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20 रुपये में होगी खाद्य पदार्थों की जांच, मोबाइल लैब्स सड़क पर उतरेंगी

करनाल प्रदेश में खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ जल्द ही बड़ा अभियान शुरू होगा। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग (एफडीए) ने खाद्य जांच व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापक योजना तैयार की है। इसके तहत प्रदेश में आठ नई खाद्य पदार्थ जांच प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। साथ ही आधुनिक उपकरणों से लैस मोबाइल जांच प्रयोगशालाएं भी सड़कों पर उतरेंगी, जहां आम नागरिक मात्र 20 रुपये में अपने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करा सकेंगे। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस के उपलक्ष्य में खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के प्रदेश के एकमात्र नामित अधिकारी पृथ्वी सिंह ने दैनिक जागरण से विशेष बातचीत की। एनसीआर में 55 करोड़ से मजबूत होगा जांच तंत्र वर्तमान में विभाग के पास सिर्फ दो प्रयोगशालाएं हैं। इसी वर्ष दो नई प्रयोगशालाएं और शुरू की जाएंगी। अगले पांच वर्षों में पूरे प्रदेश में स्वीकृत सभी प्रयोगशालाओं का नेटवर्क तैयार करने का लक्ष्य है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में खाद्य जांच सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए 55 करोड़ रुपये का बजट जारी किया है। इससे फरीदाबाद, गुरुग्राम और रोहतक में अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित की जा रही हैं। इन परियोजनाओं पर तेजी से कार्य चल रहा है। पांच अन्य जिलों को भी मिली मंजूरी केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त सहयोग से नारनौल, हिसार, जींद, सिरसा और यमुनानगर में भी नई प्रयोगशालाएं बनाई जाएंगी। विभाग इन जिलों में भूमि की तलाश की जा रही है। भूमि उपलब्ध होते ही निर्माण प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। सबसे पहले हिसार में कार्य आरंभ किए जाने की योजना है। करनाल स्थित प्रयोगशाला को भी अत्याधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है। इसके लिए करीब 25 करोड़ रुपये के आधुनिक उपकरण खरीदे जा रहे हैं। खरीद प्रक्रिया अंतिम चरण में है। नई व्यवस्था के तहत प्रयोगशाला में सूक्ष्मजीव विज्ञान (माइक्रोबायोलाजी) अनुभाग स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा उच्च क्षमता वाली आधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी, जो खाद्य पदार्थों में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म स्तर की मिलावट का भी पता लगाने में सक्षम होंगी। गांव-गांव पहुंचेगी जांच सुविधा विभाग आम लोगों को सीधे इस अभियान से जोड़ेगा। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित मोबाइल खाद्य प्रयोगशालाएं तैयार की जा रही हैं। इन मोबाइल वैन के लिए निविदा प्रक्रिया जारी है। मोबाइल प्रयोगशालाओं के संचालन के बाद नागरिक अपने घरों में उपयोग होने वाले दूध, दाल, मसाले और अन्य खाद्य पदार्थों के नमूनों की मौके पर ही जांच करा सकेंगे। इसके लिए सिर्फ 20 रुपये का शुल्क लिया जाएगा। जांच सुविधा लोगों तक पहुंचने से मिलावटखोरों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा। साथ ही खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी। जानिये सैंपल फेल होने का अर्थ नामित अधिकारी पृथ्वी सिंह ने कहा कि प्रदेश में पांच वर्षों के दौरान फेल हुए 4607 सैंपलों का मतलब सीधे तौर पर जहर या जानलेवा मिलावट होना नहीं है। इनमें से अधिकतर सैंपल तकनीकी कमियों के कारण सब-स्टैंडर्ड (अवमानक) श्रेणी में आते हैं। उदाहरण के लिए, यदि दूध में निर्धारित फैट छह प्रतिशत की जगह 5.9 प्रतिशत मिलता है या पनीर में तय मानक से नमी ज्यादा पाई जाती है, तो वह फेल माना जाता है। मिलावट का यह औसत पूरे देश में लगभग एक समान है। सरकारी लैब में कुछ एडवांस टेस्टों जैसे फसलों पर होने वाले पेस्टिसाइड/केमिकल स्प्रे को पकड़ने की आधुनिक मशीनें नहीं हैं। भारी बजट खर्च करके, एक-एक सैंपल की प्रामाणिक जांच के लिए ₹30 हजार रुपये तक फीस देकर बड़ी निजी लैब से टेस्ट करवाते हैं।

