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‘हम इसका ख्याल रखेंगे’ अस्पताल CEO को ममता की कथित चेतावनी वायरल, भाजपा ने घेरा

कोलकाता तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के मामले में राजनीति तेज होती जा रही है। अभिषेक को कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराए जाने के दौरान ममता बनर्जी का हॉस्पिटल सीईओ को धमकाते हुए एक ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है। इस क्लिप के वायरल होते ही राजनीति तेज हो गई है। वायरल रिकॉर्डिंग में, ममता बनर्जी कथित तौर पर बेले व्यू अस्पताल के सीईओ प्रदीप टंडन पर जमकर बरस रही हैं,उन पर गलत काम करने का आरोप लगा रही हैं और उन्हें अंजाम भुगतने की चेतावनी दे रही हैं। दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में अभिषेक पर हुए हमले के बाद उन्हें बेले व्यू हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। ममता का आरोप है कि हॉस्पिटल ने अभिषेक की चोटों को कम करके दिखाया। इतना ही नहीं सरकार के निर्देश पर उन्होंने अभिषेक बनर्जी को भर्ती करने से भी इनकार कर दिया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक वायरल ऑडियो क्लिप में ममता बनर्जी को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “माफ कीजिए मिस्टर टंडन, आपने गलत काम किया है।” ममता बनर्जी आगे कहती हैं, "याद रखिए कि हमने आपकी कितनी मदद की है। भगवान आपको माफ नहीं करेंगे। आप लोगों को गुमराह कर रहे हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। हर कोई आपके अहंकार को याद रखेगा। आप अस्पताल चला रहे हैं और भाजपा सत्ता में है। कल, अगर केंद्र सरकार नहीं रही, तो हम इसका ख्याल रखेंगे।" गौरतलब है कि ममता बनर्जी का यह वीडियो ऐसे समय में लीक हुआ है, जब बंगाल के भाईपो (बंगाली में भतीजा) पर सोनारपुर में हमला हुआ था। चुनावी हिंसा में मारे गए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार वालों से मिलने के लिए पहुंचे अभिषेक के सामने लोगों ने चोर-चोर के नारे लगाए। इसके बाद उन पर अंडे और पत्थर फेंके गए। सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी में ही अभिषेक के साथ मारपीट कर दी गई। इतना ही नहीं उनकी शर्ट को भी फाड़ डाला गया। सोशल मीडिया पर इस घटना से जुड़े कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें अभिषेक के सुरक्षाकर्मी उन्हें हेलमेट पहनाकर सुरक्षित निकालते हुए दिख रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अभिषेक बनर्जी ने हमले का आरोप भारतीय जनता पार्टी के ऊपर लगाया। उन्होंने कहा, "यह सब भाजपा की किया हआ है। यह इनका लोकतंत्र है। अभी सत्ता में आए 6 महीने नहीं हुए हैं। यह कानून व्यवस्था है। मेरी सुरक्षा में तैनात कर्मियों ने घटनाक्रम से पहले ही अपने अधिकारियों को सूचित कर दिया था लेकिन इसके बाद भी कोई अतिरिक्त फोर्स नहीं भेजी गई।" इस घटना के बाद अभिषेक कार्यकर्ता के घर गए और फिर वहां से उन्हें कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां से उन्हें बैले व्यू हॉस्पिटल शिफ्ट कर दिया गया। यहां पर पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सामने आईं और उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और एक पुलिस अधिकारी ने अस्पताल को फोन करके अभिषेक को जल्द से जल्द डिस्चार्ज करने के लिए दबाव डाला है। ममता ने कहा कि अभिषेक की चोटें गंभीर हैं, लेकिन इसके बाद भी उन्हें भर्ती नहीं करने दिया गया। बता दें, इस मामले में बंगाल पुलिस ने अभी तक पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के मुताबिक घटना के दौरान के वीडियो और लोगों से पूछताछ के आधार पर 5 संदिग्ध लोगों को अभिषेक बनर्जी पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। फिलहाल इस मामले की जांच की जा रही है।

मुख्यमंत्री बदलने की अटकलें तेज, 3 जून को DK शिवकुमार की ताजपोशी और कैबिनेट फेरबदल संभव

