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टैक्स बम से गर्माया UK, कीर स्टार्मर पर आरोपों की बौछार; रीव्स के ‘झूठ’ पर बढ़ी हलचल

लंदन  ब्रिटेन में कीर स्टार्मर सरकार द्वारा पेश किए गए नए बजट ने देश की राजनीति को हिला कर रख दिया है। मीडिया और विपक्ष इस बजट को “Benefits Street Budget” कह रहे हैं  यानी ऐसा बजट जो कामकाजी लोगों पर भारी टैक्स बढ़ाकर वेलफेयर लाभों को बढ़ावा देता है। बढ़ते जन-रोष और राजनीतिक संकट के बीच प्रधानमंत्री को खुद सामने आकर डैमेज कंट्रोल करना पड़ा। क्यों मचा बवाल?      चांसलर रेचल रीव्स ने बजट में £30 बिलियन की टैक्स बढ़ोतरी की घोषणा की है। इसके कारण     लगभग 10 लाख ब्रिटिश नागरिक पहली बार 40% इनकम टैक्स स्लैब में आएंगे।     2030–31 तक हर चार में से एक कामगार हाई टैक्स रेट देगा।     वेलफेयर स्कीम्स पर खर्च बढ़ाया गया है।     “टू-चाइल्ड बेनिफिट कैप” हटने से लाभार्थियों की संख्या और फंडिंग दोनों बढ़ेंगे।     विपक्ष और टैक्सपेयर्स समूहों का आरोप है कि यह बजट मेहनतकश और टैक्स देने वाले मध्यम वर्ग पर सीधा हमला ।     सबसे बड़ा आरोप- क्या सरकार ने वित्तीय आंकड़े छुपाए?  बजट के बाद एक बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब सामने आया कि OBR (Office for Budget Responsibility) ने सरकार को बताया था कि देश के फाइनेंसेज़ में घाटा नहीं, बल्कि £4.2 बिलियन का सरप्लस था। इसके बावजूद बजट में टैक्स बढ़ोतरी को “आर्थिक गड्ढे” का हवाला देकर सही ठहराया गया। विपक्ष इसे “झूठ बोलकर जनता को गुमराह करने” का मामला बता रहा है। इसी कारण इसे “Reeves Lie Scandal” कहा जा रहा है। रीव्स और पीएम कीर का पलटवार  लगातार तीखे सवालों और आलोचनाओं के बीच रीव्स ने इंटरव्यू में कहा:“पिछले 16 महीनों में कई लोगों ने मुझे ख़त्म समझा।लेकिन आप मेरी राजनीतिक obituary आज नहीं लिखने वाले।”उन्होंने कहा कि टैक्स बढ़ोतरी “ज़रूरी और न्यायसंगत” है और वे किसी भी वादाखिलाफी को स्वीकार नहीं करतीं। तेज़ी से फैल रहे जनाक्रोश और राजनीतिक तूफान के बीच पीएम कीर स्टार्मर ने जनता और मीडिया को शांत करने के लिए बयान जारी किया और बताया कि वेलफेयर सिस्टम में सुधार लाए जाएंगे। उन्होंने युवा बेरोज़गारी और वर्क-इंसेंटिव को संबोधित करने का वादा किया और कहा कि आने वाले भाषण में बड़े आर्थिक सुधारों की घोषणा होगी।  साथ ही, सरकार की आलोचना करने वालों का कहना है कि यह बजट कामकाजी वर्ग को और कमजोर करेगा, आर्थिक असमानता बढ़ाएगा, सरकार की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल उठा रहा है। “Benefits Street Budget” ने ब्रिटेन की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में गहरी हलचल पैदा कर दी है।टैक्स बढ़ोतरी, वेलफेयर विस्तार, और वित्तीय जानकारी छुपाने के आरोपों ने सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। विपक्ष का दावा है कि यह बजट “वर्कर्स पर टैक्स बम” है। सरकार इसे “न्यायसंगत और संवेदनशील” बता रही है।   

4 दिसंबर धर्मशाला प्रदर्शन: भाजपा बोले—कांग्रेस की गारंटियों का सच जनता के सामने लाएंगे

