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पेंशनर्स के परिवारों को राहत, फैमिली पेंशन के लिए नया खाता खोलने की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  केंद्रीय पेंशनभोगियों और उनके जीवनसाथी के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और राहत भरी खबर है. पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग (DoPPW) तथा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के अनुसार, मुख्य पेंशनभोगी के निधन के बाद उनके पति या पत्नी के साथ चल रहा जॉइंट बैंक अकाउंट बंद नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही, फैमिली पेंशन शुरू कराने के लिए जीवित जीवनसाथी को कोई भी नया सिंगल बैंक अकाउंट खोलने की आवश्यकता नहीं होगी. सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य संकट की घड़ी में बुजुर्गों को बैंकों की लंबी कागजी कार्रवाई और चक्कर काटने से बचाना है।  क्या है नया नियम और व्यवस्था? पेंशन विभाग और बैंकिंग नियमों के मुताबिक, यदि पेंशनभोगी का अपने जीवनसाथी के साथ "आइदर और सर्वाइवर" (Either or Survivor) या "फॉर्मर और सर्वाइवर" मोड में संयुक्त खाता है, तो पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद उसी खाते में फैमिली पेंशन ट्रांसफर की जाएगी. बैंक इस मौजूदा जॉइंट अकाउंट को ही सिंगल अकाउंट में परिवर्तित कर देगा. इसके लिए पूरी बैंकिंग प्रक्रिया को नए सिरे से दोहराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है।  फैमिली पेंशन शुरू कराने की आसान प्रक्रिया पेंशनभोगी के निधन के बाद परिवार को सबसे पहले संबंधित बैंक शाखा को सूचित करना होगा. इसके लिए जीवनसाथी को केवल निम्नलिखित दस्तावेज जमा करने होंगे:     मृत्यु प्रमाण पत्र: पेंशनभोगी के निधन की आधिकारिक पुष्टि के लिए.     PPO की कॉपी: यदि पीपीओ में पति/पत्नी का नाम फैमिली पेंशन के लिए पहले से दर्ज है, तो काम बेहद आसान हो जाता है।      साधारण आवेदन पत्र और KYC: बैंक खाते का स्टेटस अपडेट करने के लिए एक साधारण फॉर्म और पहचान पत्र।  इन दस्तावेजों को जमा करते ही बैंक केंद्रीय पेंशन प्रसंस्करण केंद्र (CPPC) को सूचना भेजेगा और उसी खाते में फैमिली पेंशन क्रेडिट होना शुरू हो जाएगी. इस प्रक्रिया में जीवित पति/पत्नी को 'फॉर्म 14' भरने की भी जरूरत नहीं पड़ती।  देरी से बचने के लिए अभी करें ये काम विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर फैमिली पेंशन में देरी नियमों की वजह से नहीं, बल्कि दस्तावेजों में कमियों के कारण होती है. इसलिए पेंशनभोगियों को समय रहते ये कदम उठाने चाहिए: नाम की स्पेलिंग जांचें: सुनिश्चित करें कि पीपीओ, आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते में जीवनसाथी के नाम की स्पेलिंग बिल्कुल एक जैसी हो।  KYC अपडेट रखें: बैंक खाते का नो-योर-कस्टमर (KYC) रिकॉर्ड हमेशा अपडेटेड रखें ताकि खाता कभी फ्रीज न हो।  जॉइंट अकाउंट मोड: यदि खाता जॉइंट नहीं है, तो उसे तुरंत 'आइदर या सर्वाइवर' मोड में बदलवा लें। 

