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CJI गवई की प्रतिक्रिया सामने आई, सुप्रीम कोर्ट में जूताकांड ने मचाई हलचल

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट में वकील राकेश किशोर ने सीजेआई बीआर गवई पर जूता उछाला, जिसके बाद हंगामा मच गया। अब इस मामले में सीजेआई गवई ने चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने ‘जूताकांड’ पर कहा है कि जो भी हुआ, उससे मैं बहुत स्तब्ध हूं। सीजेआई बीआर गवई ने जूते से हुए हमले पर कहा, ''सोमवार को जो हुआ, उससे मैं और मेरे विद्वान साथी बहुत स्तब्ध हैं, हमारे लिए यह एक भुला दिया गया अध्याय है।'' बेंच में शामिल जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, "इस पर मेरे अपने विचार हैं। वह भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं, यह मजाक की बात नहीं है। यह संस्था का अपमान है।" इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने अदालत कक्ष के भीतर भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई पर जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर को ‘गंभीर कदाचार’ का दोषी मानते हुए उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी। एक चौंकाने वाली घटना में किशोर (71) ने प्रधान न्यायाधीश की ओर जूता फेंकने का प्रयास किया और उन्हें चिल्लाकर यह कहते हुए सुना गया कि ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।’ पुलिस सूत्रों के अनुसार वह वकील पिछले महीने खजुराहो में विष्णु प्रतिमा को पुनर्स्थापित करने से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं सीजेआई की टिप्पणी से नाराज था। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कुमार का बार लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। एससीबीए ने कहा कि किशोर का ‘‘निंदनीय, अव्यवस्थित और असंयमित व्यवहार न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला’’ और ‘‘पेशेवर नैतिकता, शिष्टाचार और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा का गंभीर उल्लंघन’’ है। उसने कहा, ‘‘कार्यकारी समिति का मानना ​​है कि उक्त आचरण न्यायिक स्वतंत्रता, अदालती कार्यवाही की पवित्रता और बार तथा बेंच के बीच आपसी सम्मान और विश्वास के दीर्घकालिक संबंध पर सीधा हमला है।’’ सीजेआई को निशाना बनाते हुए की गई पोस्ट पर एफआईआर सीजेआई को निशाना बनाने वाली आपत्तिजनक और अवैध सोशल मीडिया सामग्री पर सख्ती करते हुए, पंजाब पुलिस ने बुधवार को राज्य के विभिन्न जिलों में मिली अनेक शिकायतों के आधार पर 100 से अधिक सोशल मीडिया खातों के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज की हैं। पंजाब पुलिस के प्रवक्ता ने बताया कि सीजेआई को निशाना बनाने से जुड़ीं सोशल मीडिया पोस्ट की जांच करने के बाद कानून के तहत प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं।  

शांति और जंग के बीच संतुलन: गाजा पर बढ़ा तनाव, पड़ोसी देश ने समुद्र में तैनात किए युद्धपोत

नई दिल्ली  दो साल से तबाही झेल रहे गाजा में शांति की उम्मीद जगी है। एक हफ्ते पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित 20 सूत्री प्लान के पहले चरण पर अब हमास ने भी अपनी हामी भर दी है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही ट्रंप के प्लान पर अपनी सहमति दे चुके हैं। इसके साथ ही गाजा पट्टी में अब हमले थमने और वहां शांति स्थापना की उम्मीदें बढ़ गई हैं। इसके साथ ही दोनों तरफ से बंधकों की रिहाई की आस भी जगी है लेकिन दुनिया में तीसरे मोर्चे पर एक नई जंग की आहट तेज हो गई है। दरअसल, सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि भारत के पड़ोसी देश चीन ने ताइवान के साथ बढ़ते तनाव के बीच यांग्त्जी नदी के मुहाने पर बड़ी संख्या में युद्धपोत तैनात कर दिए हैं। न्यूज वीक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों की तैनाती की यह एक दुर्लभ घटना है। इससे चीन और ताइवान के बीच जंग की आहट तेज हो गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह दोनों सेनाओं के बीच तनाव का उच्चतम स्तर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में चीनी युद्धपोतों की तैनाती ताइवान पर हमले का संकेत हो सकता है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) ने अपनी सैन्य शक्ति का लगातार इजाफा किया है। युद्धपोतों और पनडुब्बियों की संख्या के हिसाब से चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है, जिसके पास 370 से ज़्यादा युद्धपोत और पनडुब्बियाँ हैं। इनमें लैंडिंग डॉक जहाज, हेलीकॉप्टर वाहक और विशेष लैंडिंग बार्ज शामिल हैं। बार्ज के बारे में विश्लेषकों का कहना है कि ये ताइवान जलडमरूमध्य और समंदर पार कर ताइवान पर हमले कर सकते हैं। 25,000 टन का ट्रांसपोर्टेशन शिप तैनात 6 अक्टूबर, 2025 को ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में शंघाई के यांग्त्ज़ी नदी मुहाने में कई उभयचर जहाज़ खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह मुहाना प्रमुख समुद्री रसद केंद्र है। ओपन-सोर्स रक्षा विश्लेषक एमटी एंडरसन ने सैटेलाइट इमेजरी में टाइप 071 युझाओ-क्लास लैंडिंग प्लेटफ़ॉर्म डॉक (LPD) की पहचान की है। यह 25,000 टन का एक ट्रांसपोर्टेशन शिप है जो किसी उभयचर हमले के दौरान लैंडिंग क्राफ्ट, बख्तरबंद वाहनों और सैकड़ों सैनिकों को विवादित तट तक ले जाने में सक्षम है। चीन और ताइवान में अदावत पुरानी बता दें कि चीन ताइवान को अपना क्षेत्र बताता है और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग करने की बात कह चुका है। हाल के दिनों में चीनी सेना ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास और समंदर पार कर लगभग हर दिन ताइवान पर सैन्य विमानों की उड़ानें संचालित कर ताइवान पर हमलों का दबाव बढ़ा दिया है। ताइपे और वाशिंगटन चीन के इस कदम को अस्थिरता पैदा करने वाला कदम बताया है।  

