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रायगढ़ में रीता यादव ने युवा उद्यमियों की इकाइयों का निरीक्षण किया, PMEGP और CMEGP योजनाओं की प्रगति पर नज़र

रायगढ़ छत्तीसगढ़ खादी तथा ग्रामोद्योग बोर्ड की प्रबंध संचालक (MD) श्रीमती रीता यादव ने आज रायगढ़ जिले के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर PMEGP एवं CMEGP योजनाओं के अंतर्गत स्थापित युवा उद्यमियों की इकाइयों का निरीक्षण किया। ​निरीक्षण के दौरान उन्होंने युवाओं के उत्साह और उनके द्वारा संचालित सफल व्यवसायों की सराहना की: * ​निखिल साहू (पुसौर): आधुनिक रेस्टोरेंट का सफल संचालन। * ​अभिषेक केरकेट्टा (रायगढ़): होटल एवं रेस्टोरेंट के माध्यम से स्वरोजगार। * ​श्रेयांश साहू: मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना (CMEGP) के तहत कूलर निर्माण यूनिट। * ​नेहरूलाल पटेल (ग्राम कोसमंदा): दोना-पत्तल निर्माण इकाई के जरिए ग्रामीण उद्यमिता। ​बोर्ड की इन योजनाओं के माध्यम से आज रायगढ़ के युवा न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बन रहे हैं, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर सृजित कर रहे हैं।  

कूनो में चीतों की बढ़ती संख्या, गांधीसागर और नौरादेही के जंगल बने नए घर, आठ बाड़े तैयार, जल्द शिफ्ट होंगे चीते

श्योपुर  श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क से चीतों को अब नौरादेही अभयारण्य में भी बसाने की तैयारी है। फिलहाल वहां बाड़ा निर्माण चल रहा है। दो माह में काम पूरा होने की संभावना है। यही वजह है कि जुलाई में चार चीते शिफ्ट किए जा सकते हैं। दूसरी ओर प्रदेश में चीतों का दूसरा घर गांधीसागर अभयारण्य (मंदसौर) में भी दो और चीते भेजने का प्लान है। शिफ्टिंग जून में संभव है। गांधीसागर में शिफ्ट चीतों को सड़क मार्ग से ले जाया गया था। बोत्सवाना और भारतीय चीतों में से जाएंगे कूनो में कुल 54 चीते हैं। इनमें 37 भारतीय हैं। बताया जा रहा है कि जिन चीतों को शिफ्ट किया जाना है, उनमें बोत्सवाना के नौ में से 4 और 2 भारतीय चीते होंगे। इनमें आशा के दोनों शावक केएपी-2 और केएपी-3 हो सकते हैं। ये वर्तमान में राजस्थान की सीमा में घूम रहे हैं। 440 हेक्टेयर में आठ बाड़े तैयार सागर जिले के नौरादेही अभयारण्य (वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व) में चीतों के लिए मुहली, सिंगपुर और झापन रेंज के लगभग 440 हेक्टेयर में आठ विशेष बाड़े बनाए जा रहे हैं। 8-10 फीट ऊंची फेंसिंग की जा रही है, जिसमें सोलर इलेिट्रक फेंसिंग का उपयोग किया जा रहा है। चीतों को पहले चार अलग-अलग छोटे बाड़ों में क्वारंटीन रखा जाएगा, उसके बाद जंगल में छोड़ा जाएगा। गांधीसागर में 64 वर्ग किमी का बाड़ा गांधीसागर अभयारण्य में 64 वर्ग किमी (लगभग 6400 हेक्टेयर) का बाड़ा है। तीन चीते 2025 में शिफ्ट किए गए थे। कब जाएंगे कितने जाएंगे यह तय होना बाकी कितने चीते कब जाएंगे ये तय होना बाकी है। नौरादेही में बाड़ा निर्माण चल रहा है। -उत्तम कुमार शर्मा, डायरेक्टर, चीता प्रोजेक्ट, कूनो नेशनल पार्क

