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सरकार ने जारी किए वाहन-सारथी-फास्टैग डेटा एक्सेस नियम, यूज़र्स की प्राइवेसी पर रहेगा खास ध्यान

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने नेशनल ट्रांसपोर्ट रिपॉजिटरी (NTR) से जुड़ी नई नीति पेश की है। यह डेटाबेस पूरे देश के वाहन पंजीकरण, ड्राइविंग लाइसेंस, चालान और सड़क हादसों के रिकॉर्ड को जोड़ता है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) (एमओआरटीएच) ने इस महीने की शुरुआत में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को "नेशनल ट्रांसपोर्ट रिपॉजिटरी से डेटा साझा करने की नीति" भेजी। कौन-कौन से प्लेटफॉर्म जुड़े हैं इस रिपॉजिटरी में वाहन, सारथी, ई-चालान, eDAR (ई-डार) (इलेक्ट्रॉनिक एक्सीडेंट रिपोर्ट) और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन फास्टैग जैसे प्लेटफॉर्म से डेटा लिया जाता है। इसमें 39 करोड़ से ज्यादा वाहनों और 22 करोड़ से अधिक ड्राइविंग लाइसेंस का रिकॉर्ड मौजूद है। इस लिहाज से यह देश का सबसे बड़ा सरकारी डेटाबेस माना जा सकता है। प्राइवेसी और कानूनी सुरक्षा सरकार का कहना है कि संवेदनशील पर्सनल डेटा की "कंट्रोल्ड शेयरिंग" होगी, ताकि नागरिकों की प्राइवेसी (निजता) बनी रहे। यह नियम डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 और मोटर व्हीकल एक्ट 1988 के अनुरूप होंगे। मंत्रालय ने 18 अगस्त को जारी एक परिपत्र में कहा, "यह नीति व्यक्तिगत डेटा साझा करने के लिए सहमति के संबंध में हाल की कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करती है।" हर स्टेकहोल्डर को वही डेटा मिलेगा जो उसके काम से जुड़ा होगा। जहां जरूरत होगी वहां नागरिक की सहमति भी अनिवार्य होगी। मंत्रालय ने साफ किया कि हर ट्रांजैक्शन में सुरक्षा और गोपनीयता को प्राथमिकता दी जाएगी। किसे मिलेगी कितनी पहुंच इस नई नीति के तहत पुलिस और जांच एजेंसियों को पूरे डेटाबेस की पूरी पहुंच मिलेगी। राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश सिर्फ अपने-अपने क्षेत्र का डेटा देख पाएंगे। और देशभर का डेटा शेयर करने के लिए उन्हें MoRTH से मंजूरी लेनी होगी। सरकारी एजेंसियों को API इंटीग्रेशन के जरिए डेटा तक पूरी पहुंच दी जाएगी। वहीं रिसर्च और शैक्षणिक संस्थानों को केवल अनाम (बिना नाम वाला) डेटा उपलब्ध कराया जाएगा। आम नागरिकों की पहुंच सीमित होगी। वे mParivahan और DigiLocker जैसे एप पर दिन में केवल तीन बार तक ही वेरिफिकेशन कर पाएंगे। दूसरी ओर, बीमा कंपनियों, बैंकों, स्मार्ट कार्ड वेंडर और नंबर प्लेट बनाने वाली कंपनियों जैसी प्राइवेट सेवाओं को उनकी भूमिका के हिसाब से डेटा तक पहुंच मिलेगी, लेकिन इसके लिए सख्त सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा। डेटा शेयरिंग के तरीके डेटा शेयरिंग के लिए हर प्लेटफॉर्म की अलग भूमिका तय की गई है। वाहन से गाड़ी का रजिस्ट्रेशन, मालिकाना हक, इंश्योरेंस और चालान की जानकारी मिलेगी। सारथी  से ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता, अंतरराष्ट्रीय परमिट और अपराध का रिकॉर्ड मिलेगा। ई-चालान से ट्रैफिक उल्लंघन और कोर्ट केस की जानकारी मिलेगी, जबकि ई-डार (eDAR) से सड़क हादसे से जुड़े ड्राइवर, पैसेंजर और पैदल यात्री का डेटा मिलेगा। FASTag के जरिए गाड़ी से जुड़े बैंक अकाउंट और टोल ट्रांजैक्शन की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार ने डेटा शेयरिंग का सबसे सुरक्षित तरीका API-आधारित एक्सेस को माना है, जिसमें ऑथेंटिकेशन, एन्क्रिप्शन और IP वाइटलिस्टिंग जैसी सुविधाएं होंगी। सरकारी विभाग आधार-वेरीफाइड पोर्टल से डेटा एक्सेस कर पाएंगे। प्राइवेट कंपनियों को नागरिक की सहमति के आधार पर एक्सेस मिलेगा और आम लोग केवल अपने व्यक्तिगत डेटा की वेरिफिकेशन कर पाएंगे। बड़े पैमाने पर डेटा ट्रांसफर केवल खास मामलों में ही होगा, वो भी एन्क्रिप्टेड माध्यम से। रिसर्च और पब्लिक यूज के लिए डेटा सरकार के data.gov.in पोर्टल पर अनाम रूप में उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार का उद्देश्य सरकार का मानना है कि यह नया फ्रेमवर्क ट्रांसपोर्ट सेवाओं को ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और प्रभावी बनाएगा। इससे कारोबार करना आसान होगा और डेटा के गलत इस्तेमाल पर भी कड़ी रोक लगाई जा सकेगी।

