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दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन पर खतरा, भारत और चीन के लिए मलक्का का महत्व

नई दिल्ली ईरान में जारी जंग ने पूरी वैश्विक सप्लाई चैन की पोल खोल दी है। एक समुद्री रास्ते के बंद हो जाने से तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा संकट का सामना कर रही हैं। तमाम उद्योग-धंधे बंद होने की कगार पर हैं, तो वहीं परिवहन भी महंगा हो रहा है। होर्मुज ही नहीं ये 4 स्ट्रेट्स भी हैं ग्लोबल सप्लाई की लाइफलाइन, एक पर भारत का कंट्रोल पश्चिम एशिया की जंग में लगभग सभी देशों को ऊर्जा संकट में झोंक दिया है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह हालात किसी बुरे सपने से कम नहीं है। हालांकि, सरकार लगातार दूसरे देशों से तेल और गैस की सप्लाई सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के झटके से उबरना आसान नहीं है। भारत के अलावा यूरोप समेत तमाम देश भी इस बंद से परेशान है। एक 33 किमी चौड़े समुद्री मार्ग के बंद होने ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई को पोल खोल कर रख दी है। हालात यह हैं कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। ऐसे समय में दुनिया की नजर उन पांच प्रमुख स्ट्रेट्स पर पड़ी है, जहां से करीब 60 फीसदी ऊर्जा की सप्लाई होती है। इनमें से अगर किसी एक पर भी कोई परेशानी होती है, तो पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई ठप होने की नौबत आ सकती है।     मलक्का स्ट्रेट हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला 'मलक्का स्ट्रेट' दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री जलमार्ग है। चीन जैसे देश, जो दुनिया की फैक्ट्री माने जाते हैं, उसका ज्यादातर तेल भंडार यहीं से सप्लाई होता है। दुनिया के कुल तेल परिवहन का करीब 22 से 29 फीसदी हिस्सा इसी रास्ते से होकर जाता है। इस रास्ते पर भारतीय जल सेना का प्रभुत्व है। चीन से यु्द्ध की स्थिति में भारतीय सेना इस रास्ते को बंद कर चीन की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकती है। भारत के लिए भी यह रास्ता आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आम तौर पर यह स्ट्रेट शांत और सुरक्षित रहता है, लेकिन कई बार समुद्री डकैतों से जहाजों को सामना हो जाता है। 2025 में इस क्षेत्र में समुद्री डकैती के बड़े मामले सामने आए थे। हालांकि, हिंद महासागर में सबसे बड़ी नौसेना होने के नाते भारतीय जलसेना इनका सामना करती है।  स्वेज नहर यूरोप और अमेरिका को एशिया से जोड़ने के लिए बनाई गई स्वेज नहर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री जलमार्गों में से एक है। तमाम जरूरी सामानों के साथ यह 7 से 10 फीसदी वैश्विक तेल व्यापार को भी नियंत्रित करता है। इस कैनाल को लेकर इतिहास में कई लड़ाइयां हुई हैं, लेकिन अब वैश्विकरण की स्थिति में सभी देश इसको खुले रखने पर ही सहमत हुए हैं। हालांकि, कई बार लाल सागर में अस्थिरता और 2021 में हुई कैनाल ब्लॉकेज जैसी समस्याओं ने दुनिया को परेशान किया है। इसके बाद भी यह नहर सुचारू रूप से चालू रही है। अगर यह नहर किसी भी वजह से अस्थिर हो जाती है या बंद हो जाती है, तो इसके विकल्प के तौर पर जहाजों को पूरे अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाना होगा। यह रास्ता काफी खर्चीला और समय लेने वाला सिद्ध होगा। बाव-अल-मंडेब होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिण बाव-अल-मांडेब है। यह समुद्री रास्ता लाल सागर को अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब और खाड़ी देशों से घिरा यह समुद्री मार्ग होर्मुज की तरह ही अपना एक अलग महत्व रखता है। होर्मुज के बंद होने की स्थिति में इस मार्ग से जलपरिवहन बढ़ गया है। सामान्य दिनों में यहां से 10 से 12 फीसदी वैश्विक तेल को सप्लाई किया जाता है। वैसे तो यह जलमार्ग एक सुरक्षित रास्ता माना जाता रहा है। लेकिन ईरान समर्थित हूती विद्रोही लगातार यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करते रहते हैं। अभी ईरान युद्ध के समय भी हूतियों ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करने की धमकी दी थी। तुर्किए स्ट्रेट काले सागर को भूमध्य सागर से जोड़ता है। एशिया और भारत के लिए यह रास्ता इसलिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि होर्मुज बंद की स्थिति में भारत रूस से अपने कच्चे तेल का आयात करता है। रूस से आने वाले ज्यादातर तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। इसके अलावा यह स्ट्रेट भले ही ज्यादा महत्वपूर्ण न हो, लेकिन इसका क्षेत्रीय महत्व बहुत ज्यादा है। इस समुद्री रास्ते के जरिए प्रतिदिन 2 से 3 बैरल प्रतिदिन सप्लाई होता है।  होर्मुज स्ट्रेट होर्मुज स्ट्रेट आज दुनिया का सबसे चर्चित समुद्री रास्ता है। वैश्विक राजनीति पिछले कई दशक से इस रास्ते पर ही केंद्रित रही है। यूएई, कतर, सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण और दुनिया की आर्थिक तरक्की के लिए जरूरी यह स्ट्रेट सामान्य स्थिति में प्रतिदिन 20 से 22 मिलियन बैरल सप्लाई करता है। एशिया से लेकर यूरोप तक लगभग हर देश इस स्ट्रेट पर किसी न किसी तरीके से निर्भर है। ऐसी स्थिति में यह दुनिया का सबसे बड़ा चोकप्वाइंट बन जाता है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की तरफ से किए गए हमले के बाद ईरान ने इसी रास्ते को बंद कर दिया है। इसके बंद होते ही, कच्चे तेल के बाजार में उफान आ गया और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गईं।

