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ईरान पर ट्रंप का बड़ा बयान: सरेंडर नहीं किया तो विनाश तय, क्या खत्म होने वाला है खामेनेई का दौर?

तेहरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान में प्रमुख सैन्य अभियान शुरू कर दिए हैं। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिकी नागरिकों को आगाह किया है कि इस संघर्ष में अमेरिकी सैनिकों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है और कुछ जानें भी जा सकती हैं। ट्रंप ने कहा, 'कुछ ही समय पहले, अमेरिकी सेना ने ईरान में प्रमुख सैन्य अभियान शुरू कर दिए हैं। हमारा उद्देश्य ईरानी शासन से उत्पन्न होने वाले खतरों को समाप्त करके अमेरिकी लोगों की रक्षा करना है। यह बहुत ही क्रूर और भयानक लोगों का एक दुष्ट समूह है। उनकी खतरनाक गतिविधियां सीधे तौर पर अमेरिका, हमारे सैनिकों, विदेशों में हमारे ठिकानों और दुनिया भर में हमारे सहयोगियों को खतरे में डाल रही हैं।' ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इन सैन्य हमलों का मुख्य लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमताओं को नष्ट करना और उसकी नौसेना को पूरी तरह से खत्म करना है। यह कड़ा कदम अमेरिका और इजराइल द्वारा दी गई उन लगातार चेतावनियों के बाद उठाया गया है, जिनमें साफ कहा गया था कि अगर ईरान अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना जारी रखता है, तो उस पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी। ट्रुथ सोशल पर ट्रंप का संदेश अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर जारी एक वीडियो संदेश में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा- मैं यह बयान हल्के में नहीं दे रहा हूं। ईरानी शासन लोगों की जान लेना चाहता है। इस युद्ध में हमारे साहसी और वीर अमेरिकी नायकों की जान जा सकती है और हमें नुकसान उठाना पड़ सकता है, जैसा कि अक्सर युद्धों में होता है। लेकिन हम यह सब सिर्फ आज के लिए नहीं कर रहे हैं। हम यह भविष्य के लिए कर रहे हैं, और यह एक नेक काम है। ईरानी सेना (IRGC) को सीधी चेतावनी ट्रंप ने ईरान के सशस्त्र बलों, विशेष रूप से 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) के सदस्यों को सीधे संबोधित करते हुए हथियार डालने की अपील की। उन्होंने वादा किया कि जो सैनिक आत्मसमर्पण कर देंगे, उन्हें माफी दी जाएगी। ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा कि हथियार न डालने वालों के लिए दूसरा विकल्प केवल निश्चित मौत है। वार्ता की विफलता के बाद उठाया गया कदम इस सैन्य कार्रवाई की पृष्ठभूमि में हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुई कूटनीतिक वार्ताओं की विफलता है। पिछले कुछ हफ्तों में ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर वाशिंगटन और तेहरान के बीच कई दौर की बातचीत हुई थी। सबसे ताजा वार्ता गुरुवार को ही हुई थी, जो बिना किसी समझौते के बेनतीजा समाप्त हो गई। इस विफलता पर नाराजगी जताते हुए ट्रंप ने कहा- ईरान ने इनकार कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे वह दशकों से करता आ रहा है। उन्होंने अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को छोड़ने के हर अवसर को ठुकरा दिया, और अब हम इसे और बर्दाश्त नहीं कर सकते। परमाणु हथियार या सत्ता परिवर्तन? सच्चाई जान लीजिए अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी अब एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। क्या अमेरिका का असली लक्ष्य सिर्फ ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है, या फिर इसके पीछे एक बहुत बड़ी योजना काम कर रही है- ईरान में सत्ता परिवर्तन और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को पद से हटाना। परमाणु हथियार: मुख्य कारण या सिर्फ एक आवरण? आधिकारिक तौर पर, अमेरिका और उसके सहयोगी (विशेषकर इजरायल) हमेशा यह दावा करते रहे हैं कि उनकी कार्रवाइयों का मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकना है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने उच्च स्तर तक यूरेनियम संवर्धन किया है। अमेरिका का तर्क है कि यह वैश्विक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। हालांकि, कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि परमाणु मुद्दा अमेरिका के लिए एक ढाल की तरह काम करता है। असली चिंता ईरान का 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' है, जिसके तहत वह पूरे मध्य पूर्व में हिजबुल्लाह, हमास और हूतियों जैसे गुटों का समर्थन करता है। अमेरिका का मानना है कि जब तक मौजूदा सरकार सत्ता में है, यह समर्थन कभी खत्म नहीं होगा। असली मकसद: खामेनेई और सत्ता परिवर्तन विशेषज्ञों और कूटनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि अमेरिका अब इस नतीजे पर पहुंच चुका है कि ईरान के साथ कोई भी कूटनीतिक समझौता (जैसे 2015 का परमाणु समझौता) स्थायी नहीं हो सकता। अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान में सर्वोच्च शक्ति हैं। उनकी विचारधारा पूरी तरह से 'अमेरिका विरोध' पर आधारित है। वाशिंगटन का मानना है कि खामेनेई के रहते अमेरिका और इजरायल के हित कभी सुरक्षित नहीं रह सकते। यह वजह है कि ईरान के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे देश के निर्वासित शहजादे रजा पहलवी को अमेरिका कुर्सी पर बैठाना चाहता है।

