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घरों से विधानसभा तक का सफर: कलिता माझी बनी बीजेपी विधायक

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक ऐसी कहानी उभरी है, जो सिर्फ जीत-हार से कहीं आगे जाकर उम्मीद, संघर्ष और बदलाव की मिसाल बन गई. बीजेपी की कलिता माझी ने, तृणमूल कांग्रेस के श्यामा प्रसन्न लोहार को हराकर औसग्राम (SC) विधानसभा क्षेत्र संख्या 273 में जीत हासिल की है. कलिता माझी ने श्यामा प्रसन्न को 12,535 वोटों के अंतर से हराया।  कलिता माझी को कुल 107692 वोट मिले, जबकि श्यामा प्रसन्न को 95157 वोटों से ही संतुष्ट करना पड़ा. इसके अलावा सीपीआई (एम) के चंचल कुमार माझी को 16478, कांग्रेस के तापस बराल को 2082 और निर्दलीय उम्मीदवार निहार कुमार हाजरा को महज 994 वोट ही मिल सके।  बीजेपी सांसद पी. सी. मोहन ने ‘एक्स’ पर लिखा, “बीजेपी बंगाल की उम्मीदवार कलिता माझी, जो 4 घरों में घरेलू कामगार के तौर पर काम करती हैं और महीने के ₹2,500 कमाती हैं, ने औसग्राम निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की है. यही बीजेपी की ताकत है, जहां एक आम नागरिक भी आगे बढ़ सकता है और एक सचमुच प्रेरणादायक कहानी लिख सकता है।  औसग्राम सीट से बीजेपी उम्मीदवार कलिता माझी (Kalita Majhi) की जीत ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र में आम आदमी की ताकत क्या होती है. चार घरों में घरेलू काम करके हर महीने महज 2,500 रुपये कमाने वाली कलिता माझी का सफर आसान नहीं रहा।  रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चुनौतियों से जूझते हुए उन्होंने कभी यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन वे विधानसभा तक पहुंचेंगी. लेकिन यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती है, जहां जमीन से जुड़ा एक साधारण नागरिक भी अपनी मेहनत और हौसले के दम पर इतिहास रच सकता है।  औसग्राम जैसे क्षेत्र में, जहां लंबे समय से पारंपरिक राजनीति का असर रहा है, वहां कलिता माझी की जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का संकेत भी मानी जा रही है. यह जीत उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं। 

