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डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा! अमेरिका ने किया जी-20 से बायकॉट, जानें वजह

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस साल दक्षिण अफ्रीका में होने वाले जी-20 सम्मेलन में कोई भी अमेरिकी प्रतिनिधि हिस्सा नहीं लेगा। उन्होंने कहा है कि इस अफ्रीकी देश में श्वेत किसानों के साथ भेदभाव होता है। डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही कह दिया था कि वह जी-20 सम्मेलन में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे। पहले बताया गया था कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दक्षिण अफ्रीका जा सकते हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में कहा, यह बड़ा ही अपमानजनक है कि जी-20 सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में हो रहा है। ट्रंप ने बुधवार को मियामी में ‘अमेरिका बिजनेस फोरम’ में कहा, ‘‘मैं नहीं जा रहा हूं। दक्षिण अफ्रीका में जी-20 की बैठक है। दक्षिण अफ्रीका को जी-20 में ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वहां जो हुआ है वह बहुत बुरा है। मैंने उन्हें बता दिया है कि मैं नहीं आ रहा हूं। मैं वहां अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं करने वाला…।’’ दक्षिण अफ्रीका ने एक दिसंबर 2024 को एक साल के लिए जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण की थी और वह 22 और 23 नवंबर को जोहानिसबर्ग में समूह के नेताओं की शिखर बैठक की मेज़बानी करेगा। यह पहली बार है जब जी-20 शिखर सम्मेलन अफ्रीकी धरती पर आयोजित किया जाएगा। भारत दिसंबर 2022 से नवंबर 2023 तक जी-20 का अध्यक्ष था और उसने सितंबर 2023 में नई दिल्ली में 18वें जी-20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए थे। जी-20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं। भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ही अफ्रीकी संघ आधिकारिक तौर पर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के समूह में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हुआ था। न्यूयॉर्क सिटी के नवनिर्वाचित मेयर ‘‘कम्युनिस्ट’’ जोहरान ममदानी की आलोचना करते हुए ट्रंप ने कहा कि मियामी पीढ़ियों से दक्षिण अफ्रीका में कम्युनिस्ट अत्याचार से भागने वालों के लिए एक आश्रय स्थल रहा है। ट्रंप ने कहा, ‘‘मेरा मतलब है कि दक्षिण अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है, इस पर एक नजर डालिए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है इस पर एक नजर डालिए।

सूडान के बाद माली में नया आतंक! बंदूक की नोक पर 5 भारतीयों को अगवा किया गया

माली अफ्रीका में भारतीयों की सुरक्षा को लेकर एक और चिंताजनक खबर सामने आई है. पश्चिमी अफ्रीकी देश माली में अज्ञात बंदूकधारियों ने पांच भारतीय नागरिकों का अपहरण कर लिया है. ये सभी एक बिजलीकरण परियोजना (Electrification Project) पर काम कर रहे थे. कंपनी और सुरक्षा सूत्रों ने इस घटना की पुष्टि की है. न्यूज एजेंसी AFP को दिए बयान में एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि गुरुवार को कोबरी (Kobri) इलाके के पास इन भारतीयों को अगवा किया गया. उन्होंने बताया कि ये सभी उस कंपनी के कर्मचारी थे जो माली में ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति परियोजना चला रही है. कंपनी के एक प्रतिनिधि ने कहा, ‘हम पुष्टि करते हैं कि हमारे पांच भारतीय नागरिकों का अपहरण किया गया है. बाकी भारतीय कर्मचारियों को राजधानी बमाको (Bamako) सुरक्षित पहुंचा दिया गया है.’ फिलहाल किसी भी समूह ने इस अपहरण की जिम्मेदारी नहीं ली है. इस्लामिक स्टेट और अल कायदा जैसे समूह भी यहां सिर उठा रहे हैं. माली इन दिनों अशांति और आतंकी हिंसा से जूझ रहा है. यहां की सत्ता एक सैन्य जुंटा (Military Junta) के हाथों में है, जबकि देश के कई हिस्सों पर अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े जिहादी समूहों का प्रभाव है. ग्रुप फॉर द सपोर्ट ऑफ इस्लाम एंड मुस्लिम्स (JNIM) नाम का संगठन पूरे देश में ईंधन नाकेबंदी (Fuel Blockade) जैसी गतिविधियों से आम जनता को परेशान कर रहा है. आतंकी के डर की वजह से बाकी कर्मचारियों को माली की राजधानी बामाको में शिफ्ट किया गया है। अभी तक किसी भी संगठन ने इस अपहरण की जिम्मेदारी नहीं ली है। बता दें कि माली में फिलहाल सेना का ही शासन है। अल-कायदा और आईएसआईएस की वजह से यहां आतंकी घटनाएं हुआ करती हैं। माली इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहा है। कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों और आतंकियों ने यहां फ्यूल ब्लॉकेड लगा दिया है। माली में विदेशों को टारगेट करना आम बात है। अकसर कट्टरपंथी संगठन विदेशियों की हत्या कर देते हैं या फिर उनका अपहरण कर लेते हैं। 2012 में यहां तख्तापलट हुआ था और इसके बाद से ही कभी शांति नहीं रही। बीते महीने ही आतंकियों ने दो अमीराती और एक ईरानी नागरिक को किडनैप कर लिया था। 5 करोड़ डॉलर की फिरौती के बाद उन्हें छोड़ा गया था। माली में अकसर आतंकी और जिहादी समूह फिरौती के लिए लोगों को अगवा करते हैं। वे विदेशी इंजीनियरों और कर्मचारियों को निशाना बनाते हैं और फिर कंपनी से मोटी रकम की मांग करते हैं। जेएनआईएम के आतंकियों का यही काम हो गया है। माली में आतंकियों की इन हरकतों की वजह से विदेशी कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। माली की घटना ने अफ्रीका में भारतीय कामगारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि कुछ ही दिन पहले सूडान से भी भारतीय नागरिक के अपहरण की खबर आई थी. सूडान में रैपिड सपोर्ट फोर्स (RSF) मिलिशिया ने ओडिशा के आदर्श बेहेरा को बंधक बना लिया. एक वीडियो में आदर्श दो हथियारबंद सैनिकों के बीच बैठे दिखते हैं. उनमें से एक उनसे पूछता है, ‘क्या तुम शाहरुख खान को जानते हो?’ जबकि दूसरा उन्हें कैमरे की ओर देखकर ‘डगालो गुड’ कहने के लिए कहता है. डगालो, यानी RSF प्रमुख मोहम्मद हामदान डगालो (हेमेती) का नाम. 36 वर्षीय आदर्श को अल-फशीर शहर से अगवा किया गया था. माना जा रहा है कि उन्हें RSF के गढ़ न्याला ले जाया गया है. परिवार ने बताया कि वे 2022 से सूडान की सुकराती प्लास्टिक फैक्ट्री में काम कर रहे थे और उनकी पत्नी व दो छोटे बेटे ओडिशा में हैं.