दुश्मन के इलाके में छिपे जांबाज को अमेरिका ने बचाया, भारी गोलाबारी और हवाई हमलों के बीच चला ऑपरेशन

नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच अमेरिका ने एक बेहद खतरनाक और मुश्किल सैन्य ऑपरेशन को अंजाम देते हुए अपने वायु सैनिक को ईरान की जमीन से सुरक्षित बाहर निकाल लिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इसकी पुष्टि करते हुए इसे अमेरिकी इतिहास के सबसे साहसी रेस्क्यू मिशनों में से एक बताया है. यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिकी एयरफोर्स का F-15E स्ट्राइक ईगल शुक्रवार को ईरान के दक्षिणी इलाके में मार गिराया गया. विमान में दो क्रू मेंबर थे. एक पायलट और दूसरा वेपन सिस्टम्स ऑफिसर. दोनों ने समय रहते इजेक्ट कर लिया और जमीन पर उतरने के बाद एक-दूसरे से संपर्क भी बनाए रखा. पायलट को तो कुछ ही घंटों में रेस्क्यू कर लिया गया, लेकिन दूसरे क्रू मेंबर को ढूंढना बेहद मुश्किल हो गया. वह पहाड़ी इलाके में छिपकर ईरानी सुरक्षाबलों से बचता रहा. करीब एक दिन से ज्यादा समय तक वह दुश्मन के इलाके में अकेला रहा, जहां हर पल पकड़े जाने का खतरा था. रेस्क्यू ऑपरेशन पर ट्रंप ने क्या कहा? ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस मिशन की जानकारी देते हुए लिखा, "हमने उसे ढूंढ निकाला." उन्होंने आगे कहा, "यह हमारे इतिहास के सबसे साहसी सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशनों में से एक है. यह बहादुर सैनिक दुश्मन के इलाके में, ईरान के खतरनाक पहाड़ों में छिपा हुआ था और दुश्मन उसे लगातार तलाश रहा था." ट्रंप ने पायलट की हालत के बारे में बताते हुए कहा, "उसे कुछ चोटें आई हैं, लेकिन वह बिल्कुल ठीक हो जाएगा." अमेरिका ने पायलट को कैसे किया रेस्क्यू? अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इस मिशन को अंजाम देने के लिए स्पेशल फोर्सेज की एक विशेष कमांडो यूनिट को भेजा गया. इस दौरान आसमान से भारी फायर कवर दिया गया और जरूरत पड़ने पर ईरानी बलों को रोकने के लिए एयरस्ट्राइक भी किए गए. बताया जा रहा है कि ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी बलों ने भारी गोलाबारी की, ताकि रेस्क्यू टीम सुरक्षित तरीके से सैनिक तक पहुंच सके. इस पूरे ऑपरेशन में अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) की भी अहम भूमिका रही. अधिकारियों के मुताबिक, CIA ने पहले एक "भ्रम फैलाने वाली रणनीति" अपनाई, जिसमें यह खबर फैलाई गई कि सैनिक को पहले ही ढूंढ लिया गया है. इसके साथ ही अपनी खास तकनीकी क्षमताओं के जरिए उसकी सटीक लोकेशन का पता लगाया गया और सेना को जानकारी दी गई. ईरान के देहदश्त शहर में बड़ी झड़पें हुईं इस दौरान IRGC भी उस इलाके में सक्रिय थी और वह भी अमेरिकी सैनिक को ढूंढने की कोशिश कर रही थी, ताकि उसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके. ऐसे में यह ऑपरेशन और भी ज्यादा जोखिम भरा हो गया था. अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज ने भारी सुरक्षा और फायर कवर के बीच इस मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और दोनों क्रू मेंबर्स को सुरक्षित बाहर निकाल लिया.

