samacharsecretary.com

प्राइवेट स्कूलों को मिली राहत, नए सत्र में फीस बढ़ाने पर सरकार की अनुमति जरूरी नहीं

नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट ने  शिक्षा निदेशालय (DoE) को बड़ा झटका देते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। हाईकोर्ट ने कहा है कि दिल्ली के प्राइवेट स्कूल और बिना सरकारी सहायता वाले मान्यता प्राप्त स्कूलों को नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने पर फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय से पहले से अनुमति या मंजूरी लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। एचटी की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अनूप जयराम भंभानी की बेंच ने साफ किया कि पूर्व अनुमति केवल उसी स्थिति में जरूरी है, जब कोई स्कूल चालू शैक्षणिक सत्र के बीच में अचानक फीस बढ़ाना चाहता हो। कोर्ट ने यह कहा कि किसी स्कूल के खाते में केवल 'सरप्लस फंड' होने का मतलब यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि वह स्कूल शिक्षा का व्यावसायीकरण कर रहा है। फीस बढ़ाने की स्वायत्तता पर हाईकोर्ट की मुहर हालांकि, बेंच ने अपने निर्देश में यह भी साफ कर दिया कि DoE को सौंपे गए बयानों में संबंधित स्कूलों द्वारा प्रस्तावित फीस में बढ़ोतरी केवल 2027 के शैक्षणिक सत्र से ही लागू होगी। बेंच ने कहा कि किसी भी स्कूल को पिछले शैक्षणिक सत्रों के लिए फीस या अन्य चार्जेस का कोई भी बकाया पिछली तारीख से मांगने या वसूलने की अनुमति नहीं होगी। DoE का काम स्कूलों के कामकाज को 'माइक्रो-मैनेज' करना नहीं बेंच ने यह साफ किया कि जो स्कूल किसी एकेडमिक सेशन की शुरुआत में फीस बढ़ाते हैं, उन्हें सेशन शुरू होने से पहले DoE को प्रस्तावित फीस का एक स्टेटमेंट जमा करना होगा। हालांकि, जस्टिस भंभानी ने कहा कि प्राइवेट, बिना सरकारी मदद वाले और मान्यता प्राप्त स्कूलों को अपनी वित्तीय आजादी का अधिकार बना रहेगा। शिक्षा निदेशालय का काम स्कूलों के रोजमर्रा के वित्तीय कामकाज को डिक्टेट करना या 'माइक्रो-मैनेज' करना नहीं है। DoE के रेगुलेटरी अधिकार बहुत सीमित हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निजी, बिना सरकारी मदद वाले और मान्यता प्राप्त स्कूलों में फीस तय करने के मामले में DoE के रेगुलेटरी अधिकार बहुत सीमित हैं और वे आम तौर पर दखल देने की इजाजत नहीं देते। कोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल के खातों में सिर्फ ज्यादा पैसे होने के आधार पर DoE यह नतीजा नहीं निकाल सकता कि स्कूल कमर्शियलाइजेशन (मुनाफाखोरी) कर रहा है। DoE को 2 महीने में प्रस्तावों पर लेना होगा फैसला हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आगे कहा कि जहां कोई स्कूल चल रहे एकेडमिक सेशन के दौरान फीस बढ़ाने का प्रस्ताव रखता है, तो उसे अपना प्रस्ताव DoE को उस तारीख से कम से कम दो महीने पहले जमा करना होगा, जिस तारीख से बदली हुई फीस लागू करने की मांग की जा रही है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि DoE को ऐसे प्रस्ताव पर उसी दो महीने के समय में फैसला करना होगा, ऐसा न करने पर प्रस्ताव को मंजूर माना जाएगा। 137 प्राइवेट स्कूलों की याचिका पर आया फैसला यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब दिल्ली के 137 प्राइवेट स्कूलों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इन स्कूलों ने वर्ष 2016-17 से 2022-23 के बीच समय-समय पर फीस बढ़ाने के प्रस्ताव दिए थे, जिन्हें शिक्षा निदेशालय (DoE) ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने सरकार के उन आदेशों को 'गलतफहमी पर आधारित' बताते हुए पूरी तरह से रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जिन स्कूलों को सरकारी जमीन 'लैंड क्लॉज' (जमीन आवंटन की शर्त) के तहत मिली है, उन पर भी सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए यही नियम लागू होगा।

डीपफेक कंटेंट पर कड़ा रुख, Delhi High Court ने Google-Meta Platforms को दिए निर्देश