पारंपरिक नजराना पर कोर्ट सख्त, अवैध वसूली को बताया अपराध

प्रयागराज इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसजेंडरों (किन्नरों) के पारंपरिक बधाई उपहारों को लेकर दिए एक अहम आदेश में कहा है कि उनके पास ऐसे उपहार या पारंपरिक भेंट (नजराना) लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। रेखा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के केस में 15 अप्रैल को दिए इस महत्वपूर्ण फैसले में, न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने किन्नर रेखा देवी द्वारा अन्य किन्नरों द्वारा कथित रूप से अपने ‘क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र’ के अतिक्रमण के खिलाफ सुरक्षा की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस केस में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि इस प्रकार की वसूली कई सालों से हो रही थी। इसे प्रथागत अधिकार का दर्जा प्राप्त था। हालांकि मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि इस तरह की भेंट लेने का कोई कानूनी आधार नहीं है। न्यायाधीश ने कहा, ‘कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति से धन, कर, शुल्क या उपकर वसूले जा सकते हैं। इस तरह की अनुमति देने वाला कोई वैध या कानूनी आधार नहीं है।’ कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए ऐसे अधिकार कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायालय अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, कानून के समर्थन के बिना याचिकाकर्ता के कृत्यों को वैध नहीं ठहरा सकता।’ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसले देते हुए यह भी कहा कि किसी नागरिक को केवल उतनी ही कर, उपकर या शुल्क का भुगतान करने का निर्देश दिया जा सकता है, जिसे कानून के अनुसार उससे वैध रूप से वसूला जा सकता है। कोर्ट ने याचिका में की गई प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया और कहा कि इस प्रकार धन की वसूली को किसी भी तरह से वैध नहीं ठहराया जा सकता। अवैध वसूली है अपराध हाई कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के प्रति किसी प्रकार की नरमी बरती जाती है, तो संभव है कि कई अन्य व्यक्ति या गिरोह सक्रिय हों और व्यक्तियों से जबरन अवैध वसूली कर रहे हों। इस प्रकार की अवैध वसूली को देश में कानून द्वारा कभी भी मान्यता नहीं दी गई है। यह भारतीय न्याय संहिता के तहत एक अपराध है। एक-दूसरे के क्षेत्र के अतिक्रमण की हुई थी शिकायत इस मामले में अधिवक्ता संगीता वर्मा ने कोर्ट में याचिकाकर्ता का पक्ष रखा। कोर्ट को यह बताया गया था कि याचिकाकर्ता गोंडा जिले के किन्नर समुदाय से संबंध रखता है। वह लंबे समय से एक विशेष क्षेत्र में बकाया वसूलने के अपने पारंपरिक अधिकार का प्रयोग करता आ रहा है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में बताया कि गोंडा जिले में इसी तरह के किन्नर समुदाय के कुछ और लोग भी रहते हैं जो बधाई का काम करते हैं। वे एक-दूसरे के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण कर रहे हैं, जिसके चलते समुदाय के सदस्यों के बीच शत्रुता और हिंसा पैदा हो रही है। हिंसा के भय से मांगी थी सुरक्षा इस मामले में याचिकाकर्ता ने हिंसा के भय के बिना बधाई का काम जारी रखने को अपना मौलिक अधिकारों बताते हुए उसकी रक्षा के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत संरक्षण का दावा किया था। याचिका में बधाई के लिए क्षेत्रों के सीमांकन का निर्देश देने की भी मांग की गई थी। नहीं किया जा सकता इस प्रथा का संरक्षण इस याचिका पर सुनवाई के बाद दिए फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि बधाई वसूलने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए इस प्रथा का संरक्षण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संरक्षण कानून में हाल ही में हुए परिवर्तनों पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने कहा- ‘हमने पाया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के प्रावधानों के अनुसार भी ऐसे किसी अधिकार के संरक्षण की मांग नहीं की गई है, हालांकि उक्त अधिनियम में ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपना लिंग निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। भारत की संसद में 2026 का एक नया विधेयक विचाराधीन है, जो किसी व्यक्ति के लिंग निर्धारण के संबंध में 2019 के अधिनियम से काफी भिन्न है।’