चीन ने समुद्र में उतारा नया दैत्याकार पोत, तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर शामिल

फुजियान   चीन ने  अपना सबसे उन्नत एयरक्राफ्ट कैरियर फुजियान आधिकारिक रूप से सेना में शामिल कर लिया. यह चीन का पहला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट प्रणाली से लैस एयरक्राफ्ट कैरियर है. इस लॉन्च के साथ अब चीन के पास तीन विमानवाहक पोत हैं. यह समुद्र में एक तरह का तैरता शहर जैसा होगा, जो किसी भी देश का काल बन सकता है. शिन्हुआ समाचार एजेंसी के अनुसार, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बुधवार को फुजियान के कमीशनिंग और झंडा प्रदान समारोह में भाग लिया. शी जिनपिंग ने सान्या शहर के एक नौसैनिक बंदरगाह पर जाकर इस विमानवाहक पोत का निरीक्षण भी किया. फुजियान को जून 2022 में लॉन्च किया गया था और इसका नाम फुजियान प्रांत के नाम पर रखा गया है. चीनी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, फुजियान का कमीशन होना पीएलए नौसेना के कोस्टल सिक्योरिटी से दूर समुद्री रक्षा की दिशा में हुए बदलाव की एक बड़ी उपलब्धि है. यह इस बात का प्रतीक है कि चीन अब तीन विमानवाहक पोतों के युग में प्रवेश कर चुका है. उसके इस नए एयरक्राफ्ट में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट प्रणाली भी है. इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट प्रणाली के उपयोग से विमान पूरे ईंधन और हथियारों के साथ टेकऑफ (take-off) कर सकते हैं, जिससे उनका युद्ध क्षेत्रीय दायरा बढ़ता है. यह हमलावर क्षमता में बढ़ोतरी करता है. इसके साथ ही यह प्रणाली एयरक्राफ्ट सॉर्टी रेट में भी अहम बढ़ोतरी की भी अनुमति देती है. यह चीन द्वारा खुद ही डिजाइन किया गया और पूरी तरह तैयार किया गया है. यानी पूरी तरह से इंडिजिनस. चीन अब अमेरिका के अलावा दूसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास दो से ज्यादा युद्धपोत हैं.  इस युद्धपोत का निर्माण कार्य 2019 में शंघाई के जियांगन शिपयार्ड में शुरू हुआ था. इसे 17 जून 2022 को समुद्र में उतारा गया था. 2024 से इसके समुद्री परीक्षण शुरू हुए और इसे आठ बार समुद्र में उतारा गया. कुल मिलाकर 117 दिनों की परीक्षण प्रक्रिया के बाद चीन ने मात्र छह वर्षों में इस एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण और ट्रायल दोनों सफलतापूर्वक पूरे कर लिए. वहीं अमेरिका के फोर्ड-क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर को निर्माण से लेकर कमीशनिंग तक पहुंचने में करीब 16 साल लगे थे.  22 सितंबर को, पीएलए नौसेना ने घोषणा की थी कि फुजियान ने पहला कैटापल्ट-असिस्टेड टेकऑफ और अरेस्टेड लैंडिंग ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी कर ली है. इसमें J-15T भारी लड़ाकू विमान, J-35 स्टील्थ फाइटर और KJ-600 प्रारंभिक चेतावनी विमान शामिल थे. ग्लोबल टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि इन विमानों के साथ J-15DT इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर विमान को भी 3 सितंबर को बीजिंग में आयोजित चीन के वी-डे सैन्य परेड में प्रदर्शित किया गया था. फुजियान का फुल लोड डिस्प्लेसमेंट 80,000 टन से अधिक है. यह दैत्याकार एयरक्राफ्ट कैरियर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट के साथ अरेस्टिंग डिवाइस से भी लैस है. मई 2024 में अपनी पहली समुद्री परीक्षण के बाद से फुजियान ने निर्धारित योजना के अनुसार कई समुद्री परीक्षण किए हैं, जिनमें उपकरणों के कमीशनिंग और ऑपरेशन स्टैबिलिटी का मूल्यांकन भी शामिल है. फुजियान के आने से चीन की ताकत न केवल दक्षिणी चीन सागर और पूर्वी एशिया में बढ़ेगी, बल्कि हिंद महासागर में भी वह अपना प्रभुत्व दिखा सकेगा. वहीं बीते दिनों अमेरिका ने चीन के पूर्वी समुद्री क्षेत्र यानी एशिया पैसिफिक में अपने कई युद्धपोत उतारे थे. ये दक्षिण कोरिया और जापान से लेकर बांग्लादेश तक यात्रा पर रहे. वहीं चीन के इस युद्धपोत से भारत के लिए भी मुश्किल खड़ी हो सकती है. भारत हिंद महासागर को अपना क्षेत्र मानता है, लेकिन चीन अपनी दादागिरी दिखाने के लिए, जल्द ही कोई हरकत कर सकता है. अफ्रीका से पूर्वी क्षेत्र से लेकर मलक्का तक भारत सुरक्षा गारंटर बनना चाहता है, तो उसे चीन की हरकतों पर नजर रखनी पड़ेगी. 

