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नोएडा प्राधिकरण का ₹10,290 करोड़ का बजट, नई योजनाओं को मिली मंजूरी

नोएडा नोएडा प्राधिकरण की 222वीं बोर्ड बैठक में कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए है.  इस बैठक में शहर के विकास, रियल एस्टेट, आम लोगों के सुविधाओं और वित्तीय योजनाओं से जुड़े कई बड़े फैसले लिए गए. इस बैठक की अध्यक्षता अवस्थापना और औद्योगिक विकास आयुक्त दीपक कुमार ने की. बैठक में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण के बड़े अधिकारी भी शामिल हुए।  आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए नई बजट योजना तैयार कर ली गई है. इस बार करीब 10,290 करोड़ रुपये कमाने और 10,004 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है. अगर पिछले साल (2025-26) की बात करें, तो सरकार ने बहुत बड़ा लक्ष्य रखा था, लेकिन असलियत में केवल 6,589 करोड़ रुपये की ही कमाई हो पाई. पिछले साल की इस कमी को देखते हुए, इस बार के लक्ष्य ज्यादा व्यावहारिक रखे गए हैं।  नोएडा के 50 साल पूरे होने के मौके पर प्राधिकरण ने हजारों परिवारों के घर का सपना पूरा करने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं. सरकार की नीतियों के चलते अब लंबे समय से अटकी 57 में से 36 हाउसिंग परियोजनाओं के काम में तेजी आने की उम्मीद है. इसी कड़ी में, बकाया भुगतान के विवादों को सुलझाने के लिए 'वन टाइम सेटलमेंट (OTS) योजना-2026' को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई है, जिसे शासन की अंतिम अनुमति के बाद लागू कर दिया जाएगा। . स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट लेआउट पास इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सेक्टर-150 स्थित स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट के संशोधित लेआउट प्लान को भी पास कर दिया गया है. इन फैसलों से न केवल रुकी हुई स्कीमों को नई जिंदगी मिलेगी, बल्कि बरसों से पजेशन का इंतजार कर रहे लोगों को भी जल्द राहत मिल सकेगी. साथ ही पहले की बोर्ड बैठकों में लिए गए कुछ फैसलों को वापस भी लिया गया है, जिससे इस प्रोजेक्ट में नई दिशा मिलने की उम्मीद है।    पानी के बकाया बिल पर ब्याज से परेशान लोगों को राहत देने के लिए प्राधिकरण ने 3 महीने की एमनेस्टी स्कीम शुरू करने का फैसला किया है. इसमें तय समय के भीतर भुगतान करने पर 20% से 40% तक ब्याज में छूट मिलेगी. यह योजना 16 अप्रैल से 15 जुलाई 2026 तक लागू रहेगी. इसके अलावा, आवासीय और औद्योगिक प्लॉट्स में “मिश्रित उपयोग” की अनुमति देने का फैसला भी लिया गया है।  यानी अब कुछ शर्तों के साथ एक ही प्लॉट पर अलग-अलग तरह के उपयोग किए जा सकेंगे, हालांकि इसके लिए अतिरिक्त शुल्क देना होगा. उन लोगों के लिए भी राहत दी गई है, जिन्होंने वर्षों से अपने प्लॉट पर निर्माण नहीं कराया है. 12 साल से ज्यादा समय से निर्माण अधूरा छोड़ने वालों को अब 3 महीने का आखिरी मौका दिया जाएगा, जिसमें वे शुल्क देकर समय बढ़ा सकते हैं. सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए फायर डिपार्टमेंट को भी बड़ा बजट दिया गया है. नोएडा में आग और भूकंप जैसी आपदाओं से निपटने के लिए करीब 154 करोड़ रुपये से नए उपकरण और मशीनें खरीदी जाएंगी।  शहर की साफ-सफाई और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए रोज निकलने वाले करीब 100 टन ग्रीन वेस्ट के वैज्ञानिक निस्तारण की योजना भी बनाई गई है. इसके लिए कंपनियों से प्रस्ताव मांगे जाएंगे. वहीं, सेक्टर-95 स्थित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल और ग्रीन गार्डन के रखरखाव और मरम्मत के लिए 107.77 करोड़ रुपये खर्च करने की मंजूरी दी गई है। 

