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150 साल पूरे ‘वंदे मातरम’ के: अमित शाह ने कहा—राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक है यह गीत

नई दिल्ली केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को कहा कि 'वंदे मातरम' आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति की अमर ज्वाला प्रज्वलित करता है। यह गीत देश में एकता, देशभक्ति और युवाओं में नई ऊर्जा का प्रतीक बना हुआ है। अमित शाह ने यह बात 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर कही। इस गीत के रचनाकाल (7 नवंबर 1875) से शुरू होकर अगले एक साल तक यानी 7 नवंबर 2026 तक इसका विशेष स्मरण वर्ष मनाया जाएगा। 'वंदे मातरम' भारत के आत्मा की आवाज- अमित शाह गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर लिखा, 'वंदे मातरम' सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, यह भारत की आत्मा की आवाज है। अंग्रेजी शासन के खिलाफ इस गीत ने देश को एकजुट किया और आजादी की चेतना को प्रबल किया। इसने देश के वीर क्रांतिकारियों में मातृभूमि के प्रति गर्व, समर्पण और बलिदान की भावना जगाई।' अमित शाह ने कहा कि यह गीत आज भी देशवासियों के दिलों में राष्ट्रप्रेम की लौ जलाए हुए है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अपने परिवार के साथ मिलकर 'वंदे मातरम' का पूरा संस्करण गाएं, ताकि यह भाव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का केंद्र बना रहे। पीएम मोदी आज राष्ट्रीय उत्सव का करेंगे उद्घाटन इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में वर्षभर चलने वाले इस राष्ट्रीय उत्सव का उद्घाटन करेंगे। प्रधानमंत्री एक विशेष डाक टिकट और स्मारक सिक्का भी जारी करेंगे। सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया कि 'वंदे मातरम' को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को 'बंगदर्शन' पत्रिका में पहली बार प्रकाशित किया था। बाद में उन्होंने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल किया। इस गीत को संगीतकार और कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वरबद्ध किया था। 'वंदे मातरम' भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया और आज भी यह देश की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सभ्यतागत चेतना का अभिन्न हिस्सा है।   वंदे मातरम हमारे देश का गौरव है- मुख्तार अब्बास नकवी वहीं इस मौके पर भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि 'वंदे मातरम हमारा राष्ट्रीय गीत है और हमारे देश का गौरव है। अब अगर कुछ लोगों को अपना ईमान खतरे में लग रहा है, तो उनसे बड़ा बेईमान कोई नहीं है। जिस गीत को संविधान सभा ने राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया, उसे सम्मान दिया, जिस गीत को हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूरे जोश और उत्साह के साथ गाया, देश को आजाद कराया और अंग्रेजों को देश से खदेड़ा, अगर वही गीत किसी के ईमान को तोड़ता है, तो उससे बड़ा बेईमान कोई नहीं हो सकता… यह साबित करता है कि राष्ट्र के प्रति आपके विचार और मूल्य कितने दूषित हैं।' 'वंदे मातरम' भारत की एकता का प्रतीक- प्रेम सिंह तमांग सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग ने कहा कि 'वंदे मातरम' भारत की स्वतंत्रता का प्रतीक और एकता, शक्ति व गर्व का अमर गीत है। उन्होंने बताया कि यह गीत 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अक्षय नवमी के दिन लिखा था। इसके 150 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री ने कहा, 'वंदे मातरम ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के हृदय में देशभक्ति की ज्वाला जगाई। यह गीत आज भी हमारी एकता और समर्पण का प्रतीक है।' उन्होंने सभी नागरिकों से इस वर्षभर चलने वाले राष्ट्रीय समारोह में शामिल होने की अपील की और कहा कि वंदे मातरम की अमर भावना हमें देशसेवा की प्रेरणा देती रहे। 'वंदे मातरम आज भी एकता, बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का संदेश' अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने शुक्रवार को ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने पर तवांग में आयोजित समारोह में हिस्सा लिया। उन्होंने इस गीत को ‘पवित्र गीत’ बताते हुए कहा कि यह स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों में जोश और भक्ति का भाव जगाने वाला गीत है। इस कार्यक्रम में देशभक्ति गीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी गई। सीएम खांडू ने कहा, 'वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति भक्ति का अमर आह्वान है, जिसने हर पीढ़ी को देशप्रेम से ओतप्रोत किया है।' उन्होंने कहा कि यह गीत आज भी एकता, बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का संदेश देता है, जो हर भारतीय के हृदय में गूंजता रहेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा — विभाजन की सोच अब भी राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी बाधा