ट्रंप को करारा झटका, चावल के दाने पर रुक गई करोड़ों की डील

नई दिल्ली  हर देश की अपनी कुछ सांस्कृतिक और लोक मान्यताएं होती हैं. इसकी वजह से वो किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करते हैं. ये न सिर्फ राजनीतिक बल्कि कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव ले आती हैं. कई बार ये सामने आ जाती हैं तो कई बार समझने पर पता चलता है कि जो दिख रहा है, वैसा है नहीं. कुछ ऐसा ही चल रहा है इस वक्त जापान में, जहां अमेरिका से साथ टैरिफ घटाने पर होने वाली एक डील होते-होते रुक गई. 550 अरब डॉलर के मेगा निवेश समझौते की प्रक्रिया अचानक ही रुक गई. जापान के कारोबार सलाहकार रयोसेई अकाजावा ने अमेरिका जाना था लेकिन उनका दौरा आखिरी मिनट में रद्द कर दिया. अकाजावा का यह दौरा अमेरिकी वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक के साथ फाइनल बातचीत के लिए तय था. निवेश पैकेज की घोषणा इसी हफ्ते की जानी थी, जिसमें मुनाफे के बंटवारे जैसी अहम बातें तय होनी थी. क्या है ये पूरा निवेश समझौता, जो थम गया अमेरिका और जापान के बीच सहमति बनी थी कि अगर जापान यह 550 अरब डॉलर का मेगा इनवेस्टमेंट करता है, तो टोक्यो पर लगने वाले टैरिफ 25% से घटाकर 15% कर दिए जाएंगे. हालांकि इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक अजीबोगरीब बयान देते हुए कहा – ‘यह पैसा हमारा है, हम जैसे चाहें वैसे लगाएंगे’. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस इनवेस्टमेंट का 90 फीसदी मुनाफा अपने पास रखेगा, बस यहीं जापान की बात बिगड़ गई. जापानी सरकार की ओर से कहा गया है कि कुछ अहम बिंदुओं पर सहमति नहीं बनने की वजह से दौरा रद्द किया गया है. इसमें ऑटो पार्ट्स पर तुरंत टैरिफ हटाना और पुराने कार्यकारी आदेश में बदलाव करना शामिल है. ‘चावल’ का है अहम रोल इस पूरे मामले में अहम भूमिका जापानी चावल की है. दरअसल जापान और अमेरिका के समझौते की प्रक्रिया मई से ही चल रही है. अब मु्द्दा ये है कि डोनाल्ड ट्रंप हमेशा की तरह अपनी शर्तों पर निवेश चाहते हैं. उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ये भी लिख दिया था कि जापान ने अमेरिका के लिए अपना एग्रीकल्चर सेक्टर खोल दिया है. यहां मामला सीधा चावल से जुड़ा था. जापानी किसान कभी नहीं चाहते हैं कि अमेरिका का चावल जापानी बाजारों में आए, जिसे लेकर पहले भी विरोध हो चुका है. दशकों से यहां अमेरिकी चावल का विरोध होता रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि ये सस्ता चावल किसानों के बाजार को खत्म कर देगा. जापानी लोग स्टिकी राइस खाते हैं और वे इसे पौष्टिक मानते हैं. दूसरी तरफ चावल जापान में सांस्कृतिक पहचान माना जाता है. जापानी लोग इसे अपने गांव से जोड़कर देखते हैं. भले ही जापान में बाकी भोजन आयात होता हो लेकिन उनकी कोशिश रहती है कि चावल घरेलू उत्पादन तक ही सीमित रहे, भले ही उनकी कीमतें ज्यादा हों. जापान का चावल आयात वैसे तो जापान में चावल का आयात होता लेकिन अमेरिकी चावल का ज्यादा विरोध है क्योंकि ये सस्ता होता है. जापान टैरिफ बढ़ने की सूरत में जापान से चावल का आयात कम कर चुका ह, जिसे अमेरिका बढ़ाना चाहता है. वहीं भारत का जापान में चावल का निर्यात पिछले दो सालों में बढ़ा है. साल 2024 में जापान ने भारत से $5.74 मिलियन का चावल आयात किया जो साल 2023 ( $2.08 मिलियन) की तुलना में दोगुने से ज्यादा था. ऐसे में अमेरिका से अगर जापान चावल आयात नहीं करता, तो भारत से उसकी डील हो सकती है.

