथ लाइसेंस के तहत AL-31FP इंजन का उत्पादन और रखरखाव (Production and Maintenance) करता है. ऐसे में 177S पर सहयोग भारतीय एयरोस्पेस उद्योग की घरेलू क्षमता को आगे बढ़ाने का अवसर दे सकता है. यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब भारत और रूस के बीच Su-57E पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर भी बातचीत जारी है. ऐसे में फाइटर जेट इंजन सहयोग दोनों देशों के बीच व्यापक लड़ाकू विमान और एयरोस्पेस साझेदारी का अगला चरण बन सकता है।  F-35 और राफेल से भी ताकतवर हो जाएगा Su-30MKI Su-30MKI एक ट्विन इंजन हेवी फाइटर जेट है. इसमें फिलहाल दो AL-31FP टर्बोफैन इंजन लगे हुए हैं. हर इंजन की ताकत 123 KN की है. इस तरह Su-30MKI लड़ाकू विमान 246 KN थ्रस्‍ट के साथ उड़ान भरने में सक्षम है. रूसी टर्बो फाइटर जेट मैक-2 यानी 2469 KMPH से भी ज्‍यादा की रफ्तार से टार्गेट की तरफ भाग सकता है. अब बात करते हैं राफेल फाइटर जेट की. इसमें 75 KN के थ्रस्‍ट वाले दो इंजन लगे हैं. ट्विन इंजन होने की वजह से फ्रांस का यह जेट 150 KMPH की रफ्तार से उड़ान भर सकता है. वहीं, अमेरिका का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान F-35 भी इस मामले में Su-30MKI से पीछे है. F-35 फाइटर जेट 191 KN थ्रस्‍ट से उड़ान भर सकता है. फ्लाइट मोड में इसकी रफ्तार मैक-1.6 यानी 1975 KMPH होती है। 

8th Pay Commission News: कर्मचारी कर रहे OPS बहाली की मांग, UPS में सुधार का मिल सकता है विकल्प

नईदिल्ली     8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) में सैलरी-पेंशन को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों की उम्मीदें लगातार बढ़ती जा रही हैं. हालांकि, इसके साथ ही पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की मांग भी तेजी से जोर पकड़ रही है. 8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही केंद्रीय कर्मचारियों और यूनियनों ने पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने पर बड़ा जोर दिया है. कर्मचारी संगठन नई पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को खारिज करते हुए सिर्फ OPS की वापसी चाहते हैं।  ओल्ड पेंशन स्कीम की वापसी की मांग कर्मचारी संगठन और रेलवे यूनियनों का कहना है कि न्यू पेंशन स्कीम(NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम  (UPS) कर्मचारियों की सोशल सोक्योरिटी की गारंटी पूरी तरह नहीं देती हैं. इसलिए यूनियनों की ये बड़ी मांग है कि 8वें वेतन आयोग के तहत सभी कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को फिर से लागू किया जाए।  एक तरह कर्मचारी संगठन 8वें वेतन आयोग के तहत ओपीएस लागू करने पर अड़े हुए हैं, जबकि दूसरी तरफ इकनॉमिक एक्सपर्ट और कानूनी जानकार इस मांग पर पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं .यूनियनों की इस मांग पर उन्होंने अपनी चिंताएं जताई हैं. उनका मानना है कि पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करना व्यावहारिक नहीं है।  कर्मचारियों को NPS और UPS से क्यों है ऐतराज? कर्मचारी यूनियनों की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक सुरक्षा को लेकर है. उनका तर्क है कि ओपीएस में निश्चित पेंशन मिलती थी,  जबकि  NPS का रिटर्न पूरी तरह बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है, जिससे रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर असर पड़ता है।  