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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ से सोमनाथ स्वाभिमान पर्व यात्रा को दिखाई हरी झंडी

योगी सरकार की पहल से पूरी हुई वर्षों पुरानी इच्छा, सोमनाथ यात्रा पर निकले श्रद्धालुओं ने जताया आभार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ से सोमनाथ स्वाभिमान पर्व यात्रा को दिखाई हरी झंडी प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए श्रद्धालुओं ने प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की सराहना की   लखनऊ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को लखनऊ से सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अंतर्गत सोमनाथ स्वाभिमान यात्रा 'उत्तर प्रदेश' का शुभारंभ किया। धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा के बीच शुरू हुई इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिला। शंखनाद और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रवाना हुई इस विशेष ट्रेन ने श्रद्धालुओं की आस्था को नया आयाम दिया। प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए श्रद्धालुओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना करते हुए कहा कि सरकार ने आम लोगों की वर्षों पुरानी मनोकामना पूरी करने का कार्य किया है।  श्रद्धालुओं ने सीएम योगी का जताया आभार  खासतौर पर मुजफ्फरनगर के बंती खेड़ा निवासी सतीश कुमार भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि कई वर्षों से उनकी इच्छा थी कि बाबा सोमनाथ मंदिर के दर्शन करने जाएं, लेकिन कभी अवसर नहीं मिला। सरकार की पहल से यह यात्रा शुरू होने से उनका सपना पूरा हो गया है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार जताते हुए कहा कि सरकार ने आम लोगों की भावनाओं को समझा है। वहीं बरेली की बिंदु इशिका सिंघानिया ने कहा कि यह यात्रा केवल दर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति को मजबूत करने वाली पहल है। इससे एक राज्य के लोग दूसरे राज्य की संस्कृति को जान सकेंगे और युवा पीढ़ी भी अपनी परंपराओं से जुड़ेगी। बिंदु इशिका ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद किया।  यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए वरदान  आजमगढ़ के अनंत तिवारी ने कहा कि सरकार की यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए वरदान है। कई लोग श्रद्धा रखते हैं, लेकिन आर्थिक अभाव में तीर्थ यात्रा नहीं कर पाते। अब उन्हें भी सोमनाथ धाम जाने का अवसर मिलेगा। मेरठ के अनंत राना ने बताया कि वह पहली बार सोमनाथ दर्शन के लिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों के श्रद्धालुओं को इस यात्रा से बड़ा लाभ मिलेगा। बिजनौर और गोरखपुर से आए श्रद्धालुओं ने भी सरकार की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि योगी सरकार हर वर्ग की आस्था का सम्मान कर रही है। सोमनाथ स्वाभिमान यात्रा के शुभारंभ के साथ योगी सरकार ने यह संदेश दिया है कि विकास के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

मिडिल ईस्ट संकट बेअसर, भारतीय जेनेरिक दवाओं की विदेशों में बढ़ी डिमांड

इंदौर  पीथमपुर के स्पेशल इकोनॉमिक जोन (मल्टी प्रोडक्ट एसईजेड) की फार्मा कंपनियों के शानदार प्रदर्शन से जेनेरिक दवाओं (Generic Medicine) का निर्यात बढ़ा है। ट्रंप टैरिफ और ईरान-अमरीका युद्ध (Middle east crisis) के बीच भी निर्यात में इजाफा हुआ। हालांकि अब शिपमेंट में परेशानी हो रही है। कंटेनर समय पर रवाना नहीं हो पा रहे। वाणिज्यिक और उद्योग विभाग के सेज कमिश्नर और मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम (एमपीआइडीसी) द्वारा एसईजेड के कारोबार की प्रगति रिपोर्ट में फार्मा इंडस्ट्री का अच्छा प्रदर्शन नजर आया है। पीथमपुर एसईजेड में 70 से 80 फीसदी फार्मा कंपनियां हैं। अप्रेल 2025 से मार्च 2026 के बीच 14302.25 करोड़ का निर्यात हुआ। यह बीते साल से करीब 10.46 फीसदी ज्यादा है। अमरीका-जर्मनी और खाड़ी देशों में सप्लाई एसईजेड में स्थापित फार्मा कंपनियों की दवाइयां अमरीका, जर्मनी, हांगकांग, ऑस्ट्रेलिया, यूके के साथ ही खाड़ी देशों में भी एक्सपोर्ट की जाती हैं। एसईजेड की दवा कंपनियों को विदेश के साथ देश में भी बिक्री करने की अनुमति मिल चुकी है। इसका भी फायदा हो रहा है। विदेशों में क्यों बढ़ रही मांग भारत को फॉर्मेसी ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण है सस्ती दवाएं। यहां कम लागत और भरोसेमंद गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं हैं। ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले भारत में बनी जेनेरिक दवाएं 30-40 फीसदी तक सस्ती होती हैं।यही वजह है कि अमेरिका-यूरोप जैसे देशों में इन दवाओं की डिमांड तेजी से बढ़ी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुद भारत में बनवा रही हैं दवाएं इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य खर्च बढ़ने और बीमा कंपनियों के दबाव के कारण भी अब दुनिया भर की कंपनियों का रुझान भारत की सस्ती दवा कंपनियों की ओर बढ़ा है। इसके अलावा कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुद भारत में कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के जरिए दवाएं बनवाकर अपने ब्रांड नाम से भी बेच रही हैं। मांग लगातार बढ़ने से निर्यात बढ़ रहा है एसईजेड और अन्य जगहों की फार्मा कंपनियों की बनाई जेनेरिक दवा की विदेशों में मांग ज्यादा है। खाड़ी देशों में भी यहां से दवा सप्लाई होती है। विदेशी कंपनियां सरकार से एनओसी लेकर स्थानीय कंपनियों को ऑर्डर देकर अपने ब्रांड की दवाइयां यहीं बनवाती हैं। मांग लगातार बढ़ने से निर्यात बढ़ रहा है। -जेपी मूलचंदानी, प्रेसिडेंट बेसिक ड्रग्स डीलर्स एसोसिएशन, मध्यप्रदेश हमारे यहां सस्ती दवाएं इसलिए विदेश में बढ़ी मांग युद्ध का असर फार्मा इंडस्ट्री पर है। हमारे यहां की दवाइयां सस्ती हैं, इसलिए विदेश में मांग रहती है। युद्ध के कारण निर्यात में परेशानी हो रही है। समय पर माल नहीं भेज पा रहे। लेकिन जल्द हालात सामान्य होने की उम्मीद है। -डॉ. दर्शन कटारिया, अध्यक्ष, एमपी स्मॉल ड्रग मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन

मध्यप्रदेश में 23634 पंचायतों और 444 तहसीलों में विंड सिस्टम, सरकार को हर 15 मिनट में मिलेगी मौसम अपडेट

भोपाल  मध्यप्रदेश सरकार ने खेती-किसानी और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत राज्य की सभी 23,634 ग्राम पंचायतों में ऑटोमैटिक रेन गेज और 444 तहसीलों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाए जाएंगे। कृषि विभाग ने इस परियोजना के लिए निविदा जारी कर दी है और कार्यान्वयन भागीदारों से आवेदन मांगे गए हैं। इस सिस्टम की खासियत यह होगी कि मौसम और बारिश से जुड़ा सटीक डेटा हर 15 मिनट में सीधे सरकार के पोर्टल पर अपडेट होगा, जिससे सूखे और अतिवृष्टि जैसी स्थितियों की रियल-टाइम निगरानी संभव हो सकेगी। परियोजना पर 100 से 120 करोड़ रुपये का निवेश केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त सहयोग से इस परियोजना को लागू किया जा रहा है। अनुमान के अनुसार, एक ऑटोमैटिक रेन गेज पर 35,000 से 40,000 रुपये और एक तहसील स्तर के वेदर स्टेशन पर 1.5 से 2 लाख रुपये तक की लागत आएगी। पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 100 से 120 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसमें केंद्र सरकार ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ के तहत 50% राशि उपलब्ध कराएगी, जबकि शेष राशि राज्य सरकार और एजेंसियों द्वारा वहन की जाएगी। क्यों जरूरी हुआ यह सिस्टम अभी मौसम की जानकारी जिला या ब्लॉक स्तर पर ही उपलब्ध होती है, जिससे स्थानीय स्तर पर मौसम का सटीक आंकलन नहीं हो पाता। कई बार एक ही तहसील में अलग-अलग गांवों में बारिश और सूखे की स्थिति देखने को मिलती है, जिससे नुकसान का सही आंकलन मुश्किल हो जाता है। इस कमी के कारण प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के क्लेम के निपटान में भी दिक्कत आती थी। नया सिस्टम लागू होने के बाद हर पंचायत का वास्तविक डेटा उपलब्ध होगा, जिससे किसानों को सही मुआवजा मिल सकेगा। ऑटोमैटिक रेन गेज और वेदर स्टेशन की योजना वहीं सरकार की इस योजना के तहत हर ग्राम पंचायत में ऑटोमैटिक रेन गेज लगाए जाएंगे, जो बारिश की मात्रा को मापेंगे। वहीं हर तहसील में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन लगाया जाएगा, जो तापमान, हवा की गति, नमी और अन्य मौसम से जुड़े आंकड़े रिकॉर्ड करेगा। दरअसल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक ऑटोमैटिक रेन गेज लगाने में करीब 35 हजार से 40 हजार रुपए का खर्च आएगा। वहीं तहसील स्तर के वेदर स्टेशन की लागत लगभग 1.5 लाख से 2 लाख रुपए तक हो सकती है। पूरे राज्य में 24 हजार से ज्यादा जगहों पर यह सिस्टम लगाने के लिए करीब 100 से 120 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। दरअसल इस परियोजना में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की भागीदारी होगी। भारत सरकार इस प्रोजेक्ट की कुल लागत का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग’ के रूप में देगी, जबकि बाकी खर्च राज्य सरकार और चयनित एजेंसियां मिलकर उठाएंगी। वहीं अधिकारियों का मानना है कि यह सिस्टम लागू होने के बाद मौसम की जानकारी पहले से कहीं ज्यादा सटीक और भरोसेमंद होगी। क्या किसानों के लिए होगा फायदेमंद? बता दें कि नया मौसम नेटवर्क लागू होने के बाद किसानों को अपने गांव के हिसाब से सटीक मौसम जानकारी मिल सकेगी। इससे वे बुवाई, सिंचाई और फसल कटाई का सही समय तय कर पाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम की सही जानकारी मिलने से फसल उत्पादन बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। वहीं इस सिस्टम का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के नुकसान का आकलन ज्यादा सटीक तरीके से किया जा सकेगा। पहले कई बार डेटा की कमी के कारण बीमा दावों के भुगतान में विवाद या देरी हो जाती थी। अब हर पंचायत से मिलने वाले डेटा के आधार पर बीमा कंपनियां और सरकार नुकसान का सही आंकलन कर पाएंगी। इसके अलावा यह नेटवर्क आपदा प्रबंधन के लिए भी अहम साबित होगा। अचानक आने वाली तेज बारिश, आंधी या बिजली गिरने जैसी घटनाओं की जानकारी पहले मिल सकेगी। इससे प्रशासन समय रहते चेतावनी जारी कर पाएगा और लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने की व्यवस्था कर सकेगा। दरअसल सरकार ने इस प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा करने का लक्ष्य रखा है। अप्रैल 2026 में टेंडर प्रक्रिया शुरू होने के बाद चुनी गई कंपनियों को 6 से 9 महीने के भीतर सभी चिन्हित जगहों पर उपकरण लगाने होंगे। कैसे काम करेगा सिस्टम यह पूरा नेटवर्क सौर ऊर्जा से संचालित होगा और पूरी तरह ऑटोमैटिक होगा। पंचायतों और तहसीलों में लगाए जाने वाले उपकरणों में आधुनिक सेंसर और सिम आधारित टेलीमेट्री सिस्टम होगा। ये डिवाइस हर 15 मिनट में बारिश, तापमान, हवा की गति और नमी का डेटा रिकॉर्ड कर सीधे ‘WINDS’ केंद्रीय सर्वर पर भेजेंगे। इसमें किसी भी तरह के मैनुअल हस्तक्षेप की जरूरत नहीं होगी। किसानों और आम लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा इस डिजिटल सिस्टम से कृषि विभाग को बेहतर आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी और किसानों को गांव स्तर पर सटीक मौसम सलाह मिलेगी, जिससे वे फसल की बुवाई और सिंचाई सही समय पर कर सकेंगे।इसके अलावा बीमा कंपनियों और किसानों के बीच डेटा विवाद खत्म होंगे क्योंकि भुगतान पूरी तरह वास्तविक गांव स्तर के डेटा पर आधारित होगा। परियोजना की लागत और बजट इस महत्वाकांक्षी परियोजना को केंद्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से जमीन पर उतारा जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक ऑटोमैटिक रेन गेज की स्थापना पर लगभग ₹35,000 से ₹40,000 और तहसील स्तर के वेदर स्टेशन पर ₹1.5 लाख से ₹2 लाख तक का खर्च आने का अनुमान है। प्रदेश की 24,000 से अधिक लोकेशन्स को कवर करने के लिए इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब ₹100 करोड़ से ₹120 करोड़ का निवेश किया जाएगा। भारत सरकार इस कुल लागत का 50% हिस्सा 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (VGF) के रूप में प्रदान करेगी, जबकि बाकी की राशि राज्य सरकार और चयनित एजेंसियां वहन करेंगी। इसकी जरूरत क्यों पड़ी? वर्तमान में मौसम की जानकारी केवल जिला या ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध होती है, जो स्थानीय स्तर पर होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का सटीक आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अक्सर देखा गया है कि एक ही तहसील के भीतर किसी एक गांव में भारी बारिश (अतिवृष्टि) होती है, जबकि दूसरे गांव में सूखा रहता है। डेटा के इस अभाव के कारण प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना … Read more