कुरुक्षेत्र के LNJP अस्पताल में विवाद गहराया, चेयरपर्सन के बयान से नाराज नर्सों का विरोध

कुरुक्षेत्र. एलएनजेपी अस्पताल में रविवार को राज्य महिला आयोग चेयरपर्सन रेणू भाटिया के निरीक्षण के दौरान नर्सिंग ऑफिसर्स पर टिप्पणी करने के मामले में सोमवार को अस्पताल की नर्सिंग ऑफिसर्स ने दो घंटे पेन डाउन प्रदर्शन किया। हालांकि आपातकालीन विभाग, महिला, पुरुष, नवजात शिशु देखरेख इकाई एवं प्रसूति विभाग में एक-एक नर्सिंग ऑफिसर्स तैनात रही, ताकि मरीजों को कोई दिक्कत न आए। नर्सिंग ऑफिसर्स के प्रदर्शन की सूचना मिलते ही प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. सारा अग्रवाल और जिला सिविल सर्जन डॉ. सुखबीर सिंह धरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने आश्वासन दिया कि वह खुद चेयरपर्सन रेणू भाटिया से मिलेंगे और नर्सिंग ऑफिसर्स की बात रखेंगे। नर्सिंग ऑफिसर्स ने एक ज्ञापन भी जिला सिविल सर्जन को सौंपा और चेयरपर्सन से आकर माफी मांगने की अपील की। इस दौरान सीनियर नर्सिंग आफिसर गुरमीत कौर रोने लगी और कहा कि इससे नर्सिंग कैडर की भावनाओं को ठेस पहुंची है। गौर हो कि एक दिन पहले ही राज्य महिला आयोग चेयरपर्सन रेणू भाटिया एलएनजेपी अस्पताल में चिकित्सक डॉ. शैलेंद्र कुमार शैली पर नाबालिग से दुष्कर्म के लगे आरोपों के मामले में जांच करने के लिए पहुंची थीं। इस दौरान उन्होंने पीड़िता से भी बात की थी। निरीक्षण के दौरान उन्होंने पीएमओ डॉ. सारा अग्रवाल और तीन नर्सिंग ऑफिसर्स को निलंबित करने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखने की बात कही थी। साथ ही चिकित्सक से मिलीभगत का आरोप भी लगाया था। सीनियर नर्सिंग आफिसर गुरमीत कौर ने कहा कि चेयरपर्सन को ऐसा नहीं कहना चाहिए था।

ड्यूटी के दौरान मिर्गी आने पर गई नौकरी, दो दशक बाद हाई कोर्ट के फैसले से मिला पेंशन का हक