लीगल और इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स ने क्यों जताई चिंता? एक्सपर्ट के अनुसार, ओपीएस लागू करने से सरकारी खजाने पर बेहद भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, जिससे देश के विकास कार्यों का बजट प्रभावित हो सकता है.कानूनी रूप से भी सरकार पहले ही NPS को बेहतर करने के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) का ऑप्शन ला चुकी है. ऐसे में  पुरानी व्यवस्था पर पूरी तरह लौटना नीतिगत और कानूनी रूप से  उलझाऊ और बेहद मुश्किल है।  ओल्ड पेंशन से लेकर मिनिमम सैलरी तक: कर्मचारियों की 5 बड़ी मांगें 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की बैठकों का दौर जारी है. हाल ही में चेन्नई में हुई बड़ी बैठक में केंद्रीय कर्मचारियों- पेंशनभोगियों  के लिए पेंशनर्स फोरम ने 5 बड़ी मांगें आयोग के सामने रखा है।      सबसे पहली और बड़ी मांग यह है कि नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) को हटाकर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को तुरंत बहाल किया जाए. सालों से जारी इस मांग को चेन्नई बैठक में  सबसे ज्यादा जोर दिया गया।      इसके अलावा, रिटायर हो चुके कर्मचारियों और उनके आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बेसिक पेंशन और फैमिली पेंशन दोनों में सम्मानजनक बढ़ोतरी की अपील की गई है. उनकी मांग है कि न्यूनतम बेसिक सैलरी बढ़ाकर ₹68,000 किया जाए और 10 साल के लंबे इंतजार के बजाय स्थाई 'वेज-रिविजन' सिस्टम बने।      पेंशन कम्यूटेशन या कम्यूटेड पेंशन की रिकवरी के नियमों को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता बनी हुई है, जिस पर राहत और आसान नियम बनाने की मांग की है।      वहीं, प्रमोशन और सैलरी इंक्रीमेंट से जुड़े मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (MACP) के तहत मिलने वाले फायदों को रिवाइज करने की मांग उठाई गई है, ताकि डाक कर्मचारियों के करियर ग्रोथ और पे-स्केल में सुधार हो सके।      इसके साथ ही, कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए बेहतर भत्ते, लीव रूल्स और एक मजबूत सोशल सिक्योरिटी कवर देने की बात भी आयोग के समक्ष रखी गई है।  OROP पर क्या कहती हैं लीगल एक्सपर्ट? सशस्त्र बलों की तर्ज पर सिविलियन कर्मचारियों के लिए 'वन रैंक, वन पेंशन' (OROP) लागू करने की मांग पर लीगल फर्म CMS INDUSLAW की पार्टनर अमृता टोंक का कहना है कि सिविल सेवाओं का ढांचा सेना से अलग होता है. हर विभाग, काडर और भर्ती के साल का हिसाब अलग होने के कारण एक समान OROP फॉर्मूला लागू करने से नई असमानताएं पैदा हो सकती हैं।  प्री-2026 पेंशनर्स के अधिकारों पर उनका मानना है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारियों द्वारा अर्जित किए गए अधिकार हैं. आयोग पुराने पेंशनर्स के लाभों को फ्रीज नहीं कर सकता. कानूनी रूप से सही रास्ता यही है कि नए बदलावों को केवल भविष्य में जुड़ने वाले नए कर्मचारियों पर ही लागू किया जाए।  आगे  क्या रास्ता निकाल सकती है सरकार? जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग मई-जून 2027 के आसपास अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकता है. 16 से 18 सितंबर को चंडीगढ़ में अगली बैठक होनी है।  एक्सपर्ट्स के अनुसार, OPS की पूरी तरह बहाली की गुंजाइश भले ही कम हो, लेकिन सरकार कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखते हुए यूपीएस में कुछ और सुधार कर सकती है.हालांकि ओपीएस की पूरी तरह बहाली की संभावना बहुत कम है। 

