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ChatGPT की टिप बनी मुसीबत, अस्पताल पहुंचा यूजर, जानें पूरा मामला

नई दिल्ली  अगर आप भी ChatGPT पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करते हैं और AI चैटबॉट से फिटनेस टिप्स या डाइट प्लान लेते हैं, तो सावधान हो जाइए। AI से ली गई स्वास्थ्य संबंधी सलाह जान को खतरे में भी डाल सकती है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि चैटजीपीटी की सलाह ने एक शख्स को अस्पताल पहुंचा दिया है। एक रिपोर्ट की अनुसार, न्यूयॉर्क में एक 60 वर्षीय व्यक्ति को उस समय अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जब उसने ChatGPT द्वारा बताए गए भोजन से नमक कम करने के सख्त नियम का पालन किया। डॉक्टरों के अनुसार, उस व्यक्ति ने कई हफ्तों तक अपने आहार से सोडियम की मात्रा अचानक लगभग शून्य कर दिया, जिससे सोडियम का स्तर खतरनाक रूप से कम हो गया, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है। उसके परिवार ने कहा कि उसने चिकित्सक से परामर्श किए बिना ही एआई जनरेटेड हेल्थ प्लान पर भरोसा किया। हाल ही में अमेरिकन कॉलेज ऑफ फिजिशियन जर्नल में पब्लिश यह मामला, प्रोफेशनल निगरानी के बिना एआई जनरेटेड हेल्थ एडवाइज को फॉलो करने के जोखिमों को उजागर करता है, खासकर जब इसमें सोडियम जैसे जरूरी पोषक तत्व शामिल हों। राहत की बात यह है कि अस्पताल में करीब तीन हफ्ते बिताने के बाद वह व्यक्ति ठीक हो गया। लेकिन इस मामले में चैटजीपीटी की विश्वसनीयता पर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। चैटजीपीटी की सलाह खतरनाक साबित हुई टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, उस व्यक्ति ने चैटजीपीट से पूछा कि अपने आहार से सोडियम क्लोराइड (जिसे आमतौर पर टेबल सॉल्ट कहा जाता है) को कैसे हटाया जाए। AI टूल ने एक विकल्प के रूप में सोडियम ब्रोमाइड का सुझाव दिया, जो 20वीं सदी की शुरुआत में दवाओं में इस्तेमाल होने वाला एक कंपाउंड था, लेकिन अब इसे ज्यादा मात्रा में टॉक्सिक माना जाता है। इस सलाह पर अमल करते हुए, उस व्यक्ति ने ऑनलाइन सोडियम ब्रोमाइड खरीदा और तीन महीने तक अपने खाना पकाने में इसका इस्तेमाल किया। मानसिक या शारीरिक बीमारी की कोई प्रीवियस हिस्ट्री न होने के कारण, उस व्यक्ति को मतिभ्रम, पैरानॉया (Paranoia) और अत्यधिक प्यास लगने लगी। अस्पताल में भर्ती होने पर, वह भ्रमित दिखाई दिया और दूषित होने के डर से पानी भी लेने से मना कर दिया। डॉक्टरों ने उसे ब्रोमाइड टॉक्सिसिटी से पीड़ित पाया, एक ऐसी स्थिति जो अब लगभग अनसुनी है, लेकिन कभी चिंता, अनिद्रा और अन्य बीमारियों के लिए ब्रोमाइड निर्धारित करते समय आम थी। उसमें तंत्रिका संबंधी लक्षण, त्वचा पर मुंहासे जैसे दाने और लाल धब्बे भी दिखाई दिए, जो ब्रोमिज्म के लक्षण हैं। अस्पताल में उपचार का मुख्य उद्देश्य रीहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बहाल करना था। तीन हफ्तों के दौरान, उस व्यक्ति की हालत में धीरे-धीरे सुधार हुआ, और सोडियम और क्लोराइड का स्तर नॉर्मल होने पर उसे छुट्टी दे दी गई। कंपनी ने अपनी शर्तों में यह साफ लिखा है केस स्टडी के लेखकों ने एआई टूल्स से स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाओं के बढ़ते जोखिम पर जोर दिया। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है, "यह ध्यान रखना जरूरी है कि चैटजीपीटी और अन्य एआई सिस्टम वैज्ञानिक अशुद्धियां उत्पन्न कर सकते हैं, परिणामों पर गंभीरता से चर्चा नहीं कर सकते, और अंततः गलत सूचनाओं के प्रसार को बढ़ावा दे सकते हैं।" चैटजीपीटी के डेवलपर, ओपनएआई ने इसे इस्तेमाल करने की शर्तों में स्पष्ट रूप से कहा है: "आपको हमारी सर्विसेस से प्राप्त आउटपुट को सत्य या तथ्यात्मक जानकारी के एकमात्र स्रोत के रूप में, या पेशेवर सलाह के विकल्प के रूप में नहीं मानना चाहिए।" शर्तों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह सर्विस चिकित्सा स्थितियों के निदान या उपचार के लिए नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई टूल सामान्य जानकारी के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन इन्हें कभी भी पेशेवर परामर्श का स्थान नहीं लेना चाहिए। जैसे-जैसे एआई का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है कि इसके परिणाम सटीक, सुरक्षित और लोगों द्वारा स्पष्ट रूप से समझे जाएं।  