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेता अर्जुन कपूर को बड़ी राहत देते हुए उनके व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति या संस्था उनकी अनुमति के बिना उनके नाम, छवि, आवाज या पहचान का व्यावसायिक उपयोग नहीं कर सकेगा। कोर्ट ने इस मामले में ऑनलाइन कंटेंट को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। इसके साथ ही अदालत ने टेक कंपनियों Google और Meta को निर्देश दिए हैं कि वे अर्जुन कपूर से जुड़े आपत्तिजनक या अनधिकृत कंटेंट को हटाने और उसके प्रसार को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं। यह आदेश न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जो अभिनेता ने कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और वेबसाइट्स के खिलाफ दायर की थी। अदालत ने अपने आदेश में पाया कि अर्जुन कपूर के नाम, छवि और पहचान का बिना अनुमति व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा था। इसमें उनके नाम पर सामान बेचना, प्रचार के लिए उनकी तस्वीरों का उपयोग करना और विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन जैसे मामले शामिल थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह का अनधिकृत उपयोग उनके व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों का उल्लंघन है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इस फैसले के बाद अब किसी भी व्यक्ति या संस्था को अर्जुन कपूर की पहचान का व्यावसायिक उपयोग करने से पहले उनकी अनुमति लेना अनिवार्य होगा। हर कंटेट सिर्फ छवि या नाम के आधार पर नहीं हटा सकते 29 अप्रैल को हुई सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया था कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति से जुड़ा हर कंटेंट केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि उसमें उनका नाम या छवि शामिल है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि कोई सामग्री मानहानिकारक, अपमानजनक या अवैध रूप से व्यावसायिक उपयोग वाली हो, तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है और उसे हटाया भी जा सकता है। अदालत ने कहा कि “सामान्य व्यक्ति व्यक्तित्व अधिकारों (Personality Rights) के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाता,” क्योंकि ऐसे अधिकारों से जुड़े विवाद आमतौर पर सार्वजनिक हस्तियों तक ही सीमित रहते हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अधिक जांच-परख और आलोचना का सामना करना पड़ता है, इसलिए उनके मामलों में संतुलन बनाकर निर्णय लेना आवश्यक होता है। गूगल और मेटा को निर्देश अदालत ने कहा कि अभिनेता ने अपने नाम, छवि या पहचान के इस तरह के किसी भी उपयोग के लिए कोई अनुमति या लाइसेंस नहीं दिया था। इसके बावजूद उनका नाम और तस्वीरें कई जगहों पर अनधिकृत रूप से इस्तेमाल की जा रही थीं। कोर्ट ने टेक कंपनियों Google और Meta को निर्देश दिया कि ऐसी आपत्तिजनक या गलत सामग्री को तुरंत हटाया जाए और जिन अकाउंट्स के जरिए यह कंटेंट फैलाया जा रहा है, उनकी पूरी जानकारी भी उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही अदालत ने AI से बनाए गए डीपफेक वीडियो और अश्लील सामग्री पर भी गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का दुरुपयोग न केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि उसे अपूरणीय क्षति भी पहुंचा सकता है। क्या थी अर्जुन कपूर की मांग अर्जुन कपूर की ओर से पेश वकील प्रवीण आनंद ने कोर्ट को बताया कि कई लोग बिना अनुमति उनके नाम और छवि का दुरुपयोग कर रहे हैं। दलील के अनुसार, कुछ मामलों में अर्जुन कपूर के नाम पर फर्जी बुकिंग की जा रही है, जबकि कुछ लोग उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल करके सामान बेचने जैसी गतिविधियों में शामिल हैं। इस याचिका में यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ टेक कंपनियों Google और Meta को भी पक्षकार बनाया गया है, ताकि अनधिकृत कंटेंट के प्रसार पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फेक न्यूज अर्जुन कपूर की ओर से पेश वकील प्रवीण आनंद ने अदालत को बताया कि इंटरनेट पर अभिनेता से जुड़ा ऐसा कंटेंट मौजूद है जिसमें अश्लील सामग्री, फेक न्यूज और आपत्तिजनक तस्वीरें शामिल हैं। इनमें कई इमेज AI से बनाई गई या मॉर्फ्ड (बदली हुई) हैं। दलील के अनुसार, कुछ तस्वीरों में अभिनेता को जानवरों के साथ जोड़कर दिखाया गया है, जबकि कुछ में उन्हें गोलगप्पे बेचते हुए दिखाया गया है। वकील ने कहा कि यह सामग्री न तो मजाक के दायरे में आती है और न ही व्यंग्य मानी जा सकती है। उन्होंने अदालत को बताया कि इस तरह का कंटेंट स्वीकार्य सीमाओं से बाहर जाकर अभिनेता की छवि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है। इस मामले में पहले ही कोर्ट ने व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश दिए हैं।

RTE एक्ट पर हाई कोर्ट की टिप्पणी,सामाजिक समानता जरूरी, पर खास प्राइवेट स्कूल में दाखिले की जिद गलत