नए वित्तीय वर्ष में इंटरनेट सेवाओं में हो सकती है परेशानी, 100, 200, 500 रुपये के नए नोट होंगे बाजार में

नर्मदापुरम अमरीका और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, लेकिन भारत में करंसी पेपर बनाने वाली नर्मदापुरम स्थित प्रतिभूति कागज कारखाना (एसपीएम) ने उत्पादन बढ़ाकर स्थिति संभालने का संकेत दिया है। एसपीएम ने निर्धारित लक्ष्य से अधिक करंसी पेपर तैयार किया है, जिससे जल्द ही 100, 200 और 500 रुपए के नए नोट बाजार में उपलब्ध हो सकेंगे। इससे आमजन और व्यापारियों को लेनदेन में सुविधा मिलेगी। एसपीएम देश का प्रमुख करंसी पेपर कारखाना है, जहां नोटों के लिए कागज तैयार किया जाता है। 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार पहले भी किल्लत के समय यहां 10 और 20 रुपए के नोटों के लिए कागज तैयार किया था। अब 100, 200 और 500 रुपए के नोटों के लिए कागज का उत्पादन किया गया है। एसपीएम ने 31 मार्च 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार किया है, जबकि लक्ष्य 6 मीट्रिक टन का था। प्रबंधन और कर्मचारियों के बेहतर तालमेल से यह संभव हुआ। नए वित्तीय वर्ष के लिए उत्पादन जारी है। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित होने की आशंका के बीच नकद लेनदेन में ये नए नोट सहायक होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, 500 रुपए के नोट के बाद सबसे अधिक उपयोग 100 रुपए के नोट का होता है। इसके बाद 200 रुपए के नोट का स्थान आता है। इसी कारण एटीएम में 500, 100 रुपए के नोट अधिक रखे जाते हैं। अर्थव्यवस्था को मिल रही मजबूती प्रतिभूति कागज कारखाना एसपीएम देश की महत्वपूर्ण इकाई है। इसी कारखाने ने 1000 रुपए के नोट का कागज तैयार किया था। साथ ही पासपोर्ट पेपर, स्टांप पेपर निर्माण में भी आत्मनिर्भरता का आधार बना है। प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बेहतर तालमेल है। कारखाना हर स्थिति में काम करने में सक्षम है। वित्तीय वर्ष में लक्ष्य से अधिक 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर का उत्पादन किया है।- संजय भवसार, उप महाप्रबंधक (पीआरओ), एसपीएम नर्मदापुरम बाजार में 500 और 100 रुपए के नोटों का सबसे अधिक उपयोग होता है। एटीएम में भी इनकी पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है।– रमेश बाघेला, लीड बैंक मैनेजर, सेंट्रल बैंक, नर्मदापुरम बाजार में 50 फीसदी लेनदेन डिजिटल होता है, बाजार मेंनए नोट आने से आमजन और व्यापारियों को सुविधा मिलेगी।- महेंद्र चौकेसे अध्यक्ष, किराना व्यापारी संघ, नर्मदापुरम जानिए जरूर प्वॉइंट्स वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा असर एसपीएम) ने उत्पादन बढ़ाकर स्थिति संभालने का दिया संकेत जल्द ही 100, 200 और 500 रुपए के नए नोट बाजार में होंगे 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार 

भोपाल टॉकीज तक ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार, काली माता मंदिर से 6 जंक्शन होंगे री-डिजाइन