मिडिल ईस्ट से आई अच्छी खबर, भारत-ओमान के बीच जल्द हो सकती है व्यापारिक डील

नई दिल्ली. जहां एक तरफ भारत और अमेरिका की ट्रेड डील पर सस्पेंस बना हुआ है, तो वहीं मिडिल ईस्ट से भारत के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है। भारत और ओमान के बीच जल्द ही ट्रेड डील साइन हो सकती है। दोनों देशों के बीच इसे लेकर बातचीत पूरी हो चुकी है। भारत के वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने राज्यसभा में बताया कि भारत-ओमान के बीच ट्रेड डील पर बातचीत 2023 में शुरू हुई थी, जो अब पूरी हो चुकी है। कांग्रेस नेता के सवाल पर दिया जवाब दरअसल कांग्रेस नेता हेबी माथेर हिशाम ने भारत की ट्रेड डील पर संसद में सवाल पूछा था, जिसके जवाब में केंद्रीय मंत्री जितिन ने बताया कि भारत और ओमान के बीच ट्रेड डील जल्द ही साइन हो सकती है। भारत और ओमान की दोस्ती काफी पुरानी है। दोनों देश एक-दूसरे के रणनीतिक साझेदार हैं। हमारे बीच 1955 से कूटनीतिक रिश्ते हैं। हालांकि, केंद्रीय मंत्री ने अपने जवाब में ट्रेड डील साइन करने की तारीख का जिक्र नहीं किया। 5 साल में 5 बड़ी ट्रेड डील केंद्रीय मंत्री जितिन ने सदन में बताया कि पिछले पांच सालों में भारत ने अपने व्यापारिक गठबंधन मजबूत किए हैं। हमने 5 बड़े देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement) साइन किया है। वहीं, कई देशों के साथ नई डील पर बातचीत चल रही है।  पिछले 5 साल के 5 बड़े व्यापार समझौते 2021 – भारत-मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग और साझेदारी समझौता (CECPA) 2022 – भारत-यूएई व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) 2022 – भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौता (ECTA) 2024 – भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) 2025 – भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) कई देशों से बातचीत जारी भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हुई ट्रेड डील इस साल के आखिर तक लागू होने की संभावना है। इसके अलावा भारत श्रीलंका, पेरू, न्यूजीलैंड और अमेरिका के साथ कई ट्रेड डील पर बातचीत कर रहा है।  

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में एनकाउंटर, इलाके में भारी फोर्स तैनात

जम्मू. जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड में सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ जारी है। किश्तवाड के दुल इलाके खुफिया जानकारी के आधार पर चल रहे एक अभियान के दौरान जवानों का इन आतंकियों से सामना हुआ। व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए लिखा है कि गोलीबारी हुई है, फिलहाल अभियान जारी है। घाटी में चल रहा यह अभियान कुलगाम में जारी ऑपरेशन के बाद शुरू हुआ है। कुलगाम में आतंकियों से जारी मुठभेड़ लांस नायक प्रितपाल सिंह और सिपाही हरमिंदर सिंह को वीरगति प्राप्त हुई है। ऑपरेशन ओखल पिछले नौ दिनों से जारी है। चिनार कोर ने इस अभियान में शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा। पोस्ट में लिखा, "चिनार कोर राष्ट्र के लिए अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वीरों, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रितपाल सिंह और सिपाही हरमिंदर सिंह के सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करता है। उनका साहस और समर्पण हमें सदैव प्रेरित करता रहेगा। भारतीय सेना गहरी संवेदना व्यक्त करती है और शोक संतप्त परिवारों के साथ एकजुटता से खड़ी है। अभियान जारी है।"

