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7.8% GDP ग्रोथ से उत्साह के बीच बड़ी चुनौती, 2047 के विकसित भारत मिशन पर अर्थशास्त्रियों ने चेताया

 नई दिल्ली भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की शानदार GDP ग्रोथ दर्ज की है. पश्चिम एशिया संकट और अन्य वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर रहा और भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार को दिखाता है. हालांकि, इस GDP आंकड़े को लेकर विवाद भी सामने आया।  पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के आंकड़ों और पिछली अवधि के संशोधन पर सवाल उठाए, जबकि कांग्रेस ने भी सरकार पर आंकड़ों के साथ हेरफेर करने का आरोप लगाया. सुभाष गर्ग ने तो यहां तक दावा कर दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि दर 7.8% की जगह सिर्फ 2.6% है. हालांकि, उन्होंने खुद ही एक इंटरव्यू में अपने 2.6% जीडीपी ग्रोथ के दावे से पलटते हुए इसे 5% तक संसोधित कर दिया।  दूसरी ओर, दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों- सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने GDP ग्रोथ के आंकड़ों में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है. साथ ही दोनों ने बताया कि 7.8% की ग्रोथ के बावजूद 2047 तक विकसित देश बनने के लिए भारत को और तेज आर्थिक विकास की जरूरत होगी।  खास बात यह है कि मोंटेक सिंह अहलूवालिया कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौरान योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रह चुके हैं. वह 2004 से 2014 के बीच देश की आर्थिक नीति और सुधारों से जुड़े अहम फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका में थे. इसलिए मौजूदा जीडीपी ग्रोथ पर उनकी राय इस बहस को एक अलग वजन देती है।  सुभाष गर्ग ने क्या सवाल उठाया? GDP के नए आंकड़े जारी होने के बाद पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने पिछले साल की पहली तिमाही के आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन को लेकर सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि पिछले साल की पहली तिमाही का मौजूदा कीमतों पर GDP आंकड़ा पहले करीब ₹86 लाख करोड़ बताया गया था, जिसे नई GDP सीरीज में घटाकर करीब ₹80 लाख करोड़ कर दिया गया. उन्होंने करीब ₹6 लाख करोड़ के अंतर को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा और इसी आधार पर मौजूदा 7.8% ग्रोथ की गणना पर सवाल उठाया।  सुभाष गर्ग का तर्क था कि अगर पुराने और नए आंकड़ों को अलग-अलग आधार पर देखा जाए तो मौजूदा कीमतों पर GDP ग्रोथ 2.5% से भी कम नजर आती है. हालांकि, सरकार और अर्थशास्त्रियों ने उनकी इस गणना को सिरे से खारिज करते हुए अतार्किक बताया. सरकार और अर्थशास्त्रियों ने कहा कि दो अलग-अलग स्टैटिस्टिकल सीरीज के आंकड़ों की तुलना करने जीडीपी की गणना नहीं की जा सकती।  कांग्रेस ने भी उठाए थे सवाल सुभाष गर्ग की आपत्ति के बाद GDP के आंकड़े राजनीतिक बहस का मुद्दा भी बन गए. कांग्रेस ने नई GDP सीरीज, GDP डिफ्लेटर और पिछले आंकड़ों में हुए संशोधन को लेकर सरकार पर सवाल उठाए. पार्टी ने दावा किया कि नई सीरीज में चार वर्षों के दौरान भारत की GDP में करीब ₹43 लाख करोड़ की कमी दिखाई गई है. सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नई GDP सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है और आंकड़ों की गणना के लिए बेहतर डेटा सोर्स, नई मेथोडोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है. सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) ने भी कहा है कि अलग-अलग GDP सीरीज के आंकड़ों की तुलना करके ग्रोथ रेट निकालना सही तरीका नहीं है।  दो बड़े अर्थशास्त्रियों ने क्या कहा? GDP के आंकड़ों को लेकर चल रही इस बहस के बीच सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी अपनी राय रखी. दोनों ने इस बात से सहमति जताई कि 7.8% के आंकड़े को राजनीतिक तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का कोई ठोस सबूत नहीं है. विश्व बैंक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा ने भी अलग-अलग GDP सीरीज को मिलाकर 2.6% या 2.8% की ग्रोथ निकालने को सही नहीं माना।  सुरजीत भल्ला ने कहा कि अगर सरकार GDP को बढ़ाकर दिखाना चाहती, तो खपत के आंकड़ों को भी बढ़ा हुआ दिखाया जा सकता था. लेकिन नई सीरीज में खपत को उलटे नीचे संशोधित किया गया है. उनके मुताबिक, अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि GDP के आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ हुई है।  7.8% ग्रोथ ठीक, पर 2047 का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण GDP विवाद से अलग दोनों अर्थशास्त्रियों की सबसे अहम बात 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को लेकर है. भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की मजबूत ग्रोथ जरूर दर्ज की है, लेकिन सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के मुताबिक सिर्फ एक-दो तिमाहियों की तेज ग्रोथ से यह तय नहीं किया जा सकता कि भारत 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बन जाएगा।  सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लंबे समय तक दोहरे अंकों में ग्रोथ बनाए रखनी होगी. उन्होंने इन्वेस्टमेंट-GDP रेशियो में करीब 34% तक की मजबूती को सकारात्मक बदलाव माना, लेकिन कहा कि डॉलर के लिहाज से प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए अभी काफी तेज ग्रोथ की जरूरत है।  मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के निराशावादी अनुमानों के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है. लेकिन 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य के लिए मौजूदा रफ्तार पर्याप्त नहीं है. उनका मानना है कि भारत को ज्यादा ऊंची और लगातार बनी रहने वाली ग्रोथ चाहिए।  सिर्फ GDP बढ़ना काफी नहीं अर्थशास्त्रियों के मुताबिक किसी देश के विकसित होने का मतलब सिर्फ कुल GDP का बढ़ना नहीं है. प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, प्रोडक्शन और डेवलपमेंट का फायदा समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है. अर्थशास्त्री रोहित लांबा ने भारत के डेवलपमेंट मॉडल को चीन और दक्षिण कोरिया से अलग बताया है।  उनके मुताबिक भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से सीधे हाई-स्किल सर्विस सेक्टर की ओर तेजी से बढ़ा, जबकि बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को जितना चाहिए, उतना मजबूत नहीं बना सका. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP करीब 2,695 डॉलर थी. इसके मुकाबले चीन की प्रति व्यक्ति GDP करीब 13,303 डॉलर, ब्रिटेन की करीब 53,246 डॉलर और अमेरिका की करीब 84,534 डॉलर थी।  रोजगार और K-Shaped ग्रोथ की चुनौती भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती ऐसी ग्रोथ … Read more