लश्कर की 26/11 जैसी हमले की तैयारी, बलूचिस्तान में विशेष ट्रेनिंग शिविर

नई दिल्ली पाहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी से ठीक पहले एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लश्कर-ए-तैयबा अब अपने पारंपरिक ठिकानों से आगे बढ़कर बलूचिस्तान में तेजी से अपना नेटवर्क विस्तार कर रहा है. यह वही इलाका है जो पहले से ही बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष का केंद्र बना हुआ है. ऐसे में लश्कर की सक्रियता ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को और जटिल बना दिया है।  सूत्रों के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के बाद लश्कर ने कराची-बलूचिस्तान बॉर्डर के पास समुद्र तट से महज 10-15 किलोमीटर दूरी पर नए लॉन्च पैड तैयार करने शुरू कर दिए हैं. यही नहीं संगठन अब अपने आतंकवादियों को तैराकी और स्कूबा डाइविंग की विशेष ट्रेनिंग दे रहा है. इन गतिविधियों को देखते हुए एजेंसियों को आशंका है कि लश्कर 26/11 मुंबई हमलों जैसे समुद्री हमले की साजिश रच रहा है. इस बीच, अप्रैल के दूसरे हफ्ते में लश्कर के डिप्टी चीफ सैफुल्लाह कसूरी का बलूचिस्तान के क्वेटा दौरा भी कई सवाल खड़े करता है. उसकी यह यात्रा उस समय हुई जब ठीक दो दिन बाद बीएलए ने पाकिस्तान कोस्ट गार्ड पर हमला कर तीन जवानों को मार गिराया।  कौन है सैफुल्लाह कसूरी लश्कर-ए-तैयबा का डिप्टी चीफ और अमेरिका द्वारा घोषित आतंकवादी. वह अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले का एक प्रमुख साजिशकर्ता है. पहलगाम में 26 नागरिकों की हत्या कर दी गई थी. कसूरी ने सार्वजनिक भाषणों में खुलकर लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तान सेना के बीच करीबी संबंधों को स्वीकार किया है और भारत के खिलाफ 2008 के मुंबई हमलों जैसी बड़े समुद्री हमलों की धमकियां दी हैं. वह अपने आतंकवादी घोषित होने के बावजूद पाकिस्तान में सार्वजनिक कार्यक्रमों में बार-बार दिखाई देता रहा है, जिनमें लश्कर से जुड़े राजनीतिक संगठनों द्वारा आयोजित रैलियां भी शामिल हैं।  खुफिया इनपुट्स यह भी संकेत देते हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई लश्कर को बलूचिस्तान में मजबूत करने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंध में सक्रिय लश्कर कमांडर फैजल नदीम को बलूचिस्तान में पाकिस्तान मरकाजी मुस्लिम लीग (पीएमएमएल) के नेता अकील अहमद लगहारी से समन्वय करने के निर्देश दिए गए थे. पीएमएमएल को लश्कर का राजनीतिक मुखौटा माना जाता है, जो जमीनी स्तर पर नेटवर्क विस्तार और भर्ती में मदद करता है।  समुद्री रास्तों के जरिए भारत को निशाना बनाने की योजना विशेषज्ञों का मानना है कि लश्कर का यह विस्तार कई रणनीतिक उद्देश्यों का हिस्सा हो सकता है. एक तरफ यह संगठन अपने ढांचे को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर समुद्री रास्तों के जरिए भारत को निशाना बनाने की नई रणनीति पर काम कर रहा है. इसके अलावा, यह भी संभावना जताई जा रही है कि पाकिस्तान सेना बलूच विद्रोहियों से निपटने के लिए लश्कर जैसे संगठनों का इस्तेमाल एक प्रॉक्सी के तौर पर कर सकती है।  पाहलगाम हमले की बरसी पर सामने आई ये जानकारी इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में आतंकी खतरा केवल बना ही नहीं हुआ है, बल्कि नए रूप में और अधिक खतरनाक हो रहा है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या यह गतिविधियां सिर्फ नेटवर्क विस्तार तक सीमित रहती हैं या फिर किसी बड़े हमले की साजिश का हिस्सा बनती हैं। 

