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“ईरान युद्ध के बाद…” ट्रंप ने बताया अपना अगला बड़ा टारगेट

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। वाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनके प्रशासन का वर्तमान लक्ष्य ईरान के साथ चल रहे युद्ध को समाप्त करना है, जिसके तुरंत बाद अमेरिका का पूरा ध्यान क्यूबा की ओर मुड़ जाएगा। यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के अगले रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। मेजर लीग सॉकर चैंपियन 'इंटर मियामी सीएफ' के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्य पूर्व के संघर्ष पर चर्चा की। उन्होंने कहा, "हम पहले ईरान युद्ध को खत्म करना चाहते हैं।" उन्होंने आगे संकेत दिया कि क्यूबा के साथ संबंधों में सुधार या वहां के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव केवल समय की बात है। ट्रंप ने दावा किया कि क्यूबा की राजधानी हवाना वाशिंगटन के साथ समझौता करने के लिए बेहद उत्सुक है। उन्होंने कहा, "क्यूबा बहुत बुरी तरह से एक डील चाहता है। जल्द ही बहुत से अद्भुत लोग वापस क्यूबा जा सकेंगे।" ईरान युद्ध में बड़ी जीत का दावा राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर एक उत्साहजनक रिपोर्ट पेश की। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना और उनके इजरायली सहयोगी दुश्मन को समय से काफी पहले ही पूरी तरह से ध्वस्त कर रहे हैं। सैन्य प्रगति का विवरण देते हुए ट्रंप ने कहा ईरान के पास अब न तो कोई वायु सेना बची है और न ही प्रभावी हवाई रक्षा प्रणाली। राष्ट्रपति ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने मात्र तीन दिनों के भीतर ईरान के 24 जहाजों को नष्ट कर दिया है, जिससे उनकी नौसेना की शक्ति खत्म हो गई है। हालांकि, इन सैन्य दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन ट्रंप का लहजा पूरी तरह से आक्रामक और जीत के प्रति आश्वस्त नजर आया। वार्ता की मेज पर ईरान? ट्रंप ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि ईरानी नेतृत्व अब युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत का रास्ता तलाश रहा है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “वे फोन कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि डील कैसे की जाए? मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा देर कर चुके हैं, अब हम उनसे ज्यादा लड़ने के इच्छुक हैं।” इसके साथ ही उन्होंने ईरानी राजनयिकों को एक अवसर भी दिया। ट्रंप ने कहा कि जो लोग सहयोग करेंगे वे एक नए और बेहतर ईरान के निर्माण में मदद कर सकते हैं, जिसमें विकास की अपार संभावनाएं होंगी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि संघर्ष जारी रखने के परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। तेल बाजार की रणनीति युद्ध के आर्थिक प्रभावों, विशेषकर तेल की कीमतों पर बोलते हुए ट्रंप ने स्वीकार किया कि इस संघर्ष की वजह से उन्हें अपनी घरेलू प्राथमिकताओं से थोड़ा भटकाव लेना पड़ा। उन्होंने कहा, "तेल की कीमतें अब काफी हद तक स्थिर हो गई हैं। हमने कीमतों को बहुत कम रखा था, लेकिन इस युद्ध के कारण हमें यह छोटा सा मोड़ लेना पड़ा।" राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि ऊर्जा बाजारों पर दबाव कम करने के लिए जल्द ही कुछ नए उपायों की घोषणा की जा सकती है।

