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LVM3 रॉकेट से ISRO ने लॉन्च किया दुनिया का सबसे भारी सेटेलाइट, ब्लूबर्ड ब्लॉक-3

श्रीहरिकोटा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) बुधवार सुबह 8.55 बजे अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 से अमेरिकी कंपनी AST स्पेसमोबाइल की ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 संचार सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया. यह इस रॉकेट की छठी ऑपरेशनल उड़ान (LVM3-M6) है. ये मिशन है न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और AST स्पेसमोबाइल के बीच हुए समझौते के तहत किया जा रहा है. इस मिशन से लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में दुनिया का सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट तैनात होगा, जो सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड इंटरनेट प्रदान करेगा. ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट की विशेषताएं ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 AST स्पेसमोबाइल की अगली पीढ़ी की संचार सैटेलाइट्स सीरीज का हिस्सा है. यह सैटेलाइट दुनिया भर में उन इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए डिजाइन की गई है जहां ग्राउंड नेटवर्क नहीं पहुंच पाता. मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं…     वजन: लगभग 6100 से 6500 किलोग्राम (यह LVM3 द्वारा भारतीय मिट्टी से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी पेलोड है).     आकार: इसमें 223 वर्ग मीटर (लगभग 2,400 स्क्वायर फीट) का फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो इसे लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात होने वाला सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट बनाता है.     क्षमता: यह 4G और 5G नेटवर्क सपोर्ट करता है. सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड प्रदान करेगा.     स्पीड: प्रति कवरेज सेल में 120 Mbps तक की पीक डेटा स्पीड, जो वॉइस कॉल, वीडियो कॉल, टेक्स्ट, स्ट्रीमिंग और डेटा सर्विसेज को सपोर्ट करेगी.     उद्देश्य: यह सैटेलाइट AST स्पेसमोबाइल की ग्लोबल कांस्टेलेशन का हिस्सा है, जो दुनिया भर में 24/7 कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगी. इससे दूरदराज के इलाकों, समुद्रों और पहाड़ों में भी मोबाइल नेटवर्क पहुंचेगा.     पिछली सैटेलाइट्स: कंपनी ने सितंबर 2024 में ब्लूबर्ड 1-5 सैटेलाइट्स लॉन्च की थीं, जो अमेरिका और कुछ अन्य देशों में कंटीन्यूअस इंटरनेट कवरेज प्रदान कर रही हैं. ब्लॉक-2 इससे 10 गुना ज्यादा बैंडविड्थ कैपेसिटी वाली है. यह सैटेलाइट लगभग 600 किलोमीटर की ऊंचाई वाली लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात की जाएगी. LVM3 रॉकेट की विशेषताएं LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3), जिसे पहले GSLV Mk-III कहा जाता था, इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसे इसरो ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किया है. मुख्य स्पेसिफिकेशंस…     ऊंचाई: 43.5 मीटर     लिफ्ट-ऑफ वजन: 640 टन     स्टेज: तीन स्टेज वाला रॉकेट     दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर्स (S200)     लिक्विड कोर स्टेज (L110)     क्रायोजेनिक अपर स्टेज (C25)     पेलोड क्षमता: जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में: 4,200 किलोग्राम तक. लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में: 8,000 किलोग्राम तक.     पिछले सफल मिशन: LVM3 ने चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और दो वनवेब मिशनों (कुल 72 सैटेलाइट्स) को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. इसका पिछला मिशन LVM3-M5/CMS-03 था, जो 2 नवंबर 2025 को सफल रहा. यह रॉकेट भारत की अंतरिक्ष क्षमता का प्रतीक है और भविष्य में गगनयान मानव मिशन के लिए भी इस्तेमाल होगा. यह मिशन इसरो के कॉमर्शियल लॉन्चेस में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा. AST स्पेसमोबाइल दुनिया की पहली स्पेस-बेस्ड सेल्युलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बना रही है, जो स्टारलिंक जैसी सेवाओं से कॉम्पीट करेगी. भारत से लॉन्च होने से इसरो की ग्लोबल लॉन्च सर्विसेज में मजबूती आएगी.

यूनुस के लिए बढ़ी टेंशन, अमेरिका ने आवामी लीग बैन हटाने पर की रोक, शेख हसीना की वापसी की अटकलें तेज