गाजा में रुकी गोलियों की गूंज, इजरायल और हमास के बीच शांति की नई शुरुआत

गाजा  दुनिया को खुशखबरी मिल गई है. इजरायल और हमास के बीच शांति समझौता हो गया है. 2 साल से चली आ रही जंग का अब अंत हो गया है. इजरायल और हमास ने डोनाल्ड ट्रंप के पीस डील को स्वीकार कर एक गाजा में नई सुबह की शुरुआत की है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में इजरायल और हमास ने शांति समझौते के पहले चरण पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. खुद डोनाल्ड ट्रंप ने यह खुशखबरी पूरी दुनिया को दी है. सालों से चले आ रहे गाजा युद्ध के बीच यह समझौता एक अहम मोड़ है, जो दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में पहला कदम साबित हो सकता है. अब सवाल है कि इजरायल और हमास के बीच पहले चरण के समझौते में क्या-क्या होगा? दरअसल, अमेरिका ने ही हमास और इजरायल के बीच पीस डील का खाका तैयार किया है. इस समझौते के पहले चरण में मुख्य रूप से मानवीय पहलुओं पर फोकस किया गया है. इसमें बंधकों की रिहाई और इजरायली सेना के पीछे हटने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं. आइए जानते हैं कि इस फर्स्ट फेज में क्या-क्या होने वाला है और इसका क्या प्रभाव पड़ेगा. पीस डील के फर्स्ट फेज में क्या-क्या? सबसे पहले समझौते के तहत सभी बंधकों को रिहा किया जाएगा. हमास के पास मौजूद इजरायली बंधकों को तत्काल मुक्त किया जाएगा. अनुमान है कि करीब 100 से अधिक बंधक इस प्रक्रिया में शामिल हैं, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी हैं. हालांकि, समाचार एजेंसी एपी ने दावा किया है कि हमास इस वीकेंड तक सभी 20 जीवित बंधकों को रिहा कर देगा. वहीं, इजरायल गाजा के अधिकांश हिस्से से वापस लौट जाएगा. बंधकों को सुरक्षित रूप से उनके परिवारों तक पहुंचाने के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी. इसमें मेडिकल चेकअप और मनोवैज्ञानिक सहायता भी शामिल होगी.     उधर इजरायल भी अपनी जेलों से फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा करेगा. हालांकि, अभी इसकी संख्या सार्वजनिक नहीं की गई है. अब चूंकि डील हो गई है, इसलिए यह रिहाई प्रक्रिया 72 घंटे के भीतर पूरी करनी होगी, जो शांति वार्ता की सफलता की पहली परीक्षा होगी.     दूसरा अहम पहलू इजरायली सेना का निर्धारित क्षेत्रों तक पीछे हटना है. समझौते के पहले चरण के मुताबिक, इजरायली फौज गाजा पट्टी के कुछ हिस्सों से हटेगी. खासकर उन क्षेत्रों से जहां हाल के महीनों में तीव्र संघर्ष देखा गया है. सेना के पीछे हटने की सीमा पूर्व-निर्धारित बफर जोन तक होगी, जो गाजा की सीमाओं पर स्थित हैं. इस प्रक्रिया में सेना की टुकड़ियां अपनी पोजीशन से पीछे हटेंगी, मगर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति सेना की तैनाती की जा सकती है.     इतना ही नहीं, फर्स्ट फेज में गाजा में पानी, बिजली और चिकित्सा आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने पर जोर दिया जाएगा. ट्रंप ने वादा किया है कि सेना के पीछे हटाव के बाद गाजा में निर्माण कार्यों को अनुमति दी जाएगी, जो युद्ध से तबाह हुए इलाकों के पुनर्निर्माण में सहायक होगा.     इस फर्स्ट फेज का मकसद तत्काल संघर्ष विराम सुनिश्चित करना है. हमास और इजरायल ने अगले 30 दिनों के भीतर इस पहले चरण को पूरा करने का लक्ष्य रखा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पूरा बयान     मुझे यह बताते हुए बहुत गर्व है कि इजरायल और हमास दोनों ने हमारे शांति समझौते के पहले चरण पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसका मतलब है कि सारे बंधक बहुत जल्द रिहा किए जाएंगे और इजरायल अपनी फौजों को तय की गई सीमा तक पीछे हटा लेगा. यह एक मजबूत, स्थायी और लंबे समय तक रहने वाली शांति की दिशा में पहला कदम है. सभी पक्षों के साथ इंसाफ से बर्ताव किया जाएगा. यह अरब और मुस्लिम दुनिया, इजरायल, आस-पास के सभी देशों और अमेरिका के लिए एक ऐतिहासिक और खुशियों भरा दिन है. हम कतर, मिस्र और तुर्की के उन मध्यस्थों का शुक्रिया अदा करते हैं, जिन्होंने हमारे साथ मिलकर इस ऐतिहासिक और अनोखे समझौते को संभव बनाया. शांति दूत धन्य हैं.