भोपाल भोपाल शहर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए एक अहम कदम उठाया गया है। तलैया स्थित काली माता मंदिर से तीन मोहारा तक करीब 3.2 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर ट्रैफिक सुधार की नई योजना पर काम शुरू हो गया है। इस योजना के तहत काली माता मंदिर तिराहा से भोपाल टॉकीज चौराहे के बीच आने वाले 6 प्रमुख जंक्शनों (3 चौराहे और 3 तिराहे) को नए सिरे से डिजाइन किया जाएगा। विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा ट्रैफिक पुलिस ने School of Planning and Architecture (SPA) के साथ मिलकर तैयार की है। सोमवार को यह विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया, जिसमें हर जंक्शन की मौजूदा समस्याओं और उनके समाधान को चिन्हित किया गया है। इस कॉरिडोर में भोपाल टॉकीज, नादरा बस स्टैंड, अल्पना, संगम, भारत टॉकीज और काली माता तिराहा जैसे व्यस्त जंक्शन शामिल हैं। ट्रायल में सामने आई असली समस्या हमीदिया रोड स्थित भोपाल टॉकीज चौराहे पर किए गए ट्रायल के दौरान यह पाया गया कि ट्रैफिक जाम की मुख्य वजह सड़क की चौड़ाई की कमी नहीं, बल्कि सड़क का गलत उपयोग और खामीपूर्ण डिजाइन है। ट्रायल के दौरान लेन डिसिप्लिन, स्टॉप लाइन और टर्निंग स्पेस में बदलाव कर ट्रैफिक फ्लो को बेहतर बनाया गया। जंक्शनों पर होंगे ये प्रमुख बदलाव नई डिजाइन के तहत ट्रैफिक मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए जाएंगे:     स्टॉप लाइन, जेब्रा क्रॉसिंग और टर्निंग एंगल में सुधार     अनावश्यक कट और अवैध पार्किंग हटाई जाएगी     पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ विकसित किए जाएंगे बाजार क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती कॉरिडोर के दोनों ओर घनी कमर्शियल गतिविधियों के कारण ट्रैफिक और पार्किंग का संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए योजना में सड़क किनारे पार्किंग के साथ-साथ जरूरत के अनुसार मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है। यह पहल शहर में ट्रैफिक मैनेजमेंट को आधुनिक और सुगम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।  

प्यास से बेहाल डिंडौरी: गंदे नाले का पानी पीने को मजबूर लोग, प्रशासन के सामने छलका गुस्सा

 डिंडौरी आदिवासी बहुल जिले डिंडौरी में जलसंकट इस कदर गहरा गया है कि ग्रामीण बूंद बूंद पानी के लिए भी तरस रहे है। पानी की समस्या को लेकर ग्रामीण चक्का जाम का रास्ता भी अपना रहे हैं। विभागीय अधिकारियों सहित कलेक्टर तक भी शिकायत पहुंच रही है। इसी क्रम में मंगलवार को कलेक्टर की जनसुनवाई में दो गांवों के ग्रामीण खाली बर्तन लेकर पहुंचे और पानी की समस्या का हल करने के गुहार लगाई। जनपद मेहंदवानी के ग्राम चौबीसा और जरगुड़ा में जलसंकट गहराने से ग्रामीणों को पीने के लिए भी बमुश्किल पानी मिल पा रहा है। एक किलोमीटर दूर नाला का पानी कर रहे उपयोग जनसुनवाई में पहुंचे ग्राम पंचायत चौबीसा रैयत के सकरीटोला की महिलाओं ने बताया कि गांव में लगभग एक सैकड़ा परिवार जलसंकट से जूझ रहे है। नल जल योजना से पाइप लाइन भी नहीं बिछ पाई है। गांव में चार हैंडपंप है लेकिन तीनों सूख चुके है। एक कुंआ भी है, जिसमें पानी नहीं है। ऐसी स्थिति में करीब एक किलोमीटर दूर नाला से पानी लाकर जीविकोपार्जन करना पद रहा है। समस्या को लेकर ग्राम पंचायत सरपंच, सचिव को कई बार अवगत कराए जाने के बाद भी अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई है। त्रस्त होकर ग्रामीण शिकायत करने जनसुनवाई में पहुंच गए। कुआं का गंदा पानी पीने मजबूर जरगुड़ा के ग्रामीण इसी तरह मेहंदवानी जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत जरगुड़ा के पोषक ग्राम घांघारी टोला के दर्जनों ग्रामीण खाली बर्तन लेकर जनसुनवाई में पहुंचे और पानी की शिकायत की। महिलाओं ने बताया कि घांघारी टोला की जनसंख्या लगभग 500 के आसपास है। गांव में नल जल योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है। गांव में एक हैंडपंप है लेकिन उससे मटमैला पानी निकलता है। वहीं एक कुआं है जिसका दूषित पानी ग्रामीण पीने मजबूर हैं। काफी मशक्कत से मिल पाता है एक बाल्टी ही पानी ग्रामीणों ने बताया कि हैंडपंप में सुबह से लाइन लगाने के बाद काफी मशक्कत से एक बाल्टी ही पानी मिल पाता है। समस्या को लेकर ग्राम पंचायत के जिम्मेदारों सहित जनपद और पीएचई विभाग में भी ग्रामीणों द्वारा लिखित तौर पर शिकायत की गई है। इसके बाद भी अभी तक कोई पहल न होने से मजबूर होकर ग्रामीण खाली बर्तन लेकर जनसुनवाई में पहुंच गए।  