ढाका  बांग्लादेश में फरवरी में होने वाले आम चुनाव से पहले शेख हसीना की वापसी का रास्ता बनता दिख रहा है. मोहम्मद यूनुस की तानाशाही के खिलाफ अंतरिम सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तेज हो गया है. अमेरिका के प्रभावशाली सांसदों के एक समूह ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यूनुस को शेख हसीना की पार्टी वामी लीग से बैन हटाना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा गया, तो यह चुनाव न तो स्वतंत्र होगा और न ही निष्पक्ष. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति के वरिष्ठ सदस्य ग्रेगरी डब्ल्यू मीक्स, बिल हुईजेंगा और सिडनी कैमलागर-डोव ने मंगलवार को बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को एक औपचारिक पत्र भेजा. इस पत्र में उन्होंने कहा कि किसी पूरे राजनीतिक संगठन पर प्रतिबंध लगाना लाखों मतदाताओं को उनके वोट के अधिकार से वंचित कर सकता है. अमेरिकी सांसदों ने यह पत्र ऐसे समय में भेजा है जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने जुलाई विद्रोह के बाद अवामी लीग और उसकी छात्र इकाई बांग्लादेश छात्र लीग पर प्रतिबंध लगा रखा है. सांसदों ने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रीय संकट के दौरान अंतरिम सरकार की भूमिका को समझते हैं, लेकिन किसी पार्टी को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना बुनियादी मानवाधिकारों और व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी के सिद्धांत के खिलाफ है.पत्र में यह भी चेतावनी दी गई कि राजनीतिक गतिविधियों पर रोक और इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) को दोबारा उसी पुराने स्वरूप में शुरू करना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है. अमेरिका से यूनुस ने की थी बात अमेरिकी सांसदों ने जोर दिया कि चुनाव ऐसा होना चाहिए जिसमें जनता शांतिपूर्ण तरीके से बैलेट के जरिए अपनी इच्छा व्यक्त कर सके और सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता पर भरोसा बहाल हो. यह पत्र ऐसे समय आया है जब यूनुस ने अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर से फोन पर बातचीत की. इस बातचीत में व्यापार, टैरिफ, चुनाव, लोकतांत्रिक संक्रमण और छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या पर चर्चा हुई. यूनुस ने कहा कि देश 12 फरवरी को चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है और अंतरिम सरकार स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करेगी. शेख हसीना की बैकडोर से एंट्री! राजनीति में कहा जाता है कि नेता पद छोड़ सकता है, देश छोड़ सकता है, लेकिन उसका सियासी वजूद रातों-रात खत्म नहीं होता. बांग्लादेश में इन दिनों कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भले ही देश से दूर हों, लेकिन उनकी पार्टी अवामी लीग का बेस इतना बड़ा है कि उसे बांग्लादेश के नक्शे से मिटाना नामुमकिन साबित हो रहा है. शेख हसीना को सत्‍ता से हटाने में अहम भूमिका न‍िभाने वाले नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के संयोजक नाहिद इस्लाम ने चौंकाने वाला दावा किया है. उनका कहना है क‍ि शेख हसीना की पार्टी के नेता अब दूसरी पार्टियों के जरिए मुख्यधारा की राजनीति में लौटने की तैयारी कर रहे हैं. इसे शेख हसीना की बैकडोर एंट्री के तौर पर देखा जा रहा है. नाहिद इस्लाम के दावों ने अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है. 5 अगस्त के बदलाव के बाद बांग्लादेश में अवामी लीग के लिए हालात चुनौतीपूर्ण हो गए हैं. पार्टी के कई बड़े नेताओं पर मुकदमे दर्ज हैं. लेकिन अवामी लीग बांग्लादेश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टियों में से एक है, जिसका हर गांव और कस्बे में अपना एक मजबूत वोट बैंक और कार्यकर्ता नेटवर्क है. नाहिद इस्लाम का दावा है कि विपक्षी पार्टियां खासकर खाल‍िदा ज‍िया की पार्टी बीएनपी और जमात-ए-इस्‍लामी अवामी लीग के इस विशाल वोट बैंक की ताकत को समझती हैं. द डेली स्टार के एक कार्यक्रम में नाहिद ने कहा, इन वोटों को अपने पाले में करने के लिए पर्दे के पीछे एक खेल चल रहा है. दूसरी पार्टियां अवामी लीग के नेताओं को ऑफर दे रही हैं कि अगर वे उनका समर्थन करें, तो उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे या उन्हें सुरक्षा दी जाएगी. शेख हसीना के शुरू हो गए अच्छे दिन बांग्लादेश में चारों तरफ से बरस रही नफरत की आग के बीच एक ही नाम गूंज रहा है और वो है ‘शेख हसीना’ का…यहां के उग्रवादी पूर्व प्रधानमंत्री की वापसी की डिमांड कर रहे हैं. हालांकि, शेख हसीना ने साफ कर दिया है कि वो किसी धमकी से घबराती नहीं हैं, इस बीच चुपके से उनकी धमाकेदार वापसी की शुरुआत हो चुकी है. देश की एक बड़ी पोस्ट पर शेख हसीना का करीबी बैठ गया है. ये वही पोस्ट है जहां से शेख हसीना के खिलाफ लिए गए कई कानूनी एक्शन कैंसिल हो सकते हैं लेकिन अभी ऐसा कोई ऐलान नहीं हुआ है. कौन हैं शेख हसीना के करीबी? बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को बांग्लादेश में फांसी की सजा तक सुनाई जा चुकी है और उन्हें फंदे पर लटकाने के लिए मौजूदा सरकार बार-बार उनके प्रत्यर्पण की डिमांड कर रही है. बांग्लादेश में तबाही मचा रहे आंदोलनकारी भी शेख हसीना का ही नाम जप रहे हैं. इन सबके बीच हाल ही में यूनुस की आखों के सामने हसीना के करीबी जुबैर रहमान चौधरी, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की कुर्सी पर जाकर बैठ गए हैं. बांग्लादेश राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने उनके नियुक्ति पत्र पर मुहर लगी है और बात पक्की हो चुकी है. कैसे दिखाई शेख हसीना के प्रति वफादारी? बताया जा रहा है कि अब जुबैर रहमान 27 दिसंबर को कुर्सी पर बैठेंगे और इसके बाद अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे. माना जा रहा है कि इस तारीख के बाद से शेख हसीना की देश में धमाकेदार वापसी की शुरुआत हो सकती है. अभी भले ही ऐसा कोई इशारा नहीं मिला है लेकिन रहमान, शेख हसीना के करीबी माने जाते हैं. बताया जाता है कि तख्तापलट के बाद से अपीलीय न्यायालय प्रभाग के न्यायाधीश पद पर रहते हुए रहमान के पास शेख हसीना के खिलाफ कई केसेस आए लेकिन उन्होंने ज्यादातर पर फैसला नहीं दिया. शेख हसीना के राज में क्या हुआ था? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शेख हसीना के राज में ही जुबैर का कद बढ़ा है. साल 2003 में जुबैर को जज के तौर पर पहली नियुक्ति मिली थी … Read more

पावरफुल पासपोर्ट की लिस्ट जारी, इस देश ने फिर मारी बाज़ी, भारत की रैंक क्या?