रायपुर: बस्तर के लिए वैश्विक मार्ग, 4 घंटे में समंदर तक पहुंच

रायपुर : बस्तर के लिए खुलेगा वैश्विक द्वार, 4 घंटे में पूरा होगा समंदर तक का सफर रायपुर-विशाखापट्टनम कॉरिडोर से बस्तर को मिलेगा वैश्विक कनेक्शन बस्तर से बंदरगाह तक सीधी राह, इकोनॉमिक कॉरिडोर से विकास को मिलेगी नई दिशा रायपुर बस्तर की प्रगति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-130 CD) एक क्रांतिकारी कदम साबित होने जा रहा है। भारतमाला परियोजना के तहत बन रहा यह 6-लेन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर न केवल दूरियों को कम करेगा, बल्कि बस्तर के स्थानीय उत्पादों को सीधे अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों तक पहुँच प्रदान कर लैंड-लॉक्ड क्षेत्र की बाधाओं को समाप्त करेगा। दुर्गम घाटों से मुक्ति और समय की बड़ी बचत वर्तमान में जगदलपुर से विशाखापट्टनम की यात्रा ओडिशा के कोरापुट और जयपुर के कठिन घाटों से होकर गुजरती है, जिसमें 7 से 9 घंटे का समय लगता है। भारी वाहनों के लिए यह मार्ग न केवल थकाऊ है, बल्कि डीजल की खपत और मेंटेनेंस के लिहाज से भी खर्चीला है। नया कॉरिडोर इस यात्रा को मात्र 3.5 से 4 घंटे में समेट देगा। सीधा और घाट-मुक्त रास्ता होने के कारण वाहनों का परिचालन खर्च काफी कम हो जाएगा, जिससे परिवहन क्षेत्र को बड़ी राहत मिलेगी। नबरंगपुर इंटरचेंज: बस्तर का प्रवेश द्वार रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH-130 CD) छत्तीसगढ़ के रायपुर, धमतरी, कांकेर और कोंडागांव जिलों से गुजर रहा है। जगदलपुर मुख्यालय को इस कॉरिडोर से जोड़ने के लिए ओडिशा के नबरंगपुर का दासपुर इंटरचेंज महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। जगदलपुर का ट्रैफिक मात्र 50-60 किमी का सफर तय कर नबरंगपुर इंटरचेंज के माध्यम से रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर में शामिल हो सकेगा, जिससे बस्तर सीधे विशाखापट्टनम पोर्ट और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक नेटवर्क से जुड़ जाएगा। बस्तरिया ब्रांड का अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश इस कॉरिडोर का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अब बस्तर की अरेबिका कॉफी, जैविक इमली, महुआ उत्पाद और प्रसिद्ध ढोकरा शिल्प को विशाखापट्टनम पोर्ट तक पहुँचाना सुगम होगा। कम लॉजिस्टिक लागत के कारण ये उत्पाद वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी दरों पर उपलब्ध होंगे, जिससे स्थानीय किसानों, संग्रहकर्ताओं और शिल्पकारों को उनकी उपज का बेहतर अंतरराष्ट्रीय मूल्य मिल सकेगा। सामाजिक और आर्थिक उत्थान बस्तर, कांकेर और कोंडागांव जैसे आकांक्षी जिलों को इस परियोजना से सीधा लाभ मिलेगा। बेहतर सड़क संपर्क से शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाएं इन सुदूर क्षेत्रों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेंगी। इस राजमार्ग के माध्यम से बस्तर का कृषि उत्पाद और इस्पात सीधे रायपुर, दुर्ग-भिलाई और विशाखापट्टनम जैसे औद्योगिक केंद्रों से जुड़ जाएगा। इससे स्थानीय युवाओं के लिए तकनीकी, प्रबंधन, लॉजिस्टिक्स, रियल एस्टेट और सर्विस सेक्टर में हजारों नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे। यह कॉरिडोर बस्तर में औद्योगिक विकास की एक नई लहर लाने के लिए तैयार है। औद्योगिक और खनिज विकास बस्तर क्षेत्र लौह अयस्क और अन्य खनिजों से समृद्ध है। यह कॉरिडोर इन खनिजों को विशाखापत्तनम पोर्ट तक तेजी से पहुंचाने में मदद करेगा, जिससे निर्यात और व्यापार में भारी उछाल आएगा। कॉरिडोर के किनारे नए औद्योगिक क्लस्टर विकसित होने की संभावना है, जिससे स्थानीय स्तर पर विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान का विस्तार कनेक्टिविटी में सुधार होने से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की आमद बढ़ेगी। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा, दंतेश्वरी मंदिर, ढोलकल गणेश, कुतुमसर गुफा और चित्रकोट-तीरथगढ़ जैसे जलप्रपातों तक पहुंच आसान होगी। इससे न केवल पर्यटन राजस्व बढ़ेगा, बल्कि आदिम संस्कृति और लोक कलाओं को भी वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। पर्यावरण और इंजीनियरिंग का तालमेल कांकेर जिले के बासनवाही के मंझिनगढ़ पहाड़ी (केशकाल) को चीरकर 2.79 किमी लंबी छत्तीसगढ़ की पहली ट्विन-ट्यूब टनल बनाई जा रही है। यह टनल उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के इको-सेंसिटिव जोन से गुजरती है, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि वन्यजीवों का आवागमन बाधित न हो। साथ ही पूरे राजमार्ग में मंकी कैनोपी, एनिमल अंडरपास और ओवरपास बनाए जा रहे हैं ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे। रायपुर-विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर रायपुर-विशाखापत्तनम इकोनॉमिक कॉरिडोर (NH 130CD) बस्तर संभाग और पूरे छत्तीसगढ़ के आर्थिक परिदृश्य को बदलने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। लगभग 16,491 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह 464 किमी लंबा ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल  कॉरिडोर न केवल दूरी कम करेगा, बल्कि बस्तर जैसे जनजातीय क्षेत्रों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सेतु का काम करेगा। यह कॉरिडोर बस्तर को विश्व व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह परियोजना सही मायने में बस्तर की आत्मनिर्भरता और वैश्विक पहचान का आधार बनेगी। "रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के लिए विकास का नया द्वार खोलने जा रहा है। केंद्र सरकार के सहयोग से हम राज्य में आधुनिक और मजबूत अधोसंरचना का तेजी से विस्तार कर रहे हैं। इससे न केवल यात्रा समय कम होगा, बल्कि स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक सीधी पहुंच मिलेगी। हमारी सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों को मुख्य धारा की अर्थव्यवस्था से जोड़कर समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित किया जाए। यह परियोजना आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की दिशा में एक मजबूत कदम है।" – मुख्यमंत्री विष्णु देव साय "रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रदेश में कनेक्टिविटी और औद्योगिक विकास को नई गति देगा। विश्वस्तरीय सड़क नेटवर्क तैयार कर नागरिकों और माल परिवहन को सुगम, सुरक्षित और तेज बनाया जा रहा है। इस कॉरिडोर से बस्तर सीधे बंदरगाह से जुड़कर व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा। हमारी प्राथमिकता है कि हर क्षेत्र तक बेहतर सड़क और बुनियादी सुविधाएं पहुंचें, जिससे प्रदेश का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।" – उप मुख्यमंत्री तथा लोक निर्माण मंत्री अरुण साव

MMS लीक का खुलासा, दफ्तर से बेडरूम तक राज हो रहे उजागर; कौन हैं इसके जिम्मेदार?