एथेनॉल फ्यूल से होगी बचत या बढ़ेगा खर्च? E85 और E100 का पूरा गणित समझें

नई दिल्ली  भारत में अब E85 पेट्रोल मिलना शुरू हो गया है. E85 का मतलब है ऐसा ईंधन जिसमें 85 प्रतिशत एथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है. फिलहाल यह कुछ चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध है, जिनमें दिल्ली जैसे शहर भी शामिल हैं. सरकार का लक्ष्य अगले साल तक इसे देशभर के करीब 5,000 पेट्रोल पंपों तक पहुंचाने का है. दिल्ली में जहां सामान्य पेट्रोल की कीमत करीब 102 रुपये प्रति लीटर है, वहीं E85 करीब 82 रुपये प्रति लीटर में बेचा जा रहा है. यानी इसकी कीमत लगभग 20 रुपये कम रखी गई है. हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि आज देश में मिलने वाले सामान्य पेट्रोल में भी लगभग 20 प्रतिशत एथेनॉल पहले से मिलाया जा रहा है, जिसे E20 कहा जाता है।  E20 पेट्रोल लगभग सभी पेट्रोल वाहनों के लिए उपलब्ध है, लेकिन E85 हर गाड़ी में नहीं डाला जा सकता. इसके लिए फ्लेक्स फ्यूल इंजन वाली कार या मोटरसाइकिल होना जरूरी है. ऐसी गाड़ियों की खासियत यह है कि इनमें E20, E85 या भविष्य में आने वाला E100 यानी 100 प्रतिशत एथेनॉल वाला ईंधन भी इस्तेमाल किया जा सकता है. भारत में अब फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाली कारें और दोपहिया वाहन बाजार में आने लगे हैं. सरकार का उद्देश्य लोगों को धीरे धीरे ऐसे वाहनों की ओर प्रोत्साहित करना है ताकि पेट्रोल पर निर्भरता कम हो और देश का आयात बिल घट सके।  सरकार एथेनॉल को बढ़ावा क्यों दे रही है एथेनॉल का उत्पादन भारत में ही किया जाता है, जबकि कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है. अगर अधिक लोग एथेनॉल आधारित ईंधन अपनाते हैं तो देश को कम कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा और विदेशी मुद्रा की बचत होगी. इसी सोच के तहत सरकार ने तेल कंपनियों से E85 की कीमत सामान्य पेट्रोल से कम रखने को कहा है।  क्या 20 रुपये सस्ता ईंधन सच में सस्ता साबित होगा पहली नजर में 20 रुपये प्रति लीटर कम कीमत काफी आकर्षक लगती है, लेकिन असली सवाल माइलेज का है. एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा कम होती है, इसलिए एक लीटर एथेनॉल पर गाड़ी उतनी दूरी तय नहीं कर पाती जितनी एक लीटर पेट्रोल पर करती है. यही वजह है कि केवल प्रति लीटर कीमत देखकर फैसला करना सही नहीं होगा. वास्तविक खर्च इस बात पर निर्भर करेगा कि गाड़ी एक लीटर ईंधन में कितने किलोमीटर चलती है।  ब्राजील का अनुभव क्या कहता है एथेनॉल आधारित परिवहन की बात करें तो ब्राजील दुनिया के सबसे पुराने और सफल उदाहरणों में शामिल है. वहां 1975 से एथेनॉल को बढ़ावा देने की नीति लागू है और 2003 के बाद फ्लेक्स फ्यूल वाहनों का तेजी से विस्तार हुआ. आज वहां अधिकांश गाड़ियां ऐसी हैं जिनमें पेट्रोल और एथेनॉल दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।  ब्राजील में एक मशहूर सिद्धांत है जिसे 70 प्रतिशत नियम कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि एथेनॉल वाला ईंधन तभी आर्थिक रूप से फायदेमंद माना जाता है जब उसकी कीमत सामान्य पेट्रोल की कीमत के लगभग 70 प्रतिशत या उससे कम हो, यानी करीब 30 प्रतिशत सस्ती हो. इसका कारण यह है कि वहां के अनुभव के अनुसार एथेनॉल पर माइलेज पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम मिलती है. अगर कोई गाड़ी एक लीटर शुद्ध पेट्रोल पर 10 किलोमीटर चलती है तो वही गाड़ी एक लीटर शुद्ध एथेनॉल पर लगभग 7 किलोमीटर चलती है।  भारत के E20 और E85 का गणित अगर मान लिया जाए कि कोई वाहन 100 प्रतिशत पेट्रोल पर 10 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देता है, तो E20 में मौजूद 80 प्रतिशत पेट्रोल और 20 प्रतिशत एथेनॉल के आधार पर उसकी अनुमानित माइलेज करीब 9.4 किलोमीटर प्रति लीटर बैठती है. इसी तरह E85 में 85 प्रतिशत एथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है. उसी गणना के आधार पर इसकी अनुमानित माइलेज करीब 7.5 किलोमीटर प्रति लीटर हो सकती है. इसका मतलब यह हुआ कि E20 की तुलना में E85 पर माइलेज लगभग 20 प्रतिशत कम हो सकती है. इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए E85 की कीमत सामान्य पेट्रोल से लगभग 20 रुपये प्रति लीटर कम रखी गई है।  क्या उपभोक्ता को फायदा होगा मौजूदा गणना के आधार पर ऐसा लगता है कि कम कीमत और कम माइलेज लगभग एक दूसरे को संतुलित कर देते हैं. यानी E85 इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता को कोई बड़ा अतिरिक्त आर्थिक फायदा नहीं मिलेगा, लेकिन उसे कोई खास नुकसान भी नहीं होना चाहिए।  देश को हो सकता है बड़ा लाभ अगर बड़ी संख्या में लोग फ्लेक्स फ्यूल इंजन वाली गाड़ियां अपनाते हैं और E85 या भविष्य में E100 जैसे ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा देश को होगा. इससे पेट्रोल और कच्चे तेल के आयात में कमी आ सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और डॉलर पर निर्भरता घट सकती है. लंबे समय में इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये की स्थिति को भी मजबूती मिल सकती है. कुल मिलाकर, मौजूदा आंकड़ों के आधार पर E85 उपभोक्ता के लिए कोई चमत्कारी बचत का साधन नहीं दिखता, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम जरूर साबित हो सकता है।   

‘महा-भूकंप’ का खतरा? 1000 वर्षों से जमा हो रहा तनाव लॉस एंजेलिस के लिए बन सकता है चुनौती