अग्नि-4 मिसाइल का परीक्षण हो सकता है बंगाल की खाड़ी में, NOTAM जारी

 नई दिल्ली भारत सरकार ने बंगाल की खाड़ी में लंबी दूरी की मिसाइल परीक्षण के लिए NOTAM (Notice to Airmen) जारी किया है. यह चेतावनी 25 अप्रैल से 6 मई 2026 तक लागू रहेगी. NOTAM में करीब 3550 किलोमीटर लंबा खतरे का इलाका घोषित किया गया है।  रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान अग्नि-4 मिसाइल का परीक्षण किया जा सकता है. यह परीक्षण ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के आसपास होने जा रहा है, जिससे यह परीक्षण सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक संदेश भी देने वाला माना जा रहा है. अग्नि-4 मिसाइल की विशेषताएं  अग्नि-4 भारत की महत्वपूर्ण मिसाइलों में से एक है. यह एक Intermediate Range Ballistic Missile (IRBM) है।      रेंज: 3500 से 4000 किलोमीटर       वजन: लगभग 17 टन       लंबाई: करीब 20 मीटर       ईंधन: सॉलिड फ्यूल (ठोस ईंधन)       चरण: दो चरण वाली मिसाइल        वॉरहेड: 1000 किलोग्राम तक का परमाणु या पारंपरिक हथियार ले जा सकती है.       विशेषता: बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता और मोबाइल लॉन्चर पर चलने वाली मिसाइल।  अग्नि-4 भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह रेल और सड़क दोनों जगहों से लॉन्च की जा सकती है, जिससे दुश्मन को इसे पहले से नष्ट करना बहुत मुश्किल होता है।  क्यों जारी किया गया NOTAM? NOTAM जारी करके भारत ने पायलटों और जहाजों को चेतावनी दी है कि वे तय क्षेत्र में न जाएं. यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में है, जो अग्नि-4 जैसी मिसाइल के परीक्षण के लिए उपयुक्त है. रक्षा सूत्रों के अनुसार, फ्लाइट पाथ और खतरे वाले क्षेत्र की दूरी अग्नि-4 की क्षमता से बिल्कुल मेल खाती है।  ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर परीक्षण का मतलब ऑपरेशन सिंदूर मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर किया गया था. अब ठीक एक साल बाद यह मिसाइल परीक्षण हो रहा है. हालांकि रक्षा मंत्रालय ने इसे आधिकारिक रूप से वर्षगांठ से जोड़ा नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह परीक्षण भारत की सैन्य तैयारियों और मजबूती का संदेश देगा।  भारत की मिसाइल क्षमता बढ़ रही है हाल के महीनों में भारत ने अपनी मिसाइलों के परीक्षण तेज कर दिए हैं. अग्नि सीरीज के अलावा K-4 (सबमरीन से लॉन्च होने वाली), हाइपरसोनिक मिसाइल LRAShM और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के 800 किलोमीटर रेंज वाले वर्जन का परीक्षण चल रहा है।  ब्रह्मोस का नया वर्जन 2027 तक भारतीय सेना में शामिल होने वाला है. इन सभी परीक्षणों से साफ है कि भारत अपनी रक्षा क्षमता को लगातार आधुनिक और मजबूत बना रहा है।  क्यों जरूरी है अग्नि-4 जैसी मिसाइल? अग्नि-4 चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के किसी भी हिस्से को निशाना बना सकती है. यह मिसाइल भारत को क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस नीति को मजबूत करती है. ठोस ईंधन होने के कारण इसे जल्दी लॉन्च किया जा सकता है. दुश्मन के रडार से बचना भी आसान होता है।  बंगाल की खाड़ी में जारी NOTAM और अग्नि-4 का संभावित परीक्षण भारत की सैन्य ताकत और तैयारियों को दर्शाता है. ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर यह परीक्षण रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. भारत लगातार अपनी मिसाइल तकनीक को बेहतर बना रहा है ताकि देश की सुरक्षा अटूट बनी रहे। 