8वें वेतन आयोग में बदलाव, केंद्रीय कर्मचारियों के लिए यह स्कीम हो सकती है नई

नई दिल्ली  केंद्रीय कर्मचारियों को आठवें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार है। वेतन आयोग की सिफारिशें 18 से 20 महीने में लागू होने की उम्मीद है। इससे पहले, वेतन आयोग के सामने डिमांड लिस्ट सौंपने का सिलसिला जारी है। ऐसी ही एक डिमांड केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) से जुड़ी है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा मानी जाने वाली इस योजना में बड़े बदलाव की उम्मीद है। क्या हो सकता है बदलाव? दरअसल, केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना में स्वास्थ्य सुविधाओं के तहत CGHS से वंचित शहरों में कर्मचारियों को वर्तमान में 1,000 रुपये मासिक भत्ता मिलता है। हालांकि, नेशनल काउंसिल(स्टाफ साइड), NC-JCM की 25 फरवरी 2026 को हुई बैठक में इसमें बदलाव की मांग की गई है। कर्मचारी संगठनों ने इसे बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह करने की मांग की है। क्यों अहम है CGHS का मुद्दा? CGHS के तहत सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों और उनके आश्रितों को पैनल अस्पतालों में कैशलेस इलाज, ओपीडी परामर्श, दवाइयां और डायग्नोस्टिक सेवाएं मिलती हैं। पिछले कुछ वर्षों में निजी अस्पतालों के पैकेज रेट, महंगी दवाइयों और सुपर-स्पेशलिटी उपचार की लागत तेजी से बढ़ी है। ऐसे में आठवां वेतन आयोग महंगाई और वास्तविक खर्च के अनुरूप वेतन संरचना तय करता है, तो स्वास्थ्य कवर की सीमा और योगदान राशि में बदलाव स्वाभाविक माना जा रहा है। संभावित बदलाव क्या हो सकते हैं? वर्तमान में CGHS योगदान वेतन स्तर के अनुसार तय होता है। कर्मचारियों के संगठनों की मांग है कि पैनल अस्पतालों की संख्या बढ़े और पैकेज रेट समय-समय पर संशोधित हों। वहीं, स्वास्थ्य लाभों का दायरा बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है। CGHS कार्ड, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट और ई-रिफरल सिस्टम को और सरल बनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। नई वेतन आयोग की सिफारिशों में प्रशासनिक सुधार और टेक्नोलॉजी अपग्रेड का रोडमैप भी शामिल किया जा सकता है। बुजुर्ग पेंशनरों के लिए क्रॉनिक बीमारियों, होम-केयर और टेलीमेडिसिन सुविधाओं का विस्तार भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसको लेकर भी कोई मॉडल बनाया जा सकता है। पिछले साल हुआ गठन बता दें कि बीते साल सरकार ने आठवें वेतन आयोग गठन का ऐलान किया था। इसके लिए नवंबर महीने में समिति को गठित किया था। वहीं, फरवरी 2026 में वेतन आयोग ने एक वेबसाइट लॉन्च किया है। वेतन आयोग ने हितधारकों से अपनी वेबसाइट पर पोस्ट किए गए 18 प्रश्नों पर प्रतिक्रिया देने का अनुरोध किया है।

एआई रिवोल्यूशन को गति देगा सेमीकंडक्टर सेक्टर: पीएम मोदी का बड़ा बयान

साणंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को गुजरात के साणंद में अमेरिकी कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी की सेमीकंडक्टर असेंबली, टेस्ट और पैकेजिंग (एटीएमपी) फैसिलिटी का उद्घाटन किया। यह भारत के सेमीकंडक्टर इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, जिसे पीएम मोदी ने "टेक्नोलॉजी लीडरशिप की ओर भारत की यात्रा में महत्वपूर्ण कदम" बताया। पीएम मोदी ने उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा, "माइक्रोन की यह फैसिलिटी और आज का यह कार्यक्रम भारत और अमेरिका के बीच मजबूत सहयोग और साझेदारी का भी प्रमाण है। खासतौर पर एआई और चिप जैसी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका की साझेदारी बहुत महत्वपूर्ण है। आज पूरा विश्व मानवता के बेहतर भविष्य से जुड़ी इन दोनों टेक्नोलोजी की सप्लाई चेन को सुरक्षित करना चाहता है। दुनिया की दो सबसे बड़े लोकतंत्र, भारत और अमेरिका इसके लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। एआई समिट के दौरान भारत और अमेरिका के बीच हुआ पैक्स-सिलिका से जुड़ा समझौता इसी दिशा में किया गया एक और प्रयास है। हमारे साझा प्रयास क्रिटिकल मिनरल की ग्लोबल सप्लाई चेन को भी अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बनाएंगे।" पीएम मोदी ने 20वीं सदी की इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन का जिक्र करते हुए कहा, "20वीं सदी तक दुनिया ने इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन का दौर देखा है। उस समय जो देश फैक्ट्री, मशीन और मास प्रोडक्शन में आगे थे, उन्होंने तेजी से तरक्की की। यह सदी एआई रिवोल्यूशन की शताब्दी है। सेमीकंडक्टर इसी बदलाव का बड़ा ब्रिज है। छोटी सी चिप इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन और एआई रिवोल्यूशन को जोड़ने वाला माध्यम है। अगर पिछली शताब्दी का रेगुलेटर ऑयल था, तो इस शताब्दी का रेगुलेटर माइक्रोचिप होने वाला है।" उन्होंने भारत की सेमीकंडक्टर नीति पर प्रकाश डालते हुए बताया, "इसी सोच के साथ भारत ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में तेजी से आगे बढ़ने का फैसला किया। जब दुनिया कोविड के कहर से जूझ रही थी, तो भारत ने सेमीकंडक्टर मिशन की घोषणा की थी। अभी तक सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम के तहत कुल 10 प्रोजेक्ट की मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से माइक्रोन के अलावा तीन अन्य प्रोजेक्ट भी बहुत जल्द प्रोडक्शन शुरू करने वाले हैं। हम जो सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बना रहे हैं, वह किसी एक रीजन तक नहीं, बल्कि पैन-इंडिया है।" पीएम मोदी ने आगे कहा, "यहां साणंद के अलावा धोलेरा में भी बहुत बड़े स्तर पर काम चल रहा है। कुछ दिन पहले ही यूपी के नोएडा में भी नई फैसिलिटी पर काम शुरू हुआ। असम, ओडिशा और पंजाब में भी सेमीकंडक्टर यूनिट पर काम शुरू हुआ। आज पूरी दुनिया के इन्वेस्टर के लिए भारत का एक ही मैसेज है- 'इंडिया इज रेडी, इंडिया इज रिवाइवल एंड इंडिया इज डिलीवर्स'।"

