samacharsecretary.com

मांसाहार की बढ़ती मांग का पर्यावरण पर असर, UN की रिपोर्ट ने दुनिया को किया सतर्क

मुंबई  चिकन-मटन शौक से खाने वाले लोगों की वजह से दुनिया में एक नया संकट पैदा हो गया है, जिसके बारे में खुद संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कई डराने वाले खुलासे हुए हैं. बताया जा रहा है कि पिछले 60 सालों में ग्लोबल डाइट पूरी तरह से बदल चुकी है. लोग अब साग-सब्जी और शाकाहार को छोड़कर अंधाधुंध तरीके से नॉन-वेज की तरफ भाग रहे हैं. चिकन और मटन की इस दीवानगी ने स्वाद का चस्का तो बढ़ा दिया है, लेकिन हमारी बेचारी धरती के लिए एक ऐसा खौफनाक संकट खड़ा कर दिया है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।  यूएन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के बड़े-बड़े नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां लोगों की थाली में मीट का वजन लगातार भारी होता जा रहा है, वहीं इसके चलते हमारी धरती पर प्रदूषण, जहरीली गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी एक डरावने स्तर पर पहुंच रहा है।  25 किलो से सीधे 47 किलो पर पहुंची चिकन-मटन की खपत इस रिपोर्ट में जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, वे वाकई किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं. अगर हम साल 1961 के दौर की बात करें तो उस समय दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की कुल सप्लाई औसतन सिर्फ 25 किलोग्राम हुआ करती थी लेकिन साल 2022 तक आते-आते ये आंकड़ा करीब-करीब दोगुना बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना पर पहुंच गया है. यानी हर साल इंसानी बस्तियां लाखों टन मांस डकार रही हैं।  चिकन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड: साल 1961 में एक इंसान सालभर में औसतन 3 किलो से भी कम चिकन खाता था, लेकिन साल 2022 में यह आंकड़ा सीधे 17 किलोग्राम पर पहुंच गया. इसका मतलब ये हुआ कि चिकन की खपत में करीब 6 गुना का बंपर और ऐतिहासिक उछाल आया है. आज गली-कूचों से लेकर बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में चिकन की डिमांड सबसे ज्यादा है।  पोर्क और बीफ का हाल: इस दौरान पोर्क खाने की आदत भी इंसानों में दोगुनी हो गई है और ये अब 15 किलो प्रति व्यक्ति पर जा पहुंची है. हालांकि, इस पूरे खेल में बीफ की खपत में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और ये दुनिया भर में करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर है।  मीट की मांग क्यों बढ़ी? एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे असली खेल पैसे और लाइफस्टाइल का है. जिन देशों में लोगों की आमदनी बढ़ रही है और जहां शहरीकरण बहुत तेजी से फैल रहा है, वहां लोगों का रहन-सहन और खान-पान का तरीका बिल्कुल बदल चुका है. लोग अब पारंपरिक दाल-चावल या हरी सब्जियों को छोड़कर मीट को स्टेटस सिंबल और अपनी रोजाना की डाइट का मुख्य हिस्सा बना रहे हैं. इस लजीज स्वाद की जो कीमत हमारी धरती को चुकानी पड़ रही है, वो बहुत भयानक है।  आसमान छूता प्रदूषण: आज के समय में दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एग्रीकल्चर और पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है. फैक्ट्रियों और गाड़ियों के बाद यही सेक्टर सबसे ज्यादा जहर उगल रहा है।  Livestock का जानलेवा खतरा: पर्यावरण में गर्मी बढ़ाने वाली और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में अकेले पशुपालन का हिस्सा 12% से लेकर 20% तक है. आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक में इस सेक्टर से होने वाला प्रदूषण 7.6% तक और ज्यादा बढ़ सकता है, जिसका 80% कारण सिर्फ और सिर्फ ये पशुपालन होगा।  अमीर-गरीब का फासला इस रिपोर्ट में एक और बेहद कड़वा और परेशान करने वाला सच सामने आया है कि अमीर और गरीब देशों के बीच खाने की थाली को लेकर कितनी बड़ी खाई मौजूद है. अमीर देशों में तो लोग अपनी हैसियत के दम पर भर-भर कर मीट खा रहे हैं और वहां मांस की सप्लाई बहुत ज्यादा और स्थिर बनी हुई है।  हालांकि, कई गरीब और कम आय वाले देशों में आज भी भुखमरी का खौफनाक माहौल है. वहां लोगों के लिए पौष्टिक खाना और दूध तो बहुत दूर की बात है, दो वक्त की सूखी रोटी जुटाना भी एक बहुत बड़ी जंग जैसा बना हुआ है।  UN के सॉफ्ट स्टैंड पर भड़के वैज्ञानिक हैरान करने वाली बात ये है कि पर्यावरण के ऊपर मंडरा रहे इतने बड़े खतरे के बावजूद यूएन की संस्था एफएओ (FAO) ने अमीर देशों को मीट की खपत कम करने की कोई सीधी या सख्त सलाह नहीं दी. इसके बजाय, यूएन ने बहुत ही ‘सॉफ्ट’ स्टैंड लेते हुए गोलमोल बातें कीं. उन्होंने कहा कि खेती के तरीकों को थोड़ा बेहतर बनाया जाए, खाना बर्बाद होने से रोका जाए और नई-नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पशुपालन से होने वाले प्रदूषण को कम किया जाए।  यूएन के इस ढुलमुल रवैए ने दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भड़का दिया है और वे इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का साफ और दोटूक शब्दों में कहना है कि अगर अमीर देश मांस खाना थोड़ा कम कर दें और ‘प्लांट-बेस्ड डाइट’ की तरफ वापस लौटें, तो क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के इस बड़े खतरे को बहुत आसानी से और बहुत जल्दी टाला जा सकता है। 

