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PM मोदी के न्योते पर भारत आएंगे बालेन शाह? नेपाल के वित्त मंत्री ने दिया बड़ा अपडेट

नई दिल्ली नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत दौरे को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। माना जा रहा कि इस साल के आखिर तक बालेन शाह दिल्ली की अपनी पहली यात्रा कर सकते हैं। इस दौरान आपसी रिश्तों को और मजबूती देने के साथ साझेदारी के नए रास्ते खुलेंगे। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने भारत दौरे पर ये बात कही है। दिल्ली दौरे पर उन्होंने भारत और नेपाल के बीच इंडस्ट्री-टू-इंडस्ट्री सहयोग और बालेन शाह सरकार के रोजगार सृजन और उद्योग पर फोकस के बारे में भी बात की। बालेन शाह इसी साल आ सकते हैं भारत पिछले साल नेपाल में बड़े पैमाने पर हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों के बाद पिछली सरकार गिर गई थी। इसके बाद 2026 की शुरुआत में संसदीय चुनाव जीतकर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने पहले ऐलान किया था कि वे प्रधानमंत्री के तौर पर विदेश यात्रा 2027 से ही शुरू करेंगे। हालांकि, मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने हमारे सहयोगी अखबार ईटी को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण के बाद बालेन शाह नवंबर में नई दिल्ली आ सकते हैं। नेपाल के वित्त मंत्री ने दिल्ली दौरे पर दी जानकारी नेपाल के वित्त मंत्री के तौर पर अपनी पहली भारत यात्रा पर आए स्वर्णिम वागले ने प्रधानमंत्री बालेन शाह के कार्यक्रम को लेकर अहम अपडेट दिया। स्वर्णिम वागले, दिल्ली स्थित RIS में विशेषज्ञों और थिंक-टैंक के सदस्यों के एक चुनिंदा समूह से बात कर रहे थे। मंत्री ने भारत और नेपाल के बीच इंडस्ट्री-टू-इंडस्ट्री सहयोग और शाह सरकार के रोजगार सृजन और उद्योग पर फोकस के बारे में भी बात की। खास बात यह है कि भारत से नेपाल में निजी निवेश की पिछली लहर लगभग 25 साल पहले आई थी। काठमांडू अब निवेश का एक नया दौर चाहता है। द्विपक्षीय व्यापार और ट्रांजिट संधि पर फोकस नेपाल द्विपक्षीय व्यापार और ट्रांजिट संधि को आधुनिक बनाने का भी इच्छुक है। ट्रांजिट संधि में 1 जून, 2023 को सात साल की अवधि के लिए संशोधन किया गया था। इसके बाद पिछले नवंबर में रेल-आधारित माल ढुलाई और बल्क कार्गो कनेक्टिविटी का विस्तार करने के लिए एक अतिरिक्त लेटर ऑफ एक्सचेंज पर सहमति बनी थी। वागले ने कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बैठकों में अगस्त में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ के बाद नेपाल में पुनर्निर्माण कार्यों और भारत से संभावित मदद पर भी फोकस किया गया। वागले के भारत दौरे पर क्या कह रहे एक्सपर्ट नेपाल मामलों के जानकारों का कहना है कि वागले ने अपनी पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए भारत को इसलिए चुना क्योंकि दोनों देशों के बीच करीबी द्विपक्षीय संबंध हैं। हाल ही में आई आपदा के बाद बचाव और राहत कार्यों में नई दिल्ली ने तेजी से मदद की थी। इससे पहले पिछले कुछ महीनों में नेपाल के विदेश मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष ने भारत का दौरा किया था। इस बीच, भारत ने शनिवार को हिमालयी देश को आपदा से उबरने के प्रयासों में मदद के लिए 11 टन और राहत सामग्री भेजी।

INS कोलकाता-पाकिस्तानी PNS हुनैन की टक्कर से बढ़ा तनाव, भारत ने राजदूत को किया तलब