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने पर एक वर्ष तक चलने वाले स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया है। इस दौरान आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम, ये शब्द एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है, एक संकल्प है। वंदे मातरम, ये शब्द मां भारती की साधना है, मां भारती की आराधना है। वंदे मातरम, ये शब्द हमें इतिहास में ले जाता है, ये हमारे वर्तमान को नए आत्मविश्वास से भर देता है, और हमारे भविष्य को ये नया हौसला देता है कि ऐसा कोई संकल्प नहीं जिसकी सिद्धि न हो सके, ऐसा कोई लक्ष्य नहीं जिसे हम भारतवासी पा न सकें। गुलामी के कालखंड  'वंदे मातरम्' आजादी का गीत बना- पीएम इस दौरान पीएम मोदी ने कहा, 'गुलामी के उस कालखंड में वंदे मातरम् इस संकल्प का उद्घोष बन गया था और वह उद्घोष था- भारत की आजादी का, मां भारती के हाथों से गुलामी की बेड़िया टूटेगी और उसकी संतानें स्वयं अपने भाग्य की भाग्य विधाता बनेगी।' उन्होंने आगे कहा 'गुलामी के कालखंड में जिस तरह अंग्रेज भारत को नीचा और पिछड़ा बताकर अपने शासन को सही ठहराते थे, इस पहली पंक्ति ने उस दुष्प्रचार को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। इसलिए, 'वंदे मातरम्' न केवल आजादी का गीत बना, बल्कि 'वंदे मातरम्' ने करोड़ों देशवासियों के सामने स्वतंत्र भारत कैसा होगा, वह 'सुजलाम सुफलाम' सपना भी प्रस्तुत किया।'   'आतंक के विनाश के लिए दुर्गा भी बनना जानता है भारत' इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा, '1927 में महात्मा गांधी ने कहा था 'वंदे मातरम्' हमारे सामने पूरे भारत की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है जो अखंड है… हमारे राष्ट्रीय ध्वज में समय के साथ कई बदलाव हुए हैं, लेकिन तब से लेकर आज तक, जब भी राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, तो 'भारत माता की जय', 'वंदे मातरम्' स्वतः ही हमारे मुंह से निकलता है।' पीएम मोदी ने आगे कहा कि 'बीते वर्षों में दुनिया ने भारत के इसी स्वरूप का उदय देखा है। हमने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरे हैं और जब दुश्मन ने आतंकवाद के माध्यम से भारत की सुरक्षा और सम्मान पर प्रहार करने का दुस्साहस किया, तो पूरी दुनिया ने देखा कि नया भारत अगर मानवता की सेवा के लिए कमला और विमला का स्वरूप है, तो आतंकवाद के विनाश के लिए 10 प्रहर धारिणी दुर्गा बनना भी जानता है।'   विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए चुनौती- पीएम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, 'आजादी की लड़ाई में 'वंदे मातरम्' की भावना ने पूरे राष्ट्र को आलोकित किया, लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में इसकी आत्मा का एक हिस्सा, 'वंदे मातरम्' के महत्वपूर्ण पदों को अलग कर दिया गया। 'वंदे मातरम्' को खंडित किया गया, उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। 'वंदे मातरम्' के इसी विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बोए… आज की पीढ़ी के लिए यह जानना जरूरी है कि यह अन्याय क्यों हुआ, क्योंकि वही विभाजनकारी सोच आज भी देश के लिए चुनौती बनी हुई है।'

कजाकिस्तान ने चुना अब्राहम समझौता: 33 साल से इजरायल से संबंध, अब क्यों हो रहा साझेदारी?

तेल अवीव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि कजाकिस्तान अब्राहम समझौते में शामिल हो गया है. यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला ऐसा कदम है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह समझौता क्या है, कजाकिस्तान क्यों इसमें आ रहा है, और इससे मिडिल ईस्ट या दुनिया में क्या बदलाव आएगा? आइए समझते हैं. अब्राहम समझौता क्या है? अब्राहम समझौता ट्रंप के पहले कार्यकाल की बड़ी कामयाबी है. यह 2020 में शुरू हुआ था. इसका नाम अब्राहम से आया है, जो यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों के पैगंबर माने जाते हैं. यह समझौता इजरायल और कुछ मुस्लिम देशों के बीच दोस्ती से जुड़ा है. इससे पहले, इजरायल और कई अरब देशों के बीच दुश्मनी थी. लेकिन इस समझौते से वे देश इजरायल को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने लगे. दूतावास खोले, व्यापार बढ़ाया, पर्यटन शुरू किया. अभी तक इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और सूडान शामिल हैं. इन देशों ने इजरायल के साथ पूर्ण संबंध बनाए. सूडान इकलौता ऐसा देश है, जिसने दूतावास नहीं खोला. ट्रंप इसे अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता मानते हैं. लेकिन गाजा युद्ध के बाद यह समझौता थोड़ा ठंडा पड़ गया था. अब ट्रंप इसे फिर से जिंदा करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि मध्य एशिया का मुस्लिम बहुल देश कजाखस्तान ऐसा पहला देश होगा, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनेगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर इस संबंध में पोस्ट करके जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मैंने कजाखस्तान के राष्ट्रपति कासम-जोमार्ट तोकायेव से बात की है। इसके अलावा इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से भी इस संबंध में बात की है। उन्होंने कहा कि हम दुनिया में शांति स्थापित करना चाहते हैं और उसके लिए ये संबंध अहम हैं। इसी के तहत अब्राहम अकॉर्ड अहम है और सभी इसके साथ जुड़कर शांति एवं समृद्धि को बढ़ावा देना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का दावा- कुछ और मुसलमान देश हैं लाइन में डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा भी किया कि अभी इस अकॉर्ड से कुछ और देश भी जुड़ने के लिए कतार में हैं। उन्होंने कहा कि हम जल्दी ही एक सेरेमनी का ऐलान करेंगे, जिसमें कजाखस्तान अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनेगा। हमें उम्मीद है कि जल्दी ही दुनिया में एकता, विकास और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए कुछ और देश भी साथ आएंगे। बता दें कि इस अकॉर्ड से सीरिया के भी जुड़ने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। यह इजरायल का पड़ोसी देश है और यदि सीरिया साथ आया तो यह बड़ा बदलाव होगा। खासतौर पर मध्य पूर्व एशिया में शांति और स्थिरता के लिहाज से यह अहम होगा। यही नहीं मुस्लिम देशों की एकता के लिए भी यह देखने लायक होगा। इजरायल के साथ कजाखस्तान के हैं पुराने रिश्ते, अब क्या बदलेगा बता दें कि कजाखस्तान के पहले से ही इजरायल से रिश्ते रहे हैं। कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहे कजाखस्तान ने 1992 में इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे। ट्रंप का मानना है कि मुसलमान देशों को साथ लाने से गाजा में भी शांति व्यवस्था स्थापित करने में मदद मिलेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि गाजा में इजरायली हमलों के खिलाफ मुसलमान देश एकजुट रहे हैं। कजाखस्तान भी मुस्लिम बहुल देश, पर क्यों नहीं है कट्टरता कज़ाखस्तान की आबादी लगभग 2 करोड़ है और यह क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है। हालांकि इसकी अधिकांश आबादी मुस्लिम है, लेकिन यह आधिकारिक तौर पर इस्लामिक देश नहीं है। जैसा बहरीन, मोरक्को और संयुक्त अरब अमीरात के साथ है, जिन्होंने 2020 में अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने का फैसला लिया था। यही नहीं कजाखस्तान को अपेक्षाकृत उदारवादी देश माना जाता है। अन्य इस्लामिक देशों के मुकाबले सोवियत से अलग होने वाले मुल्क मुस्लिम बहुल तो हैं, लेकिन कट्टरता वहां नहीं है। कजाकिस्तान का क्या संबंध है? कजाकिस्तान मध्य एशिया का एक बड़ा देश है. यहां की आबादी का 70 फीसदी मुस्लिम है. लेकिन अब्राहम समझौते पर अगर यह देश हस्ताक्षर करता है तो भी ये कुछ नया नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि कजाकिस्तान के 1992 से ही इजरायल के साथ अच्छे संबंध रखे हैं. वहां दूतावास हैं, व्यापार होता है, कोई दुश्मनी नहीं. ऐसे में यह कदम नया संबंध बनाने का नहीं, बल्कि पुराने को मजबूत करने का है. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव से फोन पर बात की. टोकायेव गुरुवार को व्हाइट हाउस में ट्रंप से मिले थे, क्योंकि वहां सेंट्रल एशिया के पांच देशों के नेताओं का समिट था. टोकायेव ने कहा, ‘यह हमारे देश की नीति का प्राकृतिक हिस्सा है. हम संवाद, सम्मान और स्थिरता चाहते हैं.’ एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने इसे ‘शक्ति का क्लब’ कहा और बोले, ‘यह पहला देश है, कई और आएंगे.’ कजाकिस्तान अब क्यों करेगा समझौता?     न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक कजाकिस्तान के राष्ट्रपति टोकायेव का कहना है कि इससे इजरायल के साथ व्यापार और सहयोग बढ़ेगा.     कजाकिस्तान के पास यूरेनियम और दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार हैं. गुरुवार को कजाकिस्तान ने महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में अमेरिकी सरकार के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किया. इसमें कजाकिस्तानका भी हित है. वह नहीं चाहता कि चीन और रूस के बीच फंसा रहे.     कजाकिस्तान अमेरिका को खुश करके निवेश और तकनीक हासिल करना चाहता है. इसका एक उदाहरण भी दिखा जब कजाकिस्तान के राष्ट्रपति ने ट्रंप के सामने उनकी तारीफ की. उन्होंने कहा, ‘आप एक महान राजनेता हैं जिन्हें अमेरिका की नीति में सामान्य ज्ञान और परंपराओं को वापस लाने के लिए स्वर्ग से भेजा गया है.’     ट्रंप के लिए यह राजनीतिक जीत है. गाजा युद्ध के बाद इजरायल दुनिया में अकेला पड़ गया था. ट्रंप पहले भी कह चुके हैं, ‘मेरा लक्ष्य इजरायल को फिर से मजबूत बनाना है.’ किसको क्या फायदा होगा?     ट्रंप कार्यकाल का यह पहला समझौता होगा. ऐसे में इजरायल की दुनिया में साख बढ़ेगी. दूसरे मुस्लिम देशों से समर्थन की भी उम्मीद है.     कजाकिस्तान अमेरिका के कहने पर यह समझौता करेगा. ऐसे में अमेरिका से आर्थिक मदद, इजरायल … Read more