China-India Direct Flight: 6 साल बाद ग्वांगझू-दिल्ली उड़ानें फिर शुरू, भारतीय व्यापारियों का बचेगा समय और खर्च

नई दिल्ली चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दिल्ली दौरे से ठीक पहले  चीन-दक्षिण एयरलाइंस (China Southern Airlines) ने 6 साल बाद ग्वांगझू-दिल्ली डायरेक्ट फ्लाइट (Guangzhou-Delhi Direct Flight) शुरू करने का ऐलान किया है.ग्वांगझू भारत के व्यापारियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा हब माना जाता है. चीनी एयरलाइंस की ओर से ग्वांगझू-नई दिल्ली फ्ला इट्स शुरू करने और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे की यह खबर ट्रेड, बिजनेस और इकोनॉमी के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है… आइए जानते हैं कि इस डायरेक्ट कनेक्टिविटी के शुरू होने से भारतीय कारोबारियों और इम्पोर्टर्स को क्या-क्या बड़े फायदे होंगे?बिजनेस ट्रैवल, सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की लागत पर इसका क्या असर पड़ेगा? व्यापारियों को बड़ा फायदा, आधा रह जाएगा ट्रैवल टाइम, घटेगा खर्च ग्वांगझू दक्षिण चीन का सबसे बड़ा ट्रेड और एक्सपोर्ट सेंटर है. भारत के हजारों कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, हार्डवेयर, ऑटो पार्ट्स और प्लास्टिक व्यापारी हर साल कैंटन फेयरऔर सप्लाई चेन के सिलसिले में ग्वांगझू जाते हैं. 6 साल बाद डायरेक्ट फ्लाइट शुरू होने से बिजनेस ट्रैवल टाइम  घटकर सीधे आधा हो जाएगा।  सिर्फ 5-6 घंटे का सफर! लॉजिस्टिक्स और सैंपल चेकिंग में आएगी तेजी अभी तक भारतीय व्यापारियों को हांगकांग, बैंकॉक या मलेशिया होकर जाना पड़ता था, जिससे 12 से 18 घंटे लगते थे. अब 5-6 घंटे में सीधे पहुंचने से लॉजिस्टिक्स, सैंपल चेकिंग और सौदों की फाइनल डिलीवरी में काफी तेजी आएगी वहीं,, कनेक्टिंग फ्लाइट्स से जाने से टिकट के दाम और ट्रैवल का खर्च काफी ज्यादा आता था. डायरेक्ट फ्लाइट्स से व्यापारियों की लॉजिस्टिक्स और ट्रैवल कॉस्ट घटेगी।  राष्ट्रपति शी जिनपिंग के BRICS सम्मेलन के लिए दिल्ली आने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव कम होने की उम्मीद है, जिससे द्विपक्षीय व्यपार(Bilateral Trade) को नया बूस्ट मिलेगा।  सीपी मार्केट एसोसिएशन के विक्रम बधवार (Vikram Badhwar) ने कहा, "अगर दोनों देशों के बीच डायरेक्ट फ्लाइट शुरू हो रही है, तो यह बहुत ही अच्छी बात है. वहां से भी फ्लाइट्स भारत आएंगी और यहां से भी चीन जाएंगी, जिससे दोनों देशों के बीच भाईचारा और आपसी रिश्ते बेहतर होंगे. आखिर आपस में लड़ने से किसी का क्या फायदा है? आज हमारे देश के कई व्यापारी व्यापार के लिए चीन पर निर्भर हैं. डायरेक्ट फ्लाइट्स चलने से अब व्यापारियों को घूम-फिर कर दूसरे रास्तों से नहीं जाना पड़ेगा. बिजनेस और ट्रेड के लिहाज से यह बेहद अच्छी शुरुआत है।  