शटडाउन का असर एयर ट्रैवल पर, अमेरिका के 40 हवाई अड्डों से उड़ानें रद्द और लेट

वाशिगटन   अमेरिका में शटडाउन का असर अब हवाई सेवाओं पर भी दिखने लगा है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार हजार से ज्याद फ्लाइट कैंसिल कर दी गई हैं। बता दें, अमेरिकी सरकार ने पहले ही 40 एयरपोर्ट पर 10 फीसदी फ्लाइट के संचालन में कटौती की चेतावनी जारी कर दी थी। अमेरिकी मीडिया ने बताया कि विमानन विश्लेषण कंपनी सिरियम के आंकड़ों के अनुसार, 7 से लेकर 9 नवंबर के लिए 1,700 से ज्यादा उड़ानें रद्द हुई हैं। वहीं फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) के आदेश के अनुसार, अमेरिका के प्रमुख शहरों के 40 हवाई अड्डों पर डोमेस्टिक फ्लाइट के संचालन में 4 फीसदी की कटौती की गई। जिन एयरपोर्ट की सेवाएं बाधित हुई हैं, उनमें अटलांटा, डेनवर, नेवार्क, शिकागो, ह्यूस्टन और लॉस एंजिल्स सहित अन्य शामिल हैं। एफएए ने कहा कि यह निर्णय वेतन न मिलने की वजह से हो रही वित्तीय कठिनाई के कारण लिया गया है। शुरुआत में चार प्रतिशत की कटौती लागू की गई, साथ ही चेतावनी दी गई कि अगर कांग्रेस किसी वित्तीय समझौते पर सहमत नहीं होती है, तो अगले सप्ताह कटौती को बढ़ाकर 10 प्रतिशत किया जा सकता है। एफएए ने कहा कि अगर यही स्थिति बरकरार रही तो एयरलाइनों को मंगलवार को इन हवाई अड्डों के लिए अपनी 6 फीसदी उड़ानें, गुरुवार को 8 फीसदी और अगले शुक्रवार को 10 फीसदी उड़ानें रद्द करनी पड़ सकती हैं। अमेरिका में शटडाउन को 38 दिन हो गए है और धीरे-धीरे इसका असर दिखने लगा है। यह अब तक का सबसे लंबा शटडाउन है। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान सबसे लंबा शटडाउन 35 दिनों का था। एफएए ने इससे पहले बताया था कि शटडाउन के कारण कर्मचारियों की कमी के बीच सुरक्षा मानकों को बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था। इस शटडाउन के कारण हजारों हवाई यातायात नियंत्रक और परिवहन सुरक्षा प्रशासन (टीएसए) के निरीक्षक बिना वेतन के काम कर रहे हैं। दूसरी ओर एफएए प्रशासक ब्रायन बेडफोर्ड ने कहा कि 'एजेंसी के आंकड़ों से कर्मचारियों में फ्लाइट के ऑपरेशन को लेकर तनाव और थकान महसूस की जा रही है। अगर इसे अनदेखा किया गया, तो एयरलाइन प्रणाली की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।' उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया की सबसे सुरक्षित एयरलाइन प्रणाली बनाए रखने के लिए इस समस्या का हल निकालना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया मोड़: तालिबान को रूस का समर्थन, भारत ने मदद का इशारा