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट,भारत में ईंधन की सप्लाई पर्याप्त, अफवाहों और जमाखोरी पर कड़ा प्रहार

नई दिल्ली   सरकार ने एक बार फिर से देश के नागरिकों से पेट्रोल-डीजल या एलपीजी की पैनिक बायिंग यानी घबराहट में खरीदारी न करने की अपील की है. जारी बयान में सरकार ने कहा है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के बंद होने से जुड़ी रुकावटों के बावजूद देश में ईंधन की सप्लाई पर्याप्त और सुचारू बनी हुई है. इसमें भरोसा दिलाते हुए कहा गया है कि पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स से लेकर कुकिंग गैस तक बिना रुकावट के मिल रही है. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार को सरकार की ओर से नागरिकों से पेट्रोल, डीजल और LPG की घबराहट में खरीदारी करने से बचने की अपील की गई. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों और कुकिंग गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है. पैनिक बायिंग से बचने की अपील करने के साथ ही मंत्रालय की ओर से साफ हिदायत दी गई कि सिर्फ आधिकारिक जानकारी पर ही भरोसा करें और ऊर्जा बचाएं. बयान में साफ कहा गया कि सरकार ने घरेलू LPG और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई को खासतौर पर घरों, अस्पतालों और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए प्राथमिकता पर रखा है. इसके अलावा रिफाइनरी प्रोडक्शन बढ़ाकर डिमांड को मैनेज करने के लिए उपाय लागू किए गए हैं. इनमें LPG रिफिलिंग के बीच के समय को बढ़ाना भी शामिल है. जमाखोरी पर एक्शन जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल-गैस की जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ लगातार एक्शन जारी है. इसके तहत 3,700 से अधिक छापे मारे गए हैं और एलपीजी डिस्ट्रिब्यूटर्स को लगभग 1,000 कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं. इसके अलावा अब तक 27 डीलरों को निलंबित किया जा चुका है. मंत्रालय की ओर से आंकड़े पेश करते हुए कहा गया है कि जियो-पॉलिटिकल स्थिति के कारण सप्लाई पर दबाव है, लेकिन इसके बावजूद सेंटर्स पर एलपीजी की कमी की कोई रिपोर्ट नहीं की गई है. बीते शुक्रवार को करीब 51 लाख LPG Cylinder बांटे गए, जिनमें से ऑनलाइन बुकिंग कुल डिमांड का 95% था. 'पेट्रोल पंप पूरी तरह से भरे हैं' अन्य कदमों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई को होर्मुज संकट से पहले के स्तर के 70% तक सीमित कर दिया गया है. इसके अलावा डिमांड को पूरा करने के लिए केरोसिन और कोयले जैसे वैकल्पिक फ्यूल ऑप्शन का इस्तेमाल हो रहा है. इसके साथ ही मंत्रालय ने आगे कहा कि सभी रिफाइनरियां पर्याप्त कच्चे तेल के भंडार के साथ काम कर रही हैं, और देश भर के पेट्रोल पंप पूरी तरह से भरे हुए हैं.  

नौकरी छोड़ने या जाने पर कंपनी को करना होगा ये जरूरी काम, नए कानून में हुआ बदलाव

नई दिल्‍ली देश में नया लेबर कोड लागू हो चुका है. इस बीच, एक खास बदलाव हुआ है, जो हर कर्मचारियों के लिए महत्‍वपूर्ण है. दरअसल, अगर आप किसी कंपनी में नौकरी करते हैं और फिर उसे छोड़ देते हैं तो अब आपको सिर्फ 2 दिन के अंदर ही पूरा सेटलमेंट मिल जाएगा यानी कि नौकरी छोड़ने के दो दिनों में ही पैसे का सेटलमेंट कर दिया जाएगा।  अभी तक ज्‍यादातर नौकरी छोड़ने या निकाले जाने के बाद कर्मचारियों को अपना बकाया पैसा पाने के लिए 40 से 45 दिनों का समय लगता था, जिससे कर्मचारियों को काफी परेशानी उठानी पड़ती थी. यहां तक की घर का किराया देने या मंथली खर्च के लिए भी उन्‍हें दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता था. हालांकि अब ये परेशानी खत्‍म होने जा रही है. अब फुल सेटलमेंट 2 दिनों के अंदर ही कर दिया जाएगा. लेकिन कुछ शर्तों के तहत सेटलमेंट अभी भी 1 महीने तक लागू हो सकता है।   क्या है नया नियम? 1 अप्रैल 2026 से नए नियम के तहत कंपनियों को कर्मचारियों का फुल एंड फाइनल (FnF) सेटलमेंट सिर्फ 2 वर्किंग डेज के अंदर करना होगा. यह नियम Code on Wages, 2019 के तहत लागू किया गया है. नए कानून के तहत अगर कोई कर्मचारी नौकरी छोड़ता है या निकाला जाता है या कंपनी बंद हो जाती है तो इस कंडीशन में कंपनी को उसके सभी बकाया पेमेंट 2 वर्किंग दिवस के अंदर करना होगा. पहले इस प्रोसेस में 30 से 90 दिन का समय लग जाता है।  क्या है फुल एंड फाइनल सेटलमेंट? फुल एंड फाइनल सेटमेंट का मतलब है कि कर्मचारी को उसकी नौकरी खत्‍म होने पर मिलने वाले सभी बकाया पैसों का हिसाब और पेमेंट करना है. इसमें सिर्फ सैलरी ही शामिल नहीं होती है, बल्कि अन्‍य अलाउंस और सर्विसेज शामिल होती हैं।  क्‍या-क्‍या शामिल होता है?      वर्किंग डे के हिसाब से आखिरी महीने की सैलरी     बची हुई छुट्टियों का पैसा      परफॉर्मेंस के आधार पर मिलने वाला बोनस या इन्‍सेंटिव का पैसा     ऑफिस से जुड़े खर्च जैसे यात्रा या अन्य खर्चों का रिइम्बर्समेंट     टैक्स, एडवांस सैलरी, लोन या कंपनी के सामान वापस न करने पर कटौती ग्रेच्‍युटी कब दिया जाता है?  नए लेबर कोड में जो खास बदलाव किया गया है, उसमें अब एक साल की नौकरी के बाद भी ग्रेच्‍युटी का लाभ दिया जाएगा. पहले पांच साल की नौकरी करने के बाद ही ग्रेच्‍युटी दी जाती थी, लेकिन अब एक साल की नौकरी के बाद ही ग्रेच्युटी का लाभ कर्मचारियों को दिया जाएगा. कंपनी को इसे 30 दिन के अंदर ही देना होगा। 