BRICS समिट के लिए सजेगी दिल्ली, 12 सितंबर से भारत मंडपम में जुटेंगे वैश्विक नेता

 नई दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए तैयार है. ब्रिक्स की अध्यक्षता इस साल भारत कर रहा है और अध्यक्ष के नाते इस बार के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की जिम्मेदारी भी भारत की है. 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को होना है।  इस शिखर सम्मेलन में शिरकत करने के लिए ब्रिक्स के सदस्य देशों के साथ ही कई अन्य कद्दावर भी नई दिल्ली में होंगे. इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई दिल्ली आ सकते हैं. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान भी भारत आ सकते हैं।  संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी इसमें शामिल होने भारत आ सकते हैं. विदेश मंत्रालय की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे. साझेदार देशों के राष्ट्राध्यक्षों और कई अन्य देशों के प्रतिनिधियों को भी आउटरीच के तहत इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है।  नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में होने जा रहा है, जब संगठन के 20 साल पूरे हो रहे हैं. ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने साल 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान अनौपचारिक तौर पर ब्रिक समूह की नींव रखी थी. हालांकि, इसकी औपचारिक स्थापना साल 2009 में हुई थी।  तब 16 जून को रूस के येकातेरिनबर्ग शहर में ब्रिक समूह का औपचारिक गठन किया गया था. ब्रिक का पहला शिखर सम्मेलन भी तभी हुआ था. ब्रिक का पहला शिखर सम्मेलन 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में ही हुआ था. साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी इस समूह में शामिल हो गया और इसके बाद ब्रिक संगठन ब्रिक्स हो गया था।  ब्रिक्स में इस समय भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ ही मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया सदस्य देश हैं. साझेदार देशों की भी एक अलग कैटेगरी है. इस कैटेगरी में 10 देश शामिल हैं। 

Bullet Train: मुंबई-अहमदाबाद सफर होगा महज 2 घंटे का, रेल मंत्री ने बताया कब दौड़ेगी पहली ट्रेन

अहमदाबाद  भारत की पहली बुलेट ट्रेन को लेकर बड़ी खुशखबरी सामने आई है. केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि भारत की पहली स्वदेशी बुलेट ट्रेन का ट्रायल अगले साल मई और जून में शुरू होने की उम्मीद है. बुलेट ट्रेन के ट्रायल शुरू होने के दो से चार महीनों के बाद इसे आम यात्रियों के लिए खोला जाएगा. पहली बुलेट ट्रेन मुंबई-अहमदाबाद रूट के एक सेक्शन पर शुरू होगी. यहां निर्माण कार्य अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है।  अगले साल मई-जून में शुरू होगी पहली बुलेट ट्रेन वडोदरा में 'नमो फॉर विकसित भारत' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हाई-स्पीड ट्रेन का पहला बॉडी फ्रेम हाल ही में बनकर तैयार हुआ है और उसे स्क्वीज टेस्टिंग के लिए भेजा गया है. उन्होंने कहा, 'अगले साल मई या जून तक, भारत की अपनी बुलेट ट्रेन टेस्टिंग के लिए पटरियों पर होगी. 2-4 महीने की टेस्टिंग के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुलेट ट्रेन का उद्घाटन करेंगे।  केंद्रीय मंत्री ने कहा कि यह प्रोजेक्ट 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन के तहत तैयार किया जा रहा है और इससे वडोदरा और मुंबई के बीच यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा. उन्होंने कहा, 'जब आप वडोदरा से बुलेट ट्रेन में सफर करेंगे, तो आप सिर्फ डेढ़ घंटे में मुंबई पहुंच जाएंगे।  तेजी से चल रहा निर्माण कार्य वैष्णव ने बताया कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है और सूरत-वापी सेक्शन के इस साल दिसंबर तक पूरा होने की उम्मीद है. रेलवे सेक्टर में बड़े सुधारों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार रेलवे के ऑपरेटिंग सिस्टम, रिजर्वेशन प्लेटफॉर्म और निर्माण से जुड़े नियमों को आधुनिक बना रही है. उन्होंने कहा, 'हम ऑपरेटिंग सिस्टम और रिजर्वेशन सिस्टम से लेकर पुराने कंस्ट्रक्शन प्रोटोकॉल तक, हर चीज में सुधार और आधुनिकीकरण कर रहे हैं।  सेक्शन में शुरू होगी बुलेट ट्रेन     सूरत-बिलिमोरा सेक्शन: सबसे पहले शुरू होगा     वापी-सूरत सेक्शन: दूसरे चरण में शुरू होगा     वापी-अहमदाबाद सेक्शन: तीसरे चरण में शुरू होगा      अहमदाबाद-ठाणे सेक्शन: चौथे चरण में शुरू होगा      अहमदाबाद-मुंबई: ठाणे के बाद मुंबई वाला सेक्शन शुरू होगा और बुलेट ट्रेन अहमदाबाद से मुबंई तक शुरू हो जाएगी।  वैष्णव ने बताया कि हाल के वर्षों में रेलवे के कई लंबे समय से अटके प्रोजेक्ट पूरे किए गए हैं. उन्होंने चिनाब ब्रिज और मिजोरम को राष्ट्रीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ने वाले रेल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट का जिक्र किया. केंद्रीय मंत्री के अनुसार, 280 रेलवे स्टेशनों को फिर से विकसित किया गया है और 36,000 किलोमीटर नए रेलवे ट्रैक बिछाए गए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वंदे भारत टेक्नोलॉजी वाली कार्गो ट्रेनें भी विकसित की जा रही हैं।  उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी की चुनौतियों के बावजूद रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की रफ्तार तेज हुई है. उन्होंने बताया कि 2020 में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का पहला सेक्शन पूरा होने के बाद, अगले सेक्शन पर काम में तेजी आई. वैष्णव ने कहा, 'भारतीय रेलवे का जो आधुनिक स्वरूप उभर रहा है, उससे आने वाली कई पीढ़ियों को फायदा होगा।  ये 7 बुलेट ट्रेन कॉरिडोर भी हैं प्रस्तावित     दिल्ली-वाराणसी बुलेट ट्रेन     वाराणसी-पटना-सिलीगुड़ी      मुंबई-पुणे बुलेट ट्रेन     पुणे-हैदराबाद कॉरिडोर      बेंगलुरु-चेन्नई कॉरिडोर      बेंगलुरु-हैदराबाद कॉरिडोर      चेन्नई-हैदराबाद कॉरिडोर 