RBI रिपोर्ट ने खोली पोल, बाजार में पैसा भरपूर लेकिन ATM में नहीं मिल रहा कैश; इंडस्ट्री परेशान

 नई दिल्‍ली ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद और यूपीआई का चलन बढ़ने के बाद से ही पिछले कुछ सालों में कैश को लेकर परेशानी बढ़ गई है. भारतीय रिजर्व बैंक के नए आंकड़ों ने कई बड़े खुलासे किए हैं, जिसके अनुसार 29 मई 2026 तक चलन में कैश 42.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. यह पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी की बढ़ोतरी है. इसके बावजूद कुछ एटीएम मशीनों में कैश की कमी होती दिख रही है. लोगों को कैश निकालने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।    एटीएम ऑपरेटरों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था, एटीएम उद्योग परिसंघ (CATMi) ने भारतीय बैंक संघ (IBA) को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि एटीएम में कैश भरने के लिए उपलब्ध कैश  में कमी आ रही है. लेटर में कहा गया है कि नवंबर 2025 में कैश आपूति 80 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि 20 फीसदी की कमी थी।  यह कमी लगातार बढ़ रही है, जो मार्च 2026 में 36 फीसदी और अप्रैल में 43 फीसदी थी. आसान शब्‍दों में कहें तो ATM ऑपरेटरों को अप्रैल में अपनी कैश जरूरतों का सिर्फ 57 फीसदी ही मिला. लेटर में कहा गया है कि दिसंबर 225 के अंत से, हमारे सदस्‍यों को कई राज्‍यों में बैंक ब्रांचेज और करेंसी चेस्‍ट से ATM में कैश डालने में लगातार परेशानियां छेलनी पड़ रही है।    क्‍यों घट रहा एटीएम में कैश?  एटीएम से निकासी में गिरावट आई है. CATMi के अनुसार, मासिक एटीएम निकासी जनवरी 2023 में लगभग 57 करोड़ से घटकर सितंबर 2025 तक लगभग 44 करोड़ हो गई है. डिजिटल भुगतान, खासकर यूपीआई की बढ़ती संख्‍या इस गिरावट का मुख्‍य कारण बताया जा रहा है।    CATMi ने कहा कि वर्तमान एटीएम कॉन्‍ट्रैक्‍ट्स 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत प्रति साल की मामूली गिरावट पर आधारित थे, जिसे सीपीआई से जुड़ी वृद्धि द्वारा समायोजित किया जाना था. वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. इसने यह भी बताया कि कस्‍टमर द्वारा फ्री लिमिट से अधिक एटीएम उपयोग के लिए भुगतान किया जाने वाला शुल्क बढ़ गया है, इसने अधिक लोगों को डिजिटल की ओर धकेल दिया है, जिससे गिरावट तेज हो गई है और ऑपरेटरों के राजस्व में कमी आ रही है।     एटीएम ऑपरेट करने की कॉस्‍ट बढ़ी  उद्योग के जानकारों का यह भी कहना है कि बढ़ती लागत ऑपरेटरों पर दबाव बढ़ा रही है. इसमें परिवहन की कुल लागत, ईंधन, साथ ही सुरक्षा गार्डों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन शामिल हैं. विनिमय लागत (यह वह राशि है जो एक बैंक दूसरे बैंक को तब देता है जब कोई ग्राहक एक बैंक के डेबिट कार्ड का उपयोग दूसरे बैंक के एटीएम में करता है) से परिचालन लागत के कुछ हिस्से की भरपाई होने की उम्मीद थी, लेकिन उनका कहना है कि 19 रुपये से 21 रुपये तक की 2 रुपये की वृद्धि बढ़ती लागतों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही है।    आरबीआई गवर्नर ने क्‍या कहा?  कैश संकट के बारे में पूछे जाने पर, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने शुक्रवार को कहा कि वे हर साल करेंसी की आवश्यकता का एक प्लान बनाते हैं और आवश्यकतानुसार बैंकों को उपलब्ध कराते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कहीं भी नकदी की कमी होती है, तो वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि नकदी शीघ्रता से उपलब्ध कराई जाए।    मॉनिटरी पॉलिसी की घोषणा के बाद हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि नकदी की कमी होने पर हमारे पास एटीएम और बैंक शाखाओं को भरने और फिर से भरने के लिए पर्याप्त पैस हो. डिजिटल भुगतान आम होने के कारण, विशेषकर बड़े शहरों में रहने वाले लोग एटीएम में नकदी खत्म होने की स्थिति में शायद ज्यादा चिंतित न हों।  हालांकि, सरकार से डायरेक्‍ट बेनिफिट मिलने वाले लोगों को नकदी की कमी का असर महसूस हो सकता है क्योंकि उनके शहर के एटीएम में पर्याप्त नकदी न हो. कई वरिष्ठ नागरिक अभी भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए नकदी निकालते हैं. छोटे व्यापारी भी आमतौर पर नकदी लेनदेन पर निर्भर रहते हैं. CATMi ने सदस्य बैंकों से एटीएम में नकदी की विश्वसनीय बनाए रखने और बैंकों से इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए कहा है। 

पॉलीमर नोटों पर चल रहा विचार, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं; RBI गवर्नर ने साफ की स्थिति