सिख नेता स्वर्णजीत सिंह खालसा की बड़ी सफलता, नॉर्विच (कनेक्टिकट) के मेयर चुने गए

 वॉशिंगटन भारतीय मूल के मुसलमान जोरहान ममदानी के अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क का मेयर चुने जाने की दुनिया भर में चर्चा है। इस बीच भारतीय मूल के ही एक सिख नेता स्वर्णजीत सिंह खालसा ने भी बड़ी सफलता पाई है। वह अमेरिकी प्रांत कनेक्टिकट के शहर नॉर्विच के मेयर चुने गए हैं। वह पहले सिख नेता हैं, जिन्हें अमेरिका के इस प्रांत के किसी शहर में यह जिम्मेदारी मिली है। खालसा ने रिपब्लिक कैंडिडेट पीटर नैस्ट्रॉम को हराकर सफलता हासिल की है। अहम बात यह है कि नॉर्विच में सिर्फ 10 परिवार ही हैं और उसके बाद भी खालसा को जीत मिलना दिलचस्प है। स्वर्णजीत सिंह खालसा 40 वर्षीय अमृतधारी सिख हैं और मूल रूप से उनका परिवार पंजाब के जालंधर का रहने वाला है। उनका परिवार दिल्ली से लेकर पंजाब तक पंथिक मामलों से लेकर राजनीति तक में ऐक्टिव रहा है। उन्होंने अमेरिका में राजनीतिक जीवन की शुरुआत तब की, जब 9/11 के आतंकी हमलों के बाद सिखों को भी उनकी वेश-भूषा के चलते टारगेट किया गया। हेट क्राइम का भी सामना करना पड़ा। स्वर्णजीत सिंह खालसा ने एक लंबा कैंपेन चलाया था कि कैसे सिख समुदाय की एक अलग पहचान है। इसके बाद वह स्थानीय मसले भी उठाने लगे और धीरे-धीरे अमेरिका के नॉर्विच शहर में एक लोकप्रिय चेहरा बन गए। FBI ने भी किया था स्वर्णजीत सिंह खालसा का सम्मान उनकी ओर से लगातार प्रयास किए गए कि नॉर्विच समेत अमेरिका में सहिष्णुता और सामुदायिक भावना को प्रोत्साहित किया जाए। उनके प्रयासों का परिणाम था कि अमेरिकी एजेंसी एफबीआई की ओर से 2017 में उन्हें कम्युनिटी लीडरशिप अवॉर्ड मिला था। कुल 56 लोगों को ये सम्मान मिले थे, जिनमें से वह अकेले भारतीय थे। उनका मुख्य प्रयास यह था कि अमेरिकियों को बताया जाए कि सिखों की एक अलग पहचान है। वे वैसे नहीं हैं, जैसी इमेज उनके बारे में है। खासतौर पर दाढ़ी और पगड़ी के चलते उनके बारे में पूर्वाग्रह रखने वाले लोगों को उन्होंने जागरूक किया। जालंधर के कॉलेज से पढ़े और फिर स्टडी वीजा पर गए थे अमेरिका स्वर्णजीत सिंह खालसा के पिता परमिंदर पाल सिख इंटरनेशल सोसायटी में हैं। उन्होंने बेटे की सफलता का जिक्र सोशल मीडिया पर भी किया है। परमिंदर ने बताया कि उनके बेटे ने जालंधर के डीएवी इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। इसके बाद वह स्टडी वीजा पर अमेरिका चले गए थे। अमेरिका में ही स्वर्णजीत सिंह ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। वहीं पर उन्होंने लुधियाना की ही रहने वाली सिख युवती से विवाह किया था। फिलहाल वह नॉर्विच में कंस्ट्रक्शन का बिजनेस करते हैं। वह जिस नॉर्विच शहर में रहते हैं, वह अमेरिका के उन शहरों में से एक है, जहां लोगों की प्रति व्यक्ति आय काफी ज्यादा है।