जनसंख्या बदलाव का असर: असम के 11 जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक, मुस्लिम बहुल इलाके बढ़े

दिसपुर  उत्तर प्रदेश के संभल की डेमोग्राफी बदल गई है. संभल हिंसा पर बनी कमेटी की रिपोर्ट चौंकाने वाली है. संभल में हिंदू आबादी घट गई है. रिपोर्ट की मानें तो संभल नगर पालिका क्षेत्र में हिंदू आबादी आजादी के समय 45 फीसदी थी. अब यह घटकर 15 फीसदी रह गई है. इस पर अब सियासत भी तेज हो चुकी है. हालांकि, हकीकत देखें तो संभल तो अभी झांकी है. इससे अधिक तो असम चौंकाता है. असम में ऐसे कम से कम 11 जिले हैं, जहां की डेमोग्राफी में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है. असम में कम से कम 11 जिलों में हिंदू बहुसंख्यक से अल्पसंख्यक हो चुके हैं. खुद असम के मुख्यमंत्री का कहना है कि 2041 तक राज्य में मुस्लिमों और हिंदुओं की आबादी 50-50 हो सकती है. दरअसल, साल 2011 की जनगणना के अनुसार दावा किया जा रहा है कि असम के 11 जिलों में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो गई है, जहां हिंदू अब अल्पसंख्यक हैं. इन जिलों में अवैध घुसपैठ, जन्म दर में अंतर और प्रवासन को मुख्य कारण माना जा रहा है. यह स्थिति उत्तर प्रदेश के संभल जिले की हालिया जांच रिपोर्ट से काफी मिलती-जुलती है, जहां भी डेमोग्राफिक शिफ्ट में हिंदू आबादी घट गई है. असम के ये 11 जिले, जहां मुस्लिम हो गए बहुसंख्यक     धुबरी- 79.67% मुस्लिम     गोलपारा- 57.52% मुस्लिम     बरपेटा- 70.74% मुस्लिम     मोरीगांव- 52.56% मुस्लिम     नागांव- 55.36% मुस्लिम     दरांग-64.34% मुस्लिम     हैलाकांडी- 60.31% मुस्लिम     करीमगंज-56.36% मुस्लिम     बोंगाईगांव – 50.22% मुस्लिम     साउथ सलमारा-मानकाचार- डेटा उपलब्ध नहीं     होजाई- डेटा उपलब्ध नहीं राज्य में कैसे घटते गए हिंदू? दरअसल, 2011 की जनगणना के अनुसार, असम की कुल मुस्लिम आबादी 1.07 करोड़ थी. यह राज्य के कुल 3.12 करोड़ निवासियों का 34.22 प्रतिशत थी. राज्य में 1.92 करोड़ हिंदू थे, जो कुल जनसंख्या का करीब 61.47 प्रतिशत था. 2011 की जनगणना के अनुसार कम से कम नौ जिले मुस्लिम बहुल थे. जबकि 2001 में यह संख्या महज छह थी . अभी मौजूदा समय में यह संख्या बढ़कर कम से कम 11 हो गई है. 2001 में कितने जिले मुस्लिम बहुल? 2001 में जब असम में 23 जिले थे, तब छह जिलों में मुस्लिम बहुल थे. धुबरी (74.29), गोलपाड़ा (53.71), बारपेटा (59.37), नागांव (51), करीमगंज (52.3) और हैलाकांडी (57.63). क्या है कारण? असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का मानना है कि हिंदुओं की घटती आबादी की वजह बांग्लादेशी घुसपैठ है. इसके अलावा विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च जन्म दर, प्रवासन और भूमि अतिक्रमण जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं. अनुमान के मुताबिक, अगले कुछ सालों में राज्य में हिंदू आबादी 61% से घटकर अनुमानित 50% के करीब पहुंच सकती है, जबकि मुस्लिम 34% से बढ़कर 40% से अधिक हो सकती है. अगर सीएम की मानें तो 2041 तक दोनों की आबादी बराबर हो जाएगी, अगर इसी अनुपात से डेमोग्राफी में बदलाव होते रहे तो. संभल से जैसा असम में हाल? असम में यह डेमोग्राफिक बदलाव, उत्तर प्रदेश के संभल से मिलती जुलती है. संभल की रिपोर्ट में डेमोग्राफिक बदलाव को ‘साजिश’ बताया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, 1947 में संभल नगर पालिका क्षेत्र में हिंदू 45% थे, जबकि मुस्लिम 55%. आज हिंदू घटकर 15 फीसदी रह गए हैं. मुस्लिम 85% हो गए हैं. जांच समिति ने इसे ‘व्यवस्थित परिवर्तन’ माना, जिसमें हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया गया और आबादी का ‘एथनिक क्लीनिंग’ जैसा असर हुआ.