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी बच्चे के शिक्षा के अधिकार में उसके लिए कोई खास स्कूल चुनने का अधिकार शामिल नहीं है। कोर्ट का यह फैसला एक महिला की अपील पर आया, जिसमें उसने अपने बच्चे को ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि शिक्षा का अधिकार एक्ट एक फायदेमंद कानून है। इसे सामाजिक समावेश के लक्ष्यों को पाने और यह पक्का करने के लिए बनाया गया था कि स्कूल एक ऐसी जगह बनें, जहां जाति, नस्ल या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। कोर्ट ने 25 मार्च को फैसला सुनाते हुए कहा कि शिक्षा के इस अधिकार को किसी खास स्कूल को चुनने के अधिकार के तौर पर नहीं देखा जा सकता। कोर्ट का यह फैसला एक मां की अपील पर आया था, जिसमें उसने अपने बच्चे को 2024-2025 के एकेडमिक सेशन के लिए ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत एक प्राइवेट स्कूल में दूसरी क्लास में एडमिशन दिलाने की गुहार लगाई थी। एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी थी अपीलकर्ता ने इससे पहले 2023-2024 के शैक्षणिक सत्र के लिए एक निजी स्कूल की पहली कक्षा में ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत अपने बच्चे के दाखिले के लिए हाई कोर्ट की एकल जज की पीठ से संपर्क किया था। इस अपील में, अपीलकर्ता ने एकल जज के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कहा गया था कि चूंकि स्कूल के पास अपीलकर्ता के बच्चे को दाखिला देने से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं था, फिर भी संबंधित शैक्षणिक वर्ष के खत्म हो जाने के कारण कोर्ट उसके बच्चे को अगले शैक्षणिक वर्ष यानी 2024-25 में एडमिशन देने का आदेश जारी करने में असमर्थ थी। दूसरी कक्षा में प्रवेश चाहती थी महिला एकल जज ने कहा था कि इस शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा एक में ईडब्ल्यूएस की जो सीटें खाली रह गई हैं, उन्हें अगले वर्ष इसी कक्षा के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। यदि कोई ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार आवेदन करना चाहता है, जिसमें अपीलकर्ता का बच्चा भी शामिल है तो ये सीटें उसके लिए उपलब्ध होंगी। लेकिन, अपीलकर्ता ने डिवीजन बेंच के सामने यह तर्क दिया कि उसके बच्चे को शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 के लिए स्कूल में कक्षा दो में प्रवेश दिया जाना चाहिए। डिवीजन बेंच का राहत देने से इनकार डिवीजन बेंच ने अपील में राहत देने से इनकार कर दिया। बेंच ने कहा कि याचिका के लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के तहत अस्थायी दाखिला या सीट आरक्षित करने का कोई आदेश न होने की स्थिति में शैक्षणिक वर्ष समाप्त होते ही स्कूल में दाखिला पाने का छात्र का अधिकार समाप्त हो गया। बेंच ने यह भी कहा कि जब स्कूल ने दाखिला देने से इनकार कर दिया तो शिक्षा निदेशालय ने अपीलकर्ता के बच्चे को एक दूसरे स्कूल में समायोजित कर दिया। यह स्कूल उन पसंदीदा स्कूलों में से एक था जिन्हें अपीलकर्ता ने आवेदन पत्र भरते समय चुना था। हालांकि, कोर्ट ने यह नोट किया कि अपीलकर्ता ने दूसरे स्कूल को स्वीकार नहीं किया। लॉटरी ड्रॉ के दौरान चुना गया नाम अपीलकर्ता ने बताया कि मार्च 2023 में शिक्षा निदेशालय द्वारा किए गए लॉटरी ड्रॉ के दौरान उनके बच्चे का नाम एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन के लिए चुना गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह डॉक्यूमेंट्स के वेरिफिकेशन और एडमिशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए स्कूल गईं तो उन्हें अंदर जाने से रोक दिया गया। बताया गया कि उन्हें आगे की जानकारी दी जाएगी। वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया कोर्ट को बताया गया कि बाद में अपीलकर्ता को सूचित किया गया कि ईडब्ल्यूएस बच्चों को तब तक एडमिशन नहीं दिया जा सकता, जब तक कि जनरल कैटेगरी की सभी सीटें भर न जाएं। इसलिए उनके बच्चे को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। इसलिए, उसने एक रिट याचिका दायर की, जिसमें स्कूल को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वह शिक्षा निदेशालय द्वारा लॉटरी के माध्यम से चुनी गई उम्मीदवारों की सूची के आधार पर प्रवेश दे। नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश अपील की सुनवाई के दौरान, शिक्षा निदेशालय के वकील ने अपीलकर्ता के बच्चे को किसी भी नगर निगम स्कूल में प्रवेश देने की पेशकश की। अपीलकर्ता के वकील ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता आवंटित स्कूल के अलावा किसी अन्य संस्थान में प्रवेश स्वीकार करने को तैयार नहीं है, क्योंकि उनकी ओर से कोई गलती न होने के बावजूद उनके बच्चे को प्रवेश देने से मना कर दिया गया था।