देशों के बीच बिजनेस-ट्रेड होगा मजबूत चीन के सरकारी मीडिया 'पीपुल्स डेली' के जर्नलिस्ट रेन येन और वेई च्यांग ने NDTV से बातचीत में कहा, "7 साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा बेहद अहम है. हमें पूरी उम्मीद है कि इस दौरे से दोनों देशों के बीच बिजनेस, ट्रेड और लोगों का आपस में मिलना-जुलना बढ़ेगा. महामारी और बीते कुछ सालों की दूरियों के कारण दोनों देशों के बीच सीधा संपर्क काफी सीमित हो गया था. ऐसे में चीन और भारत के बीच सीधी उड़ानों का दोबारा शुरू होना रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा और अच्छा कदम है।  उन्होंने आगे कहा, "चीन और भारत सिर्फ पड़ोसी देश ही नहीं हैं, बल्कि दोनों ही दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले और समृद्ध इतिहास वाले देश हैं. हमें आपस में दूरी बनाने के बजाय एक-दूसरे का हाथ थामकर आगे बढ़ना चाहिए. हम आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच बिजनेस एंड कल्चरल ट्रेड बढ़ने की उम्मीद कर रहे हैं। 

FASTag नियम सख्त: गलत लेन या बिना एक्टिव FASTag टोल पार किया तो देना होगा दोगुना शुल्क

नई दिल्ली देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर सफर को आसान और तेज बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन व्यवस्था लागू की गई है. हालांकि, जल्दबाजी या लापरवाही में कई वाहन चालक गलत लेन में गाड़ी घुसा देते हैं. ऐसे में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के परिचालन दिशा निर्देशों के मुताबिक अगर कोई पैसेंजर कार ड्राइवर कमर्शियल वाहनों, ओवरसाइज़्ड ट्रांसपोर्ट्स या खास काम के लिए तय FASTag लेन में गलत तरीके से दाखिल होते हैं, तो उससे सामान्य टोल दर का दोगुना टैक्स वसूला जाएगा।  चालान और कानूनी कार्रवाई का भी जोखिम दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात में रुकावट और जाम जैसे हालात को रोकने के लिए NHAI ने कड़े कदम उठाए हैं. टोल प्लाजा पर लगे आधुनिक हाई-डेफिनिशन सेंसर और कैमरे वाहन के आकार व श्रेणी को खुद बखुद पहचान लेते हैं और गलत लेन में जाने पर सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर देता है. इसके बाद टोल बूथों के आसपास तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी मोटर वाहन अधिनियम के तहत लेन अनुशासन तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग के आरोप में ऑन-द-स्पॉट या ई-चालान जारी कर सकते हैं।  हाईवे अथॉरिटी के हालिया रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हर 10 में से एक गाड़ी बिना मान्य FASTag या बिना बैलेंस के इन टोल प्वाइंट्स से गुजर रही है. बता दें कि, दिल्ली के मुंडका, गुजरात के चोरयासी, हरियाणा के घरौंडा और राजस्थान के दौलतपुरा व मनोहरपुरा टोल प्लाजा के आंकड़ों से पता चला है कि मई से जुलाई के बीच करीब 1.10 करोड़ गाड़ियों में से 10.52 लाख गाड़ियों को ई-नोटिस भेजे गए हैं. अगर आप भी अपने FASTag को समय पर रीचार्ज नहीं करते या ब्लैकलिस्टेड टैग के साथ बैरियरलेस टोल पार करते हैं तो आपकी जरा सी लापरवाही जेब पर काफी भारी पड़ सकती है।  दोगुना पेनल्टी का है खतरा बता दें कि, बैरियरलेस टोल प्लाजा पर अगर आपकी कार के FASTag में बैलेंस कम है या टैग काम नहीं कर रहा है तो सिस्टम तुरंत आपकी गाड़ी का चालान काटकर ई-नोटिस जारी कर देता है. यह नोटिस गाड़ी मालिक के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है. सरकारी नियमानुसार ई-नोटिस मिलने के बाद आपको सामान्य टोल टैक्स चुकाने के लिए पूरे 72 घंटे यानी 3 दिन का समय दिया जाता है।  