 कैलिफोर्निया वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में चेतावनी दी है कि दक्षिणी कैलिफोर्निया की दो सबसे प्रमुख फॉल्ट लाइनों सैन एंड्रियास और सैन जैसिंटो  में पिछले 1000 सालों की तुलना में इस समय सबसे अधिक दबाव जमा हो चुका है. यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई और यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के विशेषज्ञों के नेतृत्व में किए गए इस स्टडी ने भूकंपीय खतरों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।  शोधकर्ताओं ने एक आधुनिक 'फिजिक्स-बेस्ड मॉडल' का उपयोग करके साल 1000 ईस्वी (CE) से लेकर वर्तमान समय तक इन फॉल्ट्स पर बढ़ते दबाव को ट्रैक किया है. इस स्टडी के परिणाम बताते हैं कि लॉस एंजेलिस और रिवरसाइड जैसे घने बसे हुए महानगरीय क्षेत्रों के नीचे जमीन के भीतर एक बहुत बड़ा खतरा पनप रहा है, जो कभी भी एक बड़े विनाशकारी भूकंप का रूप ले सकता है।  क्या है यह नया शोध और कैसे मापा गया दबाव? इस ऐतिहासिक शोध में वैज्ञानिकों ने पारंपरिक तरीकों से हटकर एक खास कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल किया है, जो पृथ्वी के भीतर होने वाली भौतिक हलचलों और टेक्टोनिक प्लेटों के दबाव को समझता है. इस मॉडल की मदद से पिछले एक हजार साल के डेटा का विश्लेषण किया गया, जिससे यह पता चल सके कि समय के साथ इन फॉल्ट्स के अलग हिस्सों पर कितना दबाव बढ़ा या घटा है।  स्टडी में पाया गया कि सैन एंड्रियास फॉल्ट के 'मोजावे साउथ' हिस्से पर दबाव बढ़कर 2.8 मेगापास्कल (MPa) तक पहुंच गया है. वहीं दूसरी ओर, सैन जैसिंटो फॉल्ट की 'बरनार्डिनो स्ट्रैंड' पर यह दबाव और भी अधिक यानी 3.6 मेगापास्कल (MPa) दर्ज किया गया है।  वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले 1000 वर्षों के इतिहास में इन दोनों जगहों पर दबाव का यह अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है. यह दबाव इस बात का संकेत है कि धरती के नीचे की चट्टानें अब अपनी सहनशीलता की आखिरी सीमा पर हैं।  कजोन पास: महा-भूकंप का संभावित केंद्र इस पूरे शोध में सबसे चिंताजनक बात 'कजोन पास' को लेकर सामने आई है. कजोन पास वह भौगोलिक स्थान है जहां सैन एंड्रियास और सैन जैसिंटो फॉल्ट्स एक-दूसरे के बेहद करीब आते हैं. वैज्ञानिक इस जगह को एक मुख्य 'जंक्शन' या संपर्क बिंदु मान रहे हैं।  कजोन पास के कारण दोनों फॉल्ट्स आपस में इस तरह जुड़ सकते हैं कि यदि किसी एक फॉल्ट पर भूकंप की शुरुआत होती है, तो उसका कंपन या दरार दूसरे फॉल्ट को भी सक्रिय कर देगी.अगर ऐसा होता है, तो यह कई दरारों का एक साथ टूटना होगा, जो इतिहास के किसी भी सामान्य भूकंप से कहीं ज्यादा बड़ा और विनाशकारी हो सकता है।  दो बड़ी फॉल्ट लाइनों के एक साथ मिलने से पैदा होने वाला भूकंप रिक्टर पैमाने पर 7.5 या उससे भी अधिक तीव्रता का हो सकता है, जिससे दक्षिणी कैलिफोर्निया के एक बहुत बड़े हिस्से में भारी तबाही मच सकती है।  दशकों की शांति बढ़ा रही है बड़ा खतरा कैलिफोर्निया के इतिहास पर नजर डालें तो सैन एंड्रियास के मोजावे साउथ हिस्से में साल 1857 के बाद से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है. वहीं सैन जैसिंटो की बरनार्डिनो शाखा में आखिरी बार साल 1968 में हलचल देखी गई थी. पिछले कई दशकों या कहें तो सदियों की यह शांति वास्तव में कोई राहत की बात नहीं है, बल्कि यह एक बड़े खतरे की दस्तक है।  जब दो टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में रगड़ खाती हैं और उनके बीच की फॉल्ट लाइन हिलती नहीं है, तो वहां लगातार ऊर्जा और दबाव जमा होता रहता है. इसे सिस्मिक गैप कहा जाता है. चूंकि पिछले 150 से अधिक सालों से मोजावे साउथ सेगमेंट पूरी तरह शांत है, इसलिए वहां इतनी भारी मात्रा में दबाव जमा हो चुका है कि जब भी यह फॉल्ट टूटेगा, तो इससे निकलने वाली ऊर्जा अकल्पनीय होगी।  यह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि तैयारी की चेतावनी है इस शोध की मुख्य लेखिका लिलियन बर्कहार्ड ने स्पष्ट किया है कि उनके इस स्टडी का उद्देश्य किसी निश्चित तारीख या समय पर भूकंप आने की भविष्यवाणी करना बिल्कुल नहीं है. वर्तमान विज्ञान के पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जो यह बता सके कि भूकंप ठीक किस दिन या किस समय आएगा।  बर्कहार्ड के अनुसार, इस रिसर्च का असली मकसद प्रशासन और आम जनता को आने वाले कल के लिए बेहतर तरीके से तैयार करना है. यह डेटा लॉस एंजेलिस, रिवरसाइड और सैन बर्नार्डिनो जैसे शहरों के लिए आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन में बेहद मददगार साबित होगा।  इस जानकारी का उपयोग करके स्थानीय सरकारें अपने बिल्डिंग कोड को और सख्त बना सकती हैं, ताकि भविष्य में बनने वाली इमारतें इतने ऊंचे दबाव से पैदा होने वाले झटकों को झेल सकें. इसके अलावा, पुराने बुनियादी ढांचे, जैसे कि पुल, पानी की पाइपलाइनें और बिजली ग्रिड को मजबूत करने के लिए भी इस डेटा का इस्तेमाल किया जा सकता है। 

15 करोड़ किसान परिवारों के लिए खुशखबरी, होर्मुज मार्ग से आ रहे 34 जहाज; ईंधन संकट की आशंका टली

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते और होर्मुज स्ट्रेट पर दोहरी नाकेबंदी हटते ही भारत को बड़ी राहत मिली है. कतर से एलएलजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) भरकर भारत आ रहा जहाज ‘दिशा’ होर्मुज पार कर चुका है. यह सिर्फ एक जहाज की यात्रा नहीं, बल्कि उन दर्जनों जहाजों के लिए उम्मीद का संकेत है जो पिछले कई महीनों से फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं. इन जहाजों में पेट्रोल-गैस के साथ भारी संख्या में उर्वरकों से लदे जहाज भी शामिल है. ऐसे में अब भारत के करीब 15 करोड़ किसान परिवारों को भी जल्द बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।  भारत सरकार के अनुसार, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम का एलएनजी कैरियर दिशा 62,370 मीट्रिक टन गैस लेकर भारत की तरफ तेजी से बढ़ रहा है और 18 जून तक इसके दाहेज पोर्ट पर पहुंचने की संभावना है. यह तीन महीने से अधिक समय बाद युद्धग्रस्त क्षेत्र से बाहर निकलने वाला पहला भारतीय ध्वज वाला एनएलजी जहाज है।  आखिर क्यों खास है ‘दिशा’? दिशा की सुरक्षित यात्रा इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसके पीछे 34 अन्य भारतीय और विदेशी जहाजों की किस्मत जुड़ी हुई है. फारस की खाड़ी में फंसे इन जहाजों में बड़ी संख्या ऐसे पोतों की है, जो भारत के लिए जरूरी ऊर्जा और उर्वरक लेकर आने वाले हैं. दिशा के सुरक्षित निकलने से यह भरोसा बढ़ा है कि बाकी जहाज भी जल्द भारत की ओर रवाना हो सकेंगे।  किसानों के लिए आ रही गुड न्यूज जानकारी के मुताबिक फंसे हुए 34 जहाजों में से 16 जहाज फर्टिलाइजर लेकर आ रहे हैं. इनमें से 8 जहाज यूरिया से लदे हैं, 4 जहाजों पर DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट), 3 जहाज सल्फर और एक जहाज अमोनिया लेकर आ रहा है. इसके अलावा 15 अन्य जहाज कच्चा तेल, एलएनजी और एलपीजी जैसी ऊर्जा सामग्री लेकर चल रहे हैं. यानी इन जहाजों का भारत पहुंचना सिर्फ पेट्रोलियम सेक्टर के लिए नहीं, बल्कि किसानों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।  भारत के लिए इतनी अहमियत क्यों रखता है होर्मुज? भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है. इसके अलावा भारत के आयातित एनएलजी का 60 प्रतिशत से ज्यादा और एलपीजी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. ऐसे में इस समुद्री मार्ग पर किसी भी तरह की बाधा सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कीमतों को प्रभावित करती है।  कब तक खत्म हो सकेगा संकट? एक्सपर्ट्स का कहना है कि जहाजों की आवाजाही शुरू होना अच्छी खबर है, लेकिन पेट्रोल-गैस संकट खत्म होने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा. कतर के रास लाफान एनएलजी परिसर और यूएई के हबशन गैस प्लांट जैसी अहम ऊर्जा सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है. इससे उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और सामान्य स्थिति बहाल होने में समय लग सकता है।  भारत के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी क्या है? अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम और होर्मुज को फिर से खोलने पर बनी सहमति के बाद समुद्री व्यापार में भरोसा लौटने लगा है. हालांकि वैश्विक शिपिंग कंपनियां अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और कई ऑपरेटर स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. फिर भी दिशा का सुरक्षित निकलना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि होर्मुज में सामान्य गतिविधियां धीरे-धीरे बहाल हो सकती हैं।  सबसे बड़ी राहत यह है कि तीन महीने से जकड़ी भारत की एनर्जी और फर्टिलाइजर सप्लाई चेन अब दोबारा से खुलने की उम्मीद जगी है. ‘दिशा’ ने सिर्फ LNG नहीं पहुंचाई, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि होर्मुज के रास्ते फिर से खुल सकते हैं. अगर आने वाले दिनों में बाकी 34 जहाज भी सुरक्षित निकल जाते हैं तो भारत को ईंधन, गैस और खाद की आपूर्ति में बड़ी राहत मिल सकती है। 