महिला क्रिकेट की सफलता के बाद, अब महिला कुश्ती पर भी ध्यान: प्रो रेसलिंग लीग भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए तैयार

“पिच से लेकर मैट तक – भारत की महिलाएं खेल सशक्तिकरण के एक नए युग की पटकथा लिख रही हैं।” नई दिल्ली जब पूरा देश भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक वर्ल्ड कप जीत का जश्न मना रहा है, उसी समय एक और खेल चर्चा में आने को तैयार है- महिला कुश्ती। क्रिकेट की इस बड़ी जीत से कुछ दिन पहले ही, प्रो रेसलिंग लीग (PWL) की वापसी की आधिकारिक घोषणा नई दिल्ली में एक शानदार प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई। यह लीग जनवरी 2026 से शुरू होगी। इन दोनों उपलब्धियों ने मिलकर भारतीय खेलों में एक नया दौर शुरू किया है, जहाँ महिला खिलाड़ी अब हर मैदान पर देश की शान बढ़ा रही हैं और सफलता की नई कहानियाँ लिख रही हैं। प्रो रेसलिंग लीग 2026: एक नई शुरुआत फिर से शुरू हो रही प्रो रेसलिंग लीग (PWL) एक बार फिर कुश्ती को चर्चा के केंद्र में लाने जा रही है। यह लीग अब और भी आधुनिक, पेशेवर और महिला-पुरुष दोनों खिलाड़ियों के लिए समान अवसरों वाली होगी। भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के सहयोग से यह लीग आईपीएल जैसी फ्रेंचाइज़ी प्रणाली पर आधारित होगी, जिसमें भारत के साथ-साथ विदेशी पहलवान भी मुकाबला करेंगे। लॉन्च के दौरान डब्ल्यूएफआई के प्रवक्ता ने कहा, “पीडब्ल्यूएल की वापसी सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि यह भारत की महिला पहलवानों को दुनिया के मंच पर अपनी पहचान बनाने का मौका देगी। हमारी महिला क्रिकेट टीम की शानदार सफलता के बाद, अब कुश्ती भारत की खेल क्रांति का अगला अध्याय लिखने के लिए तैयार है।” महिलाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान PWL 2026 की सबसे खास बात यह है कि यह लीग महिला खिलाड़ियों की भागीदारी और नेतृत्व को बढ़ावा देने पर खास ध्यान देगी। यह पहल महिलाओं को न सिर्फ पहलवानी के अखाड़े में, बल्कि खेल के हर स्तर पर आगे बढ़ने का अवसर देगी। लीग आयोजकों ने यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धता जताई है: हर टीम में महिला खिलाड़ियों को बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा। महिला मुकाबलों का प्रसारण प्राइम टाइम में किया जाएगा, ताकि उनकी लोकप्रियता और दर्शक संख्या बढ़े। उभरती हुई पहलवानों को अनुभवी चैंपियनों से जोड़ा जाएगा, ताकि वे उनसे सीख सकें और आगे बढ़ें। महिला खिलाड़ियों को बराबर इनामी राशि और स्पॉन्सरशिप के अवसर दिए जाएंगे। यह पहल भारत में खेलों में लैंगिक समानता (gender parity) की बढ़ती भावना को मजबूती देती है और देशभर की युवा लड़कियों के लिए कुश्ती को एक प्रेरणादायक करियर विकल्प के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखती है। पीडब्ल्यूएल के सीईओ अखिल गुप्ता ने कहा, “प्रो रेसलिंग लीग की वापसी सिर्फ एक खेल को फिर से शुरू करने की बात नहीं है, यह एक सपने को दोबारा जगाने की कोशिश है। हमारी महिला पहलवानों में वो काबिलियत, हौसला और जुनून है कि वे दुनिया के किसी भी मंच पर डटकर खड़ी हो सकती हैं। बराबर के अवसर और बेहतर पहचान के साथ, हम ऐसा भविष्य बना रहे हैं जहाँ कुश्ती हर लड़की को यह विश्वास दिलाए कि वह भी कर सकती है। यह सिर्फ एक लीग नहीं, बल्कि भारत में ताकत और बहनचारे का आंदोलन है।” क्रिकेट की प्रेरणा, कुश्ती का अवसर भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप जीत ने प्रशंसकों और प्रायोजकों की नज़र में महिला खिलाड़ियों की छवि को एक नई पहचान दी है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यह जोश अब महिला कुश्ती तक भी पहुँचेगा, जिससे प्रो रेसलिंग लीग (PWL) में कॉरपोरेट निवेश, विज्ञापन और दर्शकों की बढ़ती दिलचस्पी के नए अवसर खुलेंगे। पहले से ही भारत के पास साक्षी मलिक, अंतिम पंघाल और विनेश फोगाट जैसी विश्वस्तरीय पहलवान हैं। ऐसे में PWL देश में कुश्ती के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है — जो इस पारंपरिक ग्रामीण खेल को बदलकर राष्ट्रीय स्तर का प्राइम-टाइम खेल बना देगी। जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण और व्यापक दृष्टिकोण पीडब्ल्यूएल के पुनरुद्धार का मकसद सिर्फ खेल को दोबारा लोकप्रिय बनाना नहीं, बल्कि उसका विकासात्मक लक्ष्य भी है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की ट्रेनिंग अकादमियाँ अब युवा महिला पहलवानों को खोजने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू कर रही हैं। इसी के साथ, सरकारी योजनाएँ और सीएसआर समर्थित खेल संस्थान मिलकर कोचिंग, पोषण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव के लिए संसाधनों का विस्तार कर रहे हैं। यह दोहरा प्रयास – पेशेवर मंच और जमीनी विकास, भारत में कुश्ती को पेरिस 2028 ओलंपिक और आने वाले वर्षों में पदक की सबसे बड़ी उम्मीदों में बदलने की दिशा में एक मजबूत कदम है। निष्कर्ष: एक नए खेल समुदाय का उदय जब भारत अपनी महिला क्रिकेट टीम की जीत की खुशी मना रहा है, उसी समय प्रो रेसलिंग लीग 2026 की वापसी एक और प्रेरणादायक शुरुआत लेकर आई है। यह सिर्फ एक लीग नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जो भारत की महिला खिलाड़ियों की ताकत, समानता और नए अवसरों का प्रतीक है। मैदान से लेकर अखाड़े तक, भारत की बेटियाँ अब सिर्फ खेल नहीं रही हैं, बल्कि भारतीय खेलों की तस्वीर हमेशा के लिए बदल रही हैं।  