यदि अगर आप इस तय समयसीमा के भीतर ऑनलाइन पेमेंट नहीं करते हैं तो 72 घंटे बीतते ही यह रकम दोगुनी कर दी जाती है. यानी जो टोल आप आराम से कम पैसों में दे सकते थे उसके लिए आपको सीधा डबल जुर्माना भरना पड़ेगा। ०  सबसे ज्यादा नियम तोड़ने का रिकॉर्ड जानकारी के लिए आपको बता दें कि, आंकड़ों का विश्लेषण करने पर सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि टोल नियमों को तोड़ने में सबसे आगे कार और जीप वाले ही हैं. मई से जुलाई के बीच जारी हुए कुल 10.52 लाख ई-नोटिस में से 91 परसेंट से भी ज्यादा यानी 9.62 लाख नोटिस सिर्फ निजी कारों को भेजे गए हैं।  वहीं ट्रकों और बसों जैसी भारी गाड़ियों की हिस्सेदारी इसमें केवल 3.5 परसेंट के करीब ही रही है. ज्यादातर कार चालक FASTag का लो बैलेंस नजरअंदाज कर देते हैं या विंडशील्ड पर गलत तरीके से लगा टैग लेकर निकल पड़ते हैं. दिल्ली के मुंडका टोल प्लाजा पर सबसे ज्यादा 4.54 लाख ई-नोटिस जारी किए गए हैं।  ई-नोटिस न भरने पर रुक जाएंगे काम आपको यह भी बता दें कि, कई लोग सोचते हैं कि ई-नोटिस आने के बाद भी अगर भुगतान न करें तो क्या ही फर्क पड़ेगा. लेकिन अथॉरिटी ने इस बार नियम काफी सख्त कर दिए हैं. अगर आपके नाम पर बकाया ई-नोटिस जमा नहीं होता है तो भविष्य में गाड़ी से जुड़े लगभग सभी सरकारी काम पूरी तरह ठप हो जाएंगे।  जब भी आप अपनी गाड़ी का मालिकाना हक किसी दूसरे के नाम ट्रांसफर कराने जाएंगे गाड़ी का रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराएंगे या फिटनेस सर्टिफिकेट लेने जाएंगे तो आपको एनओसी जारी नहीं किया जाएगा. जब तक आप अपना सारा बकाया टोल जुर्माना नहीं भर देते तब तक वाहन पोर्टल पर आपकी गाड़ी के सारे काम रोक दिए जाएंगे।  इन गलतियों की वजह से लगता है दोगुना जुर्माना     पैसेंजर कार को ट्रकों और भारी व्यावसायिक वाहनों के लिए रिजर्व लेन में ले जाना.     FASTag वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस न होने पर ऑटोमेटिक सेंसर टैग को स्कैन नहीं करता और बैरियर नहीं खुलता, जिससे गाड़ी गलत श्रेणी में आ जाती है.     तय प्रक्रिया के अनुसार फास्टैग को सामने की विंडशील्ड पर सही ढंग से न चिपकाने या हाथ में लेकर दिखाने पर भी दोगुना टोल लिया जा सकता है.     केवाईसी (KYC) अधूरा होने या वाहन नंबर से सही तरीके से लिंक न होने पर टैग ब्लॉक हो जाता है. पेनल्टी और असुविधा से बचने के लिए ये करें     टोल प्लाजा आने से 100-200 मीटर पहले ओवरहेड इलेक्ट्रॉनिक इंडिकेटर और साइन बोर्ड को ध्यान से देखें और केवल अपनी श्रेणी वाली लेन में ही गाड़ी चलाएं.     हाईवे पर निकलने से पहले अपने FASTag से जुड़े बैंक ऐप या वॉलेट में पर्याप्त धनराशि सुनिश्चित करें.     अपने फास्टैग स्टीकर को कार की आगे वाली कांच के ठीक बीच में अंदर की तरफ चिपकाएं. जुर्माना से बचने के लिए करें ये काम अगर आप भी हाईवे पर बिना किसी झंझट और जुर्माने के सफर करना चाहते हैं तो कुछ छोटी-छोटी बातों का हमेशा ध्यान रखें. सबसे पहले जब भी लंबी यात्रा पर निकलें तो  अपने FASTag वॉलेट में हमेशा पर्याप्त बैलेंस बनाकर रखें ताकि रास्ते में लो-बैलेंस की दिक्कत न हो. इसके अलावा FASTag को अपनी गाड़ी की विंडशील्ड पर बिल्कुल सही जगह और सही तरीके से चिपकाएं ताकि हाई-स्पीड एएनपीआर कैमरे उसे एक बार में ही स्कैन कर सकें।  अगर कभी गलत टोल कट जाता है या कोई तकनीकी गड़बड़ी होती है तो घबराने की जरूरत नहीं है. आप 3 दिनों के भीतर संबंधित वेबसाइट पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जांच के बाद आपका पैसा आपके FASTag में वापस क्रेडिट कर दिया जाएगा। 