शिक्षा का अजीब हाल: 8 हजार स्कूलों में स्टूडेंट ही नहीं, 1 लाख में सिर्फ 1 टीचर

नई दिल्ली शिक्षा मंत्रालय की नई UDISE+ (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन) रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, भारत में पहली बार स्कूल शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ के पार पहुंच गई है. यह उपलब्धि देश की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव मानी जा रही है क्योंकि इससे न केवल शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ी है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और स्टूडेंट-टीचर अनुपात (Student-Teacher Ratio) में भी सुधार हुआ है. महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ी  देश में महिला शिक्षकों की संख्या में भी साल 2014 के तुलना में इजाफा हुआ है. शिक्षा मंत्रालय के रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 से अभी तक 51.36 लाख शिक्षकों की भर्ती की जा चुकी है, जिनमें से 61 प्रतिशत महिलाएं हैं. मौजूदा समय में जहां पुरुष शिक्षकों की संख्या 46.41 लाख हैं. वहीं, महिला शिक्षकों की संख्या 54.81 लाख हैं.  भारत में कुल स्कूलों की संख्या 14.71 लाख है, जिसमें 69 प्रतिशत सरकारी हैं और इनमें कुल छात्रों के नामांकन का दर 49 प्रतिशत है. वहीं, देश में कुल प्राइवेट स्कूलों की संख्या 26 प्रतिशत है, लेकिन ये देश के 41 प्रतिशत छात्रों को शिक्षा प्रदान करते हैं. वहीं, देश के कुल शिक्षकों में से 51 प्रतिशत शिक्षक सरकारी स्कूलों में और 42 प्रतिशत शिक्षक प्राइवेट स्कूलों में हैं.  UDISE Report: शिक्षकों की संख्या में बढ़ोतरी रिपोर्ट के मुताबिक, 2022-23 की तुलना में 2024-25 में शिक्षकों की संख्या में 6.7% की वृद्धि हुई है. अब देश में अलग-अलग स्तरों पर स्टूडेंट-टीचर अनुपात अलग-अलग है. शिक्षकों की संख्या में वृद्धि छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने और शिक्षकों की उपलब्धता में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.      क्या है डेमोग्राफिक चेंज? 3 प्वाइंट में समझें, संभल हिंसा पर सौंपी गई रिपोर्ट में इसपर क्यों हुई है चर्चा     ट्रंप टैरिफ जारी रहा, तो भारत के निर्यात पर पड़ेगा भारी असर; विशेषज्ञों ने बताया स्थिति से निपटने का तरीका     शरीर पर 36 जख्म और पोस्टमार्टम में निकली 17 गोलियां, झारखंड के चर्चित नीरज सिंह हत्याकांड को जानिए स्टूडेंट-टीचर रेशियो (PTR) और बेहतर परिणाम यूडीआईएसई प्लस (UDISE Plus) की रिपोर्ट के अनुसार आधारभूत, प्राथमिक, मध्य और माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात क्रमशः 10, 13, 17 और 21 है. यह अनुपात राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में सुझाए गए 1:30 से कहीं बेहतर है. रिपोर्ट बताती है कि कम अनुपात होने से शिक्षक और छात्रों के बीच संवाद बेहतर होता है, जिससे पढ़ाई आसान बनती है और परिणाम भी अच्छे आते हैं. छात्रों के स्कूल छोड़ने के दर में गिरावट  शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के स्कूल छोड़ने के दर में भी गिरावट आई है. प्राइमरी लेवल पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या एक साल में 3.7 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिशत हो गई है. मिडिल लेवल पर स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या 1 साल में 5.2 प्रतिशत से घटकर 3.5 प्रतिशत और सेकेंडरी लेवर पर 10.9 प्रतिशत से घटकर 8.2 प्रतिशत हो गई है. इसी प्रकार छात्रों के स्कूल में बने रहने के दर में भी वृद्धि हुई है. प्राइमरी लेवल पर बच्चों के स्कूल में बने रहने का दर एक साल में 85.4 प्रतिशत से बढ़कर 92.4 प्रतिशत हो गई है. वहीं, मिडिल लेवल पर एक साल में 78 प्रतिशत से बढ़कर 82.8 प्रतिशत और सेकेंडरी लेवल पर यह एक साल पहले में 45.6 प्रतिशत से बढ़कर 47.2 प्रतिशत हो गई है.  महिला शिक्षकों की संख्या तेजी से बढ़ी ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2023-24 के सत्र में कुल शिक्षक 98.83 लाख थे, जो अब 1 करोड़ 1 लाख 22 हजार 420 हो गए हैं। इनमें से 51% (51.47 लाख) शिक्षक सरकारी स्कूलों में हैं। एक दशक में महिला शिक्षकों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। 2014-15 में पुरुष शिक्षक 45.46 लाख और महिला 40.16 लाख थीं, जो 2024-25 में बढ़कर क्रमश: 46.41 लाख और 54.81 लाख हो गई हैं। बीते दशक में महिला शिक्षकों की संख्या करीब 8% बढ़ने की बड़ी वजह इनकी भर्तियां हैं। 2014 से अब तक 51.36 लाख भर्तियों में से 61% महिला शिक्षकों की हुई हैं। पीपुल-टीचर रेश्यो: अब 21 छात्रों पर एक शिक्षक, पहले 31 पर थे     मिडिल स्तर पर 10 साल पहले एक शिक्षक के पास 26 छात्र थे, जो घटकर 17 रह गए हैं। सेकंडरी स्तर पर यह 31 से घटकर 21 रह गया है। यानी छात्र व शिक्षकों के बीच संवाद बेहतर हो रहा है। शिक्षकों के पास जितने कम छात्र होंगे, वे उन्हें ज्यादा समय दे पाएंगे।     ड्रॉपआउट रेट घटा है। सेकंडरी पर 2023-24 में यह 10.9% था, जो 2024-25 में 8.2% बचा है। मिडिल स्तर पर यह 5.2% की तुलना में 3.5% और प्राथमिक पर 3.7% से घटकर 2.3% रह गई है।     प्राथमिक पर रिटेंशन रेट 2023-24 में 85.4% से बढ़कर अब 92.4 % हो गया है। मिडिल पर 78% से बढ़कर 82.8%, तो सेकंडरी पर यह 45.6% से बढ़कर 47.2% हो गया है। सेकंडरी स्तर पर नामांकन दर बढ़कर 68.5% हो गई है। डिजिटल सुविधा और इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ी  डिजिटल सुविधा और इंटरनेट कनेक्टिविटी की बात करें तो स्कूलों में डिजिटल सुविधाएं भी लगातार बढ़ रही है. पिछले साल तक 57.2 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर थे, जो अब 64.7 प्रतिशत स्कूलों में हो गए हैं. वहीं, स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की बात करें, जो पिछले साल तक 53.9 प्रतिशत स्कूलों में थी, वो अब लगभग 63.5 प्रतिशत हो गई है.  बुनियादी सुविधाएं बेहतर इन सभी के साथ स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं भी पहले के मुकाबले बेहतर हुई है. अब 99.3 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी, 93.6 प्रतिशत स्कूलों में बिजली, 97.3 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय और 96.2 प्रतिशत स्कूलों में लड़कों के लिए शौचालय हैं. इसी के साथ स्कूलों अन्य सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, अब 55 प्रतिशत स्कूलों में रैंप और रेलिंग, 89.5 प्रतिशत स्कूलों में लाइब्रेरी और 83 प्रतिशत स्कूलों में खेल के मैदान हैं.   ड्रॉपआउट दर और नामांकन में सुधार रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या में लगभग 6% की कमी आई है और शून्य नामांकन वाले स्कूलों में करीब 38% की … Read more