ट्रंप और ईरान समझौते पर उठे सवाल, एक्सपर्ट्स बोले- यह इज्जत बचाने की रणनीति हो सकती है

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते को लेकर तरह-तरह की चर्चा है. इस बीच वेस्ट एशिया मामलों के एक्सपर्ट इसे अलग नजरिये से देखते हैं. उनका मानना है कि यह डील महज जंग से पहले की स्थिति पर वापसी भर है. आने वाले 60 दिन यह तय करेंगे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन उद्देश्यों को हासिल कर पाते हैं या नहीं, जिनके नाम पर उन्होंने ईरान के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन शुरू किया था।  क्या है समझौते का मुख्य उद्देश्य? वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो विल टॉडमैन ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा कि शुरुआती समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच दुश्मनी को खत्म करना, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना है. उनके अनुसार यह समझौता मूल रूप से हालात को उसी स्थिति में वापस ले जाता है, जहां वे अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों से पहले थे।  टॉडमैन ने कहा, 'अमेरिका अब तक उनमें से एक भी उद्देश्य या लक्ष्य नहीं पा सका, जिनका ऐलान उसने जंग के शुरू करने से पहले किया था.' उन्होंने कहा कि युद्ध के बाद बनी परिस्थितियां बताती हैं कि इस मिलिट्री ऑपरेशन से अमेरिका को जैसी अपेक्षा थी, वैसी रणनीतिक सफलता हासिल नहीं हुई है।  दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच रविवार को होर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमति बनी. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है. इस मार्ग के खुलने से ग्लोबल एनर्जी बाजार को राहत मिलने की उम्मीद है और तेल आपूर्ति नॉर्मल होने का रास्ता साफ हो सकता है. हालांकि समझौते की पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं. ईरान ने संकेत दिया है कि समझौते को औपचारिक रूप से लागू करने की प्रक्रिया हस्ताक्षर समारोह के बाद शुरू होगी।  60 दिन तक बातचीत के बाद खुलेगी समझौते की राह बातचीत में मिडिएटर की भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के अनुसार यह हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित किया जा सकता है. समझौते में एक महत्वपूर्ण प्रावधान 60 दिनों की वार्ता अवधि (बातचीत के लिए 60 दिनों का समय) भी है. इस दौरान ईरान के एनरिच (हाई लेवल पर संवर्धित) यूरेनियम के भंडार और उसके परमाणु प्रोग्राम से जुड़े विवादित मुद्दों पर बातचीत होगी. यही वह स्टेप होगा, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कितनी प्रभावी शर्तें लागू करा पाते हैं।  खाड़ी देशों से संबंधों में नुकसान टॉडमैन का कहना है कि तीन महीने से अधिक चले इस युद्ध ने अमेरिका के पश्चिम एशियाई सहयोगियों के साथ संबंधों को भी नुकसान पहुंचाया है. उनके मुताबिक खाड़ी के कई अरब देशों को महसूस हुआ कि अमेरिका ने युद्ध के दौरान उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।  उन्होंने कहा, 'अरब खाड़ी देशों को लगता है कि अमेरिका ने उन्हें अकेला छोड़ दिया. राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध से पहले और युद्ध के दौरान निर्णय लेते समय उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया.' टॉडमैन के अनुसार इसका परिणाम यह हो सकता है कि खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अन्य देशों के साथ भी रणनीतिक साझेदारियां विकसित करें।  विशेषज्ञ का मानना है कि अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बना विश्वास का संकट जल्दी दूर होने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन या भविष्य की कोई भी अमेरिकी सरकार इस भरोसे की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पूंजी खर्च करने के लिए तैयार नहीं दिखती।  इस जंग से अमेरिका और इजरायल के बीच भी पनपे मतभेद ऐसे में आने वाले वर्षों में दोनों पक्षों के संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं. टॉडमैन ने यह भी कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका और इजरायल के बीच भी एक असामान्य प्रकार का मतभेद पैदा कर दिया है. उनके अनुसार इजरायली सरकार को आशंका है कि मौजूदा समझौता ईरान से उत्पन्न सुरक्षा खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं करता और भविष्य में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं को भी सीमित कर सकता है।  उन्होंने कहा, 'इजरायल का मानना है कि समझौता ईरान के खतरे को पूरी तरह बेअसर नहीं बनाता. इसके अलावा इजरायल को लगता है कि लेबनान में उसका अभियान अभी अधूरा है.' लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि लेबनान में संघर्ष आगे न बढ़े, क्योंकि इससे ईरान के साथ हुआ समझौता खतरे में पड़ सकता है।  विशेषज्ञ के अनुसार युद्ध का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा. इससे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी दूरी बढ़ी है. यूरोप के कई देशों ने युद्ध का समर्थन नहीं किया था और उन्होंने कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया था।  टॉडमैन ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नाटो की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि गठबंधन ने युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया. उनके मुताबिक यह विवाद ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ाने वाला साबित हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल युद्धविराम और होरमुज का खुलना एक पॉजिटिव संकेत है, लेकिन असली चुनौती अगले 60 दिनों की बातचीत में होगी।  अगर परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम भंडार और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तो यह समझौता केवल अस्थायी राहत साबित हो सकता है. ऐसे में आने वाले दो महीने न सिर्फ अमेरिका और ईरान, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं।   