ऊना भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार के 3 वर्ष 11 दिसंबर को पूर्ण हो रहे हैं और मीडिया के माध्यम से यह जानकारी मिली है कि कांग्रेस पार्टी इस अवसर पर मंडी में जश्न मनाने की तैयारी कर रही है। डॉ. बिंदल ने कहा कि वास्तव में यह तीन साल “जश्न” के नहीं, बल्कि व्यवस्था पतन के तीन साल हैं। इन तीन वर्षों में हिमाचल प्रदेश की संपूर्ण व्यवस्थाएं तार-तार हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि यह कानून व्यवस्था के पतन के तीन साल हैं, जहां आए दिन लूट, चोरी, फिरौती, डकैती और गोलीकांड की घटनाएं आम हो गई हैं। ऊना के लोग इसके प्रत्यक्ष गवाह हैं, लेकिन यह समस्या केवल ऊना तक सीमित नहीं रही, बल्कि चंबा से सिरमौर और कांगड़ा से किन्नौर तक गोलीकांड और अपराध की घटनाएं आम बात बन गई हैं। यह सरकार कानून व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह विफल रही है। डॉ. बिंदल ने कहा कि यह भारी कर्ज के तीन साल हैं। प्रदेश सरकार ने भारीभरकम कर्ज तो लिया, लेकिन उस कर्ज को जनता के हित में लगाने में पूरी तरह असफल रही। यह सरकार बेरोजगारों के साथ किए गए भद्दे मजाक के तीन साल साबित हुई है। उन्होंने कहा कि नौकरियां देने के वादे तो किए गए, लेकिन डेढ़ लाख से अधिक सरकारी पदों को समाप्त कर दिया गया। यह बेरोजगार युवाओं के साथ घोर अन्याय है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि यह शिक्षा व्यवस्था के पतन के तीन साल हैं। आए दिन नए फरमान जारी किए जा रहे हैं। पहली से पांचवीं कक्षा तक अंग्रेजी माध्यम लागू कर दिया गया, जबकि शिक्षकों को इसकी न तो समुचित ट्रेनिंग दी गई और न ही आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए। बच्चे पांचवीं कक्षा में पहुंच जाते हैं और उन्हें बिना तैयारी के ऊँचे स्तर की अंग्रेजी पढ़ाई जाती है। हिमाचल प्रदेश शिक्षा बोर्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हुए हैं, जिसके कारण कुछ स्कूलों को सीबीएसई में बदल दिया गया और करीब 2000 स्कूल बंद कर दिए गए। अध्यापक व्यवस्था को भी पूरी तरह से छिन्न-भिन्न कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह स्वास्थ्य सेवाओं के पतन के तीन साल भी हैं। गरीब व्यक्ति पहले हिमकेयर और आयुष्मान भारत योजनाओं के माध्यम से इलाज करवा रहा था, लेकिन आज वह इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। हिमकेयर बंद, आयुष्मान बंद, अस्पतालों में दवाइयों की कमी और अव्यवस्थाएं चरम पर हैं। यह सरकार स्वास्थ्य सेवाएं देने में पूरी तरह विफल सिद्ध हुई है। डॉ. बिंदल ने आरोप लगाया कि यह भाई-भतीजावाद, मित्रों की सरकार और माफिया राज के तीन साल भी हैं। शासन-प्रशासन में पारदर्शिता समाप्त हो गई है और मित्रवाद हावी हो गया है। उन्होंने कहा कि मंडी, जहां आज भी हजारों लोग आपदा के जख्म झेल रहे हैं, अपने घरों की जगह स्कूलों, धर्मशालाओं और रिश्तेदारों के घरों में शरण लेने को मजबूर हैं, वहीं कांग्रेस सरकार वहां जश्न मनाने की तैयारी कर रही है। यह जश्न नहीं, बल्कि बर्बादी का उत्सव है। डॉ. बिंदल ने स्पष्ट किया कि इसी व्यवस्था पतन और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी 4 दिसंबर को धर्मशाला के जोरावर स्टेडियम में एक विशाल प्रदर्शन करने जा रही है। इस प्रदर्शन के माध्यम से सरकार को उसकी विफलताओं का आईना दिखाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह वही सरकार है जो झूठी गारंटियों के दम पर सत्ता में आई थी। 28 लाख बहनों को ₹1500 रुपये प्रतिमाह देने की गारंटी, 58 साल की उम्र तक पक्की नौकरी देने की बातें, पहली ही कैबिनेट में फैसले लेने के वादे – सब आज हवा-हवाई साबित हो चुके हैं। मित्र, रोगी मित्र, वन मित्र जैसे नामों पर युवाओं के साथ हजारों रुपये मानदेय में अन्याय किया गया है। डॉ. बिंदल ने कहा कि मुख्यमंत्री बार-बार भाजपा पर गुटबाजी का आरोप लगाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए तीन साल से भाजपा का नाम जप रही है। मुख्यमंत्री से आग्रह है कि यदि उन्हें वास्तव में लगता है कि भाजपा गुटों में बंटी है, तो वे कल ही चुनाव करा लें, जनता स्वयं बता देगी कि कांग्रेस कहां खड़ी है और भाजपा कहां। उन्होंने कहा कि सरकार का दायित्व है कि वह आपदा प्रबंधन, समय पर वेतन और पेंशन भुगतान, कानून-व्यवस्था की मजबूती, नशा कारोबार पर रोक और जनसुरक्षा को सुनिश्चित करे, लेकिन कांग्रेस सरकार इन सभी जिम्मेदारियों से भाग रही है। हिमाचल की जनता आज इस सरकार से पूरी तरह त्रस्त है। डॉ. बिंदल ने कहा कि ना भूतों ऐसी सरकार देखी गई और ना भविष्य में ऐसी सरकार देखने को मिलेगी। अंत में डॉ. बिंदल ने प्रदेश की जनता से 4 दिसंबर के विशाल प्रदर्शन में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर प्रदेश सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का आह्वान किया।