भारत में जल्द दौड़ेगी सुपरफास्ट ट्रेन, दिल्ली- पटना का सफर सिर्फ ढाई घंटे में

नई दिल्ली भारत में इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को दुरुस्‍त करने पर लगातार काम चल रहा है. खासकर रेल और रोड प्रोजेक्‍ट्स पर लाखों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है. मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्‍ट उनमें से एक है. इसका काम तेजी से चल रहा है और आनेवाले कुछ महीनों में देश की पहली बुलेट ट्रेन पटरियों पर दौड़ सकती है. इस बीच, हाईस्‍पीड ट्रेन को लेकर एक और बड़ी खबर सामने आई है. सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो भारत में नेक्‍स्‍ट जेनरेशन बुलेट ट्रेन का प्रोडक्‍शन शुरू हो सकता है. भारत इस बाबत जापान के साथ करार कर सकता है. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान की यात्रा पर हैं और इस दौरान दोनों देशों के बीच ई-10 शिंकानसेन बुलेट ट्रेन (E10 Shinkansen Bullet Train) की भारत में मैन्‍यूफैक्‍चरिंग पर समझौता होने की उम्‍मीद है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत और जापान जल्द ही मिलकर अगली पीढ़ी की ई-10 शिंकानसेन बुलेट ट्रेन का निर्माण कर सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय जापान यात्रा के दौरान इसका औपचारिक ऐलान किया जा सकता है. मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि दोनों देशों के बीच इस साझेदारी पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है. ई-10 शिंकानसेन को जापान की ALFA-X से विकसित किया गया है और इसे भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से विशेष रूप से तैयार किया जाएगा. यह पहल भारत-जापान के बीच पहले से चल रहे अहमदाबाद-मुंबई हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट को और मजबूती देगी. यह प्रोजेक्ट कुल 508 किलोमीटर लंबा है और इसका पहला 50 किलोमीटर का खंड 2027 तक गुजरात में शुरू होने की उम्मीद है, जबकि पूरा प्रोजेक्ट 2029 तक पूरा होगा. 400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह साझेदारी लगभग चार दशक पहले शुरू हुई मारुति-सुजुकी जॉइंट वेंचर की तरह ऐतिहासिक साबित हो सकती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस प्रोजेक्ट का पैमाना और रणनीतिक महत्व कहीं ज्यादा है. पीएम मोदी की पहल और जापान से उनकी गहरी दोस्ती का नतीजा है कि बुलेट ट्रेनें अब भारत में ही बनने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है. ई-10 शिंकानसेन की अधिकतम रफ्तार 400 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि भारत के लिए पहले ई-5 शिंकानसेन (320 किमी/घंटा) का विकल्प तय था. पीएम मोदी की विशेष दिलचस्पी और जापानी नेतृत्व से उनके घनिष्ठ संबंधों के चलते भारत को नवीनतम तकनीक का लाभ मिलने जा रहा है. दुनिया की सबसे सुरक्षित ट्रेन इस प्रोजेक्ट से न केवल भारत की तेज़ी से बढ़ती परिवहन ज़रूरतों को पूरा किया जाएगा, बल्कि यहां बनी ट्रेनों की आपूर्ति अन्‍य देशों को भी की जा सकती है. भारत की किफायती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और जापान की विश्वस्तरीय तकनीक और गुणवत्ता इसे एक्सीलेंस प्रोजेक्ट बना सकता है. पीएम मोदी अपने जापानी समकक्ष शिगेरू इशिबा के साथ वार्षिक शिखर सम्मेलन और बिज़नेस फोरम में शामिल होंगे. अगले दिन दोनों प्रधानमंत्री शिंकानसेन से यात्रा कर सेनदाई जाएंगे, जहां वे एक सेमीकंडक्टर फैक्ट्री का दौरा करेंगे और जापानी प्रांतों के गवर्नरों से मुलाकात करेंगे. जापानी पक्ष का मानना है कि भारत में हाई-स्पीड रेल नेटवर्क बनाते समय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. गौरतलब है कि 1964 में शुरू होने के बाद से शिंकानसेन का सुरक्षा रिकॉर्ड बेहतरीन रहा है. अभी तक किसी यात्री की ट्रेन हादसे में जान नहीं गई है.