​आत्मविश्वास से बदल रही जिंदगी: पुनर्वास केंद्र में हुनर सीख रहे मुख्यधारा में लौटे 40 पूर्व नक्सली

​रायपुर नारायणपुर में आत्मसमर्पित नक्सलियों की नई पारी छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में हिंसा और आतंक का मार्ग छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सली अब 'नवनिर्माण' की राह पर निकल पड़े हैं। जिले के लाइवलीहुड कॉलेज स्थित पुनर्वास केंद्र में इन लोगों को केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का आधार भी मिल रहा है। कभी बंदूक थामने वाले इन हाथों ने अब खेतों की खुशहाली के लिए ट्रैक्टर का स्टीयरिंग थामना शुरू कर दिया है। ​लोकतंत्र की मुख्यधारा से जुड़ाव प्रशासनिक पहल के तहत पुनर्वासितों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। इसी कड़ी में हाल ही में 8 पुनर्वासितों को वोटर आईडी कार्ड वितरित किए गए, जिससे वे अब लोकतंत्र का हिस्सा बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, 40 लोगों के फॉर्म-6 भरवाकर उन्हें मतदाता सूची से जोड़ने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। यह कदम उन्हें केवल पहचान ही नहीं, बल्कि समाज में बराबरी का हक भी दिला रहा है। ​कलेक्टर की पहल पर शुरू हुआ प्रशिक्षण पुनर्वास केंद्र के निरीक्षण के दौरान कलेक्टर के समक्ष 40 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने ट्रैक्टर चलाने और उसकी मरम्मत सीखने की इच्छा जताई। कलेक्टर ने इस सकारात्मक पहल को तुरंत मंजूरी दी और सोमवार से ही प्रशिक्षण कार्यक्रम का गणेश कर दिया।​विशेषज्ञ प्रशिक्षकों की देखरेख में ये सभी लोग अब ट्रैक्टर की तकनीकी बारीकियों और रख-रखाव का प्रशिक्षण ले रहे हैं। गौरतलब है कि इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने पूर्व में साइकिल तक नहीं चलाई थी, लेकिन आज वे पूरी गंभीरता के साथ आधुनिक कृषि यंत्रों का कौशल सीख रहे हैं। ​आत्मनिर्भरता से उज्ज्वल भविष्य की ओर यह प्रशिक्षण केवल कौशल विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके जीवन को नई दिशा देने वाला माध्यम है। खेती-किसानी और परिवहन के क्षेत्र में इस कौशल से उन्हें न केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हो सकेंगे। ​अतीत की अस्थिरता और डर के साये से निकलकर अब इन लोगों के चेहरों पर आत्मविश्वास और भविष्य के प्रति स्पष्ट उम्मीदें देखी जा सकती हैं। नारायणपुर का यह केंद्र आज केवल एक पुनर्वास स्थल नहीं, बल्कि विश्वास और बदलाव का एक आदर्श उदाहरण बनकर उभरा है। यह साबित करता है कि सही अवसर और सहयोग मिले, तो भटका हुआ हर व्यक्ति समाज की प्रगति में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकता है।

एमपी में ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट में सुनवाई तेज, पक्ष और विपक्ष की याचिकाएं अलग करने का आदेश