40 लाख आवारा पशुओं को मिलेगा 12 अंकों का कोड, मध्य प्रदेश में केसरिया टैग से होगी पहचान

भोपाल मध्य प्रदेश की सड़कों और खेतों में घूम रहे करीब 40 लाख आवारा पशुओं की पहचान अब दूर से ही हो सकेगी। केंद्र सरकार ने राज्य के उस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है, जिसके तहत आवारा मवेशियों के कान पर 12 अंकों वाला केसरिया या लाल रंग का पहचान टैग लगाया जाएगा। अब तक सभी पशुओं को पीले रंग के टैग लगाए जाते थे, जिससे पालतू और लावारिस पशुओं के बीच फर्क करना मुश्किल होता था। पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा। हादसों और मुआवजे का गणित राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है। किसानों की दोहरी मार एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में पीले टैग की वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना कठिन था। हमने रंगों में बदलाव का प्रस्ताव दिया था जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। अब केसरिया या लाल टैग से प्रबंधन तेज़ और सटीक होगा। अभी लगाए जाते हैं पीले टैग पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।  इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है।  स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।  कानून क्या कहता है? मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है। किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।  फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है।  पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।  मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है।  राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।  क्या ह रहे अधिकारी अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं।  इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके … Read more

धार भोजशाला केस: हिंदू पक्ष ने पेश किए मंदिर होने के सबूत, हवन कुंड और मूर्तियों का किया जिक्र