PM मोदी पर टिप्पणी मामले में राहुल गांधी को राहत नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मानहानि केस खारिज करने से किया इनकार

मुंबई कांग्रेस नेता राहुल गांधी को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. अदालत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर विवादित टिप्पणियों से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने माना कि भारतीय जनता पार्टी एक पहचान योग्य राजनीतिक संगठन है और इस मामले में शिकायतकर्ता के तौर पर भाजपा कार्यकर्ता की याचिका प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य है. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राहुल गांधी के खिलाफ चल रहा आपराधिक मानहानि मामला आगे बढ़ेगा. हालांकि अदालत ने उन्हें छह सप्ताह की अंतरिम राहत भी प्रदान की है।  मजिस्ट्रेट के आदेश में हस्तक्षेप से कोर्ट का इनकार न्यायमूर्ति नितिन बोरकर की एकल पीठ ने राहुल गांधी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि 'मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश में कोई स्पष्ट अवैधता या गंभीर त्रुटि नहीं दिखती. इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत हस्तक्षेप करने का यह उपयुक्त मामला नहीं है.' कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए समन आदेश में कोई कमी नजर नहीं आती।  उच्च न्यायालय ने कहा, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा का एक प्रमुख चेहरा हैं और इसलिए उनके खिलाफ की गई किसी भी टिप्पणी का भाजपा के सदस्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, ऐसा नहीं कहा जा सकता।  अदालत ने कहा कि गांधी द्वारा की गई टिप्पणियां व्यक्तिगत प्रकृति की थीं या केवल प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाकर की गई थीं या नहीं, यह सबूतों और गवाहों के बयानों की जांच के बाद मुकदमे के दौरान ही निर्धारित किया जा सकता है।  भाजपा कार्यकर्ता की शिकायत को माना सुनवाई योग्य राहुल गांधी की ओर से दलील दी गई थी कि उनकी कथित टिप्पणियों में भाजपा या किसी विशेष समूह का नाम नहीं लिया गया था, इसलिए भाजपा कार्यकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है. हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि भाजपा एक पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और एक स्पष्ट रूप से पहचानी जाने वाली संस्था है. कोर्ट ने माना कि प्रारंभिक स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी की कथित टिप्पणियां केवल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक सीमित थीं. गांधी की ओर से पेश अधिवक्ता सुदीप पसबोला और अधिवक्ता कुशल मोर ने दलील दी कि शिकायत निराधार है तथा शिकायतकर्ता को इसे दायर करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था. उन्होंने कहा था कि शिकायतकर्ता इस मामले में पीड़ित पक्ष नहीं है और इसलिए वह ऐसी शिकायत दायर नहीं कर सकता।  क्या है पूरा मामला? यह मानहानि शिकायत भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल ने गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत में दर्ज कराई थी. शिकायतकर्ता श्रीश्रीमल ने उच्च न्यायालय में गांधी की याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सदस्य होने के नाते वह अपने नेता के खिलाफ की गई टिप्पणियों से आहत हैं. शिकायत 2018 में राजस्थान की एक रैली में राहुल गांधी द्वारा दिए गए कथित बयान को लेकर की गई थी. शिकायतकर्ता का आरोप है कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए विवादित शब्दों का इस्तेमाल किया था. महेश श्रीश्रीमल का कहना था कि इन टिप्पणियों से न केवल प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची, बल्कि भाजपा कार्यकर्ताओं को भी गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया।  2019 में जारी हुआ था समन शिकायतकर्ता द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद मजिस्ट्रेट अदालत ने अगस्त 2019 में राहुल गांधी को समन जारी किया था. इसके बाद राहुल गांधी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करते हुए समन आदेश और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।  सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए मिली राहत हालांकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की याचिका खारिज कर दी, लेकिन उन्हें तत्काल राहत भी दी है. अदालत ने छह सप्ताह तक मजिस्ट्रेट अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से संरक्षण प्रदान किया है, ताकि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकें। 

पुतिन के भारत दौरे का काउंटडाउन शुरू, BRICS से पहले PM मोदी संग बैठक; एजेंडे में होंगे ये अहम मुद्दे