CM ममता का दावा: SIR में जिंदा मतदाताओं को ‘मृत’ दिखाया गया, उठाए गंभीर सवाल

कोलकाता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुक्रवार को इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ईसीआई) पर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) एक्सरसाइज में कई जिंदा वोटर्स को मरा हुआ दिखाने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री ने अनिश्चितकालीन एसआईआर विरोधी धरने पर कहा, "इनमें से कुछ वोटर आज हमारे साथ यहां हैं। कमीशन को शर्म आनी चाहिए कि उसने एसआईआर में उन वोटरों को मरा हुआ मार्क कर दिया जो जिंदा हैं। लेकिन, आज वे यह साबित करने के लिए यहां हैं कि वे अभी भी जिंदा हैं। चुनाव आयोग भाजपा के एजेंट के तौर पर काम कर रही है, जो खुद एक बेशर्म पॉलिटिकल ताकत है।" मुख्यमंत्री ने आगे कहा, "याद रखें हम काम कर रहे हैं। हमने उन सभी 22 वोटरों को ट्रैक किया है जिन्हें मरा हुआ बताया गया है। मैं मीडिया से भी रिक्वेस्ट करूंगी कि वे ऐसे वोटरों के बारे में पूरी कवरेज दें, जो अभी जिंदा हैं लेकिन कमीशन के रिकॉर्ड के मुताबिक मर चुके हैं।" उन्होंने कहा कि इस साल के आखिर में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव एक मजाक होंगे, जब तक कि असली वोटर उस चुनाव में अपना वोट नहीं डाल पाते। तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं के अलावा, तृणमूल कांग्रेस से जुड़े बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) के एसोसिएशन के सदस्य भी धरना-प्रदर्शन की जगह पर मौजूद थे। इत्तेफाक से मुख्यमंत्री के धरना-प्रदर्शन की जगह पश्चिम बंगाल के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) के ऑफिस से मुश्किल से 1.5 किलोमीटर दूर है। मुख्यमंत्री का अनिश्चितकालीन प्रदर्शन ठीक उससे पहले शुरू हुआ है जब चीफ इलेक्शन कमिश्नर (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की लीडरशिप में ईसीआई की पूरी बेंच 8 मार्च को कोलकाता आ रही है, जिसका अगले दो दिनों का शेड्यूल काफी बिजी है। तृणमूल कांग्रेस लीडरशिप ने इस बात का कोई इशारा नहीं दिया कि प्रदर्शन कब तक चलेगा, लेकिन स्टेज के आकार और वहां मौजूद सुविधाओं से ऐसा लगता है कि प्रदर्शन काफी लंबा चलने वाला है।

100 घंटे की जंग में अरबों स्वाहा: ईरान से भिड़ंत में US को 31 हजार करोड़ का झटका

वाशिंगटन ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले का आज (शुक्रवार, 6 मार्च को) सातवां दिन है। शुक्रवार को अमेरिका ने स्टेल्थ बॉम्बर और एडवांस्ड वेपन सिस्टम से ईरान पर हमला बोला है। बदले में ईरान भी इजरायल पर और मिडिल-ईस्ट में अमेरिकी सैन्य अड्डों को लगातार निशाना बना रहा है। इस बीच, अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) ने युद्ध के लागत पर एक विश्लेषण में कहा है कि ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) के तहत पहले 100 घंटों में ही अमेरिका को लगभग 3.7 अरब डॉलर (करीब 31,000 करोड़ रुपये) का खर्च उठाना पड़ा है। यह आकलन वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक CSIS के विशेषज्ञों मार्क कैंसियन और क्रिस पार्क द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार युद्ध के शुरुआती 100 घंटों में अमेरिका का औसत खर्च लगभग 891 मिलियन डॉलर प्रतिदिन यानी करीब 90 करोड़ डॉलर रोज रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती चरण में सबसे अधिक खर्च महंगे हथियारों, मिसाइलों और बमों के इस्तेमाल पर हुआ है, इसलिए शुरुआती दिनों में लागत सबसे ज्यादा है। हथियारों पर खर्च थिंक टैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.7 अरब डॉलर पेट्रियट जैसे एयर डिफेंस इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च किए गए हैं, जबकि 1.5 अरब डॉलर मिसाइलों और अन्य आक्रामक हथियारों पर किए गए हैं। इसके अलावा 125 मिलियन डॉलर लड़ाकू विमानों और हवाई अभियानों के परिचालन पर खर्च किए गए हैं। CSIS के मुताबिक कुल खर्च में से केवल लगभग 200 मिलियन डॉलर ही पहले से अमेरिकी रक्षा बजट में शामिल था, जबकि करीब 3.5 अरब डॉलर का खर्च अतिरिक्त है, जिसके लिए अलग से फंड की जरूरत पड़ सकती है। इसका मतलब है कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय यानी United States Department of Defense (पेंटागन) को जल्द ही युद्ध जारी रखने के लिए अतिरिक्त बजट की मांग करनी पड़ सकती है। 2000 से ज्यादा हथियारों का इस्तेमाल रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि युद्ध के पहले 100 घंटों में अमेरिका ने 2,000 से अधिक प्रकार के हथियार और मिसाइलें इस्तेमाल कीं हैं। इन हथियारों के स्टॉक को दोबारा भरने में ही लगभग 3.1 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध लंबा चला तो यह खर्च और तेजी से बढ़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार यदि युद्ध जारी रहता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की सरकार को कांग्रेस से अतिरिक्त बजट की मंजूरी लेनी पड़ सकती है लेकिन अमेरिका में महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत और युद्ध के कारण बढ़ती तेल कीमतों के चलते यह मुद्दा राजनीतिक विवाद का कारण भी बन सकता है। मानवीय नुकसान भी भारी थिंक टैंक ने अपने आकलन में कहा है कि युद्ध का मानवीय नुकसान भी तेजी से बढ़ रहा है। ईरान में अमेरिकी और इजरायली हमलों में अब तक 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें कई बच्चे भी शामिल बताए जा रहे हैं। साथ ही क्षेत्र के अन्य देशों में भी हमलों और जवाबी कार्रवाई के कारण कई लोगों की जान गई है। खर्च के अलावा, कुवैत में 'फ्रेंडली फायर' की घटना में तीन F-15 लड़ाकू विमानों के नष्ट होने जैसी खबरें भी सामने आई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने संकेत दिया है कि यह सैन्य अभियान अभी कई हफ्तों तक जारी रह सकता है। ऐसे में इसका आर्थिक और राजनीतिक असर अमेरिका सहित पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।  