 धार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में धार की विवादित भोजशाला को लेकर नियमित सुनवाई शुरू हुई. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने हिंदू पक्ष ने कड़ा तर्क दिया कि यह स्मारक कभी मस्जिद था ही नहीं, बल्कि यह राजा भोज द्वारा निर्मित वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।  'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी, ''ASI की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट साफ बताती है कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया है।  परिसर में आज भी संस्कृत श्लोकों वाले शिलालेख, हवन कुंड, मंडप और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मौजूद हैं. यह ढांचा 1034 ईस्वी में परमार राजा भोज ने बनाया था. आक्रमणकारियों ने प्रतीकों को मिटाने के बावजूद मूल चरित्र आज भी जीवंत है।  ASI के नियमों के अनुसार, किसी भी संरक्षित स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता, इसलिए यहां सिर्फ हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां तकरीबन 2 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने अनुरोध किया कि हिंदू समुदाय की याचिका के समर्थन में पेश किए गए सभी दस्तावेजों की प्रतियां उन्हें भी उपलब्ध कराई जाएं। हाई कोर्ट ने इस अनुरोध को मंजूर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि दलीलें पूरी होने के बाद, इस मामले से जुड़े सभी पक्ष अपनी आपत्तियां पेश कर सकते हैं, जिन पर कोर्ट विचार करेगा. डिवीजन बेंच ने कहा कि वह मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी।  क्या कहती है ASI की रिपोर्ट? बता दें कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI ने दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था और एक रिपोर्ट पेश की थी. 2000 से ज्यादा पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मस्जिद से पहले, धार के परमार राजाओं के शासनकाल का एक विशाल ढांचा वहां मौजूद था और मौजूदा विवादित ढांचा मंदिर के ही हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था।  यह ध्यान देने लायक बात है कि परमार राजाओं ने 9वीं सदी से लेकर 400 सालों तक मध्य-पश्चिमी भारत के मालवा के आस-पास के एक बड़े इलाके पर राज किया था।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां मुस्लिम पक्ष ने ASI के सर्वेक्षण पर सवाल उठाए हैं और हिंदू पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया है कि भोजशाला परिसर असल में एक मंदिर था।  इसके अलावा, मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि ASI ने उनकी पिछली आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वेक्षण में विवादित परिसर के अंदर 'चोर दरवाजजे से रखी गई चीजों' को भी शामिल कर लिया।  ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के मुताबिक, हिंदुओं को हर मंगलवार को इस परिसर में पूजा करने की इजाजत है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति है। 

ग्वालियर-आगरा का सफर होगा महज 50 मिनट में, केंद्रीय मंत्री ने हाईस्पीड कॉरिडोर से आर्थिक विकास का दिया भरोसा

ग्वालियर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे निर्माण कार्य का निरीक्षण करते हुए बड़ा दावा किया कि इस हाईस्पीड कॉरिडोर के बनते ही ग्वालियर से आगरा की दूरी महज 45 से 50 मिनट में सिमट जाएगी। करीब 5500 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा यह 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को नई गति देगा। निरीक्षण के दौरान जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट और ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर भी मौजूद रहे। यातायात तेज और सुरक्षित सिंधिया ने कहा कि देश में तेजी से विकसित हो रहा आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक प्रगति की मजबूत आधारशिला बन रहा है। उन्होंने कहा, ग्वालियर-आगरा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) वर्तमान मार्ग से करीब 32 किलोमीटर छोटा होगा और कुल दूरी लगभग 88 किलोमीटर रह जाएगी। मौजूदा 2 लेन सडक़ को अपग्रेड कर 6 लेन हाईस्पीड कॉरिडोर बनाया जा रहा है, जहां न्यूनतम गति 100 किमी प्रति घंटा निर्धारित की गई है। कॉरिडोर में सीमित एंट्री-एग्जिट के साथ कुल 4 इंटरचेंज बनाए जाएंगे, जिससे यातायात तेज और सुरक्षित रहेगा। सिंधिया ने कहा कि अब दो-लेन सड़क को अपग्रेड करके छह-लेन हाई-स्पीड कॉरिडोर बनाया जाएगा, जिसमें न्यूनतम गति 100 किमी/घंटा होगी. आगरा से ग्वालियर का सफर अभी 2.5-3 घंटे में पूरा होता है, लेकिन एक्सप्रेस-वे बनने के बाद सिर्फ 45-50 मिनट में पूरा होगा. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि लगभग तीन साल में ये एक्सप्रेस-वे जनता के लिए खोल दिया जाएगा।  आधुनिक सुविधाओं वाला होगा नया एक्सप्रेस-वे सिंधिया ने कहा कि नया एक्सप्रेस-वे पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं वाला बन रहा है. इसमें सिर्फ चार मुख्य एंट्री-एक्जिट पॉइंट होंगे, जिससे ट्रैफिक में कोई दिक्कत नहीं आएगी. हाई-स्पीड कॉरिडोर बिना रुकावट चलेगा. लोग तेज और आराम से सफर कर सकेंगे. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में चंबल नदी पर नया छह-लेन का पुल बनाया जाएगा. यह पुल सबसे आधुनिक तकनीक से बनेगा और डिजाइन में दुनिया के बेहतरीन पुलों जैसा होगा।  उन्होंने कहा कि इसके साथ ही शिवपुरी को जोड़ने के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बाईपास भी डेवलप किया जा रहा है, जिसकी लागत लगभग 1,400 करोड़ रुपये है. इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच यात्रा आसान और तेज होगी।  600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन बनेगा केंद्रीय मंत्री ने बताया कि ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे और पश्चिमी बाईपास मिलाकर लगभग 7,000 करोड़ की परियोजनाएं क्षेत्र को मिली हैं. इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन भी बन रहा है. उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स से पूरे ग्वालियर-चंबल इलाके का कायाकल्प होगा और यहां निवेश, रोजगार और व्यापार के नए मौके लोगों को मिलेंगे।  आधुनिक तकनीक से तैयार होगा 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज उन्होंने कहा, परियोजना के तहत चंबल नदी पर आधुनिक तकनीक से 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज बनाया जाएगा। साथ ही शिवपुरी को जोडऩे के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बायपास विकसित किया जा रहा है, जिसकी लागत करीब 1400 करोड़ रुपए है। इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच आवागमन और अधिक सुगम होगा। 7000 करोड़ के प्रोजेक्ट से बदलेगी तस्वीर सिंधिया ने कहा, हाईस्पीड कॉरिडोर (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) और पश्चिमी बायपास को मिलाकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र को करीब 7000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट मिले हैं। इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक रेलवे स्टेशन का निर्माण भी जारी है। इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने पर क्षेत्र में निवेश, व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।  