नई दिल्ली दुनिया भर की सीमाओं को पार करने की आजादी अब एशियाई देशों के हाथों में सिमटती दिख रही है। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2025 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल मोबिलिटी (वैश्विक गतिशीलता) में एशिया का दबदबा कायम है। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस देश का पासपोर्ट कितना दमदार है और भारतीय यात्रियों के लिए क्या बदला है। नंबर 1 पर सिंगापुर: दुनिया का 'गोल्ड स्टैंडर्ड' पासपोर्ट सिंगापुर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसका पासपोर्ट दुनिया में सबसे शक्तिशाली है। सिंगापुर के नागरिक दुनिया के 193 देशों में बिना किसी पूर्व वीजा के यात्रा कर सकते हैं। मजबूत राजनयिक संबंध, स्थिर शासन और व्यापारिक उदारीकरण ने सिंगापुर को इस पायदान पर बनाए रखा है। एशिया का दबदबा: टॉप 3 में एशियाई देश रैंकिंग में शीर्ष स्थानों पर एशियाई देशों का कब्जा यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर इस क्षेत्र का प्रभाव बढ़ रहा है:     दूसरे स्थान पर: दक्षिण कोरिया (190 देश)          तीसरे स्थान पर: जापान (189 देश) यूरोप की स्थिति: चौथे स्थान पर जर्मनी, इटली, स्पेन और स्विट्जरलैंड जैसे देश हैं, जो 188 देशों तक पहुंच प्रदान करते हैं। हालांकि ये अभी भी बेहद शक्तिशाली हैं, लेकिन वे एशियाई देशों की तुलना में थोड़ा पीछे छूट गए हैं।   भारत की स्थिति: रैंकिंग में आई गिरावट भारतीय पासपोर्ट की ताकत में इस साल थोड़ी कमी देखी गई है। भारत 2025 की रैंकिंग में 85वें स्थान पर खिसक गया है। (2024 में भारत 80वें स्थान पर था)। फिलहाल भारतीय पासपोर्ट धारक 57 देशों में वीजा-मुक्त या वीजा ऑन अराइवल की सुविधा के साथ यात्रा कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में वीजा नियमों के उदारीकरण की गति थोड़ी धीमी रही है जिससे रैंकिंग में 5 स्थानों की गिरावट आई है। बिना वीजा के यहां घूम सकते हैं भारतीय भले ही रैंकिंग में गिरावट आई हो लेकिन भारतीय यात्रियों के लिए अभी भी कई खूबसूरत और लोकप्रिय देश 'वीजा फ्री' या आसान एंट्री वाले हैं:     पड़ोसी देश: भूटान, नेपाल, श्रीलंका।     पर्यटन स्थल: थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, मालदीव, मॉरीशस।     मध्य पूर्व: कतर, ओमान।     अन्य: कजाकिस्तान, फिजी, बारबाडोस। पासपोर्ट रैंकिंग का महत्व पासपोर्ट की ताकत केवल घूमने की आजादी नहीं है बल्कि यह किसी देश की आर्थिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय ट्रस्ट और राजनयिक प्रभाव का प्रतीक है। जिस देश का पासपोर्ट जितना मजबूत होता है उसके नागरिकों के लिए वैश्विक स्तर पर व्यापार और शिक्षा के अवसर उतने ही बढ़ जाते हैं।  