CISF स्थापना दिवस समारोह में पहुंचे अमित शाह, ओडिशा में जवानों का बढ़ाया हौसला

कटक गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार को कटक में आयोजित सीआईएसएफ के 57वें स्थापना दिवस समारोह में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज 56 वर्ष पूरे करने के बाद सीआईएसएफ ने यह मुकाम हासिल किया है। 57 मात्र एक संख्या नहीं है बल्कि यह समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा की एक यात्रा का प्रतीक है, जो औद्योगिक सुरक्षा के क्षेत्र में शून्य से शिखर तक के दृढ़ प्रयास को दर्शाती है। देश के अर्थतंत्र की मजबूती की कल्पना और इस देश को दुनिया का सबसे बड़ा अर्थतंत्र बनाने की संपल्पना औद्योगिक विकास के बिना नहीं हो सकती। औद्योगिक विकास को सुरक्षित वातावरण देने के लिए जरूरी है, राष्ट्रीय स्तर पर एक इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स की और मुझे खुशी है कि इन 56 सालों में सीआईएसएफ ने अपनी स्थापना के उद्देश्यों को सिद्ध किया है। साथ ही, हर प्रकार की चुनौतियों से सीखते हुए समय के साथ अपने को बदलने का प्रयास भी किया है। उन्होंने आधुनिकता को भी अपनाया है और परंपराओं को भी जीवित रखा है। उन्होंने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि सुरक्षा बलों का अपना सम्मेलन आयोजित किया जाता है। देश की सीमाओं की रक्षा करने वालों को ऐसा अवसर मिलना चाहिए और देश के भीतर नागरिक क्षेत्रों में विभिन्न सुरक्षा भूमिकाओं में कार्यरत लोगों को भी ऐसा मंच मिलना चाहिए। मैं सीआईएसएफ की इस पहल को बधाई देना चाहता हूं। भारत के औद्योगिक विकास की संपल्पना सीआईएसएफ के बिना नहीं हो सकती। चाहे हवाई अड्डे हों, चाहे बंदरगाह हों या फिर बड़ी औद्योगिक इकाइयां हों, सीआईएसएफ हमेशा राष्ट्र की ढाल बनकर मजबूती से खड़ा है। गृह मंत्री ने कहा कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने एक निर्णय किया है कि सभी बंदरगाहों की सुरक्षा भी सीआईएसएफ को सौंपकर हम इस मामले में भी निश्चिंत होना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के सामने दो महत्वपूर्ण संकल्प रखे हैं। 2047 तक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनना, दुनिया में नंबर एक पर पहुंचना और 2027 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना। इस लक्ष्य को पाने के लिए सीआईएसएफ अहम भूमिका निभा रही है।

कृषि को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने पर जोर, बोले पीएम मोदी– निर्यात आधारित बनानी होगी भारतीय खेती