अमेरिका में बड़ा विमान हादसा, B-52 बॉम्बर क्रैश; 8 लोगों ने गंवाई जान

कैलिफोर्निया अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित एडवर्ड्स एयर फोर्स बेस पर सोमवार को भयानक हादसा देखने को मिला. यहां B-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस बॉम्बर विमान हादसे में आठ लोगों की मौत हो गई. विमान नियमित टेस्ट्स मिशन पर था और स्थानीय समय के मुताबिक 11.20 am पर उड़ा भरी. उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद ये क्रैश हो गया. अमेरिकी वायुसेना ने इसे असहनीय और दुखद हादसा बताया है. एडवर्ड्स एयर फोर्स बेस के अधिकारियों के मुताबिक हादसा इतना भीषण था कि उसमें किसी के बचने की संभावना नहीं थी. दुर्घटना के बाद घटनास्थल से काले धुएं का विशाल गुबार उठता दिखाई दिया।  वायुसेना ने बताया कि विमान रडार आधुनिकीकरण कार्यक्रम से जुड़े एक टेस्ट मिशन पर था. हादसे में मारे गए लोगों में सैन्य अधिकारी, सरकारी कर्मचारी और सरकारी ठेकेदार शामिल थे. अधिकारियों ने मृतकों के परिजनों को सूचना देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यह दुर्घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि B-52 अमेरिकी वायुसेना के सबसे प्रतिष्ठित और लंबे समय से सर्विस में मौजूद विमानों में से एक है।  आखिर क्यों बनाया गया था B-52? B-52 का विकास 1950 के दशक की शुरुआत में शीत युद्ध (Cold War) के दौरान किया गया था. उस समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की होड़ चरम पर थी. अमेरिका को ऐसे विमान की जरूरत थी जो हजारों किलोमीटर दूर तक उड़कर परमाणु बम पहुंचा सके और दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला कर सके. इसी टार्गेट को लेकर अमेरिकी कंपनी बोइंग ने B-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस का निर्माण किया. यह विमान पहली बार 1952 में उड़ा और 1955 में अमेरिकी वायुसेना में शामिल किया गया।  B-52 हुआ क्रैश. B-52 की सबसे बड़ी खासियतें     ये करीब 31,700 किलोग्राम तक बम और मिसाइलें ले जाने की क्षमता रखता है.     लंबी दूरी तक बिना रुके उड़ सकता है. रास्ते में रीफ्यूलिंग की जरूरत पड़ सकती है.     पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह के हथियार ये ले जा सकता है.     हवा में ईंधन भरने के बाद लगभग दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंच सकता है.     ये क्रूज मिसाइलों और परमाणु हथियारों को लॉन्च करने में सक्षम है.     मौजूदा B-52H संस्करण आज भी अमेरिकी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का अहम हिस्सा है. किन-किन युद्धों B-52 का हुआ इस्तेमाल हुआ?     वियतनाम युद्ध: 1960 और 1970 के दशक में B-52 ने वियतनाम युद्ध में बड़े पैमाने पर बमबारी की. ‘ऑपरेशन लाइनबैकर’ जैसे अभियानों में इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ. अमेरिका का एक B-52 क्रैश भी हुआ और एक झील में गिर गया. इसी कारण वियतनाम में आज भी B-52 लेक है, जहां उसका मलबा पड़ा है।      1991 का खाड़ी युद्ध : इराक के खिलाफ ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म में B-52 ने लंबी दूरी से भारी बमबारी कर अमेरिकी सेना को बढ़त दिलाई।      अफगानिस्तान युद्ध: 2001 में 9/11 हमलों के बाद अफगानिस्तान में तालिबान और अल-कायदा के ठिकानों पर हमलों में इस विमान का इस्तेमाल किया गया।      इराक युद्ध: 2003 में इराक पर अमेरिकी हमलों के दौरान भी B-52 ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।      ISIS के खिलाफ हमले: सीरिया और इराक में ISIS के ठिकानों पर भी B-52 से हमले किए गए।      ईरान युद्ध: हालिया अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान भी B-52H बमवर्षकों को मिशनों में तैनात किया गया था. इसकी मौजूदगी को अमेरिका की सैन्य चेतावनी के तौर पर देखा जाता है।  B-52 अब नहीं बनते हैं दिलचस्प बात यह है कि B-52 का उत्पादन 1962 में ही बंद हो गया था. इसके बावजूद अमेरिकी वायुसेना लगातार इसे आधुनिक तकनीक से अपग्रेड करती रही है. फिलहाल अमेरिकी वायुसेना के पास B-52H के 76 विमान हैं. अमेरिका ने हाल ही में इसके नए इंजन और आधुनिक रडार सिस्टम लगाने के लिए अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट शुरू किया है, ताकि यह विमान 2050 के दशक तक सेवा में बना रह सके। 

हवा में 15 चक्कर लगाने के बाद सुरक्षित उतरी एयर इंडिया एक्सप्रेस की फ्लाइट, तकनीकी खामी बनी वजह

