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सरकार अपना सकती है ‘मिडिल पाथ’, 8वें वेतन आयोग में सीमित बढ़ोतरी के संकेत

नई दिल्ली 8वें वेतन आयोग को लेकर देशभर के लाखों केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनर्स बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। हर तरफ यही चर्चा है कि इस बार सैलरी में कितना बड़ा इजाफा होगा और क्या कर्मचारियों की लंबे समय से चली आ रही मांगें पूरी होंगी। लेकिन, अब जो संकेत सामने आ रहे हैं, उनसे लग रहा है कि सरकार बहुत बड़ा वेतन बढ़ोतरी पैकेज देने के बजाय मिडिल पाथ यानी संतुलित रास्ता अपना सकती है। आसान शब्दों में कहें तो कर्मचारियों को अच्छी बढ़ोतरी तो मिल सकती है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक बहुत बड़ा धमाका शायद न हो। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं। दरअसल, कर्मचारी संगठनों ने 8वें वेतन आयोग के सामने कई बड़ी मांगें रखी हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा फिटमेंट फैक्टर को लेकर हो रही है। यूनियनों की मांग है कि फिटमेंट फैक्टर को 3.83 तक बढ़ाया जाए। फिटमेंट फैक्टर वही गणितीय फॉर्मूला होता है, जिससे कर्मचारियों की पुरानी बेसिक सैलरी को नई सैलरी में बदला जाता है। उदाहरण के लिए 7वें वेतन आयोग में 2.57 फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जिसके बाद न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हो गई थी। अगर इस बार 3.83 फिटमेंट फैक्टर लागू होता है, तो कर्मचारियों की सैलरी में जबरदस्त उछाल देखने को मिल सकता है। लेकिन, एक्सपर्ट और कुछ यूनियन नेताओं का मानना है कि सरकार इतनी बड़ी बढ़ोतरी को मंजूरी देने से बच सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश पर बढ़ता वित्तीय बोझ है। सरकार को सिर्फ केंद्रीय कर्मचारियों की सैलरी ही नहीं बढ़ानी होती, बल्कि उसके साथ पेंशन, भत्ते और रिटायरमेंट से जुड़े खर्च भी तेजी से बढ़ जाते हैं। इसके अलावा केंद्र के फैसले का असर राज्यों पर भी पड़ता है, क्योंकि ज्यादातर राज्य सरकारें भी बाद में अपने कर्मचारियों के वेतन में संशोधन करती हैं। ऐसे में अगर बहुत बड़ा फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया, तो सरकारी खजाने पर लाखों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। महंगाई और बढ़ती जीवनशैली की लागत को देखते हुए कर्मचारी संगठन वेतन में बड़ी बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में घर खर्च, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च काफी बढ़ गया है। ऐसे में मौजूदा वेतन संरचना कर्मचारियों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही। हालांकि, सरकार आर्थिक संतुलन को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती। यही वजह है कि अब यह माना जा रहा है कि सरकार बहुत बड़ा वेतन विस्फोट करने के बजाय एक मॉडरेट यानी संतुलित वेतन संशोधन का रास्ता चुन सकती है। मतलब कर्मचारियों को राहत जरूर मिलेगी, लेकिन सभी मांगें पूरी होना मुश्किल दिख रहा है। 8वां वेतन आयोग करीब 1.1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स को प्रभावित करेगा। इसलिए, इसकी हर छोटी अपडेट पर लोगों की नजर बनी हुई है। अब सभी को इंतजार है कि आयोग अपनी अंतिम सिफारिशों में क्या प्रस्ताव देता है और सरकार उस पर कितना अमल करती है।