मुंबई  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश की मुद्रा को लेकर एक बहुत बड़ी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि आरबीआई भारत में प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलाने के विचार पर काम कर रहा है. हालांकि, गवर्नर ने यह साफ किया कि यह योजना अभी बिल्कुल शुरुआती दौर में है और इस पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है. बैंक अभी इसके हर फायदे और नुकसान की अच्छे से जांच कर रहा है।  पहले क्यों नहीं चल पाए थे प्लास्टिक के नोट? भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. साल 2014 के आसपास सरकार ने देश के पांच शहरों—जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक छोटा सा टेस्ट (ट्रायल) किया था. लेकिन उस समय यह तरीका सफल नहीं हो पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि देश के ATM और बैंकों की नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों के हिसाब से बनी थीं. प्लास्टिक के नोटों की वजह से मशीनें बार-बार जाम होने लगीं. साथ ही, भारत की तेज गर्मी में इन नोटों के आपस में चिपकने और सिकुड़ने का डर भी था. इसी वजह से तब इस काम को रोक दिया गया था. अब आरबीआई इन सभी पुरानी कमियों को दूर करने की तैयारी कर रहा है।  क्या होते हैं पॉलीमर नोट और इनके क्या फायदे हैं? प्लास्टिक या पॉलीमर नोट किसी कड़क प्लास्टिक कार्ड (जैसे एटीएम कार्ड) की तरह नहीं होते. ये एक खास तरह के बहुत पतले और लचीले प्लास्टिक (BOPP) से बनते हैं. इन्हें आप आम कागजी नोटों की तरह ही आसानी से मोड़कर जेब या पर्स में रख सकते हैं. इन नोटों के कई बड़े फायदे हैं:     ज्यादा मजबूती: ये नोट पानी या पसीने से गलते नहीं हैं और आसानी से फटते भी नहीं हैं. इसलिए ये बहुत लंबे समय तक चलते हैं।      गंदगी का असर नहीं: इन नोटों पर धूल, मिट्टी या पानी का असर नहीं होता, जिससे ये गंदे और काले नहीं पड़ते।      नकली नोटों पर रोक: प्लास्टिक के नोटों पर ऐसे सुरक्षा घेरे (सिक्योरिटी फीचर्स) लगाए जा सकते हैं, जिनकी नकल करना नामुमकिन होता है. इससे देश में नकली नोटों का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा।      पैसों की बचत: हालांकि इन्हें छापने का शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च बच जाता है।  दुनिया के कई देशों में है यह व्यवस्था दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल शुरू किया था. आज के समय में ब्रिटेन (यूके), कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड समेत दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में प्लास्टिक के नोट बहुत कामयाबी से चल रहे हैं. आरबीआई गवर्नर ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि इस नए बदलाव के दौरान देश में पैसों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। 

सुपरफास्ट ग्रोथ के मिशन पर भारत, प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक विशेषज्ञों के साथ किया मंथन

नई दिल्‍ली  पूरी दुनिया मंदी, युद्ध की आहट और आर्थिक अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसी है. वैश्विक बाजारों में हाहाकार मचा है, सप्लाई चेन टूट रही है और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने को बेताब हैं. दुनिया की इस महा-उथल-पुथल के बीच दिल्ली के पावर कॉरिडोर में भारत को आर्थिक सुपरपावर बनाए रखने की एक बेहद महत्वपूर्ण बिसात बिछाई जा रही थी. जून की इस तपती दोपहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे बड़े आर्थिक धुरंधरों (PM-EAC) के साथ बंद कमरे में मेज पर जुटे. मकसद साफ था दुनिया भले ही मंदी की गर्त में जाए लेकिन भारत की विकास दर सुपरफास्ट रफ्तार से दौड़ती रहनी चाहिए. इस हाई-प्रोफाइल बैठक में न सिर्फ भारत की अभेद्य आर्थिक किलेबंदी का ब्लूप्रिंट तैयार हुआ बल्कि पश्चिम एशिया के बारूद की आंच से घरेलू बाजार को बचाने का फुलप्रूफ प्लान भी सामने आया।  पीएम नरेंद्र मोदी की बैठक की 5 मुख्य बातें • आर्थिक किलेबंदी की रणनीति: वैश्विक मंदी और तनाव के बीच भारत की 7.7% की रफ्तार को बरकरार रखने और इसे आगे बढ़ाने के लिए नए आर्थिक सुधारों पर गहन मंथन हुआ।  • पश्चिम एशिया संकट पर पैनी नजर: लाल सागर और पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत के व्यापार, MSMEs और कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ने वाले असर का बारीकी से आकलन किया गया।  • नीति आयोग की खुफिया रिपोर्ट: नीति आयोग द्वारा पीएमओ (PMO) को सौंपी गई इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर भविष्य के बड़े झटकों से निपटने की रणनीति बनाई गई।  • ईज ऑफ लिविंग पर सबसे बड़ा दांव: आम आदमी के जीवन को आसान बनाने और व्यापारिक बाधाओं को खत्म करने के लिए नियमों को और अधिक सरल बनाने पर सहमति बनी।  • घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग पर जोर: विदेशी झटकों से बेअसर रहने के लिए देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने और घरेलू उपभोग को मजबूत करने का संकल्प लिया गया।  वैश्विक तूफान, पीएम मोदी की ढाल वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है. एक तरफ पश्चिम एशिया का संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को असुरक्षित बना रहा है तो दूसरी तरफ दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में की जा रही सख्ती ने निवेश पर ब्रेक लगा दिया है. ऐसे में भारत के लिए अपनी ग्रोथ को कायम रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।  इस बैठक का सबसे बड़ा आर्थिक संदेश यह है कि भारत अब रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक नीति पर चल रहा है. वित्त वर्ष 2026 में 7.7% की जीडीपी ग्रोथ हासिल करके भारत ने अपनी आंतरिक मजबूती साबित की है. नीति आयोग की रिपोर्ट और PM-EAC की सलाह का कोर-पॉइंट यह है कि अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत अपनी घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड सरकारी खर्च के जरिए उसकी भरपाई करेगा. सरकार का यह कदम भारतीय बाजार को एक इंसुलेटेड शील्ड यानी सुरक्षा कवच प्रदान करेगा, जिससे दुनिया की मंदी का असर भारत के युवाओं के रोजगार और उद्योगों पर न पड़े।  सवाल-जवाब PM-EAC की इस आपात बैठक का मुख्य एजेंडा क्या था? इस बैठक का मुख्य एजेंडा वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की विकास दर को ‘सुपरफास्ट’ बनाए रखना, घरेलू उद्योगों को सुरक्षित करना और आर्थिक सुधारों को गति देना था।  पश्चिम एशिया के तनाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या खतरा है? भारत अपनी ऊर्जा (क्रूड ऑयल) जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और माल ढुलाई (शिपिंग रूट) महंगी हो सकती है, जिससे भारत के निर्यात और MSMEs पर असर पड़ सकता है।  नीति आयोग की ‘इम्पैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट’ में क्या खास है? इस रिपोर्ट में युद्ध के लंबे खिंचने की स्थिति में भारतीय व्यापार, किसानों, कृषि क्षेत्र और प्रमुख औद्योगिक सेक्टरों पर पड़ने वाले तात्कालिक और मध्यम अवधि के प्रभावों का पूरा खाका और उससे निपटने के उपाय सुझाए गए हैं।  सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ पर इतना जोर क्यों दे रही है? वैश्विक उथल-पुथल के समय अगर देश के भीतर व्यापार करना और आम नागरिक का जीवन आसान होगा, तो घरेलू निवेश बढ़ेगा. इससे नए रोजगार पैदा होंगे और विदेशी निवेशकों के लिए भारत सबसे सुरक्षित और पसंदीदा ठिकाना बना रहेगा। 