उन्नाव रेप पीड़िता की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई स्थगित, 28 मार्च तय हुई नई तारीख

नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई टाल दी है, जिसमें उसने अपने पिता की हिरासत में हुई मौत के मामले में दोषियों की सजा बढ़ाने की मांग की है। इस याचिका में मुख्य आरोपी और पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर समेत अन्य आरोपियों की सजा बढ़ाने की अपील की गई है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित पक्ष को जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया जाता है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 मार्च के लिए तय कर दी है। उन्नाव रेप पीड़िता ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने पिता की कथित हिरासत में मौत के मामले में दोषियों के खिलाफ सजा बढ़ाने की मांग की है। पीड़िता के मुताबिक कहा गया है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषियों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। उन्नाव दुष्कर्म मामले में पीड़िता के परिवारवालों ने अब दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।  पीड़िता ने अपने पिता की कथित पुलिस हिरासत में मौत के मामले में दोषी करार दिए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा बढ़ाने की मांग की है। निचली अदालत ने पीड़िता के पिता की मौत मामले में सेंगर को गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की सजा सुनाई थी और उस पर 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। निचली अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य की मौत के मामले में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती। हालांकि, पीड़िता का पक्ष है कि यह सजा अपराध की गंभीरता के अनुरूप नहीं है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।

डिजिटल भुगतान पर खतरा! UPI फ्रॉड को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र, RBI और NPCI से मांगी रिपोर्ट

नई दिल्ली ऑनलाइन पेमेंट के बढ़ते इस्तेमाल के बीच दिल्ली में UPI फ्रॉड के मामलों में तेजी से इजाफा होने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब तलब किया है। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने UPI फ्रॉड रोकने तथा पीड़ितों को तुरंत राहत देने के लिए ठोस गाइडलाइंस बनाने की मांग पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किए। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल भुगतान के बढ़ते दायरे के साथ साइबर ठगी की घटनाएं भी चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही हैं। अदालत ने वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब देने को कहा है। कोर्ट यह जानना चाहता है कि UPI फ्रॉड रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और पीड़ितों को त्वरित राहत देने के लिए कौन-सी व्यवस्था मौजूद है। दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑनलाइन ठगी के मामलों में तेजी पर चिंता जताई याचिकाकर्ता पंकज निगम ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि फरवरी 2024 में ऑनलाइन किराये का फ्लैट ढूंढते समय उनसे 1.24 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। उन्होंने कहा कि मकान किराये पर दिलाने के नाम पर आरोपियों ने डिजिटल पेमेंट के जरिए पैसे ट्रांसफर करवा लिए, जिसके बाद उनका कोई संपर्क नहीं हुआ। याचिकाकर्ता के अनुसार, घटना की शिकायत संबंधित एजेंसियों से करने के बावजूद न तो उनकी रकम वापस मिली और न ही आरोपियों के बारे में कोई ठोस जानकारी दी गई। उन्होंने अदालत को बताया कि ऐसे मामलों में आम लोग खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करते हैं, क्योंकि न तो त्वरित कार्रवाई होती है और न ही पीड़ितों को समय पर राहत मिलती है। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि UPI और ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों में सख्त दिशा-निर्देश बनाए जाएं, ताकि भविष्य में लोगों को इस तरह की ठगी से बचाया जा सके और पीड़ितों को जल्द न्याय मिल सके। क्या कहा याचिका में ? याचिका में कहा गया है कि फर्जी या अधूरी जानकारी वाले बैंक खातों के जरिए होने वाली ठगी रोकने के लिए केवल फुल KYC (पूर्ण सत्यापन) वाले बैंक अकाउंट को ही UPI से जोड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसके अलावा एक यूनिफाइड रिपोर्टिंग प्लेटफॉर्म बनाने की भी मांग की गई है, जो साइबर क्राइम हेल्पलाइन को UPI ऐप, बैंकों, पेमेंट कंपनियों और टेलीकॉम सेवाओं से जोड़ सके। इससे ठगी के शिकार लोगों को अलग-अलग जगह भटकने के बजाय एक ही मंच पर तुरंत शिकायत दर्ज कराने की सुविधा मिल सकेगी। याचिका में कहा गया है कि ऐसा सिस्टम होने पर फ्रॉड की जानकारी तुरंत संबंधित एजेंसियों तक पहुंचेगी और संदिग्ध लेनदेन को समय रहते रोका जा सकेगा। अदालत ने इस मामले में वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से जवाब मांगा है, ताकि डिजिटल भुगतान प्रणाली को और सुरक्षित बनाया जा सके। याचिका दाखिल कर SOP बनाने की मांग UPI फ्रॉड के बढ़ते मामलों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिका में और भी कड़े कदम उठाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि 10 लाख रुपये तक के UPI फ्रॉड मामलों को ई-जीरो FIR सिस्टम में शामिल किया जाए, ताकि पीड़ित को तुरंत कानूनी कार्रवाई का लाभ मिल सके। याचिकाकर्ता का कहना है कि गंभीर मामलों में अपने-आप FIR दर्ज होने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे पुलिस कार्रवाई में देरी न हो और आरोपियों तक जल्दी पहुंचा जा सके। इससे साइबर ठगी के मामलों में शुरुआती “गोल्डन टाइम” का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा, जब रकम को ट्रैक या फ्रीज करना संभव होता है। इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों में अलग नियमों के कारण जांच में होने वाली देरी को खत्म करने के लिए पूरे देश में एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू करने की भी मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि एक समान व्यवस्था होने से एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर होगा और पीड़ितों को समय पर राहत मिल सकेगी। मामले में अदालत पहले ही वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से विस्तृत जवाब मांग चुकी है, ताकि डिजिटल भुगतान से जुड़े फ्रॉड पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस दिशा-निर्देश तय किए जा सकें।