खौफनाक मंजर: यूपी में अचानक गिरने लगे गिद्ध, 28 की दर्दनाक मौत से मचा हड़कंप

 बिजुआ (लखीमपुर) भीरा वन रेंज के पड़रिया बीट क्षेत्र में लापरवाही और जहरखुरानी ने प्रकृति के संतुलन पर सीधा हमला कर दिया। सेमरिया गांव के पास एक किसान के खेत में जहर देकर मारे गए कुत्ते के शव को खाने से करीब 40 गिद्धों के झुंड में से 28 की तड़प-तड़प कर मौत हो गई, जो गिद्ध पर्यावरण को साफ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, वही इंसानी लापरवाही का शिकार हो गए। सुबह जब खेत में गिद्धों का झुंड मरे कुत्ते को नोचता दिखा तो लोगों में उत्साह था, कई प्रकृति प्रेमी उन्हें कैमरे में कैद कर रहे थे, लेकिन कुछ ही देर में यह दृश्य भयावह हो गया। एक-एक कर गिद्ध बेहोश होकर गिरने लगे और देखते ही देखते पूरा झुंड मौत के मुंह में समाने लगा, जिसने भी यह मंजर देखा वह सन्न रह गया। जांच में सामने आया कि पास के गांव में आवारा कुत्तों को जहर दिया गया था, उन्हीं में से एक कुत्ता खेत के पास आकर मर गया, जिसे खाने पहुंचे गिद्ध जहर की चपेट में आ गए, नतीजा ये हुआ कि एक साथ 28 गिद्धों की मौत हो गई जबकि कई अन्य खेतों और पेड़ों के नीचे तड़पते मिले। गिद्ध, जिन्हें ‘प्रकृति के सफाईकर्मी’ कहा जाता है, पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन उनकी इस तरह हो रही मौतें वन्यजीव संरक्षण पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं, स्थानीय लोगों और प्रकृति प्रेमियों ने वन विभाग की सुस्ती पर भी नाराजगी जताई, उनका कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई होती तो कई गिद्धों की जान बचाई जा सकती थी। घटना की सूचना पर पहुंची वन विभाग की टीम ने मृत गिद्धों को एकत्र कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा, लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है, कि आखिर कब तक जहरखुरानी से वन्यजीवों की यूं ही मौत होती रहेगी, और जिम्मेदार महकमे केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहेंगे?  