नई दिल्ली दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात तय है. क्रेमलिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की शुक्रवार को होने वाली द्विपक्षीय बैठक की पुष्टि करते हुए भारत को रूस का "रणनीतिक साझेदार" बताया है।  रूसी राष्ट्रपति के दिल्ली पहुंचने से पहले क्रेमलिन के प्रवक्ता और राष्ट्रपति पुतिन के प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने मंगलवार को मीडिया से वर्चुअल बातचीत की. उनके बयानों में भारत-रूस रिश्तों की गर्माहट के साथ-साथ बदलती वैश्विक व्यवस्था की झलक भी दिखाई दी।  पेस्कोव ने कहा, "दोनों देशों के बीच आपसी संपर्क बहुत अहम होंगे, खासकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक. जैसा कि आप जानते हैं, भारत और रूस के नेताओं के बीच बहुत करीबी संबंध हैं. उनके संबंध बहुत व्यावहारिक हैं और वे एक-दूसरे के साथ इतने ईमानदार हैं कि वैश्विक एजेंडे और हमारे आपसी संबंधों से जुड़े सबसे संवेदनशील मुद्दों पर बहुत खुले और रचनात्मक तरीके से चर्चा कर सकते हैं।  यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ने, पश्चिमी प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे कई बड़े सवालों से जूझ रही है।  ब्रिक्स की अहमियत पर पेस्कोव ने प्रकाश डालते हुए कहा," मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि ब्रिक्स कोई संगठन नहीं है; यह एक क्लब है. हमारे पास कोई चार्टर, नियम या स्थायी कार्यालय नहीं है. बल्कि, यह उन देशों का एक क्लब है जो इस बात पर एक जैसी सोच रखते हैं कि दुनिया में काम कैसे होने चाहिए और अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग कैसे किया जाना चाहिए।  उन्होंने ब्रिक्स के तीन प्रमुख स्तंभों का जिक्र करते हुए कहा, "रूस ब्रिक्स सहयोग के तीन मुख्य स्तंभों – राजनीति और सुरक्षा; अर्थव्यवस्था और वित्त; और सांस्कृतिक व मानवीय संपर्क – के और विकास में योगदान देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. बेशक, हमारी अपनी कई पहल हैं जिन्हें हम इस समूह के भीतर बढ़ावा दे रहे हैं. हम ब्रिक्स के भीतर सहयोग के अलग-अलग तरीकों में ज्यादा से ज्यादा देशों को शामिल करने के विचार का समर्थन करते हैं।  पार्टनर कंट्री के कॉन्सेप्ट की प्रशंसा करते हुए पेस्कोव बोले, " 2024 में, पार्टनर देशों की एक नई श्रेणी – 'ब्रिक्स पार्टनर कंट्री' श्रेणी – बनाई गई थी, और अब यह बहुत अच्छी तरह से विकसित हो रही है. बेलारूस, बोलीविया, वियतनाम, कजाकिस्तान, क्यूबा, ​​नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान को पार्टनर का दर्जा दिया गया है. इन देशों के प्रतिनिधियों को धीरे-धीरे अलग-अलग वर्किंग ग्रुप और फॉर्मेट में शामिल किया जा रहा है, और हम इसे एक बहुत ही सकारात्मक विकास मानते हैं।  उन्होंने बताया कि रियो डी जनेरियो में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान, रूसी प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज को बेहतर बनाने से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर एक्सपर्ट लेवल पर बातचीत शुरू करने की पहल की. बोले, "हम इस पहल को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं, और ब्रिक्स के भीतर कई देशों ने इसका समर्थन किया।  पेस्कोव ने बताया कि रूस और ब्रिक्स देशों के बीच अब करीब 90 प्रतिशत भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है. यह बयान ऐसे समय आया है जब डॉलर के प्रभुत्व और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को लेकर ब्रिक्स देशों के बीच चर्चा तेज है।  भारत के रूसी ऊर्जा आयात पर अमेरिका की ओर से प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रस्ताव पर पेस्कोव ने कड़ा रुख अपनाया. उन्होंने अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक को “अवैध” करार दिया।  पीएम मोदी-राष्ट्रपति पुतिन बातचीत के दौरान यूक्रेन युद्ध और शांति की कोशिशें भी अहम मुद्दा हो सकती हैं. भारत ने शुरुआत से ही युद्ध के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति का रास्ता अपनाने पर जोर दिया है. भारत की इसी भूमिका को लेकर पूछे गए सवाल पर पेस्कोव ने कहा, "हम भारतीय प्रयासों का स्वागत करते हैं।  पेस्कोव ने ब्रिक्स को सिर्फ आर्थिक समूह के रूप में देखने से आगे बढ़ते हुए इसे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रतीक बताया. उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता में काफी निवेश किया है और संगठन की विचारधारा बहुध्रुवीय दुनिया की विचारधारा है. उनके अनुसार एकध्रुवीय दुनिया ढह रही है और अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो रही है।  उनके मुताबिक, दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन केवल सदस्य देशों की बैठक नहीं है. इसके पीछे दुनिया की उस नई व्यवस्था की बहस भी है जिसमें रूस, भारत, चीन और दूसरे उभरते देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभाव की मांग कर रहे हैं।  इसके साथ ही पेस्कोव ने भारत-रूस संबंधों को काफी महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा, "कहानी केवल तेल और रक्षा तक सीमित नहीं है." पेस्कोव ने भारत में नए परमाणु संयंत्र के विकास में आगे प्रगति की उम्मीद जताई. उन्होंने रूस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों का भी स्वागत किया।   

वडोदरा में PM मोदी का कांग्रेस पर निशाना, ‘हमने बनाए 50 हजार रेल कोच, कांग्रेस 50 हजार टॉयलेट भी नहीं बना पाई’