चंडीगढ़. सीमा की सुरक्षा करते हुए बीएसएफ में सेवा देने वाले एक जवान को मिर्गी (एपिलेप्सी) की बीमारी के कारण नौकरी से बाहर कर दिया गया था। इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई 21 साल बाद उसके पक्ष में समाप्त हुई। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने बीएसएफ की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी जवान को भर्ती के समय स्वस्थ पाया गया था और बाद में सेवा के दौरान बीमारी सामने आई, तो उसे सेवा से जुड़ी बीमारी माना जाएगा। ऐसे कर्मचारी को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। मामला भिवानी निवासी अजमेर सिंह का है, जो वर्ष 1990 में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में भर्ती हुए थे। सेवा के दौरान वर्ष 1996 में उन्हें पहली बार मिर्गी का दौरा पड़ा। बाद में मेडिकल बोर्ड ने उन्हें ‘ग्रैंडमल एपिलेप्सी’ से पीड़ित बताते हुए आगे की सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इसके आधार पर 30 नवंबर 2005 को उन्हें मेडिकल आधार पर सेवा से मुक्त कर दिया गया। गलत तरीके से सेवा से हटाया गया अजमेर सिंह का कहना था कि उन्हें गलत तरीके से सेवा से हटाया गया और वे दिव्यांगता पेंशन के हकदार हैं। साथ ही उनकी लगभग 50 हजार रुपये की ग्रेच्युटी राशि भी लंबित थी। उन्होंने इसके लिए सिविल अदालत का दरवाजा खटखटाया। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने 2008 में उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद जिला जज , भिवानी की अदालत में अपील दायर की गई। अपीलीय अदालत ने 2010 में ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए अजमेर सिंह के पक्ष में निर्णय दिया और उन्हें राहत प्रदान की। इस फैसले को बीएसएफ अधिकारियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट में बीएसएफ का तर्क था कि मिर्गी ऐसी बीमारी नहीं है जिसे सेवा के दौरान उत्पन्न हुई बीमारी माना जाए, इसलिए अजमेर सिंह दिव्यांगता पेंशन के पात्र नहीं हैं। वहीं कर्मचारी की ओर से कहा गया कि भर्ती के समय वह पूरी तरह स्वस्थ थे और बीमारी सेवा के दौरान सामने आई। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने क्या कहा? जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले धर्मवीर सिंह बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा कि यदि रिकार्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि कर्मचारी भर्ती के समय बीमारी से ग्रस्त था, तो यह माना जाएगा कि वह पूरी तरह स्वस्थ था और बाद में स्वास्थ्य में आई गिरावट सेवा के कारण हुई। अदालत ने पाया कि अजमेर सिंह को पहला दौरा भर्ती होने के छह वर्ष बाद पड़ा था। उन्हें किसी अनुशासनहीनता या कदाचार के कारण नहीं बल्कि केवल मेडिकल आधार पर सेवा से हटाया गया था। ऐसे में बीमारी और सेवा के बीच संबंध को नकारा नहीं जा सकता। हाई कोर्ट ने जिला न्यायाधीश के फैसले को सही ठहराते हुए बीएसएफ की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही अजमेर सिंह की दिव्यांगता पेंशन का रास्ता साफ हो गया।

खाद्य सुरक्षा को मिलेगा बड़ा बल, हरियाणा सरकार 55 करोड़ की लागत से खोलेगी 8 नई टेस्टिंग लैब