 नई दिल्ली उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के विध्वंसक पोत INS कोलकाता और पाकिस्तानी नौसेना के गश्ती जहाज PNS हुनैन के बीच हुई टक्कर ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच समुद्री सीमा और कूटनीतिक तनाव को एक बार फिर बढ़ा दिया है। भारत के अनुसार, 15 सितंबर को यह हादसा उस समय हुआ जब पाकिस्तानी जहाज ने तेज रफ्तार में आकर बेहद गैर पेशेवर तरीके से खतरनाक ओवरटेकिंग की कोशिश की। भारत ने इस घटना पर कड़ा रुख अपनाते हुए नई दिल्ली में पाकिस्तान के कार्यवाहक राजदूत को तलब किया और 1991 के द्विपक्षीय समझौते के उल्लंघन पर विरोध दर्ज कराया। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, PNS हुनैन का यह कदम 1991 के भारत-पाकिस्तान समझौते के धारा 10 का स्पष्ट उल्लंघन था। इस समझौते के तहत दोनों देशों के युद्धपोतों को एक-दूसरे से कम से कम 3 नॉटिकल मील (लगभग 5.5 किमी) की दूरी बनाए रखना अनिवार्य है। टक्कर के बावजूद भारतीय नौसेना के 7400 टन वजनी गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर INS कोलकाता को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा और वह समुद्र में अपनी तैनाती पर बना हुआ है। वहीं, लगभग 2,600 टन वजनी पाकिस्तानी गश्ती पोत PNS हुनैन बुरी तरह क्षतिग्रस्त होकर अपने बंदरगाह लौटने पर मजबूर हो गया। पाकिस्तान ने इस घटना पर भारत पर उसके नौसैनिक अभ्यास में बाधा डालने का आरोप लगाया। भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए टालमटोल वाला रवैया बताया। क्या है भारत-पाकिस्तान समुद्री विवाद का मूल कारण? समुद्र में दोनों देशों के बीच अक्सर पैदा होने वाले तनाव के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण हैं। गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच 96 किमी लंबी सर क्रीक दलदली सीमा रेखा को लेकर दशकों पुराना विवाद है। सीमा का सही सीमांकन न होने के कारण दोनों देशों के बीच अरब सागर में एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) का दायरा तय नहीं हो पाया है, जहां तेल, प्राकृतिक गैस और विशाल मत्स्य संसाधन मौजूद हैं। स्पष्ट समुद्री सीमा न होने के कारण दोनों देशों के मछुआरे अक्सर एक-दूसरे के जलक्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं। इसके चलते तटरक्षक बल नियमित रूप से मछुआरों को गिरफ्तार करते हैं और उनकी नौकाएं जब्त कर लेते हैं। 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद भारत ने अपनी समुद्री सीमाओं पर निगरानी बेहद सख्त कर दी है। समुद्री हादसों और सैन्य झड़पों को रोकने के लिए 1991 में बनाए गए सुरक्षा नियमों का उल्लंघन ऐसी घटनाओं का कारण बनता है। 3 नॉटिकल मील की दूरी का नियम न मानने से कई बार गंभीर दुर्घटनाएं होने की आशंका बनी रहती है। भारतीय नौसेना अपने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मार्गों और समुद्री सुरक्षा को बनाए रखने के लिए उत्तर-पश्चिमी अरब सागर में निरंतर गश्त करती है। दूसरी ओर पाकिस्तान अपनी तटरेखा और ग्वादर बंदरगाह जैसे रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा के नाम पर ऐसी आक्रामक पैंतरेबाजी करता रहता है।

निजी निवेश बढ़ाने पर केंद्र का जोर, राज्यों से कैपिटल खर्च बढ़ाने और निवेश माहौल सुधारने को कहा