जबलपुर  मध्य प्रदेश में  27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण किए जाने से संबंधित याचिकाओं पर सोमवार से तीन दिनों तक लगातार सुनवाई प्रारंभ हुई। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव कुमार सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने ओबीसी आरक्षण के पक्ष तथा विपक्ष में दायर याचिकाओं को अलग-अलग करने के निर्देश जारी किए हैं। याचिकाओं पर मंगलवार को भी सुनवाई जारी है। गौरतलब है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत किए जाने के पक्ष तथा विपक्ष में हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। आरक्षण के खिलाफ दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी तथा मराठा आरक्षण के संबंध में दायर याचिकाओं में स्पष्ट कहा गया है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। कुछ याचिकाओं में फॉर्मूला 87:13 को चुनौती देते हुए 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर आपत्ति की गई थी। पक्ष में दायर की गई याचिकाओं में आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग की गई थी। कोर्ट ने तीन दिनों तक नियमित सुनवाई के निर्देश जारी किए थे हाईकोर्ट ने कुछ याचिकाओं की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद प्रदेश सरकार सहित अन्य पक्षकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में इसी मुद्दे पर एसएलपी दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी एसएलपी को सुनवाई के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया था। हाईकोर्ट ने 27 अप्रैल से लगातार तीन दिनों तक नियमित सुनवाई के निर्देश जारी किए थे। वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने युगलपीठ को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने तीन माह में संबंधित याचिकाओं के निराकरण के निर्देश जारी किए हैं। युगलपीठ को याचिका की सुनवाई के दौरान जानकारी दी गई कि ओबीसी आरक्षण के विपक्ष में 70 तथा पक्ष में 30 याचिकाएं दायर की गई हैं। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद तर्क प्रस्तुत करने के लिए पक्ष व विपक्ष में दायर याचिकाओं को अलग-अलग करने के आदेश जारी किए हैं।

होशियारपुर में सरपंच का अनोखा कदम, रेलवे ने नहीं दिया गेटमैन तो खुद दिखाते हैं ट्रेन को हरी झंडी

होशियारपुर  गढ़शंकर के गांव बसियाला के सरपंच गुरदेव सिंह बिना गार्ड वाले रेलवे क्रॉसिंग पर एक अनौपचारिक गेटमैन की भूमिका निभा रहे हैं। सरपंच गुरदेव सिंह खुद मोर्चा संभालते हुए फाटक खोलते और बंद करते हैं। रेलवे विभाग ने अब तक फाटक पर कोई कर्मचारी तैनात नहीं किया है, जिसके कारण सरपंच को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। इस स्थिति के चलते गांववासियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और दुर्घटना का खतरा बना हुआ है। सरपंच गुरदेव सिंह ने कहा कि मुझे डर है कि कभी भी किसी बड़े हादसे का सामना करना पड़ सकता है। रेलवे फाटक पर कर्मचारियों की तैनाती न होने के कारण मुझे खुद फाटक खोलने और बंद करने का काम करना पड़ता है। हमने कई बार अधिकारियों से इस मामले में मदद मांगी है, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला। हमें एक रास्ता यहां से रेलवे ने दिया है जो नवांशहर के गांव मुबारिकपुर में निकलता है। जबकि हमारे गांव बसियाला व रसूलपुर गढ़शंकर में पड़ते है। इसके अलावा यह रास्ता दोपहर और शाम के समय महिलाओं के अकेले आने जाने के लिए तो खतरनाक है। गन्ने की ट्रॉलियां भी इस रास्ते से नहीं निकल सकती। गांव वासियों के फाटक पर पहले एक व्यक्ति दस हजार सैलरी पर रखा था। वह भी काम छोड़ गया। उसके बाद से मैं खुद ही फाटक खोलने बंद करने का काम करता हूं।  ग्रामीणों ने चंदा इकठ्ठा कर लगवाया फाटक फाटक नहीं होने पर ग्रामीणों ने खुद चंदा इकट्ठा कर फाटक लगवाया, ताकि आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. इसके बावजूद कई बार रेलवे अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से यहां कर्मचारी तैनात करने की मांग की गई और इसके लिए ज्ञापन भी दिए गए, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. कुछ समय के लिए ग्रामीणों ने एक व्यक्ति को मासिक वेतन पर रखा भी, लेकिन कुछ ही समय बाद वह काम छोड़कर चला गया।  सरपंच में खुद संभाली जिम्मेदारी इसके बाद सरपंच गुरदेव सिंह ने खुद यह जिम्मेदारी संभाल ली. वह दिन में दो बार, जब ट्रेन आने का समय होता है. अपनी दुकान छोड़कर फाटक पर पहुंचते हैं. पहले वह मुबारकपुर के रेलवे स्टाफ से फोन पर ट्रेन की जानकारी लेते हैं, फिर समय पर फाटक बंद कर देते हैं और हाथ में हरी झंडी लेकर ट्रेन को सुरक्षित गुजरने का संकेत देते हैं।  न हो कोई हादसा इसलिए खुद ली जिम्मेदारी गुरदेव सिंह का कहना है कि उन्हें हमेशा इस बात का डर रहता है कि कहीं लापरवाही के कारण कोई बड़ा हादसा न हो जाए, इसलिए उन्होंने इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान लिया है. गांव के लोग भी उनके इस प्रयास की सराहना कर रहे हैं।  गांववासियों का कहना है कि यह रास्ता महिलाओं और बच्चों के लिए भी खतरनाक हो सकता है, खासकर जब वे अकेले इस रास्ते से गुजरती हैं। गांववासियों ने बार-बार विभिन्न नेताओं और अधिकारियों को ज्ञापन देकर रेलवे से इस फाटक पर कर्मचारी तैनात करने की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। पहले रेलवे ने इस रास्ते को बंद कर दिया था, लेकिन गांववासियों के संघर्ष के बाद इसे फिर से खोला गया। हालांकि, फाटक पर कर्मचारियों की तैनाती अभी तक नहीं की गई है। पूर्व सांसद अविनाश राय खन्ना ने हाल ही में केंद्रीय राज्य रेलवे मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू से मिलकर इस समस्या का समाधान करने की अपील की थी। बिट्टू ने आश्वासन दिया था कि जल्द ही इस मामले में कार्रवाई की जाएगी और एक टीम भेजकर कर्मचारी तैनात किया जाएगा। गांववासियों की मांग है कि रेलवे विभाग शीघ्र इस समस्या का समाधान करें और फाटक पर सुरक्षा के लिए कर्मचारी तैनात करें, ताकि किसी बड़े हादसे से बचा जा सके।