इस साल का पहला और आखिरी चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई देगा, तारीख 7-8 सितंबर तय

इंदौर  साल 2025 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण, जिसे 'ब्लड मून' के नाम से भी जाना जाता है, अगले महीने दिखने वाला है। सितंबर  महीने में यह खगोलीय घटना देखने को मिलेगी। यह चंद्र ग्रहण कई देशों के साथ-साथ भारत में भी नजर आएगा। ऐसे में सूतक  काल भी मान्य होगा। जो जानते हैं यह खगोलीय घटना कब होगी और सूतक काल का समय क्या होगा? साल का आखिरी और दूसरा चंद्र ग्रहण भारत में 7 सितंबर को दिखेगा। इसी दिन पितृपक्ष की भी शुरुआत होगी। यह एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा।  इस दौरान चंद्रमा पूर्ण से गुजरेगा और एक चमकदार लाल रंग के गोले में बदल जाएगा। यानि इस दिन चंद्रमा लाल रंग का होगा, जिसे बल्ड मून कहा जाता है, जो कई सालों में एक बार दिखाई देता है। चंद्र ग्रहण करीब चार घंटे तक रहेगा। उज्जैन की जीवाजी वैधशाला के अधीक्षक राजेंद्र गुप्त ने बताया कि दिनांक 7-8 सितंबर 2025 को पूर्ण चन्द्र ग्रहण की खगोलीय घटना हो रही है। भारतीय समय के अनुसार पूर्ण चन्द्र ग्रहण का प्रारंभ 7 सितंबर 2025 को रात्रि 09:56:08 बजे से शुरू होगा। मध्य की स्थिति मध्यरात्रि 11:41:08 बजे पर होगी। इस समय चन्द्रमा का 136.8 प्रतिशत भाग पृथ्वी की छाया से ढका हुआ दृष्टिगोचर होगा अर्थात् पूर्ण चन्द्र ग्रहण की स्थिति दृष्टिगोचर होगी। ग्रहण के मोक्ष की स्थिति दिनांक 8 सितंबर 2025 को रात्रि 01:26:08 बजे पर होगी। यह ग्रहण भारत में पुराण रूप से दिखाई देगा। यह पूर्ण चन्द्र ग्रहण अंटार्कटिका, पश्चिमी प्रशांत महासागर, आस्ट्रेलिया, एशिया, हिन्द महासागर व यूरोप में भी दिखेगा। चन्द्र ग्रहण की स्थिति में पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा के मध्य में होती है तथा पूर्ण ग्रहण की स्थिति में पृथ्वी की छाया से चन्द्रमा का पूर्ण भाग ढकता है। इसीलिए इसे पूर्ण चन्द्र ग्रहण कहते हैं। कब और कितने बजे लगेगा पूर्ण चंद्रग्रहण भारतीय समय के अनुसार, 7 सितंबर 2025 को चंद्र ग्रहण लगेगा। यह पूर्ण चंद्र ग्रहण रात 9:57 बजे शुरू होगा और 8 सितंबर को 1:26 बजे तक रहेगा। ग्रहण का स्पर्श रात 11:09 बजे होगा, जबकि मध्यकाल रात 11:42 बजे होगा। इसका मोक्ष काल रात 12:23 बजे से शुरू होगा। कुल मिलाकर, यह चंद्र ग्रहण लगभग 4 घंटे तक चलेगा। एक घंटे से ज्यादा समय तक चलने वाला चरम चरण तब होगा जब चंद्रमा अपने सबसे गहरे लाल रंग में दिखाई देगा। सूतक काल का समय चंद्र ग्रहण का सूतक काल 7 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 57 मिनट पर शुरू होगा। दरअसल, चंद्र ग्रहण के शुरू होने से करीब 9 घंटे पहले सूतक काल प्रारंभ हो जाता है। इस दौरान शुभ कार्यों को नहीं किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण में मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं। साल का आखिरी और पूर्ण चंद्रग्रहण भारत के कई शहरों में दिखाई देगा। यह ग्रहण दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, बेंगलुरु समेत कुछ और शहरों में दिखाई देगा। भारत के अलावा ये ऑस्ट्रेलिया, अमेरिकी, फिजी और न्यूजीलैंड में भी दिखाया देगा।  क्या होता है 'ब्लड मून'?  खगोलीय वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी की छाया से पूरी तरह ढक जाएगा, जिससे वह लाल रंग का दिखाई देगा। यह नजारा भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगा। खगोलशास्त्रियों ने इसे साल की सबसे खास खगोलीय घटनाओं में से एक बताया है। बता दें कि ब्लड मून पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान होता है, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के ठीक बीच में आ जाती है।  