Farakka Treaty: सिंधु जल संधि के बाद अब गंगा जल बंटवारे पर बांग्लादेश की नजर, दिसंबर 2026 में खत्म होगा समझौता

नई दिल्ली बीते साल पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से साथ सिंधु जल संधि से दूरी बना ली. एक तरह से भारत ने इस संधि को अपनी तरफ से सस्पेंड कर दिया. इस कारण पाकिस्तान गर्मियों में प्यासे रहने को मजबूर हो गया है. वह तिलमिलाया हुआ है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा में लगा हुआ है. इस बीच कुछ ऐसा ही डर अब बांग्लादेश को सताने लगा है. वैसे भी अगस्त 2024 में बांग्लादेश से शेख हसीना सरकार के हटने के बाद यह पड़ोसी कुछ ज्यादा ही फड़फड़ा रहा है. वहां की मौजूदा सरकार और इससे पहले अंतरिम सरकार के मुखिया रहे मोहम्मद यूनिस ने भारत से नफरत की सारी हदें पार कर दी. यह मुल्क इस वक्त चीन और पाकिस्तान की गोद में बैठकर भारत के लिए मोहरा बन रहा है. लेकिन, इस वक्त वह एक कड़वी सच्चाई का सामना कर रहा है. यह सच्चाई है गंगा नदी जल बंटवारे को लेकर हुई फरक्का संधि. इस संधि की मियाद इसी साल दिसंबर में पूरी हो रही है. भारत ने इस संधि में एक पड़ोसी होने के नाते बांग्लादेश को कई तरह की रियायत दी थी. लेकिन, अगर भारत इस मौजूदा संधि के प्रावधानों को कड़ाई से लागू कर दे तो गर्मियों के सीजन में बांग्लादेश को छठी का दूध याद आ जाएगा. इसी कारण वहां के हुक्मरान अब पाकिस्तान की तरह ही तिलमिलाए हुए हैं।  दिसंबर में खत्म हो रही है 30 साल पुरानी संधि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को समझौता हुआ था. इसे आम तौर पर गंगा जल बंटवारा संधि या फरक्का संधि कहा जाता है. यह 30 साल के लिए हुई थी और दिसंबर 2026 में इसकी अवधि खत्म हो रही है. यही वजह है कि इस समय दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर बातचीत बेहद अहम हो गई है. इस संधि के तहत फरक्का पर जनवरी से मई के बीच गंगा के पानी का बंटवारा किया जाता है. यानी वह समय जब नदी का प्राकृतिक बहाव कम हो जाता है और पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए यह महज पानी का समझौता नहीं है. यह खेती, पीने के पानी, मछली पालन, नदी परिवहन और पर्यावरण से जुड़ा मामला है  असली डर पानी कम होना बांग्लादेश की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर गंगा का बहाव ही कम हो गया तो उसे मिलने वाला पानी भी कम हो सकता है. 1996 की संधि में पानी के बंटवारे के लिए एक फॉर्मूला बनाया गया है. अगर फरक्का पर पानी का बहाव 70 हजार क्यूसेक या उससे कम है तो दोनों देशों के बीच पानी बराबर बांटा जाता है. 70 हजार से 75 हजार क्यूसेक के बीच होने पर बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक मिलता है. वहीं 75 हजार क्यूसेक से ज्यादा बहाव होने पर भारत को 40 हजार क्यूसेक मिलता है और बाकी पानी बांग्लादेश को जाता है. लेकिन यहां एक पेंच है. इस समझौते में बांग्लादेश के लिए किसी स्थायी न्यूनतम जल-गारंटी का प्रावधान नहीं है. यही बात आज ढाका को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है. बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री भी कह चुके हैं कि नई संधि में गारंटी क्लॉज की जरूरत है और उनका देश ज्यादा पानी हासिल करना चाहता है।  