संदिग्ध डिवाइस मिलने पर हड़कंप, मौके पर पहुंची पुलिस और बम निरोधक दस्ता

सांबा  सांबा के दूर-दराज की ब्लाक सुंब के एक गांव में उपकरण मिलने से हड़कंप मच गया। जानकारी अनुसार पुलिस पोस्ट गोरन के चंढली गांव में स्थानीय लोगों ने एक उपकरण और गुब्बारा देखकर पुलिस को सुचित किया, जिसके बाद अलर्ट पुलिस ने तुरंत बम डिस्पोजल दस्ते को सुचित किया और उन्होंने उसे अपने कब्जे में ले लिया।  वहीं उपकरण पर लिखे शब्दों से लग रहा है कि वैसाला रेडियोसॉन्डे एक उपकरण है जिसे मौसम के डेटा को ऊपरी वायुमंडल से एकत्र करने के लिए उपयोग किया जाता है, जिसमें तापमान, आर्द्रता, दबाव और हवा की गति व दिशा शामिल हैं। यह उपकरण एक गुब्बारे से बंधा होता है और यह डेटा को रेडियो के माध्यम से जमीन पर भेजता है। 

भारत की ‘डिजिटल स्ट्राइक’! WhatsApp उपयोग पर नए नियम से ISI में हड़कंप, गुप्त बैठकें शुरू