CBSE स्कूलों में नया बदलाव, विद्यार्थियों के लिए लिया गया बड़ा फैसला

लुधियाना   सैंट्रल बोर्ड ऑफ सैकेंडरी एजुकेशन (सी.बी.एस.ई.) ने विद्यार्थियों की पढ़ाई की क्वालिटी और सुधारों के उद्देश्य से बड़े बदलाव किए हैं। स्कूलों के पारंपरिक क्लासरूम, जो अब तक केवल चार दीवारी और ब्लैक बोर्ड तक सीमित थे, अब स्किल लैब के रूप में नजर आएंगे। सी.बी.एस.ई. ने सत्र 2026-27 के लिए यह बड़े बदलाव किए हैं जिससे विद्यार्थी किताबी दुनिया से निकलकर जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकेंगे। नए बदलावों के तहत अब रटने की आदत को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है और पढ़ाई को पूरी तरह प्रैक्टिकल नॉलेज पर फोकस किया जाएगा। बोर्ड ने कक्षा तीसरी से ही आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस (एआई) और कोडिंग को अनिवार्य कर दिया है। विद्यार्थी अब इंटरडिसीप्लिनरी प्रोजैक्ट्स के माध्यम से सीखेंगे कि अलग-अलग विषय एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। उदाहरण के तौर पर स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजैक्ट पर काम करते समय वे बजट कैलकुलेशन के लिए मैथ्स, एनर्जी मैनेजमेंट के लिए साइंस और शहरी नियोजन के लिए सोशल साइंस का एक साथ प्रयोग करेंगे। इसके अलावा, 'स्किल सैटरडे' जैसे नवाचारों के जरिए बच्चों में फाइनेंशियल लिटरेसी और पब्लिक स्पीकिंग जैसे जीवन कौशल विकसित किए जाएंगे। परीक्षा का नया पैटर्न : रटने की आदत होगी खत्म  बोर्ड ने परीक्षा के तनाव को कम करने और योग्यता को परखने के लिए इवैल्यूएशन पैटर्न में भी बड़ा बदलाव किया है। अब पेपर में 50 प्रतिशत सवाल कॉम्पिटैंसी यानी योग्यता और व्यावहारिक प्रयोग पर आधारित होंगे। अब किताब के पीछे दिए गए प्रश्नों को रटकर अच्छे मार्क्स लाना मुश्किल होगा। मनोचिकित्सकों के अनुसार, एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग और इस नए परीक्षा पैटर्न से विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और मानसिक तनाव कम होगा। व्यावहारिक होगी गणित  गणित की जटिलताओं को दूर करने के लिए स्कूलों में 'रियल लाइफ मैथ सिमुलेशन' का सहारा लिया जाएगा। इसके तहत स्कूलों में मिनी मार्कीट बनाए जाएंगे, जहां विद्यार्थी खुद दुकानदार और ग्राहक बनेंगे। इस एक्टिविटी से वे डिस्काऊंट, प्रॉफिट और लॉस जैसे कठिन समीकरणों को रटने के बजाय प्रैक्टिकली हल करना सीखेंगे।

