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इतने नॉमिनेशन के बावजूद ट्रंप क्यों रहे नोबेल शांति पुरस्कार से वंचित?

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला है। इस साल का सम्मान मारिया कोरिना नाचाडो को मिला है, जो वेनेजुएला की विपक्षी नेता हैं। अब उनका नाम डोनाल्ड ट्रंप के साथ लिया जा रहा है कि आखिर वह कैसे नोबेल सम्मान पा गईं, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति चूक गए। डोनाल्ड ट्रंप के लिए लगातार लॉबिंग हो रही थी। पाकिस्तान की ओर से उनके नाम का नॉमिनेशन हुआ था। इसके अलावा नेतन्याहू समेत कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इसकी पहल की थी। फिर भी उन्हें सम्मान नहीं मिला। मीडिया की सुर्खियां भी यही हैं कि डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति सम्मान नहीं मिला है। इसकी वजह यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने इसी साल 19 जनवरी को कमान संभाली थी। नोबेल पुरस्कार के लिए एंट्री 31 जनवरी तक ही मांगी गई थीं। उसके बाद भेजी गईं एंट्रीज पर विचार नहीं किया जाता है। डोनाल्ड ट्रंप के केस में ऐसा ही हुआ है। उन्होंने 19 जनवरी को कमान संभाली थी और महज 12 दिन बाद नामांकन की प्रक्रिया बंद हो गई थी। डोनाल्ड ट्रंप जिन 8 जंगों को रुकवाने का श्रेय लेते हुए नोबेल पुरस्कार की मांग रख रहे हैं, वे 31 जनवरी के बाद की उपलब्धियां हैं। ऐसे में अब उनके नाम पर 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए विचार हो सकता है, लेकिन इस साल के लिए वह पात्र ही नहीं थे। इसलिए उनके नाम पर कमेटी ने विचार तक नहीं किया। डोनाल्ड ट्रंप के माम दावों के बाद भी उनके नाम पर विचार ना किए जाने को लेकर जब नोबेल कमेटी के चेयरमैन जॉर्गन वाटने फ्रिडनिस से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इसका फैसला तो काम के आधार पर किया जाता है। इसके अलावा अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार निर्णय होता है। उन्होंने कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार के लंबे इतिहास में कभी भी इस समिति ने मीडिया अटेंशन या फिर प्रचार नहीं देखा। हमें हर साल हजारों पत्र मिलते हैं और दावा किया जाता है कि वे कौन-कौन सी उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं, जिसके लिए उन्हें सम्मान मिलना चाहिए। फिर भी हमारी मान्यता यही है कि किसी भी एंट्री पर कामकाज के आधार पर ही विचार करेंगे। ऐसा ही होता भी है। नोबेल समिति के जानकारों का कहना है कि हम इस बात को प्राथमिकता देते हैं कि दावेदार के प्रयास कैसे थे और उनमें क्या निरंतरता थी। हेनरी जैकसन सोसायटी के रिसर्च फेलो और इतिहासकार थिओ जेनोउ ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप के जिन प्रयासों की बात की जा रही है, उनका असर ज्यादा समय तक नहीं रहने वाला है। उन्होंने कहा कि किसी समस्या को समाप्त करना और उसे कुछ समय के लिए रोकना अलग-अलग चीजें हैं। शॉर्ट टर्म उपायों के आधार पर नोबेल समिति में पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाता।  