 नई दिल्ली केंद्र सरकार ने विकसित भारत के लिए ज्यादा प्राइवेट इन्वेस्टमेंट की जरूरत पर जोर दिया है और कहा है कि सिर्फ सरकारी खर्च से विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने शनिवार को राज्यों और केंद्र के अधिकारियों और वित्त मंत्रियों से कहा, "हालांकि भारत का बचत आधार काफी बड़ा है और इसे और बढ़ाने की जरूरत है लेकिन विकसित भारत के लिए जरूरी निवेश जुटाने के लिए निजी पूंजी की बड़ी भागीदारी बहुत जरूरी होगी।" 'सिर्फ सरकारी खर्चे पर हासिल नहीं होगा लक्ष्य' शुक्रवार को आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने भी ऐसी ही बातें कही थीं। बयान में कहा गया, "डीईए सचिव ने जोर दिया कि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी बड़े बदलाव को सिर्फ सरकारी बजट से पूरा नहीं किया जा सकता। निजी क्षेत्र से फंडिंग, नए तरह के फंडिंग के तरीके और सरकार के अलग-अलग स्तरों के बीच सहयोग अहम भूमिका निभाएंगे।" केंद्र ने राज्यों को निवेश बढ़ाने के लिए कहा अपनी तरह की इस पहली बैठक में नागेश्वरन ने कहा, "विकसित भारत, विकसित राज्यों पर निर्भर करता है।" केंद्र ने राज्यों से निवेश आकर्षित करने के प्रयास तेज करने को कहा। नागेश्वरन ने सुझाव दिया कि राज्यों द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों, नियमों को आसान बनाने की चल रही कोशिशों और विशेषज्ञों की सिफारिशों को आगे बढ़ाया जाए और उन्हें स्पष्ट जिम्मेदारियों और समय-सीमा के साथ साझेदारियों में बदला जाए। उन्होंने कहा कि अगले पांच वर्षों में जब वैश्विक स्तर पर फाइनेंसिंग के अवसर उपलब्ध हों भारत को संसाधनों को जुटाने की गति बढ़ाते हुए अपनी दीर्घकालिक विकास यात्रा को जारी रखना चाहिए। राज्यों के लिए बताईं प्राथमिकताएं सरकार के मुख्य अर्थशास्त्री ने राज्यों के लिए तीन प्राथमिकताएं बताईं-     जमीन, बिजली और लॉजिस्टिक्स की उपलब्धता और असरदार सिंगल-विंडो क्लीयरेंस के जरिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए अनुकूल माहौल बनाना।     मजबूत प्रोजेक्ट-तैयारी पाइपलाइन और भरोसेमंद प्रोजेक्ट रिपोर्ट के जरिए इन्वेस्टमेंट की क्वालिटी बेहतर करना ताकि घरेलू और मल्टीलेटरल फंडिंग मिल सके।     साथ ही विकास की संभावना वाले उन जिलों में क्रेडिट पहुंचाना जहां अभी तक पर्याप्त क्रेडिट नहीं पहुंचा है। वित्तीय बाधाओं के बावजूद राज्यों के अपने कैपिटल खर्च को बढ़ाना। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों को 2031-32 तक कैपिटल खर्च को GSDP के लगभग 2.4% से बढ़ाकर 3% करना चाहिए।  

7 अक्टूबर हमले से पहले नेतन्याहू को मिली थी चेतावनी? कतर-हमास फंडिंग रिपोर्ट से बढ़ा दबाव

यरूशलेम इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर कतर और हमास से जुड़े फंडिंग के एक मामले को लेकर सवाल उठ रहे हैं. दरअसल, एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 7 अक्टूबर 2023 के हमले से पहले इजरायली खुफिया एजेंसियों ने नेतन्याहू को कतर से हमास के सैन्य संगठन तक पहुंच रहे पैसों को लेकर कई बार चेतावनी दी थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया आकलन में यह रकम हमास के सैन्य संगठन के कुल बजट की करीब आधी तक बताई गई थी. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने नेतन्याहू पर निशाना साधा है. उनका कहना है कि अगर सुरक्षा एजेंसियों की ओर से ऐसी जानकारी दी गई थी, तो इस मामले की गंभीरता से जांच होनी चाहिए. इजरायली खुफिया एजेंसियों ने दी थी वार्निंग इजरायली न्यूजपेपर येदिओथ अहरोनोथ (Yedioth Ahronoth) की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नेतन्याहू को कतर से हमास के सैन्य संगठन तक पहुंच रहे पैसों की जानकारी कई बार दी गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया था कि यह पैसा हमास के सैन्य संगठन के बजट का बड़ा हिस्सा था. रिपोर्ट में मिस्र की ओर से दी गई चेतावनी का भी जिक्र है. दावा किया गया है कि मिस्र ने भी नेतन्याहू को बताया था कि कतर से आने वाली रकम हमास के सैन्य संगठन तक पहुंच रही है. इसके अलावा इजरायली खुफिया एजेंसियों को एक अलग और गुप्त रास्ते की जानकारी मिली थी. इसके जरिए कतर से जुड़ी रकम सीधे हमास की सशस्त्र इकाइयों तक पहुंचाई जा रही थी. इस बीच नेतन्याहू के कार्यालय ने इन दावों को खारिज किया है. कार्यालय ने जांच रिपोर्ट को पुराने झूठ का संग्रह बताया है. उसका कहना है कि इन दावों को पहले भी गलत साबित किया जा चुका है. नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा है कि इजरायल के सुरक्षा प्रमुखों ने कतर की आर्थिक मदद का समर्थन किया था. यह मदद मानवीय जरूरतों के लिए थी. इसका उद्देश्य गाजा में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मदद करना था. कतर ने भी आरोपों को बताया गलत कतर ने भी रिपोर्ट में किए गए दावों को पूरी तरह खारिज किया है. कतर के अंतरराष्ट्रीय मीडिया कार्यालय ने कहा कि उसने कभी हमास को पैसा नहीं दिया. उसके मुताबिक, कतर की मदद इजरायल और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ तय व्यवस्था के तहत फिलिस्तीनी नागरिकों तक पहुंचाई गई. कतर ने कहा कि अगर किसी दूसरे तरीके से कोई पैसा हमास तक पहुंचा भी है, तो उसका कतर से कोई संबंध नहीं है. कतर ने इजरायल के राजनीतिक नेताओं पर भी निशाना साधा. उसने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले गल्फ देश को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है. रिपोर्ट के सामने आने के बाद नेतन्याहू की सरकार पर विपक्ष का दबाव बढ़ा है. याशर पार्टी के प्रमुख गादी आइजेनकोट ने कहा कि इन खुलासों से 7 अक्टूबर के हमले से जुड़ी घटनाओं की जांच की जरूरत और बढ़ गई है. उन्होंने 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलताओं की जांच के लिए एक राज्य जांच आयोग बनाने की मांग की. इस हमले से पहले इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया सूचनाओं को लेकर पहले भी कई सवाल उठ चुके हैं. नई रिपोर्ट ने अब कतर से आने वाली रकम और उसके हमास तक पहुंचने के दावों को लेकर एक और बहस छेड़ दी है. हालांकि, नेतन्याहू का कार्यालय और कतर दोनों इन आरोपों को खारिज कर चुके हैं.  