काबुल  अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तुर्की में हो रही शांति वार्ता पर पाकिस्तानी हमलों का साया पड़ गया है। काबुल और इस्लामाबाद के संबंध भी नाजुक मोड़ पर आ गए हैं। एक तरफ दोनों पक्षों ने ताजा शांति वार्ता शुरू की, वहीं दूसरी ओर गुरुवार को अफगान-पाक सीमा पर स्पिन बोल्डक कस्बे के पास पाकिस्तान ने गोलीबारी को भड़काया। आपको बता दें कि दोनों पक्षों ने 19 अक्टूबर को दोहा में संघर्षविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, पिछले हफ्ते इस्तांबुल में हुई दूसरे दौर की बातचीत बिना किसी दीर्घकालिक समझौते के समाप्त हो गई थी। इसी कारण तीसरे दौर की वार्ता आवश्यक हो गई। अफगान मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, काबुल के प्रति पाकिस्तान की आक्रामक नीतियों के कारण दोनों के संबंध तनावपूर्ण और उदासीन बने रहने की आशंका है। जैसे ही शांति वार्ता शुरू हुई अफगानिस्तान में तालिबान शासन को रूस से समर्थन मिला। गुरुवार को, रूसी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (सेक्रेटरी ऑफ द कंट्रीज सिक्योरिटी काउंसिल) सर्गेई शोइगु ने सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CSTO) और स्वतंत्र राज्यों के राष्ट्रमंडल (CIS) की संयुक्त बैठक के दौरान अफगानिस्तान में "महत्वपूर्ण और सकारात्मक विकास" की बात की। शोइगु ने अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए भी अफगानिस्तान को क्षेत्रीय आर्थिक ढांचों में फिर से शामिल करने के महत्व पर जोर दिया। इसी बैठक को संबोधित करते हुए, CSTO के महासचिव इमानगाली तस्मागाम्बेटोव ने अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान के बीच सीमा सुरक्षा को मजबूत करने वाले कार्यक्रम को लागू करने पर बल दिया। उन्होंने उल्लेख किया कि अफगानिस्तान की स्थिरता और विकास उसके पड़ोसी देशों, विशेष रूप से CSTO सदस्य देशों के हितों के अनुरूप है। कृषि में भारत का सहयोग इस बीच, भारतीय राजनयिक मिशन के प्रमुख ने इस सप्ताह अफगानिस्तान के कृषि मंत्री से मुलाकात की। इस बैठक का उद्देश्य कृषि क्षेत्र और अनुसंधान में क्षमता निर्माण के साथ काबुल की सहायता करना था।

J&K के कुपवाड़ा में बड़ी सफलता! सेना ने घुसपैठ की कोशिश नाकाम कर 2 आतंकियों को किया ढेर

कुपवाड़ा जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा (LoC) के साथ घुसपैठ की कोशिश को सेना ने नाकाम कर दिया। साथ ही, जवानों ने 2 अज्ञात आतंकवादियों को मारा गिराया है। सेना के श्रीनगर स्थित चिनार कोर ने बताया कि खुफिया एजेंसियों से इनपुट मिला था। इसके आधार पर कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में घुसपैठ की कोशिश को रोकने के लिए अभियान शुरू किया गया। सेना ने एक्स पर पोस्ट में कहा, 'सतर्क सैनिकों ने संदिग्ध गतिविधि देखी और चुनौती दी। इस दौरान आतंकवादियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने दो आतंकवादियों को मार गिराया। फिलहाल इलाके की तलाशी जारी है।' वहीं, श्रीनगर में पुलिस ने  तीन संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया। उनके पास से हथियार और गोला-बारूद जब्त कर आतंकी साजिश नाकाम कर दी गई। पुलिस प्रवक्ता ने बताया कि ममता चौक, कोनाखान डलगेट के पास नियमित वाहनों की जांच चल रही थी। इस दौरान पुलिस की टीम ने बिना पंजीकरण संख्या वाली काले रंग की मोटरसाइकिल को रोका। रुकने का इशारा करने पर मोटरसाइकिल सवार और पीछे बैठे दो लोगों ने भागने की कोशिश की, लेकिन सतर्क पुलिसकर्मियों ने उन्हें तुरंत पकड़ लिया। देसी कट्टा और 9 जिंदा कारतूस बरामद पुलिस अधिकारी ने बताया कि गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान शाह मुतैयब और कामरान हसन शाह के रूप में हुई है। ये दोनों कुलीपोरा खानयार श्रीनगर के निवासी हैं। मोहम्मद नदीम उत्तर प्रदेश के मेरठ का निवासी है और वर्तमान में कावा मोहल्ला, खानयार में रह रहा है। पुलिस ने बताया कि इनके पास से एक देसी कट्टा और 9 जिंदा कारतूस बरामद हुए। शुरुआती जांच से संकेत मिलता है कि आरोपी बरामद हथियार और गोला-बारूद का इस्तेमाल करके इलाके में किसी आतंकी घटना को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। खानयार पुलिस स्टेशन में यूएपीए और मोटर वाहन अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।