नोट से गांधी हटाने की तैयारी? केरल सांसद ने किया बड़ा खुलासा

नई दिल्ली बीते दिनों संसद के शीत सत्र में केंद्र सरकार ने वीबी-जी राम जी बिल पास करवा लिया. इस बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई है. यह बिल देश में रोजगार गारंटी स्कीम मनरेगा की जगह लेगा. सरकार का कहना है कि यह पूरी तरह से नया बिल है. वहीं विपक्ष का कहना है कि सरकार ने मनरेगा स्कीम से महात्मा गांधी का नाम हटाने के लिए यह कानून बनाया है. इसको लेकर जारी विवाद के बीच केरल से माकपा के सांसद जॉन ब्रिटास ने एक बड़ा दावा किया है. उन्होंने कहा कि सरकार मनरेगा के बाद अब नोट से भी महात्मा गांधी की तस्वीर हटाने की योजना बना रही है. इसके लिए एक हाई लेवल मीटिंग भी हो चुकी है. माकपा के राज्यसभा सांसद ब्रिटास ने दावा किया है कि भले ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इस बात को खारिज करे लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार महात्मा गांधी की तस्वीर को भारतीय मुद्रा नोटों से हटाने की योजना बना रही है. ब्रिटास ने सोमवार को दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर हाई-लेवल बैठक पहले ही हो चुकी है, जिससे सरकार की सोच में बदलाव का संकेत मिलता है. हाई लेवल मीटिंग होने का दावा ब्रिटास ने कहा कि आधिकारिक इनकारों के बावजूद इस मुद्दे पर पहली दौर की उच्च स्तरीय चर्चा हो चुकी है. यह अब मेरा अनुमान नहीं है. गांधी को हमारी मुद्रा से हटाना राष्ट्र के प्रतीकों को फिर से लिखने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र गांधी की तस्वीर को भारत की संस्कृति को बेहतर प्रतिबिंबित करने वाले किसी अन्य प्रतीक से बदलने पर विचार कर रहा है, जिसमें भारत माता भी एक विकल्प है. हालांकि सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मुद्रा नोटों के डिजाइन पर निर्णय आरबीआई लेता है, जो केंद्र के साथ परामर्श में होता है. महात्मा गांधी की तस्वीर 1996 में सभी नोटों पर स्थायी रूप से आ गई थी, जब महात्मा गांधी सीरीज के नोट लॉन्च किए गए थे. 2022 में आरबीआई ने स्पष्ट रूप से खबरों को खारिज किया था, जिसमें दावा किया गया था कि गांधी की तस्वीर को रवींद्रनाथ टैगोर या एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अन्य हस्तियों की तस्वीर से बदलने का प्रस्ताव है. क्या है विवाद यह मुद्दा फिर से सामने आया है, जब विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) बिल, 2025 पेश करने के बाद आपत्ति जताई. इस बिल में गांधी का नाम हटा दिया गया और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए. विपक्षी दलों ने सरकार पर राम के नाम का उपयोग कर योजना को राजनीतिक रंग देने और गांधी की विरासत मिटाने का प्रयास करने का आरोप लगाया है. उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि नया कानून मनरेगा के मुकाबले काफी है. मनरेगा दुनिया का सबसे बड़ा ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम है.

देसी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए: लाइट वेट और किफायती, भारत का 200 जेट खरीदने का फैसला