ईरान संकट में भारत की ओर दौड़े पड़ोसी, अरबों बांटने वाला चीन क्यों है नदारद?

नई दिल्ली जब मुसीबत आती है, तो पता चलता है कि असली दोस्त कौन है. ईरान युद्ध के कारण जब दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई ठप होने लगी है, तो भारत के पड़ोसी देश चीन के अरबों रुपये के कर्ज को भूलकर अब नई दिल्ली की तरफ दौड़ रहे हैं. चीन भले ही पैसे बांटता हो, लेकिन जब किचन का चूल्हा जलाने और गाड़ियां चलाने के लिए तेल की जरूरत पड़ी, तो सबको सिर्फ भारत से ही आस है।  ईरान संघर्ष की वजह से स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है. ऐसे में नेपाल से लेकर श्रीलंका और मालदीव तक, सबके सामने अंधेरा छाने लगा है. न उन्‍हें तेल मिल पा रहा है और ना ही गैस. इन देशों को अब समझ आ गया है कि मुश्किल वक्त में भारत ही वह भरोसेमंद पार्टनर है जो उन्हें डूबने से बचा सकता है।  देश-दर-देश: किसने मांगी कितनी मदद? श्रीलंका: मोदी से बात की और मिल गया तेल श्रीलंका में हालात इतने खराब हैं कि स्कूल बंद करने पड़ रहे हैं. राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने खुद बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से बात की और तुरंत मदद मिल गई. भारत ने मार्च में 38,000 मीट्रिक टन डीजल और पेट्रोल श्रीलंका भेजा है. श्रीलंका ने इसके लिए भारत का दिल से आभार जताया है।  नेपाल: चूल्हा जलाने के लिए भारत पर निर्भर नेपाल में गैस की भारी किल्लत हो गई है. वहां लोग अब आधे सिलेंडर से काम चला रहे हैं. नेपाल ने भारत से मांग की है कि उसे हर महीने मिलने वाली 48,000 टन गैस के अलावा 3,000 टन और गैस दी जाए. नेपाल को पता है कि उसकी रसोई तभी जलेगी जब भारत से ट्रक रवाना होंगे।  बांग्लादेश: पाइपलाइन से पहुंची मदद बांग्लादेश भी डीजल के लिए भारत के आगे हाथ फैला रहा है. भारत पहले से ही उसे सालाना 1.8 लाख टन तेल देता है, लेकिन युद्ध के चलते सप्लाई कम हुई तो भारत ने पाइपलाइन के जरिए तुरंत हजारों टन डीजल और भेज दिया।  मालदीव: पुरानी कड़वाहट भूल मांगी मदद हाल के दिनों में रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद, मालदीव को जब अपनी ऊर्जा सुरक्षा की चिंता हुई तो वह भी भारत के पास ही आया है. मालदीव ने कम समय और लंबे समय, दोनों के लिए तेल सप्लाई की गुहार लगाई है, जिस पर भारत विचार कर रहा है।  मॉरीशस और सेशेल्स इन देशों से भी लगातार बातचीत जारी है. जैसे-जैसे ऊर्जा संकट बढ़ रहा है, ये देश भी भारत के साथ खड़े होने की तैयारी में हैं।  एक्सपर्ट्स बोले- चीन नहीं, भारत है असली लीडर विशेषज्ञों का कहना है कि चीन सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज का जाल बिछाता है, लेकिन जीवन की बुनियादी जरूरतों जैसे तेल, गैस, बिजली के लिए भारत की क्षमता और नियत दोनों साफ हैं. एशिया ग्रुप के अशोक मलिक के मुताबिक, इस मदद से भारत की साख पूरी दुनिया में बढ़ेगी।  भारत की अपनी चुनौतियां भले ही भारत सबको मदद दे रहा है, लेकिन वह खुद भी मुश्किलों से लड़ रहा है. भारत के 18 जहाज अब भी युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं जिन्हें निकालने की कोशिश जारी है. इसके बावजूद, भारत अपनी जरूरतें पूरी करते हुए पड़ोसियों का साथ छोड़ नहीं रहा है।  भारत एकतरफा नहीं सबसे बड़ी बात, भारत एकतरफा नहीं है. न तो वह पूरी तरह अमेर‍िका-इजरायल के साथ खड़ा दिखता है और ना ही ईरान के साथ. इसल‍िए पड़ोसी देशों को लगता है क‍ि भारत हर देश के साथ बात कर सकता है. हर देश के साथ जरूरत पड़ने पर हमारी मदद कर सकता है. यही भारत के लीडर बनने की कहानी है। 

होर्मुज पार कर भारत की ओर बढ़ा एलपीजी टैंकर ग्रीन सान्वी, मुंबई तक यात्रा कब पूरी होगी?