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने साइबर नियमों को और सख्‍त बनाते हुए गाइडलाइन जारी की है. इसके तहत अब WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh जैसे लोकप्रिय ऐप बिना एक्टिव SIM कार्ड के काम नहीं कर सकेंगे. दूरसंचार विभाग (DoT) ने यह नियम Telecommunication Cybersecurity Amendment Rules, 2025 के तहत लागू किया है. इस दिशानिर्देश में जो नई बात सामने आई है, वो ये है कि लैपटॉप, डेस्‍कटॉप पर भी ‘व्हाट्सएप वेब’ या अन्‍य प्‍लेटफॉर्म का इस्‍तेमाल करने वाले यूजर्स को हर 6 घंटे में लॉग आउट करना होगा. इसके बाद क्यूआर कोड के जरिए ही लॉगिन हो सकेगा. सरकार की गाइडलाइन पर कंपनियों का कहना कि लगातार सिम जांच और 6 घंटे के भीतर एक बार लॉगआउट के नियम से यूजर्स की प्राइवेसी में बाधा आ सकती है और एक से ज्‍यादा डिवाइस पर इन ऐप्‍स के इस्‍तेमाल की सुविधा खत्‍म हो सकती है. हालांकि, दूरसंचार कंपनियों ने सरकार के इस कदम का समर्थन किया है. वहीं सूत्रों के अनुसार इस कदम से पड़ोसी देश पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसियों में हड़कंप मच गया है. यही वजह है कि, आनन फानन में पाक इंटेलिजेंस एजेंसी ISI ने इसका तोड़ निकालने एक सीक्रेट मीटिंग बुलाई है. सरकारी सर्कुलर में क्‍या कहा गया? दूरसंचार विभाग की ओर से जारी सर्कुलर में कहा गया है कि अगर मोबाइल या टैब में मूल सिम मौजूद न हो तो 90 दिनों के बाद इन ऐप्स का उपयोग नहीं कर पाएंगे. वेब आधारित प्लेटफॉर्म जैसे व्हाट्सएप, टेलीग्राम, सिग्नल, अराटाई, स्नैपचैट, शेयरचैट और ऐसे सभी अन्य प्लेटफॉर्म पर ये नियम लागू होंगे. यूजर्स के रजिस्‍ट्रेशन के समय उपयोग किया जाने वाला SIM यानी सब्सक्राइबर आइडेंटिटी मॉड्यूल सर्विसेज से जुड़ा होना चाहिए. इस मतलब ये हुआ कि मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की सर्विसेज सिम से जुड़ी हुई होंगी. यानी जब सिम यूजर्स के फोन में मौजूद होगी, तभी आप इन ऐप्स की सर्विसेज का उपयोग कर पाएंगे जैसे ही सिम बंद हो जाएगी, आप सर्विसेज उपयोग नहीं कर पाएंगे. सरकार यह कदम क्यों उठा रही है? DoT के मुताबिक, अभी ज्यादातर मैसेजिंग ऐप सिर्फ पहली बार इंस्टॉल करते समय मोबाइल नंबर को वेरिफाई करते हैं. उसके बाद ऐप SIM हटाने या बंद होने पर भी चलता रहता है. COAI (सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) ने कहा कि यह तरीका बड़ी सुरक्षा खामी पैदा करता है. इसका फायदा उठाकर साइबर अपराधी SIM बदलने या बंद करने के बाद भी ऐप का इस्तेमाल जारी रखते हैं. उनकी लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड या कैरियर डेटा ट्रेस नहीं हो पाता. इसके अलावा इस नए नियम से सीमा पार आतंकवाद पर भी नकेल कसने में मदद मिलेगी. क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स? कुछ साइबर एक्सपर्ट मानते हैं कि इससे धोखाधड़ी और स्पैम कम हो सकते हैं, क्योंकि यूजर, नंबर और डिवाइस की ट्रेसिंग आसान होगी. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि अपराधी आसानी से फर्जी या उधार लिए हुए दस्तावेजों पर नए SIM ले लेते हैं, इसलिए फायदा सीमित ही रहेगा. वहीं टेलीकॉम उद्योग का मानना है कि भारत में मोबाइल नंबर ही सबसे मजबूत डिजिटल पहचान है और इस नियम से साइबर सुरक्षा बेहतर हो सकती है. आम यूजर पर क्या असर? यह कदम करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की डिजिटल आदतों में बदलाव ला सकता है. कारण, अब यूजर लगातार कई दिनों तक WhatsApp Web खुले नहीं रख पाएंगे. हर 6 घंटे पर लॉगआउट होना पड़ेगा. वहीं अगर SIM बंद हो गया या SIM स्लॉट में नहीं है तो ऐप खुलेगा ही नहीं. इसके अलावा जिन यूजर्स के पास दो डिवाइस हैं, वे पहले की तरह स्वतंत्र रूप से ऐप नहीं चला पाएंगे.