कन्नूर  केरल के कन्नूर इंटरनेशनल एयरपोर्ट से जेद्दाह जा रही एयर इंडिया एक्सप्रेस की एक फ़्लाइट में तकनीकी खराबी आने के बाद इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी. टेकऑफ के तुरंत बाद ही इस दिक्कत का पता चला, जिससे एयरक्राफ़्ट एक घंटे से ज़्यादा समय तक हवा में चक्कर लगाता रहा और फिर सुरक्षित रूप से लैंड कर गया. इस तरह पायलट के समय पर दखल देने से एक बड़ी मुसीबत टल गई।  फ़्लाइट कन्नूर से सुबह 7.30 बजे 150 यात्रियों को लेकर निकली थी. रास्ते में जब एयरक्राफ़्ट मंगलुरु के एयरस्पेस में पहुंचा तो पायलट को तकनीकी दिक्कतें नजर आई. यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए फ़्लाइट को तुरंत कन्नूर वापस डायवर्ट करने का तुरंत फैसला लिया गया।  पायलट ने एयरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क किया और इमरजेंसी लैंडिंग की इजाजत मांगी. हालाँकि, सुरक्षित लैंडिंग के लिए एयरक्राफ़्ट का फ़्यूल लेवल कम करना पड़ा. ऐसा करने के लिए फ़्लाइट ने मंगलुरु एयरस्पेस के ऊपर लगभग पंद्रह बार चक्कर लगाए।  इमरजेंसी में एयरक्राफ्ट को सुरक्षित रूप से लैंड कराने के लिए फ्यूल जलाना एक स्टैंडर्ड तरीका है. पायलट एयरक्राफ्ट का वजन कम करने और सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चत करने के लिए यह तरीका अपनाते हैं. ज़्यादा फ्यूल खत्म करने से बड़ी मुसीबतों को रोकने में मदद मिलती है. इसमें लैंडिंग के समय आग लगने का खतरा भी शामिल है, और यह काम एविएशन नियमों के तहत जरूरी सुरक्षा सावधानियों के मुताबिक है. एक घंटे से ज़्यादा हवा में चक्कर लगाने के अनुभव से यात्रियों में काफी चिंता हो गई।  फ्यूल लोड को काफी कम करने के बाद फ्लाइट कन्नूर एयरपोर्ट के रनवे पर सुरक्षित रूप से लैंड हो गई. इमरजेंसी लैंडिंग की आशंका को देखते हुए एयरपोर्ट ने फायर फोर्स, एम्बुलेंस और मेडिकल टीमों सहित इमरजेंसी सिस्टम को स्टैंडबाय पर रखा. अधिकारियों ने कन्फर्म किया कि एयरक्राफ्ट में सवार सभी 150 यात्री और क्रू मेंबर पूरी तरह सुरक्षित उतर गए।  एयरक्राफ्ट के रनवे पर सुरक्षित रूप से लैंड करने के बाद अधिकारियों और यात्रियों दोनों ने राहत की सांस ली. इसके बाद यात्रियों को टर्मिनल ले जाया गया, जहाँ एयरपोर्ट अधिकारियों ने जरूरी मेडिकल मदद और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम किया. यात्रियों का सामान सुरक्षित रूप से निकालने का प्रोसेस भी पूरा कर लिया गया।  डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन समेत एविएशन अथॉरिटीज, टेक्निकल खराबी की सही वजह का पता लगाने के लिए डिटेल में इंस्पेक्शन करेगी. इंस्पेक्शन के बाद ही यह साफ होगा कि खराबी एयरक्राफ्ट के लैंडिंग गियर में थी या किसी दूसरे टेक्निकल सेक्शन में।  मेंटेनेंस का काम करने के लिए एक एक्सपर्ट इंजीनियरिंग टीम कन्नूर पहुंच गई है, और खराबी पूरी तरह से ठीक होने के बाद ही एयरक्राफ्ट को अगली सर्विस के लिए क्लियर किया जाएगा. एयर इंडिया एक्सप्रेस खाड़ी देशों और केरल के बीच सर्विस देने वाली बड़ी एयरलाइन्स में से एक है. मालाबार इलाके में बाहर से आए लोगों के लिए बहुत ज़्यादा भरोसेमंद फ्लाइट से जुड़ी ऐसी घटनाओं ने यात्रियों में काफ़ी चिंता पैदा कर दी है। 

दवाओं की बिक्री पर नई सख्ती, प्रिस्क्रिप्शन के बिना सिरप देने पर रोक

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने दवाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है, स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक अहम नोटिफिकेशन जारी करते हुए साफ कर दिया है कि अब खांसी समेत सभी तरह के सिरप बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलेंगे, यानी अब मेडिकल स्टोर से कोई भी कफ सिरप या अन्य सिरप आधारित दवा खरीदने के लिए पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होगा।  क्या है नया नियम? 9 जून को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर बताया कि Drugs (5th Amendment) Rules, 2026 लागू कर दिए गए हैं, इसके तहत एक बड़ा बदलाव किया गया है अब ड्रग्स रूल्स, 1945 के शेड्यूल K से “Syrups” को हटा दिया गया है।  पहले शेड्यूल K के तहत कुछ दवाएं ऐसी थीं जिन्हें बिना डॉक्टर की पर्ची के खरीदा जा सकता था (OTC दवाएं), लेकिन अब इस लिस्ट से सिरप को बाहर कर दिया गया है. अब कफ सिरप समेत सभी तरह के सिरप बिना प्रिस्क्रिप्शन नहीं मिलेंगे। क्या है नया नियम? केंद्र सरकार ने 9 जून 2026 को जारी अधिसूचना के जरिए Drugs (Fifth Amendment) Rules, 2026 लागू किए हैं. यह संशोधन Drugs and Cosmetics Act, 1940 की धारा 12 और 33 के तहत किया गया है और आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही प्रभावी हो गया है।  ड्रग्स रूल्स में क्या बदलाव किया गया? सरकार ने ड्रग्स रूल्स, 1945 की Schedule K में सूचीबद्ध दवाओं की श्रेणी से "Syrups" शब्द को हटा दिया है. इसके परिणामस्वरूप सिरप अब ओवर-द-काउंटर दवाओं की श्रेणी में नहीं रहेंगे और उनकी बिक्री पर सख्त नियामकीय नियंत्रण लागू होगा।  अब बिना प्रिस्क्रिप्शन नहीं मिलेगी कफ सिरप नए नियम के तहत कफ सिरप सहित औषधीय सिरप खरीदने के लिए उपभोक्ताओं को रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जारी प्रिस्क्रिप्शन दिखाना होगा. इससे उन सिरपों की सामान्य खरीद प्रभावित होगी, जिन्हें अब तक लोग सीधे मेडिकल स्टोर से खरीद लेते थे।  बच्चों की मौत के मामलों के बाद लिया गया फैसला सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है जब मध्य प्रदेश और राजस्थान में दूषित कफ सिरप के सेवन से बच्चों की मौत के मामलों ने दवाओं की गुणवत्ता और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे. इन घटनाओं के बाद सिरप के निर्माण और बिक्री पर कड़े नियंत्रण की मांग तेज हो गई थी।  जनता से सुझाव लेने के बाद लागू हुआ संशोधन इस संशोधन का मसौदा 30 दिसंबर 2025 को जारी किया गया था, जिस पर आम जनता से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे. सरकार ने कहा कि प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद अंतिम संशोधन अधिसूचित किया गया।  फार्मेसियों को करना होगा नए नियमों का पालन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव हर्ष मंगला द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अब देशभर की फार्मेसियों को सिरप और संबंधित औषधीय फॉर्मूलेशन की बिक्री के लिए संशोधित नियमों का पालन करना होगा. इसके तहत बिना डॉक्टर की पर्ची के ऐसी दवाएं बेचना संभव नहीं होगा।  क्यों लिया गया यह फैसला? स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि ये कदम दवाओं के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया गया है. पिछले कुछ समय से कफ सिरप और दूसरी सिरप वाली दवाओं के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ रही थी।      कई मामलों में ओवरडोज का खतरा     बिना जरूरत दवा लेना     बच्चों में गलत डोज     मिलावटी सिरप से नुकसान इन सभी समस्याओं को देखते हुए सरकार ने सख्ती बढ़ाई है. मेडिकल स्टोर के लिए भी सख्त नियम नए नियम लागू होने के बाद अब मेडिकल स्टोर्स को भी निर्देश दिए गए हैं कि     बिना डॉक्टर पर्ची के सिरप न बेचें     नियम तोड़ने पर कार्रवाई हो सकती है छोटे पैक में ही मिलेगी दवा सरकार ने एक और बड़ा बदलाव किया है, अब सभी सिरप और लिक्विड दवाएं सिंगल-यूनिट पैक में ही बेची जाएंगी.     5 ml, 10 ml जैसी छोटी पैकिंग     एक बार की डोज वाला पैक यह नियम कब लागू होगा? 1 जनवरी 2027 से पूरे देश में लागू. पुराने स्टॉक बेचने के लिए कंपनियों को 6 महीने का समय मिल है. ऐसा इसलिए क्योंकि खुली बोतल से ओवरडोज या गलत डोज का खतरा साथ ही मिलावट या खराब होने की संभावना रहती थी।   इससे क्या होगा फायदा?     ओवरडोज का खतरा कम होगा     बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा बढ़ेगी     दवा की क्वालिटी बनी रहेगी     मिलावट और खराब दवा का जोखिम घटेगा