सऊदी के बाद पाकिस्तान को भी हूतियों की धमकी, मक्का पैक्ट के बीच बढ़ा तनाव

नई दिल्ली   मक्का समझौता करने के बाद पाकिस्तान की मुसीबतें और भी बढ़ गई हैं। पहली बात तो सऊदी अरब के खिलाफ हूतियों के अटैक पर निष्क्रियता की वजह से उसकी दुनियाभर में आलोचना हो रही है। दूसरी ओर हूती विद्रोहियों ने पाकिस्तान को भी हमले की धमकी दे दी है।अमेरिका के पूर्व सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर ने कहा कि मक्का पैक्ट के पीछे भी पाकिस्तान के इरादे साफ नहीं हैं। आपको बता दें कि 7 अगस्त को ही सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने एक सझौते पर साइन किए थे। इस समझौते के मुताबिक अगर इन तीनों में से किसी एक देश पर भी हमला होता है तो तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों प्रतिक्रिया देंगे। तुर्किए ने तो यहां तक कहा था कि यह नाटो की तर्ज पर बनाया गया है. इसलिए इसे इस्लामिक नाटो कहा जा सकता है। हूतियों ने पाकिस्तान को दी धमकी सऊदी अरब में तुर्की और पाकिस्तान की सेना की तैनाती को लेकर हूती विद्रोहियों ने दोनों देशों को हमले की धमकी दी है। हूती नेता अल बुखैती ने कहा कि अगर इस्लामाबाद और अंकारा सामने आते हैं तो उनपर भी सीधा हमला होगा। हूती नेता ने कहा कि यमन अब भी रक्षात्मक रुख अपना रहा है। लेकिन अगर पाकिस्तान और तुर्की भी उतरते हैं तो उनके लिए ठक नहीं होगा। उन्होने कहा कि यमन किसी भी विदेशी ताकत का दखल स्वीकार नहीं करेगा। पाकिस्तान ने ईरान और अमरेका के बीच युद्धविराम पर समझौता करवाने और क्रेडिट लूटने की पूरी कोशिश की थी लेकिन उसका कोई भी प्रयास सफल नहीं हो पाया। इसके बाद पाकिस्तान की शांतिदूत की छवि बनाने वाली कोशिश फेल हो गई। मक्का समझौता करके उसने एक बार फिर अपनी विदेश नीति दिखाने की कोशिश की लेकिन यह भी फेल ही होता नजर आ रहा है। हूतियों ने खोल दिया नया मोर्चा सऊदी अरब ने शनिवार को पुष्टि की कि यमन के हूती विद्रोहियों ने बैलिस्टिक मिसाइल से उसकी राजधानी रियाद को निशाना बनाने की कोशिश की। ईरान समर्थित विद्रोहियों के साथ संघर्ष तेज होने के बाद रियाद को निशाना बनाने की यह पहली कोशिश है। हूती विद्रोहियों ने ईरान युद्ध में एक नया मोर्चा खोल दिया है। हूती विद्रोहियों से लड़ रहे सऊदी अरब नीत गठबंधन ने तड़के की गई इस कोशिश के काफी देर बाद बयान जारी कर कहा कि मिसाइल को बीच में ही रोक दिया गया। रियाद के कुछ निवासियों ने विस्फोट की आवाज सुनी। बाद में कुछ लोगों ने हवाई अड्डे के पास धुएं का गुबार देखा। किसी के हताहत होने या किसी तरह के नुकसान की कोई खबर नहीं है। बयान में यह भी कहा गया कि हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के बंदरगाह शहर यनबू में असैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिश की। सऊदी अरब की एक प्रमुख पाइपलाइन यहीं समाप्त होती है। इसके अलावा ताइफ, बैश और फरसान में भी हमले के प्रयास किए गए लेकिन उन्हें नाकाम कर दिया गया। गठबंधन ने इस बारे में और जानकारी नहीं दी। हूती विद्रोहियों ने इससे पहले बिना कोई सबूत दिए दावा किया था कि उन्होंने रियाद में ''संवेदनशील ठिकानों'' और यनबू में सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको के प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जिससे ''भीषण आग'' लग गई।