क्षेत्रीय तनाव के बीच ब्रह्मोस बना चर्चा का केंद्र, विरोधी खेमे में बढ़ी बेचैनी

नई दिल्ली भारत की एक कूटनीतिक चाल से इस्‍लामिक NATO के खलीफ तुर्की का दम घुटने लगना है. तुर्की ने जिस तरह से आतंकवादियों के पनाहगार पाकिस्‍तान का साथ दे रहा है, उससे भारत को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने और उसे बदलने पर मजबूर होना पड़ा है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की एक्‍सपर्ट पाकिस्‍तान में मौजूद थे. इससे भारत की चिंता और भी बढ़ गई. इसके बाद तुर्की को उसके ही आंगन में घेरने की कवायद शुरू कर दी गई. अब इसका असर दिखने लगा है. तुर्की की बौखलाहट बढ़ गई है. दरअसल, भारत ने भूमध्‍य सागर में अपनी डिफेंस डिप्‍लोमेसी को रफ्तार के साथ धार देना भी शुरू कर दिया है. अभी तो बस शुरुआत भर है, लेकिन उससे ही इस्‍लामिक NATO के इस खलीफा का दम निकलने लगा है. भारत तुर्की के तीन पड़ोसी देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों को लगातार नई ऊंचाई दे रहा है. इन तीनों देशों ने ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल की खरीद में दिलचस्‍पी भी दिखाई है. ब्रह्मोस का नाम सुनकर ही तुर्की में घबराहट है. तुर्की की मीडिया में इस बात की ड‍िमांड भी बढ़ गई है कि इससे पहले कि ग्रीस की हाथों में ब्रह्मोस जैसी मिसाइल और मॉडर्न वेपन सिस्‍टम पहुंचे, उसपर अटैक कर देना चाहिए। पिछले कुछ सालों में भारत ने भूमध्‍य सागर में तुर्की के तीन पड़ोसी देशों – अर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने पर काम करना शुरू किया है. खासकर रक्षा के क्षेत्र में तीनों देशों ने भारत के साथ संबंधों को नया आयाम देने की गंभीर कोशिश की है. तुर्की के मनमाने रवैये से परेशान अर्मेनिया के भारत के साथ मजबूत रक्षा संबंध हैं. अर्मेनिया को भारत से कई तरह के मॉडर्न वेपन सिस्‍टम भी मिले हैं. दूसरी तरफ, साइप्रस और ग्रीस भी भारत के साथ रक्षा संबंधों को बढ़ाने में जुटे हैं. कुछ दिनों पहले ही साइप्रस के प्रधानमंत्री निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स भारत के दौरे पर आए थे. इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को स्‍ट्रैटजिक पार्टनरशिप का दर्जा देने पर सहमति जताई है. इसके साथ ही साइप्रस और भारत के बीच रक्षा संबंध आने वाले दिनों में और भी मजबूत होने की संभावना प्रबल हो गई है. भारत और ग्रीस के बीच भी स्‍ट्रैटजकि पार्टनरशिप को लेकर एग्रीमेंट हुआ है. एथेंस ने ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने में अपनी दिलचस्‍पी दिखाई है। तुर्की में बौखलाहट इस्‍लामिक NATO के जरिये भारत की घेरेबंदी करने की साजिश कर रहा है तुर्की अब भारत की कूटनीति के सामने पस्‍त होता दिख रहा है. दरअसल, तुर्की की ग्रीस से पुरानी रंजिश रही है. अब जब यह खबर सामने आई कि ग्रीस भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने की तैयारी कर रहा है तो तुर्की की सांस उखड़ने लगी है. अंकारा में बौखलाहट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तुर्की की मीडिया में ग्रीस पर पहले ही अटैक करने की सलाह दी जाने लगी है. तुर्की के एक्‍सपर्ट और नीति-नर्माताओं को इस बात का डर है कि यदि ग्रीस के पास ब्रह्मोस मिसाइल आ गई तो रीजन में सिक्‍योरिटी कैलकुलेशन पूरी तरह से बदल जाएगा. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की के साथ ही पूरी दुनिया ने देखा कि ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल ने किस तरह से पाकिस्‍तान के तमाम एयर डिफेंस सिस्‍टम को भेदते हुए तबाही ट्रेलर दिखाया था। इस वजह से ब्रह्मोस बेहद खास     दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल: ब्रह्मोस लगभग Mach 2.8 से 3 की रफ्तार से उड़ती है, यानी आवाज की गति से करीब तीन गुना तेज।     भारत-रूस की संयुक्त परियोजना: इसे भारत के DRDO और रूस की NPO Mashinostroyenia ने मिलकर विकसित किया है।     मल्टी-प्लेटफॉर्म लॉन्च क्षमता: ब्रह्मोस को जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी से लॉन्च किया जा सकता है।     ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक: लॉन्च के बाद इसे लगातार कंट्रोल करने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे दुश्मन के लिए इसे रोकना मुश्किल हो जाता है।     बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान: यह समुद्र की सतह से सिर्फ 5 से 10 मीटर ऊपर उड़ सकती है, जिससे रडार पर पकड़ना कठिन होता है।     उच्च सटीकता के साथ हमला: ब्रह्मोस दुश्मन के ठिकानों और युद्धपोतों पर बेहद सटीक निशाना लगाने में सक्षम है।     दो चरण वाला इंजन सिस्टम: पहले चरण में सॉलिड बूस्टर और दूसरे चरण में लिक्विड रैमजेट इंजन इस्तेमाल होता है, जो इसे सुपरसोनिक गति देता है।     भारी वारहेड ले जाने की क्षमता: यह करीब 200 से 300 किलोग्राम तक का पारंपरिक वारहेड ले जा सकती है।     दुश्मन के लिए इंटरसेप्ट करना मुश्किल: इसकी तेज गति, कम ऊंचाई वाली उड़ान और बदलते फ्लाइट पाथ इसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बनाते हैं।     भारत का सफल रक्षा निर्यात हथियार: फिलीपींस ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बना और अब कई अन्य देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं। अर्मेनिया और साइप्रस को भी मिलेगा ब्रह्मोस? तुर्की के दो और पड़ोसी देश भारत के अहम साझीदार हैं – अर्मेनिया और साइप्रस. इन दोनों देशों ने भी नई दिल्‍ली के साथ अपने संबंधों को स्‍ट्रैटजिक लेवल पर अपग्रेड किया है. अर्मेनिया पहले से ही भारतीय हथ‍ियारों का बड़ा खरीदार बना हुआ है. वहीं, साइप्रस के प्रधानमंत्री निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स कुछ दिनों पहले ही भारत की यात्रा पर आए थे. इस दौरान दोनों देशों ने डिफेंस सेक्‍टर में साझीदारी को लेकर सहमति जताई है. ग्रीस और अर्मेनिया की तरह ही साइप्रस ने भी भारत से ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल खरीदने की चाहत दिखाई है. उम्‍मीद है कि आने वाले दिनों, महीनों या कुछ वर्षों में ग्रीस, अर्मेनिया और साइप्रस के पास ब्रह्मोस मिसाइल होगी. इस तरह तुर्की तीन तरफ से यानी पूरब, पश्चिम और दक्षिण तीन दिशाओं से ब्रह्मोस मिसाइल की नोक पर होगा. और इसी बात से तुर्की में खलबली मची हुई है. तुर्की के एनालिस्‍ट और वहां की मीडिया पहले ही ग्रीस पर अटैक करने की बात करने लगे हैं।  

समय से पहले दस्तक की उम्मीद टूटी, आखिर क्यों लेट हुआ मॉनसून?