2030 तक AI बनेगा सबसे बड़ा संसाधन उपभोक्ता? UN रिपोर्ट में पानी-बिजली को लेकर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अक्सर एक तर्क दिया जाता है. लोग कहते हैं कि फ्यूचर में तकनीक सुधरेगी तो एआई मॉडल्स कम एनर्जी और रिसोर्सेज का इस्तेमाल करेंगे. यूनाइटेड नेशन्स की एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. यूएन की इस रिपोर्ट में एआई के कारण पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान का डेटा दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक एआई की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है. तब यह पूरी दुनिया की कुल बिजली का 3 प्रतिशत हिस्सा अकेले खा जाएगा. इतना ही नहीं, एआई से होने वाला कार्बन उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के बराबर पहुंच जाएगा।  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए इतना पानी लगेगा, जितना पूरी दुनिया की आबादी सालभर में भी नहीं पीती है. यह स्थिति पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है।  जेवंस पैराडॉक्स का वह जाल क्या है जिसमें फंसकर एआई बढ़ा रहा है पर्यावरण की मुसीबत? यूएन की रिपोर्ट में एक बेहद जरूरी आर्थिक सिद्धांत का जिक्र किया गया है. इसे ‘जेवंस पैराडॉक्स’ कहा जाता है. यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई नई टेक्नोलॉजी किसी रिसोर्स के इस्तेमाल को ज्यादा एफिशिएंट बनाती है, तो कुल खपत घटती नहीं है. इसके उलट उस रिसोर्स का कुल कंजम्पशन और ज्यादा बढ़ जाता है।  इस सिद्धांत का नाम मशहूर इकोनॉमिस्ट विलियम स्टेनली जेवंस के नाम पर रखा गया था. उन्होंने 19वीं सदी के इंग्लैंड में कोयले के इस्तेमाल के दौरान इस पैटर्न को देखा था. तब कोयले के इंजन ज्यादा एफिशिएंट हो गए थे. इसके बाद भी कोयले की कुल खपत कम नहीं हुई थी  असल में एफिशिएंसी बढ़ने से कोयले की लागत कम हो गई थी. कम लागत के कारण लोगों ने इसका इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था. इससे कुल डिमांड में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. एआई के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही होने की आशंका है।  जैसे-जैसे एआई मॉडल्स ज्यादा सस्ते और बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा. लोग नए-नए कामों के लिए एआई का उपयोग शुरू कर देंगे. इससे एफिशिएंसी से होने वाली कोई भी बचत पूरी तरह खत्म हो जाएगी।  डेटा सेंटर्स दुनिया की कितनी बिजली और पानी सोख रहे हैं और इसके पीछे का सच क्या है?     इस संकट के बड़े पैमाने को समझने के लिए डेटा सेंटर्स की मौजूदा स्थिति को देखना होगा. पिछले साल दुनिया के डेटा सेंटर्स ने मिलकर उतनी ही बिजली खर्च की, जितनी सऊदी अरब जैसा देश करता है. सऊदी अरब दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली कंज्यूमर देश है।      अगर साल 2030 तक एआई की बिजली डिमांड दोगुनी हो जाती है, तो इससे पर्यावरण पर भारी असर पड़ेगा. इस बढ़े हुए कार्बन फुटप्रिंट की भरपाई करने के लिए इंसान को बहुत बड़े कदम उठाने होंगे. इसके लिए करीब 10 सालों तक 6.7 बिलियन पेड़ उगाने होंगे।      इतना ही नहीं, साल 2030 तक इन डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत होगी. यह पानी डेटा सेंटर्स के भारी-भरकम सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसके साथ ही इन सेंटर्स के लिए मेक्सिको सिटी के साइज से दस गुना ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ेगी।  ग्लोबल लेवल पर एआई की ताकत का बंटवारा कैसे पर्यावरण के लिए नई असमानता पैदा कर रहा है? यूएन की रिपोर्ट केवल रिसोर्स के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. यह एआई बूम के पीछे छिपी गहरी असमानता को भी सामने लाती है. दुनिया में केवल 32 देश ऐसे हैं, जिनके पास एआई के लिए जरूरी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।  हैरानी की बात यह है कि इस पूरी क्षमता का 90 प्रतिशत हिस्सा केवल अमेरिका और चीन के पास है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इससे दुनिया में एक बड़ा डिजिटल डिवाइड पैदा हो रहा है. एक तरफ वे देश हैं जो एआई सिस्टम को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं।  दूसरी तरफ वे देश हैं जो केवल इन सिस्टम्स का इस्तेमाल करते हैं. इन कमजोर देशों को पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है. एआई के लिए जरूरी मिनरल्स का एक्सट्रैक्शन और खतरनाक ई-वेस्ट का बोझ अक्सर इन्हीं गरीब देशों पर पड़ता है।  एआई मॉडल्स के अलग-अलग टास्क पर्यावरण पर कितना और किस तरह का असर डालते हैं?     एआई के काम करने के तरीके को दो मुख्य ताकतें तय करती हैं. पहला यह कि हम इसका कितना इस्तेमाल करते हैं. दूसरा यह कि हम इसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं. एआई कई तरह के टास्क पूरे करता है।  .     इसमें टेक्स्ट लिखना, कोड जेनरेट करना, इमेज बनाना और वीडियो बनाना शामिल है. इन सभी कामों को पूरा करने के लिए अलग-अलग कंप्यूटर पावर की जरूरत होती है. इमेज और वीडियो बनाने में टेक्स्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा एनर्जी खर्च होती है।      सही मॉडल का चुनाव करना भी बेहद जरूरी है. हर एआई सिस्टम के काम करने की एनर्जी कॉस्ट अलग होती है. इसलिए रिस्पॉन्सिबल एआई के लिए पूरी वैल्यू चेन को संभालना होगा. इसमें मिनरल्स की माइनिंग से लेकर रीसाइक्लिंग और ई-वेस्ट का सही डिस्पोजल शामिल होना चाहिए।  दुनिया के बड़े देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं और कहां चूक हो रही है? आजकल दुनिया भर की सरकारें अपने पब्लिक सेक्टर में एआई को तेजी से अपना रही हैं. उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड की सरकार ने एक नेशनल एआई स्ट्रेटजी तैयार की है. उन्होंने एक पब्लिक सर्विस एआई फ्रेमवर्क भी बनाया है।  यह फ्रेमवर्क सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात तो करता है, लेकिन इसमें एनवायरमेंटल डिस्क्लोजर की कोई शर्त नहीं है. वहां कोई भी रेगुलेटर एआई की बिजली खपत या एमिशन का डेटा इकट्ठा नहीं कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी ऐसा ही हाल है।  ऑस्ट्रेलिया के नेशनल फिल्म एंड साउंड आर्काइव ने ‘बॉवरबर्ड’ नाम का एक टूल बनाया है. यह टूल ऑडियो और वीडियो को ट्रांसक्राइब करने का काम करता है. वहीं वहां का वेटरन्स अफेयर्स डिपार्टमेंट दावों के निपटारे को तेज करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है।  ये दोनों देश एआई रेगुलेशन के मामले में बहुत हल्का रुख अपना … Read more