1977 की संधि में था गारंटी क्लॉज यही वह बात है जो बांग्लादेश को पुराने समझौते की याद दिला रही है. 1977 में भारत और बांग्लादेश के बीच पांच साल के लिए पानी बांटने का समझौता हुआ था. उसमें बांग्लादेश के लिए एक न्यूनतम गारंटी क्लॉज था. इस प्रावधान के तहत कम बहाव की स्थिति में भी एक न्यूनतम मात्रा सुनिश्चित करने की व्यवस्था थी. लेकिन 1996 की 30 साल वाली संधि में ऐसा कोई स्थायी न्यूनतम गारंटी क्लॉज नहीं रखा गया. अब बांग्लादेश चाहता है कि नई संधि में उसकी इस मांग को शामिल किया जाए. वहां के जल संसाधन मंत्री ने अगस्त 2026 में साफ कहा कि ढाका मौजूदा समझौते को फिर से बातचीत के जरिए बदलना चाहता है और जरूरत पड़ने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों का रुख भी कर सकता है।  भारत के लिए फरक्का क्यों महत्वपूर्ण है? अब सवाल है कि आखिर फरक्का को लेकर इतना विवाद क्यों है? भारत ने पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज का निर्माण किया था. इसका मकसद गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी की ओर मोड़ना था. इससे कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को हटाने और नदी की नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद थी. लेकिन गंगा भारत से निकलकर बांग्लादेश भी जाती है. वहां यही नदी पद्मा के नाम से जानी जाती है. इसलिए फरक्का से पानी मोड़े जाने का असर नीचे की ओर बांग्लादेश तक पहुंचता है. यही वजह है कि ढाका लंबे समय से फरक्का को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करता रहा है।  भारत ने खुद को सिंधु जल संधि से अलग कर लिया है. इस कारण पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है।  बांग्लादेश को गर्मियों में क्यों लगता है सबसे ज्यादा डर? गर्मी और सूखे के महीनों में गंगा का प्राकृतिक बहाव पहले ही कम हो जाता है. ऐसे में पानी की मांग बढ़ती है. बांग्लादेश के लिए इसका असर सिर्फ नदियों तक सीमित नहीं है. कम पानी का मतलब सिंचाई पर असर, मछलियों और जलीय जीवों पर असर और दक्षिण-पश्चिमी हिस्सों में समुद्री खारे पानी के ऊपर आने का खतरा भी बढ़ना है. बांग्लादेशी विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा के कम प्रवाह का असर देश के बड़े हिस्से की कृषि और पर्यावरण पर पड़ रहा है. वहां की राजनीति में भी फरक्का लंबे समय से बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है. यानी ढाका को डर सिर्फ इस बात का नहीं है कि उसे कुछ हजार क्यूसेक पानी कम मिलेगा. डर यह है कि अगर आने वाले वर्षों में नदी का बहाव लगातार घटा तो मौजूदा फॉर्मूला उसके लिए और मुश्किल पैदा कर सकता है।  अब बांग्लादेश क्यों बेचैन है? यही वह सवाल है जो मौजूदा भारत-बांग्लादेश रिश्तों के बीच बेहद अहम हो जाता है. 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव … Read more

BRICS के मंच से दुनिया को PM मोदी का स्पष्ट संदेश, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार जरूरी