नई दिल्ली  देशभर में बदलते मौसम के बीच मानसून की रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई है। अंडमान सागर और श्रीलंका तक समय से पहले पहुंचने वाला मानसून भारत की मुख्य भूमि के करीब आकर ठहर गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह बंगाल की खाड़ी में सक्रिय हुआ चक्रवाती मौसम सिस्टम और हवाओं के बदले हुए रुख को माना जा रहा है। मौसम विभाग ने पहले 26 मई के आसपास केरल में मानसून पहुंचने का अनुमान किया था, लेकिन अब इसके तीन से चार जून के बीच दस्तक देने की संभावना है। केरल में मानसून अब 3-4 जून को पहुंचेगा आईएमडी के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्रा शुक्रवार को मानसून का दूसरा अग्रिम अनुमान जारी करेंगे, जिसके बाद स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी। मौसम विज्ञानी एवं स्काइमेट के अध्यक्ष जेपी शर्मा का कहना है कि इस बार मानसून की शुरुआत धीमी और संतुलित रह सकती है। उनके मुताबिक अगर मानसून तीन-चार जून तक केरल पहुंच भी जाता है तो शुरुआत में इसकी रफ्तार कमजोर रहेगी और यह तेजी से उत्तर भारत की ओर आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने इसे मानसून की सॉफ्ट लैंडिंग बताया है। बंगाल की खाड़ी में चक्रवात मुख्य कारण मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की चाल अभी पूरी तरह समुद्री हवाओं पर निर्भर है। बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवाती सिस्टम ने मानसूनी हवाओं को अपनी ओर खींच लिया है। इससे अरब सागर से केरल की तरफ बढ़ने वाली नमी भरी दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। यही कारण है कि मानसून की प्रगति रुक गई और उत्तर की ओर बढ़ने की उसकी रफ्तार धीमी हो गई। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून अरब सागर, लक्षद्वीप एवं बंगाल की खाड़ी के कुछ हिस्सों तक आगे बढ़ चुका है, लेकिन केरल तट पर इसके आगमन के लिए जरूरी परिस्थितियां अभी पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। निचले स्तर की हवाएं धीरे-धीरे मजबूत हो रही हैं, मगर ऊपरी स्तर की हवाएं अभी सही दिशा में नहीं बह रहीं। इसी वजह से मानसून को आगे बढ़ने में समय लग रहा है। श्रीलंका में भी देरी से पहुंच रहा मानसून  श्रीलंका में मानक समय से छह दिन की देरी से आधिकारिक तौर पर मानसून पहुंच गया है। श्रीलंका पहुंचने के लगभग एक सप्ताह बाद मानसून केरल पहुंचता है। ऐसे में अब दो से चार जून के बीच केरल में मानसून के प्रवेश की संभावना सबसे ज्यादा मानी जा रही है। हालांकि केरल में अभी भारी बारिश हो रही है, लेकिन उसे प्री-मानसून की श्रेणी में रखा गया है। एल नीनो का शुरुआती प्रभाव भी संभव मानसून घोषित करने के लिए मौसम विभाग के तय 14 केंद्रों में से कम से कम 60 प्रतिशत केंद्रों पर लगातार दो दिनों तक 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज होना जरूरी होता है। इसके साथ हवा की गति, दिशा और बादलों की स्थिति भी तय मानकों पर खरी उतरनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि भीषण गर्मी और मानसून की देरी का सीधा संबंध समुद्री और वायुमंडलीय हालात पर निर्भर है। प्रशांत महासागर की स्थिति अभी धीरे-धीरे अलनीनो की ओर बढ़ती दिख रही है। मौसम विभाग का कहना है कि एल-नीनो की शुरुआती छाया मानसून की गति एवं वर्षा के वितरण को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल इसका असर शुरुआती चरण में ही माना जा रहा है।  