राजपाल यादव को मिली जमानत, दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद भरने होंगे करोड़ों रुपये

नई दिल्ली चेक बाउंस मामले में तिहाड़ जेल में बंद अभिनेता राजपाल यादव को आज दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अभिनेता की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अभिनेता को 18 मार्च तक के लिए जमानत दे दी है। इससे पहले कोर्ट ने राजपाल यादव के वकील को अंतरिम जमानत के लिए दोपहर 3 बजे तक प्रतिवादी यानी जिस कंपनी से उधार लिया है उसके नाम पर 1.5 करोड़ रुपये जमा करने का आदेश दिया था। अभिनेता ने ऐसा कर दिया, जिसके बाद कोर्ट ने 18 मार्च तक के लिए अभिनेता को जमानत दे दी। अगली सुनवाई इसके बाद ही होगी। 1.5 करोड़ रुपए देने के बाद मिली जमानत न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने राजपाल यादव द्वारा शिकायतकर्ता को 1.5 करोड़ रुपये का भुगतान करने के बाद यह आदेश पारित किया। साथ ही यह भी बताया गया कि उनकी भतीजी की शादी 19 फरवरी को है। इसलिए उन्हें जमानत दी जाती है। मामले की अगली सुनवाई अब 18 मार्च को होगी। तब तक अभिनेता जेल से बाहर रहेंगे। ऐसे में साफ है कि अब अभिनेता अपने घर के कार्यक्रमों में शामिल हो सकेंगे। साथ ही होली का त्योहार भी घर पर मना सकेंगे। राजपाल के वकील की दलील पर कोर्ट की प्रतिक्रिया बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, राजपाल यादव के वकील ने अदालत को बताया कि अभिनेता बिना किसी शर्त के एफडीआर के जरिए 1.5 करोड़ रुपये जमा करने के लिए तैयार हैं। इस पर न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट किया, ‘आप पहले से ही जानते हैं, यह एक डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) होना चाहिए। अदालत ने आगे दर्ज किया कि 25 लाख रुपये का डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) पहले से ही प्रतिवादियों के नाम पर है और 75 लाख रुपये का एक अतिरिक्त डिमांड ड्राफ्ट पहले ही जमा किया जा चुका है। दोपहर तीन बजे तक का समय दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजपाल यादव के वकील को अंतरिम जमानत की शर्त के रूप में प्रतिवादी को 1.5 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट प्रस्तुत करने के लिए आज दोपहर 3 बजे तक का समय दिया है। अदालत ने कहा, ‘यदि आप इसे आज दोपहर 3 बजे तक जमा कर देते हैं, तो हम आपको रिहा कर देंगे। यदि नहीं, तो हम कल सुबह इस मामले पर सुनवाई करेंगे।’

निजी जानकारी साझा करने से इनकार पर राहत: CBI नोटिस के खिलाफ रिटायर्ड जज के पक्ष में HC