एमपी टूरिज्म क्विज के लिए बच्चों को दी जाएगी पर्यटन और संस्कृति पर आधारित पुस्तकें

भोपाल  संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी ने आज मंत्रालय में पर्यटन बोर्ड की गतिविधियों की विस्तृत समीक्षा की। बैठक में उन्होंने प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर को वैश्विक पटल पर लाने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए। फिल्म पर्यटन और स्थानीय प्रतिभाओं को प्रोत्साहन राज्य मंत्री लोधी ने कहा कि मध्यप्रदेश फिल्म निर्माण के लिए एक उभरते हुए केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। उन्होंने निर्देश दिए कि प्रदेश में फिल्म पर्यटन पर केंद्रित राज्य स्तरीय आयोजन की कार्ययोजना तैयार की जाए। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य प्रदेश में फिल्मांकन करने वाले फिल्म निर्माताओं, स्थानीय फिल्म निर्माताओं और कलाकारों को मंच प्रदान करना तथा उन्हें प्रोत्साहित करना होगा। बैठक में 'मध्यप्रदेश फिल्म पर्यटन नीति 2025' की समीक्षा के साथ ही फिल्मों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी और लंबित प्रकरणों के त्वरित निराकरण पर भी चर्चा की गई। पर्यटन क्विज से बढ़ेगा बच्चों का ज्ञान भावी पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने के उद्देश्य से राज्य लोधी ने कहा कि 'एमपी टूरिज्म क्विज' के माध्यम से बच्चों को प्रदेश के गौरवशाली इतिहास और पर्यटन स्थलों से परिचित कराया जाए। उन्होंने बताया कि प्रतियोगिता की तैयारी के लिए बच्चों को प्रदेश की संस्कृति और पर्यटन पर आधारित ज्ञानवर्धक पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे न केवल उनका सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, बल्कि वे अपनी माटी की गौरव गाथा को भी जान सकेंगे। गुणवत्ता और समयबद्धता पर जोर मंत्री लोधी ने निर्माण कार्यों की समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि विकास कार्यों में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने सभी परियोजनाओं को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के निर्देश दिए। बैठक में वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट आवंटन, होटल एवं रिजॉर्ट के लिए कैपिटल सब्सिडी, ग्रामीण पर्यटन और महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन स्थल परियोजनाओं की प्रगति का भी बारीकी से विश्लेषण किया गया।  

अभियान” जनभागीदारी से आकार ले रहीं संरचनायें पेश कर रही हैं जल संरक्षण की नई मिसाल