अब PNG और LPG दोनों रख सकेंगे उपभोक्ता, गैस सिलेंडर पर नया अपडेट

नई दिल्ली शहर बदलते हैं, तो सामान तो पैक हो जाता है, लेकिन रसोई की गैस वाली मुसीबत कई लोगों के लिए 'गले की हड्डी' बन जाती थी. अक्सर लोग पीएनजी यानी पाइप वाली गैस लेने से कतराते थे, क्योंकि डर यही रहता था कि अगर कल को कहीं और शिफ्ट होना पड़ा, तो फिर से नए कनेक्शन के चक्कर में कौन धक्के खाएगा. अब दिल्ली सरकार और केंद्र के नए आदेश के बाद इस मामले में भी राहत मिल रही है. दरअसल, सरकार ने एलपीजी नियमों में गजब के बदलाव किए हैं, जिसके बाद अब आपका पुराना कनेक्शन 'डेड' नहीं होगा, बल्कि उसे 'पॉज' माना जाएगा। अगर आपके घर में भी नया पीएनजी कनेक्शन लगा है, तो यह जानकारी आपके बहुत काम की है. HPCL ने ग्राहकों को बताया है कि जिन घरों में पीएनजी कनेक्शन एक्टिव हो चुका है, उनके पास अब 2 रास्ते हैं. या तो वे पीएनजी लगने के 30 दिनों के भीतर अपना एलपीजी कनेक्शन को सरेंडर करके हमेशा के लिए खत्म कर दें, या फिर एक खास ट्रांसफर वाउचर ले लें. इस ट्रांसफर वाउचर का फायदा यह है कि अगर आप भविष्य में किसी ऐसे इलाके या शहर में शिफ्ट होते हैं जहां पीएनजी की पाइपलाइन मौजूद नहीं है, तो आप इसी वाउचर की मदद से अपना पुराना एलपीजी कनेक्शन फिर से चालू करवा सकते हैं। गैस डिस्ट्रीब्यूशन को पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए सरकार इस दिशा में काफी तेजी से कदम उठा रही है. HPCL ने कहा है कि ये नई गाइडलाइंस 25 मई 2026 से पूरी तरह प्रभावी हो चुकी हैं. नागरिकों से अनुरोध किया गया है कि वे इस बदले हुए नियम के बारे में खुद को अपडेट रखें और बिना किसी गड़बड़ी के सुचारू रूप से गैस सप्लाई का लाभ उठाने के लिए इन नए नियमों का पालन करें. यह पूरा फैसला असल में सरकार के लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस अमेंडमेंट ऑर्डर 2026 के तहत लिया गया है, जिसे मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस ने नोटिफाई किया है। इस समय इस तरह के कड़े और सूझबूझ वाले नियमों की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर गैस और ऊर्जा का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. मध्य पूर्व में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चल रहे भारी तनाव और संकट की वजह से दुनिया भर में गैस की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है. इस रास्ते में पैदा हुई रुकावटों के कारण वैश्विक बाजार में गैस की किल्लत की स्थिति बन गई है, जिससे कच्चे माल और गैस के दामों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. भारत अपनी जरूरत की एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इस अंतरराष्ट्रीय संकट का सीधा असर हमारे देश की घरेलू गैस सप्लाई और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। कैसे मिलेगी गैस की सुविधा नियम ये है कि पीएनजी लगवाने के 30 दिनों के भीतर आपको अपना पुराना एलपीजी सिलेंडर वाला कनेक्शन बंद करने की अर्जी देनी होगी, लेकिन इसका फायदा 'ट्रांसफर वाउचर' में है. अगर आप कल किसी ऐसे शहर या इलाके में शिफ्ट होते हैं, जहां पाइप वाली गैस नहीं है, तो बस ये वाउचर दिखाइए और अपना सिलेंडर वाला कनेक्शन फिर से चालू करवा लीजिए. यानी कि, सिक्योरिटी डिपॉजिट और पेपरवर्क की भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी। किसके लिए है ये काम की खबर? खासकर उन लोगों के लिए जो काम के सिलसिले में शहर-दर-शहर भटकते हैं, या फिर वो छात्र जो रेंट पर रहते हैं. अब आप बेफिक्र होकर पीएनजी अपनाएं, क्योंकि सुरक्षा और सुविधा के बीच अब आपको किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. सरकार का यह कदम वाकई में आम आदमी की 'किचन लाइफ' को बहुत सहूलियत देने वाला है। कुल मिलाकर, यह नियम उन लोगों के लिए किसी 'वरदान' से कम नहीं है जो बार-बार घर बदलते हैं. अब 'ट्रांसफर वाउचर' के जरिए आपकी गैस की गाड़ी कभी नहीं रुकेगी. बस अपने पेपर संभाल कर रखिए और बेफिक्र होकर अपनी रसोई को स्मार्ट बनाइए।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होर्मुज संकट के कारण पैदा हुई गैस की किल्लत को देखते हुए भारत सरकार के लिए अपने घरेलू संसाधनों का सही और सटीक इस्तेमाल करना बेहद जरूरी हो गया है. यही वजह है कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, यह नया संशोधन उन लोगों के लिए एक बहुत बड़ी राहत लेकर आया है जिनकी नौकरियां ट्रांसफरेबल हैं या जो अक्सर घर बदलते रहते हैं. सरकार ने इस बात का खास ख्याल रखा है कि ट्रांसफर होने वाले कर्मचारियों, प्रवासी परिवारों, किरायेदारों और पढ़ाई के सिलसिले में बाहर रहने वाले छात्रों को भविष्य में कोई दिक्कत न हो. मान लीजिए आज आप किसी ऐसे फ्लैट में रह रहे हैं जहां पीएनजी लगी है, लेकिन कल को किसी कारण से आपको किसी ऐसी जगह जाना पड़े जहां अभी पाइपलाइन नहीं बिछी है, तो आपके पास मौजूद ट्रांसफर वाउचर सिस्टम ही आपके काम आएगा। यह नया नियम असल में केंद्र सरकार के 'एक घर, एक गैस कनेक्शन' वाले बड़े अभियान का एक अहम हिस्सा है. सरकार का मुख्य उद्देश्य डुप्लिकेट एलपीजी कनेक्शनों के इस्तेमाल पर लगाम लगाना, सब्सिडी का फायदा सीधे सही और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना और होर्मुज संकट जैसी वैश्विक दिक्कतों के बीच एलपीजी की पूरी सप्लाई चेन पर पड़ रहे भारी दबाव को कम करना है. भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी बाजारों में से एक है, जहां एचपीसीएल, इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां करोड़ों घरेलू उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाले और मार्केट रेट वाले सिलेंडरों की डिलीवरी करती हैं, इसलिए इस पूरी व्यवस्था को सुरक्षित और व्यवस्थित करना बेहद जरूरी हो गया था।