मॉरीशस ने मालदीव से तोड़े रिश्ते, रातों-रात हुआ बड़ा कूटनीतिक विवाद

माले मॉरीशस सरकार ने एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कड़ा फैसला चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर मालदीव के बदले हुए रुख के बाद लिया गया है। बता दें कि ये दोनों ही देश भारत के मित्र हैं। विवाद का मुख्य कारण क्या है? मॉरीशस के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, मालदीव सरकार ने हाल ही में चागोस द्वीप समूह को लेकर अपना रुख बदल लिया है। मालदीव अब चागोस द्वीप समूह और उसकी क्षेत्रीय अखंडता पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता नहीं देता है। इसके अलावा, मालदीव ने मॉरीशस और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच चागोस द्वीप को लेकर हुए हालिया समझौते पर भी आपत्ति जतानी शुरू कर दी है। इसी वजह से मॉरीशस की कैबिनेट ने मालदीव के साथ रिश्ते तोड़ने का यह सख्त कदम उठाया है और मालदीव सरकार को इसकी आधिकारिक सूचना दे दी गई है। मॉरीशस सरकार का आधिकारिक रुख मॉरीशस के विदेश मंत्रालय ने कहा- आज का निर्णय मॉरीशस के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतर्राष्ट्रीय कानून और क्षेत्र में शांति और स्थिरता के सिद्धांतों को बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मालदीव के साथ रिश्ते तोड़ने के अलावा, मॉरीशस की कैबिनेट ने चागोस और डिएगो गार्सिया से जुड़े कुछ अन्य अहम कानूनी और कूटनीतिक घटनाक्रमों पर भी चर्चा की। यह कूटनीतिक संकट 5 फरवरी को मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू के ‘स्टेट ऑफ द नेशन’ संबोधन के बाद गहराया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि चागोस द्वीपसमूह पर मालदीव का किसी भी अन्य देश से अधिक मजबूत दावा है। मुइज्जू ने 2022 में मालदीव की पिछली सरकार द्वारा मॉरीशस की संप्रभुता को दी गई मान्यता को औपचारिक रूप से वापस ले लिया। उन्होंने इस फैसले को मालदीव के समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया। इसके साथ ही, मालदीव सरकार ने यूनाइटेड किंगडम की उस योजना का विरोध करते हुए औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई, जिसके तहत ब्रिटेन चागोस द्वीपसमूह का नियंत्रण मॉरीशस को हस्तांतरित करने वाला है। चागोस द्वीप समूह का पूरा मामला क्या है? चागोस द्वीप समूह का विवाद आधुनिक इतिहास के सबसे जटिल भू-राजनीतिक और मानवाधिकार के मुद्दों में से एक है। यह केवल दो देशों के बीच जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें हिंद महासागर की रणनीतिक सुरक्षा, महाशक्तियों का प्रभाव और हजारों मूल निवासियों का विस्थापन शामिल है। चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के मध्य में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का एक समूह है। यह मॉरीशस से लगभग 2,200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और मालदीव के दक्षिण में स्थित है। इसका सबसे बड़ा द्वीप डिएगो गार्सिया है। अपनी लोकेशन के कारण, यहां से मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका पर सैन्य नजर रखना और ऑपरेशन चलाना बेहद आसान है। 1965 का बंटवारा मॉरीशस और चागोस दोनों ही ब्रिटिश उपनिवेश थे। 1968 में मॉरीशस को आजादी मिलने वाली थी। लेकिन आजादी से तीन साल पहले, 1965 में, ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस द्वीप समूह को अलग कर दिया और इसे एक नया नाम दिया: ब्रिटिश-हिंद महासागर क्षेत्र। ब्रिटेन ने इसके एवज में मॉरीशस को मात्र 30 लाख पाउंड का मुआवजा दिया था। मॉरीशस का हमेशा से यह तर्क रहा है कि आजादी से पहले दबाव में यह समझौता कराया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ था। डिएगो गार्सिया और अमेरिकी सैन्य बेस चागोस को मॉरीशस से अलग करने का मुख्य कारण अमेरिका था। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका को हिंद महासागर में एक सुरक्षित और रणनीतिक सैन्य अड्डे की जरूरत थी। ब्रिटेन ने 1966 में डिएगो गार्सिया द्वीप को 50 साल के पट्टे पर अमेरिका को दे दिया (जिसे बाद में बढ़ा दिया गया)। आज यह अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी सैन्य अड्डों में से एक है, जिसका इस्तेमाल इराक और अफगानिस्तान युद्धों में भी किया गया था। मूल निवासियों का जबरन विस्थापन सैन्य अड्डा बनाने के लिए अमेरिका की शर्त थी कि द्वीप पर कोई स्थानीय आबादी नहीं होनी चाहिए। इसके बाद, 1967 से 1973 के बीच ब्रिटेन ने चागोस के लगभग 1,500 से 2,000 मूल निवासियों को जबरन वहां से निकाल दिया और उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स में निर्वासित कर दिया। इन लोगों को अपने घर लौटने से रोक दिया गया, जो एक बड़ी कानूनी और मानवाधिकार लड़ाई का कारण बना। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और यूएन (UN) का फैसला मॉरीशस ने दशकों तक अपनी संप्रभुता और चागोसियों की वापसी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) ने एक ऐतिहासिक सलाहकारी राय में कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना गैर-कानूनी था और ब्रिटेन को जल्द से जल्द इस द्वीप को छोड़ देना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने भी भारी बहुमत से प्रस्ताव पारित कर ब्रिटेन से मॉरीशस को द्वीप सौंपने को कहा, लेकिन ब्रिटेन ने शुरू में इसे मानने से इनकार कर दिया। हालिया ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता दशकों के विवाद और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद, ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ (जिसका जिक्र आपके पिछले दस्तावेजों में भी था)। इस समझौते के तहत:     ब्रिटेन, चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने के लिए तैयार हो गया।     हालांकि, एक अहम शर्त के तहत डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य बेस एक लंबी अवधि (आमतौर पर 99 साल) के पट्टे के तहत काम करता रहेगा। अब मालदीव का विवाद क्या है? मालदीव और चागोस के बीच समुद्री सीमा (EEZ) का विवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (ITLOS) ने पहले मॉरीशस के पक्ष में सीमांकन किया था। मालदीव ने पहले मॉरीशस के दावे का समर्थन किया था, लेकिन अब मालदीव सरकार ने अपना कूटनीतिक रुख बदल लिया है। मालदीव अब चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता और ब्रिटेन के साथ हुए समझौते पर आपत्ति जता रहा है, जिसके कारण मॉरीशस ने मालदीव से राजनयिक संबंध तोड़ लिए हैं।