नई दिल्ली   प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को किसानों से भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों का लाभ उठाने और उच्च मूल्य वाली फसलों की पैदावार बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने को कहा। उन्होंने कहा कि ऐसा करने पर देश के कृषि उत्पाद वैश्विक बाजारों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। 'कृषि और ग्रामीण परिवर्तन' पर बजट के बाद आयोजित एक वेब गोष्ठी को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और मानकों के सभी पहलुओं पर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि विशेषज्ञों, उद्योग और किसानों को एक साथ आना होगा। प्रधानमंत्री ने बजट के बाद अपनी तीसरी वेब गोष्ठी में कहा, ''आज दुनिया के बाजार खुल रहे हैं और वैश्विक मांग बदल रही है हमारी कृषि को निर्यात-उन्मुख बनाने पर अधिक चर्चा करना आवश्यक है। हमारे पास विविध जलवायु है और हमें इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। हम कृषि-जलवायु क्षेत्रों के मामले में समृद्ध हैं।'' मोदी ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में काजू, कोको और चंदन सहित उच्च मूल्य वाली कृषि पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि खाद्य तेल और दलहन पर राष्ट्रीय मिशन और प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन सभी कृषि क्षेत्र को मजबूत कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, ''यदि हम उच्च मूल्य वाले कृषि क्षेत्र को बड़े पैमाने पर बढ़ाते हैं, तभी हम अपने कृषि क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में बदल सकते हैं।'' प्रधानमंत्री ने कहा कि आज दुनिया स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रही है और समग्र स्वास्थ्य सेवा तथा जैविक भोजन पर उनका विशेष ध्यान है। उन्होंने कहा, ''हमें रसायन मुक्त और प्राकृतिक खेती पर अधिक जोर देना चाहिए। प्राकृतिक खेती दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचने का रास्ता बनाती है।'' मोदी ने कहा कि कृषि भारत की दीर्घकालिक विकास यात्रा का एक रणनीतिक स्तंभ है, और सरकार ने कृषि क्षेत्र को लगातार मजबूत किया है। उन्होंने आगे कहा, ''लगभग 10 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से चार लाख करोड़ रुपये से अधिक मिले हैं।''  

मिडल ईस्ट तनाव पर राजनाथ सिंह का बड़ा बयान: ईरान युद्ध के हालात से पूरी दुनिया प्रभावित होगी

नई दिल्ली    रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे अत्यधिक असामान्य करार दिया है। कोलकाता में आयोजित 'सागर संकल्प' (Sagar Sankalp) मैरीटाइम कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि इस तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा और व्यापार सप्लाई चेन पूरी तरह से बाधित हो रही है। ऊर्जा सुरक्षा के लिए 'होर्मुज' का महत्व रक्षा मंत्री ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण Strait of Hormuz और फारस की खाड़ी का जिक्र करते हुए कहा, "यह क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। जब यहाँ हलचल होती है, तो इसका सीधा असर तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ता है। वर्तमान में हम न केवल ऊर्जा, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सप्लाई चेन के टूटने के गवाह बन रहे हैं, जिसका सीधा प्रहार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हो रहा है।" असामान्यता ही अब नया सामान्य है बदलते भू-राजनीतिक परिवेश पर बोलते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि विभिन्न देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, "राष्ट्र आज जमीन, हवा, पानी और यहाँ तक कि अंतरिक्ष में भी एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। यह एक चिंताजनक स्थिति है, और सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि यह असामान्यता अब 'न्यू नॉर्मल' (New Normal) बनती जा रही है।"   'आत्मनिर्भरता' ही एकमात्र समाधान अनिश्चितता के इस दौर से निपटने के लिए रक्षा मंत्री ने 'आत्मनिर्भरता' पर जोर दिया। उन्होंने कहा:     सप्लाई चेन की बाधाओं से बचने का एकमात्र तरीका खुद पर निर्भर होना है।     रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (DPSUs) हमारी इस दृष्टि के प्रमुख स्तंभ हैं।     एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र होने के नाते, भारत की जिम्मेदारी है कि वह आत्मविश्वास और स्पष्ट दृष्टि के साथ नेतृत्व प्रदान करे। 2047 के लिए बड़ा लक्ष्य शिपबिल्डिंग (जहाज निर्माण) क्षेत्र में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए रक्षा मंत्री ने उद्योग जगत को स्पष्ट लक्ष्य दिए:     2030 तक: भारत दुनिया के टॉप-10 जहाज निर्माण देशों में शामिल हो।     2047 तक: भारत को टॉप-5 देशों की सूची में पहुंचाना। उन्होंने कहा कि यह सपना बड़ा जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। इसके लिए सरकार, उद्योग और कार्यबल को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।

आकार में छोटा लेकिन हौसले में बड़ा ईरान: अमेरिका के सामने कैसे टिकती है उसकी सैन्य ताकत