बेंगलुरु  कर्नाटक में चल रही सियासी उथल-पुथल के बीच बड़ा अपडेट सामने आया है। सूत्रों का कहना है कि डीके शिवकुमार 3 जून यानी बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। उनके साथ 10 अन्य मंत्री भी शपथ ले सकते हैं। इसके बाद 18 जून के बाद कैबिनेट का विस्तार किया जा सकता है। राज्यसभा चुनाव होने के बाद कर्नाटक में कैबिनेट विस्तार की संभावना है। कैबिनेट में भी बड़ा फेरबदल राज्य सरकार में चल रहे नेतृत्व परिवर्तन के बीच पार्टी नेतृत्व शनिवार को होने वाली कांग्रेस विधायक दल (CLP) की एक महत्वपूर्ण बैठक की तैयारी कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि डीके शिवकुमार की कैबिनेट में 50 फीसदी नए चेहरे हो कते हैं कर्नाटक विधान परिषद के चीफ विप सलीम अहमद ने शुक्रवार को कहा कि कैबिनेट के गठन, क्षेत्रीय एवं सामाजिक (जातीय) प्रतिनिधित्व और संभावित उप-मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के संबंध में अंतिम निर्णय सीएलपी बैठक के बाद कांग्रेस आलाकमान की ओर से लिया जाएगा। शाम तक हो सकती है औपचारिक घोषणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला इस बैठक में शामिल होने वाल हैं। शाम तक मुख्यमंत्री के नाम की औपचारिक घोषणा भी हो सकती है। इसके बाद शपथ ग्रहण की तारीख का भी ऐलान किया जा सकता है। बता दें कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के कांग्रेस आलाकमान के निर्देशों के बाद अपना इस्तीफा सौंप दिया है और राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने शुक्रवार को इस्तीफा स्वीकार कर लिया। कम नहीं होगा सिद्धारमैया का दबदबा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधायकों, पिछड़ा वर्ग समूहों और जमीनी कार्यकर्ताओं पर श्री सिद्दारमैया की मजबूत पकड़ सत्ता के औपचारिक हस्तांतरण के बाद भी राज्य कांग्रेस की दिशा तय करती रहेगी। कांग्रेस आलाकमान सिद्दारमैया के प्रभावशाली 'अहिंडा' सामाजिक गठबंधन (जिसमें अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित शामिल हैं) को छेड़ने से बच रहा है। यह गठबंधन कर्नाटक में पार्टी की चुनावी सफलता का मुख्य केंद्र रहा है। राज्यसभा का ऑफर क्यों नकारा? राज्यसभा की भूमिका स्वीकार करने के बजाय कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय रहने का सिद्दारमैया का फैसला साफ संकेत देता है कि वे राज्य के राजनीतिक मामलों में अपना सीधा प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब दो शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाने का कठिन काम है – सरकार पर शिवकुमार का नियंत्रण और पार्टी के सामाजिक व संगठनात्मक आधार पर सिद्दारमैया का प्रभाव। इसके अलावा, कांग्रेस के रणनीतिकारों को डर है कि इस नेतृत्व परिवर्तन से पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों का समर्थन कमजोर हो सकता है, क्योंकि ये वर्ग वर्षों से सिद्दारमैया के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं। सीएम बनने के बाद शुरू होगी असली चुनौती जानकारों का मानना है कि डीके शिवकुमार की असली परीक्षा पद संभालने के बाद शुरू हो सकती है, जहां उन्हें प्रशासनिक नियंत्रण सुनिश्चित करना होगा और साथ ही सिद्दारमैया के खेमे को कर्नाटक कांग्रेस के भीतर एक समानांतर राजनीतिक व्यवस्था के रूप में विकसित होने से रोकना होगा।

MP राज्यसभा चुनाव में बड़ा सस्पेंस, कमलनाथ या किसी बाहरी चेहरे पर दांव लगाएगी कांग्रेस?