अजित पवार और पत्नी सुनेत्रा को 25,000 करोड़ के घोटाले में मिली क्लीन चिट

मुंबई  सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करने वाली एक विशेष अदालत ने  25000 करोड़ रुपये के महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (MSCB) घोटाला मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा दायर की गई दो क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है जिसमें दिवंगत अजित पवार को क्लीन चिट दी गई है। इस बैंक और इसकी सहायक कंपनियों का नेतृत्व करने वाले कई प्रमुख नेताओं के नाम इस कथित घोटाले में सामने आए थे। नेताओं को क्लीन चिट: EOW ने अपनी रिपोर्ट में दिवंगत अजित पवार, उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके भतीजे रोहित पवार को क्लीन चिट दे दी है। सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की मौजूदा उपमुख्यमंत्री हैं। ED और अन्ना हजारे की याचिकाएं खारिज जज महेश के. जाधव ने क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करने और मामले में हस्तक्षेप करने की प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका को खारिज कर दिया। इसके अलावा, अदालत ने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे सहित 50 अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर की गई विरोध याचिकाओं को भी नामंजूर कर दिया है। याचिका खारिज होने का कारण जज ने बताया कि EOW की पहली क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ ED ने पहले भी इसी तरह की याचिका दायर की थी, जिसे खारिज किया जा चुका है। उस फैसले के खिलाफ ED की अपील फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित है। अदालत के विस्तृत आदेश अगले सप्ताह तक उपलब्ध होने की उम्मीद है। ED का पक्ष और दलीलें ED ने अपनी हस्तक्षेप याचिका में दावा किया था कि वह इस मामले में एक 'प्रभावित पक्ष' है क्योंकि उनका मनी लॉन्ड्रिंग का पूरा मामला EOW द्वारा दर्ज की गई FIR पर ही आधारित था। ED ने दलील दी कि जांच के दौरान उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की थी और संपत्तियां भी कुर्क की थीं, जिसमें अजित पवार, सुनेत्रा पवार और रोहित पवार से जुड़ी एक मिल (कारखाना) भी शामिल थी। EOW का पक्ष और क्लोजर रिपोर्ट का आधार EOW ने अदालत में कहा कि ED को इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है, खासकर तब जब उनकी ऐसी ही एक याचिका पहले ही खारिज हो चुकी हो। EOW ने स्पष्ट किया कि मामले की गहन और आगे की जांच के बाद भी उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो कि कोई 'संज्ञेय अपराध' हुआ है। इसी कारण से उन्होंने मामले को बंद करने की रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) अदालत में पेश की। सुप्रीम कोर्ट के नियम का प्रभाव इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का 2022 का एक अहम फैसला लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि यदि कोई 'प्रेडिकेट' या 'शेड्यूल्ड' अपराध (यानी वह मूल आपराधिक मामला जिस पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस आधारित होता है) साबित नहीं होता है या मौजूद नहीं है, तो 'धन शोधन निवारण अधिनियम' (PMLA) के तहत दर्ज मामला आगे नहीं बढ़ सकता। इस स्थिति में, EOW का मामला ही वह 'मूल अपराध' था। चूंकि EOW ने ही मामले में कोई अपराध न होने की बात कहकर क्लोजर रिपोर्ट लगा दी है, इसलिए कानूनी रूप से ED के मनी लॉन्ड्रिंग केस का आधार भी खत्म हो जाता है। बता दें कि महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री और दिग्गज राजनेता अजित पवार का 28 जनवरी 2026 को एक दर्दनाक विमान दुर्घटना में निधन हो गया। 66 वर्षीय पवार मुंबई से अपने गृह क्षेत्र बारामती जा रहे थे, जब उनका चार्टर्ड विमान (लियरजेट 45) बारामती हवाई अड्डे पर लैंडिंग के दौरान क्रैश होकर आग की लपटों में घिर गया। इस भीषण हादसे में अजित पवार के साथ-साथ विमान में सवार चार अन्य लोगों (दो पायलट, एक सुरक्षा अधिकारी और एक फ्लाइट अटेंडेंट) की भी जान चली गई। दशकों तक महाराष्ट्र की सियासत में अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले 'अजित दादा' के इस आकस्मिक निधन ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया और राज्य की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है। वर्तमान में इस दुर्घटना के कारणों को लेकर सीआईडी (CID) और उड्डयन अधिकारियों द्वारा उच्च स्तरीय जांच की जा रही है।

पूरी सेना के बराबर ताकत वाला USS अब्राहम लिंकन, ईरान पर हुआ हमला, खामेनेई की हालत क्या है?

