samacharsecretary.com

विजयपुर के विधायक मुकेश मल्होत्रा, HC ने दिए अपने ही फैसले पर स्टे

श्योपुर  मध्य प्रदेश का श्योपुर विधानसभा क्षेत्र में बीते 2-3 दिनों से चर्चाओं में बना हुआ है. इसकी वजह है, सोमवार यानि 9 मार्च को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ का सुनाया गया फैसला. जहां कोर्ट ने विजयपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर फैसला सुनाते हुए बीजेपी के हारे हुए प्रत्याशी रामनिवास रावत को विधायक घोषित किया था, जबकि कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा की विधायकी शून्य की थी. वहीं हाईकोर्ट ने राज्यसभा सांसद विवेक तंखा की याचिका पर संज्ञान लेते हुए अपने ही फैसले पर 15 दिन का स्टे लगा दिया है. जिसके बाद कांग्रेस अब सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी। अपने ही फैसले पर हाईकोर्ट ने लगाया स्टे विजयपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद विवेक तंखा ने तुरंत कोर्ट का रूख किया. जहां विवेक तंखा की याचिका पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले को 15 दिन के लिए स्थगित कर दिया है. जिसका मतलब है कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में अपील करके स्थगन आदेश प्राप्त करने का मौका दिया गया है. यह स्थगन RP एक्ट के प्रावधान अनुसार दिया गया है. यानि तब तक मुकेश मल्होत्रा विजयपुर से कांग्रेस विधायक रहेंगे. जस्टिस एसजी अहलूवालिया ने मुकेश मल्होत्रा ​​की इस दलील पर सहमति जताई कि अगर फैसले के असर और अमल पर रोक नहीं लगाई गई तो उन्हें भारी नुकसान होगा. उन्होंने कहा कि "फैसले के असर और अमल पर 15 दिनों के लिए रोक लगाने की अर्ज़ी न्याय के हित में है, ताकि प्रतिवादी मुकेश मल्होत्रा ​​सुप्रीम कोर्ट से रोक का आदेश ले सकें। जीतू पटवारी ने बताया लोकतांत्रिक लड़ाई जीतू पटवारी ने कहा कि हम लोकतांत्रिक तरीके से फिर से कांग्रेस का विधायक बनवाएंगे. कांग्रेस अध्यक्ष ने इसे लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई बताया है. उन्होंने कहा कि हम राज्यसभा सांसद के साथ मजबूती से लगे हुए हैं. साथ ही कहा कि बीजेपी दलित, आदिवासी और आरक्षण विरोधी है. बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट में विवेक तंखा और अभिषेक मनु संघवी मामले की पैरवी करेंगे। क्या है मुकेश मल्होत्रा और रामनिवास का पूरा मामला दरअसल, विजयपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा को जीत मिली थी, जबकि बीजेपी रामनिवास रावत को हार का सामना करना पड़ा था. हार के बाद रामनिवास रावत ने हाईकोर्ट में मुकेश मल्होत्रा के खिलाफ याचिका लगाई थी, जिसमें दावा किया गया था कि कांग्रेस विधायक ने आपराधिक जानकारी छिपाई है. मामले में सोमवार को ग्वालियर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए मुकेश मल्होत्रा द्वारा आपराधिक जानकारी छिपाने की बात सही पाई गई, जिसके बाद कोर्ट ने मुकेश मल्होत्रा की विधायकी शून्य कर दी और रामनिवास रावत को विधायक घोषित किया।