नई दिल्ली देश में बीते डेढ़ साल के दौरान एमएमएस लीक की ऐसी बाढ़ आई कि दफ्तर से लेकर बेडरूम तक होने वाली हरकतें एक झटके में सबके सामने आ गईं. लीक हुए एमएमएस सिर्फ दफ्तर और बेडरूम तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि इनकी जद कॉलेज और मेट्रो ट्रेन तक फैली हुई थी. ये हरकतें जायज थीं या नाजायज, फिलहाल यह सवाल नहीं है. सवाल यह है कि इन एमएमएस वीडियोज को लोगों के मोबाइल तक किसने और कैसे पहुंचा. इस सवाल का पूरा जवाब मिलता, इससे पहले सोशल मीडिया में सोशल मीडिया में वायरल हुए ’19 मिनट के वीडियो’ ने सिक्‍योरिटी एजेंसीज और साइबर एक्‍सपर्ट्स का भी सबका दिमाग हिला दिया . इस वीडियो को देखने के बाद किसी आम आदमी के लिए यह अंदाजा लगाना नामुमकिन था कि वह वीडियो असली था या फिर उसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से तैयार किया गया था. इस वीडियो की गुत्‍थी सुलझती, इससे पहले ‘सीजन 5′ और ’50 मिनट के फुल वर्जन’ ने साइबर एक्‍सपर्ट्स को नया चैलेंज दे दिया. दरअसल, एआई के जरिए तैयार किए गए इन वीडियोज के जरिए स्कैमर्स ने लोगों की उत्सुकता का फायदा उठाया. इन वीडियोज के जरिए मैलवेयर लिंक लोगों के मोबाइल तक पहुंचाए गए. इसके बाद, हजारों लोगों के फोन हैक कर बैंक अकाउंट खाली कर दिए. इसके बाद सामने आए नमो भारत ट्रेन के सीसीटीवी फुटेज लीक ने सरकारी निगरानी पर भी सवाल खड़े कर दिए . इन कांडों में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से ज्‍यादातर लीक या तो एआई से बनाए गए थे, या फिर करीबी दोस्तों ने लीक किए थे. कई लीक्‍स में सिक्‍योरिटी स्‍टाफ भी शामिल मिला. वीडियो को लोगों के बीच पॉपुलर करने के लिए जानी मानी महिला यूट्यूबर के चेहरे का इस्‍तेमाल कर डीपफेक वीडियो वायरल किए गए. वहीं एक मामला ऐसा था कि एक पीडि़ता का वीडियो उसके ही दोस्त ने लीक कर दिया. नमो भारत ट्रेन का सीसीटीवी वीडियो एक स्‍टाफ ने अपने मोबाइल से रिकॉर्ड कर फैला दिया. साइबर फ्रॉड्स ने ‘ललिता’ और ‘सारा बलोच’ के नाम पर फर्जी लिंक बनाकर लोगों को खूब ठगा. कुल मिलाकर अब एमएमएस लीक अब साइबर फ्रॉड्स के लिए एक नया हथियार बन चुका है . लोगों के दिमाग को हिला गए ये पांच बड़े कांड     कांड 1: ’19 मिनट का वीडियो’ और ‘सीजन 5’ का झांसा     नवंबर 2025 में एक 19 मिनट का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कथित तौर पर एक बंगाली यूट्यूबर और उनकी गर्लफ्रेंड थी. देखते ही देखते दावे किए जाने लगे कि इसका ‘सीजन 5′ और ’50 मिनट का फुल वर्जन’ लीक हो गया है. साइबर जांच में खुलासा हुआ कि असलियत में कोई ‘सीजन 5’ मौजूद ही नहीं था. जो वीडियो वायरल हो रहे थे, वे एआई डीपफेक टेक्‍नोलॉजी से बनाए गए थे. फोरेंसिक रिपोर्ट में बताया गया कि वीडियो में चेहरे के हाव-भाव नेचुरल नहीं थे, होंठ ऑडियो से मेल नहीं खा रहे थे और लाइटिंग मिसमैच थी. जांच में यह भी सामने आया कि असली मंशा साइबर ठगी की थी. स्कैमर्स ने ‘सीजन 5’ के नाम पर फेक लिंक बनाए, जिन पर क्लिक करते ही यूजर के फोन में मैलवेयर इंस्टॉल हो जाता था. इससे बैंकिंग डिटेल्स, यूपीआई पिन और ओटीपी चोरी हो रहे थे .     कांड 2: नमो भारत ट्रेन का सीसीटीवी लीक     दिसंबर 2025 में गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर की नमो भारत ट्रेन का 4 मिनट 44 सेकंड का एक सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ. इसमें एक युवक और युवती ट्रेन के कोच में अंतरंग पलों में डूबे दिखे. इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी. जांच में कई चौंकाने वाला खुलासा हुए. यह वीडियो एनसीआरटीसी के ही एक स्‍टाफ ऋषभ ने अपने मोबाइल फोन से सीसीटीवी फुटेज रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर लीक किया था. जिन लोगों पर यात्रियों की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी थी, उन्होंने ही प्राइवेसी का उल्लंघन किया. एनसीआरटीसी ने आरोपी को बर्खास्त कर दिया और मुरादनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई. इस वीडियो का अंजाम और भी दर्दनाक रहा. दोनों स्टूडेंट्स कॉलेज जाना छोड़ चुके थे, डिप्रेशन में आत्महत्या का प्रयास किया. अंततः परिवारों ने दबाव में आकर दोनों की शादी करा दी गई .     कांड 3: सारा बलोच और ललिता के नाम पर डिजिटल हनी ट्रैप     फरवरी 2026 में पाकिस्तानी क्रिएटर सारा बलोच का नाम ‘असम इंसीडेंट’ से जोड़कर एक लिंक वायरल किया गया. दावा किया गया कि उनका ‘लीक एमएमएस’ वायरल हो रहा है. हकीकत में सारा बलोच का उस वीडियो से कोई लेना-देना नहीं था. यह पूरी तरह से साइबर स्कैम था, जिसमें उनके नाम का इस्तेमाल कर लोगों के एकाउंट साफ किए जा रहे थे. वहीं, तेलंगाना के करीमनगर में पुलिस ने ललिता और उसके पति को गिरफ्तार किया. यह दंपति सोशल मीडिया पर दोस्ती कर पुरुषों को किराए के फ्लैट पर बुलाता, जहां पति हिडन कैमरे से वीडियो रिकॉर्ड करता. फिर ब्लैकमेल कर पैसे वसूले जाते. पुलिस ने साफ किया कि ‘ललिता वायरल वीडियो’ इंटरनेट पर नहीं है, बल्कि पुलिस के मालखाने में बंद है. फिर भी स्कैमर्स ने उसी नाम से फेक लिंक बनाकर लोगों के फोन हैक करने शुरू कर दिए .     कांड 4: बंगाली यूट्यूबर के बॉयफ्रेंड ने कर दिया कांड     बंगाली महिला यूट्यूबर का 16 मिनट का एक प्राइवेट वीडियो अचानक वायरल हो गया. इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर हड़कंप मचा हुआ था. तब यूट्यूबर ने खुद एक वीडियो जारी कर चौंकाने वाला खुलासा किया. उन्होंने दावा किया कि यह वीडियो उनके एक्‍स-बॉयफ्रेंड ने बदला लेने के लिए लीक किया है. यह एक ऐसा मामला था, जिसमें ब्रेकअप के बाद बदला लेने के लिए अपने ही पार्टनर के निजी पलों को पब्लिक कर दिया था. इसके बाद, यूट्यूबर का एक और वीडियो आया, जिसे स्टेज्ड और एडिटेड बताया गया, लेकिन तब तक बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था. यूट्यूबर के लिए घर से बाहर निकलना तो छोडिए, घर के अंदर रहना भी मुश्किल हो गया था .     कांड 5: भोजपुरी स्‍टार का एमएमएस हुआ वायरल     नवंबर 2025 में महज 15 साल की एक भोजपुरी एक्टर का एक एमएमएस … Read more