9 साल बाद फिर याद आई नोटबंदी – जब 1000 गायब हुए और ₹2000 आए, फिर गायब हो गए

 नई दिल्ली   तारीख- 8 नवंबर 2016. रात के 8 बजे, अचानक देश को संबोधित करने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देशवासियों की निगाहें टेलीविजन पर टिकी थीं. पीएम मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए तत्काल प्रभाव से 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने का ऐलान कर दिया, पूरा देश सन्न रह गया था.  दरअसल, आज नोटबंदी के 9 साल पूरे हो चुके हैं. लेकिन वो मंजर आज भी सभी को याद है. 8 नवंबर 2016 को हुए ऐलान ने देश की अर्थव्यवस्था, बाजार और आम आदमी से लेकर खास को हिलाकर रख दिया था. 500 और 1000 रुपये के नोट बंद किए जाने से सिस्टम में कैश की दिक्कत होने लगी थी. जिससे तुरंत 2000 रुपये का नोट पहली बार जारी किया गया था. लोगों को जल्दी राहत देने के लिए RBI ने बड़ी वैल्यू वाला नया 2000 रुपये का नोट जारी किया, ताकि बाजार में कैश फ्लो बढ़े. लेकिन इसके बावजूद महीनों तक लोग कैश के लिए बैंकों और ATM के बाहर में घंटों तक कतार में खड़े होने के लिए मजबूर थे. 2000 रुपये के नोट सिस्टम से आउट फिर 10 नवंबर 2016 को RBI ने 500 रुपये का नया नोट जारी किया. साल 2017 में 200 रुपये के नए नोट जारी किए गए. हालांकि मई- 2023 में RBI ने 2000 रुपये के नोट को चलन से वापस लेने की घोषणा की, लेकिन इसे वैध मुद्रा (Legal Tender) माना गया. यानी अब भी यह नोट मान्य है, लेकिन बैंकों से यह नोट नहीं मिलेगा.  सरकार का दावा था कि नोटबंदी का मकसद  काला धन, आतंक फंडिंग और नकली करेंसी पर लगाम लगाना था. लेकिन सवाल उठता है कि क्या नोटबंदी ने अपने लक्ष्य हासिल किए? क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि बंद किए गए लगभग 15.44 लाख करोड़ रुपये में से 15.31 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए. यानी 99 फीसदी ज्यादा पैसा 'सफेद' बन गया. नकली नोट जरूर कम हुए, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ. आज भी जगह-जगह नकली नोट पकड़े जाते हैं.  नोटबंदी से डिजिटल पेमेंट की खुली राह  हालांकि नोटबंदी के बाद देश डिजिटल पेमेंट का प्रचलन तेजी से बढ़ा है. अगर नोटबंदी की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जाए, तो वह डिजिटल पेमेंट की क्रांति है. Paytm, PhonePe, Google Pay जैसे ऐप ने गांव-गांव तक लेनदेन का तरीका बदल दिया. आज अधिकतर लोग डिजिटल पेमेंट से लेन-देन करते हैं.  UPI के जरिये रोजाना करीब 14 करोड़ से अधिक ट्रांजेक्शन होता है, जो कि 2016 की तुलना में 1000 गुना अधिक है.  छोटे दुकानदार से लेकर सब्जीवाले तक QR कोड से पेमेंट ले रहे हैं, नोटबंदी के समय देश में डिटिजल पेमेंट का उपयोग कुछ चुनिंदा लोगों के द्वारा किया जाता था. लेकिन नोटबंदी के कारण नकद की कमी के चलते करीब सभी वर्गों में यह तेजी से लोकप्रिय हुआ.नोटबंदी के एक साल के अंदर ही डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ा बूम देखने को मिला था.  हालांकि नोटबंदी की वजह से छोटे उद्योग, कैश-डिपेंडेंट सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था. छोटे उद्योगों को पटरी पर लौटने में कई वर्ष लग गए. जानकार तो ये भी कहते हैं कि नोटबंदी की वजह GDP में गिरावट दर्ज की गई थी. नोटबंदी से काला धन खत्म हुआ या नहीं, इस पर अभी भी राजनीतिक गलियारों में बहस जारी है. 

कटरा रूट पर बड़ा बदलाव: कई ट्रेनें रद्द, अनेक के रूट सीमित — वैष्णो भक्तों की बढ़ी मुश्किलें