कांग्रेस का विरोध अब देश के खिलाफ दिखने लगा : संजय सरावगी का हमला

पटना,  बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने एसआईआर को लेकर राहुल गांधी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी बिहार में जिस तरह चुनाव प्रचार कर रहे थे और बार-बार उन्हीं मुद्दों को उठा रहे थे लेकिन आम जनता ने इसे नकार दिया और कांग्रेस का सफाया कर दिया। उनके पास विधायकों की संख्या नाममात्र की है। संजय सरावगी ने कहा कि पूरे देश में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। बिहार में भी एसआईआर हुआ और एक भी व्यक्ति न्यायालय में नहीं गया। इन बातों का जनता पर असर नहीं होता। मुद्दों को भटकाने वाली बातों को आम जनता नकार चुकी है। कांग्रेस का तो चाल, चरित्र और चेहरा उजागर हो चुका है। कांग्रेस भाजपा का विरोध करते-करते देश का विरोध करने लगी है। देश की जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। बता दें कि देश के कई राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया जारी है और विपक्ष एसआईआर का विरोध कर रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी एसआईआर के बाद मतदाताओं के नाम कटने का आरोप लगा रही हैं और धरना प्रदर्शन कर रही हैं। 10 मार्च को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में एसआईआर को धोखाधड़ी करार दिया था। मल्लिकार्जुन खड़गे ने एसआईआर को लेकर राज्यसभा में कहा था कि एसआईआर के नाम पर हर जगह धोखाधड़ी हो रही है। यह सबसे बुरा है और सारी कवायद चुनाव जीतने के लिए हो रही है। इस तरह की कवायद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक में हो रही है। हर जगह और हर राज्य में धोखाधड़ी ही धोखाधड़ी है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 9 मार्च को आरोप लगाया था कि राज्य में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची में बदलाव का मकसद आगामी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाना है। ममता बनर्जी ने धरनास्थल से पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर चुनौती देते हुए कहा था कि अगर भाजपा को चुनाव आयोग का समर्थन भी मिल जाए, तो भी वह चुनाव नहीं जीत पाएगी। उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता अपने अधिकार छीनने वालों को करारा जवाब देगी।  

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर AAP का बयान, केजरीवाल केस की सुनवाई के बीच BJP कनेक्शन पर विवाद

नई दिल्ली कथित शराब घोटाले से जुड़े केस की सुनवाई कर रहीं हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर आम आदमी पार्टी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। 'आप' ने सवाल किया है कि भाजपा और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बीच क्या रिश्ता है? कथित शराब घोटाले से जुड़े केस की सुनवाई कर रहीं हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर आम आदमी पार्टी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। 'आप' ने सवाल किया है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से क्या रिश्ता है? आप के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने भाजपा नेताओं के बयानों के मायने तलाशते हुए जज को लेकर यह सवाल उठाया है। कथित शराब घोटाले के केस में ट्रायल कोर्ट ने 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल समेत सभी 23 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया था। सीबीआई ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच इसकी सुनवाई कर रही है। सोमवार को जस्टिस स्वर्ण कांता ने फौरी तौर पर सीबीआई को राहत दी तो भाजपा नेताओं ने उम्मीद जाहिर की कि ‘पिक्चर अभी बाकी’ है। अब इसी को आधार बनाकर 'आप' ने जज की निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए हैं। पूर्व मंत्री और आप के प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस वीरेंद्र सचदेवा का एक बयान सुनाया और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा का ट्वीट दिखाया। उन्होंने कहा, ‘जिस तरीके से दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा कह रहे हैं कि निश्चित सजा मिलेगी, इनके मंत्री कपिल मिश्रा कह रहे हैं कि पिक्चर अभी बाकी है। इन्हें कैसे पता कि पिक्चर अभी बाकी है। पिक्चर में क्या बाकी है, यह कपिल मिश्रा को कैसे पता, यह तो अभी हाई कोर्ट की जज साहिबा को भी नहीं पता होगा। अभी वह केस पढ़ेंगी तब पता चलेगा।’ कपिल मिश्रा की वजह से हो गया था जज का ट्रांसफर: भारद्वाज भारद्वाज ने कहा कि वीरेंद्र सचदेवा कैसे कह सकते हैं कि निश्चित तौर पर सजा मिलेगी। क्या ये सीधे तौर पर यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि इन्हें मालूम है कि इस मुकदमे में क्या होगा। इन्हें पता है कि पिक्चर आगे क्या है? क्या ये कहना चाह रहे हैं कि हम जो फैसला चाहेंगे वह जस्टिस स्वर्ण कांता से करा लेंगे? 'आप' नेता ने कपिल मिश्रा का प्रभाव बताते हुए आरोप लगाया कि हाई कोर्ट के एक जज ने उनके खिलाफ एफआईआर का आदेश दिया और अगले दिन अदालत में तलब किया तो रात को ही उनका ट्रांसफर हो गया। जज का पूछ लिया भाजपा से रिश्ता सौरभ भारद्वाज ने कई सवालों के बीच जस्टिस का भाजपा से रिश्ता भी पूछ लिया। उन्होंने कहा, 'कपिल मिश्रा का यह कहना कि पिक्चर अभी बाकी है, यह कुछ सवाल पैदा करता है। क्या जस्टिस क्या करेंगी यह इनको मालूम है? इनका क्या सवाल आता है। जस्टिस स्वर्ण कांता का भाजपा से क्या रिश्ता है,यह इन लोगों को बताना चाहिए। वीरेंद्र सचदेवा और कपिल मिश्रा कैसे कह सकते हैं कि पिक्चर अभी बाकी है। मैं आपके सामने गंभीर सवाल रख रहा हूं।'