पाकिस्तान को 300 KM दूर से दी मात, भारतीय वायुसेना ने रचा अनोखा रिकॉर्ड

नई दिल्ली. ऑपरेशन सिंदूर के तीन महीने बाद भारतीय वायुसेना (IAF) ने पहली बार सार्वजनिक रूप से उस बड़े हमले का खुलासा किया है, जिसे सैन्य अधिकारी आधुनिक हवाई युद्ध के इतिहास में अभूतपूर्व मानते हैं। शनिवार को बेंगलुरु में एक व्याख्यान के दौरान वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए. पी. सिंह ने बताया कि 7 मई को पाकिस्तान का एक बड़ा हवाई प्लेटफार्म लगभग 300 किलोमीटर की दूरी से मार गिराया गया। यह संभवतः इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) या एयरबॉर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमान हो सकता है। उन्होंने इसे अब तक का सबसे लंबी दूरी से दर्ज सतह-से-आकाश में मारने वाली घटना बताया है। वायुसेना चीफ ने स्पष्ट किया कि “300 किमी की दूरी पर यह रिकॉर्ड किसी विमान के आकार को लेकर नहीं, बल्कि दूरी के लिहाज से है।” ऐसे हमलों की पुष्टि अक्सर कठिन होती है क्योंकि मलबा दुश्मन देश की सीमा में गिरता है और स्वतंत्र रूप से सत्यापन संभव नहीं होता। इस मामले में, वायुसेना प्रमुख का बयान संभवतः इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग के जरिए पुष्टि के बाद ही दिया गया। अधिकारियों के अनुसार, “हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक तरीके हैं जिससे हम किसी लक्ष्य को गिराने की पुष्टि कर सकते हैं। रडार पर एक ब्लिप दिखाई देता है और फिर गायब हो जाता है।” 300 किमी दूरी क्यों है खास? इतनी लंबी दूरी से किसी हवाई लक्ष्य को गिराने के लिए सिर्फ़ लंबी दूरी के इंटरसेप्टर मिसाइल (Surface-to-Air Missile – SAM) ही नहीं, बल्कि सटीक ट्रैकिंग, स्थिर टार्गेट लॉक और लक्ष्य तक हथियार की निरंतर मार्गदर्शन क्षमता की जरूरत होती है। भारतीय वायुसेना ने यह क्षमता हाल ही में रूसी S-400 प्रणाली के आगमन के साथ हासिल की। अधिकारियों के मुताबिक, S-400 प्रणाली की 400 किमी तक की मारक क्षमता ने पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों को इतनी दूरी पर रोक दिया कि वे लंबी दूरी के ग्लाइड बम का भी इस्तेमाल नहीं कर सके। दुनिया में दुर्लभ उदाहरण हाल के संघर्षों में इतनी लंबी दूरी से सतह-से-आकाश मार के मामले बहुत कम सामने आए हैं। फरवरी 2024 में यूक्रेन ने दावा किया कि उसने रूस के A-50 जासूसी विमान को 200 किमी से अधिक दूरी पर गिराया। फरवरी 2022 में यूक्रेन का एक Su-27 लड़ाकू विमान रूसी S-400 से लगभग 150 किमी की दूरी पर गिरा। 300 किमी की दूरी से इस तरह का हमला सार्वजनिक रूप से दर्ज होना अत्यंत दुर्लभ है। भारत को रूस से अब तक 5 में से 3 S-400 यूनिट मिल चुकी हैं, जिन्हें पाकिस्तान और चीन की सीमा पर तैनात किया गया है। बाकी 2 यूनिट 2025–26 तक मिलने की उम्मीद है। अधिकारियों ने इसकी तुलना ऐसी टॉर्च से की जो सीमा से कई किलोमीटर भीतर तक देख सकती है। ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में S-400 के साथ-साथ बराक-8 मीडियम रेंज SAM और स्वदेशी आकाश मिसाइल प्रणाली ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हाल ही में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने S-400 के लिए व्यापक वार्षिक रखरखाव अनुबंध को मंजूरी दी है। CAATSA और S-400 डील भारत ने S-400 सौदा 2018 में रूस के साथ किया था, ठीक एक साल बाद जब अमेरिका ने काउंटरिंग अमेरिका’स एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट (CAATSA) लागू किया था। यह कानून रूस, ईरान या उत्तर कोरिया से बड़े रक्षा सौदे करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।  