कर्मचारियों के लिए खुशखबरी: 8वें वेतन आयोग से सैलरी 283% तक बढ़ सकती है

नई दिल्ली केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग को लेकर एक बड़ी खबर है। नेशनल काउंसिल (JCM) के स्टाफ साइड ने सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए 3.83 के फिटमेंट फैक्टर की मांग की है। अगर यह मांग मंजूर हो जाती है, तो कर्मचारियों की न्यूनतम मूल सैलरी और पेंशन में 283% तक का ऐतिहासिक उछाल आ सकता है। क्या है 3.83 फिटमेंट फैक्टर और इससे कितनी बढ़ेगी सैलरी? फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक है, जिससे मौजूदा बेसिक सैलरी को गुणा किया जाता है। 7वें वेतन आयोग में यह फैक्टर 2.57 था। अब JCM ने इसे बढ़ाकर 3.83 करने की मांग रखी है। अगर मांग मान ली जाती है तो मौजूदा न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 × 3.83 = ₹68,940 हो जाएगा। वहीं, न्यूनतम पेंशन ₹9,000 से बढ़कर ₹34,470 हो जाएगा। यानी सैलरी और पेंशन दोनों में 283% की बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन यह सिर्फ कर्मचारियों की मांग है, अंतिम फैसला सरकार करेगी। क्या वाकई 283% बढ़ोतरी मिलेगी? हालांकि, 283% का आंकड़ा काफी चर्चा में है, लेकिन पिछले अनुभवों से समझा जा सकता है कि सरकार आमतौर पर कर्मचारियों की मांग से कम फिटमेंट फैक्टर तय करती है। एक्सपर्ट्स के अनुमान के अनुसार, सरकार 1.8 से 2.86 के बीच फिटमेंट फैक्टर लागू कर सकती है। ऐसे में असली बढ़ोतरी करीब 13% से 35% के बीच रहने की संभावना है, न कि 283%। फिर भी, यह केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ा फायदा होगा। कर्मचारियों की अन्य प्रमुख मांगें क्या हैं? JCM ने सिर्फ सैलरी बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा है। उनकी अन्य प्रमुख मांगों में ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की बहाली, वेतन स्तरों को घटाकर सिर्फ 7 लेवल करना, हाउस रेंट अलाउंस (HRA) 30% करना, सालाना इंक्रीमेंट 3% से बढ़ाकर 6% करना, और 30 साल की सेवा में कम से कम 5 प्रमोशन सुनिश्चित करना शामिल है। इन मांगों पर सरकार का फैसला अभी बाकी है। कब बना 8वां वेतन आयोग और कब मिलेगा फायदा? 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा जनवरी 2025 में हुई थी। 3 नवंबर 2025 को इसका औपचारिक गठन किया गया। आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 18 महीने का समय मिला है। उम्मीद है कि सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएंगी, भले ही औपचारिक लागू होने में देरी हो। संभावित तारीखों के अनुसार, कर्मचारियों को 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक बढ़ी हुई सैलरी और पेंशन मिलना शुरू हो जाएगा। 7वां और 8वां वेतन आयोग में तुलना अगर 7वें वेतन आयोग की बात करें, तो उसमें फिटमेंट फैक्टर 2.57 था, जिससे न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 और अधिकतम ₹2,50,000 था। वहीं 8वें वेतन आयोग के लिए प्रस्तावित 3.83 फैक्टर से न्यूनतम मूल वेतन ₹68,940 हो सकता है। हालांकि, एक्सपर्ट्स अनुमान बताते हैं कि असली फैक्टर 2.86 के आसपास हो सकता है, जिससे न्यूनतम वेतन करीब ₹51,480 बनता है। क्या पेंशनर्स को भी फायदा होगा? जी हां, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें सभी केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स पर समान रूप से लागू होंगी। जिस फिटमेंट फैक्टर से सक्रिय कर्मचारियों की सैलरी बढ़ेगी, उसी फैक्टर से पेंशनभोगियों की पेंशन भी बढ़ाई जाएगी। साथ ही, पिछली तारीख (1 जनवरी 2026) से एरियर भी दिया जाना संभव है।