वाशिंगटन अमेरिका के मुकाबले ईरान सैन्य ताकत, आबादी और क्षेत्रफल समेत सभी पैमानों पर कमजोर दिखता है। इसके बाद भी बीते एक सप्ताह से वह अमेरिका और इजरायल के खिलाफ संयुक्त जंग में लड़ रहा है। यही नहीं ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल ने रेड लाइन पार कर दी है और उन्हें इसका खामियाजा भुगतना होगा। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि आखिर 9 करोड़ की आबादी वाले ईरान के पास इतनी ताकत कहां से आती है। इस सवाल का जवाब ईरान की सेना है। ईरान की आबादी भले ही 9 करोड़ है, लेकिन उसके सैनिकों की संख्या बड़े-बड़े देशों से कहीं अधिक है। ईरान की सेना की बात करें तो वह मुख्य रूप से दो हिस्सों में विभाजित है। पहली है नियमित सेना, जिसे Artesh कहा जाता है। दूसरी है IRGC यानी इस्लामिक रिवॉलूशनरी गार्ड कॉर्प्स। इसे स्पेशल फोर्सेज भी कहा जाता है। ईरान की रेग्युलर आर्मी में थल सेना, नेवी और एयर फोर्स आते हैं। इसके अलावा ईरान एयर डिफेंस फोर्स भी है। अब संख्या की बात करें तो ईरान की थल सेना में 3 लाख 50 हजार सैनिक हैं। नेवी में 18 हजार हैं और वायुसेना में 37 हजार सैनिक शामिल हैं। इसी तरह एयर डिफेंस फोर्स में 15000 सैनिक शामिल हैं। अब बात करते हैं ईरान की रिवॉलूशनरी गार्ड कॉर्प्स की। इसमें 1 लाख 50 हजार जमीनी सैनिक हैं। नेवी में 20 हजार जवान हैं और एयरोस्पेस 15,000 हैं। इसी तरह कुद्स फोर्स में 5 हजार सैनिक हैं। इसके बाद नंबर आता है रिजर्व फोर्स का, जिसमें 4 लाख 50 हजार सैनिक शामिल हैं। इस तरह सब मिलाकर ईरान की सैन्य संख्या 10 लाख 60 हजार हो जाती है। यह एक बड़ा आंकड़ा है। 25 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान की सैन्य संख्या भी 6 लाख 50 हजार ही है। सबसे बड़ी फौज चीन की मानी जाती है, जिसमें करीब 20 लाख सैनिक हैं। इसके बाद दूसरे नंबर और तीसरे नंबर पर अमेरिका और भारत हैं। दोनों मुल्कों की संख्या 13 लाख से अधिक है। ईरान की ताकत की यह भी एक वजह है कि वह अमेरिका और इजरायल से मुकाबले में पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। यही नहीं एक्सपर्ट मान रहे हैं कि अब ईरान तो खुद ही चाहता है कि यह जंग थोड़ी लंबी खिंचे। ऐसा होने पर अमेरिका को ही निकलने का बहाना खोजना पड़ेगा। ईरान की लीडरशिप नहीं चाहती कि वह किसी भी हाल में अमेरिका या इजरायल से समझौता करती दिखे। बता दें कि लंबे युद्धों में अकसर अमेरिका को ही परेशानी का सामना करना पड़ा है। अमेरिका को वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान से बीच में ही निकलना पड़ा था।  

दिल्ली एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी, 104 इंटरनेशनल फ्लाइट कैंसिल; हजारों यात्री परेशान