भोपाल  मध्य प्रदेश में 18 जून को राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हैं। कांग्रेस के खाते में एक सीट जा रही है। यह सीट दिग्विजय सिंह की है। दिग्विजय सिंह पहले ही राज्यसभा जाने से मना कर चुके हैं। ऐसे में अटकलें हैं कि पूर्व सीएम कमलनाथ को राज्यसभा भेजा सकता है। बुधवार को नई दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की है। इसके बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राज्यसभा की तीन सीटें हो रही हैं खाली मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनमें दो सीटें बीजेपी की हैं। जनवरी में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने घोषणा की थी कि वह मध्य प्रदेश से जून में होने वाले राज्यसभा चुनावों के लिए कांग्रेस की एकमात्र सीट खाली कर देंगे। उम्मीदवारों की है लंबी सूची प्रदेश कांग्रेस सूत्रों के अनुसार जून में होने वाले राज्यसभा चुनावों के लिए एआईसीसी के पास उम्मीदवारों की एक लंबी सूची है। इस सूची में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन खेड़ा, पूर्व राज्यसभा सांसद बी के हरिप्रसाद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सहित कई अन्य नाम शामिल हैं। कांग्रेस की आएंगी पांच सीटें वहीं, इस रेस में कमलनाथ का नाम शामिल होता है तो इससे चयन प्रक्रिया आसान नहीं होगी, क्योंकि राज्यसभा की कुल 26 सीटें खाली होने के बावजूद कांग्रेस के हिस्से में केवल पांच सीटें ही आएंगी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की एक सीट खाली हो रही है। ऐसे में यह काफी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस में नहीं मिला कोई पद दरअसल, 2022-23 में कमलनाथ को कथित रूप से एआईसीसी अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव मिला था। 2024 में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ को बीजेपी में जाने की चर्चा हुई थी। इसके बाद से कांग्रेस में उन्हें कोई पद नहीं मिला है। कमलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद रह चुके हैं। अपनी सीट उन्होंने बेटे के लिए छोड़ दी थी लेकिन 2024 में नकुलनाथ चुनाव हार गए। माना जा रहा है प्रबल दावेदार वहीं, दिग्विजय सिंह के बाद मध्य प्रदेश के कमलनाथ ही कांग्रेस में ऐसे कद्दावर नेता हैं, जिनके नाम पर उम्मीद की जा सकती है कि क्रॉस वोटिंग न हो। इसी साल मार्च में हुए राज्यसभा चुनावों में हरियाणा और ओडिशा में कांग्रेस के लिए क्रॉस-वोटिंग एक बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारियों का दावा है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अलावा किसी अन्य उम्मीदवार को शायद ही 61 विधायकों का समर्थन मिल पाए। दो विधायक हैं वोट से वंचित मध्य प्रदेश में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म हो गई है। विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा को वोटिंग का अधिकार नहीं है। तीसरी एमलए निर्मला सप्रे के खिलाफ हाईकोर्ट में दल बदल का मामला लंबित है। ऐसे में हो सकता है कि वह भी वोट न दें। एमपी से राज्यसभा की एक सीट पर जीत के लिए 58 विधायकों की जरूरत है। कांग्रेस के पास इस आंकड़े से सिर्फ तीन वोट अधिक हैं। इसलिए स्थिति नाजुक है। बीजेपी के पास हैं 165 विधायक वहीं, मध्य प्रदेश में बीजेपी के पास 165 विधायक हैं। ऐसे में दो सीटों पर उनकी जीत पक्की है। इसके बाद उनके पास 49 विधायक बचते हैं। राज्य बीजेपी के एक वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि अगर कांग्रेस के अंदर गुटबाजी होती है तो बीजेपी तीसरी सीट पर चुनाव करवाने का मौका भुनाने से पीछे नहीं हटेगी।