मारिया ने झेला अंधकार, लोकतंत्र की रोशनी के लिए जीता नोबेल शांति पुरस्कार

कराकास  आर्कटिक से आने वाली नॉर्वे की सर्द हवाओं के बीच नॉर्वेजियन नोबेल समिति की घोषणा ने दुनिया भर में एक नई उम्मीद की किरण जलाई है। वेनेजुएला की विपक्षी नेता को 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया है। नोबेल कमिटी के चेयरमैन जॉर्गेन वाटने फ्राइडनेस ने मंच पर खड़े होकर कहा, "यह पुरस्कार एक ऐसी महिला को जाता है जो बढ़ते हुए अंधेरे में लोकतंत्र की लौ जलाए रखती है।" और फिर नाम लिया गया- मारिया कोरिना माचाडो। वेनेजुएला की यह बेटी, जो तानाशाही के साए में छिपी हुई थी, वह 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता बन चुकी है। लेकिन यह सिर्फ एक सम्मान नहीं है; यह उन लाखों वेनेजुएलन दिलों की धड़कन है, जो दशकों से दम तोड़ रही थीं। यह पुरस्कार उन्हें वेनेजुएला के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने के उनके अथक प्रयासों और तानाशाही से लोकतंत्र की ओर न्यायपूर्ण एवं शांतिपूर्ण संक्रमण के संघर्ष के लिए दिया गया। 'लोकतंत्र के औजार ही शांति के औजार हैं' मारिया कोरिना माचाडो का नाम सुनते ही आंखों के सामने एक तस्वीर उभरती है- एक महिला, जिसके कंधों पर वेनेज़ुएला का पूरा बोझ लदा है, फिर भी उसकी मुस्कान में उम्मीद की किरण चमकती है। 1967 में काराकास की गलियों में जन्मीं मारिया, एक धनी इंजीनियर और व्यवसायी परिवार की बेटी थीं। लेकिन भाग्य ने उन्हें राजनीति के मैदान में धकेल दिया जहां साल 2000 से ह्यूगो चावेज की तानाशाही ने लोकतंत्र को कुचलना शुरू कर दिया था। 2010 में लोकसभा के लिए चुनी गईं मारिया ने रिकॉर्ड वोटों से जीत हासिल की, लेकिन 2014 में शावेज के उत्तराधिकारी निकोलास मादुरो के शासन ने उन्हें पद से हटा दिया। फिर भी, वे रुकीं नहीं। उन्होंने वेंते वेनेज़ुएला पार्टी की स्थापना की, 2017 में सोय वेनेज़ुएला गठबंधन बनाया। यह एक ऐसा धागा था जो विपक्षी दलों को एक सूत्र में बांधता था। इसके बाद का सफर और कठिन हो गया- उन्हें राजनीतिक प्रतिबंध लगाए गए, यात्रा पर रोक लगा दी गई और बार-बार गिरफ्तारी की धमकियां मिलीं। नोबेल कमिटी ने कहा, "मारिया ने दिखाया कि लोकतंत्र के औजार ही शांति के औजार हैं।" बीबीसी की '100 वुमन' सूची (2018) और टाइम मैगजीन की 'वर्ल्ड्स मोस्ट इन्फ्लुएंशियल पीपल' (2025) में शामिल होना उनके वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है। पुरस्कार की वजह? सरल शब्दों में कहें तो यह वेनेज़ुएला के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए उनके अथक संघर्ष का सम्मान है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के बाद, मारिया ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जगाया। उन्होंने स्वतंत्र चुनावों की मांग की, मानवाधिकार उल्लंघनों पर रोशनी डाली। अमेरिकी सीनेटर रिक स्कॉट और मार्को रुबियो जैसे नेताओं ने अगस्त 2024 में नोबेल कमिटी को पत्र लिखा, जिसमें कहा, "उनका साहस और निस्वार्थ नेतृत्व शांति और लोकतंत्र की खोज में महत्वपूर्ण रहा है।" लेकिन वजह सिर्फ राजनीति नहीं; यह शांति की वो लड़ाई है जो तानाशाही से लोकतंत्र की ओर शांतिपूर्ण संक्रमण की मांग करती है। वेनेज़ुएला, जहां 25 सालों से चावेज-मादुरो रेजीम ने अर्थव्यवस्था को चूर-चूर कर दिया, लाखों को भुखमरी की कगार पर ला खड़ा किया, वहां मारिया की आवाज ने लोगों को एकजुट किया। नोबेल कमिटी ने जोर दिया, "लोकतंत्र- मतदान का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही देशों के भीतर और बीच शांति की नींव है।" मारिया का संघर्ष वैश्विक संकट को भी दर्शाता है, जहां लोकतंत्र पीछे हट रहा है। मारिया की जीत का प्रतीक अब बात उस खास किस्से की जो मारिया की जीत का प्रतीक बन गया- एक ऐसा पल जो आंसू और साहस की मिश्रित कहानी है। जनवरी 2025 की ठंडी सुबह, काराकास के चाको इलाके में एक रैली हो रही थी। तीन महीने से छिपी हुई मारिया पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आईं। भीड़ में सैकड़ों लोग थे- भूखे, डरे हुए, लेकिन आशा से भरे। मारिया मंच पर चढ़ीं, उनकी आवाज कांप रही थी, लेकिन शब्द मजबूत थे: "हम डरेंगे नहीं। यह हमारा देश है, हमारी आजादी है।" रैली खत्म होते ही, मादुरो रेजीम की ताकतें दौड़ पड़ीं। गोलियां चलीं, आंसू गैस के धमाके हुए। मारिया को गिरफ्तार करने की कोशिश हुई- वे उन्हें घेर चुके थे। लेकिन तब कुछ हुआ जो इतिहास बन गया। भीड़ ने एक दीवार बनाई। साधारण लोग- माताएं, छात्र, मजदूरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मारिया को बचाया। एक बुजुर्ग महिला ने चिल्लाया, "वह हमारी उम्मीद है!" जबकि युवा छिपे हुए रास्ते से मारिया को सुरक्षित निकाल ले गए। यह गिरफ्तारी का प्रयास विफल रहा, लेकिन इसने दुनिया को दिखा दिया कि मारिया अकेली नहीं हैं; वे लाखों की आवाज हैं।

ईडी का जोरदार ऐक्शन: ऑनलाइन सट्टेबाजी के आरोप में कांग्रेस विधायक के घर से 40 किलो सोना जब्त