करनाल. प्रदेश में खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ जल्द ही बड़ा अभियान शुरू होगा। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग (एफडीए) ने खाद्य जांच व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापक योजना तैयार की है। इसके तहत प्रदेश में आठ नई खाद्य पदार्थ जांच प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी। साथ ही आधुनिक उपकरणों से लैस मोबाइल जांच प्रयोगशालाएं भी सड़कों पर उतरेंगी, जहां आम नागरिक मात्र 20 रुपये में अपने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करा सकेंगे। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के नामित अधिकारी पृथ्वी सिंह ने विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस के उपलक्ष्य में विशेष बातचीत की। एनसीआर में 55 करोड़ से मजबूत होगा जांच तंत्र वर्तमान में विभाग के पास सिर्फ दो प्रयोगशालाएं हैं। इसी वर्ष दो नई प्रयोगशालाएं और शुरू की जाएंगी। अगले पांच वर्षों में पूरे प्रदेश में स्वीकृत सभी प्रयोगशालाओं का नेटवर्क तैयार करने का लक्ष्य है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी (एनसीआर) में खाद्य जांच सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए 55 करोड़ रुपये का बजट जारी किया है। इससे फरीदाबाद, गुरुग्राम और रोहतक में अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित की जा रही हैं। इन परियोजनाओं पर तेजी से कार्य चल रहा है। पांच अन्य जिलों को भी मिली मंजूरी केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त सहयोग से नारनौल, हिसार, जींद, सिरसा और यमुनानगर में भी नई प्रयोगशालाएं बनाई जाएंगी। विभाग इन जिलों में भूमि की तलाश की जा रही है। भूमि उपलब्ध होते ही निर्माण प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। सबसे पहले हिसार में कार्य आरंभ किए जाने की योजना है। करनाल स्थित प्रयोगशाला को भी अत्याधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है। इसके लिए करीब 25 करोड़ रुपये के आधुनिक उपकरण खरीदे जा रहे हैं। खरीद प्रक्रिया अंतिम चरण में है। नई व्यवस्था के तहत प्रयोगशाला में सूक्ष्मजीव विज्ञान (माइक्रोबायोलाजी) अनुभाग स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा उच्च क्षमता वाली आधुनिक मशीनें लगाई जाएंगी, जो खाद्य पदार्थों में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म स्तर की मिलावट का भी पता लगाने में सक्षम होंगी। गांव-गांव पहुंचेगी जांच सुविधा विभाग आम लोगों को सीधे इस अभियान से जोड़ेगा। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित मोबाइल खाद्य प्रयोगशालाएं तैयार की जा रही हैं। इन मोबाइल वैन के लिए निविदा प्रक्रिया जारी है। मोबाइल प्रयोगशालाओं के संचालन के बाद नागरिक अपने घरों में उपयोग होने वाले दूध, दाल, मसाले और अन्य खाद्य पदार्थों के नमूनों की मौके पर ही जांच करा सकेंगे। इसके लिए सिर्फ 20 रुपये का शुल्क लिया जाएगा। जांच सुविधा लोगों तक पहुंचने से मिलावटखोरों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा। साथ ही खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी। जानिये सैंपल फेल होने का अर्थ नामित अधिकारी पृथ्वी सिंह ने कहा कि प्रदेश में पांच वर्षों के दौरान फेल हुए 4607 सैंपलों का मतलब सीधे तौर पर जहर या जानलेवा मिलावट होना नहीं है। इनमें से अधिकतर सैंपल तकनीकी कमियों के कारण सब-स्टैंडर्ड (अवमानक) श्रेणी में आते हैं। उदाहरण के लिए, यदि दूध में निर्धारित फैट छह प्रतिशत की जगह 5.9 प्रतिशत मिलता है या पनीर में तय मानक से नमी ज्यादा पाई जाती है, तो वह फेल माना जाता है। मिलावट का यह औसत पूरे देश में लगभग समान है। सरकारी लैब में कुछ एडवांस टेस्टों जैसे फसलों पर होने वाले पेस्टिसाइड/केमिकल स्प्रे को पकड़ने की आधुनिक मशीनें नहीं हैं। भारी बजट खर्च करके, एक-एक सैंपल की प्रामाणिक जांच के लिए ₹30 हजार रुपये तक फीस देकर बड़ी निजी लैब से टेस्ट करवाते हैं।