Golden City सिर्फ अमृतसर नहीं, राजस्थान के इस शहर की भी है सोने जैसी खूबसूरती

नई दिल्ली भारत को व‍िव‍ि‍धताओं का शहर कहा जाता है। यहां खानपान से लेकर घूमने फि‍रने के ल‍िए कई जगहें मौजूद हैं। भारत में जब भी सबसे खूबसूरत राज्‍यों की बात हाेती है तो राजस्‍थान का नाम सबसे पहले ल‍िया जाता है। भारत में ऐसे कई शहर मौजूद हैं जो अपने खास नामों और उपनामों (Nickname) से फेमस हैं। ये नाम न सिर्फ उनकी पहचान बन जाते हैं, बल्कि वहां की संस्कृति, इतिहास और खूबसूरती को भी द‍िखाते हैं। ऐसा ही एक नाम है Golden City। आमतौर पर लोग जब इस नाम को सुनते तो उन्‍हें पंजाब के अमृतसर की ही याद आती है, लेकिन दिलचस्प बात तो ये है कि राजस्थान का एक शहर भी इसी नाम से जाना जाता है। ये शहर अपनी अनोखी पहचान के लिए दुनियाभर में मशहूर है। देश-विदेश से लोग यहां की रौनक और खूबसूरती को देखने के ल‍िए हर साल आते हैं। यहां का माहौल, वास्तुकला और लोक संस्कृति हर किसी को अपना दीवाना बना देती है। ये जगह न सिर्फ घूमने के ल‍िहाज से खास है, बल्कि इसके पीछे एक पुरानी कहानी और विरासत भी जुड़ी हुई है। अगर आपको भी घूमने-फ‍िरने का शौक है और भारत के अलग-अलग शहरों की खासियत को जानना चाहते हैं, तो इस Golden City के बारे में भी आपको जरूर जानना चाह‍िए। आज का हमारा लेख भी इसी व‍िषय पर है। हम आपको इससे जुड़ी द‍िलचस्‍प बातें बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं व‍िस्‍तार से – बलुआ पत्थर के ए‍क टीले पर बसा है शहर आपको बता दें क‍ि जेसलमेर पीले रंग के बलुआ पत्थर के ए‍क टीले पर बसा है। इस पर एक किला है, जिसमें एक महल और कई खूबसूरत जैन मंदिर हैं। यहां के बहुत से घर और मंदिर बहुत ही सुंदर ढंग से तराशे गए हैं। ये शहर Thar Desert के बीचों-बीच बसा हुआ है। अब आप सोच रहे होंगे क‍ि जैसलमेर में ऐसा क्‍या है जो इसे Golden City के नाम से जाना जाता है। तो हम आपको बता दें क‍ि जैसलमेर थार रेगिस्तान में बसा एक शहर है और यहां का रेतिला रेगिस्तान पूरे देश में जाना जाता है। सुनहरे रंग में रंग जाता है पूरा जैसलमेर बताया जाता है क‍ि जब रेग‍िस्‍तानी म‍िट्टी पर सूरज की रोशनी पड़ती है तो पूरा शहर सुनहरे रंग में चमक उठता है। दूर-दूर तक रेग‍िस्‍तान का सुनहरा नजारा देखने को म‍िलता है। कहते हैं क‍ि पीली रेत और सभी इमारतों में इस्तेमाल हुए पीले बलुआ पत्थर पूरे शहर और उसके आस-पास के इलाके को सुनहरे रंग में रंग देते हैं। यही कारण है क‍ि जैसलमेर (Jaisalmer) को गोल्‍डन सि‍टी के नाम से जाना जाता है। जैसलमेर नाम कैसे पड़ा? जैसलमेर शहर का नाम राजपूत राजा राव जैसल के नाम पर रखा गया है। इन्होंने इस शहर को 1156 ईस्वी में बसाया था। जैसलमेर का मतलब है- जैसल का पहाड़ी किला। ये राजस्थान का सबसे बड़ा और देश के सबसे बड़े जिलों में से एक है। जैसलमेर किले को त्रिकूट गढ़ भी कहते हैं। इसे 1156 में भाटी राजपूत शासक राव जैसल ने मेरु पहाड़ी पर बनवाया था। ये किला कई लड़ाइयों का गवाह रहा है। जैसलमेर के हैं कई नाम दिन के समय इसकी बड़ी सी बलुआ पत्थर की दीवारें शेर जैसी भूरी दिखती हैं, और जब सूरज डूबने लगता है, तो वो सुनहरी यानी कि‍ गोल्‍डन हो जाती हैं। आपको बता दें क‍ि इसे गोल्‍डन स‍िटी के अलावा और भी कई नामों से जाना जाता है। इसमें हवेलियों का शहर, म्यूजियम सिटी, पीले पत्थरों का शहर, झरोखों की नगरी जैसे कई नाम शाम‍िल हैं।  

उत्तरकाशी आपदा से घायल हर्षिल घाटी की गंगा, फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ का प्रसिद्ध स्थल हुआ शांत