ईंधन संकट की चिंता खत्म! LPG और पेट्रोल-डीजल की भरपूर आपूर्ति के लिए तैयार हुआ बड़ा रोडमैप

नई दिल्ली  भारत लंबे समय से कच्चे तेल और गैस के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है. हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है. लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी शुरू हो चुकी है. अंडमान सागर में प्राकृतिक गैस मिलने के बाद मोदी सरकार ने पूर्वी तट पर ऐसा मेगाप्लान शुरू किया है, जो आने वाले सालों में देश की ऊर्जा कहानी बदल सकता है. सरकार अब समुद्र की गहराई में छिपे तेल और गैस भंडार खोजने के लिए बड़े स्तर पर सर्वे करा रही है. अगर यह मिशन सफल हुआ तो भारत को न सिर्फ एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की सप्लाई में मजबूती मिलेगी, बल्कि विदेशी तेल कंपनियों पर निर्भरता भी कम होगी. यही वजह है कि ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ इसे भारत का ‘एनर्जी फ्रीडम मिशन’ बता रहे हैं. सरकार की नजर अब उन इलाकों पर है जहां पहले तकनीक की कमी के कारण पूरी तरह खोज नहीं हो पाई थी. अब एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी के जरिए समुद्र के नीचे छिपे बड़े हाइड्रोकार्बन भंडार तलाशे जाएंगे।   जानकारी के अनुसार सरकार की यह पूरी योजना सिर्फ तेल खोजने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक दोनों सोच काम कर रही है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है. घरेलू उत्पादन कम होने के कारण देश को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है. इससे वैश्विक संकट का असर सीधे भारतीय बाजार पर दिखता है. रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल ईस्ट तनाव के दौरान इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में साफ दिखा था. अब सरकार चाहती है कि देश के भीतर ही ऐसे बड़े भंडार खोजे जाएं, जिससे आने वाले दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके. इसी दिशा में महानदी, बंगाल-पुर्णिया, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर सर्वे शुरू किए जा रहे हैं. माना जा रहा है कि इन इलाकों में भारी मात्रा में तेल और गैस छिपी हो सकती है।  पूर्वी तट पर शुरू हुआ भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा मिशन     अंडमान सागर में ऑयल इंडिया को प्राकृतिक गैस मिलने के बाद सरकार का फोकस अब पूरी तरह पूर्वी तट पर आ गया है. सरकार ने वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएं मांगी हैं ताकि पुराने सिस्मिक डेटा को दोबारा प्रोसेस किया जा सके और नए ब्रॉडबैंड 3D सर्वे किए जा सकें. यह मिशन करीब 36 महीने तक चलेगा. इसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और संरचनाओं का हाई-टेक नक्शा तैयार किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उन क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया गया था।      सरकार इस बार सिर्फ पुराने तरीकों पर भरोसा नहीं कर रही. नई तकनीकों का इस्तेमाल करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की स्पष्ट तस्वीर बनाई जाएगी. सर्वेक्षण जहाज समुद्र में लंबी केबल यानी स्ट्रीमर छोड़ेंगे. ये उपकरण साउंड वेव भेजकर नीचे की चट्टानों से लौटने वाली गूंज रिकॉर्ड करेंगे. वैज्ञानिक इस डेटा को प्रोसेस करके पता लगाएंगे कि कहां तेल और गैस फंसी हो सकती है. यही तकनीक दुनिया के बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल होती है।      भारत का सबसे बड़ा दांव कृष्णा-गोदावरी यानी KG बेसिन पर माना जा रहा है. यह क्षेत्र पहले से ही देश का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है. यहां कई बड़े गैस फील्ड मौजूद हैं. लेकिन सरकार का मानना है कि एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग से यहां और गहरे हिस्सों में नए भंडार मिल सकते हैं. KG बेसिन में गैस हाइड्रेट्स, डीप वॉटर रिजर्वायर और जटिल पेट्रोलियम सिस्टम मौजूद हैं. अगर यहां नई खोज होती है तो भारत की गैस सप्लाई में बड़ा उछाल आ सकता है।  महानदी बेसिन में छिपा बड़ा खजाना? ओडिशा तट के पास मौजूद महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित डीप-वॉटर क्षेत्रों में माना जा रहा है. यहां पहले भी हाइड्रोकार्बन मिलने के संकेत मिल चुके हैं, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन सीमित रहा. अब नई तकनीक के जरिए यहां की गहरी सिडिमेंटरी परतों की जांच होगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां 8 किलोमीटर से ज्यादा गहराई तक तेल और गैस मौजूद हो सकते हैं।  