चिकन नेक क्षेत्र में भारत का नया गढ़, पड़ोसी देशों की रणनीति पर टिकी निगाह

नईदिल्ली  भारत ने बांग्लादेश के साथ अपनी संवेदनशील और लंबी सीमा पर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत ने शुक्रवार को तीन नई सैन्य छावनियों (गैरीसन) का उद्घाटन किया है। ये छावनियां असम के धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज, और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में स्थित हैं। ये तीनों गढ़ अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं। इन्हें भारतीय सेना व सीमा सुरक्षा बल (BSF) के लिए फोर्स मल्टीप्लायर यानी शक्ति में बढ़ोत्तरी माना जा रहा है। इन नई छावनियों का उद्देश्य 4096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा में मौजूद रणनीतिक कमजोरियों को दूर करना और किसी भी संभावित घुसपैठ या आपात स्थिति में तेजी से जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है। चिकन नेक पर नजर इस कदम का एक अहम भू-राजनीतिक पहलू भी है। उत्तर बंगाल का सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की पूर्वोत्तर दिशा में एकमात्र जमीनी कड़ी है। इसे सामरिक हलकों में चिकन नेक कहा जाता है। मात्र 22 किलोमीटर चौड़ी यह पट्टी देश के आठ पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि भारत से जोड़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कभी यह कॉरिडोर दुश्मन के निशाने पर आया, तो भारत के 4.5 करोड़ से अधिक नागरिकों वाले पूरे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पर संकट मंडरा सकता है। इसीलिए नई छावनियों का निर्माण भारतीय सैन्य लॉजिस्टिक और आर्थिक संपर्क को सुरक्षित रखने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। नई दिल्ली की रणनीतिक तैयारी रक्षा सूत्रों के अनुसार, इन छावनियों के साथ भारत ने सीमा पर आधुनिक उपकरणों, सड़क नेटवर्क और निगरानी प्रणालियों की तैनाती भी बढ़ा दी है। यह सब भारत की बॉर्डर मॉडर्नाइजेशन ड्राइव के तहत किया जा रहा है। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा कि नई छावनियां न केवल हमारी तैनाती को मजबूत करेंगी बल्कि घुसपैठ या बाहरी गतिविधियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने में भी मददगार होंगी। ढाका-रावलपिंडी समीकरण पर नजर इस सामरिक सुदृढ़ीकरण की टाइमिंग भी बेहद अहम मानी जा रही है। कुछ ही हफ्ते पहले, बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारियों की मेजबानी की थी। पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शामशाद मिर्जा ने ढाका पहुंचकर यूनुस से उनके जमुना निवास पर मुलाकात की। दोनों के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा हुई। हालांकि, भारतीय सुरक्षा हलकों में इस मुलाकात को सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं अधिक माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, ढाका और रावलपिंडी के बीच ऐसे और संवाद आने वाले हफ्तों में जारी रह सकते हैं, जिससे दिल्ली की सतर्कता और बढ़ गई है। भविष्य की तैयारी भारत की ओर से सीमा पर नए गढ़ों का निर्माण न केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम स्पष्ट करता है कि भारत अपने पूर्वी मोर्चे पर किसी भी भू-राजनीतिक अस्थिरता या पड़ोसी देशों के बदलते समीकरणों को लेकर चुपचाप लेकिन सख्त तैयारी में जुटा हुआ है।

Fitment Factor बढ़ने की तैयारी: 2026 से सरकारी कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले

नई दिल्ली केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए खुशखबरी आई है। लंबे इंतज़ार के बाद आखिरकार आठवें वेतन आयोग का गठन औपचारिक रूप से कर दिया गया है। यह आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, भत्ते और अन्य वित्तीय लाभों की समीक्षा करेगा और ज़रूरी सुधारों की सिफारिश केंद्र को सौंपेगा। इस फैसले से करीब 1 करोड़ से अधिक कर्मचारियों और पेंशनर्स को सीधा फायदा पहुंचने की संभावना है। आयोग का काम क्या होगा? सरकार ने आयोग के साथ उसका टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) भी जारी किया है। इसके तहत आयोग को कई अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं — मौजूदा वेतन ढांचे, सेवा शर्तों और रिटायरमेंट लाभों की गहन समीक्षा करना। देश की आर्थिक स्थिति, मुद्रास्फीति (महंगाई) और विकास दर को ध्यान में रखते हुए वेतन और पेंशन में संशोधन के सुझाव देना। सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ और कर्मचारियों की आय — दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना। हर 10 साल में सरकार नया वेतन आयोग गठित करती है ताकि कर्मचारियों की आय को महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप समायोजित किया जा सके। कब लागू होंगे नए वेतन नियम? पिछला, यानी सातवां वेतन आयोग, 1 जनवरी 2016 से प्रभावी हुआ था। उसी क्रम में माना जा रहा है कि आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू हो सकती हैं। सरकार ने आयोग को 18 महीने का समय दिया है ताकि वह सभी मंत्रालयों, विभागों और कर्मचारी संगठनों से विचार-विमर्श कर रिपोर्ट सौंप सके। अगर रिपोर्ट में देरी होती है, तो कर्मचारियों को एरियर (arrears) के रूप में बढ़ा हुआ वेतन मिल सकता है। कितना बढ़ेगा वेतन और पेंशन? कर्मचारियों के लिए सबसे अहम रहेगा फिटमेंट फैक्टर (Fitment Factor) — यानी पुराने वेतन से नए वेतन में कितनी गुना बढ़ोतरी होगी। सातवें वेतन आयोग में यह 2.57 था। जानकारों का अनुमान है कि इस बार यह 2.8 से 3.0 के बीच रह सकता है। अगर ऐसा होता है तो कर्मचारियों के बेसिक पे (Basic Pay) में उल्लेखनीय इज़ाफा देखा जा सकता है। इसके साथ ही, महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया भत्ता (HRA) और अन्य Allowances में भी बदलाव संभव है, जिससे पेंशनर्स को भी सीधा लाभ मिलेगा। क्यों अहम है यह फैसला? सरकार का उद्देश्य है कि वेतन वृद्धि आर्थिक रूप से टिकाऊ हो — यानी न तो सरकारी बजट पर असंतुलित दबाव पड़े और न ही कर्मचारियों की वास्तविक आय घटे। 8वां वेतन आयोग इसलिए खास है क्योंकि यह एक ऐसे दौर में आ रहा है जब महंगाई दर बढ़ रही है, और सरकारी कर्मचारियों के लिए यह राहत भरी खबर साबित हो सकती है।  

FASTag से जुड़ा बड़ा अपडेट: अब Toll पर ये गलती पड़ी तो तुरंत भरना पड़ेगा Fine!

नई दिल्ली अगर आपकी कार का FASTag टोल प्लाजा पर स्कैन नहीं हो रहा या “इनवैलिड टैग” दिखा रहा है, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। हाल ही में ऐसे कई वाहन चालकों को समस्या का सामना करना पड़ा है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अब इस स्थिति को देखते हुए FASTag से जुड़ा एक नया नियम लागू किया है। क्या है FASTag KYV प्रक्रिया? FASTag KYV यानी “Know Your Vehicle Verification” एक नई वेरिफिकेशन प्रक्रिया है जिसे NHAI ने अनिवार्य किया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर FASTag उसी वाहन पर इस्तेमाल हो जिसके लिए उसे जारी किया गया है — ताकि गलत टैग या फर्जीवाड़े की घटनाओं को रोका जा सके। इस प्रक्रिया में वाहन मालिक को यह साबित करना होता है कि उसका FASTag सही वाहन पर लगा है। इसके लिए गाड़ी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) और वाहन की फोटो अपलोड करनी होती है। FASTag KYV में हुए नए बदलाव कई यूज़र्स की शिकायतों के बाद NHAI ने इस प्रक्रिया को आसान बना दिया है। अब नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए गए हैं: ➤ अब पहले की तरह कई फोटो अपलोड नहीं करनी होंगी — केवल एक फ्रंट फोटो काफी है, जिसमें नंबर प्लेट और FASTag स्टिकर साफ दिखाई दें। ➤ वाहन नंबर दर्ज करते ही सिस्टम अपने आप Vahan डेटाबेस से RC की जानकारी ले आएगा। ➤ अगर वेरिफिकेशन अधूरा रह जाए, तो FASTag तुरंत बंद नहीं होगा, बल्कि NHAI वाहन मालिक को SMS रिमाइंडर भेजेगा। ➤ अगर एक मोबाइल नंबर पर कई FASTag रजिस्टर्ड हैं, तो अब आप खुद चुन सकते हैं कि किस वाहन का KYV पहले पूरा करना है। ➤ दस्तावेज़ अपलोड में दिक्कत आने पर बैंक या FASTag जारी करने वाला संस्थान सीधे ग्राहक से संपर्क करेगा। FASTag KYV करने का आसान तरीका ➤ अगर आपका FASTag काम नहीं कर रहा है, तो नीचे दिए स्टेप्स फॉलो करें ➤ सबसे पहले जाएं — https://fastag.ihmcl.com अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से लॉगिन करें। ➤ वाहन की फ्रंट फोटो अपलोड करें, जिसमें नंबर प्लेट और विंडशील्ड पर लगा FASTag साफ दिखे। ➤ सिस्टम अपने आप RC की डिटेल्स भर देगा — उन्हें चेक करें और सबमिट करें। ➤ अगर टैग सही वाहन पर है और उसका गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो FASTag दोबारा एक्टिवेट हो जाएगा। क्यों जरूरी है यह वेरिफिकेशन? NHAI के अनुसार, हाल में कई मामलों में पाया गया कि कुछ लोग एक वाहन का FASTag दूसरे वाहन में इस्तेमाल कर रहे थे। इससे न केवल टैग सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा था, बल्कि टोल कलेक्शन की पारदर्शिता पर भी असर पड़ रहा था। इसलिए अब यह KYV प्रक्रिया अनिवार्य कर दी गई है ताकि हर वाहन की पहचान और उसका टैग एक-दूसरे से लिंक रहे।  

नई कृषि क्रांति की तैयारी – ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होगी स्मार्ट खेती