 नई दिल्ली  दुनिया में अमेरिकी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट एफ-35 की तूती बोलती है. इस फाइटर जेट की क्षमता को आज की तारीख में कोई भी देश चुनौती नहीं दे सकता है. इसके बाद राफेल, सुखोई-57, चीनी जे-35, यूरो फाइटर जैसे फाइटर जेट्स आते हैं. ये सभी ए+ या ए श्रेणी के जेट्स हैं. लेकिन, इन फाइटर जेट्स को खरीदने से ज्यादा बड़ी टेंशन इनको उड़ाने में होती है. इन विमानों को उड़ाना हर किसी के बस की बात नहीं हैं. यानी ये सफेद हाथी हैं जिनको खरीदने से ज्यादा टेंशन पालने की होती है. आज दुनिया बदल रही है. युद्ध के तरीके बदल रहे हैं. जमीनी की जगह हवाई जंग का महत्व बढ़ गया है. हर देश अब अपनी एयरफोर्स को मजबूत करने में जुटी है. ऐसे में भारत भी पूरी शिद्दत से अपनी एयरफोर्स को मजबूत करने में जुटा है. इस वक्त भारतीय एयरफोर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती फाइटर जेट्स की कमी को पूरा करना है. एयरफोर्स को फाइटर जेट्स के 42 स्क्वड्रन की जरूरत है, लेकिन उसके पास ऑपरेशनल केवल 30 स्क्वाड्रन हैं. एक स्क्वाड्रन में 18 विमान होते हैं. इसके अलावा आने वाले समय में कई स्क्वाड्रन रिटायर होने वाले हैं. ऐसे में यह अंतर और बढ़ने वाला है. भारत ने देसी फाइटर जेट्स पर क्यों जताया भरोसा? ऐसे में इस कमी को पूरा करने के लिए भारत ने देसी फाइटर जेट्स तेजस पर भरोसा जताया है. सरकार ने अब तक तेजस एमके-1 फाइटर जेट के 180 यूनिट का आर्डर दे दिया है. इसके अलावा कुछ ट्रेनर विमान भी हैं. अब इन विमानों की सप्लाई भी शुरू होने वाली है. इस विमान को एचएएल ने बनाया है. अनुमान है कि चीजें पटरी पर आने के बाद एचएएल हर साल इसकी 24 यूनिट की आपूर्ति कर सकता है. मार्केट में राफेल, एफ-35 जैसे विमान तो तेजस को तरजीह क्यों? तेजस एमके-1 के ऑर्डर बुक देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है जब चीन और पाकिस्तान जैसे हमारे दुश्मन पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की ओर बढ़ रहे हैं तो हमने तेजस की इतनी तरजीह क्यों दी है. तेजस एमके-1 एक 4+ का लाइट वेट फाइटर जेट है. हमारे मन में यही सवाल है कि क्या बदलने समय के अनुसार इसकी सार्थकता है. हम आगे इसी सवाल पर जबाव खोजेंगे.     तेजस क्यों है एयरफोर्स की पसंद?     तेजस एमके-1 का ऑपरेशन कॉस्ट काफी कम है. एक शॉर्टी यानी 45 मिनट के एक उड़ान पर इसमें 1200-1400 किलो फ्यूल खर्च होता है. इस पर प्रति फ्लाइट ऑवर 4 से 8 हजार डॉलर का कुल खर्च आता है. दूसरी ओर राफेल पर 16 से 31 हजार डॉलर प्रति घंटे का खर्च आता है. वहीं एफ-35 की बात करें तो यह खर्च 35 से 42 हजार डॉलर प्रति घंटे तक पहुंच जाता है. इस तरह इस बात को समझना आसान हो जाता है कि ऑपरेशन लागत ही वह सबसे बड़ा कारण है जिससे एयरफोर्स ने तेजस एमके-1 को तरजीह दी है. तेजस फाइटर वर्ल्ड का ऑल्टो क्यों दुनिया के तमाम एक्सपर्ट्स के मुताबिक एक एफ-35 फाइटर जेट पर उसके पूरे लाइफ साइकिल में 20 से 45 करोड़ डॉलर का खर्च आता है. यह खर्च हथियारों की लोडिंग, उसकी उड़ान के घंटे, मेंटेनेशन सहित कई अन्य चीजों पर निर्भर करता है. ऐसे में अगर इन सभी लागत का औसत लिया जाए तो समझ में आ जाता है कि भारत ने बेहद समझादी का परिचय दिया है. एक राफेल या एफ-35 पर होने वाले खर्च से करीब छह से आठ गुना कम खर्च तेजस एमके-1 पर होता है. अब आप समझ गए होंगे कि हमने इस तेजस को फाइटर जेट की दुनिया का ऑल्टो क्यों कह रहे हैं. कार की दुनिया में ऑल्टो केवल एक मॉडल का नाम नहीं है बल्कि यह किफायत का पर्याववाची भी है. तो क्या तेजस एमके-1 से भारत की जरूरतें पूरी होगी? यह बहुत अच्छा सवाल है. आमतौर पर सस्ती चीजों को लेकर हमारे मन में एक ही सवाल उठता है कि यह कितना टिकाऊ है. आपका चिंतित होना लाजिमी भी है. क्योंकि देश चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से घिरा हुआ है. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें भारत और पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा को लेकर थोड़ी बात करनी होगी. दरअसल, पाकिस्तान 1947 से पहले भारत का हिस्सा था. वह कोई चांद से उतरा देश नहीं है. सरहद के उस पार की स्थिति-परिस्थिति के बारे में हमें बखुबी पता है. भारत की सीमा से 100-200 मील के दायरे में अधिकतर पाकिस्तान सिमट जाता है. उसका सबसे प्रमुख शहर लाहौर, रावलपिंडी, राजधानी इस्लामाबाद तो भारत की सीमा के बहुत करीब हैं. ऐसे में इनको बड़े आसानी से तेजस एमके-1 जैसे फाइटर जेट से कवर किया जा सकता है. इस बात को आप इससे और अच्छी तरह समझ सकते हैं कि अगर आपको शहरी इलाके में 50-100 किमी की दूरी तय करनी है तो आपको बहुत महंगी बड़ी करोड़ों रुपये की गाड़ी नहीं खरीदनी चाहिए. बशर्ते आप गाड़ी जरूरत को ध्यान में रखकर खरीद रहे हैं न कि शौकिया तौर पर. इससे आपकी जेब पर पेट्रोल का खर्च कम पड़ता है और आप कार की भी सवारी करते हैं. ऐसे में भारत ने पाकिस्तान और उसके साथ लगने वाली सीमाई इलाकों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही तेजस-एमके-1 की खरीद की है. इस इलाके में तेजस भी करीब-करीब वही काम करेगा जो काम राफेल या फिर एफ-35 जैसे विमान करेंगे, लेकिन दोनों के ऑपरेशन कॉस्ट में जमीन आसमान का अंतर है. इससे भारत एक बड़ी धनराशि की बचत कर उसे अन्य चीजों पर खर्च कर सकता है. अब बात करते हैं चीन सीमा की चीन एक विशाल देश है. उसके साथ लगने वाली सीमा भी बेहद दुर्गम है. ऐसे में हमें इस बात की स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए कि तेजस एमके-1 उसके खिलाफ बहुत प्रभावी साबित नहीं होगी. इसी कारण भारत ने इसके लिए अलग रणनीति अपनाई है. वह देसी तेजसे-एमके-2 और एम्का प्रोग्राम पर काम कर रहा है. इसके साथ ही राफेल, सुखोई-30 जैसे फाइटर जेट्स हैं. ये मीडियम से हाई रेंज के एयरक्राफ्ट हैं. भारत इस कैटगरी में और फाइटर … Read more