बंगाल-पुर्णिया बेसिन पर क्यों टिकी नजर? बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भी सरकार बड़ा फ्रंटियर अवसर मान रही है. यहां 10 किलोमीटर तक मोटी सिडिमेंटरी परतें मौजूद हैं. भूवैज्ञानिक अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि यहां मियोसीन युग के हाइड्रोकार्बन भंडार हो सकते हैं. पहले यहां बायोजेनिक गैस के संकेत भी मिल चुके हैं. अगर यह क्षेत्र सफल रहा तो पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल सकती है।  कावेरी बेसिन से मिल सकती है नई ताकत तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन पहले से तेल उत्पादन क्षेत्र रहा है. लेकिन सरकार का मानना है कि यहां अभी भी बड़े भंडार छिपे हुए हैं. खासकर ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले में भारी संभावनाएं बताई जा रही हैं. इस क्षेत्र में सिडिमेंटरी परतें करीब 8 किलोमीटर तक गहरी हैं. यानी यहां भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की संभावना है।  विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने की तैयारी भारत अभी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है. अगर घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी. साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का असर भी कम होगा. यही वजह है कि सरकार इसे सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मिशन मान रही है।  मल्टी-क्लाइंट मॉडल से कैसे बदलेगा खेल? सरकार इस मिशन में मल्टी-क्लाइंट मॉडल का इस्तेमाल कर रही है. इसका मतलब है कि जियोफिजिकल कंपनियां खुद डेटा जुटाएंगी और बाद में उसे कई ऊर्जा कंपनियों को बेच सकेंगी. इससे सरकार पर शुरुआती आर्थिक बोझ कम होगा. साथ ही निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ेगी. इससे खोज का काम तेजी से आगे बढ़ सकता है।  सरकार पूर्वी तट पर नया सर्वे क्यों करा रही है? सरकार का उद्देश्य समुद्र के नीचे छिपे तेल और प्राकृतिक गैस भंडार की खोज करना है. भारत अभी बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है. अगर घरेलू भंडार मिलते हैं तो एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की सप्लाई मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता … Read more

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का बड़ा ऐलान, दिल्ली-सिलीगुड़ी बुलेट ट्रेन कॉरिडोर से जुड़ेंगे कई प्रमुख शहर

कोलकाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बुलेट ट्रेन लाने का वादा किया है. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राज्य सचिवालय 'नबन्ना' में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के साथ बैठक के दौरान यह जानकारी दी. रेल मंत्री ने बताया कि 42 वर्षों में कोलकाता मेट्रो नेटवर्क का केवल 28 किलोमीटर हिस्सा ही पूरा हो पाया था, जबकि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से 45 किलोमीटर मेट्रो लाइनें जोड़ी गई हैं।  रेल मंत्री ने शनिवार को कहा कि राज्य के लिए बुलेट ट्रेन शुरू करने का फैसला किया गया है. यह ट्रेन दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी और पटना होते हुए सिलीगुड़ी को जोड़ेगी. इस सफर में सिर्फ छह घंटे लगेंगे और यह आरामदायक होगा. अगले पांच सालों में कोलकाता मेट्रो के लिए 60 नई पीढ़ी की ट्रेनें शुरू की जाएंगी और उम्मीद है कि 'डबल-इंजन' सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में रेलवे प्रोजेक्ट्स को नई रफ्तार मिलेगी।  अश्विनी वैष्णव ने कहा, 'अगले पाँच सालों में कोलकाता मेट्रो के लिए 60 नई पीढ़ी की ट्रेनें शुरू की जाएंगी. आज मैंने कोलकाता मेट्रो में सफर किया. हम कोलकाता मेट्रो को नया रूप देंगे.' मंत्री ने यह भी कहा कि दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी के बीच प्रस्तावित बुलेट ट्रेन सेवाओं का उद्देश्य यात्रा के समय को तेजी से कम करना है. उन्होंने कहा, 'ये हाई-स्पीड कॉरिडोर छह घंटे में सिलीगुड़ी को नई दिल्ली से जोड़ देंगे।  बैठक में शामिल होने के लिए वह शनिवार को  दमदम हवाईअड्डे पर पहुंचे. हवाईअड्डे से निकलने के तुरंत बाद रेल मंत्री मेट्रो में चढ़े और यात्रियों से बातचीत की. उन्होंने ऑटो रिक्शा में भी सवारी की. उनके साथ राज्य के मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय और पुरुलिया के सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो भी थे।  इसके बाद मुख्यमंत्री और रेल मंत्री ने मीडिया को संबोधित किया और राज्य के लिए कई रेल परियोजनाओं को शुरू करने की घोषणा की. बुलेट ट्रेन के बारे में बात करते हुए रेल मंत्री ने कहा, 'इस पर काम जल्द ही शुरू होगा. रेल परियोजना का रास्ता साफ हो गया है और सभी विधायकों ने सहयोग का भरोसा दिया है.' उन्होंने नए स्टेशनों और अतिरिक्त ट्रेनों को शुरू करने का भी वादा किया. साथ ही, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने केंद्रीय मंत्री से राज्य में सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र पर ध्यान देने का आग्रह किया। 