उत्तरकाशी ऐसे कई स्थान हैं, जो किसी फिल्म से जुड़कर देश-दुनिया में चर्चित हो गए। बालीवुड के अमर शिल्पी और जानेमाने फिल्मकार राज कपूर की फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' (1985) ने एक समय उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल हर्षिल को भी जबरदस्त सुर्खियों में ला दिया था। बर्फ से ढकी चोटियां, भागीरथी नदी के किनारे फिल्म की नायिका मंदाकिनी की निर्दोष मुस्कान, सेब के बागानों की छांव में राज कपूर का कैमरा, चिट्ठियों के इंतजार में डाकघर पर टिकीं नायिका की निगाहें…, फिल्म के इन तमाम दृश्यों ने पूरे देश में हर्षिल को तब चर्चा में ला दिया था। फिल्म में अभिनेत्री मंदाकिनी ने गंगा का किरदार और अभिनेता राजीव कपूर ने नरेन की भूमिका निभाई है। इस फिल्म ने गढ़वाल की जीवन शैली, पारंपरिक पोशाक, आभूषण आदि को भी जीवंत कर दिया था। उस दौर में हर्षिल घाटी प्रेम, पवित्रता, सादगी और सिनेमाई सौंदर्य का प्रतीक बन गई थी। धराली की आपदा ने हर्षिल की इन्हीं खूबसूरत वादियों में वीरानगी फैला दी है। आज हर्षिल में राहत दलों की आवाजाही और हेलिकाप्टरों की गड़गड़ाहट गूंज रही है। सेब की बगीचों की रंगत मलबे के नीचे दब चुकी है। धराली में खीरगंगा और हर्षिल में तेलगंगा के तांडव ने यहां की सुंदर और शांत वादियों को झकझोर दिया है। फिल्म राम तेरी गंगा मैली का सुपरहिट गाना 'हुस्न पहाड़ों का…' तब खूब चर्चित हुआ था। कभी यह गीत यहां शादी-ब्याह और अन्य समारोहों में खूब गूंजता था। इसी गीत के माध्यम से देश भर के दर्शकों ने हर्षिल की सुरम्य वादियों को पहली बार परदे पर देखा था। धराली से एक किलोमीटर आगे गंगोत्री की ओर प्रसिद्ध मंदाकिनी झरने के नीचे नायिका पर सफेद साड़ी में यह गीत फिल्माया गया था। इस झरने में ऐसे तो कोई उफान नहीं आया है, लेकिन आज वहां आसपास सैलाब की सिसकियां सुनाई देती हैं। हर तरफ मलबे में दबी खामोशी है। चार दिन पहले धराली में खीरगंगा और हर्षिल में तेलगंगा के उफान ने जो तबाही मचाई, उसने हर्षिल में बहुत कुछ बदल डाला है। सेब के बगीचों के बीच बसा धराली कस्बा तो नक्शे से लगभग गायब हो गया। सुरक्षित है हर्षिल गांव और बाजार पिछले दिनों की आपदा ने ऐसे तो हर्षिल को बुरी तरह झकझोर दिया है, लेकिन राम तेरी गंगा मैली में फिल्माए गए यहां के स्थल अब भी सुरक्षित हैं। प्रसिद्ध डाकघर, जहां फिल्म की नायिका गंगा (मंदाकिनी) नरेन के लिए चिट्ठी भेजती है और उसकी चिट्ठी का इंतजार करती थी, आपदा में सुरक्षित है। हर्षिल गांव और उसका मुख्य बाजार भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। आपदा के दिन हर्षिल हेलीपैड के पास झील बनने के कारण उत्पन्न खतरे पर अब एक हद तक नियंत्रण पाया जा चुका है। झील का जलस्तर घट रहा है और इस स्थान पर भागीरथी नदी का प्रवाह सामान्य होने की दिशा में है।

2019 में देश में मधुमेह की बढ़ती संख्या, 45+ आयु वर्ग में हर पांचवां प्रभावित

नई दिल्ली भारत में 2019 में 45 वर्ष और उससे अधिक आयु का लगभग हर पांचवां व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित था और हर पांच में से दो व्यक्तियों को अपने स्वास्थ्य संबंधी इस स्थिति के बारे में संभवतः पता ही नहीं था। भारत के वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों में यह जानकारी दी गई। 'द लांसेट ग्लोबल हेल्थ' में प्रकाशित निष्कर्षों से यह भी पता चलता है कि जैसे-जैसे देश की आबादी तेजी से वृद्ध होती जाएगी, मध्यम आयु वर्ग और वृद्धों में मधुमेह के मामले बढ़ेंगे। यह शोध करने वालों में मुंबई और अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान के शोधकर्ता भी शामिल थे। उन्होंने पाया कि मधुमेह को लेकर जागरुक 46 प्रतिशत लोगों ने रक्त शर्करा के स्तर पर नियंत्रण पा लिया और लगभग 60 प्रतिशत लोग उसी वर्ष अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने में सक्षम रहे। शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि छह प्रतिशत लोगों ने हृदय संबंधी रोग के जोखिम को कम करने के लिए 'लिपिड' नियंत्रित करने वाली दवा ली। 'लान्गिटूडनल एजिंग स्टडी इन इंडिया' शीर्षक वाले इस अध्ययन के तहत 2017 से 2019 के दौरान 45 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 60,000 वयस्कों का सर्वेक्षण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि चयापचय संबंधी समस्या (लगभग 20 प्रतिशत) पुरुषों और महिलाओं में समान थी और शहरी क्षेत्रों में यह ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में दोगुनी थी। शोधकर्ताओं ने कहा कि इसके अलावा, जो राज्य आर्थिक रूप से अधिक विकसित थे, उनमें मधुमेह के मामले अधिक रहे। उन्होंने कहा, ''हमारा अध्ययन भारत में मध्यम आयु वर्ग और वृद्ध वयस्कों में 'ग्लाइकेटिड हीमोग्लोबिन' सांद्रता का उपयोग करके मधुमेह को नियंत्रित करने, इसका उपचार करने, इसकी व्यापकता का पता लगाने, इसे लेकर जागरूकता फैलाने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अद्यतन आंकड़े मुहैया कराता है।'' टीम ने पाया, ''45 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग हर पांच में से एक व्यक्ति को मधुमेह था।' परिणाम बताते हैं कि ''आने वाले वर्षों में मधुमेह से पीड़ित मध्य आयु वर्ग और वृद्ध वयस्कों की कुल संख्या बढ़ेगी, भले ही आयु-विशिष्ट मधुमेह के प्रसार में वृद्धि को रोका जा सके।''  