मुंबई  होर्मुज स्ट्रेट से भारत के लिए एक और अच्छी खबर आई है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारतीय झंडे वाला एलपीजी टैंकर ग्रीन सान्वी सफलतापूर्वक पार हो गया है. इस जहाज पर लगभग 44,000 मीट्रिक टन LPG है. टैंकर ने शुक्रवार को होर्मुज स्ट्रेट पार किया और अनुमान है कि यह 6 अप्रैल तक मुंबई पहुंच जाएगा. मार्च महीने में यह होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज है. अभी भी कई भारतीय तेल-गैस जहाज होर्मुज में फंसे हुए हैं और ईरानी क्लीयरेंस का इंतजार कर रहे हैं।  जहाज ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, ग्रीन सान्वी फारस की खाड़ी में खड़ा था और ईरान के समुद्री इलाके से होकर होर्मुज स्ट्रेट के पूरब में पहुंचा. इसके बाद यह मुंबई की ओर बढ़ रहा है. अनुमान है कि इस टैंकर में लगभग 44,000 मीट्रिक टन LPG है, जो पश्चिम एशिया युद्ध से पहले भारत की LPG खपत के आधे दिन के बराबर है. युद्ध के कारण सप्लाई में कमी आई है और देश में मौजूदा एलपीजी खपत कम है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगले कुछ दिनों में दो और एलपीजी टैंकर  ग्रीन आशा और जग विक्रम भी होर्मुज पार करके भारत आने की उम्मीद है।  होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, ग्रीन सान्वी ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज पार करने वाला सातवां भारतीय जहाज है. अब तक आने वाले सभी सात जहाज एलपीजी टैंकर ही थे. ग्रीन सान्वी के ट्रांजिट के साथ, फारस की खाड़ी में अब 17 भारतीय झंडे वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट के पूरब में हैं. भारत अभी भी होर्मुज स्ट्रेट से भारतीय जहाजों के सुरक्षित पास के लिए ईरान के साथ डिप्लोमैटिक बातचीत कर रहा है. ईरान ने होर्मुज बंद कर रखा है और अब टोल वसूल रहा है, लेकिन भारत से अच्छे संबंधों के कारण भारतीय जहाजों को छूट दी गई है।  केवल कुछ देशों को ही होर्मुज पार करने की अनुमति पिछले हफ्ते ईरान ने कहा था कि केवल अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगी देशों के अलावा मित्र देशों के जहाज ही ईरानी अधिकारियों के साथ तालमेल करके होर्मुज पार कर सकते हैं. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट उन देशों के लिए चालू है, जो ईरान के मित्र हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान के जहाजों को समुद्री चोकपॉइंट से पार करने की अनुमति दी गई है।  ग्रीन सान्वी ने कैसे पार किया होर्मुज होर्मुज पार करते समय ग्रीन सान्वी ने भारतीय जहाज होने का संकेत दिया, जिसमें भारतीय नाविक सवार थे. यह संकेत ईरानी अधिकारियों के साथ तालमेल बनाने का एक स्टैंडर्ड प्रक्रिया बन गया है. ईरान और ओमान के बीच संकरे पानी के रास्ते से जहाजों की आवाजाही को रेगुलेट किया जाता है. यह रास्ता फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और ग्लोबल एनर्जी फ्लो के लिए महत्वपूर्ण है. भारतीय जहाजों को इंडियन नेवी द्वारा एस्कॉर्ट भी किया जाता है।  पिछले हफ्ते आए दो एलपीजी टैंकर पिछले हफ्ते जग वसंत ने कांडला में 47,612 मीट्रिक टन LPG डिलीवर किया, जबकि पाइन गैस ने न्यू मंगलौर में 45,000 मीट्रिक टन LPG डिलीवर की. ये दोनों टैंकर भी होर्मुज पार करके भारत पहुंचे. दो और एलपीजी जहाज ग्रीन आशा और जग विक्रम अब स्ट्रेट पार करने के लिए रेडी हैं और इंडियन नेवी के निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं. 28 फरवरी से ईरान-अमेरिका युद्ध जारी है. अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था, जिसमें खामेनेई की मौत हुई. तब से होर्मुज बंद है। 

इकोनॉमिस्ट की चेतावनी: ‘युद्ध 40 दिन से ज्यादा चला तो…’ खाद्य कीमतें 6 महीने के हाई पर पहुंच सकती हैं

 नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East War) का असर लगभग हर देश में देखने को मिला है. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग के चलते होर्मुज बंद होने से पैदा हुए ग्लोबल तेल संकट (Oil Crisis) ने पाकिस्तान, बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका समेत अन्य देशों की चिंता बढ़ा दी. संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) फूड प्राइस इंडेक्स के आकंड़े देखें, तो युद्ध के चलते दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम छह महीने के हाई (Global Food Price Surge) पर पहुंच गए हैं।  आने वाले महीनों में बढ़ेगी टेंशन!  मार्च महीने में वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतें सितंबर 2025 के बाद से हाई लेवल पर पहुंच गईं. इससे आने वाले महीनों में किराने पर खर्च और उनके बिलों की स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा हुई हैं।  एफएओ के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी हुई है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में महंगाई के बढ़ते दबाव का संकेत है     . जरूरी चीजों के मूल्य का आकलन करने वाला मानक FAO Food Price Index बीते मार्च महीने में औसतन 128.5 अंक रहा, जो फरवरी से 2.4% और वार्षिक आधार पर 1% का इजाफा दर्शाता है. इसके पीछे बड़े कारण की बात करें, तो खासतौर पर वेस्ट एशिया में जियो-पॉलिटिकल टेंशन के कारण बढ़ती ऊर्जा कीमतें, उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होना है। FAO के चीफ इकोनॉमिस्ट मैक्सिमो टोरेरो का कहना है कि मिडिल ईस्ट जंग शुरू होने के बाद से कीमतों में जो वृद्धि हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण तेल की ऊंची कीमतें हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का फूड सिस्टम पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।  खाद्य मंहगाई (Food Inflation) के पीछे के कारणों की बात करें,तो कच्चे तेल की हाई कीमतों से ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ती है. इसके साथ ही बायोफ्यूल की डिमांड में भी इजाफा देखने को मिलता है और इससे वनस्पति तेल जैसी वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं. फर्टिलाइजर्स पर असर एक बड़ी चिंता का विषय है, जो किसानों के बुवाई प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।  गेहूं और मक्का की कीमतों में इजाफा  वैश्विक स्तर पर फूड प्राइस में बढ़ोतरी के बारे में रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख रूप से खाद की बढ़ती लागत के चलते गेहूं की कीमतों में ग्लोबली 4.3% की वृद्धि हुई, तो एथेनॉल की डिमांड मजबूत होने से मक्का का भाव बढ़ा है।  इसके अलावा वनस्पति तेल की कीमतों में सबसे तेज इजाफा देखने को मिला है, जो मासिक आधार पर 5.1% है. इसके अलावा सालाना आधार पर देखें, तो 13.2% की बढ़ोतरी देखने को मिली है. ये क्रूड प्राइस और बायोफ्यूल की डिमांड बढ़ने के चलते रही. मीट की कीमतों में 1% की वृद्धि हुई. डेयरी प्रोडक्ट्स की कीमतों में 1.2%, जबकि चीनी की कीमतों में 7.2% का उछाल आया।  इकोनॉमिस्ट ने दी चेतावनी एफएओ ने खाद्य सप्लाई के लिए संभावित जोखिमों की चेतावनी भी दी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक गेहूं उत्पादन 820 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.7% कम है. इसके साथ ही इकोनॉमिस्ट टोरेरो ने वार्निंग देते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्ष 40 दिनों से अधिक समय तक चलता है, तो इसका वास्तविक प्रभाव बाद में देखने को मिल सकता है।  उन्होंने कहा कि किसान खाद का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, बुवाई कम कर सकते हैं या कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं. ये ऐसे फैसले हैं, जिनसे आने वाले महीनों में पैदावार कम हो सकती है और आपूर्ति सीमित हो सकती है. टोरेरो की मानें, तो फिलहाल फूड प्राइस में जो तेजी देखने को मिली है, वो डराने वाली नहीं है, लेकिन इन क्षेत्रों में लगातार दबाव वैश्विक स्तर पर खाद्य लागत में बड़ी वृद्धि का कारण बन सकता है।   

समंदर में तनाव: जहाज रोकने पर चीन और अमेरिका के बीच हुआ आमना-सामना

वाशिंगटन दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें अमेरिका और चीन, समंदर में भी आमने-सामने आ गई हैं. ताजा विवाद पनामा झंडे वाले जहाजों को लेकर शुरू हुआ है, जिसने वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर नए खतरे खड़े कर दिए हैं. अमेरिका ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह पनामा-फ्लैग वाले जहाजों को अपने बंदरगाहों पर रोक रहा है और उन्हें जानबूझकर देरी कर रहा है।  अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे "परेशान" या दबाव बनाने की रणनीति बताया. उन्होंने कहा कि चीन के इस कदम से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, लागत बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय ट्रेड सिस्टम पर भरोसा कम हो रहा है।  आंकड़े भी इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं. एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च महीने में चीन के बंदरगाहों पर जिन 124 जहाजों को जांच के नाम पर रोका गया, उनमें से 92 यानी करीब 75% पनामा के झंडे वाले जहाज थे. ये जहाज एक दिन से लेकर 10 दिन तक रोके गए. इससे पहले जनवरी और फरवरी में यह आंकड़ा काफी कम था, जो अब अचानक बढ़ गया है।  पनामा नहर से जुड़ा पूरा विवाद इस पूरे विवाद की जड़ पनामा नहर से जुड़ी है. पनामा कनाल दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से भारी मात्रा में वैश्विक व्यापार गुजरता है. हाल ही में पनामा की सुप्रीम कोर्ट ने एक हांगकांग आधारित कंपनी के नियंत्रण वाले दो बड़े पोर्ट टर्मिनल्स का कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया था. इसके बाद पनामा ने इन पोर्ट्स पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया।  अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि चीन इस नहर के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका पनामा नहर पर फिर से नियंत्रण हासिल कर सकता है. ऐसे में चीन द्वारा पनामा-फ्लैग जहाजों को रोकना इस बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा माना जा रहा है।  चीन ने अमेरिका पर पनामा पर कब्जा करने का लगाया आरोप चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. वॉशिंगटन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका बेबुनियाद आरोप लगा रहा है और असल में खुद पनामा नहर पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहा है. पनामा सरकार ने इस विवाद को शांत करने की कोशिश की है. विदेश मंत्री ने माना कि जहाजों को रोके जाने के मामले बढ़े हैं, लेकिन इसे सामान्य समुद्री प्रक्रिया का हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि पनामा चीन के साथ सम्मानजनक संबंध बनाए रखना चाहता है।  लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि मामला इतना साधारण नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर चीन पनामा के झंडे वाले जहाजों को लगातार निशाना बनाता है, तो इससे पनामा की वैश्विक शिपिंग इंडस्ट्री पर बड़ा असर पड़ सकता है. पनामा दुनिया में जहाज रजिस्ट्रेशन का एक बड़ा केंद्र है और इससे उसे हर साल करीब 100 मिलियन डॉलर की कमाई होती है।   