नई सरकार के शपथ ग्रहण में 9 मई की तारीख क्यों है शुभ, BJP का फैसला

कोलकाता  भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में शानदार जीत दर्ज पूर्वी भारत के उस अहम गढ़ में प्रवेश कर लिया. इस शानदार जीत के बाद बीजेपी ने नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए 9 मई की तारीख तय की है. ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि बीजेपी ने इस दिन का चयन क्यों किया है. बताया जा रहा है कि बुधवार को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह कोलकाता आएंगे. वह यहां बीजेपी के जीते हुए विधायकों से बातचीत करेंगे जिसके बाद विधायक दल का नेता और बंगाल के नये मुख्यमंत्री के नाम का फैसला होगा  बंगाल के लिए खास है 9 तारीख दरअसल, 9 मई को गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती होती है. बंगाल की संस्कृति से रविंद्र नाथ टैगोर के संगीत और साहित्य का क्या महत्व है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान तृणूमल कांग्रेस और ममता बनर्जी यही आरोप लगाती रहीं कि बीजेपी सत्ता में आते ही बंगाल की संस्कृति से खिलवाड़ करेगी. ऐसे बीजेपी नई सरकार के गठन के लिए रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती का दिन चुना है, ताकि वह टीएमसी के आरोपों का जवाब दे सके कि बीजेपी बंगाल की सभ्यता और संस्कृति का कितना ख्याल करती है. पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने भी 9 मई की तारीख पर मुहर लगाई है  बंगाल में बीजेपी की जीत है खास पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह निर्णायक जीत सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ममता बनर्जी के लंबे वर्चस्व को बड़ा झटका देते हुए राज्य की राजनीति को नया स्वरूप दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘जनता की शक्ति और सुशासन की जीत’ बताया. 2014 में सीमित उपस्थिति से शुरू हुई भाजपा की यात्रा 2019 में उभार, 2021 में चुनौतियों और अब 2026 में स्पष्ट जनादेश तक पहुंची है।  यह जीत राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की मजबूत होती राजनीतिक पकड़ को भी दर्शाती है. पार्टी ने अपनी रणनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ रोकने, सीमा बाड़बंदी, सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा, सीएए और यूसीसी जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. साथ ही, कानून-व्यवस्था, औद्योगिक विकास, महिलाओं की सुरक्षा और केंद्र की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।  प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह जैसे शीर्ष नेताओं के आक्रामक प्रचार ने सत्ता विरोधी लहर को मजबूत किया. हालांकि, जीत के बाद भाजपा के सामने ध्रुवीकृत समाज, क्षेत्रीय पहचान और तृणमूल कांग्रेस के मजबूत विपक्ष जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी।  इसके बावजूद, यह परिणाम एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है, जिसने भाजपा को चुनौती देने वाली पार्टी से सत्तारूढ़ शक्ति में बदल दिया है और बंगाल की राजनीति को नए दौर में पहुंचा दिया है। 

पाकिस्तानी नेता शाहीर सियालवी का ऐलान: सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर के लिए लड़ा ऑपरेशन

लाहौर  पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में छिपे आतंकियों के ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. अब इस ऑपरेशन के एक साल बाद पाकिस्तान से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के एक नेता ने खुलेआम स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों के लिए लड़ाई लड़ी थी. यह बयान आतंकियों की एक बैठक में दिया गया, जिसने पाकिस्तान की असली नीति को एक बार फिर उजागर कर दिया है।  क्या कहा पाक नेता ने? लश्कर-ए-तैयबा के एक कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता शाहीर सियालवी ने कहा… पहली बार पाकिस्तान की सेना ने हाफिज सईद और मसूद अजहर के लिए लड़ाई लड़ी. उन्होंने यह भी माना कि भारत ने 10 मई को मुरीदके (लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय) और बहावलपुर (जैश-ए-मोहम्मद का केंद्र) में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था. इन हमलों में कई आतंकवादी मारे गए थे।  पाकिस्तान ने बदली रणनीति सियालवी के अनुसार, हमलों के बाद पाकिस्तान ने दुनिया को गुमराह करने के लिए अपनी रणनीति बदल दी. आतंकियों के जनाजे की नमाज, मौलवी या मुफ्ती से नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के धार्मिक अधिकारी ने पढ़ाए. पाकिस्तानी सैनिक वर्दी पहनकर इन आतंकियों के शव लेकर निकले. इसका मकसद था दुनिया को यह दिखाना कि मारे गए आतंकी नहीं, बल्कि आजादी के लड़ाके थे।  आतंकियों की महफिल में खुलासा यह बयान लश्कर-ए-तैयबा के कार्यक्रम में दिया गया, जिसमें अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी मुजम्मिल इकबाल हाशमी भी मौजूद था. इस बैठक में पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के बीच गहरे संबंध साफ दिखाई दिए।  पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान के अंदर लश्कर और जैश के मुख्य ठिकानों पर सटीक हमले किए थे. भारत का कहना था कि आतंकियों को सबक सिखाने के लिए जरूरी था।  इस खुलासे का मतलब यह बयान साबित करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ दिखावा करता है. हकीकत में उसकी सेना कुछ खास आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं की खुलेआम मदद कर रही है. हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को पाकिस्तान अपनी सुरक्षा समझता है।  पाकिस्तान की यह नीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके लिए शर्मनाक है. दुनिया के सामने उसकी दोहरी नीति को फिर से उजागर करती है. ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद पाकिस्तान के नेता का यह बयान भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन दुनिया के लिए यह सबूत है कि पाकिस्तान आतंकवाद को राज्य नीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।  भारत लगातार कहता रहा है कि पाकिस्तान आतंकियों का समर्थन करता है. अब खुद पाकिस्तान के लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। 