नए नोट छपाई का ठेका चीन को—काठमांडू के फैसले से भारत-नेपाल सीमा विवाद फिर गरमाया

नेपाल  नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने चाइना बैंक नोट प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन को 50, 500 और 1,000 के नए नोट डिजाइन करने, छापने और सप्लाई करने का ठेका दिया है। एनआरबी के प्रवक्ता गुरु प्रसाद पौडेल ने कहा कि चीनी कंपनी को 9 महीने के भीतर नोट सौंपने होंगे। चीनी कंपनी डिजाइन तैयार करती है जिसकी मंजूरी के बाद छपाई होती है। यह कंपनी सबसे कम मूल्य की बोली के आधार पर चुनी गई है और पहले भी नेपाल के 5, 10, 100 और 500 रुपये के नोट छाप चुकी है।   चीनी कंपनी को 43 करोड़ के नेपाली रुपये के 1,000 के नोट डिजाइन और छपाई के लिए पत्र मिला था। 1 हजार के नए नोट पर नेपाल का राष्ट्रीय फूल रोडोडेंड्रॉन (लाली गुरांस) के 7 चित्र होंगे, जो देश के सात प्रांतों को दर्शाते हैं। इस पर वर्तमान गवर्नर प्रोफेसर डॉ. बिश्वनाथ पौडेल का साइन भी होगा। इसके चलते भारत के साथ नक्शा विवाद फिर से चर्चा में आ गया है। बीते गुरुवार को नेपाल के केंद्रीय बैंक ने नए राष्ट्रीय नक्शे वाले 100 रुपये के नोट जारी किए, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा क्षेत्र शामिल हैं। ये क्षेत्र महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं, जिन पर भारत दावा करता है। कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा पर विवाद नेपाल का दावा है कि ये इलाके 1816 के सुगौली संधि के तहत उसके क्षेत्र में आते हैं। ये विवादित क्षेत्र मई 2020 में केपी शर्मा ओली सरकार की ओर से नेपाल के राजनीतिक नक्शे में शामिल किए गए थे, जिसे बाद में संसद ने भी मंजूरी दी। उस समय भारत ने बदले नक्शे की कड़ी आलोचना की थी, इसे एकतरफा और अस्वीकार्य विस्तार बताया गया। दूसरी ओर, एनआरबी के अधिकारी कहते हैं कि नेपाल के 1 और 2 रुपये के सिक्के पिछले दो वर्षों से संशोधित नक्शे के साथ ढाले जा चुके हैं।