विदेशी कृषि आयात और भारतीय किसान: खतरे और समाधान के आंकड़े

नई दिल्ली  भारत एक ऐसा देश है जहां खेती-बाड़ी हमारी संस्कृति और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है. करीब 44 प्रतिशत लोग खेती से अपनी जीविका चलाते हैं. हमारे किसान दिन-रात मेहनत करके देश का पेट भरते हैं, लेकिन उनकी जिंदगी आसान नहीं है. एक बड़ी समस्या है विदेशी कृषि और डेयरी उत्पादों का आयात, खासकर अमेरिका जैसे देशों से. वहां की सरकार अपने किसानों को इतनी बड़ी सब्सिडी देती है कि उनके उत्पाद बहुत सस्ते हो जाते हैं. अगर ये सस्ते उत्पाद हमारे बाजार में बिना किसी रोक-टोक के आ गए, तो हमारे किसानों का बहुत नुकसान होगा. अमेरिका में एक किसान को सब्सिडी अतुल ठाकुर के अनुसार, 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अमेरिका से आने वाले खाद्य उत्पादों पर 40.2 प्रतिशत और पूरी दुनिया से आयात होने वाले खाद्य उत्पादों पर औसतन 49 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया था. यह शुल्क इसलिए जरूरी है ताकि विदेशी उत्पादों की कीमतें हमारे बाजार में ज्यादा रहें और हमारे किसानों के उत्पादों को बिकने का मौका मिले. अमेरिका में एक किसान को औसतन 61,000 डॉलर की सब्सिडी मिलती है, जबकि हमारे किसान को सिर्फ 282 डॉलर. इस वजह से अमेरिका के मक्का, सोयाबीन, गेहूं और डेयरी उत्पाद बहुत सस्ते दामों पर बिकते हैं. हमारे किसानों के लिए इनसे मुकाबला करना मुश्किल है, क्योंकि उनकी लागत ज्यादा आती है. फसलों की पैदावार कम भारत में ज्यादातर किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास औसतन सिर्फ 1.08 हेक्टेयर जमीन होती है. दूसरी तरफ, अमेरिका में एक किसान के पास औसतन 187 हेक्टेयर जमीन होती है. हमारे यहां खेती में मेहनत ज्यादा लगती है, क्योंकि ज्यादातर काम हाथ से या छोटी मशीनों से होता है. साथ ही, हमारी फसलों की पैदावार भी कम होती है, जिससे उत्पादन की लागत बढ़ जाती है. किसानों की कमाई कम होने का खतरा  अगर सस्ते विदेशी उत्पाद बाजार में आ गए, तो स्थानीय उत्पादों की कीमतें गिरेंगी. इससे किसानों की कमाई कम होगी और उनकी जिंदगी और मुश्किल हो जाएगी. इतना ही नहीं, इससे देश की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि हमारा देश अपनी जरूरतों के लिए खुद की फसलों पर निर्भर है. एक और बड़ी बात है हमारी संस्कृति और धर्म से भी जुड़ी हुई है. अमेरिका में कुछ उत्पादों में अक्सर मांस के मसाले का इस्तेमाल होता है, जो भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को आहत कर सकता है. कई भारतीय लोग इस बात को लेकर बहुत सजग हैं कि उनके खाने में ऐसी चीजें न हों. अगर अमेरिकी डेयरी उत्पाद बिना सख्त नियमों के यहां आए, तो लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं. इसके अलावा, अमेरिका से आने वाले मक्का और सोयाबीन ज्यादातर जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) होते हैं. भारत में जीएम फसलों की खेती की इजाजत नहीं है, क्योंकि इन्हें इंसान के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक माना जाता है. अगर ये आयातित फसलें हमारी फसलों के साथ मिल गईं, तो हमारी जैव विविधता को नुकसान हो सकता है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर कई बार बात हुई, लेकिन यह कृषि और डेयरी उत्पादों पर आकर अटक जाती है. अमेरिका चाहता है कि भारत अपने बाजार को उसके दूध पाउडर, चीज़, सेब, अखरोट, मक्का और सोयाबीन जैसे उत्पादों के लिए खोले. वह आयात शुल्क कम करने और जीएम फसलों पर नियम ढीले करने की मांग करता है. लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं है, क्योंकि इससे करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी. भारत का डेयरी उद्योग ज्यादातर असंगठित है, और अमूल जैसी सहकारी संस्थाएं करोड़ों किसानों की कमाई का सहारा हैं. अमेरिकी डेयरी उत्पादों के सामने ये टिक नहीं पाएंगे. अन्य देशों का अनुभव दूसरे देशों के अनुभव भी यही बताते हैं. मैक्सिको ने 1994 में अमेरिका के साथ नाफ्टा समझौता किया, जिससे सस्ते अमेरिकी मक्का और सोयाबीन वहां आए. लाखों मैक्सिकन किसानों को खेती छोड़नी पड़ी और बेरोजगारी बढ़ी. चिली और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी यही हुआ. वहां अमेरिकी उत्पादों की बाढ़ से स्थानीय किसान कमजोर पड़ गए. भारत नहीं चाहता कि ऐसा यहाँ भी हो. भारत का रुख साफ है कि वह अपने किसानों और डेयरी उद्योग को बचाना चाहता है. अमूल और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन विदेशी डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने का विरोध करते हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि कुछ अमेरिकी उत्पादों को सीमित मात्रा में अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते उनकी साफ लेबलिंग हो कि वे किस चारे से बने हैं. भारत भी अपने जैविक खाद्य और मसालों को अमेरिका में निर्यात करने की छूट चाहता है. लेकिन डेयरी और जीएम उत्पादों पर भारत का रुख सख्त है. कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. सस्ते आयात से किसानों की आय घटने का खतरा है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकता है. 2020-21 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि किसानों के हितों को नजरअंदाज करना सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता है. इसलिए, सरकार अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में अपने किसानों को प्राथमिकता दे रही है. आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के तहत स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना और विदेशी आयात पर निर्भरता कम करना जरूरी है. इससे न सिर्फ किसानों की जिंदगी बेहतर होगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान भी बनी रहेगी.  