अमेरिका की ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ तैनाती के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में नौसैनिक तनाव और गहराया

अबू धाबी/तेल अवीव  ईरान ने सोमवार शाम को संयुक्त अरब अमीरात और ओमान की राजधानियों पर मिसाइल और ड्रोन हमले के बाद एक बार फिर मिडिल ईस्ट जंग के मुहाने पर पहुंच गया है। इन हमलों के बाद इजरायल के लिए खतरा बढ़ गया है। विश्लेषकों का कहना है इजरायल जल्द ही एक बार फिर ईरान के निशाने पर हो सकता है। विश्लेषक ईरान के हमलों को उसी तैयारी की पृष्ठभूमि में देखते हैं। यह हमले ऐसे समय में हुए जब अमेरिका ने अपने दो विध्वंसक जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से होते हुए फारस की खाड़ी में भेजा है। ट्रंप ने प्रोजेक्ट फ्रीडम की घोषणा की है, जो सोमवार को शुरू हुआ है। इसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को जहाजों के लिए खोलना है। इसके पहले अमेरिका ने युद्धविराम का इस्तेमाल करते हुए एक विशाल नौसैनिक, हवाई और जमीनी सेना तैयार कर ली है। ईरान को किस बात का खौफ? तेहरान समझ गया है कि अगर अमेरिका होर्मुज को कमर्शियल जहाजों के लिए आंशिक रूप से भी खोलने में कामयाब हो जाता है, तो ईरान बातचीत में अपनी मोलभाव करने की ताकत खो देगा। इसके अलावा उसे ऐसी शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी जो उसके शासन के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है। अमेरिका नेवी के विध्वसंक जहाज अब ईरानी तट और जहाजों के बीच खड़े हैं और उन पर होने वाले हर हमले का जवाब देने को तैयार हैं। इसमें मिसाइल-जैमर सिस्टम के साथ सेंट्रल कमांड के टोही विमान और ड्रोन तैनात किया है। ये विध्वंसक जहाजों के ऊपर गश्त करते हुए दुश्मन के हर लॉन्च का पता लगाते हैं और उस पर हमला करते हैं। अमेरिकी सेना ने कहा है कि उसने ईरान की छह स्पीडबोट्स को डुबो दिया है। UAE पर तेहरान ने क्यों किया हमला? ईरान समझता है कि ऐसे किसी भी टकराव में ईरान के सफल होने की संभावना नहीं है। यही कारण है कि तेहरान ने खाड़ी देशों पर पहले हमला करने का फैसला किया। सबसे पहले UAE को निशाना बनाया, जो खाड़ी देशों के बीच ईरान के विरोध का नेतृत्व करता है। तेहरान के पास UAE की तेल सुविधाओं और बंदरगाहों पर हमला करने की असीमित क्षमता मौजूद है। UAE में इजरायली एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका और इजरायल ने हाल ही में UAE की मिसाइल और ड्रोन रक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर काम किया है। इनमें इजरायल के आयरन डोम और लेजर वेपन आयरन बीम की UAE में तैनाती अहम है। इसके बावजूद अमीरात का तेल उद्योग ईरान के हमले के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। इजरायली विश्लेषकों का कहना है कि UAE और ओमान पर किए गए हमले अभी बस एक शुरुआत हैं। तेहरान इस बात को समझता है कि अगर वह इस अभियान में हार जाता है और ईरान पर ट्रंप की घेराबंदी जारी रहती है, तो ईरान के इस्लामिक शासन के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगेगा।