सरकारी फंड घोटाला मामला: CBI ने दिल्ली-NCR सहित 6 ठिकानों पर की कार्रवाई

 चंडीगढ़   हरियाणा और चंडीगढ़ के सरकारी विभागों के 661 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच कर रही सीबीआई  ने शनिवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर में छह जगहों पर छापे मारे। जांच के दायरे में हरियाणा के कुछ वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, बैंक अधिकारी और एक निजी कंपनी भी हैं। सीबीआई के मुताबिक यह मामला हरियाणा सरकार के आठ विभागों और चंडीगढ़ प्रशासन के दो विभागों नगर निगम चंडीगढ़ और क्रेस्ट चंडीगढ़ के सरकारी फंड में गड़बड़ी से जुड़ा है। आरोप है कि सरकारी धन को गलत तरीके से खातों के जरिए दूसरी जगह भेजकर हड़प लिया गया। जांच एजेंसी के मुताबिक हरियाणा कैडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के घरों के अलावा नोएडा स्थित वीपम कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशक के ठिकानों पर की गई। जांच में सामने आया है कि कुछ अधिकारियों ने बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर खाते खुलवाने, सरकारी पैसे के ट्रांसफर और बाद में उसे अन्य खातों में भेजने में मदद की। इसके बदले उन्हें फायदा मिलने के भी आरोप हैं। सीबीआई ने बताया कि वीपम कंसल्टेंसी के खाते में भी कथित तौर पर घोटाले का पैसा पहुंचा था, जिसे बाद में कंपनी के निदेशक के निजी खाते में ट्रांसफर किया गया। तलाशी के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल उपकरण और संपत्ति से जुड़े कागजात बरामद किए गए हैं। यह जांच सीबीआई ने हरियाणा विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो से एक मामला अपने हाथ में लेने और चंडीगढ़ पुलिस के आर्थिक अपराध थाने में दर्ज दो मामलों को अपने अधीन लेने के बाद शुरू की थी। तीनों मामलों में आपराधिक साजिश, सरकारी धन के गबन और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच चल रही है। सीबीआई पहले ही इस मामले में पंचकूला की विशेष अदालत में पहली चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। इसमें हरियाणा पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी का कहना है कि सरकारी धन को IDFC फर्स्ट बैंक और AU फाइनेंस बैंक में रखे खातों से सुनियोजित तरीके से दूसरी जगह भेजा गया। सीबीआई का कहना है कि जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में और लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। मामले में जल्द ही अतिरिक्त चार्जशीट भी दाखिल की जाएगी।

लोकतंत्र में अधिकार या अजीब नाम? अनिल विज ने CJP पर किया तीखा वार

चंडीगढ़ हरियाणा के ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को लेकर तीखा बयान दिया है. उन्होंने इस पार्टी के पदाधिकारियों को नसीहत दी है कि लोकतंत्र में सबको संघर्ष करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उन्हें अपना यह नाम बदल लेना चाहिए. विज के मुताबिक, 'कॉकरोच एक बेहद गंदा कीड़ा होता है, जिसे देखते ही छोटा बच्चा भी चप्पल से कुचल देता है'. इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा सत्र के मुद्दे पर कांग्रेस को भी घेरा है. दरअसल, अनिल विज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट लिखा. जब मीडिया ने उनसे इस पोस्ट के बारे में पूछा, तो उन्होंने अपने शब्दों को दोबारा दोहराया. विज ने साफ कहा कि प्रजातंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने की आजादी मिली हुई है. इस हक का इस्तेमाल जरूर होना चाहिए, मगर 'कॉकरोच' जैसे अजीब नाम के साथ राजनीति करना बिल्कुल ठीक नहीं है. 'बहस से भागती है कांग्रेस पार्टी' इसके बाद अनिल विज ने हरियाणा के नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा के उन आरोपों का भी करारा जवाब दिया, जिसमें उन्होंने विधानसभा का सत्र न बुलाने की बात कही थी. विज ने पलटवार करते हुए कहा कि जब भी सदन की कार्यवाही शुरू होती है, कांग्रेस के नेता उसमें गंभीरता से हिस्सा नहीं लेते. जैसे ही सरकार के मंत्री या मुख्यमंत्री उनके सवालों का जवाब देना शुरू करते हैं, कांग्रेस वाले बीच में ही सदन छोड़कर बाहर चले जाते हैं. इतना ही नहीं उन्होंने कांग्रेस की राजनीति पर तंज कसते हुए कहा कि विपक्षी दल लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहा है. उनके पास जनता के जरूरी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए कोई ठोस बात नहीं होती. कांग्रेस के नेताओं को सिर्फ अखबारों की हेडलाइंस में बने रहने का शौक है. वे बस यही चाहते हैं कि उनका नाम मीडिया में चमकता रहे, भले ही खबर उनके पक्ष में हो या विरोध में. वहीं, दीपेंद्र सिंह हुड्डा की गिरफ्तारी से जुड़े सवाल पर भी मंत्री ने खुलकर बात रखी. उन्होंने साफ किया कि सरकार किसी को भी जानबूझकर निशाना नहीं बना रही है. राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है. अंत में उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि विपक्ष के इसी खराब बर्ताव की वजह से हरियाणा की जनता बार-बार हमारी पार्टी को ही चुनकर सत्ता में लाती है.