बेंगलुरु ईडी ने ऑनलाइन सट्टेबाजी से जुड़े रैकेट की चल रही जांच के मामले में छापेमारी कर कर्नाटक कांग्रेस के विधायक के दो लॉकरों से 40 किलोग्राम सोना जब्त किया है। इसकी कीमत 50 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही है। ईडी अधिकारियों के मुताबिक तलाशी अभियान बेंगलुरु क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा पीएमएलए 2002 के तहत किया गया। इस बरामदगी के साथ इस मामले में कुल जब्त राशि 150 करोड़ रुपये से अधिक हो गयी है, जिसमें पहले से जब्त लगभग 21 किलोग्राम सोने की छड़ें, नकदी, आभूषण, लक्जरी वाहन और फ्रीज किए गए बैंक खाते शामिल हैं। चित्रदुर्ग विधानसभा क्षेत्र से विधायक केसी वीरेंद्र को इस साल के अगस्त में गिरफ्तार कर लिया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में है। ईडी को जांच में किंग 567 और राजा 567 जैसे कई ऑनलाइन प्लेटफार्मों के माध्यम से संचालित 2,000 करोड़ रुपये के सट्टेबाजी नेटवर्क का पता चला है। अपने बयान में ईडी ने कहा कि वीरेंद्र ने अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर कई अवैध सट्टेबाजी वेबसाइट चलाये और मासूम लोगों को ठगा। इन प्लेटफॉर्मों से एकत्रित धनराशि को फोनपैसा समेत कई गेटवे से भेजा गया और पूरे भारत में बिचौलियों से मिले हजारों 'म्यूल' खातों के जरिये स्थानांतरित किया गया। जांच में यह भी पता चला कि सट्टेबाजी से प्राप्त आय का इस्तेमाल विदेशों में लग्जरी यात्रा, वीजा और आतिथ्य सेवाओं के वित्तपोषण के लिए किया गया था। एजेंसी ने कहा कि मार्केटिंग, सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन, बल्क एसएमएस कैंपेन और प्लेटफॉर्म होस्टिंग के लिए भुगतान भी सट्टेबाजी नेटवर्क से जुड़े खातों के माध्यम से किये गये थे। ईडी ने कहा, 'साक्ष्य बताते हैं कि अवैध ऑनलाइन गतिविधियों से प्राप्त धन को उनके स्रोत को छिपाने के लिए कई मध्यस्थ खातों के माध्यम से स्थानांतरित किया गया था।' प्रवर्तन निदेशालय वीरेंद्र और उसके सहयोगियों से जुड़े अपराध से कमाये धन के स्रोत का पता लगाने और अतिरिक्त संपत्तियों की पहचान करने का काम कर रही है

ऐतिहासिक फैसला: हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड के खिलाफ 600 परिवारों की दावेदारी को ठुकराया

कोच्चि केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि केरल वक्फ बोर्ड द्वारा वर्ष 2019 में मुनंबम की विवादित संपत्ति को वक्फ घोषित करने का निर्णय “कानून के अनुरूप नहीं” था। न्यायमूर्ति एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को अवैध ठहराया गया था। यह मामला कई दशकों पुराना है। 600 परिवारों के बेघर होने का खतरा बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मुनंबम की यह भूमि मूल रूप से 404.76 एकड़ थी, जो अब समुद्री कटाव से घटकर करीब 135.11 एकड़ रह गई है। 1950 में सिद्दीक सैत नामक व्यक्ति ने यह भूमि फारूक कॉलेज को उपहार (Gift Deed) के रूप में दी थी। हालांकि, उस समय इस भूमि पर कई परिवार बसे हुए थे। बाद में कॉलेज ने इन परिवारों को भूमि के कुछ हिस्से बेच दिए, लेकिन बिक्री दस्तावेजों में इस संपत्ति को वक्फ भूमि नहीं बताया गया। 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस भूमि को औपचारिक रूप से वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जिससे पहले हुए सभी भूमि सौदे अमान्य हो गए। इसके बाद लगभग 600 परिवारों को बेदखली का खतरा पैदा हो गया और उन्होंने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया। राज्य सरकार ने बनाई जांच आयोग प्रदर्शनों को देखते हुए केरल सरकार ने नवंबर 2024 में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया। इस आयोग का उद्देश्य प्रभावित परिवारों की स्थिति और उनके अधिकारों की जांच करना था। लेकिन ‘वक्फ संरक्षण समिति’ के सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि वक्फ संपत्तियों पर जांच आयोग गठित करने का अधिकार सरकार के पास नहीं है, क्योंकि यह अधिकार वक्फ अधिनियम के तहत केवल वक्फ बोर्ड को है। एकल पीठ का फैसला और राज्य की अपील 17 मार्च को न्यायमूर्ति बेकु कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने आयोग के गठन के आदेश को रद्द कर दिया था। एकल जज ने यह राय दी थी कि आयोग को वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत पहले से तय या लंबित मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में अपील की। सरकार का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं के पास मामले को अदालत में लाने का अधिकार ही नहीं था और वक्फ बोर्ड का आदेश कानूनी रूप से गलत था। डिवीजन बेंच का निर्णय: वक्फ बोर्ड का आदेश ‘अवैध’ और ‘देरी से पारित’ डिवीजन बेंच यानी खंडपीठ ने राज्य सरकार की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि 1950 का दस्तावेज “वक्फ डीड” नहीं बल्कि “गिफ्ट डीड” था। अदालत ने कहा, “1950 की दान-पत्री का उद्देश्य ‘ईश्वर के नाम पर स्थायी समर्पण’ करना नहीं था, बल्कि यह केवल एक साधारण उपहार था। अतः यह जमीन किसी भी वक्फ अधिनियम (1954, 1984 या 1995) के तहत वक्फ नहीं मानी जा सकती।” अदालत ने आगे कहा कि वक्फ बोर्ड द्वारा 2019 में जारी आदेश “बेहद विलंबित, कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन में” और “कानूनन अमान्य” हैं। पीठ ने कहा, “वक्फ बोर्ड द्वारा सितंबर और अक्टूबर 2019 में संपत्ति को वक्फ घोषित करने की कार्रवाई न केवल अनुचित देरी से की गई बल्कि यह वक्फ अधिनियमों के प्रावधानों के स्पष्ट उल्लंघन में है। यह आदेश कानून में प्रवर्तनीय नहीं हैं।” “वक्फ डीड” और “गिफ्ट डीड” क्या है? वक्फ डीड एक कानूनी दस्तावेज है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को इस्लामी कानून के तहत धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए स्थायी रूप से दान कर देता है। इसे वक्फनामा भी कहते हैं। यह संपत्ति किसी व्यक्ति के निजी लाभ के लिए उपयोग नहीं की जा सकती। वहीं गिफ्ट डीड भी एक कानूनी दस्तावेज है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को स्वेच्छा से बिना किसी भुगतान के किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को उपहार के रूप में ट्रांसफर करता है। मुख्य अंतर वक्फ डीड धार्मिक/दान उद्देश्य के लिए होती है और स्थायी होती है, जबकि गिफ्ट डीड व्यक्तिगत उपहार के लिए होती है और उद्देश्य में लचीलापन हो सकता है। ‘भूमि हथियाने की कोशिश’ बताया गया अदालत ने अपने कड़े शब्दों में कहा कि वक्फ बोर्ड द्वारा भूमि को वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया “भूमि हथियाने की चाल” थी, जिसने सैकड़ों परिवारों की आजीविका पर असर डाला। अदालत ने कहा, “25 सितंबर 2019 की अधिसूचना, जिसके तहत उक्त भूमि को वक्फ घोषित किया गया, वह वक्फ अधिनियमों के प्रावधानों के विरुद्ध और ‘भूमि हथियाने की कोशिश’ के समान है। इससे सैकड़ों परिवारों की रोटी-रोजी प्रभावित हुई है।” राज्य सरकार वक्फ बोर्ड के आदेश से बाध्य नहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार वक्फ बोर्ड के ऐसे आदेशों से बाध्य नहीं है। पीठ ने कहा, “हम यह घोषित करते हैं कि राज्य सरकार वक्फ बोर्ड की घोषणाओं से बंधी नहीं है, क्योंकि यह केवल एक दिखावा था ताकि संपत्ति को वक्फ बताकर कब्जा किया जा सके। राज्य सरकार को वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 97 के तहत आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार है।”  