नई दिल्ली PM Modi BRICS Summit: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के जरिए भारत ने दुनिया में अपनी कूटनीति की फिर से धाक दिखाई है. इस समिट के स्वागत संबोधन में ही पीएम मोदी ने दुनिया को स्पष्ट संदेश देते हुए साफ कहा कि- 'UNSC में सुधार अब टाला नहीं जा सकता.' दरअसल पीएम मोदी ने भारत मंडपम में ब्रिक्स सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के स्वागत के बाद अपने संबोधन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की बड़ी मांग को उठाया. पीएम मोदी ने रिप्रंजेटेशन की बात करते हुए दो-टूक कहा कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में रिफॉर्म अब और टाला नहीं जा सकता. निश्चित समयसीमा में ठोस नतीजों से इसे जोड़ना होगा।  'विशेषाधिकार के पिरामिड को साझेदारी के मंच में बदलना होगा' 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "…आज, ग्लोबल साउथ वैश्विक संगठनों में तो आगे की कतार में है, लेकिन फैसले लेने की प्रक्रिया में पीछे की कतार में ही रहता है. हमें 'विशेषाधिकार के पिरामिड' को 'साझेदारी के मंच' में बदलना होगा. जहां हर देश की आवाज सुनी जाए, हर सदस्य की हिस्सेदारी हो, और हर कोशिश के केंद्र में मानवता की प्रगति हो. इसके लिए, मेरा प्रस्ताव है कि हम मिलकर वैश्विक शासन में सुधार के लिए 10 प्रस्ताव तैयार करें, जिन्हें हम अगले शिखर सम्मेलन तक 'ब्रिक्स सुधार रोडमैप' का रूप देने की कोशिश कर सकें।  तीन प्रमुख बातें- प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाना पीएम मोदी ने आगे कहा कि इस रोडमैप को तैयार करते समय हमें तीन मुख्य स्तंभों पर ध्यान देना होगा: प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाना. सबसे पहले, प्रतिनिधित्व के बारे में, मैं यह कहना चाहता हूँ कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों में अब और देरी नहीं की जा सकती. इस मामले में, लिखित बातचीत को एक निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट, ठोस नतीजों से जोड़ा जाना चाहिए. इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर, नेतृत्व के पद और नीतिगत प्राथमिकताएं आज की आर्थिक हकीकत के अनुरूप होनी चाहिए।  सदस्य देशों के प्रतिनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत  भारत की मेजबानी में दिल्ली में हो रहे इस समिट में रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील सहित सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं. इस समिट से जुड़ी सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि सभी सदस्य देशों के बीच साझा घोषणापत्र के एजेंडे को लेकर सहमति बन गई है. साझा घोषणापत्र में सभी सदस्य देशों के बीच एकतरफा युद्ध के खिलाफ प्रस्ताव पर सहमति बन गई है. आज दोपहर दो बजे के बाद सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि भारत मंडपम पहुंचे. जहां पीएम मोदी ने सभी सदस्य देशों के प्रतनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत किया।  भारत मंडपम में ब्रिक्स सदस्य देशों के प्रतनिधियों का औपचारिक स्वागत करने के बाद सभी देशों के प्रतनिधियों को पीएम मोदी ने संबोधित भी किया. पीएम मोदी ने सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के ब्रिक्स समिट में स्वागत करते हुए अपने संबोधन में कहा- मुझे आप सभी का स्वागत और अभिनंदन करते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है. उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स के लिए 350 से अधिक बैठकों का आयोजन, 30 शहरों में आपकी टीम का स्वागत करने का हमे अवसर मिला. भारत को ब्रिक्स समिट का आयोजन करने में आप सभी के मदद के लिए धन्यवाद।