नई दिल्ली पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य तनाव और कई देशों द्वारा अपने हवाई क्षेत्र को बंद करने का सीधा असर देश की राजधानी के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय (आईजीआई) हवाई अड्डे पर पड़ा है। शुक्रवार को सुरक्षा कारणों और रूट डायवर्जन के चलते दिल्ली से संचालित होने वाली 104 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद कर दी गईं, जिससे हजारों यात्रियों का सफर अधर में लटक गया। वैकल्पिक उड़ानों की मांग रहे जानकारी प्राप्त जानकारी के अनुसार, रद की गई कुल उड़ानों में 62 प्रस्थान और 42 आगमन की उड़ाने शामिल हैं। विशेष रूप से खाड़ी देशों की ओर जाने वाली उड़ानों पर इसका व्यापक असर देखा जा रहा है। टर्मिनल-3 पर सुबह से ही यात्रियों की भारी भीड़ जमा हो गई और एयरलाइंस के काउंटरों पर लोग वैकल्पिक उड़ानों की जानकारी के लिए जद्दोजहद करते नजर आए। प्रमुख एयरलाइंस की 168 उड़ानें प्रभावित हुईं पश्चिम एशिया के एयरस्पेस में लगी पाबंदियों के कारण भारत की प्रमुख एयरलाइंस को अपनी सेवाएं सीमित करनी पड़ी हैं। इसके कारण देश की प्रमुख एयरलाइंस की 168 उड़ानें प्रभावित हुईं, इन उड़ानों ने अपने निर्धारित समय से या तो देर से उड़ान भरी या उन्हें डायवर्ट कर दिया गया या रूट बदलकर दूसरे रूट से सफर करनी पड़ी जिससे गंतव्य तक पहुंचने में अधिक समय लगा। इसका खामियाजा यात्रियों को भोगना पड़ा। इसमें इंडिगो एयरलाइन की लगभग 72 उड़ानें, एयर इंडिया समूह की करीब 31 और एयर इंडिया एक्सप्रेस की लगभग 55 उड़ानें देरी का शिकार हुई हैं। ये उड़ानें मुख्य रूप से दुबई, अबू धाबी, दोहा, कुवैत और बहरीन जैसे शहरों के लिए निर्धारित थीं। यूरोप जाने वाले यात्रियों की बढ़ी दूरी हवाई क्षेत्र बंद होने के कारण यूरोप और अमेरिका जाने वाली उड़ानों को अब लंबे और वैकल्पिक रास्तों से भेजा जा रहा है। इस मार्ग परिवर्तन की वजह से यात्रा के समय में 3 से 5 घंटे की वृद्धि हो गई है। ईंधन की अधिक खपत और क्रू मेंबर्स के वर्किंग आवर्स के चलते कई लंबी दूरी की उड़ानों के समय में भी बदलाव किया गया है। अचानक उड़ानें रद होने से उपजी स्थिति को देखते हुए एयरलाइंस ने यात्रियों को फ्री री-शेड्यूलिंग (बिना अतिरिक्त शुल्क के टिकट बदलने) या फुल रिफंड का विकल्प दिया है। हालांकि, यात्रियों के लिए परेशानी का कारण है कि पीक सीजन होने के कारण दूसरी उड़ानों में सीटें मिलना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का शेड्यूल अस्थिर उधर, दिल्ली एयरपोर्ट प्रबंधन (डायल) ने एक आधिकारिक एडवायजरी जारी कर यात्रियों से अपील की है कि वे घर से निकलने से पहले अपनी संबंधित एयरलाइन की वेबसाइट या मोबाइल ऐप पर लाइव फ्लाइट स्टेटस जरूर चेक करें। अधिकारियों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का शेड्यूल अस्थिर रह सकता 