CJI गवई की शख्सियत का अंदाज: ‘हम भी तो बच्चे थे!’ – SG तुषार मेहता के सामने यह क्यों कहा?

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ आज (शुक्रवार, 10 अक्टूबर को) दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में वायु प्रदूषण से जुड़े पटाखों के मुद्दे और ‘हरित’ पटाखों के निर्माण और बिक्री से संबंधित मुद्दों पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि कुछ शर्तों के साथ पटाखे जलाने की अनुमति दी जाए। NCR के राज्यों ने कोर्ट में यह भी दलील दी कि वे सभी हरित पटाखे हों और केवल राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान यानी National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) द्वारा हरित पटाखे के तौर पर अनुमोदित हों। सुनवाई के दौरान एनसीआर राज्यों ने शीर्ष अदालत को यह सुझाव भी दिया कि किसी भी ई-कॉमर्स वेबसाइट को पटाखों के लिए ऑनलाइन ऑर्डर स्वीकार नहीं करेंगे। एनसीआर राज्यों ने शीर्ष अदालत को यह सुझाव भी दिया कि दिवाली पर रात 8 बजे से रात 10 बजे तक ही पटाखे जलाने की अनुमति दी जानी चाहिए। एनसीआर राज्यों ने यह सुझाव भी दिया कि क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर रात 11.55 बजे से रात 12.30 बजे तक ही पटाखे जलाने की अनुमति दी जाए। हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल इस मामले पर कोई आदेश नहीं दिया है। क्या 2018 में 2024 की तुलना में काफी कम प्रदूषण (AQI) था दरअसल, एनसीआर राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट से दिल्ली-एनसीआर में हरित पटाखे जलाने की अनुमति देने का आग्रह किया था। केंद्र सरकार की तरफ से मामले में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से हरित पटाखे जलाने की इजाजत देने की मांग की थी। बार एंड बेंच के मुताबिक, इस दौरान CJI बीआर गवई ने पूछा, "क्या 2018 में प्रदूषण (AQI) 2024 की तुलना में काफी कम था?" हम सब भी तो बच्चे थे मीलॉर्ड! इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “कोविड काल में यह कम हुआ था… अन्यथा यह हमेशा से वैसा ही रहा है। रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि पटाखों की वजह से ऐसा हुआ है। मैं आग्रह करता हूँ कि पटाखों पर कोई प्रतिबंध न हो। अगर दो घंटे का समय है… तो एक घंटा तो सिर्फ़ माता-पिता को समझाने में ही चला जाता है! हम सब भी तो बच्चे थे मीलॉर्ड!” आधे हरियाणा पर बिना सुनवाई के ही प्रतिबंध इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता के परमेश्वर ने हरियाणा का पक्ष रखते हुए कहा, "आधे हरियाणा पर बिना सुनवाई के ही प्रतिबंध लगा दिया गया है। एनसीआर का विस्तार ऐसा ही है।" CJI जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ पटाखा निर्माताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें प्रतिबंध में ढील देने और ‘हरित’ पटाखे बेचने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है। बता दें कि शीर्ष अदालत ने 26 सितंबर को प्रमाणित निर्माताओं को इस शर्त के साथ ‘हरित’ पटाखों के निर्माण की अनुमति दी थी कि वे बिना उसकी मंजूरी के प्रतिबंधित दिल्ली-एनसीआर में इन्हें नहीं बेचेंगे।  

भारत की अफगानिस्तान में वापसी! काबुल में दूतावास खोलने की तैयारी, तालिबान ने क्या कहा?