5 राज्यों के चुनावों में कांग्रेस की जीत का पैटर्न: ज्यादातर विजेता मुस्लिम उम्मीदवार

 नई दिल्ली हालिया विधानसभा चुनावों को लेकर सामने आए आंकड़ों में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिला है. असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कांग्रेस के जिन उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम नेताओं की रही।  असम में 19 सीटों में 18 पर जीत असम में कांग्रेस को मिली 19 सीटों में से 18 पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. पार्टी ने वहां 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 18 जीत गए, जबकि गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में सिर्फ एक ही जीत सका. कांग्रेस के सहयोगी राइजर दल को भी 2 सीटें मिलीं, जिनमें एक मुस्लिम उम्मीदवार और दूसरी सीट अखिल गोगोई ने जीती।  केरल में 35 मुस्लिम विधायक केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में 35 मुस्लिम विधायक चुने गए, जिनमें से 30 कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन से हैं. इनमें 8 कांग्रेस और 22 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के विधायक शामिल हैं।  पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दो सीटें मिलीं और दोनों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते. यहां कांग्रेस ने 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जो तृणमूल कांग्रेस के 47 उम्मीदवारों से ज्यादा है. तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से एक जीतने में सफल रहा।  मुस्लिम उम्मीदवारों का जीत प्रतिशत 80 रहा सूत्रों का कहना है कि असम और केरल में कांग्रेस गठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत दर करीब 80 फीसदी रही. वहीं, पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल करते हुए 15 साल पुरानी टीएमसी सरकार को हटा दिया. असम में भी एनडीए तीसरी बार सरकार बनाने जा रहा है, जहां उसने 126 में से 102 सीटें जीतीं।  तमिलनाडु में अभिनेता-राजनेता विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि केरल में 10 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन फिर से सरकार बनाने जा रहा है।  केरल में भाजपा को तीन सीट केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीन सीटें जीतकर राज्य में अपना सूखा खत्म किया, लेकिन कई सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही. मतगणना के बाद बीजेपी तिरुवल्ला, पालक्काड, मलमपुझा, अट्टिंगल, कासरगोड और मंजेश्वर सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. तिरुवल्ला में पार्टी के नेता अनूप एंटनी को 43,078 वोट मिले और वह करीब 10 हजार वोटों से हार गए, लेकिन यहां पार्टी का वोट शेयर पहले से बढ़ा है।  पालक्काड में वरिष्ठ नेता शोभा सुरेंद्रन को कड़े मुकाबले में यूडीएफ के रमेश पिशारोड़ी से करीब 13 हजार वोटों से हार मिली, हालांकि यहां भी बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा. अट्टिंगल में पी. सुधीर दूसरे स्थान पर रहे और उन्होंने भी पार्टी का वोट शेयर बढ़ाया।  वहीं मलमपुझा, कासरगोड और मंजेश्वर में बीजेपी उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन इन सीटों पर पार्टी अपने वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी नहीं कर पाई. कुल मिलाकर, बीजेपी ने सीटें भले कम जीती हों, लेकिन कई क्षेत्रों में अपने जनाधार को मजबूत करने के संकेत दिए हैं।  चुनाव नतीजों के अनुसार, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 140 में से 102 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की, जबकि सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले एलडीएफ को 35 सीटों पर संतोष करना पड़ा। 

ममता बनर्जी का केंद्र और भाजपा पर हमला, चुनाव आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल

नई दिल्ली  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में घमासान तेज हो गया है। 5 मई 2026 को कार्यवाहक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamta Banerjee Press Conference) ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे इस्तीफा नहीं देंगी। ममता ने कड़े शब्दों में कहा, "मेरे इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। हम चुनाव हारे नहीं हैं, हमें साजिश के तहत हराया गया है। मैं लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं दूंगी, क्योंकि नैतिक तौर पर जीत हमारी हुई है।" '100 सीटें लूटी गईं और 90 लाख नाम काटे गए' ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने चुनाव आयोग का औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। सीएम ममता के अनुसार, "हमारी 100 सीटें लूट ली गईं और 90 लाख मतदाताओं के नाम जानबूझकर मतदाता सूची (SIR) से हटा दिए गए। भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर एक गंदा और घटिया खेल खेला है, जिसे मैंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कभी नहीं देखा।" EVM और चुनाव आयोग पर उठाए गंभीर सवाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को 'खलनायक' करार दिया। उन्होंने EVM की कार्यप्रणाली पर संदेह जताते हुए कहा, "वोटिंग के बाद EVM मशीन 80-90% चार्ज कैसे रह सकती है? आमतौर पर यह 40% से नीचे होती है। चुनाव से दो दिन पहले हमारे लोगों को गिरफ्तार किया गया, IPS और IAS अधिकारियों को बदल दिया गया और भाजपा की पसंद के अधिकारियों को तैनात किया गया।" उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना केंद्रों पर उन्हें धक्का देकर बाहर निकाला गया और उनके एजेंटों के साथ मारपीट की गई। 'इंडी' गठबंधन के साथ की मजबूती और भविष्य की रणनीति हार के बावजूद ममता बनर्जी ने विपक्षी एकजुटता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव समेत 'इंडी' गठबंधन के तमाम नेताओं ने उन्हें फोन कर अपना समर्थन दिया है। ममता ने कहा, "अखिलेश यादव कल कोलकाता आ रहे हैं। आने वाले दिनों में हमारी एकजुटता और मजबूत होगी। मेरा लक्ष्य साफ है – मैं अब एक 'आजाद पंछी' की तरह पूरे देश में इंडी गठबंधन को मजबूत करने का काम करूँगी।" 'कुर्सी की मोहताज नहीं, मैं एक आजाद पंछी हूं' ममता ने भावुक होते हुए कहा कि उन्होंने पिछले 15 वर्षों में न तो पेंशन ली और न ही तनख्वाह का एक पैसा निकाला। उन्होंने कहा, "अब मेरे पास कोई कुर्सी नहीं है, इसलिए मैं एक आम आदमी हूं। अब कोई यह नहीं कह सकता कि मैं सत्ता का इस्तेमाल कर रही हूँ। मैंने अपनी पूरी जिंदगी लोगों की सेवा में लगा दी है और अब मैं जनता के बीच जाकर इस अन्याय के खिलाफ लड़ूंगी।"

सत्ता की जंग तेज: बंगाल में मुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चाएं, अमित शाह को जिम्मेदारी

नई दिल्ली बंगाल और असम में भाजपा को प्रचंड जीत मिली है। इसके बाद अब सरकार बनाने की कवायद तेज हो गई है। भाजप ने गृहमंत्री अमित शाह को पश्चिम बंगाल के लिए और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा को असम के लिए विधायक दल के नेता के चयन के लिए केंद्रीय प्रर्यवेक्षक नियुक्त किया है। भाजपा आलाकमान ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लेते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को पश्चिम बंगाल का 'पर्यवेक्षक' और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को सह पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा को असम के पर्यवेक्षक और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को सह पर्यवेक्षक बनाया गया है। बंगाल में 9 मई को होगा नए सीएम का शपथग्रहण बंगाल बीजेपी अध्यक्ष ने घोषणा की है कि 9 मई को होगा शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जाएगा। मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इस बात की उम्मीद जताई जा रही है कि ममता बनर्जी को हराने वाले सुवेंदु अधिकारी बंगाल के अगले सीएम हो सकते हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री फेस को लेकर अभी भी सस्पेंस बरकरार है। जिसका फैसला गृहमंत्री अमित शाह कर सकते हैं.  