एक पेड़ मां के नाम 3.0’ अंतर्गत राज्यभर में पहले ही दिन 6 लाख पौधों का रोपण किया जाएगा

अहमदाबाद विश्व पर्यावरण दिवस’ पर प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी से प्रेरित ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तीसरे चरण का शुभारंभ होगया। गांधीनगर से मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के करकमलों से राज्यव्यापी अभियान का आरंभ किया गया । गांधीनगर के ‘ज’ रोड पर लोकभवन स्टाफ क्वार्टर्स के पास 0.5 हेक्टेयर क्षेत्र में ‘वन कवच’ पद्धति से लगभग 5,000 पौधों का रोपण कर यह राज्यव्यापी अभियान शुरू किया गया । उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2024 में नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क से ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का शुभारंभ किया गया था। वन विभाग के अनुसार वन एवं पर्यावरण मंत्री  अर्जुन मोढवाडिया तथा राज्य मंत्री  प्रवीण माळी के मार्गदर्शन में समग्र राज्य में इस अभियान को गतिमान बनाया जाएगा। पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता बायोडायवर्सिटी के संरक्षण के लिए गांधीनगर में 57 स्थानीय प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाएगा। जो कि त्रि- स्तरीय होगा। जिसमें 16 प्रजातियों के 20 प्रतिशत उच्च स्तरीय पौधें, 25 प्रजातियों के 50 प्रतिशत मध्यम स्तरीय तथा विभिन्न 16 प्रजातियों के 30 प्रतिशत निम्न स्तरीय पौधों का समावेश होगा। इस वन कवच माइक्रो फॉरेस्ट की विशेषता यह है कि यह बहुत कम स्थान में अत्यंत सघन तथा तेजी से विकसित होने वाला शहरी जंगल तैयार करता है। इसके अतिरिक्त; वन विभाग के अनुसार इस अभियान अंतर्गत केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री तथा गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र के सांसद श् अमित शाह के लोकसभा क्षेत्र को ‘हरियाली लोकसभा’ बनाने के लिए वन विभाग द्वारा लगभग 500 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में 50 लाख से अधिक पौधे लगाकर ‘वन कवच – माइक्रो फॉरेस्ट’ तैयार किया जाएगा। ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ से शुरू कर आगामी सप्ताह तक वन विभाग द्वारा पूरे गुजरात को कवर करने वाले विभिन्न जन कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जो कि इस प्रकार हैं : राज्यभर में ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर कुल 50 हजार ‘समूह स्तर’ निर्धारित किए गए हैं। प्रत्येक समूह द्वारा 12 पौधों का रोपण किया जाएगा और एक ही दिन में पूरे राज्य में 6 लाख पौधों का रोपण किया जाएगा। इस सप्ताह के दौरान प्रत्येक जिला स्तर पर मुख्य चार कार्यक्रम तथा सभी 265 तहसीलों को विधानसभा क्षेत्र में महानुभावों की अध्यक्षता में सघन पौधो का रोपण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त सप्ताह के दौरान 265 तहसील स्तरीय कार्यक्रमों के माध्यम से 1.53 लाख से अधिक पौधों का रोपण किया जाएगा तथा 1.87 लाख से अधिक पौधे निःशुल्क वितरित किए जाएंगे। साथ ही तहसीलों में 861 निर्धारित स्थलों पर वन विभाग के मार्गदर्शन में अतिरिक्त 4.15 लाख से अधिक पौधे लगाए जाएंगे। वन विभाग ने राज्य के प्रत्येक नागरिक, सामाजिक संस्थाओं तथा युवाओं से अपनी माता के नाम पर कम से कम एक वृक्ष लगाने और उसके संरक्षण करने के लिए अनुरोध किया है।

शाला प्रवेशोत्सव से पहले प्राथमिक विद्यालयों में पुस्तकें पहुँचाने के लिए प्रशासन सजग: पावरा