काबुल   अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी भारत के ऐतिहासिक दौरे पर हैं। शुक्रवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर और मुत्तकी के बीच बेहद अहम बातचीत हुई। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता के लिए भारत पूरी तरह प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि भारत जल्द ही काबुल में अपना दूतावास खोलेगा। बता दें कि चार साल पहल अशरफ गनी के अफगानिस्तान से भागने और तालिबान के कब्जे के बाद भारत ने अपना दूतावास काबुल में बंद कर दिया था। गौरतलब है कि इस वक्त अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच भी संबंध तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत और अफगानिस्तान की निकटता पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। भारत के खिलाफ नहीं होगा अफगान जमीन का इस्तेमाल मुत्ताकी ने खुलकर स्वीकार किया है कि भारत हमेशा अफगान लोगों के साथ खड़ा रहा है और कई क्षेत्रों में उनकी सहायता की है। अफगानी विदेश मंत्री ने भी आश्वासन दिया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के लिए कतई नहीं होने देंगे। बता दें कि भारत ने अपने दूतावास को बंद करने के एक साल बाद ही काबुल में एक अस्थायी मिशन शुरू कर दिया था जिसका उद्देश्य व्यापारिक संबंधों को बनाए रखना और अफगानिस्तान की जनता को सहायता मुहैया कराना था। वहीं अब काबुल में रूस, ईरान और पाकिस्तान समेत करीब एक दर्जन देशों के दूतावास काम कर रहे हैं। हालांकि तालिबानी शासन को मान्यता अब तक केवल रूस ने ही दी है। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, हमारे विकास और क्षेत्रीय शांति के लिए दोनों देशों का आपसी सहयोग बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि काबुल में भारत के टेक्निकल मिशन को जल्द ही दूतावास में बदल दिया जाएगा। हालांकि इसके लिए विदेश मंत्री ने कोई समय सीमा नहीं बताई है। बता दें कि भारत के साथ संबधों को सुधारने और आगे बढ़ाने के ही उद्देश्य से मुत्तकी भारत के 6 दिवसीय दौरे पर हैं। भारत और अफगानिस्तान के साथ हमेशा ही अच्छे संबंध रहे हैं। हालांकि अब तक भारत ने तालिबानी शासन को मान्यता नहीं दी है। पश्चिमी जानकारों का कहना है कि तालिबानी प्रशासन को मान्यता ना मिलने की केवल एक वजह है और वह है महिलाओं पर प्रतिबंध। बता दें कि अब तक यूएनएससी ने तालिबानी नेताओं की यात्रा पर प्रतिबंध लगा रखे थे। प्रतिबंध हटने के बाद ही उनकी भारत यात्रा संभव हो पाई है।  

वेनेजुएला की मचादो ने जीता नोबेल शांति पुरस्कार, ट्रंप के बड़े दावों पर लगा ब्रेक

ओस्लो दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान शुक्रवार को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में होते ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सपना चकनाचूर हो गया। इस बार का 'नोबेल पीस प्राइज' वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचादो को मिला है। बता दें कि नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी हर साल इस पुरस्कार के लिए ऐसे लोगों या संस्थाओं को चुनती है, जो शांति को बढ़ावा देने, देशों के बीच भाईचारे को मजबूत करने और समाज के लिए काम करने में योगदान देते हैं। बता दें कि यह पुरस्कार हमेशा चौंकाने वाला होता है। नोबेल प्राइज के लिए काफी बेचैन थे ट्रंप? नोबेल पीस प्राइज के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कई दिनों से काफी बेचैन नजर आ रहे थे। ट्रंप ने अपनी विदेश नीति की कुछ उपलब्धियों, जैसे शांति समझौतों को लेकर खुद की तारीफ की थी। लेकिन नोबेल विशेषज्ञों का पहले ही कहना था कि उनके जीतने की संभावना बहुत कम है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि कमेटी आमतौर पर उन लोगों या संगठनों को पुरस्कार देती है, जो लंबे समय से शांति के लिए काम कर रहे हों।   कौन हैं मारिया कोरिना मचाडो? मारिया कोरिना मचाडो का जन्म 7 अक्टूबर 1967 को हुआ था। वह वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता और औद्योगिक इंजीनियर हैं। 2002 में उन्होंने वोट निगरानी समूह सूमाते की स्थापना की और वेंटे वेनेजुएला पार्टी की राष्ट्रीय समन्वयक हैं। 2011-2014 तक वे वेनेजुएला की नेशनल असेंबली की सदस्य रहीं। वह 2018 में बीबीसी की 100 प्रभावशाली महिलाओं और 2025 में टाइम पत्रिका की 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल हुईं। निकोलस मादुरो सरकार ने उनके देश छोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। 2023 में अयोग्यता के बावजूद, उन्होंने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी प्राथमिक चुनाव जीता, लेकिन बाद में उनकी जगह कोरिना योरिस को उम्मीदवार बना दिया गया।   इन नामों की हो रही थी चर्चा नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इस बार कई नाम सामने आए थे। पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो ने कुछ संभावित विजेताओं का जिक्र किया था, जिनमें शामिल थे:     सूडान की इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स: यह एक समुदाय आधारित नेटवर्क है, जो सूडान के गृहयुद्ध के दौरान मानवीय सहायता का मजबूत आधार बना हुआ है।     इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट: ये दोनों संस्थाएं वैश्विक न्याय और शांति के लिए काम करती हैं।     कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स: यह अमेरिका आधारित संगठन प्रेस की आजादी को बढ़ावा देता है और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करता है। यह संगठन उन पत्रकारों की सूची भी तैयार करता है, जो अपने काम के दौरान मारे गए। पिछले साल किसने जीता था नोबेल शांति पुरस्कार? पिछले साल 2024 में नोबेल शांति पुरस्कार जापान की संस्था निहोन हिदानक्यो को दिया गया था। यह संगठन परमाणु हथियारों के खिलाफ दशकों से काम कर रहा है और हिरोशिमा-नागासाकी बम धमाकों के पीड़ितों की आवाज को दुनिया तक पहुंचाता है। क्यों खास है नोबेल शांति पुरस्कार? नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक है। बाकी नोबेल पुरस्कार (जैसे चिकित्सा, भौतिकी, रसायन और साहित्य) स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दिए जाते हैं, लेकिन शांति पुरस्कार का ऐलान और समारोह ओस्लो में होता है। इस हफ्ते स्टॉकहोम में चिकित्सा, भौतिकी, रसायन और साहित्य के पुरस्कारों का ऐलान हो चुका था जिसके बाद सबकी नजर शुक्रवार के ऐलान पर टिकी थीं। इसके अलावा, अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार सोमवार को घोषित किया जाएगा।