न्यूयॉर्क/तेहरान  अमेरिका ने अपना सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन से ईरान पर हमला किया है. यह जहाज दक्षिण चीन सागर से मिडिल ईस्ट कुछ हफ्ते पहले पहुंचा था. अमेरिका कह रहा है – ईरान के साथ तनाव बढ़ रहा है, इसलिए हम अपनी पूरी ताकत तैनात कर चुके हैं.  अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया क्या? अमेरिका ने यूएसएस अब्राहम लिंकन से ईरान पर हमला शुरू कर दिया है. यह हमला इजरायल की मदद और ईरान को रोकने के लिए किया जा रहा है. यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप क्या है? यह अमेरिकी नौसेना का पूरा युद्ध समूह है. इसमें एक बड़ा कैरियर मुख्य जहाज होता है. पूरा ग्रुप अकेला ही पूरी सेना जितनी तबाही मचा सकता है. इसका नाम Carrier Strike Group 3 (CSG-3) है. खामेनेई सुरक्षित या मारे गए अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ व्यापक सैन्य हमला शुरू कर दिया है, जिससे पूरे क्षेत्र में अभूतपूर्व तनाव फैल गया है. इस अभियान का सबसे बड़ा और संवेदनशील पहलू यह बताया जा रहा है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के दफ्तर को सीधे निशाना बनाया गया है. राजधानी तेहरान के मध्य स्थित उनके आधिकारिक कार्यालय पर हमले की खबर सामने आने के बाद हालात और अधिक गंभीर हो गए हैं. बताया जा रहा है सुप्रीम लीडर खामेनेई तेहरान में नहीं हैं और अमेरिका-इजरायल के हमले से पहले ही उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था. तेहरान समेत कई बड़े शहरों में एक के बाद एक जोरदार विस्फोट सुने गए. शुरुआती चरण में ईरान की सैन्य इकाइयों और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के ठिकानों को निशाना बनाया गया. चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर हुए हमलों में मंत्रियों और मिलिट्री चीफ के घरों, डिफेंस और इंटेलिजेंस मिनिस्ट्री के ठिकानों, और प्रेसिडेंशियल फैसिलिटी को निशाना बनाया गया है. इस ग्रुप में कितने जहाज और पनडुब्बियां हैं?     1 बड़ा न्यूक्लियर कैरियर – यूएसएस अब्राहम लिंकन (1 लाख टन से ज्यादा वजन)     3-4 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर (Arleigh Burke क्लास)     कभी-कभी 1 क्रूजर     1-2 न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियां     1-2 सपोर्ट जहाज (तेल, गोला-बारूद ले जाने वाले)     कुल: 7-10 जहाज और पनडुब्बियां इसमें कितने सैनिक और विमान हैं?     कुल 7000-8000 सैनिक और मरीन     65-70 लड़ाकू विमान     F/A-18 Super Hornet     F-35C स्टील्थ फाइटर     E-2D Hawkeye (आसमान की नजर)     MH-60 हेलीकॉप्टर     EA-18G Growler (दुश्मन के रडार जाम करने वाला) इसमें कितनी मिसाइलें और हथियार हैं?     सैकड़ों टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें (दूर से दुश्मन को मारने वाली)     हवा से हवा, हवा से जमीन मिसाइलें     बम और गोला-बारूद हजारों किलो     डिफेंस मिसाइलें (समुद्र से आने वाले हमले रोकने वाली)     कैरियर खुद न्यूक्लियर पावर से चलता है, लेकिन उसके हथियार सामान्य हैं। ईरान को कितना नुकसान होगा?     बहुत भारी नुकसान.     विमान रोज 100-150 हमले कर सकते हैं.     टोमाहॉक मिसाइलें ईरान के एयरबेस, मिसाइल साइट, तेल फैक्टरी, नौसेना बेस को तबाह कर सकती हैं.     ईरान की छोटी नौसेना को पूरी तरह नष्ट कर सकता है.     होर्मुज स्ट्रेट (तेल का रास्ता) पर कब्जा कर सकता है.     ईरान की हवा में उड़ान बंद हो सकती है.      लेकिन ईरान के पास भी बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन और दोस्त गुट हैं जो जवाब दे सकते हैं. यह ग्रुप क्यों भेजा गया? ईरान को डराने, इजरायल की मदद करने और अमेरिका के हितों की रक्षा करने के लिए. यह कोई रोज का काम नहीं, बल्कि बहुत बड़े तनाव में खास भेजा गया है. आगे क्या हो सकता है? स्थिति बहुत गंभीर है. अगर ईरान ने जवाब दिया तो पूरा मिडिल ईस्ट फिर से जंग में फंस सकता है. तेल महंगा हो सकता है. दुनिया भर में टेंशन बढ़ गया है. ईरान ने कर दिया पलटवार इजरायल और अमेरिका ने संयुक्त रूप से शनिवार सुबह ईरान पर बड़ा सैन्य हमला करते हुए कई शहरों को निशाना बनाया, जिसके बाद पूरे मिडिल ईस्ट में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. इजरायल ने इसे प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक बताया है और कहा है कि संभावित हमले के खतरे को रोकने के लिए यह कार्रवाई की गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक तेहरान, इस्फहान, क़ोम और खोर्रमाबाद समेत कई शहरों पर मिसाइल और एयरस्ट्राइक की गई. तेहरान में यूनिवर्सिटी स्ट्रीट इलाका, सुप्रीम कोर्ट और न्याय मंत्रालय के पास धमाके की खबर है. हमलों में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के घर को निशाना बनाकर तबाह कर दिया गया. हालांकि खबर ये है कि खामेनेई को पहले ही सुरक्षित बंकर में पहुंचा दिया गया था. इजरायल ने ईरान पर क्यों किया हमला? इजरायली सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक ऑपरेशन कई महीनों से प्लान किया जा रहा था और इसका लक्ष्य ईरान की सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करना है. अमेरिकी अधिकारियों ने भी संकेत दिया है कि हमले बड़े दायरे में होंगे और इजरायल के साथ मिलकर कार्रवाई की जा रही है. एक रिपोर्ट में कहा गया कि कम से कम चार दिन तक भारी हमले जारी रह सकते हैं. इराक के आसमान में भी क्रूज मिसाइलें देखी गईं, जिससे साफ है कि हमले कई दिशाओं से किए जा रहे हैं. यही कारण है कि इराक ने भी अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है. ईरान ने हमले के बाद क्या किया? हालात बिगड़ते देख ईरान ने अपना पूरा एयरस्पेस बंद कर दिया है. इसके अलावा चेतावनी दी है कि हमला उसने शुरू किया है, लेकिन इस लड़ाई को खत्म वह करेगा. इजरायल में इमरजेंसी लगा दी गई है और लोगों को शेल्टर में रहने के निर्देश दिए गए हैं. कतर में अमेरिकी दूतावास ने भी अपने कर्मचारियों को सुरक्षित जगहों पर रहने को कहा है. इस बीच कई देशों ने अपने दूतावास खाली करने शुरू कर दिए हैं. अर्जेंटीना, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, यूक्रेन और आइसलैंड ने तेहरान से स्टाफ हटा लिया है.