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर संचालित “जल गंगा संवर्धन अभियान” ग्वालियर–चंबल संभाग में जन-आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। इस अभियान के तहत जहां एक ओर वर्षों पुरानी जल संरचनाओं को पुनर्जीवित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नई जल संरचनाओं का निर्माण कर जल संरक्षण की दिशा में ठोस कार्य किए जा रहे हैं। जनभागीदारी, श्रमदान और जागरूकता के माध्यम से यह अभियान जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन संवर्धन का भी माध्यम बन रहा है। ग्वालियर में ऐतिहासिक बावड़ियां बनीं जल संरक्षण का केंद्र ग्वालियर शहर में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत तीन ऐतिहासिक बावड़ियों का पुनर्जीवन किया गया है। इन बावड़ियों में प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख लीटर पानी सहेजने की क्षमता विकसित की गई है। सुरक्षा के लिए लोहे के जाल लगाए गए हैं तथा आरओ प्लांट की व्यवस्था भी की गई है, जिससे नागरिकों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो सकेगा। ग्वालियर दुर्ग स्थित प्राचीन सूरज कुण्ड को स्वच्छ एवं आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। साथ ही जलालपुर कुण्ड और केआरजी कॉलेज की बावड़ी की साफ-सफाई भी कराई जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अभियान ने गति पकड़ी है। जिले में कुल 2300 जल संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य है, जिनसे लगभग 31.50 लाख घन मीटर जल संरक्षित होगा। अब तक 71 खेत तालाब और 249 कुओं के रिचार्ज कार्य पूर्ण हो चुके हैं। शिवपुरी में 587 ग्राम पंचायतों में जनसहभागिता से कार्य शिवपुरी जिले की सभी ग्राम पंचायतों में तालाबों की सफाई, गहरीकरण, गाद निकासी और पेयजल व्यवस्था जैसे कार्य जनसहयोग से किए जा रहे हैं। विभिन्न ग्राम पंचायतों में अभियान की शुरुआत के साथ ही ग्रामीण स्तर पर जल संरक्षण के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ी है। गुना में खेत तालाब और रिचार्ज कार्यों में उल्लेखनीय प्रगति गुना जिले में 1547 खेत तालाबों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें से 547 पूर्ण हो चुके हैं। डगवेल रिचार्ज के 2206 कार्यों में से 1889 कार्य पूरे किए जा चुके हैं। इसके अलावा 1007 नई जल संरचनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें से 193 पूर्ण हो चुकी हैं। जिले में 57 सार्वजनिक प्याऊ भी शुरू की गई हैं। अशोकनगर में श्रमदान से दिया जल संरक्षण का संदेश अशोकनगर जिले में प्राचीन बावड़ियों, तालाबों और धार्मिक स्थलों पर श्रमदान कर जल संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। तुलसी सरोवर सहित कई जल स्रोतों का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। गांव-गांव में कलश यात्रा, पूजन और श्रमदान के माध्यम से जनजागरण किया जा रहा है। दतिया में सीवरेज प्रबंधन से तालाब संरक्षण दतिया जिले में सीतासागर तालाब में गंदे पानी के प्रवाह को रोकने के लिए नालों को सीवर पंपिंग स्टेशन से जोड़ा गया है। अब यह पानी एसटीपी प्लांट में शोधन के बाद पुनः उपयोग में लाया जा रहा है। आंगनबाड़ियों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग मॉडल भी विकसित किए गए हैं। मुरैना और भिण्ड में लक्ष्य आधारित कार्यों की तेज प्रगति मुरैना जिले में 1000 खेत तालाब निर्माण का लक्ष्य है, जिनमें से 200 पूर्ण हो चुके हैं। साथ ही 2382 अन्य जल संरचनाओं में से 250 कार्य पूरे किए जा चुके हैं। भिण्ड जिले में गौरी सरोवर सहित कई ऐतिहासिक जल स्रोतों की सफाई, गाद हटाने और संरक्षण का कार्य जनभागीदारी से किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब गहरीकरण और जल संरक्षण के प्रयास तेज हुए हैं। श्योपुर में भी गांव-गांव जल संरचनाओं का निर्माण श्योपुर जिले में भी जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत जल संरचनाओं का तेजी से निर्माण हो रहा है, जिसमें जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। जल चौपाल और प्याऊ से बढ़ी जनभागीदारी अभियान के तहत जल चौपाल आयोजित कर लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। साथ ही गर्मी के मौसम में राहगीरों को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जगह-जगह सार्वजनिक प्याऊ स्थापित किये गये हैं। जल संरक्षण से जुड़ रहा जन-जन, बन रहा सतत विकास का आधार “जल गंगा संवर्धन अभियान” केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक बन चुका है। जल स्रोतों के संरक्षण, पुनर्जीवन और विकास के इन प्रयासों से न केवल जल संकट का समाधान संभव होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सतत जल उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।