भूकंप के तेज झटकों से कांपा इंडोनेशिया, पालू में अफरा-तफरी और संपत्तियों को क्षति

पालू  इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप में मंगलवार (16 जून 2026) को आए 6.7 तीव्रता के बेहद शक्तिशाली भूकंप ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया. इस तेज झटके के कारण मध्य सुलावेसी प्रांत की राजधानी पालू और उसके आसपास के इलाकों में व्यापक स्तर पर नुकसान की खबरें आ रही हैं।  भूकंप इतना जोरदार था कि लोग डर के मारे अपने घरों और दफ्तरों से बाहर निकलकर खुले मैदानों की तरफ भागने लगे. डराने वाली बात यह है कि पालू वही शहर है जिसने करीब आठ साल पहले एक बेहद विनाशकारी भूकंप और सुनामी का सामना किया था, जिसके जख्म आज भी यहां के लोगों के दिलों में ताजा हैं. इस नए झटके ने एक बार फिर स्थानीय निवासियों के मन में पुरानी और खौफनाक यादों को जिंदा कर दिया है।  अस्पतालों से मरीजों को निकाला गया बाहर, होटल और इमारतों को पहुंचा नुकसान भूकंप के तेज झटकों को देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से पालू शहर के कई अस्पतालों से मरीजों को तुरंत बाहर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया गया. सोशल मीडिया और समाचार एजेंसियों द्वारा जारी तस्वीरों में देखा जा सकता है कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी मरीजों को उनकी ड्रिप और स्ट्रेचर के साथ खुले आसमान के नीचे ले जा रहे हैं।  शहर के एक प्रतिष्ठित फोर-स्टार होटल के जनरल मैनेजर एफेंडी नताली ने बताया कि भूकंप आते ही होटल के सभी कमरों को खाली करा लिया गया था. हालांकि अचानक आए इस झटके से मेहमानों के बीच भारी अफरा-तफरी और घबराहट का माहौल बन गया था, लेकिन राहत की बात यह रही कि सभी सुरक्षित हैं और होटल की इमारत को केवल मामूली नुकसान पहुंचा है. शहर के अन्य हिस्सों से भी छतों के गिरने, दीवारों में दरारें आने और सड़कों पर मलबा बिखरने की तस्वीरें सामने आई हैं।  सुनामी का कोई खतरा नहीं, लेकिन प्रशासन ने जारी की आफ्टरशॉक्स की चेतावनी अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, इस भूकंप का केंद्र पालू शहर से लगभग 43 किलोमीटर पूर्व-दक्षिण-पूर्व में जमीन से करीब 10 किलोमीटर की गहराई पर था. मुख्य भूकंप के बाद इलाके में कई आफ्टरशॉक्स भी महसूस किए गए, जिनमें से सबसे शक्तिशाली झटका 5.2 तीव्रता का मापा गया।  एहतियात के तौर पर तटीय इलाकों के पास रहने वाले लोग समुद्र से दूर सुरक्षित स्थानों पर चले गए ताकि किसी संभावित सुनामी से बचा जा सके. इंडोनेशिया की मौसम विज्ञान, जलवायु विज्ञान और भूभौतिकीय एजेंसी (BMKG) ने साफ किया है कि इस भूकंप से सुनामी का कोई खतरा नहीं है, लेकिन उन्होंने लोगों को सचेत रहने की सलाह दी है क्योंकि आने वाले दिनों तक आफ्टरशॉक्स का सिलसिला जारी रह सकता है।  राहत और बचाव कार्य जारी, नुकसान का आकलन कर रही हैं एजेंसियां इंडोनेशिया की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी ने एक बयान में कहा है कि वे वर्तमान में प्रभावित क्षेत्रों से नुकसान, संभावित हताहतों और विस्थापित हुए लोगों के बारे में सटीक डेटा जुटाने में लगे हैं. मलबे को हटाने और प्रभावित लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए राहत दल को सक्रिय कर दिया गया है।  चूंकि इंडोनेशिया 'पैसिफिक रिंग ऑफ फायर' पर स्थित है, इसलिए यहां अक्सर भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं. फिलहाल प्रशासन स्थिति पर पूरी नजर बनाए हुए है और लोगों से शांत रहने की अपील की जा रही है। 