Kalyan-Latur Expressway पर बनेगी 8 किमी की टनल, सफर का समय 6 घंटे तक घटेगा

लातूर  देश के बड़े शहरों को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ ही सरकार अन्य छोटे शहरों तक कनेक्टिविटी बढ़ाने पर जोर दे रही है. इस कड़ी में अगला नाम है कल्याण से लातूर तक जाने वाले एक्सप्रेसवे (Kalyan-Latur Expressway)का. महाराष्ट्र सरकार की कैबिनेट ने इस ई-वे को मंजूरी दे दी है. यह ई-वे करीब 450 किलोमीटर लंबा होगा और इसके तैयार होने के बाद दोनों शहरों के बीच सफर में लगने वाला समय 11 घंटे से घटकर महज 5 घंटे का रह जाएगा।  यह एक्सप्रेसवे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर बन रही बदलापुर टनल के उत्तर से ही शुरू होगा और महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा के पास लातूर में निकलेगा. इसकी कुल लंबाई 450 किलोमीटर के आसपास है, जिससे महज 4.5 से 5 घंटे के सफर में पूरा किया जा सकेगा. अभी इस दूरी को तय करने में करीब 11 घंटे का समय लग जाता है. आगे चलकर यह एक्सप्रेसवे मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र से भी सीधे तौर पर जुड़ जाएगा, जो नागपुर-गोवा शक्तिपीठ एक्सप्रेसवे के पास रहेगा।  8 किलोमीटर की टनल भी बनेगी इस एक्सप्रेसवे के रास्ते में 8 किलोमीटर लंबी एक टनल भी बनाई जाएगी, जो मलशेज घाट के पास होगी. यह टनल बिलकुल वैसी ही होगी जैसी इगतपुरी के पास बन रही ट्विन टनल है. यह ट्विन टनल समृद्धि एक्सप्रेसवे पर बनाई गई है. इस ई-वे पर कुल मिलाकर 17 इंटरचेंज बनाए जाएंगे. इस ई-वे को तैयार करने पर 22 से 25 हजार करोड़ का खर्चा आएगा. इस ई-वे की सबसे खास बात इसकी लंबाई नहीं, बल्कि इसका दुर्गम रास्ता है।  क्यों जरूरी है 8 किलोमीटर की सड़क मलशेज घाट पर बनने वाली 8 किलोमीटर लंबी टनल काफी मायने रखती है. इस टनल से गुजरने के लिए फ्लैट हाईवे जैसा रास्ता नहीं होगा, बल्कि इसमें तीखे मोड़ और स्लोप हैं जिस पर ट्रैफिक को काफी धीमे-धीमे गुजरना होगा. यही वजह है कि ई-वे पर सबसे जरूरी सेक्शन यह टनल ही है. यह ई-वे दो और एक्सप्रेसवे के साथ कनेक्टिविटी मजबूत करेगा, जिसकी वजह से इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है. इसके अलावा प्रोजेक्ट को विरार-अलीबाग मल्टीमॉडल कॉरिडोर के साथ भी जोड़ा जाएगा. इससे बाद में नवी मुंबई एयरपोर्ट और अटल सेतु तक जाना भी आसान हो जाएगा. यह रास्ता मराठवाड़ा में बन रहे सूरत-चेन्नई इकनॉमिक कॉरिडोर को भी जोड़ेगा।   