कर्मचारियों के लिए खुशखबरी? सरकार दे सकती है पुरानी पेंशन योजना चुनने का मौका

 नई दिल्‍ली देशभर में 8वें वेतन आयोग को लेकर बैठक चल रही है. इस बीच, केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए पेंशन स्‍ट्रक्‍चर को लेकर एक बड़ा बदलाव हो सकता है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा रिटायरमेंट सिस्‍टम के तहत सरकारी कर्मचारियों को अपनी पेंशन विकल्‍प चुनने में ज्‍यादा लचीलापन देने के संबंध में चर्चा चल रही है। केंद्रीय सरकारी कर्मचारी संघ के एक सदस्य ने बताया कि अगर बातचीत सकारात्मक तौर पर जारी रहती है, तो अगले दो से चार महीनों के भीतर प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई हो सकती है. हालांकि, अभी तक कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है। अपनी पसंद की पेंशन सेलेक्‍ट करने का विकल्‍प पेंशन में लचीलेपन और कर्मचारियों की पसंद को लेकर पॉजिटिव बातचीत हो रही है. कर्मचारी रिटायरमेंट बेनिफिट्स के संबंध में ज्‍यादा क्लियरटी और सुरक्षा चाहते हैं. अगर बातचीत सही रहती है और प्रस्‍ताव मान लिया जाता है तो आगे कर्मचारियों को अपनी पसंद का पेंशन मिल सकता है। पुराने पेंशन बहाली की मांग यह घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि चल रहे 8वें वेतन आयोग के परामर्शों के दौरान NPS वाले कर्मचारियों के बीच पेंशन संबंधी चिंताएं सबसे बड़े मुद्दों में से एक के रूप में उभरी हैं. इनमें से ज्‍यादातर कर्मचारी पुराने पेंशन बहाली को लेकर आयोग से मांग कर रहे हैं। अभी NPS के जरिए मिलता है पेंशन अभी 1 जनवरी 2004 के बाद भर्ती किए गए ज्‍यादातर केंद्रीय कर्मचारी नेशनल पेंशन सिस्‍टम के तहत आते हैं, जो कंट्रीब्‍यूशन बेस्‍ड है और मार्केट के प्रदर्शन पर रिटर्न मिलता है. NPS के तहत कर्मचारी अपने सैलरी का एक हिस्‍सा पेंशन में योगदान देता है, जबकि सरकार भी अलग से योगदान देती है। इसके बाद, मार्केट रिटर्न और जमा फंड पर निर्भर करता है कि आपको कितना पेंशन मिलेगा. जबकि पुरानी पेंशन योजना (OPS) अंतिम प्राप्त वेतन और महंगाई भत्ता (DA) से जुड़ी गारंटीकृत पेंशन देती थी। यूपीएस का भी है विकल्‍प हाल ही में सरकार ने यूनिफाइड पेंशन योजना (UPS) शुरू की है, जो कंट्रीब्‍यूश्‍न बेस्‍ड पेशन को कुछ तय पेंशन सुरक्षा देती है. चर्चाओं में शामिल कर्मचारी प्रतिनिधियों के अनुसार, नए प्रस्‍ताव से कर्मचारियों को पेंशन सिस्‍टम के भीतर अलग-अलग पेंशन विकल्‍पों में से चुनने की अनुमति मिल सकती है।

छात्रों को लेकर धर्मेंद्र प्रधान सख्त, कहा- हर शिकायत का होगा समाधान

नई दिल्ली CBSE की परीक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति साफ कर दी है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लेकर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि यह व्यवस्था पूरी तरह आधुनिक, पारदर्शी और छात्रों के हित में बनाई गई है. उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि किस तरह पहली बार इतने बड़े स्तर पर डिजिटल मूल्यांकन कर छात्रों को भरोसेमंद और निष्पक्ष परिणाम देने की कोशिश की गई है. CBSE OSM में गड़बड़ियों पर धर्मेन्‍द्र प्रधान ने कहा कि किसी भी छात्र की शिकायत अनसुलझी नहीं रहेगी। 40 करोड़ पेज स्कैन:पहली बार हुआ इतना बड़ा डिजिटल मूल्यांकन धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि इस साल करीब 17 लाख छात्रों ने परीक्षा दी. इन परीक्षाओं में लगभग 98 लाख आंसर शीट्स को सुरक्षित रखा गया. हर आंसर शीट औसतन 40 पन्नों की थी यानी कुल मिलाकर करीब 40 करोड़ पेज स्कैन किए गए.उन्होंने कहा कि CBSE ने पहली बार OSM यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग के जरिए मूल्यांकन किया जो दुनिया भर की यूनिवर्सिटीज और संस्थानों में तेजी से अपनाई जा रही आधुनिक प्रणाली है। छात्रों के लिए फायदेमंद केंद्रीय मंत्री के मुताबिक OSM पूरी तरह स्टूडेंट फ्रेंडली सिस्टम है. इससे छात्रों को अपने अंकों की जानकारी पारदर्शी तरीके से मिलती है और मूल्यांकन प्रक्रिया में भरोसा बढ़ता है. यही वजह है कि बड़ी संख्या में छात्र इस व्यवस्था से संतुष्ट नजर आ रहे हैं। आंकड़े खुद बता रहे हैं छात्रों का भरोसा बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक कुल 18.57 लाख पंजीकृत छात्रों में से केवल 4.06 लाख छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया.OSM के तहत कुल 98.66 लाख आंसर बुक्स स्कैन की गईं, जबकि 11.38 लाख आंसर बुक्स ही देखने के लिए मांगी गईं. इन आंकड़ों से साफ है कि अधिकांश छात्र मूल्यांकन प्रक्रिया से संतुष्ट हैं। अफवाहों से निपटने के लिए CBSE की सख्त रणनीति OSM एक तकनीक आधारित सुधार है इसलिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने अफवाहों से बचने के लिए मजबूत कम्युनिकेशन रणनीति अपनाई.CBSE ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स @cbseindia29 के जरिए लगातार जानकारी दी, ताकि गलत या भ्रामक खबरों पर रोक लगाई जा सके और सिस्टम की संरचना व सुरक्षा उपायों को समझाया जा सके। केवल आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील बोर्ड ने सार्वजनिक नोटिस जारी कर छात्रों, अभिभावकों और मीडिया से अपील की है कि वे असत्यापित और सनसनीखेज सोशल मीडिया दावों से बचें और केवल CBSE वेबसाइट पर जारी आधिकारिक सर्कुलर पर ही भरोसा करें. इस पूरे माहौल में कई छात्र, शिक्षक और स्कूल प्रिंसिपल सामने आए हैं और उन्होंने OSM के जरिए हुई मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर अपने अनुभव साझा किए हैं.CBSE ने साफ किया है कि बोर्ड ने न तो कोई लिखित आदेश जारी किया है और न ही किसी पर दबाव डाला गया है कि वे इस प्रक्रिया के समर्थन में बयान दें।