नई दिल्ली  उत्तर भारत से जम्मू-कश्मीर को जोड़ने वाली रेल सेवाओं को बड़ा झटका लगा है। उत्तर रेलवे ने एक साथ 22 ट्रेनों को मार्च 2026 तक रद्द करने और कई ट्रेनों के रूट को सीमित करने का निर्णय लिया है। इस कदम से जहां यात्रियों की यात्रा योजनाएं प्रभावित होंगी, वहीं माता वैष्णो देवी यात्रा, सर्दियों का पर्यटन सीजन और स्थानीय कारोबार पर भी गहरा असर पड़ेगा। रेलवे ने इस फैसले के पीछे पुलों की मरम्मत और इंजीनियरिंग प्रतिबंध (EER) को कारण बताया है। 6 नवंबर को जारी आदेश के अनुसार, कठुआ और माधोपुर स्टेशनों के बीच पुल नंबर 17, उधमपुर-चक रकवाल सेक्शन के बीच पुल नंबर 163 और पठानकोट-कंदरोड़ी (अप/डाउन) के बीच पुल नंबर 137 और 232 की मरम्मत कार्यों के चलते यह कदम उठाया गया है।   मार्च 2026 तक रद्द की गई प्रमुख ट्रेनें रद्द की गई 22 ट्रेनों में दिल्ली, जम्मू, कटड़ा, उधमपुर और तिरुपति जैसी प्रमुख गंतव्यों को जोड़ने वाली कई महत्वपूर्ण सेवाएं शामिल हैं। इनमें प्रमुख ट्रेनें हैं- 12207/08 गरीब रथ एक्सप्रेस (काठगोदाम–जम्मू तवी) 12265/66 दुरंतो एक्सप्रेस (दिल्ली–जम्मू) 14503/04 कालका–कटड़ा एक्सप्रेस 14611/12 गोरखपुर–कटड़ा एक्सप्रेस 22439/40 वंदे भारत एक्सप्रेस (नई दिल्ली–श्री माता वैष्णो देवी कटरा) 22705/06 हमसफर एक्सप्रेस (तिरुपति–जम्मू) 22401/02 दिल्ली–उधमपुर एसी एक्सप्रेस 22431/32 सुल्तानपुर–उधमपुर सुपरफास्ट एक्सप्रेस 19107/08 जनभूमि एक्सप्रेस (भावनगर–उधमपुर) 26405/06 अमृतसर–कटड़ा वंदे भारत एक्सप्रेस सीमित रूट पर चलेंगी ये ट्रेनें रेलवे ने कुछ ट्रेनों को पूरी तरह रद्द नहीं किया है, बल्कि उन्हें सीमित रूट पर चलाने का फैसला किया है। इनमें शामिल हैं- 12549/50 दुर्ग–उधमपुर सुपरफास्ट एक्सप्रेस: अब केवल जम्मू छावनी तक 19223/24 साबरमती–जम्मू तवी एक्सप्रेस: अब फिरोजपुर तक 19415/16 साबरमती–कटड़ा एक्सप्रेस: अब अमृतसर तक 20433/34 सुल्तानपुर–कटड़ा जम्मू मेल: अब अंबाला तक 20847/48 दुर्ग–उधमपुर एक्सप्रेस: अब अंबाला तक 20985/86 कोटा–उधमपुर एक्सप्रेस: अब लुधियाना तक 22941/42 इंदौर–उधमपुर एक्सप्रेस: अब जम्मू छावनी तक 14803/04 बीकानेर–जम्मू तवी एक्सप्रेस: अब पठानकोट तक सीमित कब बहाल होंगी सेवाएं? रेलवे ने कुछ ट्रेनों की बहाली की तारीखें भी घोषित की हैं। इनमें 14661/62 शालीमार मलानी एक्सप्रेस, 22461/62 श्री शक्ति एक्सप्रेस और 74906/07 उधमपुर–पठानकोट डीएमयू सेवा शामिल हैं, जिन्हें 30 नवंबर से 3 दिसंबर 2025 के बीच चरणबद्ध तरीके से फिर से शुरू किया जाएगा। पर्यटन और स्थानीय कारोबार पर असर ट्रेनों के रद्द और सीमित होने से श्रद्धालुओं, पर्यटकों और व्यापारिक यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। वैकल्पिक परिवहन साधन सीमित हैं, जबकि बसों और निजी वाहनों से यात्रा करना महंगा साबित होगा। स्थानीय होटल कारोबारी, ट्रैवल एजेंट और टैक्सी चालक कहते हैं कि ट्रेनों की कमी से यात्रियों की संख्या घटेगी और उनका व्यवसाय प्रभावित होगा। उन्होंने रेलवे से मरम्मत कार्यों को जल्द पूरा करने और अस्थायी वैकल्पिक सेवाएं शुरू करने की मांग की है, ताकि क्षेत्र की पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को राहत मिल सके।

सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट: सौर ऊर्जा के बढ़ते उपयोग से 2047 में खुल सकता है विशाल रीसाइक्लिंग व्यवसाय