कश्मीर में लोकल आतंकियों की संख्या घटी, आर्टिकल 370 के बाद बदले हालात

श्रीनगर  जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर काफी लगाम लगी है। आंकड़े भी इसके गवाही दे रहे हैं। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 2021 से लेकर अब तक घाटी में आतंकवादी नेटवर्क में स्थानीय लोगों की भर्ती काफी कम हुई है। यह संख्या 2021 में जहां 146 थी, वही अब घटकर 2025 में सिर्फ एक रह गई। मंत्रालय ने यह भी बताया कि 2025 में घुसपैठ की सिर्फ छह कोशिशें हुईं, जो पिछले पांच सालों में सबसे कम हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में 146 स्थानीय युवा आतंकवादी संगठनों में शामिल हुए। इसके बाद 2022 में 121, 2023 में 19, 2024 में चार और 2025 में सिर्फ एक युवा शामिल हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय युवाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है और वे सरकार की विभिन्न योजनाओं और नीतियों का लाभ उठा रहे हैं। अनुच्छेद 370 हटने से पस्त हुआ पाकिस्तान आपको बता दें कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा हालात में काफी सुधार हुआ है। इस इलाके में आतंकवाद से जुड़ी हिंसा और आतंकवादियों की भर्ती में भारी कमी आई है। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर हालात काफी शांत हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में घुसपैठ की छह कोशिशों को नाकाम किया गया, जिनमें 12 आतंकवादी मारे गए। रिपोर्ट में कहा गया है, "2021 में घुसपैठ की 8 कोशिशें नाकाम की गईं और 12 आतंकवादी मारे गए। वहीं, 2022 में घुसपैठ की 12 कोशिशें नाकाम और 18 आतंकवादी मारे गए, 2023 में घुसपैठ की 18 कोशिशें नाकाम और 36 आतंकवादी मारे गए, 2024 में घुसपैठ की 10 कोशिशें नाकाम और 19 आतंकवादी मारे गए।" अब जम्मू से घुसपैठ की फिराक में आतंकी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भले ही नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशें कम हुई हैं, लेकिन आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिशें अब जम्मू इलाके में अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर ज्यादा हो रही हैं। नशीले पदार्थों की तस्करी की कोशिशें भी की जा रही हैं। मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि घुसपैठ की कोशिशों में कमी के बावजूद 2025 में सीजफायर उल्लंघन में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में LoC पर सीजफायर उल्लंघन की दो घटनाएं हुईं। वहीं, 2025 में कम से कम 163 बार सीजफायर का उल्लंघन हुआ। उनमें से 124 घटनाएं ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2025 में केंद्र शासित प्रदेश में पत्थरबाजी की कोई घटना नहीं हुई।

H-1B Visa Fee को लेकर भारतीयों की बढ़ी चिंता, ट्रंप प्रशासन ने शुल्क व्यवस्था में किया बदलाव