नोबेल पुरस्कार की दौड़ में कमजोर पड़े ट्रंप, आत्मविश्वास में भी दिखी कमी

नई दिल्ली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नोबेल पुरस्कार जीतने की कोशिश में जुटे हुए हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इस साल ट्रंप की इच्छा पूरे होने के आसार कम हैं। खुद ट्रंप भी कह रहे हैं कि नोबेल कमेटी उनके बजाए किसी और को पुरस्कार देने की वजह खोज लेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति दावा कर रहे हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान समेत 7 युद्ध रुकवाए हैं। एएफपी से बातचीत में स्वीडन के प्रोफेसर पीटर वालेनस्टीन ने कहा, 'नहीं, ट्रंप इस साल नहीं जीतेंगे।' उन्होंने कहा, 'लेकिन शायद अगले साल? तब तक गाजा संकट समेत उनकी कई पहलों पर स्थिति साफ हो चुकी होगी।' कौन जीत सकता है पुरस्कार खबर है कि इस साल 338 लोग और संगठन नॉमिनेशन प्रक्रिया में हैं, लेकिन यह सूची गुप्त रखी जाती है। नॉमिनेट करने वालों में सांसद, सरकारी अधिकारी, पूर्व विजेता और कमेटी के सदस्य शामिल होते हैं। साल 2024 में यह पुरस्कार जापान के एटम बम पीड़ितों से जुड़े निहोन हिदान्यको को मिला था। साफ नहीं है कि 2025 की रेस में कौन-कौन है। माना जा रहा है कि सुडान के इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम, रूस के विपक्षी नेता एलेक्सी नवेलनी की विधवा यूलिया नवलनाया और चुनावी गतिविधियों पर नजर रखने वाले ऑफिस फॉर डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन्स एंड ह्यूमन राइट्स का नाम दौड़ में शामिल हो सकता है। इनके अलावा संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस, UNRWA के नाम पर मुहर लग सकती है। संभावनाएं जताई जा रही हैं कि इस बार नोबेल कमेटी अपने चुनाव से सभी को चौंका सकती है। भारतीय समयानुसार शुक्रवार दोपहर करीब 2 बजकर 30 मिनट पर पुरस्कार की घोषणा की जा सकती है। खुद ट्रंप क्या बोले नोबेल से जुड़े सवाल पर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा, 'मुझे कोई आइडिया नहीं है…। मार्को आपको बताएंगे कि हमने 7 युद्ध समाप्त किए हैं। हम 8वां समाप्त करने के करीब हैं। मुझे लगता है कि हम रूसी स्थिति को भी खत्म कर लेंगे…। मुझे नहीं लगता कि इतिहास में किसी ने कभी इतने युद्ध खत्म कराए होंगे। लेकिन वो शायद पुरस्कार मुझे नहीं देने की कोई वजह खोज लेंगे।'