कुंआकोंडा के दुर्गम अंचल में पहली बार समग्र जांच का अनुभव, 62 ग्रामीणों की स्क्रीनिंग; गर्भवती सहित 4 मरीज तत्काल रेफर

रायपुर 11 किमी की दूरी नहीं बनी बाधा, स्वास्थ्य टीम पहुंची लोहागांव के हर दरवाजे तक घने जंगल, ऊंचे पहाड़ और कठिन रास्तों के बीच बसे लोहागांव में सोमवार को स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि भरोसे की दस्तक बनकर पहुंचीं। मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग की टीम ने बैलाडीला की पहाड़ियों से घिरे विकासखंड कुआकोंडा के इस सुदूर गांव तक पहुंचने के लिए करीब 11 किलोमीटर का पैदल सफर तय किया। ऐसा सफर, जो सामान्य दिनों में भी आसान नहीं माना जाता। 11 किमी की दूरी नहीं बनी बाधा, स्वास्थ्य टीम पहुंची लोहागांव के हर दरवाजे तक गांव पहुंचने के बाद टीम ने 62 ग्रामीणों की विस्तृत स्वास्थ्य जांच की। इनमें बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे शामिल रहे, जिनमें कई ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने पहली बार इस तरह की समग्र जांच कराई। मलेरिया और सिकल सेल (हीमोग्लोबिन) की जांच के साथ-साथ मोतियाबिंद और कुष्ठ रोग के संभावित मरीजों की पहचान की गई। गर्भवती महिलाओं की विशेष जांच की गई, वहीं बच्चों का टीकाकरण भी सुनिश्चित किया गया। जांच के दौरान 4 मरीजों की स्थिति गंभीर पाई गई, जिन्हें तत्काल जिला अस्पताल रेफर किया गया। इनमें एक गर्भवती महिला, एक मोतियाबिंद मरीज और दो मलेरिया पॉजिटिव मरीज शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, समय रहते इन मरीजों की पहचान होना आगे चलकर गंभीर जटिलताओं को रोकने में मददगार साबित होगा। दरअसल, 13 अप्रैल से शुरू हुए इस अभियान के तहत पूरे जिले में 76 स्वास्थ्य स्थलों के माध्यम से टीमें गांव-गांव पहुंच रही हैं। इसका उद्देश्य केवल उपचार देना नहीं, बल्कि दूरस्थ अंचलों में छिपी बीमारियों की समय रहते पहचान कर उन्हें स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना है। लोहागांव जैसे दुर्गम क्षेत्रों में टीम की यह पहुंच इस बात का संकेत है कि अब स्वास्थ्य सेवाएं “इंतजार” नहीं, बल्कि “पहलकदमी” के रूप में सामने आ रही हैं। जहां पहले दूरी और संसाधनों की कमी बड़ी बाधा थी, वहीं अब यही अभियान उन बाधाओं को पार करने की कोशिश करता दिख रहा है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया का दबदबा बढ़ा, एमपी में 5 समर्थकों को दिलाए बड़े पद