पश्चिम बंगाल चुनाव: भाजपा ने एक से दो चरणों की प्रक्रिया पर जोर दिया

कोलकाता भारतीय जनता पार्टी की पश्चिम बंगाल इकाई ने राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की पूर्ण पीठ के समक्ष विस्तृत प्रस्तुति दी। पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और निष्पक्ष बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव आयोग के सामने रखे। भाजपा ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक चलने वाली चुनाव प्रक्रिया से हिंसा और प्रशासनिक दखल की आशंका बढ़ जाती है। पार्टी ने आयोग से मांग की कि छह सप्ताह तक 7–8 चरणों में मतदान कराने के बजाय कम समय में अधिकतम एक या दो चरणों में मतदान कराया जाए। साथ ही, पिछले तीन चुनावों 2019 व 2024 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग के आदेश से स्थानांतरित किए गए सभी अधिकारियों को फिर से ट्रांसफर करने की मांग की। भाजपा ने “संवेदनशील बूथ” के बारे में बताते हुए कहा कि जहां पिछले तीन चुनावों के दौरान मतदान के समय या उसके बाद हिंसा हुई हो, या जहां 85 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है और अशांति फैलाई जा सकती है। सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भाजपा ने पश्चिम बंगाल पुलिस पर निर्भरता कम करने की बात कही। पार्टी ने मांग की कि पर्याप्त संख्या में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की अग्रिम तैनाती की जाए और उनके लिए क्षेत्र से परिचित कराने हेतु हैंडबुक उपलब्ध कराई जाए। साथ ही सीएपीएफ के नोडल अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि बल की तैनाती व आवाजाही पूरी तरह पारदर्शी हो और जवान स्थानीय लोगों से किसी प्रकार की मेहमाननवाजी स्वीकार न करें। भाजपा ने यह भी सुझाव दिया कि सामान्य पर्यवेक्षकों और पुलिस पर्यवेक्षकों को काफी पहले से तैनात किया जाए ताकि वे स्वतंत्र आकलन कर सकें। वहीं, सीएपीएफ की ओर से एरिया डॉमिनेशन, रूट मार्च और कॉन्फिडेंस बिल्डिंग उपाय स्थानीय पुलिस के बजाय ऑब्जर्वरों की पहचान के आधार पर किए जाएं। भाजपा ने वोटरों की पहचान के लिए दो चरणों की व्यवस्था, हर पोलिंग स्टेशन पर वेबकैम और राज्य व केंद्र सरकार के अधिकारियों की 50-50 फीसदी भागीदारी की भी मांग की। पार्टी का कहना है कि इन उपायों से चुनाव प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बन सकेगी।

BJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त से की अपील, बंगाल में 3 चरणों में मतदान कराने की मांग

बंगाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में आयोग की फुल बेंच अभी बंगाल के दौरे पर है और चुनाव से जुड़ी तैयारियों का जायजा ले रही है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर कभी भी चुनाव तारीखों का ऐलान हो सकता है. इस बीच राज्य में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर चुनाव को 3 चरणों में ही कराए जाने की मांग की है. बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज सोमवार को कोलकाता में चुनाव आयोग की फुल बेंच से मुलाकात की और यह मांग की कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 3 चरणों से ज्यादा चरणों में नहीं कराया जाना चाहिए. पार्टी की ओर से यह भी कहा गया कि आयोग को पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान किसी तरह की हिंसा नहीं होने, इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए. BJP ने चुनाव आयोग से चुनावी प्रक्रिया को बहुत ही कम समय में खत्म कराने की अपील की. पार्टी ने कहा, “हमारी पहली मांग है कि चुनाव एक, दो या ज्यादा से ज्यादा 3 चरणों में कराई जाए. 7 या 8 चरणों में चुनाव कराने की कोई जरूरत नहीं है.” विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सुरक्षा माहौल को लेकर गहरी चिंता जताते हुए BJP प्रतिनिधिमंडल ने आयोग को अपनी 16 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा. मामले से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ अन्य चुनाव आयुक्त एसएस संधू और विवेक जोशी के साथ आज सोमवार को मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर की पार्टियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर रहे हैं ताकि चुनाव कराने को लेकर उनकी चिंताओं और सुझावों को सुना जा सके. BJP नेता जगन्नाथ चट्टोपाध्याय, जो मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त से मिलने वाले 3 सदस्यीय पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, ने बताया कि पार्टी ने आयोग से विधानसभा चुनाव अधिक से अधिक 3 चरणों में कराने की अपील की है. उन्होंने कहा, “हमने एक, 2 या 3 चरणों में चुनाव की मांग की थी, लेकिन इससे ज्यादा चरणों में नहीं हो.” BJP के नेता शिशिर बाजोरिया, जो प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा भी थे, ने कहा, “मैंने अपनी आंखों से देखा कि रूट मार्च पूरी तरह से शांतिपूर्ण इलाकों कराए जा रहे हैं. ये मुख्य सड़कों पर किए जा रहे हैं जहां कोई लोग नहीं रहते, सिर्फ गाड़ियां गुजरती हैं. इस तरह राज्य पुलिस सेंट्रल फ़ोर्स को काम करने के लिए मजबूर कर रही है.”

असम में सीट शेयरिंग पर BJP की चिंता, क्या NDA के साथी देंगे चुनौती?

गुवाहाटी असम में 2026 की चुनावी बिसात बिछ चुकी है, लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही खेमों के भीतर सीटों के गणित को लेकर तनातनी कम होने का नाम नहीं ले रही है। गठबंधन की राजनीति के इस दौर में सहयोगी दलों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं ने रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। हालात यह हैं कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में गठबंधन के सहयोगियों के बीच ही 'मैत्रीपूर्ण मुकाबला' होने की संभावना प्रबल हो गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार एक तरफ विकास के दावों के साथ मैदान में है, वहीं दूसरी ओर उसे अपने सहयोगियों असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) को संतुष्ट रखने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। असम गण परिषद (AGP) 2014 से भाजपा की वफादार साथी रही है। इस बार अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना रही है। पिछले 2021 के चुनावों में एजीपी ने 29 सीटों पर दांव आजमाया था, जिनमें से 26 पर उसने अकेले चुनाव लड़ा और 3 सीटों पर भाजपा के साथ दोस्ताना मुकाबला किया था। अंततः पार्टी 9 सीटें जीतने में सफल रही थी। इस बार एजीपी के जमीनी कार्यकर्ताओं की मांग है कि पार्टी को अधिक सीटों पर मौका मिलना चाहिए, जिससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने संकेत दिया है कि एजीपी के साथ शुरुआती दौर की चर्चा शुरू हो चुकी है और 9 या 10 मार्च तक सीटों का अंतिम खाका तैयार हो सकता है। हालांकि, जब उनसे सहयोगियों की बढ़ती मांगों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी औपचारिक मांग से अवगत नहीं हैं, लेकिन उन्होंने 'फ्रेंडली फाइट' की संभावना से इनकार भी नहीं किया। बोडोलैंड का पेच गठबंधन की सबसे पेचीदा स्थिति बोडोलैंड क्षेत्र में देखने को मिल रही है। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) ने अपनी आक्रामक रणनीति का ऐलान करते हुए 21 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। इनमें से 15 सीटें बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) क्षेत्र की हैं और 6 सीटें उससे बाहर की हैं। सबसे बड़ी बाधा यह है कि बीपीएफ (BPF) और यूपीपीएल (UPPL) के बीच की कड़वाहट खत्म होने का नाम नहीं ले रही। दोनों दलों ने साफ कर दिया है कि वे न तो साथ चुनाव लड़ सकते हैं और न ही किसी सीट-शेयरिंग फॉर्मूले पर सहमत होंगे। यह स्थिति भाजपा के लिए सिरदर्द बन गई है, क्योंकि उसे इन दोनों क्षेत्रीय ताकतों के बीच संतुलन बनाना है। विपक्ष की एकजुटता दूसरी ओर सत्ता से बाहर कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर चार प्रमुख विपक्षी दलों ने हाथ मिलाया है और संयुक्त अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने गठबंधन की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि सभी सहयोगी दल जल्द ही पूरे राज्य में समन्वयित अभियान बैठकें करेंगे। गोगोई ने कहा, "हमारे पास केवल 30 दिन बचे हैं और ये 30 दिन असम के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमें एकजुट होकर जनता के बीच जाना होगा।" विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे कितनी जल्दी अपनी सीटों का बंटवारा कर पाते हैं, ताकि प्रचार के आखिरी दिनों में कोई आंतरिक कलह सामने न आए। जैसे-जैसे नामांकन की तारीखें नजदीक आ रही हैं, असम की राजनीति में गठबंधन धर्म और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के बीच का संघर्ष गहराता जा रहा है। जहां भाजपा के लिए अपने सहयोगियों की नाराजगी को दूर करना एक बड़ी परीक्षा है, वहीं विपक्ष के लिए 30 दिनों के भीतर एक साझा और प्रभावी नैरेटिव तैयार करना आसान नहीं होगा।