रायपुर दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में CBI द्वारा रिटायर्ड छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जज, जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को जारी की गई नोटिस को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 91 CrPC का इस्तेमाल आरोपी या गवाह से उसकी निजी जानकारी जबरदस्ती मंगवाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य केवल साक्ष्य जुटाने और जांच में सहयोग सुनिश्चित करने तक सीमित है, और इसे मोबाइल नंबर, बैंक अकाउंट डिटेल्स या घरेलू स्टाफ के नाम जैसी निजी जानकारियां जबरदस्ती हासिल करने के लिए नहीं प्रयोग किया जा सकता। क्यों नहीं चलेगा आरोपी पर ‘टेस्टिमोनियल कम्पल्शन‘? दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई द्वारा रिटायर्ड जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी को नोटिस जारी करने को रद्द करते हुए धारा 91 CrPC के दायरे पर महत्वपूर्ण स्पष्टता दी है। कोर्ट ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य केवल पहले से मौजूद दस्तावेज़ या चीज़ों को पेश करवाना है, न कि आरोपी को अपनी याददाश्त से जानकारी निकालकर लिखित रूप में देने के लिए मजबूर करना। हाईकोर्ट की बेंच ने सख्त लहजे में कहा कि ऐसा करने पर आरोपी पर सेल्फ-इनक्रिमिनेशन (खुद को दोषी ठहराने की मजबूरी) का खतरा बनता है, जो संविधान के अनुच्छेद 20(3) के खिलाफ है। अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी भी व्यक्ति को अपने खिलाफ कानूनी रूप से बोलने या लिखित में देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, चाहे वह जांच के किसी भी स्टेज पर क्यों न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 91 CrPC का प्रयोग केवल उन चीज़ों या दस्तावेजों के लिए किया जा सकता है, जो पहले से मौजूद हैं, और जांच एजेंसियां आरोपी को अपनी याददाश्त या व्याख्या से जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं। वैकल्पिक रास्ते भी हैं CBI के पास कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर जांच एजेंसी को किसी जानकारी की आवश्यकता है, तो इसके लिए उसे विकल्प उपलब्ध हैं धारा 161 CrPC के तहत पूछताछ करना, जिसमें आरोपी के पास चुप रहने का अधिकार होता है। बैंकों, टेलीकॉम कंपनियों और अन्य संस्थानों से सीधे रिकॉर्ड मंगवाना। अदालत ने कहा कि जांच की सुविधा के नाम पर संवैधानिक सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों को ताक पर नहीं रखा जा सकता। पुराने फैसलों का हवाला कोर्ट ने कहा कि धारा 91 CrPC का प्रयोग आरोपी पर व्यक्तिगत जानकारी जबरदस्ती मंगवाने के लिए नहीं किया जा सकता, जैसा CBI चाह रही थी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि धारा 91 का मकसद केवल पहले से मौजूद दस्तावेज या वस्तुएँ पेश करवाना है, न कि आरोपी को खुद के खिलाफ सबूत देने के लिए मजबूर करना। क्या था पूरा मामला? यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आई.एम. कुद्दूसी से जुड़ा है। भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच के दौरान CBI ने उन्हें नोटिस जारी किया और उनके मोबाइल नंबर, बैंक खातों के विवरण (स्टेटमेंट सहित), ड्राइवर और घरेलू सहायकों की जानकारी मांगी। जांच एजेंसी का तर्क था कि यह जानकारी जांच के लिए जरूरी है। लेकिन रिटायर्ड जज ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ट्रायल कोर्ट में चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने उनकी बात मानते हुए नोटिस को खारिज कर दिया। CBI ने हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

संजय कपूर की हजारों करोड़ की संपत्ति विवाद में अहम मोड़, हाईकोर्ट ने फैसला रखा रिजर्व