राज्यों को मिला 4.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर राजस्व, केंद्र ने किया ट्रांसफर

नई दिल्ली केंद्र सरकार को चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जुलाई की अवधि में 10,95,209 करोड़ रुपए प्राप्त हुए हैं, जो कि वित्त वर्ष 2025-26 के बजट अनुमान का 31.3 प्रतिशत है। यह जानकारी वित्त मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को दी गई। सरकार ने बताया कि इसमें से शुद्ध कर राजस्व 6,61,812 करोड़ रुपए, गैर-कर राजस्व 4,03,608 करोड़ रुपए और गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियां 29,789 करोड़ रुपए हैं। वित्त मंत्रालय ने कहा कि केंद्र ने इस अवधि के दौरान कर राजस्व के रूप में राज्य सरकारों को 4,28,544 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए हैं, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 61,914 करोड़ रुपए अधिक है। इस अवधि के दौरान केंद्र द्वारा किया गया कुल व्यय 15,63,625 करोड़ रुपए है, जो 2025-26 के संबंधित बजट अनुमान का 30.9 प्रतिशत है। इसमें से 12,16,699 करोड़ रुपए राजस्व खाते में से और 3,46,926 करोड़ रुपए पूंजी खाते में से खर्च किए गए हैं। कुल राजस्व व्यय में ब्याज भुगतान 4,46,690 करोड़ रुपए है, जबकि सब्सिडी 1,13,592 करोड़ रुपए है। समीक्षा अवधि में राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और बिजली क्षेत्रों में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर सरकार का पूंजीगत व्यय एक साल पहले के 2.6 लाख करोड़ रुपए की तुलना में 3.5 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत है क्योंकि ये बुनियादी ढांचा परियोजनाएं विकास दर को बढ़ावा देती हैं और अधिक रोजगार और आय सृजन पर गुणक प्रभाव डालती हैं। सरकार का राजकोषीय घाटा भी पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए निर्धारित बजट अनुमान के 29.9 प्रतिशत पर नियंत्रण में है। राजकोषीय घाटे में कमी अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है। इससे सरकार की उधारी में कमी आती है, जिससे बैंकिंग क्षेत्र में कॉर्पोरेट और उपभोक्ताओं को ऋण देने के लिए अधिक धनराशि बचती है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। कम राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में भी मदद करता है।

LG मनोज सिन्हा ने वैष्णो देवी मार्ग पर भूस्खलन जांच के लिए गठित की कमेटी, 2 हफ्ते में रिपोर्ट

नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने श्री माता वैष्णो देवी मार्ग पर हुई भूस्खलन की घटना को लेकर बड़ा आदेश दिया है। उन्होंने हादसे के कारणों की जाँच के लिए हाई-लेवल कमेटी गठित करने के निर्देष दिए हैं। एलजी मनोज सिन्हा ने जल शक्ति विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव शालीन काबरा की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय तीन सदस्यीय समिति के गठन का आदेश दिया है। जम्मू के संभागीय आयुक्त और जम्मू के पुलिस महानिरीक्षक इस समिति के दो अन्य सदस्य हैं। समिति को घटना के कारणों की विस्तार से जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है। कमेटी भूस्खलन की वजहों की विस्तार से जाँच करने के साथ-साथ और अन्य चूक को इंगित करेगी। कमेटी को भूस्खलन के दौरान किए गए बचाव और राहत उपायों के रूप में प्रतिक्रियाओं का आकलन भी करना होगा। इसके अलावा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उपयुक्त मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और उपाय भी सुझाने होंगे। समिति दो हफ्ते के अंदर अपनी रिपोर्ट उपराज्यपाल को सौंपेगी। दरअसल, 27 अगस्त 2025 को श्री माता वैष्णो देवी मार्ग के पास अर्द्धकुंवारी मार्ग पर स्थित इंद्रप्रस्थ भोजनालय के पास श्रद्धालुओं का बड़ा दल चल रहा था। उसी समय भूस्खलन हुआ और पहाड़ों से बड़े-बड़े पत्थर टिन के शेड को चीरते हुए गिरे। इस दौरान वहां से गुजर रहे श्रद्धालु इसकी की चपेट में आ गए और मलबे में दब गए। इसमें 35 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी. 15 के शव उनके घरों में भेज दिए गए हैं। वहीं सात शवों की अभी तक पहचान नहीं हो पाई है।