ताजमहल देखा मगर घर नहीं लौटे: ईरानी नाविकों की भारत में दर्दनाक आखिरी यात्रा

विशाखापट्टनम ईरानी युद्धपोत 'देना' के चालक दल के कई सदस्यों को शायद इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि विशाखापत्तनम में बिताई गई उनकी खूबसूरत यादें उनकी जिंदगी की आखिरी यादें बन जाएंगी। चाहे रुशिकोंडा बीच पर लंबी सैर हो या फिर मनोहारी कैलासगिरी पर्वत की यात्रा, ईरानी चालक दल ने भारत में अपने समय का भरपूर लुत्फ उठाया था। लेकिन बहुराष्ट्रीय नौसैन्य अभ्यास 'मिलन 2026' में हिस्सा लेने भारत आए इन ईरानी नौसैनिकों का सफर एक बेहद खौफनाक त्रासदी में तब्दील हो गया, जब वापसी के दौरान एक अमेरिकी पनडुब्बी ने उनके युद्धपोत को हमेशा के लिए समंदर की गहराइयों में दफन कर दिया। ये नाविक अभ्यास 'मिलान 2026' के दौरान विशाखापत्तनम में 15 से 25 फरवरी के बीच रहे। इस दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों से बातचीत की और तटीय शहर के कई प्रसिद्ध स्थलों का भ्रमण किया। अपने प्रवास के दौरान नाविकों ने 'अतुल्य भारत' कार्यक्रम के तहत आयोजित सांस्कृतिक दौरों में भी भाग लिया। उनमें से कुछ नाविक आगरा भी गए, जहां उन्होंने विश्व के सात अचंभों में शामिल ताज महल और अन्य ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और भारत की समृद्ध विरासत का अनुभव किया। सोशल मीडिया पर नाविकों के मुस्कुराते हुए, समुद्र तटों पर टहलते हुए और शहर के लोगों से बातचीत करते हुए कई वीडियो और तस्वीरें साझा की गईं। उनसे बातचीत करने वाले एक स्थानीय निवासी सोहन हतंगड़ी ने याद करते हुए कहा, 'वे (ईरानी) दोस्ताना स्वभाव के युवा नाविक थे, जो स्थानीय लोगों के साथ सेल्फी ले रहे थे और विशाखापत्तनम की मेहमाननवाजी का आनंद ले रहे थे।' नाविकों ने यहां स्थित युद्ध स्मारक, पनडुब्बी संग्रहालय और अन्य स्थानों का भी दौरा किया। कुछ ईरानी नाविक शहर के बाहरी इलाके में स्थित संकल्प आर्ट विलेज भी गए और मिलान मंडप में नौसैनिक कर्मियों और आगंतुकों के साथ चाय-नाश्ते का आनंद लेते हुए बातचीत करते देखे गए। कई नाविकों को पारंपरिक भारतीय वस्त्रों की खरीदारी करते भी देखा गया। युद्धपोत 'आईआरआईएस देना' पर चालक दल के लगभग 180 सदस्य सवार थे। एक रक्षा अधिकारी के अनुसार, ईरानी नौसैनिक प्रतिनिधिमंडल में ईरान की नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल शहरम ईरानी और आईआरआईएस देना के कमांडिंग ऑफिसर अबुजार जर्री भी शामिल थे। अधिकारी ने बताया, ‘मिलान 2026 अभ्यास के दौरान एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने भाग लेने वाली नौसेनाओं के बीच संवाद के तहत रियर एडमिरल शहरम ईरानी से मुलाकात की।’ अधिकारी ने बताया कि मिलान 2026 अभ्यास में बंगाल की खाड़ी में दुनिया भर की कई नौसेनाओं ने पेशेवर सहयोग और समुद्री सुरक्षा अभ्यास के लिए भाग लिया था। हालांकि, ईरानी नाविकों की वापसी की यात्रा त्रासदी में बदल गई। अभ्यास में भाग लेने के बाद लौटते समय बुधवार को अमेरिका की एक पनडुब्बी ने श्रीलंका के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी युद्धपोत पर टॉरपीडो से हमला कर उसे डुबो दिया, जिसमें कई नाविकों की समुद्र में ही मौत हो गई।

ईरान का ट्रंप पर बड़ा तंज: ‘अपने देश में मेयर नहीं चुन पाते, हमारे सुप्रीम लीडर की बात करते हैं’