अंडा और कैंसर कनेक्शन पर FSSAI ने दी सफाई, सुरक्षित है सभी बिकने वाले अंडे

नई दिल्ली कुछ दिन से सोशल मीडिया पर अंडों को लेकर तमाम खबरें चल रही हैं. इनमें दावा किया जा रहा है कि कुछ ब्रांड के अंडों में नाइट्रोफ्यूरान नाम का बैन एंटीबायोटिक के ट्रेस होते हैं, जिससे कैंसर होने का खतरा रहता है. अब इस मामले में FSSAI ने बड़ा खुलासा किया है. आइए आपको इसके बारे में बताते हैं.  एफएसएसएआई ने किया यह खुलासा FSSAI ने बताया कि देश में बिकने वाले अंडे पूरी तरह सुरक्षित हैं. अंडे खाने से कैंसर का कोई खतरा नहीं है. ये दावे भ्रामक और वैज्ञानिक आधार से रहित हैं. FSSAI के मुताबिक, नाइट्रोफ्यूरान का इस्तेमाल पोल्ट्री और अंडा उत्पादन में पूरी तरह प्रतिबंधित है. अगर कहीं ट्रेस मिले भी तो वह अलग-थलग मामला है, सभी अंडों पर लागू नहीं होता है. वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार, इतनी कम मात्रा से कैंसर या कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं होती है.  अंडे क्यों हैं पौष्टिक और सुरक्षित? अंडा प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स का खजाना है. इनमें विटामिन A, B12, D, E, आयरन, जिंक और कोलीन जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो मांसपेशियां मजबूत बनाते हैं. आंखों की रोशनी अच्छी रखते हैं, हड्डियां मजबूत करते हैं और इम्युनिटी बढ़ाते हैं. रोजाना 1-2 अंडे खाना ज्यादातर लोगों के लिए फायदेमंद होता है.  क्या कहते हैं डॉक्टर? दिल्ली स्थित अपोलो हॉस्पिटल में सीनियर डायटीशियन डॉ. रमेश कुमार ने बताया कि अंडा संपूर्ण प्रोटीन का बेहतरीन सोर्स है. यह मसल्स बनाने, ब्रेन हेल्थ और आंखों के लिए अच्छा है. FSSAI की रिपोर्ट से साफ है कि अफवाहें गलत हैं. रोजाना अंडा खाने से किसी भी तरह का कैंसर नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अंडे में कोलीन होता है, जो ब्रेन और लिवर के लिए जरूरी है. यह महिलाओं और बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद होता है. कैंसर की अफवाहों से घबराने की जरूरत नहीं है. कैसे खाने चाहिए अंडे?     उबले या पोच्ड सबसे अच्छे.     फ्राइड कम खाएं.     सब्जियों के साथ मिलाकर.     अच्छे ब्रांड या फार्म फ्रेश अंडे चुनें.  

क्या बढ़ता दबाव बना वजह? विपक्ष से संवाद को तैयार हुए पीएम शहबाज

इस्लामाबाद  पाकिस्तान की सियासत फिर करवट ले रही है। लामबंद विपक्ष ने एक मंच से सरकार की नाकामियां गिनाईं और सरकार के खिलाफ आगामी साल 8 फरवरी को 'ब्लैक डे' मनाने का ऐलान किया। इस फैसले के सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर छाते ही हुक्मरान थोड़ा असहज हो गए। पहले रसूखदार मंत्री, इमरान खान को लेकर बात न करने का संकल्प ले रहे थे, तो अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्पष्ट कह दिया कि वे बातचीत को तैयार हैं। शरीफ ने मंगलवार को कहा कि वह विपक्ष के साथ बातचीत के अपने प्रस्ताव को दोहरा रहे हैं। साथ ही, इस बात पर भी जोर दिया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत केवल "वैध मामलों" पर ही आगे बढ़ सकती है।  दरअसल, 21 दिसंबर को, विपक्षी गठबंधन तहरीक तहफ्फुज आईन-ए-पाकिस्तान (टीटीएपी) द्वारा आयोजित एक "राष्ट्रीय सम्मेलन" के दूसरे और आखिरी दिन, प्रतिभागियों ने सरकार की नाकामियां गिनाईं, अर्थव्यवस्था की बदहाली का ब्योरा दिया और चरमराई कानून व्यवस्था का हवाला दिया। 8 फरवरी 2023 में जो सरकार चुनी गई उसकी वैधता पर भी सवाल खड़े किए और इसकी बरसी को ही 8 फरवरी 2026 में मनाने का फैसला लिया। इस दौरान कुछ दलों ने आवाम की बेहतरी के लिए संवाद कायम करने की भी बात कही थी। प्रधानमंत्री का यह प्रस्ताव इस्लामाबाद में एक संघीय कैबिनेट बैठक के दौरान दिया गया, जहां उन्होंने विपक्ष की पीटीआई (पाकिस्तान-तहरीक-ए-इंसाफ) और उसके "साथियों द्वारा बातचीत के बारे में बात करने" की खबरों का जिक्र किया। यहां शरीफ याद दिलाना नहीं भूले कि उन्होंने पहले भी "कई मौकों पर ऐसी पेशकश की है, जिसमें असेंबली भी शामिल है, और विपक्ष को बातचीत के लिए आमंत्रित किया था।" उन्होंने कहा, "अगर वे इसके लिए तैयार हैं, तो पाकिस्तान सरकार निश्चित रूप से तैयार है," और कहा कि देश की प्रगति और समृद्धि के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच सद्भाव जरूरी है। शरीफ ने इसके साथ ही कहा कि बातचीत की आड़ में कोई "ब्लैकमेलिंग" नहीं होनी चाहिए और बातचीत केवल "वैध मामलों " को लेकर ही आगे बढ़ सकती है। विपक्षी दलों के सम्मेलन में टीटीएपी का मानना ​​था कि मौजूदा राष्ट्रीय संकट को देखते हुए, देश को पहले से कहीं ज्यादा एक नए लोकतंत्र चार्टर की जरूरत है। सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत की जरूरत पर जोर दिया गया है क्योंकि पाकिस्तान राजनीतिक और आर्थिक संकटों का सामना कर रहा है। वहीं, शरीफ की बैठक में कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने सहिष्णुता और बातचीत पर आधारित एक नए राष्ट्रीय राजनीतिक चार्टर का आग्रह किया, जबकि पीएम के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने इस बात पर जोर दिया कि राजनीतिक स्थिरता केवल संयम, आपसी सम्मान और निरंतर बातचीत से ही हासिल की जा सकती है। डॉन के अनुसार, ऐसा नहीं है कि सरकार की ये पहली पेशकश है। एक साल से ज्यादा समय तक बढ़े तनाव के बाद, दोनों पक्षों ने राजनीतिक माहौल को शांत करने के लिए दिसंबर 2024 के आखिरी सप्ताह में बातचीत शुरू की थी। लेकिन हफ्तों की बातचीत के बावजूद, बातचीत की प्रक्रिया बड़े मुद्दों पर अटक गई थी। मुद्दा 9 मई, 2023 और 26 नवंबर, 2024 के विरोध प्रदर्शनों की जांच के लिए दो न्यायिक आयोगों का गठन और पीटीआई कैदियों की रिहाई था। शहबाज सरकार ने इस साल फरवरी में एक बार फिर विपक्षी दल पीटीआई को बातचीत का प्रस्ताव दिया था। इसे इमरान खान की पार्टी ने ठुकरा दिया था। पार्टी नेता असद कैसर ने सरकार के दोहरे चरित्र पर सवाल खड़े किए थे और पूछा कि वे सरकार के साथ बातचीत कैसे कर सकते हैं, जब शासकों ने पीटीआई पर कार्रवाई तेज कर दी है। नेशनल असेंबली के स्पीकर सादिक ने 13 नवंबर को सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच बातचीत कराने के लिए अपने प्रस्ताव को दोहराया था। लेकिन तब प्रस्ताव की 'टाइमिंग' पर सवाल उठे थे। उस समय पीटीआई सदस्य 27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक के पारित होने के दौरान असेंबली में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। 6 दिसंबर को, पीटीआई समर्थित सांसद ने सीनेट में कानून के शासन की कमी और जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकातों पर बिना बताए प्रतिबंध की निंदा की। कथित तौर पर सरकार ने बातचीत का प्रस्ताव दिया जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया। मंगलवार की बैठक में प्रधान मंत्री के सलाहकार ने कहा कि "जिनसे वे (पीटीआई) बातचीत करना चाहते हैं, वे उनसे बातचीत के लिए तैयार नहीं हैं।" यहां "जिनसे" से मतलब आसिम मुनीर की सेना से है। मतलब स्पष्ट है कि पाकिस्तान की डोर अब भी आईएसआई और सेना के हाथ में है और सरकार दिखावे की ओट में बातचीत का प्रस्ताव दे रही है। जानते वो भी हैं कि जिस रास्ते पर पाकिस्तान चल पड़ा है वहां संवाद का कोई अर्थ नहीं रह गया है। खौफ है तो सत्ता के हाथ से चले जाने का। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ रहा है, मानवाधिकार संगठन भी मुखर हैं ऐसे में ये इमेज बचाने की कोशिश भी हो सकती है।  