BJP में शामिल काबिल नेताओं को निगम-मंडल नियुक्तियों में मिल सकता है बड़ा पद, दिया गया संकेत

भोपाल   मध्यप्रदेश में लंबे समय से प्रतीक्षित निगम-मंडल की नियुक्तियों को लेकर सियासत तेज हो गई है। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने संकेत दिया है कि पार्टी की ओर से नाम लगभग तय कर लिए गए हैं और अब केंद्रीय नेतृत्व की मुहर के बाद सूची जल्द जारी की जा सकती है। होली के बाद पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में खंडेलवाल ने कहा कि प्रदेश संगठन अपने हिस्से का काम पूरा कर चुका है। अब अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होना है। उन्होंने बताया कि पार्टी की प्राथमिकता पहले संगठन की सभी नियुक्तियों को पूरा करना है, जिसके बाद निगम-मंडल की सूची जारी की जाएगी। प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि एल्डरमैन की नियुक्तियों के बाद ही निगम-मंडल के पदों की घोषणा की जाएगी। इससे संकेत मिल रहा है कि लंबे समय से इंतजार कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को जल्द जिम्मेदारी मिल सकती है। कांग्रेस से आए नेताओं को भी मिलेगा मौका खंडेलवाल ने यह भी इशारा किया कि कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए योग्य नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी मौका दिया जाएगा। हालांकि उन्होंने साफ किया कि हारे हुए नेताओं और पूर्व मंत्रियों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। पार्टी युवाओं और काबिल कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने पर ज्यादा फोकस करेगी। अप्रैल में होगी पहली प्रदेश कार्यसमिति बैठक प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि नई प्रदेश कार्यकारिणी की पहली कार्यसमिति बैठक अप्रैल में आयोजित की जाएगी। इसके बाद हर तीन महीने में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक नियमित रूप से होगी।अब राजनीतिक गलियारों में नजर इस बात पर टिकी है कि निगम-मंडल की बहुप्रतीक्षित सूची कब जारी होती है और उसमें किन नेताओं को जगह मिलती है।

MP में सियासी बदलाव, 40 साल बाद कांग्रेस में नई पीढ़ी की एंट्री, BJP में भी नए चेहरे सामने आ रहे