नई दिल्ली खराब या प्रयोग से बाहर हो चुके सौर पैनलों से सामग्रियों को निकालना और उन्हें दोबारा इस्तेमाल करना 2047 में 3,700 करोड़ रुपये का बाजार अवसर हो सकता है। यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के दो नए स्वतंत्र अध्ययनों से सामने आई है, जिन्हें आज जारी किया गया है। इनमें बताया गया है कि यदि यह संभावित क्षमता हकीकत बनती है तो सौर कचरे से सिलिकॉन, तांबा, एल्यूमीनियम और चांदी जैसी मूल्यवान सामग्रियों को दोबारा निकाला जा सकता है और इससे 2047 तक क्षेत्र की विनिर्माण जरूरतों का 38 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा सकता है। साथ में, नई सामग्री की जगह पर पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग से 37 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन भी बचाया जा सकता है। भारत का सोलर मॉड्यूल रीसाइक्लिंग मार्केट अभी बहुत प्रारंभिक चरण में है, जिसमें कुछ कमर्शियल रीसाइक्लर्स काम कर रहे हैं। सीईईडब्ल्यू के दोनों अध्ययन एक घरेलू सोलर रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम बनाने के लिए भारत की पहली व्यापक रूपरेखा उपलब्ध कराते हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा और विनिर्माण में आत्मनिर्भरता, दोनों का ही समर्थन करता है।  अनुमान है कि 2047 तक, भारत की स्थापित सौर क्षमता से 11 मिलियन टन से अधिक सौर कचरा निकल सकता है, जिसका अधिकांश हिस्सा क्रिस्टलीन-सिलिकॉन मॉड्यूल से होगा। इसके प्रबंधन के लिए देश भर में लगभग 300 रीसाइक्लिंग प्लांट्स और 4,200 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी। ऋषभ जैन, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत की सौर क्रांति एक नए हरित औद्योगिक अवसर को ताकत दे सकती है। अपनी स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों में सर्कुलैरिटी (चक्रीयता) को शामिल करके, हम महत्वपूर्ण खनिजों को दोबारा हासिल कर सकते हैं, आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बना सकते हैं, और हरित नौकरियां (green jobs) सृजित कर सकते हैं, साथ में, संभावित कचरे को स्थायी मूल्य में बदल सकते हैं। इस सर्कुलर इकोनॉमी (circular economy) का निर्माण भारत के लचीले और जिम्मेदारीपूर्ण विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।” सीईईडब्ल्यू अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि सौर पैनलों की रीसाइक्लिंग (solar recycling) की एक औपचारिक व्यवस्था आज भी अव्यवहार्य है, क्योंकि रीसाइक्लर्स को प्रति टन 10,000-12,000 रुपये का नुकसान हो रहा है। बड़े परिचालन खर्चों में बेकार या प्रयोग से बाहर हो चुके सोलर मॉड्यूल को दोबारा खरीदना है, जो कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई (लगभग 600 रुपये प्रति पैनल) होता है। इसके बाद प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), संग्रहण (कलेक्शन) और निपटान (डिस्पोजल ) की लागत आती है। सौर पैनल रीसाइक्लिंग को लाभदायक बनाने के लिए, खराब मॉड्यूल की कीमत 330 रुपये से कम होनी चाहिए, या रीसाइक्लर्स को ईपीआर सर्टिफिकेट ट्रेडिंग, टैक्स राहत और सिलिकॉन व चांदी की कुशल पुनर्प्राप्ति के लिए शोध एवं विकास निवेश के जरिए मदद दी जानी चाहिए। आकांक्षा त्यागी, प्रोग्राम लीड, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “सोलर रीसाइक्लिंग भारत की स्वच्छ ऊर्जा और विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के बीच पुल बन सकती है। कचरा प्रबंधन से आगे, यह सरलता से सामग्री निकालने के लिए उपयुक्त पैनल डिजाइन करके, सामग्री की शुद्धता में सुधार लाकर और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए नई वैल्यू चेन बनाकर, इनोवेशन का अवसर भी देता है। ईपीआर लक्ष्यों को लाने, सर्कुलर उत्पादों के लिए मांग पैदा करने, डेटा पारदर्शिता में सुधार लाने और रीसाइक्लिंग को ध्यान में रखकर उत्पादों को डिजाइन करने जैसे उपायों से भारत की सौर कचरे की चुनौती एक हरित उद्योग अवसर में बदल सकती है।” रिसाइक्लिंग को विस्तार देने के लिए, सीईईडब्ल्यू के अध्ययन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 के तहत संग्रहण और पुनर्प्राप्ति (collection and recovery) के लिए ईपीआर लक्ष्यों को लाने, और नीति, वित्त और उद्योग कार्रवाई में समरूपता के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत एक सर्कुलर सोलर टास्कफोर्स बनाने का सुझाव देते हैं। इममें वेस्ट हॉटस्पॉट का पता लगाने के लिए एक केंद्रीकृत सोलर इन्वेंट्री बनाने का भी सुझाव दिया गया है और निर्माताओं से सामग्री के आंकड़े साझा करने और आसानी से रिसाइकिल होने वाले मॉड्यूल बनाने का आग्रह किया गया है। एक साथ मिलकर ये कदम एक मजबूत संग्रह प्रणाली बनाएंगे, सामग्री को दोबाारा हासिल में अनुसंधान व विकास को बढ़ावा देंगे, और भारत के अक्षय ऊर्जा मिशनों में सर्कुलरिटी को भी शामिल करेंगे, ताकि स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन संसाधनों के मामले में लचीला और आत्मनिर्भर बना रहे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान: S-400 खरीद और 50,000 करोड़ का हथियार निर्यात लक्ष्य