नई दिल्ली दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की करीब 30,000 करोड़ रुपये की निजी संपत्ति को लेकर चल रहा पारिवारिक विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अंतरिम रोक की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने स्पष्ट किया कि अब कोई नई दलील या दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जाएंगे। अदालत का आगामी आदेश इस विरासत की लड़ाई की दिशा तय करेगा और संपत्ति विवाद के भविष्य को प्रभावित करेगा। बच्चों की ओर से चुनौती केस का मुख्य बिंदु दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की कथित वसीयत है, जिसमें उनकी पूरी निजी संपत्ति तीसरी पत्नी प्रिया कपूर को देने का उल्लेख है। करिश्मा कपूर और उनके बच्चे समायरा और कियान राज कपूर ने इस वसीयत को चुनौती दी है। उनके वकील, सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी, ने कोर्ट में कहा कि वसीयत में कई असंगतियां और तकनीकी खामियां हैं। उन्होंने बताया कि दस्तावेज में स्त्रीलिंग सर्वनाम का इस्तेमाल किया गया है, संजय की मां का नाम नहीं है, दस्तावेज रजिस्टर्ड नहीं है और इसे किसी तीसरे व्यक्ति के लैपटॉप पर तैयार किया गया लगता है। जेठमलानी ने यह भी कहा कि प्रिया कपूर ही वसीयत की प्रस्तावक और एकमात्र लाभार्थी हैं, इसलिए अदालत को इस दस्तावेज की गहन जांच करनी चाहिए। मां रानी कपूर का विरोध दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की वसीयत को लेकर पारिवारिक विवाद और गहराया है। उनकी मां, रानी कपूर, ने भी वसीयत का विरोध किया है। उनके वकील, सीनियर एडवोकेट वैभव गग्गर, ने कोर्ट में कहा कि संजय अपने बच्चों, मां और परिवार से गहरा लगाव रखते थे और वे पूरी संपत्ति केवल प्रिया कपूर को नहीं दे सकते थे। रानी कपूर ने आरोप लगाया कि संजय की मौत के बाद प्रिया कपूर ने जल्दी से कारोबार और संपत्तियों पर नियंत्रण करने की कोशिश की। अदालत में जमा संपत्ति की सूची भी अधूरी है। इसमें कीमती पेंटिंग्स, घड़ियां, बैंक खाते, इंश्योरेंस और किराए की आय शामिल नहीं हैं। जांच में सामने आया कि संजय की कमाई करोड़ों में थी, लेकिन अदालत में प्रस्तुत घोषित संपत्ति केवल करीब 1.7 करोड़ रुपये दिखाई गई है प्रिया कपूर का बचाव दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में प्रिया कपूर की ओर से सीनियर एडवोकेट राजीव नायर ने अदालत में सभी आरोपों का खंडन किया। नायर ने कहा कि संपत्तियों की पूरी लिस्ट कोर्ट में जमा कर दी गई है, जिसमें वित्तीय रिकॉर्ड और शपथ पत्र शामिल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि विदेश में संपत्ति छिपाने या ट्रांसफर करने का कोई सबूत नहीं है। अदालत को बताया गया कि संजय की सालाना 60 करोड़ रुपये कमाई का दावा गलत है। साथ ही, एक महंगी रोलेक्स घड़ी का आरोप फेक सोशल मीडिया अकाउंट पर आधारित था। उन्होंने यह भी कहा कि मौत के बाद लिए गए कुछ कॉर्पोरेट कदम रानी कपूर के ईमेल पर आधारित थे, जिसे बाद में उन्होंने नकार दिया। प्रिया के वकील ने यह भी जोड़ा कि वसीयत का प्रारूप रानी कपूर की 2024 की वसीयत से मिलता-जुलता है। सभी पक्षों की लिखित दलीलें अदालत में प्रस्तुत हो चुकी हैं। अब अंतरिम आदेश का इंतजार है, जो तय करेगा कि प्रिया कपूर संपत्ति से कोई लेन-देन कर सकती हैं या नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला सिर्फ संपत्ति का विवाद नहीं, बल्कि परिवार के रिश्तों और विश्वास की परीक्षा भी है। अदालत का फैसला जल्द आने की संभावना है, जो इस विरासत की लड़ाई की दिशा तय करेगा।

ऋतिक रोशन के पर्सनैलिटी राइट्स : दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला, ई-कॉमर्स और सोशल प्लेटफॉर्म्स से हटाने होंगे पोस्ट

नई दिल्ली,  दिल्ली हाईकोर्ट ने बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन को बड़ी राहत दी है। अदालत ने ऋतिक रोशन के पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए एक अहम आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत कोर्ट ने बिना अनुमति के सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर लगाए गए पोस्ट्स के यूआरएल हटाने का निर्देश दिया है। यह कदम ऋतिक रोशन की पहचान और छवि के अनधिकृत उपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है। न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि आदेश पारित करने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुना जाएगा ताकि न्यायसंगत निर्णय लिया जा सके। अदालत ने ऋतिक रोशन के वकील से प्रोफाइल पेजों का विवरण मांगा है और साथ ही मूल सब्सक्राइबर की जानकारी भी हासिल करने को कहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आदेश पारित करते समय सभी पक्षों की बात सामने आए और न्याय प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़े। इस मामले में अदालत ने ईबे, फ्लिपकार्ट, और टेलीग्राम जैसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की दलीलों को भी रिकॉर्ड पर लिया है। इन प्लेटफॉर्म्स ने बताया है कि कुछ पोस्ट का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है और इसलिए उन पोस्ट के यूआरएल हटाने की मांग की जा रही है। ऋतिक रोशन की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि उनकी तस्वीरों और नाम का ऑनलाइन दुरुपयोग किया जा रहा है। इसमें कई बार उनकी पहचान से जुड़ी गलत और भ्रामक सामग्री भी शामिल है, जो उनके व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन है। इसके अलावा, कुछ लोग उनकी छवि का इस्तेमाल करके कमाई भी कर रहे हैं, जो पूरी तरह से गैरकानूनी है। इसी वजह से अभिनेता ने न्यायालय से आग्रह किया कि उनके पर्सनैलिटी राइट्स की कड़ी सुरक्षा की जाए और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बिना अनुमति उनके फोटो, वीडियो या नाम के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए। ऋतिक रोशन के अलावा कई अन्य मशहूर हस्तियों ने भी अपने पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए अदालत का रुख किया है। इनमें ऐश्वर्या राय बच्चन, अभिषेक बच्चन, करण जौहर और कुमार सानू जैसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने बिना अनुमति के अपनी तस्वीरों, आवाज और पहचान के इस्तेमाल को रोकने के लिए अदालत से राहत मांगी थी। अदालतों ने इन सभी को अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि उनकी पहचान का अपमानजनक या गलत तरीके से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। भारत में पर्सनैलिटी राइट्स को लेकर अभी तक कोई विशेष कानून नहीं बना है, लेकिन न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार की रक्षा करते हुए हस्तियों को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। यह अधिकार किसी भी व्यक्ति की पहचान, छवि और आवाज को बिना अनुमति के उपयोग से बचाता है।  