भोपाल मध्य प्रदेश की राजनीति में अब नई पीढ़ी का दौर तेजी से दिखाई देने लगा है। लंबे समय तक वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में चलने वाली दोनों प्रमुख पार्टियों—Indian National Congress और Bharatiya Janata Party—में अब युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के बाद प्रदेश स्तर पर नेतृत्व में बड़ा बदलाव करते हुए नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है, वहीं भाजपा में भी नए चेहरे प्रभावी होते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस में नई पीढ़ी को नेतृत्व 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए वरिष्ठ नेता Kamal Nath को प्रदेश नेतृत्व से हटाकर युवा नेता Jitu Patwari को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया।साथ ही आदिवासी नेता Umang Singhar को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब पटवारी और सिंघार की जोड़ी प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और पार्टी को फिर से खड़ा करने के प्रयास में जुटी हुई है। संगठन सृजन अभियान में उम्र सीमा तय कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के दौरान पदाधिकारियों के लिए 50 वर्ष से कम उम्र की सीमा तय की। इसके तहत ब्लॉक, जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर करीब आधे पदों पर 50 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को मौका दिया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक पद पर पांच वर्ष से अधिक नहीं रखा जाएगा, ताकि संगठन में लगातार नए नेताओं को अवसर मिलते रहें। पटवारी–सिंघार बने नई रणनीति का चेहरा कांग्रेस की इस रणनीति का असर प्रदेश नेतृत्व में साफ दिखाई देता है। Jitu Patwari और Umang Singhar को लगभग 50 वर्ष की उम्र में ही बड़ी जिम्मेदारी दी गई थी। पार्टी इसे युवा नेतृत्व को आगे लाने की शुरुआत मान रही है। भाजपा में भी उभर रहे नए चेहरे मध्य प्रदेश में Bharatiya Janata Party में भी नेतृत्व परिवर्तन की झलक दिखाई दे रही है। प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में Mohan Yadav और प्रदेश अध्यक्ष के रूप में Hemant Khandelwal को नई पीढ़ी के नेताओं में माना जा रहा है। भाजपा में यह बदलाव अपेक्षाकृत सहज तरीके से स्वीकार किया गया, जबकि कांग्रेस में शुरुआत में कुछ हिचक देखने को मिली थी। भाजपा की पुरानी पीढ़ी का लंबा दौर दरअसल, 1985-90 के दौर में भाजपा के नेतृत्व ने जिन नेताओं को आगे बढ़ाया था, वे लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे। इनमें Shivraj Singh Chouhan, Kailash Vijayvargiya, Narendra Singh Tomar, Prahlad Patel, Narottam Mishra और Jayant Malaiya जैसे नेता शामिल रहे। वर्ष 2023 में करीब तीन दशक बाद भाजपा ने नया चेहरा सामने लाते हुए Mohan Yadav को मुख्यमंत्री बनाया। सियासी संकेत: मध्य प्रदेश में अब राजनीति धीरे-धीरे पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी की ओर बढ़ती हुई नजर आ रही है। आने वाले वर्षों में दोनों ही दलों में युवा नेतृत्व की भूमिका और अधिक बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।  

राज्यसभा चुनाव का असर संगठन पर भी? MP के कई दिग्गजों को राष्ट्रीय टीम में मिल सकता है बड़ा रोल

भोपाल राज्यसभा चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी के संगठन में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि 16 मार्च के बाद भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान हो सकता है, जिसमें मध्य प्रदेश के कई नेताओं को अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के कार्यभार संभालने के बाद से ही नई टीम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। राज्यसभा चुनाव के बाद होगा बड़ा फैसला सूत्रों के अनुसार बिहार, छत्तीसगढ़ समेत करीब दस राज्यों में होने वाले राज्यसभा चुनाव के बाद भाजपा संगठन में फेरबदल पर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। इसके लिए केंद्रीय स्तर पर मंथन भी शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि संगठन को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत बनाने के उद्देश्य से अनुभवी नेताओं के साथ-साथ युवा और महिला चेहरों को भी टीम में जगह दी जा सकती है। राष्ट्रीय संगठन में पहले से मजबूत है मध्य प्रदेश भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में मध्य प्रदेश को पहले से ही खास महत्व मिलता रहा है। वर्तमान में प्रदेश से कई नेता राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इनमें सत्यनारायण जटिया संसदीय बोर्ड के सदस्य हैं, जबकि ओमप्रकाश धुर्वे राष्ट्रीय सचिव के रूप में कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति मोर्चा में भी प्रदेश के नेताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। यही वजह है कि नई टीम में भी मध्य प्रदेश की मजबूत भागीदारी की संभावना जताई जा रही है। नड्डा की टीम में भी था प्रदेश का प्रभाव पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टीम में भी मध्य प्रदेश के चार नेताओं को जगह मिली थी। उस समय कैलाश विजयवर्गीय राष्ट्रीय महासचिव के पद पर थे। बाद में वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट दिया और जीत के बाद उन्हें राज्य सरकार में मंत्री बनाया गया। इससे पहले भी भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में एक ही समय में मध्य प्रदेश से दो-दो महासचिव—बावरचंद गहलोत और नरेंद्र सिंह तोमर—रह चुके हैं।   चार से पांच नेताओं को मिल सकती है जिम्मेदारी भाजपा सूत्रों का कहना है कि नई राष्ट्रीय टीम में मध्य प्रदेश से चार से पांच नेताओं को जगह मिल सकती है। इनमें एक-दो वरिष्ठ नेताओं के साथ युवा चेहरों को भी अवसर मिलने की संभावना है। कुछ नेताओं को विभिन्न मोर्चों और प्रकोष्ठों में भी जिम्मेदारी दी जा सकती है। दरअसल, मध्य प्रदेश को भाजपा के लिए लंबे समय से एक मजबूत संगठनात्मक आधार माना जाता है। संघ और जनसंघ की जड़ों से जुड़ा यह प्रदेश पार्टी के लिए प्रयोगशाला की तरह रहा है। मजबूत संगठन और अनुभवी कार्यकर्ताओं के कारण यहां के नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार अवसर मिलता रहा है। ऐसे में नई टीम में मध्य प्रदेश की भूमिका फिर अहम रहने की संभावना है।