A320 फ्लीट में बड़ी दिक्कत: नई खामी सामने आते ही कई जेट्स ग्राउंडेड

नई दिल्ली  विमानन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी एयरबस (Airbus) ने सोमवार को बताया कि उसके कई A320-परिवार के विमानों के फ्यूज़लेज पैनल (Fuselage Panels) में एक औद्योगिक गुणवत्ता समस्या (Industrial Quality Issue) का पता चला है। उद्योग सूत्रों के अनुसार इस संदिग्ध उत्पादन दोष के कारण कंपनी के कुछ विमानों की डिलीवरी में देरी होने की आशंका है जिससे एयरबस के चुनौतीपूर्ण वार्षिक डिलीवरी लक्ष्यों को झटका लग सकता है। क्या है समस्या? सूत्रों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि यह समस्या कई दर्जन A320 परिवार के विमानों के फ्यूज़लेज पैनल को प्रभावित कर रही है। हालांकि इस बात के तत्काल कोई संकेत नहीं हैं कि यह समस्या उन विमानों तक पहुंची है जो पहले से ही सेवा में लगे हुए हैं। समस्या मुख्य रूप से नए निर्माणाधीन विमानों में पाई गई है। समस्या की जड़ या सटीक कारण का तुरंत पता नहीं चल सका है और एयरबस ने तत्काल इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। डिलीवरी लक्ष्यों पर दबाव यह तकनीकी समस्या ऐसे समय में सामने आई है जब एयरबस अपने वार्षिक डिलीवरी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जोर-शोर से प्रयास कर रहा है। नवंबर में आपूर्ति: उद्योग सूत्रों ने बताया कि विमान निर्माता कंपनी ने नवंबर में 72 विमानों की आपूर्ति की। कुल आपूर्ति: इससे इस वर्ष अब तक (नवंबर तक) कुल 657 विमानों की आपूर्ति हुई है। चुनौतीपूर्ण लक्ष्य: कंपनी का इस वर्ष का लक्ष्य लगभग 820 विमानों की आपूर्ति करना है। दिसंबर की चुनौती: इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एयरबस को अब दिसंबर के महीने में 160 से अधिक जेट विमानों का रिकॉर्ड बनाना होगा। रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती दिसंबर में 160 से अधिक जेट विमानों की डिलीवरी करना एयरबस के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। वर्ष के अंतिम महीने में अब तक का सबसे बड़ा डिलीवरी रिकॉर्ड 2019 में बनाया गया था जब कंपनी ने 138 विमानों की आपूर्ति की थी। उत्पादन दोष की यह नई समस्या एयरबस के लिए रिकॉर्ड डिलीवरी हासिल करने के प्रयासों में एक बड़ी बाधा बन सकती है।  

फांसी और 21 साल की कैद के बाद अब नई सजा—शेख हसीना पर कानूनी शिकंजा और कसा

ढाका  बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और अवामी लीग प्रमुख शेख हसीना को सोमवार को ढाका की एक विशेष अदालत से बड़ा कानूनी झटका लगा है। अदालत ने पुरबचल न्यू टाउन प्रोजेक्ट में प्लॉट आवंटन में अनियमितताओं से जुड़े बहुचर्चित जमीन घोटाला मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है। इससे पहले इस साल (2025) ही International Crimes Tribunal ने हसीना को “क्राइम्स एगेन्स्ट ह्यूमैनिटी” (2024 छात्र-आन्दोलन खूनखराबे) के लिए फांसी सुनाई थी। और इसके कुछ दिन बाद ही  ढाका कोर्ट  Special Judge Court-5   ने हाल ही में Sheikh Hasina को तीन भ्रष्टाचार-मामलों  में 21 साल की जेल की सजा सुनाई है।जमीन घोटाला मामले में   अदालत ने कुल तीन लोगों को दोषी करार ोदिया है । शेख हसीना (पूर्व प्रधानमंत्री), शेख रेहाना (हसीना की बहन),तुलिप रिजवाना सिद्दीक (शेख रेहाना की बेटी व ब्रिटिश सांसद)। ये तीनों राजुक (RAJUK) द्वारा किए गए प्लॉट आवंटन में कथित अनियमितताओं के मामले में दोषी पाए गए।  क्या है पूरा मामला?     यह मामला पुरबचल न्यू टाउन प्रोजेक्ट से संबंधित है, जो ढाका के पास राजुक द्वारा विकसित एक बड़ा आवासीय प्रोजेक्ट है।     आरोप था कि हसीना और उनके परिवार ने अपने प्रभाव का उपयोग करके इस हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट में प्लॉट अवैध तरीके से हासिल किए।     मामला कई सालों से जांच में था, और हाल ही में गवाही व दस्तावेजों की जांच पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुनाया।   अदालत का निर्णय ढाका की विशेष अदालत ने सोमवार को फैसला सुनाया  और तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया गया। अदालत ने कारावास की सजा सुनाई, जिसकी अवधि को लेकर आधिकारिक बयान विस्तृत रूप से सार्वजनिक होना बाकी है । हसीना पहले से ही कई कानूनी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। उनके खिलाफ विभिन्न आर्थिक और प्रशासनिक अनियमितताओं के मामले चल रहे हैं। अब एक और मामले में दोषी ठहराया जाना उनकी राजनीतिक और कानूनी स्थिति को कमजोर करता है। तुलिप सिद्दीक जो ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सांसद हैं का नाम इस फैसले में शामिल होने से यह मामला अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है। ब्रिटेन की राजनीति और मीडिया में भी इस पर चर्चा शुरू हो चुकी है। अवामी लीग के नेताओं ने इस फैसले को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताया है। उनका कहना है कि विपक्षी सरकार हसीना परिवार को “कमजोर करने” की कोशिश कर रही है।मामले के जानकारों के अनुसार  हसीना की कानूनी टीम उच्च अदालत में अपील दाखिल करेगी। अगर सजा बरकरार रहती है तो हसीना और उनका परिवार लंबे समय तक राजनीतिक संकट में रह सकता है।  