वड़ोदरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को वडोदरा में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के तीन सेक्शनों का उद्घाटन किया. इससे नोएडा के दादरी से नवी मुंबई तक ये कॉरिडोर पूरी तरह चालू हो गया. पीएम मोदी ने कहा कि 2004 में योजना बनने के 10 साल तक पिछले सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. वर्ष 2014 से 12 साल के भीतर हमने 2800 किमी के इस कॉरिडोर को पूरा कर दिया. इसमें मालगाड़ियों की रफ्तार दोगुना हो गई है. ट्रेवल से ट्रांसपोर्ट तक अलग-अलग रूट से कनेक्टिविटी की स्पीड बढ़ी है और लॉजिस्टिक्स की लागत घटी है।  2004 से 10 साल कॉरिडोर पर कोई काम नहीं यह 21वीं सदी के भारत के लिए ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुआ है. ये कॉरिडोर इस बात का साक्षी है कि बीते 12 साल में देश की काम करने की संस्कृति कैसे बदली है. इस कॉरिडोर पर 2004 में विचार शुरू हुआ था, 2006 में एक स्पेशल कंपनी बनाई गई. फिर 2014 तक फाइलें ही यहां से वहां होती रहीं. फाइलें टेबल पर यात्रा कर रही थीं. इन फाइलों को भी डेडिकेटेड कॉरिडोर नसीब नहीं हुआ. वर्ष 2014 में वड़ोदरा, गुजरात औऱ देश के लोगों ने मुझे दिल्ली भेजा. आपने मुझे भेजा और उनकी विदाई हुआ. 7-8 वर्षों में एक किलोमीटर का काम भी इन लोगों ने नहीं किया. उनके हिसाब से देश चलाते तो आपके बाद तीन-चार पीढ़ियांआती तो भी काम पूरा नहीं होता।  ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर में बड़ा बदलाव भारत के लॉजिस्टिक्स सिस्टम कमें बदलाव हम करके लाए हैं. आपकी शिक्षा-दीक्षा और गुजरात से जो पाठ सीखकर मैं वहां पहुंचा था, उसी के आधार पर हमने कॉरिडोर को आगे बढ़ाया और 12साल में पूरा करके दिखाया. आज ईस्टर्न और वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर देश के मुख्य कारोबार का मुख्य आधार बन गया है. ये कॉरिडोर तेजी से विकसित होते भारत की जीवन रेखा है. इसने भारत के ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर का कायाकल्प कर दिया है. पहले पैसेंजर ट्रेन जिस ट्रैक पर चलती थी, उसी ट्रैक पर मालगाड़ी भी चलती थी. ट्रेवल और ट्रांसपोर्ट दोनों धीमा था. लेकिन डेडिकेटेड कॉरिडोर ने स्थिति बदल दी।  रोजाना 430 किमी गुड्स ट्रेनें चलती हैं कॉरिडोर पर पीएम मोदी ने कहा, पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर पर रोज 430 से मालगाड़ियां चलती हैं. पहले जो मालगाड़ी साढ़े छह घंटे में 100 किमी चलती थी, वहीं मालगाड़ी आधे से भी कम समय में 100 किमी का सफर तय कर लेगी. जिस जगह ट्रक से सामान भेजने में सामान्य तौर पर 30 घंटे लगते हैं, कॉरिडोर से यही दूरी 10-12 घंटे में पूरी हो जाती है. मालगाड़ी के चलने से ट्रक और ट्रेन का फ्यूल बचता है, किराया भाड़ा का खर्च कम हुआ है. समय बचा है, पर्यावरण को फायदा हुआ है। 

मुंबई में PM मोदी के कार्यक्रम स्थल से दो हिरासत में, फर्जी PMO अधिकारी बनकर घूम रहा था रोहन पारेख

मुंबई पीएम नरेंद्र मोदी के मुंबई में कार्यक्रम स्थल से दो लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया गया. हिरासत में लिए गए लोगों में से एक के पास से फर्जी आईडी कार्ड बरामद किया गया है. पकड़ा गया शख्स खुद को पीएमओ का अधिकारी होने का दावा कर रहे थे. एक अन्य पकड़े गए शख्स के पास से बंदूक भी बरामद हुई है. शख्स के पास से मिला फर्जी ID कार्ड पकड़े गए एक व्यक्ति के पास से बंदूक बरामद हुई है. मुंबई पुलिस ने BKC स्थित नीता अंबानी सांस्कृतिक केंद्र से एक व्यक्ति को हिरासत में लिया है.पकड़ा गया शख्स खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का अधिकारी होने का दावा कर रहा था. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का नाम रोहन पारेख है और उसकी उम्र 24 वर्ष है. सूत्रों के मुताबिक, रोहन के पास प्रधानमंत्री कार्यालय का फर्जी पहचान पत्र भी था. सुरक्षा जांच के दौरान उसका पहचान पत्र फर्जी पाया गया. रोहन एक अंगरक्षक के साथ घूमता था, जिसके पास बंदूक थी. मुंबई क्राइम ब्रांच अब इस पूरे मामले की आगे जांच कर रही है. पीएम मोदी का मुंबई दौरा प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार शाम को मुंबई में करीब 5.45 बजे ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (जीएफएफ) 2026 का उद्घाटन करेंगे. ग्लोबल फिनटेक फेस्ट का सातवां संस्करण 8 से 11 सितंबर तक मुंबई में आयोजित किया जा रहा है. 2020 से, जीएफएफ एक अंतरराष्ट्रीय विचार नेतृत्व मंच के रूप में उभरा है जो नीति निर्माताओं, नियामकों, केंद्रीय बैंकों, वित्तीय संस्थानों, फिनटेक कंपनियों, प्रौद्योगिकी कंपनियों, निवेशकों, शिक्षाविदों और अन्य वैश्विक हितधारकों को वित्त के भविष्य को आकार देने पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साथ लाता है. जानिए आखिर हुआ क्या था पुलिस के मुताबिक, रोहन पारेख नामक व्यक्ति एक बॉडीगार्ड के साथ इस हाई-सिक्यॉरिटी वेन्यू के आसपास घूम रहा था. सुरक्षा जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि रोहन पारेख एक फर्जी पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय का पहचान पत्र लेकर घूम रहा था. कार्ड की जांच करने पर वह फर्जी पाया गया, जिसके बाद उसे हिरासत में ले लिया गया. पुलिस का कहना है कि रोहन पारेख और उसका बॉडीगार्ड दोनों पुलिस हिरासत में हैं, और इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच कर रही है. अधिकारी इस बात की गहराई से जांच कर रहे हैं कि वे कार्यक्रम परिसर के अंदर कैसे दाखिल हुए और वहां मौजूद रहने के पीछे उनका कोई खास मकसद या साजिश तो नहीं थी. दोनों आरोपियों को जल्द ही अदालत में पेश किए जाने की संभावना है, जहां पुलिस उनके इस उच्च सुरक्षा वाले इलाके में मौजूदगी के पीछे के बड़े कारणों का पता लगाने के लिए पूछताछ कर रही है.

दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बनने की ओर जेद्दा टावर, 109 मंजिलें पूरी; बुर्ज खलीफा रहेगा पीछे

दुबई    दुबई की बुर्ज खलीफा को दुनिया की सबसे ऊंची इमारत का खिताब हो सकता है छिन जाए. इस इमारत का यह रिकॉर्ड अब टूटने की ओर है. सऊदी अरब के जेद्दा शहर में एक ऐसी गगनचुंबी इमारत तैयार हो रही है, जिसकी ऊंचाई सुनकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह प्रोजेक्ट कितना बड़ा है।  नाम है जेद्दा टावर. इसे पहले किंगडम टावर के नाम से जाना जाता था. पूरी तरह तैयार होने के बाद इसकी ऊंचाई कम से कम 1000 मीटर यानी 1 किलोमीटर होगी. इस ऊंचाई के साथ यह दुनिया की पहली ऐसी इमारत बनने जा रही है, जो एक किलोमीटर के निशान को पार करेगी।  109 मंजिलों तक पहुंच चुका है टावर निर्माण की ताजा प्रगति के मुताबिक अगस्त 2026 तक जेद्दा टावर का स्ट्रक्चर 109वीं मंजिल तक पहुंच चुका था. इसकी ऊंचाई करीब 430 मीटर हो गई थी. यानी इमारत अभी अपनी अंतिम ऊंचाई से काफी नीचे है, लेकिन जमीन से ऊपर उठता इसका ढांचा अब दूर से ही एक विशाल गगनचुंबी इमारत जैसा दिखाई देने लगा है।  टावर में 157 से ज्यादा मंजिलें होने की योजना है. निर्माण की रफ्तार भी लगातार बढ़ाई जा रही है. इंजीनियरिंग फर्म थॉर्नटन टोमासेट्टी के मुताबिक इसका कोर स्ट्रक्चर हर हफ्ते करीब एक मंजिल और लगभग 4 मीटर ऊपर जा रहा है।  बुर्ज खलीफा से कितनी ऊंची होगी? अभी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत दुबई की बुर्ज खलीफा है, जिसकी ऊंचाई 828 मीटर है. जेद्दा टावर की प्रस्तावित ऊंचाई कम से कम 1000 मीटर है.यानी दोनों के बीच करीब 172 मीटर का अंतर होगा. आसान भाषा में समझें तो जब जेद्दा टावर पूरा होगा, तब बुर्ज खलीफा का 828 मीटर का रिकॉर्ड पीछे छूट जाएगा।  लेकिन इस प्रोजेक्ट की खासियत सिर्फ इसकी ऊंचाई नहीं है. तीन पंखुड़ियों जैसी क्यों है डिजाइन? जेद्दा टावर का डिजाइन अमेरिकी आर्किटेक्ट एड्रियन स्मिथ ने तैयार किया है. दिलचस्प बात यह है कि एड्रियन स्मिथ बुर्ज खलीफा के डिजाइन से भी जुड़े रहे हैं।  जेद्दा टावर को ऊपर से देखने पर इसकी आकृति तीन पंखुड़ियों जैसी नजर आती है. यह डिजाइन केवल देखने में आकर्षक बनाने के लिए नहीं है. इतनी ऊंची इमारत के लिए हवा सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है. टावर का आकार हवा के दबाव और उसके आसपास बनने वाले एयरफ्लो को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.यानी यहां डिजाइन और इंजीनियरिंग दोनों का काम साथ-साथ किया गया है।  630 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर होगा ऑब्जर्वेशन डेक जेद्दा टावर के अंदर सिर्फ ऑफिस या घर नहीं होंगे. इसमें होटल, रेजिडेंशियल स्पेस, सर्विस अपार्टमेंट्स और दूसरी सुविधाएं भी प्रस्तावित हैं.इसकी सबसे खास सुविधाओं में दुनिया के सबसे ऊंचे ऑब्जर्वेशन डेक में से एक शामिल होगा, जो करीब 630 से 638 मीटर की ऊंचाई पर होगा. इसके अलावा टावर के ऊपरी हिस्से में हेलीपैड की भी योजना है।  200 कमरों का लग्जरी होटल भी जेद्दा टावर को सिर्फ एक ऊंची इमारत के तौर पर नहीं बनाया जा रहा. इसमें करीब 200 कमरों वाला लग्जरी होटल भी प्रस्तावित है.इसके अलावा यहां प्राइवेट रेजिडेंस और सर्विस अपार्टमेंट्स होंगे. इमारत जितनी ऊपर जाएगी, वहां के कुछ रेजिडेंशियल स्पेस उतने ही खास और महंगे होने की उम्मीद है।  सात साल तक क्यों थम गया था काम? इस प्रोजेक्ट की कहानी सिर्फ इंजीनियरिंग की नहीं है. इसका निर्माण 2013 में शुरू हुआ था, लेकिन कुछ सालों बाद काम रुक गया.2018 के बाद जेद्दा टावर का निर्माण लंबे समय तक ठप रहा. इसके पीछे प्रोजेक्ट से जुड़ी वित्तीय और राजनीतिक परिस्थितियां अहम वजहों में शामिल थीं।  करीब सात साल तक रुके रहने के बाद जनवरी 2025 में निर्माण दोबारा शुरू हुआ. इसके बाद प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए 2 अरब डॉलर से ज्यादा के नए कॉन्ट्रैक्ट की खबरें सामने आईं और साइट पर फिर से बड़े स्तर पर काम शुरू हुआ।  अब कब तक पूरा होगा? मौजूदा निर्माण प्रगति को देखते हुए जेद्दा टावर के 2028 के आसपास पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है.अगर प्रोजेक्ट योजना के मुताबिक पूरा हुआ, तो उस वक्त दुनिया की सबसे ऊंची इमारत का रिकॉर्ड एक बार फिर बदल जाएगा. 828 मीटर की बुर्ज खलीफा नंबर-1 से नंबर-2 पर आ जाएगी. जेद्दा टावर कम से कम 1000 मीटर की ऊंचाई के साथ दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बन जाएगी।  फिलहाल 109 मंजिलों तक पहुंच चुका इसका ढांचा उस भविष्य की झलक दे रहा है, जब पहली बार किसी इमारत की ऊंचाई एक पूरे किलोमीटर के पार होगी। 