चुनाव आयोग ने 334 गैर-मान्यता प्राप्त दलों को सूची से बाहर किया

 नई दिल्ली  भारतीय निर्वाचन आयोग ने 334 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को पंजीकृत सूची से बाहर कर दिया। चुनाव आयोग के फैसले के बाद वर्तमान में सिर्फ 6 राष्ट्रीय दल और 67 क्षेत्रीय पार्टियां हैं, जबकि 2,520 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल बचे हैं। 6 राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी, बसपा, सीपीएमआई और एनपीपी शामिल हैं। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल जैसे 67 प्रमुख दल चुनाव आयोग की सूची में क्षेत्रीय दलों के तौर पर पंजीकृत हैं। आयोग ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि सूची से बाहर किए गए राजनीतिक दल आयकर अधिनियम-1961 और चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश-1968 के प्रासंगिक प्रावधानों के साथ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम- 1951 की धारा 29बी और धारा 29सी के प्रावधानों के तहत कोई भी लाभ प्राप्त करने के पात्र नहीं होंगे। हालांकि, चुनाव आयोग ने सूची से बाहर किए गए राजनीतिक दलों को अपील के लिए 30 दिन का समय दिया है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जून 2025 में ईसीआई ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को 345 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था। इस प्रक्रिया के अंतर्गत अधिकारियों ने इन दलों की जांच की, उन्हें शोकॉज नोटिस जारी किए और व्यक्तिगत सुनवाई के माध्यम से अपनी बात रखने का अवसर दिया। अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर, 345 में से 334 दलों ने शर्तों का पालन नहीं किया। आयोग ने सभी तथ्यों और अधिकारियों की सिफारिशों पर विचार करने के बाद इन 334 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को सूची से हटा दिया है। चुनाव आयोग ने बताया कि अब कुल 2,854 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में से 2,520 दल शेष रह गए हैं। निर्वाचन आयोग ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का पंजीकरण भारत निर्वाचन आयोग के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 29ए के अंतर्गत किया जाता है। राजनीतिक दलों के पंजीकरण को लेकर यह नियम है कि यदि कोई पार्टी लगातार 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ती, तो उसका नाम रजिस्ट्रेशन सूची से हटा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, धारा 29ए के तहत रजिस्ट्रेशन के समय राजनीतिक दलों को अपना नाम, पता, पदाधिकारियों की सूची आदि जैसी जानकारी देनी होती है और इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन होने पर तत्काल आयोग को सूचित करना होता है।"

टैरिफ बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था को झटका, 23 अरब डॉलर तक घट सकती है GDP