भारत-अफगान नज़दीकियों से बौखलाया पाकिस्तान, सीमा पार की एयरस्ट्राइक में दिखी बौखलाहट

काबुल अफगानिस्तान की राजधानी काबुल शुक्रवार सुबह तेज धमाकों से दहल उठी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विस्फोट पाकिस्तान एयर फोर्स (PAF) की कथित एयरस्ट्राइक के कारण हुए हैं. पाकिस्तानी चैनलों ने दावा किया कि इन हमलों का निशाना तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकाने थे. यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब तालिबान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी भारत दौरे पर हैं. मुत्तकी का यह दौरा अफगानिस्तान की नई सरकार और भारत के बीच संवाद की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि अफगानिस्तान की ज़मीन अगर पाकिस्तान विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होती है, तो ‘कड़ी कार्रवाई’ की जाएगी. उसी के कुछ दिन बाद यह कथित एयरस्ट्राइक सामने आई है. कतर में तालिबान के राजदूत मुहम्मद सुहैल शाहीन ने बयान जारी कर कहा, ‘काबुल में दो धमाकों की आवाज सुनी गई, लेकिन अभी तक किसी के हताहत होने की खबर नहीं है.’ पाकिस्तानी मीडिया ने दावा किया कि हमले में TTP प्रमुख नूर वली महमूद मारा गया. अफगान मीडिया के मुताबिक, अटैक के बाद TTP के प्रमुख नूर वली महसूद का एक ऑडियो सामने आया जिसमें उसने खुद के जिंदा होने की बात कही और पाकिस्तान पर ‘फर्जी प्रचार’ करने का आरोप लगाया. ख्वाजा आसिफ ने दी थी धमकी इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने गुरुवार को धमकी भरे लहजे में अफगानिस्तान के अंतरिम प्रशासन को चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि अफगानिस्तान तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपने देश के अंदर सुरक्षित पनाहगाह दे रहा है. उन्होंने कहा था कि ‘इनफ इज इनफ’ यानी अब बहुत हो गया. पाकिस्तानी सेना लगातार TTP के खिलाफ ऑपरेशन चला रही है. गुरुवार को कम से कम सात टीटीपी आतंकी मारे गए. मुत्ताकी की भारत यात्रा के बीच हमला एक कहावत है घर वाला घर नहीं हमें किसी का डर नहीं. यह धमाका ऐसे समय में हुआ है जब भारत और अफगानिस्तान के संबंध बेहतर हो रहे हैं और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्तकी गुरुवार को नई दिल्ली पहुंचे. अगस्त 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान में सत्ता में आने के बाद यह पहली बार है, जब काबुल से कोई मंत्री-स्तरीय प्रतिनिधि नई दिल्ली का दौरा कर रहा है. मुत्तकी की यह यात्रा लगभग एक सप्ताह की है. इसे दोनों देशों के बीच संवाद की नई पहल के रूप में देखा जा रहा है.  