एनरॉन घोटाला: छल, साजिश और दिवालिएपन की कहानी जिसने बदला अमेरिकी कारोबार का चेहरा

नई दिल्ली  दिसंबर 2001 की शुरुआत में अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था को झटका देने वाली खबर दुनिया के सामने आई—एनरॉन, जिसे कभी “अमेरिका की सबसे इनोवेटिव कंपनी” कहा गया था, महज कुछ ही महीनों में ढह गई। यह पतन सिर्फ एक कंपनी का नहीं था, बल्कि उस कॉरपोरेट संस्कृति का था जो मुनाफे की चमक के पीछे छिपी हेराफेरी को सुनियोजित तरीके से छुपाती रही। ये कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे 1990 के दशक का हर्षद मेहता घोटाला, जिसने शेयर बाजार पर भी काफी असर डाला था। एनरॉन का मॉडल ऊर्जा व्यापार के नए दौर का प्रतीक माना गया था, लेकिन बाद में खुलासा हुआ कि कंपनी ने अपने घाटे और बढ़ते कर्ज को छुपाने के लिए जटिल अकाउंटिंग तकनीकों और संदिग्ध पार्टनरशिप कंपनियों का जाल बिछाया था। बैलेंस शीट में काल्पनिक मुनाफा दिखाया गया और निवेशकों को एक ऐसी तस्वीर पेश की गई जो असलियत से बिल्कुल उलट थी। जब व्हिसलब्लोअर्स और मीडिया की रिपोर्टों ने एनरॉन के झूठ का पर्दाफाश किया, तो कंपनी के शेयर कुछ ही हफ्तों में 90 डॉलर से गिरकर एक डॉलर से भी नीचे पहुंच गए। लाखों लोगों की जमा-पूंजी, पेंशन फंड और निवेश जमीन में समा गए। इस घोटाले ने अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित ऑडिट फर्म आर्थर एंडरसन को भी समाप्ति के कगार पर ला दिया, क्योंकि उस पर एनरॉन के अकाउंट्स को गलत तरीके से क्लीन-चिट देने का आरोप लगा। एनरॉन के पतन ने अमेरिकी प्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल उठने लगे कि क्या ऑडिट और रेगुलेटरी प्रक्रियाएं सिर्फ कागजी हैं? इसी घोटाले की वजह से बाद में अमेरिका में सरबेंस-ऑक्सले एक्ट आया जिसने कॉरपोरेट गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता और अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स को नई परिभाषा दी। एनरॉन ने दुनिया को यह सिखाया कि असीमित मुनाफे की लालसा और सिस्टम की खामियों का फायदा उठाने की प्रवृत्ति किस तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन सकती है। आज भी एनरॉन स्कैंडल आधुनिक कॉरपोरेट इतिहास का वह काला अध्याय है जिसने सरकारों, निवेशकों और कंपनियों को हमेशा के लिए सतर्क कर दिया। हालांकि कम्पनी 'वी आर बैक' कैम्पेन के जरिए फिर खुद को खड़ा करने में जुटी हुई है।

SC का बड़ा आदेश: डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी पर CBI जांच, बैंकों की संलिप्तता की होगी पड़ताल