राजनीतिक नियुक्तियां जल्दी, निगम-मंडलों के 36 नामों की सूची तैयार, मंत्रिमंडल विस्तार फिलहाल नहीं

भोपाल  प्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से जारी इंतजार अब खत्म होने वाला है। सत्ताधारी दल के शीर्ष नेतृत्व ने निगम-मंडलों, प्राधिकरणों और विभिन्न सरकारी संगठनों में नियुक्तियों के लिए करीब तीन दर्जन नामों का प्रस्ताव तैयार किया है। यह सूची हाल ही में दिल्ली में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को सौंप दी गई है। अंतिम मुहर लगने के बाद औपचारिक घोषणा की जाएगी।  सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित सूची में संगठन और सरकार से जुड़े ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी गई है, जो लंबे समय से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन अब तक किसी महत्वपूर्ण दायित्व से वंचित रहे हैं। सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है। चरणबद्ध  होंगी नियुक्तियां बताया जा रहा है कि नियुक्तियां चरणबद्ध तरीके से की जाएंगी। कुछ प्रमुख निगमों और प्राधिकरणों में पहले चरण में नियुक्ति आदेश जारी हो सकते हैं, जबकि शेष पदों पर बाद में निर्णय लिया जाएगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि इन नियुक्तियों से संगठन में उत्साह बढ़ेगा और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को नई ऊर्जा मिलेगी। लंबे समय से टल रहा निर्णय बता दें, कि लोकसभा चुनाव के बाद से ही इन नियुक्तियों को लेकर चर्चा चल रही थी। कई बार सूची तैयार होने की बात सामने आई, लेकिन अंतिम निर्णय टलता रहा। अब माना जा रहा है कि इसी माह कभी भी इस संबंध में आधिकारिक रूप से सूची जारी की जा सकती है। भाजपा बचे हुए मोर्चो की कार्यकारिणी, जिला कार्यकारिणी, मंडल पदाधिकारियों, एल्डर मैन समेत अन्य पदों पर नियुक्ति के आदेश जल्द जारी करेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आगामी नगरीय निकाय और अन्य चुनावों को देखते हुए संगठनात्मक संतुलन बनाना पार्टी की प्राथमिकता है। ऐसे में इन नियुक्तियों को रणनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। मंत्रिमंडल विस्तार अभी नहीं, प्रदेश कार्यसमिति की बैठक अगले माह उधर, मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अटकलें जारी हैं। सूत्रों के अनुसार मंत्रिमंडल का विस्तार तय माना जा रहा है, लेकिन यह प्रक्रिया अभी नहीं होगी और इसके लिए करीब दो से तीन महीने का समय लग सकता है। वहीं, मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक अप्रैल में होने की संभावना है। सूत्रों का कहना है कि इसके बाद प्रदेश कार्यसमिति की बैठक हर तीन महीने में नियमित रूप से आयोजित की जा सकती है।