₹88 लाख तक की फीस के बाद अब H-1B में नई सख्ती! ट्रंप की तैयारी से भारतीयों को लग सकता है झटका

नई दिल्ली अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन फिर से H-1B वीजा के नियमों में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है. ये वीजा खासतौर पर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और विद्यार्थियों के लिए बेहद अहम होते हैं, क्योंकि इसी से अमेरिका में काम करने और आगे चलकर ग्रीन कार्ड पाने का रास्ता बनता है. लेकिन अब अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने ‘रिफॉर्मिंग द H-1B वीजा नॉन इमिग्रेंट वीजा प्रोग्राम’ नाम से एक नया प्रस्ताव जारी किया है. इसमें सिर्फ 1 लाख डॉलर की नई फीस ही नहीं, बल्कि कई सख्त बदलाव भी शामिल हैं- जैसे कौन सी कंपनी यह वीजा इस्तेमाल कर सकती है, कौन से पदों के लिए आवेदन मान्य होंगे और थर्ड पार्टी कंपनियों की निगरानी बढ़ाई जाएगी. क्या है नया प्रस्ताव? नए नियमों के तहत H-1B वीजा के चयन में अब ‘वेतन आधारित प्रणाली’ (Wage-Based Selection) लागू करने की योजना है. यानी जिन लोगों को ज्यादा वेतन मिलेगा, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी. अब तक यह चयन पूरी तरह लॉटरी सिस्टम पर आधारित था. DHS का कहना है कि इन बदलावों का मकसद है ‘अमेरिकी मजदूरों के हितों की रक्षा करना और वीजा प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाना.’ अगर यह नियम लागू हुआ तो अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले छात्रों और कम एक्सपीरियंस वाले वर्किंग प्रोफेशनल्स को एंट्री मुश्किल हो जाएगी. साथ ही, सरकार उन कंपनियों पर कड़ी नजर रखेगी जिन्होंने पहले वीजा नियमों का उल्लंघन किया है. च-1बी वीजा कैटिगरी की शुरुआत 1990 के इमिग्रेशन ऐक्ट के तहत की गई थी। इसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि अमेरिकी कंपनियां बाहर के लोगों को ला सकें, जिनके पास जरूरी तकनीकी स्किल हो। इसी नियम के चलते बड़े पैमाने पर भारतीयों को अमेरिका में जाने का मौका मिला। खासतौर पर अमेरिकी टेक कंपनियों में भारतीय की बड़ी संख्या है। अब तक नियम था कि 65 हजार एच-1बी वीजा ही साल में जारी किए जा सकते थे। इसके अलावा 20 हजार ऐसे लोगों को भी छूट थी, जिन्होंने अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली हो। इसके अलावा कई यूनिवर्सिटी और गैर-लाभकारी संस्थानों को इससे छूट रही हो। प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार 2023 में एच-1 बी वीजा के तहत अमेरिका जाने वाले लोगों में तीन चौथाई भारतीय ही थे। 2012 से अब तक एच-1 बी वीजा हासिल करने वाले 60 फीसदी लोग कंप्यूटर से संबंधित नौकरियों में गए। इसके अलावा हेल्थ सेक्टर, बैंक, यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों के लिए भी एच-1 बी वीजा जारी किए गए। कब लागू होंगे नियम? अभी यह प्रस्ताव फेडरल रजिस्टर में सार्वजनिक सुझावों के लिए रखा गया है. अगर सब कुछ तय समय पर हुआ तो दिसंबर 2025 तक यह नया नियम लागू हो सकता है. H-1B वीजा 1990 के इमीग्रेशन Act के तहत शुरू हुआ था ताकि अमेरिकी कंपनियां ऐसे कुशल लोगों को ला सकें जिनकी विशेषज्ञता अमेरिका में आसानी से नहीं मिलती. यही वजह है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी कंपनियों में हजारों भारतीय इसी वीजा पर काम कर रहे हैं. अभी हर साल अमेरिका 65,000 H-1B वीजा जारी करता है, और 20,000 अतिरिक्त वीजा अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स या उससे ऊपर की डिग्री धारकों को मिलते हैं. 2023 में मिले सभी H-1B वीजा में से करीब 75% भारतीय नागरिकों को मिले थे. ऐसे में यह कदम भारत के लिए भी बड़ी खबर है.