खेल नर्सरियों पर गहन पड़ताल, हिसार में कोचों की भूमिका भी जांच में शामिल

हिसार खिलाड़ियों को निखारने और उन्हें खेल की बारीकियों से परिचित कराने के उद्देश्य से स्थापित खेल नर्सरियों की अब गहन पड़ताल शुरू हो गई है। खेल विभाग ने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम बढ़ाया है कि कहीं इन नर्सरियों की आड़ में केवल औपचारिकताएं ही तो पूरी नहीं की जा रहीं। इसी क्रम में हिसार जिले की 169 खेल नर्सरियों की जांच शुरू कर दी गई है। जिला खेल अधिकारी नरेश सैनी के नेतृत्व में गठित टीम ने जांच का जिम्मा संभाल लिया है। जांच को निष्पक्ष और प्रभावी बनाने के लिए इसमें विभिन्न खेलों के अनुभवी कोचों को शामिल किया गया है, ताकि हर नर्सरी का मूल्यांकन उसके खेल विशेष के मानकों पर किया जा सके। जांच शुरू होते ही मचा हलचल गत सप्ताह जैसे ही जांच प्रक्रिया शुरू हुई, नर्सरियों में कार्यरत कोचों के बीच हलचल तेज हो गई। एक-दूसरे से संपर्क साधकर वे जांच के मानकों और पूछे गए बिंदुओं की जानकारी जुटाने में लगे हैं। जिन नर्सरियों की जांच पूरी हो चुकी है, वहां के कोचों से अन्य लोग विस्तार से जानकारी ले रहे हैं। यह पहला अवसर नहीं है जब खेल नर्सरियों की जांच की जा रही है। पूर्व वर्षों में हुई जांच में भी कई अनियमितताएं सामने आई थीं, जिनकी रिपोर्ट निदेशालय को सौंपी गई थी और कई खेल नर्सरियों पर निदेशायल ने संज्ञान भी लिया था। पुराने इसी अनुभव के आधार पर इस बार जांच को और अधिक गहराई से अंजाम दिया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य, प्रतिभा को मिले सही मंच सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि उभरती खेल प्रतिभाओं को वे सभी सुविधाएं मिलें, जिनके लिए ये नर्सरियां स्थापित की गई हैं। यदि खिलाड़ियों को सही प्रशिक्षण और संसाधन मिलते हैं, तो वे प्रदेश और देश के लिए पदक जीतकर गौरव बढ़ा सकते हैं। हिसार के जिला खेल अधिकारी नरेश सैनी ने कहा कि निदेशालय के दिशा-निर्देश पर खेल नर्सरियों की जांच की जा रही है। पिछले करीब एक सप्ताह से टीमें लगातार निरीक्षण कर रही हैं। जांच दल में विभिन्न खेलों के कोचों को शामिल किया गया है।  

छोटी रकम का बड़ा केस: 19 साल बाद खत्म हुआ 7,299 रुपये का यात्रा भत्ता विवाद

 चंडीगढ महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने यह फैसला हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया 7299 यात्रा भत्ता बिलों का नहीं किया भुगतान मामले की शुरुआत उस समय हुई जब रोहतक के ओपी खन्ना ने अपने लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान नहीं किया गया था। खन्ना ने दावा किया कि बिलों का भुगतान अनुचित रूप से रोका गया है और उन्होंने राशि के साथ ब्याज की भी मांग की। दूसरी ओर हरियाणा सरकार का पक्ष था कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता तथा स्थानीय यात्रा भत्ता और किलोमीटर संबंधी दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग ने यह भी कहा कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था तथा उठाई गई आपत्तियों की जानकारी कर्मचारी को दे दी गई थी। रोहतक की अदालत में दायर की अपील वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल कर दी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 स्पष्ट रूप से कहती है कि 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की यह अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है। कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी में खर्च की हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है, बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी ऐसे मामलों में खर्च होता है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट परविधान के कारण नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को लगाई फटकार, बोले- भत्ते से ज्यादा खर्च मुकदमे पर कर दिया