नई दिल्ली  देश भर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बहुत सारे फ्रॉड हुए हैं। कभी दारोगा, कभी कमिश्नर तो कभी सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों के नाम पर डराकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट करने की धमकियां दी गई हैं और उससे बचाने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। ऐसे मामलों को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट सख्त हुआ है और उसने सीबीआई से ऐसे सारे मामलों की जांच करने का आदेश दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि एजेंसी देश भर में हुए डिजिटल फ्रॉड के केसों की जांच करे। यही नहीं अदालत ने एजेंसी को बैंकों की भूमिका की जांच करनी होगी। इसके लिए एजेंसी को फ्रीहैंड है।

क्या सेना के बराबर मिलेगा वेतन-पेंशन? HC के आदेश से असम राइफल्स के जवानों में उम्मीद

नई दिल्ली  असम राइफल्स में काम कर रहे जवानों के लिए राहत की खबर है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को आदेश देते हुए डेडलाइन थमाई है कि वह असम राइफल्स में काम कर रहे जवानों और भारतीय सेना में काम कर रहे जवानों के वेतन की बराबरी के मुद्दे पर तीन महीने के अंदर फैसला करे। असम राइफल्स एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए सोमवार को जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विमल कुमार यादव की डिवीजन बेंच ने दो टूक कहा कि केंद्र सरकार असम राइफल्स के जवानों के भारतीय सेना और केंद्रीय बलों के वेतन और पेंशन की बराबरी के मुद्दे पर तुरंत फैसला ले। पीठ ने ये भी कहा कि असम राइफल्स एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन (याचिकाकर्ता) केंद्र सरकार के सामने एक रिप्रेजेंटेशन देगी, जिसमें दोनों फोर्स के सैलरी और पेंशन बेनिफिट्स के बीच अंतर को हाईलाइट किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इस आवेदन पर तीन महीने के अंदर केंद्र सरकार को फैसला करना होगा। कोर्ट ने कहा कि जब तीसरे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू थीं, तब असम राइफल्स के जवानों को भारतीय सेना के जवानों के बराबर दर्जा दिया गया था। हालांकि, चौथे वेतन आयोग के साथ वेतन और पेंशन में अचानक बदलाव आ गया, जब पैरामिलिट्री फोर्स को इस बराबर दर्जे से बाहर कर दिया गया। सक्षम प्राधिकार के पास दें रिप्रेजेंटेशन बार एंड बेंच के मुताबिक, सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आदेश दिया, "पिटीशनर, तीसरे केंद्रीय वेतन आयोग तक असम राइफल्स और इंडियन आर्मी के बीच सैलरी और दूसरे भत्ते में बराबरी को हाईलाइट करते हुए, सक्षम प्राधिकारी को एक पूरी रिप्रेजेंटेशन देंगे, जो चौथे पे कमीशन के बाद कमज़ोर हो गई लगती है। इसके बाद संबंधित प्राधिकारी उस रिप्रेजेंटेशन के मिलने के तीन महीने के अंदर कानून के हिसाब से उस पर विचार करेंगे।" सबसे पुरानी पैरामिलिट्री फोर्स, 1835 में गठन हाई कोर्ट ने असम राइफल्स एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका पर यह फैसला सुनाया है। याचिका में सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि सैलरी और पेंशन के मामले में असम राइफल्स के सदस्यों के साथ इंडियन आर्मी जैसा ही बर्ताव किया जाए। बता दें कि असम राइफल्स भारत की सबसे पुरानी पैरामिलिट्री फोर्स है, जिसे असल में 1835 में (कछार लेवी के तौर पर) बनाया गया था। अब इसे बॉर्डर सिक्योरिटी, खासकर इंडिया-म्यांमार बॉर्डर, और नॉर्थईस्ट में इंटरनल सिक्योरिटी और काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई है। यह गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन आता है, जिसका मतलब है कि भर्ती, सैलरी, पेंशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी “सर्विस कंडीशंस” MHA द्वारा कंट्रोल की जाती हैं। हालांकि, फोर्स का ऑपरेशनल कंट्रोल, जैसे डिप्लॉयमेंट, पोस्टिंग, ट्रांसफर और ऑपरेशन के दौरान कमांड, इंडियन आर्मी या मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेंस (MoD) के पास होता है।