हिना बलूच का सनसनीखेज खुलासा: पाकिस्तान की 80% आबादी गे, 20% बायसेक्सुअल

कराची  पाकिस्तानी ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता हिना बलूच का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने पाकिस्तान में बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। वीडियो में हिना ने दावा किया है कि पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' (विषमलैंगिक) नहीं है और देश की पूरी आबादी या तो समलैंगिक (Gay) है या बायसेक्सुअल (Bisexual)। उनका तर्क है कि सामाजिक दबाव, धर्म और पारिवारिक सम्मान की आड़ में पाकिस्तान में लोग अपनी कामुकता को छिपाकर रखते हैं। पाकिस्तानी समाज का 'खुला रहस्य' 'क्वीर ग्लोबल' को दिए एक हालिया इंटरव्यू में हिना बलूच ने पाकिस्तानी समाज की इस स्थिति को एक 'खुला रहस्य' बताया। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि पाकिस्तान की आधे से अधिक आबादी वास्तव में गे है। वे बस इसे खुलकर कहना नहीं चाहते हैं। मुझे लगता है कि पाकिस्तान की 80 प्रतिशत आबादी गे है और बाकी 20 प्रतिशत बायसेक्सुअल है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कामुकता के मामले में पाकिस्तान में कोई भी 'स्ट्रेट' है।' धर्म और संस्कृति की आड़ बलूच ने तर्क दिया कि कई लोग अपनी सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) को दबाते हैं या उससे इनकार करते हैं। अपने बचपन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'लोग इससे इनकार करेंगे, वे इसके बीच में धर्म को लाएंगे, वे संस्कृति का हवाला देंगे, लेकिन यह एक खुला रहस्य है।' हिना बलूच ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि उनका निजी संघर्ष कामुकता को लेकर कम, बल्कि अपनी जेंडर एक्सप्रेशन (लिंग अभिव्यक्ति) को लेकर ज्यादा था। उन्होंने बताया, 'मुझे हमेशा इस बात की चिंता सताती थी कि मैं कैसे लिपस्टिक लगाऊं ताकि परिवार से गालियां न सुननी पड़ें। मैं कैसे महिलाओं वाले कपड़े और गहने पहनूं जिससे मुझे मार न खानी पड़े?' समुदाय का शोषण उन्होंने पाकिस्तान के 'ख्वाजा सरा' (ट्रांसजेंडर) समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली प्रणालीगत और सामाजिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस समुदाय के कई लोगों को मजबूरन भीख मांगने, शादियों में नाचने या सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) जैसे सीमित और शोषणकारी कामों में धकेल दिया जाता है। इन सामाजिक बंधनों और शोषण को अस्वीकार करते हुए, बलूच ने जेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। वह 'सिंध मूरत मार्च' की सह-संस्थापक बनीं और पाकिस्तान के प्रसिद्ध 'औरत मार्च' में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने खुद को ट्रांसजेंडर और अल्पसंख्यक अधिकारों की एक मुखर पैरोकार के रूप में स्थापित किया। हिंसा और देश छोड़ना बलूच ने बताया कि एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 'प्राइड फ्लैग' फहराने के बाद उन्हें भारी हिंसक प्रतिशोध का सामना करना पड़ा था। इसके अलावा, उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा कथित अपहरण और दुर्व्यवहार का भी सामना किया। इन जानलेवा और खौफनाक अनुभवों ने अंततः उन्हें पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बाद में, उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित 'SOAS विश्वविद्यालय' में स्कॉलरशिप हासिल की और अपनी सुरक्षा के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) में शरणार्थी का दर्जा मांगा।