मध्य प्रदेश के जंगलों में आग का तांडव, 60 स्थानों पर जल रही आग, अमरकंटक के बाद इन शहरों पर खतरा

भोपाल  भीषण गर्मी की दस्तक के साथ ही मध्य प्रदेश के जंगलों से डराने वाली खबरें आने लगी हैं। पिछले तीन सालों से मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में शीर्ष पर बना हुआ है जहां जंगल की आग ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2025-26 में मध्य प्रदेश 14,506 आग की घटनाओं के साथ देश में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि पिछले साल राज्य इस मामले में नंबर-1 पर था। हर दिन 60 जगह धधक रही है आग मध्य प्रदेश में औसतन हर दिन 60 जगहों पर आग की लपटें दिखाई दे रही हैं। पिछले हफ्ते अमरकंटक के जंगलों में लगी भीषण आग ने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी थी। वन विभाग ने देवास, सीहोर, रायसेन, बैतूल, सिवनी, छिंदवाड़ा, सागर, दमोह और कटनी के पास के जंगलों को अति संवेदनशील घोषित किया है। फॉरेस्ट विभाग का पराली वाला तर्क हैरानी की बात यह है कि एमपी फॉरेस्ट विभाग इन आंकड़ों के पीछे एक तकनीकी थ्योरी दे रहा है। अधिकारियों का दावा है कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI), देहरादून के सैटेलाइट खेतों में जलने वाली पराली और जंगल की आग में अंतर नहीं कर पाते। चूंकि मध्य प्रदेश पराली जलाने के मामले में भी देश में टॉप पर है, इसलिए खेत की आग को अक्सर जंगल की आग मान लिया जाता है, जिससे राज्य की रैंकिंग खराब हो रही है। बचाव के लिए क्या हो रहा है काम? विभाग का कहना है कि वे सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए कर रहे हैं। ग्राउंड स्टाफ को तुरंत सूचना भेजी जाती है ताकि वे मौके पर पहुंच सकें। इसके अलावा:करीब 1 लाख किलोमीटर लंबी फायर लाइन (साफ की गई जमीन की पट्टियां) बनाई गई हैं।संवेदनशील इलाकों में विशेष वॉच टावर स्थापित किए गए हैं।सैटेलाइट अलर्ट सीधे फॉरेस्ट गार्ड के मोबाइल तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

मंत्री राजपूत ने बताया, एक लाख 45 हजार 71 किसानों से 63 लाख 27 हजार 410 क्विंटल गेहूँ की खरीदी