लोअर बर्थ पर चाय बनाने वाली महिला का वीडियो वायरल, ट्रेन में बनी ‘किचन’

नई दिल्ली सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला ट्रेन के कोच में इलेक्ट्रिक केतली का इस्तेमाल करती दिखाई दे रही है. वीडियो एक सह-यात्री ने रिकॉर्ड किया और इसमें महिला को लोअर बर्थ पर बैठकर केतली को कोच के सॉकेट में लगाकर चाय बनाते हुए दिखाया गया है. जैसे ही यह क्लिप सामने आई, सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ गई. वीडियो में साफ दिखता है कि महिला आराम से केतली चला रही है और उसके आसपास मौजूद यात्री भी बिना किसी आपत्ति के बैठे हुए हैं. लेकिन तथ्य यह है कि इलेक्ट्रिक केतली जैसे हाई-वॉटेज उपकरण ट्रेन में चलाना नियमों के खिलाफ है. रेलवे के कोचों में लगे सॉकेट केवल मोबाइल, लैपटॉप जैसे लो-वॉटेज इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस चार्ज करने के लिए बनाए गए हैं, न कि भारी उपकरण चलाने के लिए. ‘नियम पता हैं, लोग मानते नहीं’ वीडियो X पर साझा किया गया, जिसमें पोस्ट करने वाले ने रेलवे सेवा और रेल मंत्रालय को टैग कर चेतावनी दी कि ऐसी हरकत से शॉर्ट सर्किट या आग लगने जैसी घटना हो सकती है. उन्होंने कहा कि रेलवे को इसके लिए जागरूकता अभियान शुरू करना चाहिए. इसके बाद सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गई. कई यूजर्स ने इसे खतरनाक हरकत बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की. एक यूजर ने लिखा कि ट्रेन में इलेक्ट्रिक केतली चलाना पहले से ही प्रतिबंधित है. जागरूकता है, लोग पालन नहीं करते. एक अन्य ने कहा कि जागरूकता अभियान की जरूरत नहीं, नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई की जरूरत है. किसी ने तंज कसते हुए लिखा, नाइट सूट और केतली के साथ इन्होंने तो कोच को ही घर बना लिया है.. वहीं एक टिप्पणी थी कि लोग सोचते हैं नुकसान रेलवे का होगा, लेकिन हादसा होगा तो सबसे बड़ा नुकसान उनका ही होगा.. रेलवे सेवा हुई सक्रिय, शिकायत मांगी गई वीडियो वायरल होते ही रेलवे सेवा ने इस पर प्रतिक्रिया दी और साझा करने वाले व्यक्ति से यात्री का पीएनआर नंबर और मोबाइल नंबर मांगते हुए कहा कि वह तुरंत कार्रवाई के लिए जानकारी उपलब्ध कराएं. रेलवे ने यह भी बताया कि शिकायत सीधे RailMadad या 139 नंबर पर भी दर्ज कराई जा सकती है. गौरतलब है कि इससे पहले भी इसी तरह की घटना सामने आ चुकी है, जब एक महिला ट्रेन में इलेक्ट्रिक केतली से मैगी पकाते हुए दिखी थी. उस समय भी केंद्रीय रेलवे ने कार्रवाई की थी. क्यों हैं ये खतरनाक? भारतीय रेलवे के कोच में लगी मोबाइल/लैपटॉप चार्जिंग सॉकेट से इलेक्ट्रिक केतली चलाना बेहद खतरनाक है.ये रेलवे नियमों के खिलाफ है, क्योंकि ट्रेन की सॉकेटें केवल लो-पावर डिवाइस (50-100 वाट) के लिए बनी होती हैं, जबकि इलेक्ट्रिक केतली 1000-2000 वाट तक पावर खींचती है. इस वजह से ओवरलोडिंग, शॉर्ट सर्किट और आग लगने का बड़ा जोखिम बढ़ जाता है. यही कारण है कि रेलवे ने केतली, हीटर, इंडक्शन, इमर्शन रॉड जैसे उपकरणों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है. ऐसे उपकरण इस्तेमाल करते पकड़े जाने पर रेलवे एक्ट की धारा 153, 154 के तहत भारी जुर्माना और 6 महीने से 2 साल तक की जेल हो सकती है, और नुकसान होने पर सजा और भी बढ़ जाती है. रेलवे लगातार एडवाइजरी जारी करता है कि ऐसे डिवाइस ट्रेन में कभी न चलाएं.  

तालिबान के हमले से पाकिस्तान में खलबली, डूरंड लाइन पर गोलीबारी और सैन्य ठिकानों पर एयर स्ट्राइक