CJI गवई पर जूता फेंकने वाले की सराहना कर विवादों में फंसे पूर्व कमिश्नर

बेंगलुरु  बेंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त और भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता भास्कर राव ने CJI यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की ओर जूता उछालने वाले अधिवक्ता राकेश किशोर की प्रशंसा की है। हालांकि, आलोचना होने के बाद राव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के लिए माफी मांग ली। किशोर के खिलाफ बेंगलुरु में एफआईआर दर्ज हुई है। राव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर  एक पोस्ट में कहा था, 'भले ही यह कानूनी रूप से बहुत गलत हो, लेकिन मैं इस उम्र में भी आपके साहस की प्रशंसा करता हूं कि आपने परिणामों की परवाह किए बिना एक रुख अपनाया और उस पर कायम रहे।' राव के इस पोस्ट पर कई ‘एक्स’ उपयोगकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। नितिन शेषाद्रि ने हैरानी जताते हुए कहा, 'मान्यवर, मुझे आपसे इसकी उम्मीद नहीं थी। क्या यह नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के मुकदमों में उनके बचाव में इस्तेमाल की गई भाषा जैसी नहीं थी?' एक अन्य उपयोगकर्ता ने बेंगलुरु पुलिस को टैग करते हुए लिखा, 'आपको इस पोस्ट पर कार्रवाई करनी चाहिए!' राव ने बाद में बुधवार को एक पोस्ट कर अपनी राय के लिए माफी मांगी। भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा, 'मेरी प्रतिक्रिया हैरानी और सदमे से भरी थी कि एक व्यक्ति इतना शिक्षित, वृद्ध और अनुभवी होने के बावजूद एक भयानक और कानूनी रूप से गलत कार्य के परिणामों को पूरी तरह से जानते हुए यह कृत्य कर रहा है। मैंने न तो उच्चतम न्यायालय, न ही प्रधान न्यायाधीश या किसी समुदाय का अपमान किया है। अगर मेरे पोस्ट से किसी को गुस्सा आया है या ठेस पहुंची है, तो मुझे खेद है।' राव ने चामराजपेट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन बी जेड जमीर अहमद खान से हार गए थे। खान मौजूदा कर्नाटक सरकार में आवास मंत्री हैं। सोमवार को अदालती कार्यवाही के दौरान 71-वर्षीय वकील ने कथित तौर पर शिष्टाचार का उल्लंघन करते हुए प्रधान न्यायाधीश गवई की ओर जूता उछालने की कोशिश की।

भारत-अर्कटिक कनेक्शन: पुतिन की पहल से चीन को टक्कर, बर्फीले मार्ग की अहमियत

मॉस्को/ नईदिल्ली  वैश्विक भू-राजनीति के बदलते परिदृश्य में, रूस और भारत के बीच सदियों पुरानी दोस्ती एक बार फिर नई ऊंचाइयों को छूने वाली है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दिसंबर में प्रस्तावित भारत यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करेगी, बल्कि आर्कटिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक समझौते की नींव भी रखेगी। यह समझौता नॉर्दर्न सी रूट (NSR) और संसाधन विकास पर केंद्रित होगा जो भारत को आर्कटिक परिषद में बड़ी भूमिका दिलाने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह कदम न केवल आर्थिक अवसरों के द्वार खोलेगा, बल्कि चीन की बढ़ती आर्कटिक महत्वाकांक्षाओं के बीच रूस के लिए एक रणनीतिक संतुलन भी साबित होगा। पारंपरिक दक्षिणी समुद्री मार्गों की तुलना में छोटा यह मार्ग ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली की नॉर्दर्न सी रूट के विकास में संभावित भागीदारी को लेकर बातचीत चल रही है और संभावना है कि इस साल होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन में इस दिशा में ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं। नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर गुजरता है और पारंपरिक दक्षिणी समुद्री मार्गों की तुलना में करीब 40% छोटा है। इस मार्ग से यूरोप और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बीच तेज, सुरक्षित और किफायती कार्गो परिवहन संभव हो सकेगा। जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आर्कटिक शिपिंग में सहयोग की संभावनाओं को लेकर एक संयुक्त कार्य समूह बनाने पर सहमति जताई थी। यह समूह रूस के विशेष आर्कटिक विकास प्रतिनिधि