1971 का इतिहास मत भूलो! रूस का बांग्लादेश को दो-टूक संदेश—भारत से दुश्मनी भारी पड़ेगी

ढाका  बांग्लादेश में रूस के राजदूत अलेक्जेंडर ने ढाका को 1971 के ऐतिहासिक युद्ध की याद दिलाते हुए भारत के साथ बढ़ते तनाव पर सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को “जल्द से जल्द” भारत के साथ रिश्तों में तनाव कम करना चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि उसकी आज़ादी में भारत और तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) की निर्णायक भूमिका रही है।   रूसी राजदूत ने साफ शब्दों में कहा कि 1971 में भारत ने न सिर्फ सैन्य स्तर पर अहम योगदान दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी बांग्लादेश के पक्ष में मजबूती से खड़ा रहा। वहीं, सोवियत संघ ने उस दौर में भारत-बांग्लादेश को कूटनीतिक और रणनीतिक समर्थन देकर पश्चिमी दबावों को संतुलित किया था। राजदूत अलेक्जेंडर के मुताबिक,“बांग्लादेश की स्वतंत्रता किसी एक देश की देन नहीं थी। भारत और रूस दोनों ने भारी बलिदान दिए। ऐसे में इतिहास को नज़रअंदाज़ करना भविष्य के रिश्तों के लिए खतरनाक हो सकता है।”   उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत-बांग्लादेश संबंधों में खटास, आंतरिक अस्थिरता और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं। मॉस्को का संकेत साफ माना जा रहा है कि वह दक्षिण एशिया में तनाव नहीं, संतुलन और स्थिरता चाहता है।विश्लेषकों का कहना है कि रूस का यह बयान सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि ढाका के लिए एक कूटनीतिक चेतावनी भी है कि इतिहास से मुंह मोड़ना उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर सकता है।  

सोशल मीडिया यूजर्स सावधान! अप्रैल 2026 से आपकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखेगा ये विभाग