एमएसपी पर गेहूँ की खरीदी जारी एक लाख 45 हज़ार 71 किसानों से की जा चुकी है 63 लाख 27 हजार 410 क्विंटल गेहूँ की खरीदी : मंत्री राजपूत भोपाल  खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने बताया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अभी तक एक लाख 45 हज़ार 71 किसानों से 63 लाख 27 हजार 410 क्विंटल गेहूँ की खरीदी की जा चुकी है। किसानों को 920 करोड़ 7 लाख रुपए का भुगतान उनके बैंक खाते में किया जा चुका है। अभी तक 5 लाख 36 हजार 367 किसानों द्वारा 2 करोड़ 25 लाख 96 हजार 450 क्विंटल गेहूँ के विक्रय के लिये स्लॉट बुक किये जा चुके हैं। किसानों की सुविधा के लिए उपार्जन केंद्रों पर तौल कांटों की संख्या 4 से बढ़कर 6 कर दी गई है। इससे समय पर किसानों द्वारा लाये गए गेहूं की तुलाई हो सकेगी। खरीदी के लिये 3171 उपार्जन केन्द्र बनाये गये हैं। गेहूँ की खरीदी कार्यालयीन दिवसों में होती है। सेटेलाइट ई-मेल में मिलान नहीं पाए गए खसरों को छोड़कर उसी किसान के शेष खसरों पर गेहूँ की फसल विक्रय हेतु स्लॉट बुकिंग की सुविधा दी गई है। स्लॉट बुकिंग की क्षमता बढ़ाई उपार्जन केन्द्र की क्षमता अनुसार उपज की तौल की जा सके एवं अधिक से अधिक किसानों से उपार्जन किया जा सके, इसके लिये प्रतिदिन प्रति उपार्जन केन्द्र पर गेहूँ विक्रय के लिये स्लॉट बुकिंग की क्षमता 1000 क्विंटल से बढ़ाकर 1500 क्विंटल की गई है। उपार्जन केंद्र में किसानों के लिये गेहूँ बिक्री की सभी सुविधाएं मंत्री राजपूत ने बताया है कि उपार्जन केंद्रों में गेहूँ विक्रय की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। उपार्जन केन्द्रों में छायादार स्थान में बैठने और पेय जल की समुचित सुविधा उपलब्ध कराई गई है। केंद्र में बारदाने, तौल कांटे सिलाई मशीन, कंप्यूटर, इंटरनेट, गुणवत्ता परीक्षण उपकरण और उपज की साफ सफाई के लिए पंखा, छनना आदि की व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की गई हैं। समर्थन मूल्य के साथ बोनस भी मंत्री राजपूत ने बताया है कि रबी विपणन वर्ष 2026-27 में किसानों से 2585 रूपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य एवं राज्य सरकार द्वारा घोषित 40 रूपये प्रति क्विंटल बोनस राशि सहित 2625 रूपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूँ का उपार्जन किया जा रहा है। गेहूँ के उपार्जन के लिये आवश्यक बारदानों की व्यवस्था की जा चुकी है। उपार्जित गेहूँ को रखने के लिये जूट बारदानों के साथ ही पीपी/एचडीपी बैग एवं जूट के भर्ती बारदाने का उपयोग किया जा रहा है। समर्थन मूल्य पर उपार्जित गेहूँ के सुरक्षित भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। उपार्जित गेहूँ में से 51 लाख 75 हजार 370 क्विंटल गेहूँ का परिवहन किया जा चुका है। उपार्जन के लिए रिकार्ड पंजीयन प्रदेश में गेहूँ उपार्जन के लिये इस वर्ष रिकार्ड 19 लाख 4 हजार किसानों ने पंजीयन कराया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3 लाख 60 हजार अधिक है। विगत वर्ष समर्थन मूल्य पर लगभग 77 लाख मीट्रिक टन गेहूँ का उपार्जन किया गया था। इस वर्ष युद्ध की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद किसानों के हित में सरकार द्वारा 78 लाख मीट्रिक टन गेहूँ के उपार्जन का लक्ष्य रखा गया है, जो कि पिछले वर्ष से एक लाख मीट्रिक टन अधिक है।  

भारत-रूस समझौता: 3000 सैनिक एक-दूसरे की ज़मीन पर तैनात, जेट और युद्धपोत भी होंगे शामिल

 नई दिल्ली भारत और रूस ने हाल ही में एक बहुत महत्वपूर्ण सैन्य समझौता किया है. इस समझौते का नाम है इंडो-रूसी रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट यानी RELOS. फरवरी 2025 में साइन हुए इस समझौते को जनवरी 2026 से लागू कर दिया गया है. अब दोनों देश एक-दूसरे के इलाके में ज्यादा से ज्यादा 3000 सैनिक, 10 एयरक्राफ्ट यानी हवाई जहाज और 5 वॉरशिप यानी युद्धपोत तैनात कर सकते हैं।  यह समझौता 5 साल के लिए है. अगर दोनों पक्ष चाहें तो इसे और 5 साल बढ़ाया भी जा सकता है. समझौते में साफ नियम बनाए गए हैं कि दोनों देश अपने सैनिकों, जहाजों और हवाई जहाजों को कैसे सपोर्ट करेंगे. इसका मुख्य मकसद संयुक्त सैन्य अभ्यास, मानवीय मदद और आपदा राहत जैसे कामों को आसान बनाना है।  समझौता क्या है और इसमें क्या-क्या शामिल है? यह RELOS समझौता दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक्स यानी सप्लाई और सपोर्ट का आदान-प्रदान करने वाला है. पहले भारत और अमेरिका के बीच भी ऐसा ही LEMOA समझौता हुआ था. अब रूस के साथ भी यही हुआ है. समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, बंदरगाहों और एयरबेस पर सैनिक, जहाज और एयरक्राफ्ट रख सकते हैं।  अधिकतम 3000 सैनिक एक साथ रह सकते हैं. 10 फाइटर प्लेन या ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और 5 युद्धपोत भी एक साथ तैनात किए जा सकते हैं. समझौते में लिखा है कि तैनात सैनिकों को ईंधन, मरम्मत, खाना, स्पेयर पार्ट्स और हर तरह का टेक्निकल सपोर्ट दिया जाएगा. यह सिर्फ युद्ध के लिए नहीं है बल्कि मुख्य रूप से संयुक्त ट्रेनिंग, अभ्यास और मदद के कामों के लिए है. रूस की संसद ने दिसंबर 2025 में इसे पास किया और अब यह पूरी तरह लागू हो चुका है।  भारत और रूस यह सैन्य आदान-प्रदान क्यों कर रहे हैं? भारत और रूस बहुत पुराने दोस्त हैं. दोनों देश 70 साल से ज्यादा समय से सैन्य साझेदारी कर रहे हैं. भारत रूस से ज्यादातर हथियार और सैन्य उपकरण खरीदता है. अब दुनिया की स्थिति बदल रही है. चीन के साथ भारत की सीमा पर तनाव है. रूस यूक्रेन युद्ध में लगा है और अमेरिका-चीन के बीच भी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।  ऐसे में दोनों देश चाहते हैं कि उनकी दोस्ती और मजबूत हो. यह समझौता इसलिए किया गया है ताकि संयुक्त अभ्यास आसानी से हो सके. पहले अभ्यास के लिए सैनिक और सामान लाना-ले जाना बहुत महंगा और मुश्किल होता था. अब दोनों देश एक-दूसरे के बेस इस्तेमाल करके जल्दी और सस्ते में काम कर सकेंगे।  भारत को रूस के आर्कटिक क्षेत्र और फार ईस्ट के बेस मिलेंगे जहां ठंडे इलाकों में ट्रेनिंग हो सकेगी. रूस को भारतीय महासागर के बंदरगाह मिलेंगे जहां उसके जहाज रुक सकेंगे. साथ ही मानवीय मिशन जैसे बाढ़, भूकंप या बचाव कार्य में मदद मिलेगी. यह दोनों देशों की सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए है।  इस समझौते से दोनों देशों को क्या फायदा होगा? इस RELOS समझौते से दोनों देशों को बहुत फायदा होगा. सबसे बड़ा फायदा लॉजिस्टिक्स सपोर्ट का है. मतलब अगर भारतीय सैनिक रूस में अभ्यास करें तो वहां उन्हें रूस का बेस, ईंधन और मरम्मत मिल जाएगी. उसी तरह रूसी सैनिक भारत आएं तो भारतीय बेस पर सब कुछ उपलब्ध होगा. इससे समय और पैसे की बचत होगी।  संयुक्त अभ्यास जैसे INDRA ज्यादा बेहतर और बार-बार हो सकेंगे. आपदा राहत में भी तेजी आएगी. उदाहरण के लिए अगर रूस में कोई प्राकृतिक आपदा हो तो भारतीय सैनिक और जहाज जल्दी मदद पहुंचा सकेंगे. भारत की नेवी को रूस के उत्तरी इलाकों तक पहुंच मिलेगी जो भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है।  रूस को भारतीय समंदर में मजबूत पकड़ मिलेगी. कुल मिलाकर दोनों देश अपनी सेनाओं को और मजबूत और तैयार रख सकेंगे. यह समझौता सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देगा।  यह समझौता क्यों महत्वपूर्ण है और आगे क्या होगा? यह समझौता भारत-रूस दोस्ती का नया अध्याय है. दोनों देश लंबे समय से साथ हैं. दुनिया में कई देश ऐसे समझौते कर रहे हैं ताकि अपनी सेनाएं मजबूत रहें. भारत के लिए यह इसलिए खास है क्योंकि वह रूस पर निर्भर है हथियारों के लिए और अब लॉजिस्टिक्स भी आसान हो जाएगी. रूस के लिए भी भारत जैसे मजबूत साथी का बेस मिलना महत्वपूर्ण है. समझौता 5 साल बाद बढ़ाया जा सकता है. फिलहाल दोनों देश इसे लागू करने की तैयारी कर रहे हैं। 