नेतन्याहू ने PM मोदी को कॉल करने के लिए रोकी अहम बैठक, सामने आई बड़ी वजह

नई दिल्ली यरूशलम में गुरुवार रात एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला. इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्‍याहू सुरक्षा कैबिनेट की अहम बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे. एजेंडा बेहद गंभीर था. गाजा में सीजफायर और बंधकों की रिहाई पर बड़ा फैसला होना था. लेकिन अचानक नेतन्‍याहू ने बैठक रोक दी. वजह? भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन आ गया था. जी हां, नेतन्‍याहू ने अपने सारे मंत्री और अफसर कुछ मिनटों के लिए इंतजार में छोड़ दिए, ताकि वो सीधे पीएम मोदी से बात कर सकें. दोनों नेताओं के बीच यह बातचीत लगभग दस मिनट चली, लेकिन उसका असर अब दोनों देशों के रिश्तों पर साफ दिख रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, प्रधानमंत्री नेतन्‍याहू ने गाजा में युद्धविराम और बंधकों की रिहाई पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का फोन रिसीव किया. मोदी ने उन्हें इस समझौते पर बधाई दी और कहा कि भारत इस मानवीय प्रयास का समर्थन करता है. बयान में आगे लिखा है कि मोदी ने नेतन्‍याहू को करीबी दोस्त बताया और कहा कि भारत-इजरायल की दोस्ती हर परिस्थिति में मजबूत रहेगी. नेतन्‍याहू ने भी पीएम मोदी का आभार जताते हुए कहा कि वो भारत के साथ मिलकर काम जारी रखना चाहते हैं. नेतन्याहू को दी बधाई, गाज़ा समझौते का किया स्वागत पीएम मोदी ने नेतन्याहू को फोन लगाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के गाज़ा में शांति प्लान के तहत हुई प्रगति पर इज़रायली पीएम को बधाई दी। इसके साथ ही पीएम मोदी ने बंधकों की रिहाई और गाज़ा के लोगों को मानवीय सहायता बढ़ाने पर हुए समझौते का स्वागत भी किया। पीएम मोदी ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दुनिया में कहीं भी किसी भी रूप या स्वरूप में आतंकवाद अस्वीकार्य है। मोदी बोले-आतंकवाद कहीं भी बर्दाश्त नहीं इस बातचीत के तुरंत बाद पीएम मोदी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया. उन्होंने लिखा, मैंने अपने मित्र प्रधानमंत्री नेतन्‍याहू को फोन करके गाजा शांति योजना में हुई प्रगति पर बधाई दी. हमने बंधकों की रिहाई और गाज़ा के लोगों के लिए बढ़ाई जा रही मानवीय मदद का स्वागत किया. मैंने दोहराया कि आतंकवाद किसी भी रूप में और कहीं भी स्वीकार्य नहीं है. मोदी के इस ट्वीट को कुछ ही मिनटों में लाखों व्यूज़ मिले और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया. कई विश्लेषकों ने कहा कि यह बातचीत इस बात का संकेत है कि भारत अब पश्चिम एशिया की राजनीति में एक संतुलित लेकिन प्रभावी भूमिका निभा रहा है. सोमवार तक रिहा होंगे सभी बंधक इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि गाज़ा में हामास के कब्जे में मौजूद बंधकों को सोमवार या मंगलवार को रिहा कर दिया जाएगा. उन्होंने उम्मीद जताई कि वे मिस्र में आयोजित होने वाली समझौते की हस्ताक्षर समारोह में शामिल होंगे. ट्रंप ने व्हाइट हाउस कैबिनेट बैठक में बताया कि बुधवार को बंधकों की रिहाई और गाज़ा के पुनर्निर्माण के पहले चरण पर समझौता हुआ. हामास 72 घंटे के संघर्षविराम के बाद 20 बचे बंधकों को एक साथ रिहा करेगा. ट्रंप ने इसे खुशी का दिन बताया और कहा कि इससे क्षेत्र में “स्थायी शांति” की उम्मीद है. गाजा डील और नेतन्‍याहू की मुश्किलें इजरायल और हमास के बीच महीनों से चल रहे संघर्ष में यह सीजफायर डील बेहद अहम मानी जा रही है. इसमें सभी बंधकों की रिहाई और गाजा में मानवीय सहायता बढ़ाने की बात कही गई है. इजरायल के भीतर इस समझौते को लेकर मतभेद हैं. कुछ नेता मानते हैं कि यह आतंक के आगे झुकना है, तो कुछ इसे जरूरी राहत बता रहे हैं. ऐसे वक्त में नेतन्‍याहू का मोदी से बात करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि कूटनीतिक संदेश है कि भारत न सिर्फ गाजा संकट पर नज़र रखे हुए है, बल्कि शांति के हर प्रयास का समर्थन कर रहा है. पीएम मोदी ने इजरायल को बताया भारत का मित्र प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू हमेशा से भारत के घनिष्ठ मित्र रहे हैं और दोनों देशों के बीच यह मित्रता आने वाले समय में भी और मजबूत रहेगी. मोदी ने कहा कि भारत और इजरायल के रिश्ते आपसी विश्वास, सहयोग और समान मूल्यों पर आधारित हैं और यह संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं. वहीं, प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने मोदी का इजरायल के प्रति समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया. दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि भारत और इजरायल आगे भी करीबी साझेदारी और समन्वय के साथ विभिन्न मुद्दों पर साथ काम करते रहेंगे. पीएम ने की ट्रंप से बात गुरुवार को इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी बात की और उन्हें अमेरिका की ओर से कराए गए गाजा शांति समझौते के पहले चरण की सफलता पर बधाई दी. यह तीन हफ्तों में पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच दूसरी फोन कॉल थी. प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति की इस ऐतिहासिक शांति योजना को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका की सराहना की. पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा, मैंने मेरे दोस्त राष्ट्रपति ट्रंप से बात की और ऐतिहासिक गाजा शांति योजना की सफलता पर उन्हें बधाई दी. व्यापारिक वार्ताओं में हुई अच्छी प्रगति की भी समीक्षा की. गाजा में हुआ युद्धविराम अमेरिका ने घोषणा की कि इजराइल और हमास — जो पिछले दो साल से एक-दूसरे से लड़ रहे हैं — उन्होंने गाजा शांति योजना के पहले चरण पर सहमति बना ली है. इस पहले चरण में गाजा पट्टी में युद्धविराम (सीजफायर) लागू किया जाएगा और इजराइली बंधकों और फिलिस्तीनी कैदियों की रिहाई की जाएगी. यह युद्ध उस समय शुरू हुआ जब 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइली पर हमला किया था. इस हमले में लगभग 1,200 लोगों की मौत हो गई थी और हमास ने 251 लोगों को बंधक बना लिया था, जिनमें से अब भी 50 से अधिक लोग उसकी कैद में हैं. इजराइल ने इस हमले के बाद गाजा में सैन्य अभियान शुरू किया. फिलिस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस युद्ध में अब तक 66,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं. यह शांति समझौता उस लंबे संघर्ष में एक अहम मोड़ माना जा रहा है, जिसने गाजा … Read more