काबुल/इस्लामाबाद  अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. स्थानीय मीडिया के अनुसार, शनिवार तड़के करीब 3 बजे पक्तिका प्रांत के तेरवा जिले में दुरंड रेखा के पास दोनों देशों की सेनाओं के बीच फिर से झड़प शुरू हो गई. अभी तक इस ताजा लड़ाई में किसी के हताहत होने या नुकसान की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. टोलो न्यूज की रिपोर्ट्स में बताया गया कि अफगानिस्तान की इस्लामिक अमीरात की सेनाओं ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के उत्तरी वजीरिस्तान में मीरानशाह और स्पिनवाम इलाके में स्थित पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन से हवाई हमले किए. स्पिनवाम के सैन्य अड्डे पर हमले के बाद आग लगने की भी खबर है. अफगान पक्ष का कहना है कि इन ड्रोन हमलों को ‘रद अल-जुल्म’ नाम दिया गया है. यह कार्रवाई पाकिस्तान की ओर से पिछली रात खोस्त और पक्तिया प्रांत में की गई बमबारी के जवाब में की गई. पाकिस्तान क्या कह रहा है? पाकिस्तान ने इससे पहले काबुल, कंधार और पक्तिया में हवाई हमले किए थे. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान के खिलाफ ‘खुली जंग’ की घोषणा की है. पाकिस्तान का कहना है कि उसने यह कार्रवाई अफगान सीमा से हुई फायरिंग के जवाब में की. पाकिस्तानी सूचना मंत्रालय के अनुसार, उसकी सेना ने ‘तुरंत और प्रभावी जवाब’ दिया है और देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे. तालिबान तो संभल नहीं रहा, भारत से क्या लड़ेगा पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक तनाव एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। शुक्रवार सुबह अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात के रक्षा मंत्रालय ने एक चौंकाने वाली घोषणा करते हुए दावा किया कि उसकी वायुसेना ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर घुसकर कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इस सैन्य कार्रवाई ने दोनों देशों के बीच पहले से ही जारी तनाव को संभावित पूर्ण युद्ध की स्थिति में खड़ा कर दिया है। अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह हवाई हमला शुक्रवार सुबह करीब 11:00 बजे किया गया। तालिबान के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान के भीतर गहरी पैठ बनाते हुए राजधानी इस्लामाबाद के पास फैजाबाद में एक सैन्य शिविर, नौशेरा में सैन्य मुख्यालय, जम़रुद के सैन्य टाउनशिप और एबटाबाद जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया। मंत्रालय के प्रवक्ता इनायतुल्ला ख्वारज्मी ने ऑपरेशन की सफलता की पुष्टि करते हुए कहा, "यह हवाई अभियान पूरी तरह सफल रहा। हमने पाकिस्तान सेना के उन प्रमुख केंद्रों, ठिकानों और सुविधाओं को ध्वस्त किया है जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।" तालिबान प्रशासन ने इस आक्रामक कार्रवाई को प्रतिशोध करार दिया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पिछले कुछ समय से पाकिस्तानी सेना द्वारा अफगान हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया जा रहा था। इन कथित हवाई घुसपैठ और सीमा पार हमलों के जवाब में ही काबुल ने सीधे हमले का रास्ता चुना है। अफगान सेना के प्रमुख फसीहुद्दीन फितरत ने सख्त लहजे में पाकिस्तान को चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि पाकिस्तान की ओर से कोई भी सैन्य गतिविधि दोबारा हुई तो उसका जवाब और भी अधिक भयानक होगा। फितरत ने अफगानी जनता को संबोधित करते हुए कहा, "हम अफ़गानिस्तान के मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त करते हैं कि हम किसी भी आक्रामकता का जवाब दिए बिना नहीं छोड़ेंगे। हम उंगली का जवाब मुक्के से देंगे।" उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हमले दोहराए गए तो अफगान सेना इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के अन्य प्रमुख शहरों को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटेगी। सीमा पर टैंक और भारी हथियारों की तैनाती टोलो न्यूज के सूत्रों के अनुसार, इस्लामिक अमीरात की सेना केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं है। जमीनी स्तर पर भी बड़े पैमाने पर तैयारी देखी जा रही है। अफगान सेना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में टैंक, हल्के और भारी हथियारों का जखीरा तैनात कर दिया है। किसी भी संभावित जवाबी हमले या सीधे टकराव की स्थिति में इन हथियारों के इस्तेमाल के आदेश दे दिए गए हैं। तालिबान की यह सैन्य क्षमता दुनिया के लिए अप्रत्याशित हो सकती है। विश्लेषक अब्दुल सादिक हामिदजोय ने कहा, "मुजाहिदीन केवल चार साल से नहीं, बल्कि पिछले चालीस वर्षों से युद्ध लड़ रहे हैं। उनके पास न केवल सैन्य योजनाएं हैं, बल्कि आधुनिक क्षमताओं का मुकाबला करने का अनुभव भी है।" वहीं, एक अन्य विशेषज्ञ शाहजादा मसूद ने इस स्थिति पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि अफगान कभी युद्ध के पक्षधर नहीं रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने उन्हें इस कड़े सैन्य कदम के लिए मजबूर कर दिया है। बढ़ता क्षेत्रीय संकट काबुल और इस्लामाबाद के बीच इस सीधी सैन्य भिड़ंत ने वैश्विक समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं। दोनों देश एक-दूसरे पर जवाबी हमलों और आतंकवाद को पनाह देने के आरोप लगाते रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि यह संघर्ष तुरंत नहीं रुका तो यह पूरे क्षेत्र की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। फिलहाल, पाकिस्तान की ओर से इस हमले के नुकसान को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन सीमा पर दोनों ओर से सेनाएं हाई अलर्ट पर हैं। ट्रंप का क्या रहा रिएक्शन इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जब अफगानिस्तान के हालात पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो वह दखल देंगे. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उनके पाकिस्तान के साथ ‘बहुत, बहुत अच्छे’ रिश्ते हैं और वहां की सरकार की तारीफ की. ट्रंप के बयान को क्षेत्रीय हालात के बीच पाकिस्तान के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है. पाकिस्तान-अफगानिस्तान का तनाव कम कराने के लिए आए ये देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अफगान तालिबान ने संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है. हालिया झड़पों और हवाई हमलों के बाद काबुल की ओर से कहा गया है कि मुद्दों का हल आपसी सम्मान और समझ के आधार पर निकाला जाना चाहिए. अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने कहा कि अफगानिस्तान हमेशा संवाद के जरिए समाधान चाहता है. तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने भी कहा कि मौजूदा हालात को बातचीत से सुलझाना बेहतर रास्ता है. इस बीच कतर, सऊदी अरब … Read more