सरकारी अस्पताल में छापा, ऑपरेशन थिएटर से मिला सोना और नकदी

 साउथ 24 परगना पश्चिम बंगाल के साउथ 24 परगना जिले में एक सरकारी अस्पताल से भारी मात्रा में कैश और सोना मिलने के बाद हड़कंप मच गया है. इस मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है, जहां बीजेपी ने टीएमसी नेताओं पर अवैध संपत्ति छिपाने का आरोप लगाया है. घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है और पुलिस जांच में जुट गई है।  मामला साउथ 24 परगना के जिबंतला थाना क्षेत्र के माथेरदिघी ग्रामीण अस्पताल का है, जहां ऑपरेशन थिएटर से भारी मात्रा में कैश और सोने के गहने बरामद किए गए. मंगलवार सुबह इस घटना का खुलासा हुआ, जब अस्पताल के अंदर एक संदिग्ध बैग देखा गया. इस बैग को देखकर स्थानीय लोगों और अस्पताल स्टाफ को शक हुआ. जब बैग को खोला गया, तो उसके अंदर बड़ी मात्रा में नकदी, सोने के आभूषण और जमीन से जुड़े दस्तावेज मिले. इस घटना के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई।  बताया जा रहा है कि अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर जैसे संवेदनशील स्थान पर इतनी बड़ी मात्रा में अवैध संपत्ति का मिलना बेहद चौंकाने वाला है. आमतौर पर इस जगह पर मरीजों का इलाज होता है, लेकिन वहां इस तरह का बैग मिलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई साधारण मामला नहीं है और इसमें बड़े स्तर पर गड़बड़ी की आशंका है. घटना के बाद अस्पताल प्रशासन भी सवालों के घेरे में आ गया है।  इस पूरे मामले में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने बड़ा आरोप लगाया है. उनका दावा है कि यह अवैध संपत्ति टीएमसी के एक नेता के करीबी व्यक्ति की है. बीजेपी का कहना है कि साउकत मोल्ला के करीबी माने जाने वाले हुसैन गाजी ने इस संपत्ति को अस्पताल में छिपाकर रखा था. जैसे ही यह मामला सामने आया, बीजेपी कार्यकर्ता मौके पर पहुंच गए और उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. उन्होंने अस्पताल के इंचार्ज डॉक्टर को भी घेर लिया।  बीजेपी कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के कारण अस्पताल परिसर में तनाव का माहौल बन गया. सूचना मिलने के बाद जिबंतला थाने की पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को संभालने की कोशिश की. पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है. इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया है. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि यह कैश और सोना आखिर किसका है।  दूसरी तरफ, अस्पताल के डॉक्टर शाहरुख खान ने बीजेपी के आरोपों को लेकर अलग ही दावा किया है. उन्होंने बताया कि यह बैग समसेर मीर नाम के युवक का है, जो स्थानीय टीएमसी बूथ अध्यक्ष का बेटा है. डॉक्टर के मुताबिक, समसेर मीर अस्पताल में अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम करता है. उनका कहना है कि बैग अस्पताल में उसी ने छोड़ा था, हालांकि इसके पीछे की असली वजह क्या है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है।  इस मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है. बीजेपी लगातार टीएमसी पर हमला बोल रही है और इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है. पार्टी का कहना है कि यह भ्रष्टाचार का बड़ा मामला है और इसमें कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं. वहीं, टीएमसी की ओर से अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, जिससे सियासी विवाद और बढ़ गया है।  फिलहाल, पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी हुई है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि अस्पताल में इतनी बड़ी मात्रा में कैश और सोना कैसे पहुंचा. साथ ही, जमीन से जुड़े दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है. इस घटना ने न सिर्फ अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है. आने वाले दिनों में जांच के बाद इस मामले में कई बड़े खुलासे हो सकते हैं।