नई दिल्ली.  भारत में कृषि अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि तकनीक का संगम बन चुकी है. एग्री-टेक यानी कृषि प्रौद्योगिकी ने किसानों की मेहनत को आधुनिक साधनों से जोड़कर खेती को लाभकारी बना दिया है. ड्रोन से लेकर सेंसर्स, डेटा एनालिटिक्स और मोबाइल ऐप्स तक- हर स्तर पर तकनीक का असर दिखने लगा है. अब किसान मौसम की सटीक जानकारी, मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की पैदावार का अनुमान डिजिटल साधनों से कर पा रहे हैं. इससे न सिर्फ उत्पादकता बढ़ रही है, बल्कि लागत में भी बड़ी कमी आई है. केंद्र सरकार की योजना परवान चढ़ी तो देश में कृषि अब हल-बैल से नहीं, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ), रोबोट और बीजों की जीन एडिटिंग से चलेगी। पानी की बर्बादी शून्य होगी और भरपूर पैदावार से अन्नदाता किसान की आय मौजूदा स्तर से दोगुनी हो सकती है। नीति आयोग ने अगले पांच साल के लिए देश में खेती का रोडमैप जारी करते हुए यह सपना दिखाया है जो सच भी हो सकता है। नीति आयोग ने रोडमैप के रूप में विजन डॉक्यूमेंट ‘रीइमैजिनिंग एग्रीकल्चर : रोडमैप फॉर फ्रंटियर टेक्नोलॉजी लेड ट्रांसफॉर्मेशन’ तैयार किया है। इस डॉक्यूमेंट में कृषि में 100 प्रतिशत आत्मनिर्भता लाने के लिए ऐसी तकनीकों को चुना है, जिसके जरिए देश की कृषि में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। ये तकनीकें क्लाइमेट चेंज, पानी की कमी, मिट्टी की थकान और बाजार की अनिश्चितता को खत्म करने में मददगार बनेगी। रोडमैप पर प्रभावी अमल से अगले 5 साल में देश मेें कृषि लागत 40 प्रतिशत घटने का अनुमान जताया गया है। कृषि लागत को ही किसानों की खुशहाली और खेती को लाभकारी बनाने में सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। रोडमैप से कृषि उत्पादन में 60 प्रतिशत बढ़ोतरी होगी। स्मार्ट फार्मिंग: खेतों से जुड़ी स्मार्ट सोच ‘स्मार्ट फार्मिंग’ अब भारतीय गांवों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह तकनीक खेती के हर चरण में वैज्ञानिक नजरिया अपनाने पर आधारित है. उदाहरण के लिए, ड्रोन के जरिए फसलों पर छिड़काव से समय और पानी दोनों की बचत होती है. वहीं, सेंसर से मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की निगरानी कर किसान तय कर सकते हैं कि किस समय कितनी सिंचाई या खाद की जरूरत है. कई स्टार्टअप्स किसानों को मोबाइल ऐप्स के माध्यम से बाजार भाव, बीज चयन, और फसल बीमा की जानकारी भी दे रहे हैं. इससे किसान पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर और जागरूक हो रहे हैं. डिजिटल एग्रीकल्चर से नए अवसर सरकार और निजी कंपनियां मिलकर ‘डिजिटल एग्रीकल्चर’ को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं. प्रधानमंत्री किसान ड्रोन योजना, डिजिटल किसान पोर्टल, और ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) जैसी पहलों ने किसानों के लिए तकनीक को सुलभ बना दिया है. आज किसान अपने स्मार्टफोन से सीधे मंडियों से जुड़ सकते हैं और बिचौलियों से बचकर बेहतर दाम पा सकते हैं. इसके अलावा, सैटेलाइट इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकें फसलों की स्थिति पर नज़र रखती हैं और समय रहते चेतावनी भी देती हैं. इससे फसल नुकसान की संभावना काफी घट गई है. आधुनिक तकनीक से आत्मनिर्भर किसान एग्री-टेक ने भारतीय कृषि को नई दिशा दी है. जहां पहले खेती को जोखिम भरा माना जाता था, वहीं अब यह इनोवेशन और उद्यमिता का क्षेत्र बन चुका है. युवा किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ जैविक, हाइड्रोपोनिक और प्रिसिशन फार्मिंग जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं. इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है. भारत धीरे-धीरे ‘स्मार्ट एग्रीकल्चर इकोनॉमी’ की ओर बढ़ रहा है, जहां तकनीक और परंपरा मिलकर एक स्थायी कृषि भविष्य की नींव रख रहे हैं. संक्षेप में भारत में एग्री-टेक सिर्फ खेती का आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि किसानों की जिंदगी में नई उम्मीदों की बुआई है. तकनीक ने साबित कर दिया है कि अगर सही जानकारी और संसाधन मिलें, तो खेत भी डिजिटल इंडिया की ताकत बन सकते हैं. फ्रंटियर टेक्नोलॉजी : खेत से लैब तक ड्रोन फार्मिंग : एक घंटे में 50 एकड़ पर कीटनाशक छिड़काव, 80% दवा बचत। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व मशीन लर्निंग (एआइ/एमएल): मौसम, कीट, बीमारी का 100% सटीक पूर्वानुमान। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आइओटी) : मिट्टी की नमी, पीएच, पोषक तत्व 24 घंटे सातों दिवस मोबाइल पर। सैटेलाइट इमेजरी : बादल पार कर फसल की लाइव तस्वीर, सूखा-बाढ़ अलर्ट। ब्लॉकचेन : बीज से बाजार तक पारदर्शी चेन, नकली खाद-बीज खत्म। रोबोटिक्स : बुवाई, निराई, कटाई सब ऑटोमैटिक, मजदूरों की कमी दूर। जीन एडिटिंग (सीआरआइएसपीआर ) : 2 साल में सूखा, कीट, नमक रोधी नई किस्में। प्रिसिजन फार्मिंग : हर पौधे को अलग खाद-पानी, 30% लागत में होगी बचत। वर्टिकल फार्मिंग : शहरों में की छतों पर 10 मंजिला खेत, 1 एकड़ यानी 10 एकड़ यील्ड पर फॉर्मिंग। हाइड्रोपोनिक्स : बिना मिट्टी, 90 प्रतिशत कम पानी, साल भर फसल। एरोपोनिक्स : हवा में उगाएं सब्जी, पानी की बूंद भी न बर्बाद। बिग डेटा एनालिटिक्स : हर गांव, हर फसल का अलग ‘डिजिटल फॉर्मूला’। साल दर साल ऐसे कदम वर्ष –लक्ष्य — यह होगा 2026- पायलट प्रोजेक्ट – 10 राज्यों में ड्रोन एआइ हब, 1 लाख एकड़ कवर 2027- डिजिटल पहुंच – 50 प्रतिशत किसानों को मुफ्त ऐप, सैटेलाइट डेटा, आइओटी किट मिलेंगे 2028 –ग्लोबल मार्केट- ब्लॉक चेन से सीधे निर्यात, 10 लाख टन ऑर्गेनिक 2029—रोबोट क्रांति-— 500 रुपए /दिन रोबोट किराया, 50,000 यूनिट डिप्लॉय 2030—स्मार्ट विलेज-–हर गांव में ‘डिजिटल खेत’, आय दोगुनी की गारंटी किसानो को ऐसे लाभ आय: 1 एकड़ में गेहूं से मौजूदा 25,000 रुपए से बढ़कर 2030 में 70,000 रुपए लागत कम: 40% कम होगी (खाद-पानी-दवा) उत्पादन बढ़ेगा : 60% बढ़ेगा पानी बचत : 90% (हाइड्रो/एरोपोनिक्स) बाजार उपलब्धता: 100% (ब्लॉकचेन) फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर : कृषि-टेक फंड : 50,000 करोड़ रुपए ड्रोन दीदी : 1 लाख महिलाओं को ट्रेनिंग। एआइ लैब: हर जिले में 1 एआइ लैब बनेगी। फ्री स्मार्टफोन: 10 करोड़ किसानों को रोबोट बैंक: 1 लाख यूनिट रेंट पर खुलेगा। सब साथ आएंगे होंगे सफल यह यात्रा अकेले सरकार की नहीं है। यह तभी सफल होगी जब किसान, वैज्ञानिक, उद्यमी, निवेशक और नीति-निर्माता एक साथ आएं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि खेतों तक पहुंचे। जहां यह वास्तव में बदलाव ला सकें। यह रोडमैप ऐसे भविष्य का एक आह्वान है, जहां भारत … Read more