ममता बनर्जी को बड़ा झटका! अपने बूथ पर ही पिछड़े TMC नेता, EC रिपोर्ट ने खोली पोल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई मजबूत किलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी बूथ स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि टीएमसी के प्रमुख 36 नेताओं में से केवल 14 नेता ही अपनी सीट बचा पाए हैं। टीएमसी 22 दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा है। हैरान करने वाली बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई मौजूदा मंत्रियों को अपने ही घरेलू वॉर्डों और उन सीटों पर शिकस्त झेलनी पड़ी है, जिन्हें कभी टीएमसी का अभेद्य गढ़ माना जाता था। 16 वरिष्ठ टीएमसी नेता अपनी सीटों के महज एक-तिहाई या उससे भी कम पोलिंग बूथों पर जीत दर्ज कर सके। भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी का दबदबा भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी ने 2021 के उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। वहां इस बार भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें करारी शिकस्त दी। यह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव है जब शुभेंदु ने ममता बनर्जी को पराजित किया है। भवानीपुर के कुल 270 पोलिंग बूथों में से ममता बनर्जी केवल 62 बूथों पर ही बढ़त बना सकीं। ममता बनर्जी ने अपने घरेलू पोलिंग स्टेशन बूथ संख्या 207 पर 63.33% वोट शेयर के साथ जीत जरूर दर्ज की, लेकिन वह पूरी सीट बचाने के लिए नाकाफी रहा। ममता केवल 54 बूथों पर 50% से अधिक वोट हासिल कर पाईं। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के 197 बूथों पर 50% से अधिक वोट शेयर के साथ एकतरफा जीत हासिल की, जिसमें 44 बूथ ऐसे थे जहां उन्हें 80% से अधिक वोट मिले। 3 मंत्रियों को नहीं मिला 15% बूथों पर भी समर्थन टीएमसी के चार प्रमुख चेहरे और मंत्री सुजीत बोस, ब्रात्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य और प्रदीप मजूमदार अपनी सीटों के कुल पोलिंग बूथों में से 15% बूथों पर भी जीत हासिल नहीं कर सके। इन चारों ही मंत्रियों को भाजपा उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से हराया। केवल तीन टीएमसी मंत्री मोहम्मद गुलाम रब्बानी, अखरुज्जमां और सबीना यास्मिन ही ऐसे रहे जिन्होंने अपनी सीटों के 80% से अधिक पोलिंग बूथों पर शानदार जीत दर्ज की। अपने ही घर में घिरे नेता आंकड़ों के मुताबिक, इन 36 प्रमुख नेताओं में से 25 नेता उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड थे, जहां से वे चुनाव लड़ रहे थे। इन 25 नेताओं में से केवल 9 नेता अपने घरेलू पोलिंग बूथ पर जीत दर्ज कर सके, जिनमें से 6 अंततः अपनी पूरी सीट हार गए और केवल 3 को ही अंतिम जीत मिली। कुल मिलाकर, अपने घरेलू बूथ पर जीतने वाले 16 वरिष्ठ टीएमसी नेताओं में से सिर्फ 6 ही अपनी विधानसभा सीट जीत पाए। भाजपा की रणनीति रही सफल आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी के दिग्गजों को बेदखल करने के लिए भाजपा ने बेहद रणनीतिक जीत दर्ज की। जिन 22 सीटों पर टीएमसी के बड़े नेता हारे उनमें से 15 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा ने कुल बूथों के 30% से भी कम हिस्से पर 50% से अधिक वोट शेयर हासिल किया था, फिर भी वे सीट जीतने में कामयाब रहे। भाजपा के सौरव सिकदार ने पूर्व वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को हरा दिया, जबकि सिकदार केवल 3.78% बूथों पर ही 50% से अधिक वोट शेयर हासिल कर पाए थे। जीत का बड़ा अंतर जिन 22 सीटों पर टीएमसी के दिग्गज हारे, उनमें से 16 सीटों पर आधे से अधिक पोलिंग बूथों में भाजपा उम्मीदवार और टीएमसी उम्मीदवार के बीच 10 प्रतिशत से अधिक वोटों का फासला था। दूसरी तरफ, टीएमसी के जो 14 प्रमुख नेता चुनाव जीते हैं उनमें पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चंद्रनाथ सिन्हा (बोलपुर) और पुलक रॉय (उलूबेरिया दक्षिण) शामिल हैं। ये दोनों नेता अपनी सीटों के आधे से अधिक बूथों पर भाजपा से 10% से अधिक वोटों से पिछड़ने के बावजूद अंतिम रूप से सीट जीतने में सफल रहे। टीएमसी के लिए सबसे एकतरफा और बड़ी जीत गोलपोखर में मोहम्मद गुलाम रब्बानी और सुजापुर में सबीना यास्मिन की सीटों पर दर्ज की गई।

सिद्धारमैया के बेटे की कैबिनेट एंट्री के संकेत, कांग्रेस में चार डिप्टी CM मॉडल पर चर्चा

बेंगलुरु  मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के इस्तीफे के बाद से कर्नाटक की राजनीति में बड़ा उलफेर देखने को मिल रहा है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बनने जा रही नई सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए चार डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार आज दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलकर राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल पर चर्चा करेंगे। जिसमें चार डिप्टी सीएम को लेकर भी मंथन होगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक के पूर्व सीएम सिद्दरमैया, डीके शिवकुमार और AICC के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ चर्चा करेंगे। सूत्रों ने बताया कि इस बैठक के दौरान राज्यसभा उम्मीदवारों, MLC उम्मीदवारों और मंत्रिमंडल में फेरबदल पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाएगा। चार डिप्टी सीएम बनाने की संभावना सूत्रों ने आगे बताया कि सिद्दरमैया के मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों को डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में जगह मिलने की संभावना कम है। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया कि सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए चार उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। सिद्दरमैया के बेटे को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी सूत्रों के अनुसार, सिद्दरमैया के बेटे और विधान परिषद के सदस्य यतींद्र को डीके शिवकुमार की कैबिनेट में शामिल किए जाने की पूरी उम्मीद है। उन्हें कोई अहम मंत्रालय मिलने की संभावना है, ताकि सिद्दरमैया की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश दिया जा सके। कांग्रेस विधायक दल की बैठक की तारीख आज तय की जाएगी जो कि अब महज एक औपचारिकता ही लगती है। इसके बाद, कर्नाटक के मुख्यमंत्री के तौर पर डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण समारोह की तारीख तय की जाएगी। कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों पर होने हैं चुनाव कर्नाटक में राज्यसभा की जिन चार सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से कांग्रेस दो सीटें आसानी से जीतती दिख रही है। तीसरी सीट पर भी उसे बढ़त हासिल है, जिसके लिए उसे बस कुछ और वोटों की जरूरत है। सूत्रों ने बताया कि AICC के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला तीन में से दो राज्यसभा सीटों के लिए नामों का पैनल पेश करेंगे, और खड़गे को राज्यसभा में दोबारा मौका दिया जाएगा। इसके अलावा, राज्य में विधान परिषद (MLC) की सात सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए भी संभावित नामों का एक पैनल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सौंपा जाएगा। राज्यपाल ने स्वीकार किया इस्तीफा कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने बीते गुरुवार अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने गुरुवार दोपहर तीन बजे लोकभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन राज्यपाल की अनुपस्थिति के कारण उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ था। आज राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सिद्दरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। राज्यपाला ने इस्तीफा स्वीकार करते हुए लिखा, "मैं थावरचंद गहलोत भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।" 