प्रधानमंत्री का इस्तीफा या हटना? अदालत ने सुनाया अहम फैसला

थाईलैंड  थाईलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगटार्न शिनावात्रा को आज अदालत ने एक बड़ा झटका दिया है। संवैधानिक अदालत ने उन्हें नैतिक दुर्व्यवहार के आरोप में स्थायी रूप से प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया है। शिनावात्रा को पिछले महीने ही इस मामले की जांच के लिए निलंबित किया गया था।   क्या था पूरा मामला? शिनावात्रा पर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच चल रहे सीमा विवाद में नैतिक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया था। इस मामले की जांच के लिए पिछले महीने अदालत ने उन्हें अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था। उस दौरान डिप्टी पीएम फुमथम वेचायाचाई को अंतरिम रूप से प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।   बता दें कि आज यानि शुक्रवार 29 अगस्त को अदालत ने इस मामले पर अंतिम फैसला सुनाते हुए शिनावात्रा को पद से हटाने का आदेश दिया है जिससे थाईलैंड की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है।  

संयुक्त अंतरिक्ष मिशन से स्टार्टअप्स के लिए बढ़ेंगे सहयोग के अवसर, पीएम मोदी का बयान

टोक्यो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जैक्सा) के संयुक्त अंतरिक्ष मिशन दोनों देशों के उद्योगों और स्टार्टअप्स के बीच सहयोग को नई गति देंगे। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को टोक्यो में कही।  जापान के अखबार द योमिउरी शिम्बुन को दिए साक्षात्कार में पीएम मोदी ने कहा कि ये संयुक्त मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के छायायुक्त क्षेत्रों की गहन समझ विकसित करने में भी मदद करेंगे। उन्होंने कहा, “अंतरिक्ष क्षेत्र में हमारी सरकार-से-सरकार साझेदारी इसरो और जैक्सा के बीच सहयोग की ऐसी संस्कृति बना रही है, जिससे दोनों देशों के उद्योग और स्टार्टअप्स भी जुड़ रहे हैं। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार हो रहा है, जहां प्रयोगशालाओं से लॉन्चपैड तक और शोध से वास्तविक जीवन अनुप्रयोगों तक नवाचार का प्रवाह दोनों ओर से हो रहा है।” प्रधानमंत्री ने कहा, “मुझे खुशी है कि भारत और जापान चंद्रयान श्रृंखला के अगले मिशन यानी लूपेक्स (लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन) के लिए हाथ मिला रहे हैं। यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थायी छाया वाले क्षेत्रों की हमारी समझ को और गहरा करेगा।” चंद्रयान-5 चंद्रयान श्रृंखला का पांचवां मिशन है, जिसे लूपेक्स भी कहा जाता है। इसरो और जैक्सा का यह संयुक्त मिशन वर्ष 2027-28 में जापान के एच3 रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन में जैक्सा का रोवर और इसरो का लैंडर शामिल होगा, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में जल-बर्फ की खोज और विश्लेषण करेगा। पीएम मोदी ने विश्वास जताया कि दोनों देशों की वैज्ञानिक टीमें मिलकर अंतरिक्ष विज्ञान की नई सीमाओं को छुएंगी। उन्होंने कहा, “हमारी साझेदारी न केवल अंतरिक्ष में क्षितिज का विस्तार करेगी, बल्कि धरती पर जीवन को भी बेहतर बनाएगी।” भारत की अंतरिक्ष यात्रा को प्रधानमंत्री ने “हमारे वैज्ञानिकों के संकल्प, मेहनत और नवाचार की कहानी” बताया और कहा कि अंतरिक्ष भारत के लिए अगला आयाम है। उन्होंने कहा, “चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता से लेकर हमारी अंतरग्रहीय मिशनों में प्रगति तक, भारत ने लगातार साबित किया है कि अंतरिक्ष अंतिम सीमा नहीं, बल्कि अगली सीमा है।” पीएम मोदी ने यह भी बताया कि कैसे अंतरिक्ष विज्ञान का प्रभाव हमारे दैनिक जीवन में कृषि से लेकर आपदा प्रबंधन, संचार और अन्य क्षेत्रों में दिखता है। प्रधानमंत्री मोदी 29-30 अगस्त तक जापान की दो दिवसीय यात्रा पर हैं। यह यात्रा जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के आमंत्रण पर हो रही है। यह उनका जापान का आठवां दौरा है। इससे पहले वे मई 2023 में जापान आए थे।