खोई हुई जिंदगी वापस मिली: आतंकियों से आजाद हुए बंधक ने बताई परेशान कर देने वाली आपबीती

तेल अवीव उन्होंने मेरे सारे कपड़े, मेरा अंडरवियर, सब कुछ उतार दिया. जब मैं पूरी तरह से नंगा हो गया तब…. यह कहते हुए 21 साल के शख्स की आवाज धीमी हो गई. वह थोड़ा संभले फिर बोले कि जब एक पुरुष बंधक के तौर पर मैं बिना भोजन और पानी के मर रहा था. मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी – मुझे बचा लो, मुझे इस संकट से बाहर निकालो. रोम ब्रास्लास्की हाल ही में हमास के चंगुल से आजाद हुए हैं. वह पहले पुरुष इजरायली बंधक हैं जिन्होंने खुलकर आरोप लगाया है कि गाजा में बंदी रहते हुए उनका यौन उत्पीड़न किया गया.   7 अक्टूबर को उस इवेंट पर हमले के समय जब उन्हें अगवा किया गया, वह सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर काम कर रहे थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने फिलस्तीनी इस्लामिक जिहाद की ओर से बंधक बनाए जाने के बाद अपने साथ हुई आपबीती साझा की है. सीएनएन ने फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद से इस रिपोर्ट पर संपर्क करने की कोशिश की लेकिन आतंकी संगठन की ओर से कोई जानकारी नहीं मिल पाई. इससे पहले सोसना नाम की युवती ने आरोप लगाया था कि जब वह हमास की बंधक थी तो गार्ड ने बंदूक की नोक पर उसका यौन शोषण किया.  अब ब्रास्लास्की ने कहा है कि वह निश्चित रूप से यौन शोषण था. उन्होंने कहा कि मेरे साथ जो हुआ, वो यौन हिंसा थी और इसका मकसद मुझे अपमानित करना था. वे मेरे आत्मसम्मान पर हमला करना चाहते थे और उन्होंने वही किया. इस इंटरव्यू को पिछले हफ्ते ही रिकॉर्ड किया गया है. यह वीडियो सोशल मीडिया पर आ गया है जिसे कई इजरायली शेयर कर रहे हैं.  वह कहते हैं कि मेरे लिए उस टाइम के बारे में बात करना काफी मुश्किल है. ब्रास्लास्की उन आखिरी 20 जीवित बंधकों में से एक हैं जिन्हें इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम समझौते के तहत दो साल से ज्यादा समय कैद में रहने के बाद पिछले महीने रिहा किया गया. उन्हें फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद संगठन ने बंधक बना रखा था, जो गाजा में हमास से संबद्ध एक फिलिस्तीनी आतंकी समूह है. खाने के बदले धर्म बदलने को कहा हमास के आतंकियों ने इस साल की शुरुआत में काफी कमजोर हो चुके ब्रास्लास्की का वीडियो जारी किया था. तस्वीर देखकर भावुक पिता ने कहा था कि वह अपने बेटे को पहचान नहीं पा रहे हैं. उनकी मां ने इजरायली मीडिया को बताया है कि उस पर खाना खाने (खाना देने) के बदले इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डाला गया था. मैं नर्क में रहा यौन उत्पीड़न पर ब्रास्लास्की ने कहा कि यह एक भयावह घटना थी. आप बस ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि यह रुक जाए. और जब मैं वहां था तो हर दिन, पिटाई… मैं खुद से कहता था कि मैं नर्क में एक दिन और जी चुका हूं. कल सुबह, मैं एक और नर्क में जागूंगा. कुछ और बंधकों ने आरोप लगाया है कि हमास की कैद में उनके साथ यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार किया गया. हालांकि हमास की तरफ से इसका खंडन किया जाता रहा है. नया खुलासा इसलिए चौंकाता है क्योंकि अब तक, केवल महिला बंधक ही आगे आई थी, पहली बार किसी पुरुष ने यह आरोप लगाया है.