‘शादी के बाद सहमति की जरूरत नहीं?’ 12 साल पुरानी याचिका से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मैरिटल रेप का मुद्दा

नई दिल्ली करीब 12 साल पहले एक शादीशुदा महिला अदालत पहुंची. उसका आरोप था कि उसका पति उसकी इच्छा के खिलाफ बार-बार शारीरिक संबंध बनाता है. लेकिन जब उसने न्याय की मांग की तो उसके सामने एक कानूनी दीवार खड़ी हो गई. कानून कह रहा था कि अगर ऐसा काम पति ने अपनी पत्नी के साथ किया है, तो उसे बलात्कार (Rape) नहीं माना जाएगा. यहीं से शुरू हुई बहस दिल्ली हाईकोर्ट से होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है. सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की नई तारीख तय करने से फिलहाल इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि पहले केंद्र सरकार का पक्ष रिकॉर्ड पर आने दें. लेकिन कोर्ट की अगली तारीख आने से पहले बड़ा सवाल यह है कि आखिर Marital Rape पर बहस खत्म क्यों नहीं हो रही? क्यों यह मुद्दा हर कुछ साल बाद फिर देश के सामने खड़ा हो जाता है?  दिल्ली हाईकोर्ट के जजों का फैसला भी बंटा था इन सवालों का जवाब जानने से पहले एक चौंकाने वाला तथ्य समझिए भारत में अगर कोई पुरुष किसी महिला की इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाता है, तो यह बलात्कार हो सकता है. लेकिन यदि वही महिला उसकी पत्नी है, तो भारतीय कानून में लंबे समय से एक अपवाद (Exception) मौजूद रहा है. यही "Marital Rape Exception" है, जिस पर पूरी लड़ाई टिकी हुई है. याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि "अगर सहमति ही रेप और सेक्स के बीच का फर्क है, तो शादी के बाद सहमति की अहमियत कैसे खत्म हो सकती है?" इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में जज भी एक राय नहीं बना पाए.  मार्च 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर विभाजित फैसला दिया. एक जज ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार अपवाद संविधान के खिलाफ है. लेकिन दूसरे जज इससे सहमत नहीं थे।  जाहिर है कि अदालत के भीतर भी मतभेद था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. यहीं से साफ हो गया कि यह केवल कानून का मसला नहीं, बल्कि समाज और संविधान के बीच टकरा रहे दो विचारों का सवाल है. जो Marital Rape को अपराध बनाने की मांग कर रहे हैं, वे क्या कहते हैं? पक्ष में लोग ये तर्क देते हैं     शादी किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता खत्म नहीं करती.     संविधान सभी महिलाओं को समान सुरक्षा देता है.     सहमति (Consent) हर रिश्ते में जरूरी है.     पत्नी को कानून में कम सुरक्षा देना समानता के अधिकार के खिलाफ है. और विरोध करने वाले क्या कहते हैं?     दूसरा पक्ष कई चिंताएं उठाता है:     विवाह संस्था पर असर पड़ सकता है.     झूठे मामलों की आशंका बढ़ सकती है.     पति-पत्नी के निजी विवाद आपराधिक मुकदमों में बदल सकते हैं. 29 फीसदी महिलाएं हुई हैं शिकार भारत में Marital Rape के अलग अपराध का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, इसलिए NCRB के पास इसका सीधा डेटा मौजूद नहीं है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि शादीशुदा महिलाओं के खिलाफ यौन या शारीरिक हिंसा का कोई अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) की रिपोर्ट बताती है कि 18 से 49 वर्ष की आयु की करीब 29 फीसदी विवाहित महिलाओं ने अपने जीवन में कभी न कभी पति द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेलने की बात कही. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिन महिलाओं ने यौन हिंसा की शिकायत की, उनमें अधिकांश मामलों में आरोपी कोई अजनबी नहीं बल्कि उनका अपना पति था. यही आंकड़े बताते हैं कि Marital Rape पर बहस अचानक पैदा नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे वर्षों से मौजूद एक सामाजिक वास्तविकता है, जिस पर अब कानूनी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।  दूसरी तरफ कानून की किताब में ऐसे मामलों को अलग अपराध की श्रेणी नहीं मिली हुई है. यही विरोधाभास इस पूरी बहस का केंद्र है. सुप्रीम कोर्ट के सामने भी मूल प्रश्न यही है कि अगर किसी महिला की सहमति के बिना सेक्स अपराध हो सकता है, तो क्या विवाह उस सहमति को स्थायी रूप से मान लेने का आधार बन सकता है? घर की चारदीवारी के भीतर भी होती है हिंसा अगर NCRB के व्यापक आंकड़ों को देखें तो भी एक तस्वीर सामने आती है. महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में हर साल सबसे बड़ी हिस्सेदारी 'पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता' (IPC 498A) से जुड़े मामलों की रहती है।  दूसरे शब्दों में कहें तो महिलाओं के लिए खतरा हमेशा सुनसान सड़क या किसी अजनबी से नहीं जुड़ा होता, कई बार वह उसी व्यक्ति से जुड़ा होता है जिसके साथ वह अपना जीवन साझा कर रही होती है।  यही वजह है कि Marital Rape की बहस केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं रह जाती. यह बहस उस बुनियादी प्रश्न में बदल जाती है कि भारतीय समाज विवाह को कैसे देखता है. यह भारतीय समाज की उस सोच से जुड़ा है जहां शादी को कभी अधिकार, कभी जिम्मेदारी और कभी पवित्र संस्था के रूप में देखा जाता है. लेकिन नई पीढ़ी एक अलग सवाल पूछ रही है कि "क्या किसी भी रिश्ते में, चाहे वह शादी ही क्यों न हो, सहमति से बड़ा कुछ हो सकता है?" शायद इसी सवाल का जवाब आने वाले वर्षों में भारत के कानून और समाज दोनों को तलाशना होगा। 