व्लादिमीर पानोव (Rosatom) और भारत के नौवहन मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा की संयुक्त अध्यक्षता में काम कर रहा है। इस कार्य समूह की पहली बैठक अक्टूबर 2024 में नई दिल्ली में हुई, जिसमें आर्कटिक जहाज निर्माण परियोजनाओं में साझेदारी, भारतीय नाविकों को ध्रुवीय नौवहन प्रशिक्षण देने, और एनएसआर पर कार्गो शिपिंग सहयोग के लिए एक एमओयू तैयार करने पर चर्चा हुई। भारत को आर्कटिक काउंसिल में बड़ी भूमिका देना चाहता है रूस सूत्रों के अनुसार, रूस चाहता है कि भारत को आर्कटिक काउंसिल में अधिक प्रभावशाली भूमिका दी जाए। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि मॉस्को क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल को संतुलित करना चाहता है। आर्कटिक इलाका जीवाश्म ईंधन और महत्वपूर्ण खनिजों से समृद्ध है, जिससे रूस और भारत दोनों के लिए यह रणनीतिक रूप से अहम बनता है। इसके साथ ही रूस इस बात पर भी जोर दे रहा है कि नॉर्दर्न सी रूट को ईरान के चाबहार बंदरगाह से जोड़ा जाए। भारत ने इस बंदरगाह के संचालन की जिम्मेदारी अगले दस वर्षों के लिए हासिल की है। रूस इस बंदरगाह का इस्तेमाल भारतीय महासागर क्षेत्र तक पहुंच के लिए करना चाहता है। पुतिन के आगामी भारत दौरे से उम्मीद की जा रही है कि भारत-रूस आर्कटिक सहयोग में एक नया अध्याय शुरू होगा, जो न केवल आर्थिक दृष्टि से बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से भी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आर्कटिक: वैश्विक व्यापार का नया गेटवे आर्कटिक क्षेत्र पृथ्वी के सबसे ठंडे और संसाधन-समृद्ध इलाकों में से एक है। यह आज जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघल रहा है। इससे न केवल नए शिपिंग मार्ग खुल रहे हैं, बल्कि तेल, गैस, दुर्लभ खनिजों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच भी आसान हो रही है। रूस आर्कटिक महासागर के 53 प्रतिशत तट को नियंत्रित करता है। वह इस क्षेत्र में अपनी प्रभुता कायम रखने के लिए सक्रिय है। 2024 में NSR से 37 मिलियन टन से अधिक माल ढोया गया, जो 2025 में और बढ़ने की उम्मीद है। भारत के लिए यह अवसर सुनहरा है। स्वेज कनाल या पनामा चैनल जैसे पारंपरिक मार्गों की तुलना में NSR एशिया और यूरोप के बीच यात्रा को 40 प्रतिशत छोटा कर देता है। इससे न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि व्यापारिक लागत भी घटेगी। रूसी स्रोतों के अनुसार, पुतिन की यात्रा के दौरान NSR के उपयोग पर ठोस कार्रवाई की योजना बनेगी। इसमें भारत को रूसी आइसब्रेकर बेड़े (जिसमें 40 आइसब्रेकर और 8 न्यूक्लियर-संचालित जहाज शामिल हैं) का सहयोग मिलेगा। यह कदम चीन की 'पोलर सिल्क रोड' महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला करने के लिए रूस की रणनीति का हिस्सा है। आर्कटिक में चीन की बढ़ती उपस्थिति रूस के लिए चुनौती बनी हुई है, और भारत का प्रवेश एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में काम करेगा। भारत-रूस संबंध: इतिहास से वर्तमान तक भारत और रूस के बीच संबंध सोवियत काल से ही विशेष रहे हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में सोवियत संघ का समर्थन हो या आज रूस का S-400 मिसाइल सिस्टम, दोनों देशों की साझेदारी रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में अटूट रही है। 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 63 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें रूसी तेल भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना। यूक्रेन संघर्ष के बावजूद, भारत ने रूसी ऊर्जा पर निर्भरता बनाए रखी, जिसकी आलोचना अमेरिका ने की। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में वलदाई चर्चा क्लब में कहा, "भारत हमारे ऊर्जा वाहकों को अस्वीकार करे तो उसे 9-10 अरब डॉलर का नुकसान होगा। हमारी साझेदारी मजबूत है।" पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "प्रिय मित्र" और "बुद्धिमान नेता" कहा, जो देश की भलाई के बारे में सोचते हैं।