परीक्षा सुरक्षा के मद्देनज़र टेलीग्राम पर केंद्र सरकार की अस्थायी रोक, RE-NEET बना कारण

नई दिल्ली National Testing Agency यानी NTA ने भारत में टेलीग्राम (Telegram) प्लेटफॉर्म को लेकर जारी किए गए सरकारी निर्देशों का स्वागत किया है. NTA के अनुसार उसकी सिफारिश पर भारत सरकार ने Telegram के खिलाफ दो अहम निर्देश जारी किए हैं. पहला निर्देश Information Technology Act 2000 की धारा 69A के तहत जारी किया गया है, जिसके तहत भारत में Telegram App पर 22 जून 2026 तक अस्थायी रोक लगाई गई है. दूसरा निर्देश Telegram को भारत में पहले से पोस्ट किए गए संदेशों के Message Editing Feature को 30 जून 2026 तक बंद करने के लिए दिया गया है. NTA ने कहा कि यह कदम छात्रों के हित में उठाया गया है. फैसला NEET की परीक्षा के मद्देनजर लिया गया है।  Telegram पर पहला निर्देश NTA के अनुसार Information Technology Act 2000 की धारा 69A के तहत Telegram प्लेटफॉर्म तक भारत में पहुंच को सीमित करने का निर्देश जारी किया गया है. यह प्रतिबंध 22 जून 2026 तक लागू रहेगा. इस अवधि में NEET UG 2026 Re-Examination का दिन और उसके तुरंत बाद का समय शामिल है।  Message Editing Feature पर भी निर्देश सरकार ने Telegram को भारत में पहले से पोस्ट किए गए संदेशों के Message Editing Feature को 30 जून 2026 तक बंद करने का निर्देश दिया है. NTA के अनुसार यह कदम उस विशेष फीचर को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, जिसके जरिए राष्ट्रीय परीक्षाओं में घटना के बाद फर्जी Paper Leak के सबूत तैयार किए गए।  '30 जून तक बंद रहेगा मैसेज एडिटिंग फीचर' एजेंसी ने आगे कहा, "निर्देश में प्लेटफॉर्म से कहा गया है कि वह भारत में पहले से पोस्ट किए गए मैसेज के लिए 'मैसेज-एडिटिंग' फीचर को एक तय समय (30 जून 2026) तक बंद कर दे। यह कदम उस खास फीचर को ध्यान में रखकर उठाया गया है, जिसका इस्तेमाल राष्ट्रीय परीक्षाओं के संबंध में घटना के बाद 'पेपर लीक' के सबूत गढ़ने के लिए किया जाता रहा है।" एनटीए ने छात्रों से की ये अपील एनटीए ने कहा कि मैसेज एडिट करने पर रोक का मकसद यह था कि यूजर्स पुराने मैसेज में बदलाव करके और ओरिजिनल टाइमस्टैम्प बनाए रखकर पेपर लीक के झूठे सबूत न बना सकें। एजेंसी ने माना कि इन पाबंदियों से टेलीग्राम के असली यूजर्स को परेशानी होगी, लेकिन कहा कि ये उपाय कुछ समय के लिए ही हैं और परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिए जरूरी हैं। एजेंसी ने फिर से कहा कि NEET-UG 2026 की दोबारा परीक्षा तय समय के अनुसार 21 जून को ही होगी और उम्मीदवारों से अपील की कि वे अपडेट के लिए सिर्फ एनटीए के आधिकारिक चैनलों पर ही भरोसा करें। एनटीए ने बताया किस वजह से टेलीग्राम पर लगाई गई रोक एनटीए का मानना है कि परीक्षा से जुड़े प्रश्नपत्रों, अफवाहों, फर्जी सूचनाओं के प्रसार को रोकने में यह फैसला मददगार साबित होगा। एजेंसी ने कहा कि परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। एनटीए के अनुसार, हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के दौरान सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से गलत सूचनाओं और परीक्षा सामग्री के कथित प्रसार की घटनाएं सामने आई थीं। ऐसे में एहतियाती कदम के तौर पर यह फैसला लिया गया है। पुनर्परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों से एनटीए ने अपील की है कि वे केवल आधिकारिक वेबसाइट और अधिकृत सूचना माध्यमों पर ही भरोसा करें तथा किसी भी अपुष्ट जानकारी या अफवाह से बचें। टेलीग्राम की संदेश संपादित करने की सुविधा पर 30 जून तक रहेगी रोक एनटीए द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 की धारा 69ए के तहत टेलीग्राम पर अस्थायी रूप से रोक लगाई गई है और यह रोक 22 जून 2026 तक जारी रहेगी। एक अन्य आदेश के तहत टेलीग्राम को भारत में पहले से भेजे गए संदेशों को संपादित (Edit) करने की सुविधा 30 जून 2026 तक बंद करनी होगी। इसका उद्देश्य उस सुविधा का दुरुपयोग रोकना है, जिसके जरिए राष्ट्रीय परीक्षाओं के बाद नकली पेपर लीक के सबूत तैयार किए जाते थे। इन दोनों कदमों का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और उन संगठित गिरोहों पर रोक लगाना है जो NEET (UG) 2026 की पुनः परीक्षा देने वाले छात्रों को धोखा देने के लिए टेलीग्राम का उपयोग कर रहे थे।  NTA ने क्या कहा NTA ने कहा कि दोनों कदम Public Order के हित में उठाए गए हैं. NTA के अनुसार NEET UG 2026 Re-Examination में शामिल होने वाले उम्मीदवारों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए संगठित Cheating Rackets द्वारा Telegram प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा था।  NTA ने मंत्रालय का जताया आभार NTA ने Ministry of Electronics and Information Technology का धन्यवाद किया. NTA ने कहा कि छात्रों के हित में उठाया गया यह समय पर लिया गया कदम 21 जून 2026 को NEET UG 2026 Re-Examination को सुरक्षित और संरक्षित तरीके से आयोजित करने में मदद करेगा।