अहमदाबाद  गुजरात राज्य शाला पाठ्यपुस्तक मंडल के कार्यवाहक अध्यक्ष  मनुभाई पावरा ने कहा है कि मुख्यमंत्री  भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन औरे शिक्षा मंत्री  प्रद्युमन वाजा तथा शिक्षा राज्य मंत्री मती रिवाबा जाडेजा के नेतृत्व में पाठ्यपुस्तक वितरण का कार्य चल रहा है। गुजरात बोर्ड से संबद्ध प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों तक के सभी माध्यमों की पाठ्यपुस्तकों को निर्धारित समयसीमा में विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए मंडल द्वारा युद्धस्तर पर एवं सुदृढ़ आयोजन के साथ कार्य शुरू किया गया है।  मनुभाई ने अधिक विस्तार से जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि चालू शैक्षणिक वर्ष में विद्यार्थियों के हित में कुछ नूतन विषयों को जोड़कर पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया समय पर प्रारंभ कर दी गई थी, लेकिन कुछ अनिवार्य न्यायिक प्रक्रियाओं – कोर्ट केस तथा ईरान सहित अन्य देशों के बीच उत्पन्न हुई वैश्विक युद्ध की विषम स्थिति के कारण कागज के आयात में लगभग ढाई से तीन महीनों का आकस्मिक विलंब हुआ था। हालाँकि; मंडल की समग्र टीम सभी अंतरराष्ट्रीय एवं कानूनी अवरोधों को पार कर विद्यार्थियों का शैक्षणिक कार्य जरा भी प्रभावित न हो; इसके लिए हाल में दिन-रात पुरजोर तरीके से प्रिंटिंग कार्य कर रही है। अध्यक्ष  पावरा ने राज्य के नागरिकों तथा अभिभावकों को विश्वास दिलाया कि इन सभी आकस्मिक वैश्विक चुनौतियों के बावजूद पुस्तकों के मूल्य में किसी भी प्रकार की वृद्धि नहीं की गई है और अभिभावकों पर एक भी रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने नहीं दिया जाएगा। पुस्तक वितरण की वर्तमान स्थिति तथा आगामी सुदृढ़ आयोजन की रूपरेखा देते हुए अध्यक्ष  मनुभाई ने जोड़ा कि राज्य के निजी एवं नॉन-ग्रांटेड विद्यालयों के लिए शुल्कयुक्त पुस्तकें वितरकों तक समय पर पहुँचा दी गई हैं, जो वर्तमान में विद्यार्थियों को उपलब्ध भी हो चुकी हैं, जबकि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के सभी विद्यार्थियों को आगामी 'शाला प्रवेशोत्सव' से पूर्व ही सभी पाठ्यपुस्तकें तहसील स्तर तक पूर्ण रूप से निःशुल्क मिल जाएँ; ऐसी माइक्रो-प्लानिंग प्रशासन द्वारा सुनिश्चित की गई है। इसके अतिरिक्त; सरकारी तथा ग्रांटेड माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में भी पुस्तकें अत्यंत तेजी से पहुँचाने के लिए विभिन्न सरकारी एजेंसियाँ तत्परता से कार्य कर रही हैं। अभिभावकों और विद्यार्थियों को पूर्ण रूप से आश्वस्त करते हुए अध्यक्ष  मनुभाई ने कहा कि भौगोलिक चुनौतियों अथवा सुदूरवर्ती-रिमोट क्षेत्रों में आकस्मिक परिस्थितिवश यदि भौतिक रूप से (फिजिकली) पुस्तक पहुँचने में थोड़ा भी विलंब हो, तो भी विद्यार्थियों का शैक्षणिक कार्य कहीं अवरुद्ध न हो; इसके लिए मंडल ने अत्याधुनिक 'डिजिटल बैकअप' की अग्रिम व्यवस्था की है। मंडल की आधिकारिक वेबसाइट  https://gsstb.gujarat.gov.in/gsstb/Textbook पर सभी माध्यमों की पाठ्यपुस्तकें डिजिटल रूप में – ई-पुस्तकों (e-Books) के रूप में अपलोड कर दी गई हैं। शैक्षणिक सत्र के प्रारंभिक चरण में शिक्षक तथा विद्यार्थी बिना किसी कठिनाई के वेबसाइट से सीधे ही प्रकरणों को डाउनलोड कर सकेंगे। इसके साथ ही; शिक्षक भी इनका संदर्भ के रूप में उपयोग कर बच्चों को पढ़ा सकेंगे। पाठ्यपुस्तक मंडल के अध्यक्ष  मनुभाई पावरा ने कहा कि राज्य सरकार तथा पाठ्यपुस्तक मंडल हर विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य और शैक्षणिक हित के प्रति अत्यंत संवेदनशील एवं गंभीर है और किसी भी विषम स्थिति में भी अंतिम छोर के बच्चे तक शिक्षा की सुविधा पहुँचाने के लिए हम कटिबद्ध हैं।

गुजरात के मोरबी में तेज रफ्तार का कहर, भीषण टक्कर में पांच की गई जान

 मोरबी मोरबी में हलवद क्षेत्र के चराडवा गांव के पास एक दर्दनाक हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि एक बाइक सवार गंभीर रूप से घायल हो गया. यह घटना उस समय हुई, जब एक कार वाहन से टकरा गई. हादसा इतना भीषण था कि मौके पर ही चीख-पुकार मच गई। जानकारी के अनुसार, कार में कुल सात लोग सवार थे, जो सभी हलवद के रणछोड़गढ़ गांव के रहने वाले थे. यह सभी किसी काम से जा रहे थे, तभी चराडवा गांव के पास उनकी कार आगे चल रही एक अज्ञात गाड़ी के पिछले हिस्से से जा टकराई. टक्कर इतनी जोरदार थी कि कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई।  इस हादसे में तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो अन्य ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया. बाकी घायलों का इलाज स्थानीय अस्पताल में जारी है. सूचना के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची और जायजा लिया. पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए हैं. वहीं मामले की जांच शुरू कर दी है।  इसी बीच एक और दर्दनाक घटना भी सामने आई, जिसमें परेश नाम का एक युवक बाइक से हलवद की ओर जा रहा था. मानसर गांव के पास उसकी बाइक फिसल गई, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया. घायल हालत में उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था, तभी वही कार, जो पहले से हादसे में शामिल थी, एक अज्ञात वाहन के पीछे से टकरा गई। लगातार हुए इन हादसों ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क पर तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाना अक्सर ऐसे हादसों की वजह बनता है. पुलिस ने दोनों घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है. गांव में मातम का माहौल है और हर तरफ गम का सन्नाटा पसरा हुआ है।