ईरानी जहाज के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकलने के बाद अमेरिका ने किया हमला, बातचीत का रास्ता क्या होगा?

वाशिंगटन/तेहरान  स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव चरम पर पहुंच गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को घोषणा की कि अमेरिकी नौसेना ने गल्फ ऑफ ओमान में एक ईरानी झंडे वाले कार्गो जहाज तौस्का पर गोलीबारी कर उसे जब्त कर लिया. जहाज अमेरिकी नौसेना की ब्लॉकेड को तोड़ने की कोशिश कर रहा था. इस घटना ने क्षेत्र में पहले से ही अस्थिर युद्धविराम को और कमजोर कर दिया है, जबकि पाकिस्तान में प्रस्तावित शांति वार्ता पर गहरा संकट छा गया है।  सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि यूएसएस स्प्रुएंस ने तौस्का को रोका और उसे रुकने की उचित चेतावनी दी. ईरानी क्रू ने नहीं माना, इसलिए हमारी नौसेना ने उनके इंजन रूम में छेद कर उन्हें रोक दिया. अब यह जहाज यूएस मरीन्स की कस्टडी में हैं और देख रहे हैं कि उसमें क्या है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने भी इसकी पुष्टि की. जहाज ईरान के अब्बास बंदरगाह की ओर जा रहा था. ईरान की सेना ने राज्य मीडिया के माध्यम से चेतावनी दी है कि वह जल्द ही जवाबी कार्रवाई करेगी. ईरानी अधिकारियों ने इस घटना को युद्धविराम का उल्लंघन बताया है।  गौरतलब है कि पिछले हफ्तों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान ने अमेरिकी ब्लॉकेड के जवाब में जलमार्ग को बंद रखा हुआ है. इससे ग्लोबल तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है. इस बीच, व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस और उच्च स्तरीय अमेरिकी अधिकारी आने वाले दिनों में पाकिस्तान जाकर ईरान के साथ शांति वार्ता का नया दौर करेंगे. हालांकि, तेहरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक अमेरिका ब्लॉकेड नहीं हटाता तब तक वह अपने दूत नहीं भेजेगा. इस बीच मौजूदा युद्ध विराम की मियाद बुधवार को समाप्त हो जा रही है. इसे बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन नई घटना ने स्थिति को जटिल बना दिया है।  वार्ता में अड़चने वार्ता में कई प्रमुख अड़चनें हैं. ईरान के यूरेनियम स्टॉक पर नियंत्रण, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलना और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी मांगें इसमें सबसे अहम हैं. ईरान अमेरिकी ब्लॉकेड को युद्धविराम का उल्लंघन मान रहा है, जबकि अमेरिका का कहना है कि ईरान ने जहाजों पर फायरिंग कर समझौते का उल्लंघन किया. इस तनाव का वैश्विक प्रभाव साफ दिख रहा है. रविवार को तेल की कीमतों में फिर उछाल आया. ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड दोनों में सात प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. दुनिया के लगभग फीसदी तेल की ढुलाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होती है. कई दिनों से यहां शिपिंग प्रभावित है, जिससे एशिया और यूरोप में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका है।  पाकिस्तान इन वार्ताओं में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है. पहले दौर की वार्ता में 21 घंटे की चर्चा के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका था. उपराष्ट्रपति वांस ने तब कहा था कि ईरान अमेरिकी शर्तों- खासकर परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता को मानने को तैयार नहीं है. अब नई घटना के बाद वार्ता की संभावनाएं धूमिल नजर आ रही हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है. अगर युद्ध विराम नहीं बढ़ाया गया तो फिर से पूर्ण युद्ध की स्थिति बन सकती है. अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि ब्लॉकेड तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान अपनी मांगें पूरी नहीं करता. वहीं ईरान कह रहा है कि जब तक अमेरिका अपने बंदरगाहों पर ब्लॉकेड नहीं  .हटाता, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलना नामुमकिन है।