बौखलाया ईरान! बंदर अब्बास पर वार के बाद US एयरबेस को बनाया निशाना

   तेहरान अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति वार्ता लगातार विफल होती नजर आ रही है. इसी बीच ईरानी की IRGC ने दावा किया है कि उसने बंदर अब्बास पोर्ट के पास हुए हमलों के जवाब में अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए हमला किया है. उधर, कुवैत के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वह अपने देश की ओर दागी गई मिलाइलों और ड्रोन्स को रोक रहे हैं। तसनीम समाचार एजेंसी के अनुसार, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने स्थानीय समयानुसार सुबह 4:50 बजे बंदर अब्बास पोर्ट के पास हुए अमेरिकी हमले के बाद एक अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए जवाबी कार्रवाई की है. हालांकि,  आईआरजीसी ने ये नहीं बताया कि उसने अमेरिका के किस बेस को निशाना बनाया है। IRGC ने अमेरिका को दी चेतावनी ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने अमेरिका को सीधे तौर पर बेहद सख्त चेतावनी जारी की है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि इस तरह के हमलों को दोबारा दोहराया गया तो ईरान की तरफ से इससे भी ज्यादा निर्णायक और घातक प्रतिक्रिया दी जाएगी और इसके गंभीर परिणामों के लिए केवल हमलावर जिम्मेदार होगा। इस भीषण गोलाबारी का असर अब पड़ोसी देशों पर भी साफ दिखने लगा है. क्षेत्र में बढ़े अचानक खतरे को देखते हुए कुवैत ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह अपनी एयरस्पेस की ओर दागे जा रहीं मिसाइलों और यूएवी (UAVs) को लगातार इंटरसेप्ट कर हवा में ही नष्ट कर रहे हैं। बंदर अब्बास पोर्ट के धमाके इससे पहले बुधवार रात को अमेरिका ने ईरान के अंदर एक और बड़े हवाई हमले को अंजाम दिया. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग रात 1:30 बजे (स्थानीय समय) ईरान के बंदर अब्बास शहर के पूर्वी हिस्से से तीन धमाकों की आवाजें सुनाई दीं। एक अमेरिकी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी सेना ने रात भर ईरान में नए हमले किए, जिसमें एक ऐसे सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया गया, जिसके बारे में अधिकारियों का मानना ​​था कि वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिकी सेना और कमर्शियल समुद्री आवाजाही के लिए खतरा पैदा कर रहा था. यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई है।

लश्कर आतंकियों की तलाश में सेना का मेगा सर्च ऑपरेशन, राजौरी के जंगलों पर आसमान से नजर

 श्रीनगर जम्मू-कश्मीर के राजौरी में सुरक्षाबलों का आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन पिछले छह दिनों से जारी है. सूत्रों के अनुसार, 2 से 3 शीर्ष लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी जंगल के इलाके में छिपे हुए हैं, जिनकी तलाश में सुरक्षाबलों ने गुरुवार सुबह पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है। अधिकारियों ने बताया कि राजौरी के गंभीर मुगलान इलाके में कुछ आतंकियों को छिपे होने का इनपुट मिला था. इसके आधार पर सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ द्वारा संयुक्त रूस आतंकियों की तलाश में सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया है जो छठे दिन भी जारी है. सूत्रों का कहना है कि इस इलाके में 2 से 3 लश्कर के आतंकी छिपे हुए हैं। लेफ्टिनेंट जनरल ने किया सैन्य क्षेत्र का दौरा आतंकवाद विरोधी इस बड़े ऑपरेशन की गंभीरता को देखते हुए उत्तरी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने बुधवार को खुद इस सैन्य क्षेत्र का दौरा किया था. उन्होंने अग्रिम चौकियों पर तैनात जवानों से मुलाकात की और कमान संभाल रहे अधिकारियों के साथ जारी काउंटर टेरर ऑपरेशन की रणनीतिक समीक्षा कर आवश्यक निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि शनिवार को सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच सुबह करीब साढ़े 11 बजे भीषण मुठभेड़ हुई थी, जिसमें सुरक्षाबलों ने आतंकियों को घने जंगल वाले इलाके से खदेड़ दिया। इस बेहद घने जंगल क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों से निपटने के लिए सेना द्वारा आधुनिक तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है. अत्याधुनिक ड्रोन और सैन्य हेलिकॉप्टरों के जरिए पूरे जंगल के कोने-कोने पर पैनी नजर रखी जा रही है, ताकि छिपे हुए आतंकियों को भागने का कोई मौका न मिले।