कांटों का ताज पहनेंगे डीके शिवकुमार? अगले 24 महीने तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य

बेंगलुरु कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब पार्टी दक्षिण भारत में अपनी सबसे मजबूत सरकार को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहती है. राहुल गांधी की रणनीति साफ है. कर्नाटक को 2028 चुनाव तक कांग्रेस का मॉडल राज्य बनाना है. लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले चार दशक में यहां कोई भी सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है. ऐसे में शिवकुमार के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें इतिहास बदलने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यही वजह है कि दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक इस बदलाव को कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है।  डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत खिलाड़ी माना जाता है. संकट के समय विधायकों को संभालने से लेकर पार्टी को टूटने से बचाने तक उन्होंने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. अब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष को भी साधना होगा. सिद्धारमैया भले ही कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर यह संकेत दे दिया है कि वह अभी भी कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. इसका मतलब साफ है कि शिवकुमार को हर फैसले में राजनीतिक संतुलन बनाकर चलना होगा. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि अगर जातीय समीकरण बिगड़े तो भाजपा और जेडीएस इसका बड़ा फायदा उठा सकते हैं।  40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती     कर्नाटक में पिछले 40 सालों से कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में नहीं लौटी है. कांग्रेस चाहती है कि डीके शिवकुमार इस मिथक को तोड़ें. पार्टी का मानना है कि उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ आगामी चुनावों में फायदा दिला सकती है. लेकिन यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर को रोकना सबसे मुश्किल काम माना जाता है।      सिद्धारमैया के हटने से कुरुबा समुदाय में नाराजगी की संभावना जताई जा रही है. कांग्रेस इसे संतुलित करने के लिए उनके बेटे यतींद्र को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. दूसरी ओर, वोक्कालिगा समुदाय में डीके शिवकुमार की मजबूत पकड़ पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ बन सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि जेडीएस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे उसकी तरफ शिफ्ट होगा।      राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘फाइटर’ वाली छवि है. वह जमीनी नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार के बेहद करीबी भी हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी उन्हें भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रहे हैं. हालांकि भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित खींचतान को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है।  सिद्धारमैया की मौजूदगी बनेगी दबाव? सिद्धारमैया का दिल्ली राजनीति से दूरी बनाना कई संकेत देता है. वह बेंगलुरु में रहकर अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते. इससे डीके शिवकुमार पर लगातार दबाव बना रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व भले इसे सहज परिवर्तन बता रहा हो, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।  डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2028 विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकंबेंसी को नियंत्रित करना होगी. कर्नाटक में पिछले चार दशक से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. ऐसे में उन्हें विकास, संगठन और जातीय संतुलन तीनों मोर्चों पर सफल होना पड़ेगा. अगर सरकार के खिलाफ माहौल बनता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान पर भी पड़ेगा।  सिद्धारमैया का सक्रिय रहना कांग्रेस के लिए फायदा है या नुकसान? यह दोनों तरह से असर डाल सकता है. सिद्धारमैया का अनुभव और AHINDA वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत है. लेकिन अगर उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ता है तो डीके शिवकुमार के लिए फैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हाईकमान को दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा।  राहुल गांधी के लिए कर्नाटक इतना अहम क्यों है? कर्नाटक इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है. पार्टी इसे 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ‘गवर्नेंस मॉडल’ के तौर पर पेश करना चाहती है. अगर कांग्रेस यहां दोबारा सत्ता में लौटती है तो राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को बड़ी मजबूती मिलेगी. इसलिए मुख्यमंत्री परिवर्तन को भविष्य की बड़ी चुनावी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।  वोक्कालिगा समीकरण से कांग्रेस को उम्मीद डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. कांग्रेस को भरोसा है कि इससे जेडीएस का प्रभाव कमजोर होगा. दक्षिण कर्नाटक की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि पार्टी इस बदलाव को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के रूप में भी देख रही है  भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित गुटबाजी को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद असंतोष बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस अंदरूनी संतुलन नहीं संभाल पाई तो भाजपा इसे अगले चुनाव में बड़ा हथियार बना सकती है।   