भोपाल   एमपी में विभिन्न निगमों, मंडलों, विशेष क्षेत्र प्राधिकरणों में नियुक्तियों का दौर लगातार जारी है। इसी क्रम में ग्वालियर विकास प्राधिकरण जीडीए और विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण साडा में भी नियुक्तियां की गई हैं। इन नियुक्तियों के संबंध में प्रदेश के नगरीय विकास विभाग द्वारा जारी आदेश के साथ ही ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया का दबदबा साफ नजर आया। ग्वालियर के विकास की रूपरेखा तय करने वाली दो सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं ग्वालियर विकास प्राधिकरण और विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण में सिंधिया समर्थकों अहम दायित्व दिए गए हैं। हालिया राजनैतिक नियुक्तियों ने प्रदेश की राजनीति में एक स्पष्ट संदेश दिया है। ग्वालियर चंबल इलाके में सत्ता के केंद्र में अब भी ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि इन पदों के लिए खींचतान लंबी चलेगी, लेकिन अंतिम सूची ने यह साफ कर दिया है कि ग्वालियर के निर्णयों में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बड़ा प्रभाव रहता है। जीडीए और साडा में जिन नेताओं की नियुक्तियां हुई, उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे का ही माना जाता है जीडीए और साडा में जिन नेताओं की नियुक्तियां हुई हैं उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे का ही माना जाता है। दरअसल इन दोनों प्राधिकरणों में उन्होंने अपने 5 समर्थकों को अहम पद दिला दिए हैं। अध्यक्ष पद पर मधुसूदन भदौरिया की नियुक्ति में सिंधिया की रजामंदी, उपाध्यक्ष के रूप में सुधीर गुप्ता व वेद प्रकाश शिवहरे का चयन ग्वालियर विकास प्राधिकरण (जीडीए) अध्यक्ष पद पर मधुसूदन भदौरिया की नियुक्ति में सिंधिया की रजामंदी और उपाध्यक्ष के रूप में सुधीर गुप्ता व वेद प्रकाश शिवहरे का चयन सीधे तौर पर सिंधिया खेमे की मजबूती को दर्शाता है। ये सभी नेता सिंधिया समर्थक माने जाते हैं। विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) ग्वालियर के भविष्य के विस्तार के लिए जिम्मेदार इस संस्था की कमान अशोक शर्मा को सौंपी गई है, जबकि हरीश मेवाफरोश को उपाध्यक्ष बनाया गया है। ये दोनों भी सिंधिया के खेमे के ही माने गए हैं। सत्ता का स्पष्ट संतुलन: आर्थिक शक्ति केंद्रों पर सिंधिया खेमे के लोगों की नियुक्तियां इन नियुक्तियों के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि ग्वालियर के विकास से संबंधित निर्णयों में ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका और उनका दबदबा न केवल कायम है, बल्कि पहले से कहीं अधिक संगठित व सशक्त होकर उभरा है। जीडीए और साडा के मुख्य पदों पर नियुक्तियों को लेकर जो हालिया विश्लेषण सामने आए हैं, वे इशारा करते हैं कि यह केवल संगठन की मजबूती नहीं, बल्कि सिंधिया के दबदबे का परिणाम है।

छिंदवाड़ा में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट की योजना: गौतम अडानी, कमलनाथ और मुख्यमंत्री यादव की अहम जुगलबंदी