ट्रंप का दांव उलटा पड़ा, अमेरिकी जनता भुगत रही टैरिफ का खामियाजा

वाशिंगटन डोनाल्ड ट्रंप ने किसी देश पर 25%, तो भारत और ब्राजील जैसे देशों पर 50%  का हाई टैरिफ लगाया है, लेकिन उनका ये कदम खुद अमेरिका के लिए ही परेशानी का सबब बनता जा रहा है. दुनियाभर के तमाम दिग्गज इकोनॉमिस्ट ने इसकी आलोचना की है. अब IMF की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ भी इसमें शामिल हो गई हैं. उन्होंने कहा है कि US Tariff के छह महीने के बाद भी इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला है और अमेरिका में जो राजस्व बढ़ा है, वो खुद अमेरिकी जनता और यहां की कंपनियों से ही लिया गया है.  अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर निगेटिव असर ट्रंप टैरिफ के चलते दुनिया में ट्रेड वॉर जैसी स्थिति बनी है. फिर बात चाहे चीन के साथ व्यापार युद्ध की हो, या फिर ब्राजील जैसे देशों की. भारत के बारे में देखें, तो ट्रंप ने पहले 25% टैरिफ का ऐलान किया और फिर रूसी तेल खरीद को मुद्दा बनाते हुए इसे दोगुना करते हुए 50% कर दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के तमाम देशों पर टैरिफ लगाकर आखिर अमेरिका को क्या हासिल हुआ? तो इसे लेकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ ने बड़ा दावा किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए कहा कि इसका निगेटिव असर खुद US Economy पर ही हुआ है.  US के ग्राहकों-कंपनियों पर बढ़ा बोझ गीता गोपीनाथ ने अपनी एक्स पोस्ट में कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ का ऐलान किए छह महीने से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन इसका कोई खास नतीजा नहीं निकल सका है. उन्होंने लिखा, 'अमेरिका के टैरिफ से क्या हासिल हुआ? क्या सरकार के लिए राजस्व बढ़ा? हां, काफी बढ़ा, लेकिन यह पैसा करीब-करीब पूरी तरह से अमेरिकी कंपनियों से ही वसूला गया और कुछ हद तक इसकी भरपाई अमेरिकी उपभोक्ताओं से की गई. कुल मिलकार ट्रंप का टैरिफ इनके लिए एक टैक्स जैसा ही साबित हुआ.  टैरिफ से सुधार के कोई संकेत नहीं IMF की पूर्व चीफ इकोनॉमिस्ट गीता गोपीनाथ ने टैरिफ की आलोचना करते हुए कहा कि ये सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए निगेटिव स्कोरकार्ड रहा है. भारत और ब्राजील से आयात पर 50% तक, और कुछ भारतीय दवाओं पर तो 100% तक टैरिफ घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और व्यापार संतुलन में सुधार लाने के लिए थे. लेकिन इसका अमेरिका को बहुत कम या कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ है. उन्होंने लिखा कि न तो व्यापार संतुलन में सुधार और न ही अमेरिका विनिर्माण क्षेत्र में इसके पॉजिटिव असर का कोई संकेत मिला है.  उल्टा महंगाई में कर दिया इजाफा  गीता गोपीनाथ ने टैरिफ के चलते अमेरिका में महंगाई दर को लेकर कहा कि इसके लागू होने के बाद से देश में महंगाई में थोड़ा इजाफा देखने को मिला है. खासतौर पर घरेलू उपकरणों, फर्नीचर, कॉफी जैसी चीजों के दाम में बढ़ोतरी देखने को मिली है. गोपीनाथ ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम एक्सपर्ट्स ने भी अपने-अपने तरीके से ट्रंप के टैरिफ की आलोचना की है और इसे खुद अमेरिका के लिए खराब करार दिया है. 