AI के सैन्य इस्तेमाल पर ट्रंप का बड़ा कदम, Anthropic कंपनी पर लगाया बैन

वाशिंगटन अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सैन्य उपयोग में इस्तेमाल किए जाने को लेकर सरकार और Anthropic कंपनी के बीच टकराव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि देश के सभी फ़ेंडरल एजेंसियां अब इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं करेगी. अमेरिका को इसकी ज़रूरत नहीं है. राष्ट्रपति ने इसके उपयोग पर तुरंत बंद करने के निर्देश दिए हैं.  राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी सरकार को इस तकनीक की ज़रूरत नहीं है और फ्यूचर में इस कंपनी के साथ बिज़नेस नहीं करेगा. हालांकि, रक्षा विभाग से जुड़ी एजेंसियों को छह महीने का चरणबद्ध समय दिया गया है. ये समय इसलिए दिया गया है ताकि इसके अल्टरनेट ऑप्शन ढूंढ़े जा सकें. Anthropic के सीईओ डारियो अमोदेई ने साफ किया कि उनकी कंपनी अपने Claude AI सिस्टम से सुरक्षा उपाय हटाने का विचार नहीं रखती. उन्होंने कहा है कि कुछ उपयोग जैसे पूरी तरह ख़ुद से चलने वाली हथियार सिस्टम या बड़े पैमाने पर घरेलू निगरानी नैतिक और तकनीकी सीमाओं को पार करते हैं, इसलिए ऐसी गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जाएगी. अमोदेई ने यह भी जोर दिया कि कंपनी एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को प्राथमिकता देती है. हालांकि, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक 'सप्लाई-चेन रिस्क' के रूप में घोषित कर दिया है. उन्होंने अपनी घोषणा में कहा कि अब कोई भी अमेरिकी सेना के साथ काम करने वाला ठेकेदार या साझेदार Anthropic के साथ व्यावसायिक गतिविधि नहीं कर सकेगा. यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जिसके तहत सरकार ने Anthropic के साथ अपने सभी संबंधों को सीमित करने का कदम उठाया है. राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और कार्यकारी अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि Anthropic के कामकाज से अमेरिकी सैनिकों और देश की सुरक्षा पर जोखिम उत्पन्न हो सकता है. हालांकि प्रशासन ने इस विवाद के पीछे के विस्तार से कारणों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन यह साफ है कि यह कदम अमेरिकी सरकार और प्रमुख एआई डेवलपर के बीच बढ़ती तनातनी और बदलते रिश्तों का परिचायक है.

किम जोंग उन ने अधिकारियों को गिफ्ट की स्नाइपर राइफल, बेटी ने भी दिखाया निशाना लगाना

फियोंगयांग उत्तर कोरिया की सत्ताधारी पार्टी के शीर्ष पद पर चुने जने के बाद किम जोंग उन ने अपने शीर्ष अधिकारियों और कमांडरों को नई स्निपर राइफल गिफ्ट की हैं। एक समारोह के दौरान किम जोंग उन ने लोगों को राइफल का तोहफा दिया। वहीं उनकी बेटी राइफल से निशाना लगाती नजर आई। चर्चा है कि किम जोंग उन बेटी को ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं। किम जोंग उन ने कहा कि राइफल गिफ्ट करना दिखाता है कि उनका अपने अधिकारियों पर पूर्ण विश्वास है। इसके अलावा वर्कर्स पार्टी के लिए वह पूरी तरह से ईमानदार हैं. हाल ही में किम की ब हन किम यो जोंग भी अमरिका और दक्षिण कोरिया के खिलाफ काफी बयान दे रही थीं। ऐसे में उनको लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। हालांकि एक बार फिर किम जोंग उन को ही वर्कर्स पार्टी का चीफ चुना गया। स्थानीय मीडिया द्वारा जारी तस्वीरों में दिखाया गया कि किम यो जोंग के हाथ में भी राइफल है। बेटी किम जू ए को लेकर क्या है प्लान किम जोंग की बेटी की उम्र अभी 13 साल है। वैसे तो किम जोंग उन अपने परिवार को सार्वजनिक रूप से कहीं ले नहीं जाते हैं। हालांकि हाल ही में एक मिसाइल टेस्ट के दौरान वह अपनी बेटी को लेकर गए थे। इसके अलावा उनकी बहन की भी कई तस्वीरें सामने आ चुकी हैं। हाल ही में जब किम जोंग उन चीन की यात्रा पर गए थे तब भी वह बेटी को साथ लेकर गए थे। वर्कर्स पार्टी ने सात दिनों का एक वार्षिक समारोह किया जिसमें किम जोंग उन का जमकर गुणगान किया गया। अमेरिका को दे दी धमकी किम जोंग उन ने कहा है कि यदि अमेरिका अपनी शत्रुतापूर्ण नीति छोड़कर उत्तर कोरिया के परमाणु संपन्न राष्ट्र के संवैधानिक दर्जे को स्वीकार करता है, तो उत्तरी कोरिया अमेरिका के साथ संबंधों को सुधारने के लिए तैयार होगा। कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी के अनुसार वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया की नौवीं कांग्रेस के अवसर पर आयोजित एक परमाणु सैन्य परेड में श्री किम ने यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा 'यदि अमेरिका उत्तर कोरिया के संविधान में परिभाषित परमाणु राष्ट्र की वर्तमान स्थिति का सम्मान करता है और उत्तर कोरिया के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीति वापस लेता है, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि हम अमेरिका के साथ अच्छे संबंध स्थापित न कर सकें।' किम ने कहा कि अमेरिका और उत्तर कोरिया साथ चल सकते हैं, लेकिन केवल तभी जब अमेरिका यह स्वीकार कर ले कि उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार स्थायी रूप से रहेंगे। उत्तरी कोरिया के सुप्रीम लीडर की टिप्पणियों को अप्रैल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा से पहले अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खोलने के रूप में देखा गया। श्री किम ने हालांकि दक्षिण कोरिया के साथ किसी भी राजनयिक सुधार की उम्मीदों को खारिज करते हुए उन्हें सबसे बड़ा शत्रु करार दिया।