चंडीगढ़. महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने यह फैसला हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया। मामले की शुरुआत उस समय हुई जब रोहतक के ओपी खन्ना ने अपने लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान नहीं किया गया था। खन्ना ने दावा किया कि बिलों का भुगतान अनुचित रूप से रोका गया है और उन्होंने राशि के साथ ब्याज की भी मांग की। दूसरी ओर हरियाणा सरकार का पक्ष था कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता तथा स्थानीय यात्रा भत्ता और किलोमीटर संबंधी दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग ने यह भी कहा कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था तथा उठाई गई आपत्तियों की जानकारी कर्मचारी को दे दी गई थी। वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की। प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल कर दी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 स्पष्ट रूप से कहती है कि 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की यह अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है। हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी ऐसे मामलों में खर्च होता है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट परविधान के कारण नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

दिव्यांगता मामले में HC का अहम फैसला, कारोबारी के परिवार को मिलेगी 87 लाख की राहत

चंडीगढ़. सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होकर 100 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का शिकार हुए एक कारोबारी के परिवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने मामले में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण जींद (एमएसीटी) द्वारा दिए गए मुआवजे को बढ़ाते हुए कुल 87.66 लाख रुपये कर दिया। पहले ट्रिब्यूनल ने 24.86 लाख रुपये मुआवजा दिया था। अब अदालत ने 62.80 लाख रुपये अतिरिक्त मुआवजा नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने श्याम सुंदर गुप्ता के कानूनी वारिसों की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि दुर्घटना ने पीड़ित की न केवल शारीरिक क्षमता छीन ली, बल्कि उसकी आजीविका और सामान्य जीवन जीने की संभावनाएं भी समाप्त कर दी थीं। ऐसे मामलों में पीड़ित और उसके परिवार को न्यायोचित एवं पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए। रिकार्ड के अनुसार 26 नवंबर 2003 को हुए सड़क हादसे में श्याम सुंदर गुप्ता गंभीर रूप से घायल हो गए थे। दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी, कूल्हे, पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं। चिकित्सकीय जांच में उन्हें 100 प्रतिशत स्थायी दिव्यांग घोषित किया गया। वह अपने दैनिक कार्य स्वयं करने में असमर्थ हो गए थे और जीवन भर दूसरों पर निर्भर रहने को मजबूर हो गए। दुर्घटना के बाद उन्हें देश के विभिन्न अस्पतालों में लंबे समय तक इलाज कराना पड़ा। लगभग 12 वर्ष तक बिस्तर पर रहने के बाद 26 मार्च 2015 को उनका निधन हो गया। हाई कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने मुआवजा तय करते समय कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया था। अदालत ने आयकर रिटर्न के आधार पर उनकी मासिक आय 10,855 रुपये मानी और भविष्य की आय की संभावनाओं को भी जोड़ा। इसके बाद 100 प्रतिशत कार्यात्मक दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए आय के नुकसान की पुनर्गणना की गई। अदालत ने दर्द एवं पीड़ा के लिए 15 लाख रुपये, परिचारक खर्च के लिए आठ लाख रुपये, चिकित्सा खर्च के लिए 35 लाख रुपये से अधिक, विशेष आहार, परिवहन खर्च, जीवन की सुविधाओं से वंचित होने तथा विशेष उपकरणों के लिए अलग-अलग मुआवजा प्रदान किया। अदालत ने कहा कि दुर्घटना के कारण पीड़ित सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता खो बैठा था, जिसकी भरपाई केवल चिकित्सा खर्च से नहीं हो सकती। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घायल व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद भी इलाज, दर्द एवं पीड़ा तथा अन्य खर्चों के मद में मिलने वाली राशि उसके कानूनी वारिसों को प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि यह राशि उसकी संपत्ति का हिस्सा बन जाती है। इसी आधार पर अदालत ने बीमा कंपनियों और अन्य संबंधित पक्षों को बढ़ी हुई मुआवजा राशि दो महीने के भीतर जमा कराने का आदेश दिया।