वैवाहिक झगड़ों में बच्चे को हथियार बनाने पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली  दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए अपने एक अहम फैसले में कहा है कि वैवाहिक विवाद में नाबालिग बच्चे को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना गलत है। हाईकोर्ट ने यह माना है कि पति या पत्नी द्वारा नाबालिग बच्चे को जानबूझकर दूसरे माता-पिता से अलग करने की कोशिश न सिर्फ मनोवैज्ञानिक क्रूरता है, बल्कि यह तलाक का वैध आधार हो सकता है। हाईकोर्ट ने यह फैसला एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया, जिसने सितंबर 2021 में एक फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें क्रूरता के आधार पर विवाह को भंग कर दिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने 19 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि वैवाहिक विवादों में बच्चे को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से न केवल दूसरे माता-पिता को नुकसान पहुंचता है, बल्कि बच्चे के भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालता है और इससे पारिवारिक सद्भाव की नींव कमजोर होती है। इस जोड़े की शादी मार्च 1990 में हुई थी, जिससे उनका एक बेटा हुआ और पत्नी ने 2008 से साथ रहने से इनकार कर दिया। इसके चलते पति ने 2009 में तलाक के लिए अर्जी दी थी। सितंबर 2021 में निचली अदालत ने उस व्यक्ति को तलाक दे दिया, जिसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। महिला का दाव- पति यौन संबंध बनाने को तैयार नहीं था महिला ने अपनी याचिका में कहा कि उसने अपने पति से नाता नहीं तोड़ा, बल्कि तलाक की अर्जी दायर करने के बाद भी अपने बेटे के साथ ससुराल में ही रहती रही। उसने आगे कहा कि उसका पति यौन संबंध बनाने को तैयार नहीं था और उसके ससुराल वालों ने उसके साथ मारपीट की थी। वहीं, इसके महिला के पति ने अपनी याचिका में मौजूदा मुलाकात आदेशों के बावजूद अपने बेटे से संपर्क बनाए रखने की अपनी नाकाम कोशिशों का जिक्र किया। उसने दावा किया कि उसने चार-पांच बार अपने बच्चे से मिलने की कोशिश की, लेकिन बच्चे ने उससे बात करने से इनकार कर दिया। आखिरकार उसने यह मुलाकातें बंद कर दीं। पति ने आगे दावा किया कि तलाक की अर्जी दायर करने के बाद महिला ने उसके और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ कई आपराधिक शिकायतें दर्ज कराईं। मनोवैज्ञानिक क्रूरता का एक गंभीर रूप जस्टिस शंकर द्वारा लिखित फैसले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा, ''नाबालिग बच्चे को प्रतिवादी से जानबूझकर अलग-थलग करना मनोवैज्ञानिक क्रूरता का एक गंभीर रूप है। वैवाहिक विवाद में बच्चे को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से न केवल प्रभावित माता-पिता को चोट पहुंचती है, बल्कि बच्चे की भावनात्मक स्वास्थ्य भी नष्ट हो जाता है और पारिवारिक सौहार्द की जड़ पर आघात पहुंचता है।'' हाईकोर्ट ने अपने 29 पन्नों के फैसले में यह भी माना कि वैवाहिक यौन संबंध से लगातार वंचित रखना क्रूरता की पराकाष्ठा है। कोर्ट ने कहा, "यह सर्वविदित है कि यौन संबंध और वैवाहिक कर्तव्यों का निर्वहन शादी का आधार है, उनके लिए लगातार इनकार करना न केवल वैवाहिक जीवन के बिखराव को दर्शाता है, बल्कि क्रूरता का भी प्रतीक है जिसके लिए न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है।"