दो केंद्रीय मंत्रियों को प्रदेश की कमान मिलने से बढ़ी अटकलें, मोदी सरकार में बदलाव के संकेत?

नई दिल्ली बीजेपी ने एक बार फिर चौंकाते हुए केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्‍होत्रा को प्रदेश की कमान सौंप दी है. उन्‍हें द‍िल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया गया है. दिल्ली से पहले बीजेपी ने यूपी में भी भाजपा ने यही फॉर्मूला अपनाते हुए केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी थी. यानी अब दो-दो केंद्रीय मंत्री सीधे राज्यों में संगठन की कमान संभाल रहे हैं. इस बदलाव के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा है क‍ि क्या अब मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा. क्‍योंक‍ि बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’के सिद्धांत को मानतीहै. ऐसे में मंत्रियों को संगठन में भेजे जाने का सीधा मतलब है कि केंद्रीय कैबिनेट में कई महत्वपूर्ण कुर्सियां खाली होने वाली हैं।  हर्ष मल्होत्रा पूर्वी दिल्ली से सांसद हैं और मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. दिल्ली में अगले कुछ समय में होने वाले एमसीडी चुनाव को देखते हुए उनकी न‍ियुक्‍त‍ि काफी मायने रखती है. द‍िल्‍ली में बीजेपी को एक ऐसे जमीन से जुड़े पंजाबी और वैश्य चेहरे की जरूरत थी, जिसकी प्रशासनिक पकड़ मजबूत हो. केंद्रीय मंत्री को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ने वाली. इसके साथ ही बीजेपी ने पंजाबी चेहरे को मौका देकर पंजाब में भी पैठ बनाने की कोश‍िश की है।  ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का सिद्धांत बीजेपी की कार्यशैली दूसरी पार्टियों से थोड़ी अलग है. बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का नियम बेहद कड़ाई से लागू करती है. पार्टी का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी नेता को संगठन से सरकार में या सरकार से संगठन में लाया गया है, उसने बड़े बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया है।  जेपी नड्डा का उदाहरण जब जेपी नड्डा को मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, तो उन्होंने तुरंत राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से दूरी बनाई और पार्टी ने सांगठनिक निरंतरता के लिए नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना. ठीक यही नियम अब राज्यों के स्तर पर भी लागू होने जा रहा है।  उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी कुछ समय पहले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था. तब भी यह सवाल उठा था कि क्या वे दोनों पद संभालेंगे? भाजपा की नीति के अनुसार, जब कोई मंत्री संगठन के पूर्णकालिक काम में उतरता है, तो उसे सरकारी जिम्मेदारी से मुक्त किया जाता है ताकि वह शत-प्रतिशत समय संगठन को दे सके।  अब हर्ष मल्‍होत्रा अब यही इतिहास दिल्ली में हर्ष मल्होत्रा के साथ दोहराया जा रहा है. हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी दोनों केंद्रीय मंत्रालयों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. चूंकि दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में संगठन का काम 24 घंटे और 365 दिन का होता है, इसलिए इन दोनों मंत्रियों का कैबिनेट से बाहर होना तय माना जा रहा है. यह कदम ही इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि मोदी कैबिनेट में जल्द ही नए चेहरों की एंट्री होने वाली है।  जब-जब संगठन बदला, तब-तब बदली कैबिनेट यदि हम मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों के इतिहास और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के दौर के इतिहास पर नजर डालें, तो काफी कुछ क्‍ल‍ियर हो जाता है।      साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब राजनाथ सिंह सरकार में गृहमंत्री बने. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत के तहत राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष पद छोड़ा और अमित शाह को संगठन की कमान मिली. इसके बाद संगठन का पूरी तरह कायाकल्प हुआ और कैबिनेट का भी विस्तार हुआ।      जुलाई 2021 में मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का सबसे बड़ा कैबिनेट फेरबदल किया था. उस समय रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, डॉ. हर्षवर्धन और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे 12 बड़े मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई थी. इनमें से कई नेताओं को बाद में संगठन के काम में लगाया गया था, जबकि भूपेंद्र यादव, अश्विनी वैष्णव और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नए चेहरों को कैबिनेट में एंट्री मिली थी।      अटल जी के समय भी कुशाभाऊ ठाकरे और जन कृष्णमूर्ती जैसे संगठन के दिग्गजों को सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए इस्तेमाल किया गया था. प्रमोद महाजन और वेंकैया नायडू जैसे नेताओं को कई बार संगठन से सरकार और सरकार से संगठन में भेजा गया।   