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ऐसे फैसले ले रहे हैं जिससे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। वहीं भारत पर भी उनके फैसलों का सीधा असर पड़ रहा है। 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले कानून को मंजूरी देने के अलावा ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा पर लगने वाले शुल्क को एक साल के लिए बढ़ाने का फैसला किया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा के लिए 1 लाख डॉलर का शुल्क लगाया है। अमेरिका की कोर्ट में उनके इस फैसले के खिलाफ केस भी चल रहा है। ट्रंप प्रशासन का पहले का आदेश सितंबर 2026 तक ही लागू था। बता दें कि एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां दुनियाभर के कुशल लोगों को हायकर करती हैं। आईटी सेक्टर में भी बड़ी संख्या में लोगों को अमेरिका में नौकरियां मिलती हैं। इनमें भारतीयों की संख्या काफी ज्यादा है। वाइट हाउस का कहना है कि ये कंपनियां विदेश से लोगों को सस्ते में हायर करती हैं और अमेरिकियों के लिए रोजगार का संकट पैदा हो जाता है। ऐसे में दोनों तरफ से कंपनियां ही शोषण कर रही हैं। जानकारी के मुताबिक 21 सितंबर 2025 को यह फैसला लागू होने के बाद से 700 से ज्यादा लोगों ने फीस चुकाई है। वहीं अब डिपार्टमेंट ऑफ होम सिक्योरिटी ने एच-1बी के लिए चयन प्रक्रिया में भी परिवर्तन करने का ऐालान कर दिया है। बताया गया है कि अमेरिकी कंपनियों ने एच-1बी रजिस्ट्रेशन को 24946 से घटाकर 2055 कर दिया है। इसमें 92 फीसदी की कमी देखी गई है। भारतीयों के लिए क्यों टेंशन की बात भारत के बड़ी संख्या में प्रेफेशनल एच-1बी वीजा के जरिए अमेरिका में काम करने जाते हैं। यूएससीआईएस के डेटा के मुताबिक 2024 ममें अमेरिका में 71 फीसदी एच-1बी वीजा वाले लोग भारतीय थे। वहीं चीन के 12 फीसदी लोग ही थे। भारतीय लोगों के लिए अमेरिका में काम करने का मौका एच-1बी वीजा के जरिए ही मिलता है। हालांकि अब 1 लाख डॉलर चुकाना आसान नहीं है। 2025 में एक लाख अमेरिकी डॉलर का शुल्क लगाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है और यह मामला दो अलग-अलग संघीय अदालतों में विचाराधीन है। शुल्क बढ़ाने संबंधी 2025 के इस आदेश की अवधि इस महीने समाप्त होने वाली थी। यह आदेश उन विदेशी नागरिकों को दिए गए वीजा पर लागू नहीं है जो पहले से छात्र वीजा पर अमेरिका में रह रहे हैं और नए एच-1बी वीजा पाने वालों में जिनकी बड़ी हिस्सेदारी है। यह मौजूदा वीजा के नवीनीकरण पर भी लागू नहीं था। राष्ट्रपति ने एक अलग घोषणा भी जारी की है, जिसमें विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के जरिये एच-1बी वीजा आवेदनों की जांच और कड़ी करने का प्रावधान है। आदेश में विदेश मंत्री, श्रम मंत्री और गृह सुरक्षा मंत्री को निर्देश दिया गया है कि एच-1बी वीजा आवेदनों पर विचार करते समय वे यह भी देखें कि क्या आवेदनकर्ता नियोक्ता ने समान पदों पर कार्यरत अमेरिकी कर्मचारियों की हाल में छंटनी की है या वह ऐसा करने की योजना बना रहा है। ट्रंप ने कार्यकारी आदेश में कहा कि एच-1बी गैर प्रवासी वीजा कार्यक्रम की शुरुआत अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले विदेशी अस्थायी कर्मचारियों की पहचान करने और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की जरूरतों को रणनीतिक रूप से पूरा करने के लिए की गई थी। ट्रंप ने कहा, ''इसके बजाय कुछ नियोक्ताओं, तीसरे पक्ष के जरिये कर्मचारियों की नियुक्ति करने वाले समूहों और आउटसोर्सिंग कंपनियों ने अमेरिकी कुशल श्रमिकों को कम वेतन देने और उन्हें नौकरियों से निकालने के लिए इस कार्यक्रम का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया है।''

स्कूल मिड-डे मील में चिकन बिरयानी शामिल करने की तैयारी, बच्चों को मिलेगा नया मेन्यू

चेन्नई  तमिलनाडु सरकार ने सरकारी स्कूलों के बच्चों को हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी देने की योजना बनाई है। स्कूल शिक्षा मंत्री राज मोहन ने कहा कि यह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की इच्छा है। हालांकि, इसे तुरंत लागू नहीं किया जाएगा। सरकार पहले इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट चलाएगी। इसमें यह देखा जाएगा कि बड़ी संख्या में बच्चों के लिए खाना साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा के तय मानकों के मुताबिक कैसे तैयार किया जाएगा। इसके बाद ही योजना को बड़े स्तर पर लागू करने पर फैसला होगा। मंत्री राज मोहन ने कहा कि सरकार चाहती है कि सरकारी स्कूलों के सभी स्टूडेंट्स को चिकन बिरयानी का विकल्प मिले। उन्होंने साफ किया कि इसके लिए पहले जरूरी इंतजाम करने होंगे। उन्होंने कहा, 'पुझल जेल में कैदियों को भी चिकन बिरयानी मिलती है। क्या हमारे छात्रों को यह नहीं मिल सकती?' मंत्री ने कहा कि योजना को लागू करने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के जरिए व्यवस्था की जांच की जाएगी। इसके बाद भोजन की तैयारी, साफ-सफाई और उसे स्कूलों तक पहुंचाने से जुड़ी व्यवस्थाओं को देखा जाएगा। भोजन में मांसाहारी विकल्प शामिल करने पर विचार यह प्रस्ताव पहली बार जुलाई में सामने आया था। उस समय तमिलनाडु सरकार सरकारी स्कूलों के बच्चों को लंच की योजना के तहत हफ्ते में एक बार चिकन बिरयानी देने पर विचार कर रही थी। राज मोहन ने तब बताया था कि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री थलपति विजय के सामने यह सुझाव रखा था और अंतिम फैसला उन्हीं को करना है। यह प्रस्ताव स्कूलों में दिए जाने वाले भोजन में मांसाहारी विकल्प शामिल करने को लेकर चल रही चर्चा के बीच आया था। मंत्री ने कहा था कि बढ़ते बच्चों के लिए पर्याप्त प्रोटीन जरूरी है और चिकन बिरयानी देने के प्रस्ताव को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर होगी शुरुआत राज मोहन ने कहा कि तमिलनाडु में शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के साथ पोषण पर भी लगातार ध्यान दिया गया है। प्रस्ताव लागू होने की स्थिति में शाकाहारी भोजन पसंद करने वाले बच्चों को पहले की तरह शाकाहारी खाना मिलता रहेगा, जबकि मांसाहारी भोजन खाने वाले छात्र चिकन बिरयानी का विकल्प चुन सकेंगे। फिलहाल सरकार का जोर योजना को सुरक्षित तरीके से लागू करने की तैयारी पर है। मालूम हो कि तमिलनाडु में लंच के साथ सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए नाश्ते की योजना भी चल रही है।