छिंदवाड़ा  देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूह अडानी ग्रुप छिंदवाड़ा में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट लगाने की तैयारी कर रहा है. मध्य प्रदेश सरकार ने इस प्रस्ताव को कैबिनेट में चर्चा के लिए रखा है. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अडानी ग्रुप के मालिक गौतम अडानी से इस बारे में गहन मंथन किया है. न्यूक्लियर पॉवर प्लांट छिंदवाड़ा के चौसरा गांव के पास 750 एकड़ में बनना है।  अडानी ग्रुप को 16 साल पहले दी जमीन छिंदवाड़ा के चौसरा गांव में करीब 16 साल पहले अडानी ग्रुप को थर्मल पॉवर प्लांट बनाने के लिए सरकार ने 750 एकड़ जमीन ट्रांसफर की थी. इसका नाम पेच थर्मल एनर्जी रखा गया था. कंपनी ने अपना ऑफिस भी बनाया, जमीन कवर्ड की लेकिन प्लांट का काम शुरू नहीं हो पाया. अब इसी जमीन पर थर्मल पॉवर प्लांट की जगह न्यूक्लियर थर्मल पॉवर प्लांट प्रस्तावित किया गया है. छिंदवाड़ा में न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का प्रस्ताव मंत्री परिषद में रखा गया है।  अडानी से मीटिंग पर क्या बोले कमलनाथ पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने जिला कांग्रेस कमेटी के हवाले से प्रेस नोट जारी कर कहा है "छिंदवाड़ा के समग्र विकास के लिए हमारा संकल्प दृढ़ है. वर्षों से जो भूमि अनुपयोगी पड़ी है, उसे अब विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का समय आ गया है. इसी उद्देश्य से छिंदवाड़ा में प्रस्तावित न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट को लेकर हमने गंभीरता से पहल की है।  कमलनाथ ने कहा "इस संदर्भ में गौतम अडानी से सकारात्मक चर्चा हुई है, ताकि क्षेत्र में निवेश और रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकें. मेरा हमेशा से प्रयास रहा है कि छिंदवाड़ा को विकास के मॉडल के रूप में स्थापित किया जाए. यह परियोजना उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो क्षेत्र के भविष्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी." थर्मल पॉवर प्लांट की जगह न्यूक्लियर पॉवर प्लांट अडानी ग्रुप को छिंदवाड़ा के चौसरा गांव के आसपास 299.614 हेक्टेयर यानि करीब 750 एकड़ जमीन सरकार ने दी थी. अडानी ग्रुप ने 39.6 0 करोड़ रुपए की कमिटमेंट गारंटी भी मध्य प्रदेश पॉवर मैनेजमेंट कंपनी में जमा कर दी. लेकिन किन्हीं कारणों से प्रोजेक्ट अब तक शुरू नहीं हो पाया. अब अडानी पॉवर लिमिटेड ने इस थर्मल पावर प्लांट की जगह न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने का प्रस्ताव मध्य प्रदेश सरकार के सामने रखा है. इस प्रस्ताव को कैबिनेट से मंजूरी मिलनी का इंतजार है।  किसानों ने किया था विरोध, कोर्ट ने भी मांगा था जवाब जमीन अधिग्रहण को लेकर कई बार पीड़ित किसानों और उनके परिवारों ने विरोध भी किया है. साल 2021 और 2023 में किसानों ने अधिग्रहण हुई जमीन पर कब्जा कर फसल लगा दी थी. हालांकि बाद में प्रशासन की मदद से फसल पर बुलडोजर चलाया गया. किसानों का आरोप है कि कंपनी ने जब जमीन का अधिग्रहण किया था तो उनसे वादा किया था कि जल्द यहां पर पॉवर प्लांट लगाया जाएगा।  जिन किसानों की जमीन पॉवर प्लांट के लिए अधिग्रहण की गई है, उनके परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी दी जाएगी. लेकिन ना तो जमीन पर काम शुरू हुआ और ना ही किसी को नौकरी मिली. हमारी जमीन वापस की जाए. वहीं, 2022 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट नेपॉवर प्लांट का काम शुरू नहीं होने पर अडानी ग्रुप से जवाब मांगा था।  40 साल पहले हुआ था जमीन का अधिग्रहण छिंदवाड़ा के चौसरा गांव के पास पेंच नदी के पानी से थर्मल पॉवर प्लांट बनाने के लिए 1986-1988 के दौरान मध्य प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड ने जमीन अधिग्रहित की थी. 1320 मेगावाट के इस प्लांट के लिए चौरई तहसील के चौसरा, हिवेरखेड़ी, धनोरा,थांवरीटेका,डागावानी पिपरिया गांवों की जमीन ली गई थी।  न्यूक्लियर पॉवर प्लांट प्लान से क्या लाभ     स्थानीय युवाओं को बड़े स्तर पर पर रोजगार मिलेगा     क्षेत्र में उद्योग एवं व्यापार को नई गति मिलेगी     आधारभूत जरूरतें सड़क, बिजली और जल व्यवस्था मजबूत होगी     शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में विस्तार होगा     सालों से बंजर पड़ी भूमि का सही उपयोग होगा