Siddaramaiah Resignation Accepted: अब कर्नाटक की कमान संभाल सकते हैं डीके शिवकुमार

बेंगलुरु  कर्नाटक सरकार में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता शुक्रवार सुबह साफ हो गया है. राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने आज सुबह सीएम सिद्दारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है. बता दें, सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने आवास 'कावेरी' पर आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग में इस मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का ऐलान किया था. राज्यपाल अभी कर्नाटक से बाहर इंदौर में हैं. इसके बाद दोपहर 3 बजे वे लोकभवन गए और राज्यपाल के सचिव को अपना त्यागपत्र सौंपा. इस्तीफा स्वीकार करते ही राज्य में नई सरकार के गठन होने का रास्ता बिल्कुल साफ हो गया है।  कर्नाटक में आज 29 मई को कांग्रेस विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें नए नेता का चुनाव होगा. जानकारी के मुताबिक यह बैठक शाम 5 बजे के करीब होनी है. नई सरकार को लेकर नई दिल्ली में भी कवायद शुरू हो गई है. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद पूर्व सीएम सिद्धारमैया दिल्ली पहुंच चुके हैं।  राज्य के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार भी दिल्ली पहुंचे हैं. जहां दोनों नेता पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से मुलाकात करेंगे. ऐसा माना जा रहा है कि सरकार में किन नेताओं को मंत्रिपद मिलेगा, इसकी मंत्रणा की जाएगी।  इससे पहले सिद्धारमैया के आवास पर आयोजित ब्रेकफास्ट मीटिंग में पूरी कैबिनेट शामिल हुई थी, जहां सिद्धारमैया ने पद से हटने की घोषणा की. वहीं, डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के पहले गले मिले और उसके बाद पैर छूकर आर्शीवाद लिया. आपको बता दें, राज्य में काफी दिनों से नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही थी, जिसका अब पटाक्षेप हो गया है. सूत्रों से जानकारी मिली है कि रविवार को नई सरकार का शपथ ग्रहण कार्यक्रम हो सकता है। 