शुक्र ग्रह पर भरे एसिड के बीच भारतवंशी शोधकर्ताओं को मिली पानी की प्रचुरता

नई दिल्ली शुक्र ग्रह के बादल हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं. क्या वहां जीवन हो सकता है? ये सवाल सालों से चर्चा में है. अब अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम ने 50 साल पुराने डेटा को दोबारा जांचा है. नतीजा चौंकाने वाला है – शुक्र के बादल ज्यादातर पानी से बने हैं.  ये पानी साफ-सुथरे बूंदों के रूप में नहीं, बल्कि हाइड्रेटेड सामग्री (जिसमें पानी बंधा हुआ हो) के रूप में मौजूद है. पुरानी सोच थी कि बादल ज्यादातर सल्फ्यूरिक एसिड से बने हैं, लेकिन अब पता चला है कि पानी का हिस्सा 62 प्रतिशत है. ये खोज नासा के पायनियर मिशन के पुराने आंकड़ों से आई है.  शुक्र के बादल: पृथ्वी जैसे हालात, लेकिन रहस्यमयी शुक्र सूर्य का सबसे करीब ग्रह है. इसका वातावरण बहुत गर्म और जहरीला है. सतह पर तापमान 460 डिग्री सेल्सियस तक जाता है. लेकिन उसके ऊपरी बादलों की परतें? वहां दबाव और तापमान पृथ्वी जैसे हैं – करीब 50 डिग्री सेल्सियस और सामान्य हवा का दबाव. इसलिए वैज्ञानिक सोचते हैं कि कहीं वहां सूक्ष्म जीवन (माइक्रोब्स) हो सकता है. लेकिन समस्या ये थी कि हम मानते थे बादल सल्फ्यूरिक एसिड (एक तेजाब) से भरे हैं. ये एसिड इतना जहरीला है कि जीवन की कल्पना मुश्किल लगती थी. पानी की कमी भी बड़ी बाधा थी. अब ये नया अध्ययन कहता है कि पानी बहुत ज्यादा है – बस वो हाइड्रेटेड रूप में बंधा हुआ है. कैसे हुई दोबारा जांच? पुराने डेटा की खोज ये खोज कैलिफोर्निया पॉलिटेक्निक स्टेट यूनिवर्सिटी (कैल पॉली पॉमोना), विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी और नासा के वैज्ञानिकों ने की. आइडिया आया डॉ. राकेश मोगुल (कैल पॉली पॉमोना) और डॉ. संजय लिमाये (विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी) की बातचीत से. वे शुक्र के बादलों की रचना पर चर्चा कर रहे थे. उन्होंने सोचा कि 1978 के नासा पायनियर वीनस मिशन के डेटा को दोबारा देखना चाहिए. पायनियर वीनस मिशन में एक बड़ा प्रोब (साउंडर) शुक्र के वातावरण में उतरा था. उस पर दो उपकरण थे – न्यूट्रल मास स्पेक्ट्रोमीटर (LNMS) और गैस क्रोमैटोग्राफ (LGC)। ये गैसों को मापने के लिए बने थे. लेकिन डेटा नासा के आर्काइव में माइक्रोफिल्म पर दबा था. पहले इसे डिजिटाइज करना पड़ा. ये काम आसान नहीं था – जैसे पुरानी किताबों को स्कैन करना. डेटा में क्या छिपा था? उपकरणों की 'जाम' से राज खुला वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रोब जब बादलों वाली मोटी हवा में उतरा, तो उपकरणों के इनलेट (छेद) बादलों के कणों से जाम हो गए. इससे CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) का स्तर अचानक गिर गया. पहले इसे खराबी समझा गया, लेकिन अब इसे मौका माना गया.  प्रोब नीचे उतरता गया. गर्मी से जाम कण पिघले. अलग-अलग तापमान पर अलग-अलग गैसें निकलीं. इससे पता चला कि कण क्या बने हैं. मुख्य बातें…      पानी की भारी मौजूदगी: 185 डिग्री सेल्सियस और 414 डिग्री सेल्सियस पर पानी की बड़ी मात्रा निकली. ये हाइड्रेटेड फेरिक सल्फेट (लोहे का हाइड्रेटेड यौगिक) और हाइड्रेटेड मैग्नीशियम सल्फेट जैसे यौगिकों से आई. कुल कणों का 62 प्रतिशत पानी था – ज्यादातर बंधा हुआ.     सल्फ्यूरिक एसिड भी है: 215 डिग्री सेल्सियस पर SO2 (सल्फर डाइऑक्साइड) निकला, जो सल्फ्यूरिक एसिड के पिघलने से होता है. इसका हिस्सा 22 प्रतिशत.     एक और रहस्य: 397 डिग्री सेल्सियस पर फिर SO2 निकला, साथ ही लोहे के आयनों का स्पाइक. ये फेरिक सल्फेट (लोहे का सल्फेट) का संकेत है. इसका अनुमान 16 प्रतिशत. ये यौगिक ज्यादा गर्मी सहन करता है. लोहा कहां से आया? वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष की धूल (कॉस्मिक डस्ट) शुक्र के वातावरण में आती है. ये एसिड बादलों से रिएक्ट होकर फेरिक सल्फेट बनाती है. पुरानी भूल क्यों हुई? दूर से जांच vs करीब से जांच पहले दूरबीनों से स्पेक्ट्रोस्कोपी (रंगों से विश्लेषण) की जाती थी. ये सिर्फ हवा में घुला पानी दिखा सकती थी, न कि हाइड्रेटेड पानी. लेकिन प्रोब ने सीधे बादलों के कणों को मापा, इसलिए सही नतीजा मिला. ये रहस्य सुलझ गया. जीवन की संभावना पर क्या असर? नई उम्मीदें शुक्र के बादलों में जीवन का सबसे बड़ा तर्क पानी की कमी था. अब पता चला कि पानी बहुत है – 62 प्रतिशत. लेकिन ये तेजाबी पानी है, जो पृथ्वी के जीवों के लिए कठिन. एसिड-सहने वाले माइक्रोब्स (जैसे पृथ्वी के एसिड झीलों में) वहां जी सकते हैं. ये खोज एस्ट्रोबायोलॉजी (ग्रहों पर जीवन की खोज) को नई दिशा देगी.

दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर मंदी की आहट, विश्व बैंक रिपोर्ट में जताई गई चिंता

नई दिल्ली  इस वर्ष दक्षिण एशिया में 6.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर का अनुमान है, लेकिन एक गंभीर मंदी का खतरा मंडरा रहा है. विश्व बैंक ने अपने वार्षिक क्षेत्रीय दृष्टिकोण में कहा है कि व्यापार में खुलेपन और प्रौद्योगिकी अपनाने को बढ़ावा देने वाले सुधारों से इस क्षेत्र में रोजगार सृजन और विकास को गति मिल सकती है. नवीनतम दक्षिण एशिया विकास अद्यतन, नौकरियां, एआई और व्यापार, अनुमान लगाता है कि 2026 में इस क्षेत्र की वृद्धि दर धीमी होकर 5.8 प्रतिशत हो जाएगी. इस ग्रोथ में अप्रैल के पूर्वानुमान से 0.6 प्रतिशत अंकों की कमी है. नकारात्मक जोखिमों में वैश्विक आर्थिक मंदी और व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता, क्षेत्र में सामाजिक-राजनीतिक अशांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी उभरती प्रौद्योगिकी के कारण श्रम बाजार में व्यवधान शामिल हैं. भारत के मजबूत उपभोग वृद्धि, बेहतर कृषि उत्पादन और ग्रामीण मजदूरी वृद्धि के बल पर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने की उम्मीद है. हालांकि, वित्त वर्ष 2026/27 के पूर्वानुमान को आंशिक रूप से निर्यात पर उच्च शुल्कों के कारण घटा दिया गया है. दक्षिण एशिया पर अमेरिकी शुल्कों की घोषणा 2 अप्रैल को की गई थी, फिर विलंबित और समायोजित की गई, और अंततः अगस्त में लागू की गई. प्रकाशन की तिथि तक, ये अतिरिक्त शुल्क भारत पर 50 प्रतिशत हैं. कुछ श्रेणियों की वस्तुओं पर उत्पाद-विशिष्ट शुल्क लागू होते हैं, जो वर्तमान में आम तौर पर देश-विशिष्ट शुल्कों से कम होते हैं, लेकिन भविष्य में बढ़ सकते हैं. इन वस्तुओं में जेनेरिक फॉर्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं, जो दोनों ही भारत से अमेरिकी आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वर्ष की शुरुआत में शेयर बाजार के मूल्यांकन में संघर्ष हुआ, लेकिन हाल ही में इसमें तेजी आई है. दरों में कटौती और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच जून में भारत में शुद्ध विदेशी पोर्टफोलियो निवेश नकारात्मक हो गया. यह 7.8 प्रतिशत (वर्ष-दर-वर्ष) हो गया. मजबूत निजी उपभोग और निवेश से विकास को समर्थन मिला और उम्मीद से कम कीमतों से भी इसमें तेजी आई. सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, मजबूत ऋण वृद्धि और ढीली मौद्रिक नीति के समर्थन से निवेश वृद्धि मजबूत बनी हुई है. मुद्रास्फीति के केंद्रीय बैंक के लक्ष्यों के भीतर या उसके अनुरूप बने रहने की उम्मीद है. कमजोर निर्यात संभावनाओं, बढ़ते विदेशी मुद्रा दबाव और सामाजिक अशांति के कारण क्रमशः भारत, मालदीव और नेपाल के लिए 2026 के विकास पूर्वानुमानों को घटा दिया गया है. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में सरकार के सुधारों कर स्लैब की संख्या कम करना और अनुपालन को सरल बनाना से गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. दक्षिण एशिया में भारत का विकास   देश का वित्तीय वर्ष स्थिर बाजार मूल्यों पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि (प्रतिशत) 23/24 24/25(e) 25/26(f) 26/27(f) पूर्वानुमान में संशोधन (प्रतिशत अंक) 25/26(e) 26/27(f) अप्रैल से मार्च 9.2 6.5 6.5 6.3 +0.2 -0.2 (ई) = अनुमान; (एफ) = पूर्वानुमान. हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका को भारत के लगभग तीन-चौथाई वस्तु निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 26/27 के लिए पूर्वानुमान घटा दिया गया है. अप्रैल में भारत को अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता था, लेकिन अगस्त के अंत तक उसे काफी अधिक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है. साल 2024 में भारत के वस्तु निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका को जाएगा, जो सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 2 प्रतिशत के बराबर है. मध्यम अवधि में भारत के ऊर्जा मांग का दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता स्रोत बनने और 2050 तक चीन को पीछे छोड़कर ऊर्जा मांग का सबसे बड़ा स्रोत बनने की उम्मीद है. सार्वजनिक निवेश वृद्धि औसतन 10 प्रतिशत रही. भारत में सार्वजनिक निवेश को बनाए रखते हुए, केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय ने विश्व बैंक के 2025 के अनुमान के अनुसार कुल गतिविधियों में 3-4 गुना वृद्धि की. भारत में रोजगार बाजार: भारत में, एक ही राज्य के पड़ोसी जिलों के बीच औसत प्रवास, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, राज्य की सीमा के दोनों ओर स्थित पड़ोसी जिलों के बीच प्रवास की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण रोजगार चाहने वाले लोग ढाका में उच्च उत्पादकता वाले कामों के लिए बड़े पैमाने पर पलायन करते हैं, लेकिन शहर बढ़ती भीड़भाड़ से जूझ रहा है. भारत का गैर-कृषि श्रम बाजार, जो 2023 में सफ़ेदपोश सेवाओं पर काफी हद तक निर्भर करता है, भारत में आईसीटी-बीपीएम बाजार ने 54 लाख रोजगार पैदा किए और सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत का योगदान दिया. भारत और नेपाल, जहां कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में कार्यबल और निम्न औसत कौशल स्तर हैं, इस क्षेत्र में सबसे कम रोजगार का रिकॉर्ड रखते हैं. दक्षिण एशिया में, भारत उन रोज़गार के अवसरों के मामले में सबसे ऊपर है जो पूरक हैं, जबकि श्रीलंका सबसे नीचे है. भारत में नौकरी बाजार: भारत में, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, एक ही राज्य के पड़ोसी जिलों के बीच औसत प्रवास राज्य की सीमा के विभिन्न किनारों पर पड़ोसी जिलों की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण नौकरी चाहने वाले बड़ी संख्या में ढाका में उच्च-उत्पादकता वाले काम की ओर पलायन करते हैं, लेकिन शहर बढ़ती भीड़भाड़ से जूझ रहा है. भारत का गैर-कृषि श्रम बाजार 2023 में सफेदपोश सेवाओं के काम पर बहुत अधिक निर्भर करता है, भारत में आईसीटी-बीपीएम बाजार ने 5.4 मिलियन नौकरियां पैदा कीं और सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत का योगदान दिया. भारत और नेपाल, जो कम औसत कौशल स्तर के साथ बड़े कृषि कार्यबल को जोड़ते हैं, इस क्षेत्र का सबसे कम जोखिम दर्ज करते हैं। दक्षिण एशिया में, पूरक नौकरियों के मामले में भारत सर्वोच्च स्थान पर है, जबकि श्रीलंका सबसे निचले स्थान पर है. भारत में रोजगार बाजार: भारत में, एक ही राज्य के पड़ोसी पर्यटकों के बीच औसत यात्रा हुई, भाषाई अंतर को ध्यान में रखते हुए भी, राज्य की सीमा के दोनों ओर स्थित पड़ोसी पर्यटकों के बीच यात्रा की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत अधिक है. बांग्लादेश में, ग्रामीण मजदूर सामान्य वाले लोग ढेका में उच्च श्रेणी वाले नौकरानियों के … Read more