EPFO का बड़ा बदलाव! अब ATM से निकाल पाएंगे PF का पैसा, जानिए कब और कैसे मिलेगा फायदा

 नई दिल्ली PF अमाउंट अब ATM से निकलेगा, पिछले काफी समय से इसकी चर्चा हो रही है. अगर ATM से पीएफ के पैसे निकलेंगे लगेंगे, तो एक नौकरीपेशा लोगों की इससे जुड़ी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी। दरअसल, केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया (Mansukh Mandaviya) एक निजी चैनल से बातचीत के दौरान बड़ा ऐलान कर दिया है, उन्होंने कहा कि अगले महीने यानी जून से आप अपना PF अमाउंट UPI का इस्तेमाल कर ATM से निकाल पाएंगे। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) को पूरी तरह से डिजिटाइज किया जा रहा है, जिससे PF निकालना और भी आसान हो जाएगा, सरकार का लक्ष्य है कि पीएफ खाताधारकों को अपना ही पैसा निकालने के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें और न ही लंबे-चौड़े फॉर्म भरने पड़ें। ATM और UPI से निकाल सकेंगे पैसे मनसुख मांडविया ने बताया कि एक नया सिस्टम सुनिश्चित किया गया है, जिसके तहत खाताधारक अपने कुल पीएफ फंड का 25% हिस्सा जमा रखकर बाकी 75% पैसा एटीएम (ATM) या यूपीआई (UPI) के जरिए जब चाहें तब निकाल सकेंगे. यह सुविधा अगले महीने से लागू करने की तैयारी है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि EPFO 2.0 और ऑटोमैटिक क्लेम प्रोजेक्ट पर काम तेजी से चल रहा है, जिससे क्लेम सेटलमेंट पूरी तरह से ऑटोमैटिक हो जाएगा, पहले जो 10-12 कॉलम के फॉर्म भरने पड़ते थे, उस पेचीदा सिस्टम को खत्म कर दिया गया है। WhatsApp चैटबॉट की सुविधा उन्होंने कहा कि पीएफ से जुड़ी जानकारियों को और आसान बनाने के लिए इसे WhatsApp चैटबॉट से जोड़ा जा रहा है. खाताधारक सिर्फ व्हाट्सऐप पर मैसेज करके अपने अकाउंट बैलेंस, ब्याज अमाउंट और बीमारी या शादी के लिए फंड विड्रॉल की पात्रता जैसी सारी जानकारियां तुरंत हासिल कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि मैसेज से लोग ये भी जान पाएंगे कि वो अभी कितना अमाउंट निकाल सकते हैं, पहले कब-कब निकाले थे, ये सारा व्हाट्सऐप पर मैसेज से कर्मचारियों को मिल जाएगा. पूरा सिस्टम डिजिटल में तब्दील हो जाएगा। कैसे निकलेगा ATM से पैसा? एटीएम और यूपीआई से पैसे निकालने की इस सुविधा को आधार से लिंक किया जाएगा, आपकी पहचान पूरी तरह डिजिटल तरीके से (आधार वेरिफिकेशन के जरिए) प्रमाणित होगी, जिससे बिना किसी कागजी कार्रवाई के तुरंत पैसा ट्रांसफर हो सकेगा। हालांकि अगर फटाफट यानी ATM से तुरंत पैसे निकलने लगेंगे तो फिर अधिकतर लोगों के PF अकाउंट खाली हो जाएंगे, क्योंकि उन्हें जब जरूरत होगी, तब पीएफ के पैसे निकाल लेंगे. इसपर एक्सपर्ट्स भी चिंता जता रहे हैं. जब पैसा निकालना इतना आसान हो जाएगा तो स्वाभाविक रूप से लोगों में इसे खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिससे रिटायरमेंट फंड समय से पहले खत्म होने का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि सरकार ने इस व्यवस्था को पूरी तरह खुली छूट नहीं बनाया है. केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया है कि आप चाहकर भी अपना पूरा PF अकाउंट खाली नहीं कर सकते हैं, कुल जमा राशि का 25% हिस्सा हमेशा पीएफ अकाउंट में लॉक रहेगा. आप केवल ऊपरी 75% हिस्से का ही इस्तेमाल कर पाएंगे। बता दें, पीएफ पर मिलने वाला चक्रवृद्धि ब्याज तब सबसे ज्यादा फायदा देता है जब पैसे को लंबे समय तक छुआ न जाए, बार-बार पैसा निकालने से रिटायरमेंट के वक्त मिलने वाला अंतिम फंड बहुत छोटा हो जाएगा।