किसके पास कितने वोट? राज्यसभा चुनाव में गणित बिगड़ा तो बदल सकता है पूरा समीकरण

नई दिल्ली राज्यसभा की 24 सीटों के चुनाव में संख्याबल के बावजूद विपक्षी दलों में अपने उम्मीदवार की जीत का भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है। पिछले कई मौकों पर बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग ने भाजपा विरोधी खेमे को कई बड़े झटके दिए हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश, झारखंड एवं कर्नाटक में काग्रेस और उसके सहयोदी दलों को क्रॉस वोटिंग की चिंता सता रही है। झारखंड की 2 सीटों पर चुनाव झारखंड में सत्तारूढ़ झामुमो और उसकी सहयोगी कांग्रेस के पास खाली हो रही दोनों सीट जीतने के लिए पर्याप्त नंबर हैं, लेकिन भाजपा के द्वारा चुनाव लड़ने की तैयारी से समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में दो राज्यसभा सीटों के चुनाव में एक सीट की जीत के लिए 28 वोट चाहिए। झामुमो के नेतृत्व वाली INDIA गठबंधन की सरकार के पास 56 विधायक हैं। यानी दोनों सीटें जीती जा सकती हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 24 विधायक हैं। यानी चार सीटों की क्रॉस वोटिंग से तो मामला पलट ही सकता है, एक दो वोट इधर उघर होने पर दूसरी वरीयता से दूसरी सीट का फैसला होगा। कर्नाटक में रोचक हुआ चुनाव कर्नाटक में कांग्रेस में सरकार के भीतर खींचतान जारी है। ऐसे में, वहां की चार सीटों का चुनाव रोचक है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास 135 व भाजपा-जदएस के पास 85 विधायक हैं। एक सीट के लिए 45 वोट की जरूरत है। इसमें कांग्रेस तीन एवं भाजपा के एक सीट जीतने के आंकड़े हैं, लेकिन भाजपा दूसरी सीट के लिए उतरती है तो उसे बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग करानी पड़ेगी या फिर मामला दूसरी वरीयता के वोटों पर जा सकता है। मध्य प्रदेश में चाहिए 58 वोट मध्य प्रदेश में तीन सीटों के चुनाव में एक सीट के लिए 58 वोट की जरूरत है। भाजपा के पास दो सीट जीतने के बाद भी 48 वोट अतिरिक्त हैं। यानी उसे एक और सीट जीतने के लिए दस और वोटों का जुगाड़ करना होगा। कांग्रेस के पास 62 वोट हैं। यानी आसानी से एक सीट आ सकती है, लेकिन अगर भाजपा एक ज्यादा उम्मीदवार उतारती है तो क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि इस बार कांग्रेस से दिग्विजय सिंह की सीट खाली हो रही है। वह फिर से लड़ते हैं तो भाजपा दांव खेल सकती है। पिछली बार दिग्विजय सिंह के चलते हुए राज्यसभा सीट के विवाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी थी। सिंधिया अब भाजपा में हैं। भाजपा यहां पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है। इन राज्यों में चुनाव 18 जून को होने वाले चुनाव में आंध्र प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक की चार-चार सीट, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तीन-तीन सीट, झारखंड की दो सीट तथा मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम की एक-एक सीट शामिल हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु से राज्यसभा की एक-एक सीट के लिए उपचुनाव भी होगा। जिन 26 सीटों के लिए चुनाव और उपचुनाव हो रहा है उनमें एनडीए के पास 18 सीटें हैं और इनमें भी 12 सीटें भाजपा की हैं। इसके अलावा चार सीटें कांग्रेस, तीन वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और एक झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास हैं। भाजपा की खाली होने वाली सीटों में गुजरात से तीन, कर्नाटक, मध्य प्रदेश एवं राजस्थान से दो-दो और अरुणाचल प्रदेश, झारखंड और मणिपुर से एक-एक सीट शामिल हैं।

‘बहुसंख्यक सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक’ बयान से गरमाई राजनीति, BJP ने खोला मोर्चा

भोपाल  मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण की तीखी जंग छिड़ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर दिए गए एक बयान के बाद भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भाजपा ने दिग्विजय सिंह और कांग्रेस पार्टी को सीधे तौर पर हिंदू विरोधी करार देते हुए आरोप लगाया है कि जवाहरलाल नेहरू के जमाने से लेकर आज तक कांग्रेस नेताओं ने हमेशा हिंदुओं को एक आंख नहीं भाया और उन्हें हमेशा दुश्मनों की तरह देखा है। दिग्विजय सिंह के किस बयान पर मचा बवाल? दरअसल, कांग्रेस कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दिग्विजय सिंह ने नेहरू के विचारों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि देश में इस समय बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का खतरनाक उभार देखा जा रहा है। नेहरू ने सांप्रदायिकता को एक ऐसा जहरीला तत्व बताया था जो देश के भीतर नफरत फैलाता है। दिग्विजय सिंह ने आगे जोड़ा कि नेहरू के मुताबिक, अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता की तुलना में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता देश के लिए कहीं अधिक खतरनाक होती है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति और अर्थव्यवस्था की दिशा पर भी तीखे सवाल उठाए। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस हमेशा बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाती है। कांग्रेस पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेता का बचाव किया है। कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने केवल वही बात दोहराई है, जो देश की वास्तविक चिंता है। उन्होंने भाजपा पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा चुनाव आते ही वोट बैंक के लिए समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलती है। कुछ दिन पहले इंदौर में भाजपा नेत्री उषा ठाकुर के सामने खुद को दिग्विजय ने घोर सनातनी बताया था। इस पर भाजपा नेता रजनीश अग्रवाल कहते हैं कि दिग्विजय का सनातनी रूप केवल चुनाव और राजनीतिक लाभ के लिए एक ढोंग है। वह वोट बैंक की राजनीति के तहत बहुसंख्यक समाज (हिंदुओं) को निशाना बनाते हैं। बीजेपी का तीखा पलटवार: दागे कई सवाल दिग्विजय सिंह के इस बयान पर भोपाल से भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यक राजनीति के नाम पर अलगाववाद व कट्टरपंथ फैलाने का आरोप लगाया। शर्मा ने इतिहास का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या 1947 में भारत के विभाजन के लिए हिंदू जिम्मेदार थे? क्या मोहम्मद अली जिन्ना हिंदू थे? उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस तब भी विभाजनकारी ताकतों के साथ खड़ी थी और आज भी देश को बांटने वाले तत्वों को संरक्षण दे रही है।