नई दिल्ली रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत अपनी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और आने वाले समय में रूस से और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदेगा. इसी साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 डिफेंस सिस्टम ने अपनी ताकत दिखाई थी. इस डिफेंस सिस्टम के बदले भारत ने पाकिस्तानी क्षेत्र में सैकड़ों किमी भीतर जाकर उसके लड़ाकू विमानों को मार गिराया था. एस-400 की इस सफलता के बाद से इस डिफेंस सिस्टम की दुनिया में चर्चा होने लगी. भारत ने 2018 में रूस के साथ पांच एस-400 डिफेंस सिस्टम की डील की थी. इसमें से तीन सिस्टम भारत को मिल चुके हैं. इस पुरानी डील के दो सिस्टम की डिलिवरी में यूक्रेन युद्ध के कारण देरी हो रही है. इस बीच भारत ने अपने आसमान को और सुरक्षित बनाने के लिए और एस-400 सिस्टम खरीदने की बात कही है. 50 हजार करोड़ के निर्यात का लक्ष्य  राजनाथ सिंह ने रूस से और एस-400 डिफेंस सिस्टम खरीदने की बात कही. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत आज 25000 करोड़ रुपये का एर्म्स एक्सपोर्ट कर रहा है और उसका लक्ष्य इसको बढ़ाकर 50 हजार करोड़ रुपये करने का है. सिंह ने  कहा कि देसी न्यूक्लियर सबमरीन प्रोजेक्ट में थोड़ा समय लग रहा है लेकिन इसमें बहुत अधिक देरी नहीं हुई है. इसमें हम अच्छी प्रगति कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य आने वाले वक्त में हथियारों को लेकर किसी अन्य देश पर निर्भर रहने की नहीं है. हम आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं. उन्होंने एक अन्य सवाल पर कहा कि थिएटराइजेशन की दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है. उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन त्रिशूल एक रूटीन एक्सरसाइज है. भारत इस वक्त ऑपरेशन त्रिशूल चला रहा है. नए S-400 पर दिसंबर में डील हो सकती है भारत रूस से कुछ और S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीद सकता है। ऐसे पांच सिस्टम्स की डील पहले ही हुई थी, जिनमें से 3 भारत को मिल चुके हैं। चौथे स्क्वाड्रन की डिलीवरी रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रुकी हुई है। नई डील इनके अलावा होगी। न्यूज एजेंसी PTI के सोर्स के मुताबिक, दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के समय डील पर बातचीत हो सकती है। भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ 5 अरब डॉलर का समझौता किया था। उस समय अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि इस सौदे को आगे बढ़ाने पर वह CAATSA कानून के तहत भारत पर पाबंदी लगा सकता है। भारत S-500 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भी विचार कर रहा है। S-400 और S-500 दोनों ही मॉडर्न मिसाइल सिस्टम हैं। इनका इस्तेमाल एयर डिफेंस और दुश्मन के हवाई हमलों से बचने के लिए किया जाता है। एयर चीफ मार्शल बोले थे- भारत जरूरत के हिसाब से सिस्टम खरीदेगा हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने और S-400 खरीदने के सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था- भारत के पास अभी तीन स्क्वाड्रन इसी ऑपरेशन के साथ S-400 का कॉम्बैट डेब्यू भी हो गया. हलांकि भारत ने रूस से कुल 5 यूनिट्स की डील की थी, लेकिन अब तक केवल तीन स्क्वाड्रन ही भारतीय वायुसेना को मिल पाई हैं. पहली स्क्वाड्रन – दिसंबर 2021 में मिली तो दूसरी स्क्वाड्रन – अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में मिली हैं. ये स्क्वाड्रन क्रमशः आदमपुर (पंजाब), पूर्वी सेक्टर और पश्चिमी सेक्टर में तैनात की गई हैं. सूत्रों के मुताबिक चौथी यूनिट 2026 में और अंतिम पांचवी यूनिट 2027 तक भारत को मिलने की संभावना है. अगर एस-400 की खासियतों की बात करें तो यह 600 किलोमीटर तक दुश्मन की आसमानी गतिविधियों पकड़ने की क्षमता रखता है . साथ ही यह सिस्टम एक साथ 100 से अधिक लक्ष्यों पर नज़र रख सकता है. रूस से और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदेगा भारत, ऑपरेशन सिंदूर में पाक को चटाई थी धूल भारत ने 2018 में इस सौदे पर 39,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे. अब एस-400 की बची हुई दो स्क्वाड्रन की तैनाती के बाद भारत की वायु रक्षा क्षमता और भी अभेद्य हो जाएगी. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान S-400 ने दिखाई अपनी ताकत एस-400 एक पावरफुल वेपन सिस्टम है, जो दुश्मन के हमने से बचाव कर उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हुए जबरदस्त हमला भी करता है. इस लिहाज से देश के लिये S-400 वेपन सिस्टम काफी जरूरी हो जाता है. भारत ने साल 2018 में चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए रूस से लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम S-400 खरीदने का बड़ा निर्णय लिया था. यह फैसला ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी तरह सही साबित हुआ, जब पाकिस्तान के हवाई हमलों को भारत की एस-400 बैटरी ने आसमान में ही नष्ट कर दिया था. भारत के पास अभी तीन स्क्वाड्रन इसी ऑपरेशन के साथ S-400 का कॉम्बैट डेब्यू भी हो गया. हलांकि भारत ने रूस से कुल 5 यूनिट्स की डील की थी, लेकिन अब तक केवल तीन स्क्वाड्रन ही भारतीय वायुसेना को मिल पाई हैं. पहली स्क्वाड्रन – दिसंबर 2021 में मिली तो दूसरी स्क्वाड्रन – अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में मिली हैं. ये स्क्वाड्रन क्रमशः आदमपुर (पंजाब), पूर्वी सेक्टर और पश्चिमी सेक्टर में तैनात की गई हैं. सूत्रों के मुताबिक चौथी यूनिट 2026 में और अंतिम पांचवी यूनिट 2027 तक भारत को मिलने की संभावना है. अगर एस-400 की खासियतों की बात करें तो यह 600 किलोमीटर तक दुश्मन की आसमानी गतिविधियों पकड़ने की क्षमता रखता है . साथ ही यह सिस्टम एक साथ 100 से अधिक लक्ष्यों पर नज़र रख सकता है. 400 किलोमीटर की दूरी तक वार की क्षमता एस-400 की मदद से 400 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के एयर एसैट्स को गिराने की क्षमता रखता है. एस-400 बॉम्बर, फाइटर जेट, ड्रोन, अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट और बैलिस्टिक मिसाइल तक को ध्वस्त कर सकता है . इसमें मल्टी-रेंज मिसाइलें तैनात होती हैं. एस-400 की एक रेजिमेंट में 8 लॉन्च व्हीकल होते है . प्रत्येक में 4 मिसाइल ट्यूब यानी 32 मिसाइलों के साथ-साथ कमांड-एंड-कंट्रोल और एडवांस राडार भी होता है. 2018 में भारत ने 39 हजार करोड़ रुपए में किया था डील भारत ने 2018 में … Read 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