हिमाचल में बड़ा अलर्ट! झील फटी तो 57 पुल समेत कई इलाके हो सकते हैं तबाह

 नई दिल्ली लाहौल-स्पीति के सिस्सू गांव में रहने वाले लोग अब शांतिपूर्ण पहाड़ी जीवन नहीं जी पा रहे हैं. अटल टनल खुलने के बाद यहां पर्यटकों की भारी भीड़ आ गई है, लेकिन गांव के ठीक ऊपर एक बड़ी समस्या पैदा हो रही है. 4,068 मीटर की ऊंचाई पर बनी घेपन झील हर साल बड़ा होती जा रही है. वैज्ञानिकों को डर है कि अगर यह झील फट गई तो सिस्सू गांव पर बहुत बड़ा खतरा आ सकता है. एकदम 2013 में केदारनाथ में आई आपदा की तरह।  सिस्सू गांव चंद्रा नदी के किनारे बसा है. अटल टनल से निकलते ही यह पहला बड़ा गांव है. कुछ साल पहले तक यहां शांति थी. लोग खेती और पशुपालन करते थे. लेकिन अक्टूबर 2020 में अटल टनल खुलने के बाद रोजाना हजारों गाड़ियां यहां से गुजरती हैं. पीक सीजन में 5000 गाड़ियां तक आती हैं।  DTE की रिपोर्ट के मुताबिक नदी किनारे अब बोटिंग, जिपलाइन, ऑफ-रोड वाहन और पर्यटक गतिविधियां चल रही हैं. गांव में होमस्टे और कैफे खुल गए हैं. लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक बड़ा खतरा छिपा है. गांव से करीब 11 किलोमीटर ऊपर हिमालय की घेपन झील (घेपांग घट) लगातार बढ़ रही है।  झील का आकार तेजी से बढ़ रहा है घेपन ग्लेशियर झील है. 1989 में इसका क्षेत्रफल सिर्फ 36.49 हेक्टेयर था. 2022 तक यह बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया है – यानी लगभग तीन गुना. वैज्ञानिकों के अनुसार, घेपन ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. 1962 से अब तक ग्लेशियर 2.76 किलोमीटर पीछे हट चुका है. राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) की रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी गई है कि यह झील अतिसंवेदनशील है. अगर झील फटी तो सबसे पहले सिस्सू गांव पर असर पड़ेगा।  वैज्ञानिकों ने 8 अलग-अलग स्थितियों का अध्ययन किया है. सभी में सिस्सू गांव रेड जोन में आता है. सबसे खतरनाक स्थिति में झील फटने के सिर्फ 21 मिनट में बाढ़ का पानी सिस्सू पहुंच सकता है. पानी की रफ्तार 43 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है. इस बाढ़ में सिर्फ पानी नहीं आएगा।  भारी मलबा, चट्टानें, पत्थर और ग्लेशियर के टुकड़े भी साथ आएंगे. इसकी चपेट में 34 बस्तियां, 204 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन, 57 पुल और 106 किलोमीटर सड़कें आ सकती हैं. मनाली-लेह हाईवे, अटल टनल और पूरा पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो सकता है. बाढ़ का असर चिनाब नदी के रास्ते जम्मू-कश्मीर तक पहुंच सकता है।  ग्लेशियर पिघलने के कारण वैज्ञानिक भानु प्रताप और अनिल कुलकर्णी जैसे विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय का तापमान तेजी से बढ़ रहा है. पहले ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ गिरती थी, अब बारिश हो रही है. बारिश बर्फ को बहुत तेजी से पिघलाती है.  1962 के बाद से घेपन ग्लेशियर हर साल औसतन 53 मीटर सिकुड़ रहा है. झील का बढ़ता पानी ग्लेशियर को और तेजी से पिघला रहा है. यह एक साइकिल बन गया है जो लगातार तेज होता जा रहा है।  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने झील को अतिसंवेदनशील घोषित किया है. NRSC, केंद्रीय जल आयोग, NCPOR और CDAC जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं. सिस्सू की कृत्रिम झील पर एक पायलट अलर्ट सिस्टम लगाया गया है, जिसमें सेंसर, कैमरा और सैटेलाइट आधारित चेतावनी व्यवस्था है. लेकिन यह टेस्टिंग फेज में है।  समस्या यह है कि गांव में अभी कोई पूरा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, सायरन, चेतावनी बोर्ड या स्पष्ट निकासी रास्ते नहीं हैं. जमीनी स्तर पर तैयारी काफी कमजोर दिख रही है. घेपन झील अकेली नहीं है. हिमाचल प्रदेश में 2016 में 805 ग्लेशियर झीलें थीं, जो 2022 तक बढ़कर 1,619 हो गईं।  पूरे हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण नई-नई झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में बड़े खतरे बन सकती हैं. घेपन झील सिस्सू गांव के लिए एक टाइम बम की तरह है. एक तरफ पर्यटन से हो रही कमाई, दूसरी तरफ बढ़ता पर्यावरणीय खतरा।  वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और झीलें बढ़ रही है. स्थानीय लोगों को डर के साथ जीना पड़ रहा है. सरकार और वैज्ञानिकों को अब जल्दी से जल्दी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, निकासी योजनाएं और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।  सिस्सू की कहानी पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है. जलवायु परिवर्तन अब दूर की समस्या नहीं रहा- यह हमारे पहाड़ों, गांवों और जिंदगियों को सीधे प्रभावित कर रहा है. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो एक दिन यह खतरा हकीकत बन सकता है।