नई दिल्ली भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित 'रायसीना डायलॉग 2026' के वैश्विक मंच से ईरान ने अमेरिका और विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा और व्यंग्यात्मक प्रहार किया है। ईरान के उप विदेश मंत्री डॉ. सईद खतीबजादेह ने ट्रंप पर तंज कसते हुए कहा कि जो लोग न्यूयॉर्क का मेयर तक चुन नहीं सकते, वे ईरान के अगले सुप्रीम लीडर का फैसला करेंगे? ईरानी मंत्री का ये बयान तब आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के अगले सर्वोच्चा नेता के चयन की प्रक्रिया में उन्हें शामिल किया जाना चाहिए। ट्रंप ने कहा कि ईरान पर हमलों में मारे गए अयातुल्ला अली खामेनेई के स्थान पर उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का सर्वोच्च नेता के तौर पर चयन 'अस्वीकार्य' होगा। इसके जवाब में ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने कहा- राष्ट्रपति ट्रंप ईरान में लीडरशिप (सुप्रीम लीडर) बदलने की मांग कर रहे हैं, जबकि वह खुद न्यूयॉर्क के मेयर तक को अपॉइंट नहीं कर सकते…क्या आप इस कॉलोनियल अप्रोच की कल्पना कर सकते हैं? वह अपने देश में डेमोक्रेसी देखना चाहते हैं, लेकिन ईरान के डेमोक्रेटिक तरीके से चुने गए प्रेसिडेंट को हटाना चाहते हैं।' खतीबजादेह ने अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध पर बेहद आक्रामक और स्पष्ट बयान दिए हैं। उन्होंने अमेरिका और इजरायल के हमलों को 'कोरा झूठ' और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताते हुए फारस की खाड़ी से अमेरिकी मौजूदगी को खत्म करने की खुली चेतावनी दी है। हमलों का आधार 'कोरे झूठ' और 'ग्रेटर इजरायल' का भ्रम ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमलों के पीछे की असली वजहों को उजागर करते हुए उनके दावों को सिरे से खारिज कर दिया। डॉ. खतीबजादेह ने कहा- मेरे देश पर उन कोरे झूठों के आधार पर हमला किया जा रहा है कि ईरान कोई खतरा पैदा कर रहा था। उन्होंने सवाल उठाया कि अमेरिका और इजरायल ने आक्रामकता क्यों शुरू की? उनका दावा है कि इसके पीछे सिर्फ 'सत्ता की राजनीति' और 'ग्रेटर इजरायल' बनाने का भ्रम है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर यही सवाल अमेरिकी प्रशासन से पूछा जाए, तो अलग-अलग दर्शकों और बाजारों के हिसाब से उनके जवाब भी अलग-अलग होंगे। डॉ. खतीबज़ादेह ने स्पष्ट किया कि वर्तमान संघर्ष ईरान को खत्म करने की एक साजिश है और ईरान इसका माकूल जवाब देगा। उन्होंने कहा- अमेरिका ने ईरान के अस्तित्व को खत्म करने का फैसला किया है। 'ग्रेटर इजरायल' के अपने भ्रम के कारण इजरायल कई दशकों से इसका वादा कर रहा है। एक बेहद सख्त चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा- हमारे पास फारस की खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति के अस्तित्व को खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने इस लड़ाई को 'वीरतापूर्ण और राष्ट्रवादी युद्ध' बताते हुए साफ किया कि जहां से भी अमेरिकी हमलों की शुरुआत होगी, ईरान सीधे उन ठिकानों पर पलटवार करेगा। ईरानी मंत्री ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हमने युद्ध की शुरुआत नहीं की है। उप विदेश मंत्री ने कहा- आज अमेरिका और इजरायल द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है, वह पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानून और मानदंडों के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरे विवाद में ईरान की ओर से कोई उकसावा नहीं था। मोसाद के 'फॉल्स-फ्लैग' ऑपरेशंस और क्षेत्रीय विस्तार का डर ईरान ने युद्ध को अन्य क्षेत्रों में फैलने से रोकने की अपनी मंशा जाहिर की, लेकिन इजरायल पर साजिश रचने का आरोप लगाया। डॉ. खतीबजादेह ने दावा किया कि इजरायली खुफिया एजेंसी 'मोसाद' रिफाइनरियों या यहां तक कि साइप्रस में भी 'फॉल्स-फ्लैग' (धोखे से किए गए) ऑपरेशन कर रही है ताकि ईरान को बदनाम किया जा सके। उन्होंने टकर कार्लसन के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि सऊदी अरब और कतर में मोसाद के कई समूह ऐसे ही 'फॉल्स-फ्लैग' ऑपरेशन करते हुए पकड़े गए हैं। उन्होंने अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों की हत्या को अभूतपूर्व और एक बेहद खतरनाक नई परंपरा बताया। डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा और व्यंग्यात्मक हमला उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'औपनिवेशिक मानसिकता' की कड़ी आलोचना की। ट्रंप द्वारा ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की मांग पर पलटवार करते हुए डॉ. खतीबज़ादेह ने कहा- वह (ट्रंप) ईरान में सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जबकि वह न्यूयॉर्क का एक मेयर तक नियुक्त नहीं कर सकते। उन्होंने इसे 'औपनिवेशिक दृष्टिकोण' बताते हुए कहा कि ट्रंप अपने देश में तो लोकतंत्र देखना चाहते हैं, लेकिन ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। कूटनीति ही एकमात्र विकल्प अंत में, ईरान के उप विदेश मंत्री ने गेंद को वापस अमेरिका और इजरायल के पाले में डालते हुए कूटनीति की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर हमलावर आज अपनी आक्रामकता रोक देते हैं, तो ईरान भी रुक जाएगा क्योंकि वे सिर्फ अपना बचाव कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कूटनीति ही हर देश के पास एकमात्र विकल्प है, लेकिन उन्हें इस बात पर गहरा संदेह है कि क्या वर्तमान अमेरिकी प्रशासन वास्तव में कूटनीति और संवाद के सार को समझता है।