Central Employees: सरकार ने इस योजना में किए बदलाव, केंद्रीय कर्मचारियों पर होगा असर

नई दिल्ली अगर केंद्रीय कर्मचारी हैं तो ये खबर आपके काम की हो सकती है। दरअसल, केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। आइए डिटेल में जानतें है कि क्या कुछ बदल गया है। क्या बदला है नियम? सरकार ने उस भौगोलिक शर्त को हटाने का फैसला किया है जो पहले केंद्र सरकार के मौजूदा कर्मचारियों के लिए उनके रहने या पोस्टिंग की जगह के आधार पर CGHS की पात्रता को सीमित करती थी। जानकार बताते हैं कि पहले की भौगोलिक पाबंदियों ने CGHS कवरेज के दायरे से बाहर रहने या पोस्टेड कर्मचारियों के लिए मुश्किलें और परेशानियां पैदा कर दी थीं। बदले हुए नियम ऐसे हालात में योग्य कर्मचारियों को CGHS चुनने की इजाजत देते हैं, बशर्ते वे दूसरी शर्तों को पूरा करें और तय योगदान का भुगतान करें। एक बार यह विकल्प चुनने के बाद इसे बदला नहीं जा सकता। CGHS चुनने वाले योग्य कर्मचारियों को यह अंडरटेकिंग भी देनी होगी कि वे या उनके योग्य परिवार के सदस्य CGHS और सेंट्रल सर्विसेज (मेडिकल अटेंडेंस) रूल्स, 1944, दोनों के तहत मेडिकल फायदों का दावा नहीं करेंगे। जो कर्मचारी पहले से CGHS के कवरेज वाले इलाके में रह रहे हैं या वहां तैनात हैं, उनके लिए CGHS कवरेज अनिवार्य रहेगा। ऐसे कर्मचारी इसके बदले CS(MA) नियमों के तहत मिलने वाली सुविधाओं का विकल्प नहीं चुन सकेंगे। गलत जानकारी पर होगी कार्रवाई सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई कर्मचारी गलत या भ्रामक जानकारी देकर मेडिकल लाभ लेता है, तो उसके खिलाफ गंभीर कार्रवाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ गलत तरीके से लिए गए लाभ की वसूली भी की जा सकती है। CGHS क्या है? CGHS की बात करें तो केंद्र सरकार के मौजूदा और रिटायर्ड कर्मचारियों और उनके योग्य परिवार के सदस्यों के लिए एक सरकारी हेल्थकेयर प्रोग्राम है। इसे 1 जुलाई 1954 को दिल्ली में शुरू किया गया था, जिसका मुख्य मकसद मेडिकल देखभाल देना और आउटपेशेंट दवाओं के लिए रीइंबर्समेंट का दावा करने में कर्मचारियों को होने वाली दिक्कतों को दूर करना था। पिछले कुछ दशकों में, CGHS का विस्तार दिल्ली से आगे कई शहरों तक हुआ है और अब यह वेलनेस सेंटर, पॉलीक्लिनिक, लेबोरेटरी और एम्पैनल्ड अस्पतालों के जरिए सेवाएं देता है। इसके अलावा, इसके दायरे में योग्य पेंशनभोगी और लाभार्थियों की कुछ अन्य श्रेणियां भी शामिल हो गई हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की 2024-25 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, CGHS 81 शहरों तक फैल गया था और लगभग 46.87 लाख लाभार्थियों को सेवाएं दे रहा था।