नई दिल्ली  1 अप्रैल 2026 से भारत में इनकम टैक्स नियमों में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। नए नियमों के तहत इनकम टैक्स अधिकारियों को सिर्फ भौतिक संपत्तियों तक सीमित रहने की बजाय नागरिकों की डिजिटल गतिविधियों तक पहुंच बनाने का अधिकार मिलेगा। यह पहली बार होगा जब टैक्स अधिकारी औपचारिक रूप से डिजिटल दुनिया में भी जांच कर सकेंगे। दरअसल, यह बदलाव टैक्स चोरी रोकने और वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। अब सिर्फ कैश और ज्वेलरी नहीं, डिजिटल स्पेस भी रडार पर पहले इनकम टैक्स अधिकारियों को छापेमारी के दौरान घर, प्रॉपर्टी, नकदी, दस्तावेज और गहनों जैसी भौतिक चीजों की जांच की अनुमति थी। यह अधिकार इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 132 के तहत आता था। लेकिन नए प्रस्तावित नियमों के तहत अब अधिकारियों को वर्चुअल डिजिटल स्पेस तक पहुंच का अधिकार मिलेगा। इस डिजिटल स्पेस में शामिल होंगे: ईमेल अकाउंट, क्लाउड स्टोरेज , डिजिटल वॉलेट ट्रेडिंग और इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया प्रोफाइल और चैट्स, अन्य ऑनलाइन अकाउंट।  यानि Gmail, WhatsApp, Facebook और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी टैक्स जांच के दायरे में आ सकते हैं। सरकार ऐसा बदलाव क्यों कर रही है? सरकार का कहना है कि आज के समय में ज्यादातर वित्तीय लेनदेन ऑनलाइन हो चुके हैं।       बैंकिंग और निवेश     स्टॉक ट्रेडिंग     क्रिप्टो एसेट्स     ऑनलाइन खरीदारी इन सभी लेनदेन को फिजिकल जांच के जरिए पकड़ना अब प्रभावी नहीं रहा। इनकम टैक्स अधिकारियों का मानना है कि किसी व्यक्ति की पूरी वित्तीय गतिविधि डिजिटल फुटप्रिंट में छिपी होती है। डिजिटल डेटा तक पहुंच मिलने से टैक्स चोरी के मामलों को ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ा जा सकेगा। क्या हर किसी का डेटा कभी भी चेक किया जा सकता है? सबसे बड़ा सवाल है प्राइवेसी का। सरकार ने स्पष्ट किया है कि टैक्स अधिकारी मनमाने तरीके से किसी का डिजिटल डेटा एक्सेस नहीं कर सकेंगे। जैसे पहले छापेमारी के लिए 'reason to believe' जरूरी होता था, वैसी ही शर्त अब डिजिटल अकाउंट्स पर भी लागू रहेगी। मतलब: जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ आय या वित्तीय लेनदेन में गड़बड़ी का ठोस आधार नहीं होगा, तब तक ईमेल, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल अकाउंट्स को एक्सेस नहीं किया जा सकेगा। टैक्सपेयर्स के लिए इसका क्या मतलब है?     टैक्स से जुड़ी पारदर्शिता बढ़ेगी।     लोगों को अपनी डिजिटल गतिविधियों में सावधानी बरतनी होगी।     अगर आपकी इनकम और लेनदेन साफ-सुथरे और सही तरीके से घोषित हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं।  

ट्रंप का बड़ा सैन्य दांव: अमेरिका बनाएगा अब तक का सबसे शक्तिशाली युद्धपोत, दुश्मनों की बढ़ेगी चिंता

वाशिंगटन  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना के लिए एक नए विशाल युद्धपोत के निर्माण की योजना की घोषणा की है, जिसे उन्होंने “बैटलशिप” नाम दिया है। यह घोषणा उन्होंने फ्लोरिडा स्थित अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में की। ट्रंप ने इसे अमेरिका की प्रस्तावित “गोल्डन फ्लीट” का अहम हिस्सा बताया। ट्रंप ने दावा किया कि यह नया युद्धपोत अब तक बनाए गए किसी भी बैटलशिप से “100 गुना अधिक शक्तिशाली”, सबसे तेज़ और सबसे बड़ा होगा। उनके अनुसार, यह जहाज द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए आयोवा-क्लास बैटलशिप से भी लंबा और भारी होगा, जिनका वजन लगभग 60,000 टन था। ट्रंप ने कहा कि इस नए युद्धपोत में हाइपरसोनिक मिसाइलें, रेलगन और उच्च क्षमता वाले लेज़र हथियार लगाए जाएंगे। हालांकि, अमेरिकी नौसेना अभी इन तकनीकों को पूरी तरह विकसित करने की प्रक्रिया में है। यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी नौसेना ने हाल ही में लागत बढ़ने और देरी के कारण एक नए छोटे युद्धपोत की योजना को रद्द कर दिया था। इसके अलावा, फोर्ड-क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर और कोलंबिया-क्लास पनडुब्बियों जैसी प्रमुख परियोजनाएं भी समय और बजट से पीछे चल रही हैं। इतिहास में ‘बैटलशिप’ शब्द का इस्तेमाल भारी कवच और विशाल तोपों से लैस युद्धपोतों के लिए होता रहा है, जिनका उपयोग समुद्री और तटीय हमलों में किया जाता था।   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विमानवाहक पोतों और लंबी दूरी की मिसाइलों के कारण बैटलशिप का महत्व कम हो गया।ट्रंप पहले भी नौसेना के डिज़ाइन और तकनीक को लेकर अपनी राय खुलकर रखते रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने आधुनिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट की जगह भाप से चलने वाली पुरानी प्रणाली अपनाने की वकालत की थी। उन्होंने नौसेना के जहाजों पर जंग लगने और उनके “बदसूरत” डिज़ाइन की भी आलोचना की थी। ट्रंप ने कहा कि इस नए युद्धपोत के डिज़ाइन में उनकी सीधी भूमिका होगी। उन्होंने कहा, “अमेरिकी नौसेना इन जहाजों के डिज़ाइन का नेतृत्व करेगी, लेकिन मैं भी साथ रहूंगा, क्योंकि मैं एक बहुत एस्थेटिक इंसान हूं।”