ट्रंप की 6 अप्रैल तक की मोहलत: ईरान के लिए नहीं, खुद के लिए थी ये समयसीमा

न्यूयॉर्क  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सरेंडर करने के लिए उसे छह अप्रैल तक की मोहलत दी थी. लेकिन, अब साफ हो चुका है कि यह मोहलत ईरान के लिए नहीं, बल्कि खुद डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य और राजनीतिक मजबूरी के लिए थी. 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध में अमेरिका ने भारी सैन्य तैयारी की, बड़े-बड़े नौसैनिक बेड़े भेजे और नाटो देशों से साथ आने की अपील की, लेकिन होर्मुज की खाड़ी में ईरान की पकड़ इतनी मजबूत साबित हुई कि ट्रंप की सारी रणनीति हांफती नजर आ रही है. अब ट्रंप नाटो सहयोगियों को गरियाने लगे हैं और ईरान के जवाबी हमलों में अमेरिकी फाइटर जेट व हेलीकॉप्टर मारे जा रहे हैं।  ट्रंप प्रशासन ने शुरू से ही ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई. इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए हमलों में अमेरिका ने ईरान के नेतृत्व, परमाणु सुविधाओं और मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाया. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायु सेना तबाह हो चुकी है. लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया. इस समुद्री रास्ते से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की ढुलाई होती है. इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया है और तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं।  पहले 48 घंटे का दिया था अल्टीमेटम ट्रंप ने शुरू में ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया कि होर्मुज खोलो वरना पावर प्लांट तबाह कर देंगे. फिर इसे बढ़ाकर छह अप्रैल कर दी. जानकारों के अनुसार यह विस्तार इसलिए किया गया क्योंकि अमेरिका को अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने का समय चाहिए था. इस दौरान अमेरिका ने फारस की खाडी में बड़े नौसैनिक फ्लीट भेजे, जिनमें सुपर कैरियर जैसे USS जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश भी शामिल हैं. साथ ही ट्रंप ने नाटो देशों से अपील की कि वे भी नौसेना भेजकर होर्मुज को खोलने में मदद करें।  लेकिन नाटो सहयोगी इस अपील पर खरे नहीं उतरे. यूरोपीय देशों ने साफ कहा कि वे अमेरिका-इजराइल युद्ध में सीधे शामिल नहीं होंगे. ट्रंप ने गुस्से में नाटो को कागजी शेर करार दिया और यहां तक कह दिया कि अमेरिका नाटो से बाहर निकलने पर विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि जब अमेरिका को जरूरत पड़ी तो सहयोगी पीछे हट गए, जबकि अमेरिका सालों से उनका बचाव करता रहा. नाटो महासचिव मार्क रुट्टे ने कुछ समर्थन जताया, लेकिन ज्यादातर यूरोपीय नेता ट्रंप की मांगों से दूर रहे. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तो ट्रंप की रणनीति को अस्थिर बताया. होर्मुज में अमेरिका की स्थिति कमजोर साबित हुई. ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता के सामने अमेरिकी नौसेना भी पूरी तरह ईरान को हिला नहीं पाई. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मजबूत नियंत्रण बनाए रखा और कुछ जहाजों को ही गुजरने दिया, जो ज्यादातर ईरान से जुड़े थे. इसमें कुछ भारत और चीन के जहाज थे।  अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज में ईरान की भौगोलिक स्थिति और एंटी-शिप मिसाइलें अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. अब युद्ध के करीब पांच हफ्ते बाद अमेरिका को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. एक दिन पहले ही ईरान ने अमेरिकी F-15E फाइटर जेट को मार गिराया. उस जेट का पायलट लापता है. संभवतः वह ईरान के कब्जे में है. सर्च एंड रेस्क्यू के दौरान दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर भी ईरानी गोलीबारी के शिकार हुए, हालांकि वे सुरक्षित लैंड कर गए. एक अन्य A-10 वारथोग विमान को भी कुवैत के ऊपर मार गिराया गया. ये घटनाएं अमेरिकी एयर पावर के दावों पर सवाल खड़े करती हैं. ईरान के आईआरजीसी ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है।  डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि युद्ध समाप्ति की ओर है और अगले 2-3 हफ्तों में अमेरिका बहुत जोरदार हमले करेगा. उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना चली गई है, एयर फोर्स तबाह हो चुकी है और मिसाइल स्टॉक खत्म हो रहा है. लेकिन जमीनी हकीकत अलग है. ईरान ने जवाबी हमलों में इजराइल और गल्फ देशों पर सैकड़ों मिसाइलें दागीं और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिकी नौसैनिक अड्डों पर हमलों की भी बात कही गई।  यह युद्ध ट्रंप के लिए राजनीतिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर चुनौती बन गया है. ईरान ने अमेरिका की कमजोर नस पकड़ ली है. होर्मुज की बंदी और उसके सटीक जवाबी हमले ने डोनाल्ड ट्रंप को बैकफुट पर ला दिया है. अब ट्रंप खुद को बचाने की कोशिश में लगे हैं. अगर छह अप्रैल तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई तो पावर प्लांट पर हमले की धमकी फिर दोहराई जा सकती है, लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा करना और बड़ा संकट पैदा कर सकता है. कुल मिलाकर ट्रंप की मोहलत खुद उनकी हांफती रणनीति का प्रतीक बन गई है. ईरान ने दिखा दिया कि वह आसानी से दबने वाला नहीं है।