नई दिल्ली अमेरिका भारत पर टैरिफ 25 फीसदी लगा चुका है और एक्‍स्‍ट्रा 25 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान किया है, जो 27 अगस्‍त से प्रभावी है. अब इस टैरिफ को लेकर इकोनॉमिस्‍ट चिंता जाहिर कर रहे हैं. एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इससे भारत की इकोनॉमी पर गहरा असर पड़ेगा. मार्केट एक्‍सपर्ट अजय बग्‍गा ने ट्रंप टैरिफ को लेकर भारत की अर्थव्‍यवस्‍था पर गंभीर परिणाम पड़ने की चेतावनी दी है.  उनका कहना है कि 50 फीसदी टैरिफ से भारत की GDP में करीब 23 अरब डॉलर का असर पड़ सकता है. सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म X पर लिखते हुए बग्‍गा ने कहा कि अमेरिका के टैरिफ से भारतीय एक्‍सपोर्टर पर लागत का बोझ तेजी से बढ़ेगा. बग्‍गा ने कहा कि ऑटो इक्‍यूप्‍मेंट्स, कपड़ा, ज्‍वेलरी, कालीन, केमिकल और मेटल जैसे सबसे ज्‍यादा प्रभावित सेक्‍टर्स के एक्‍सपोर्टर्स को व्‍यस्‍त सीजन में नुकसान का सामना करना पड़ेगा.  टैरिफ से इतनी घट सकती है इकोनॉमी ग्रोथ उन्‍होंने कहा कि हैंडमेड टेक्‍सटाइल प्रोडक्‍ट्स, जो अमेरिका जाने वाले एक्‍सपोर्ट का 35 फीसदी हिस्‍सा है, पर प्रभावी टैरिफ 27 अगस्‍त से बढ़कर 63.9 फीसदी हो जाएगा. कालीनों के लिए ये टैरिफ बढ़कार 58.9 फीसदी हो जाएगा. बग्‍गा ने कहा कि इससे भारत के GDP पर 0.3 फीसदी से 0.6 फीसदी का असर पड़ेगा, जिससे 23 अरब डॉलर तक का नुकसान होगा. इसका असर नौकरियों पर भी पड़ सकता है.  गोल्‍डमैन सैक्‍स ने भी जताई चिंता!  गोल्‍डमैन सैक्‍स ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय आयातों पर 25% अतिरिक्त शुल्क लगाने से भारत की अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ सकता है. रूस से भारत द्वारा कच्‍चा तेल खरीदने से जुड़े इस फैसले से वास्तविक जीडीपी ग्रोथ में 0.3 प्रतिशत की वार्षिक कमी आ सकती है. नए टैरिफ से अमेरिका में भारतीय एक्‍सपोर्ट एवरेज टैरिफ रेट करीब 32 फीसदी तक होने की उम्‍मीद है.  भारत का US से एक्पोर्ट-इम्‍पोर्ट भारत ने वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका को 86.5 अरब डॉलर वैल्‍यू की वस्तुओं का एक्‍सपोर्ट किया है, जबकि 45.7 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, दवाइयां और कपड़े प्रमुख निर्यात थे. भारत में कच्चे तेल के आयात में अमेरिका का हिस्सा 4% था, जो अप्रैल और मई 2025 में बढ़कर 8% हो गया, फिर भी रूस के योगदान की तुलना में यह कम ही रहा है.  भारत के पास क्‍या है विकल्‍प?  अजय बग्‍गा ने भारत सरकार को कुछ सुझाव दिया है, जो भारत को अमेरिका के टैरिफ वॉर से बचा सकती है. उन्‍होंने कहा कि कंज्‍युमर वस्‍तुओं पर GST में भारी कटौती, पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के लिए सब्सिडी, अल्पकालिक और दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (STCG और LTCG) का अस्‍थायी निलंबन, व्‍यापार के लिए सुगमता बढ़ाना और इंफ्रा के लिए स्‍मार्ट फंडिंग जैसे उपाय करके टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सकता है.  बग्गा ने यह भी कहा कि भारत का 150 मिलियन कंज्‍यूमर वर्ग विश्व स्तर पर सबसे ज्‍यादा टैक्‍स पे करने वाला वर्ग है और खर्च को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें तत्काल टैक्‍स राहत की आवश्यकता है.  किन सेक्‍टर पर टैरिफ पर ज्‍यादा होगा असर?    सेक्‍टर्स                        पिछला टैरिफ             नया टैरिफ                  भारत पर असर बुना हुआ कपड़ा (वस्त्र)        13.9%                   63.9%        वियतनाम की तुलना में ज्‍यादा नुकसान परिधान                              10.3%                  60.3%        ग्‍लोबल मार्केट में पहुंच खोने की आशंका  निर्मित वस्त्र                       9%                        59%     कालीन, घरेलू वस्त्र उद्योग प्रभावित होंगे  कालीन                            2.9%                     52.9%     1.2 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित रत्न और आभूषण               2.1%                     52.1%        10 अरब डॉलर का सेक्टर, एमएसएमई सबसे ज्यादा प्रभावित झींगा/समुद्री भोजन           33.26%                औसत    58%      एक्‍सपोर्ट कम होगा दवाइयां                          0%                       50% तक     वर्तमान में छूट प्राप्त, लेकिन असुरक्षित टेक्सटाइल: टैरिफ 60% के करीब पहुंचने से वैल्‍यू कंप्‍टीशन के हिसाब से कम हो रही है. निटवियर, बुने हुए परिधान और घरेलू वस्त्रों में MSME का अस्तित्व खतरे में है.   जेम्‍स एंड ज्‍वेलरी: 2% से 52% तक टैरिफ बढ़ने से अमेरिका को एक्‍सपोर्ट आर्थिक रूप से होना संभव नहीं दिख रहा है.  झींगा और सी फूड: पहले से ही उच्च टैरिफ से जूझ रहे भारतीय निर्यातकों को अब 58% का बोझ उठाना पड़ रहा है.  फार्मास्यूटिकल्स: वर्तमान में छूट प्राप्त है, लेकिन भविष्य में टैरिफ के दौर में शामिल होने से अमेरिका को भारत के 8-11 बिलियन डॉलर के फार्मा निर्यात में रुकावट पैदा हो सकती है.