सब्जी-चाय वालों पर मंडराया QR बंद होने का खतरा! 15 सितंबर तक Re-KYC जरूरी, लाखों छोटे कारोबारी परेशान

नई दिल्ली भारत में डिजिटल पेमेंट अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. चाय की दुकान हो, सब्जी मंडी हो या गली-मोहल्ले की किराना दुकान, हर जगह QR कोड के जरिए भुगतान आम बात है. लेकिन अब एक ऐसी डेडलाइन सामने आई है, जिसने लाखों छोटे कारोबारियों और उनके ग्राहकों की चिंता बढ़ा दी है।  RBI के नियमों के तहत मर्चेंट्स के लिए री-केवाईसी (Re-KYC) प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है. उद्योग जगत का कहना है कि अगर बड़ी संख्या में छोटे कारोबारियों का सत्यापन तय समय तक पूरा नहीं हो पाया, तो उनके QR कोड आधारित भुगतान प्रभावित हो सकते हैं।  क्या है पूरा मामला? रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार मर्चेंट्स को समय-समय पर अपनी KYC जानकारी अपडेट करनी होती है. मौजूदा समयसीमा के तहत 15 सितंबर तक री-केवाईसी पूरी करना जरूरी है. पेमेंट एग्रीगेटर और फिनटेक कंपनियों का कहना है कि लाखों छोटे कारोबारियों का सत्यापन अभी बाकी है. इसी वजह से इंडस्ट्री ने RBI से समयसीमा बढ़ाने की मांग भी की है।  आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है? अगर किसी दुकानदार की री-केवाईसी समय पर पूरी नहीं होती और उसका QR कोड प्रभावित होता है, तो ग्राहकों को भुगतान में परेशानी हो सकती है. मान लीजिए आप सब्जी खरीदने पहुंचे और दुकानदार का QR कोड काम नहीं कर रहा. ऐसी स्थिति में UPI से भुगतान संभव नहीं होगा. तब आपको नकद भुगतान करना पड़ सकता है या फिर सीधे बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने जैसे विकल्प अपनाने पड़ सकते हैं. हालांकि इसका असर पूरे देश में एक जैसा नहीं होगा. एक्सपर्ट्स का मानना है कि छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वाले विक्रेताओं वाले इलाकों में परेशानी ज्यादा दिखाई दे सकती है।  कितने कारोबारी हो सकते हैं प्रभावित? इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक स्थिति चिंता बढ़ाने वाली हो सकती है. करीब 30 से 35 फीसदी छोटे और रेहड़ी-पटरी वाले विक्रेता इस डेडलाइन से प्रभावित हो सकते हैं. वहीं लगभग 10 लाख छोटे कारोबारियों को जोखिम के दायरे में माना जा रहा है. इंडस्ट्री का अनुमान है कि तय समय तक करीब 80 फीसदी वेरिफिकेशन ही पूरा हो पाएगा. यही वजह है कि पेमेंट कंपनियां RBI से अतिरिक्त समय देने की मांग कर रही हैं।  क्या रुक जाएगा डिजिटल पेमेंट सिस्टम? इस पूरे मामले को लेकर सबसे जरूरी बात है कि इससे देश का डिजिटल पेमेंट सिस्टम बंद नहीं होने वाला है. भारत में हर महीने अरबों UPI ट्रांजैक्शन होते हैं और बड़े कारोबारियों के भुगतान सिस्टम सामान्य रूप से चलते रहेंगे. चिंता मुख्य रूप से उन छोटे व्यापारियों को लेकर है, जिनका कारोबार QR कोड आधारित भुगतान पर काफी हद तक निर्भर है. अगर ऐसे कारोबारियों के QR कोड प्रभावित होते हैं, तो उनकी बिक्री और ग्राहकों की सुविधा दोनों पर असर पड़ सकता है।  क्या ग्राहकों को कैश रखना चाहिए? फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है. इंडस्ट्री लगातार समयसीमा बढ़ाने की मांग कर रही है और बाजार की नजर RBI के अगले कदम पर टिकी हुई है. हालांकि एहतियात के तौर पर अगर आप छोटे बाजारों, मंडियों या रेहड़ी-पटरी वाले इलाकों में खरीदारी करते हैं, तो कुछ नकद राशि साथ रखना उपयोगी हो सकता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि RBI 15 सितंबर की समयसीमा को बरकरार रखता है या फिर इंडस्ट्री को कुछ और राहत देता है. लाखों छोटे कारोबारियों की नजर फिलहाल इसी फैसले पर टिकी हुई है।