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‘किसानों की जिंदगी बदल रही है’— शिवराज सिंह ने बताए 6 बड़े लाभ, सोशल मीडिया पर साझा की जानकारी

भोपाल   केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्यप्रदेश के विदिशा से सांसद शिवराज सिंह चौहान ने कृषि क्षेत्र में विकास और परिवर्तन को लेकर बड़ा दावा किया है। शिवराज ने कहा कि एमपी समेत पूरे देश में किसानों को 6 बड़े फायदे मिल रहे है। जिससे उनका जीवन खुशहाल हुआ है। केंद्रीय मंत्री ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर ये जानकारी दी है। बताया कि आज का किसान परंपरागत खेती की सीमाओं से बाहर निकलकर आधुनिक और विकसित खेती पद्दति से आत्मनिर्भर बना है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा – "प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं। किसान कल्याण को केंद्र में रखकर बनाई गई नीतियों ने खेती को परंपरागत सीमाओं से निकालकर आधुनिक, विकसित और आत्मनिर्भर बनाया है। इन 12 वर्षों में कृषि की तस्वीर भी बदली है और तकदीर भी। व्यवस्था भी बदली है और विश्वास भी। खेती भी आगे बढ़ी है और किसान भी। – PM-KISAN के माध्यम से ₹4.3 लाख करोड़ से अधिक की राशि सीधे किसानों के खातों में पहुंची। – MSP पर ₹26 लाख करोड़ से अधिक की खरीद हुई। – 8 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड बने। – 26 करोड़ सॉयल हेल्थ कार्ड दिए गए। – PM फसल बीमा योजना के माध्यम से किसानों को सुरक्षा कवच मिला। – e-NAM ने किसान को खेत से बाजार तक नई ताकत दी। अन्न को वैश्विक पहचान मिली, जलवायु अनुकूल फसल किस्में विकसित हुईं और AI आधारित कृषि सेवाएँ गाँव तक पहुंचीं। इन सब प्रयासों के परिणामस्वरूप खाद्यान्न उत्पादन में 71% की वृद्धि हुई। यह केवल योजनाओं की सफलता नहीं है, यह करोड़ों किसानों के जीवन में आए बदलाव की कहानी है। आज किसान के चेहरे पर मुस्कान है, क्योंकि उसकी मेहनत को सम्मान मिला है। आज किसान के मन में विश्वास है, क्योंकि उसका हक सीधे उसके पास पहुंचा है। आज किसान के खेत में उम्मीद लहलहा रही है, क्योंकि बीज से बाज़ार तक उसके साथ मोदी सरकार खड़ी है।"

बंगाल की राजनीति में हलचल: TMC सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे से मचा सियासी भूचाल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी में भगदड़ मची हुई है. पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने आज राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।   प्रकाश चिक बराइक से पहले टीएमसी के दो और कद्दावर राज्यसभा सांसद- सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव भी संसद के उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं. एक के बाद एक हुए इन तीन बड़े इस्तीफों के बाद राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत काफी कम हो गई है. आज बराइक के इस्तीफे के बाद अब उच्च सदन में टीएमसी के सांसदों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है।  आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं मुश्किलें सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी के भीतर यह असंतोष यहीं थमने वाला नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के तीन और राज्यसभा सांसद अपने पदों से इस्तीफा दे सकते हैं।  अगर ये अटकलें सच साबित होती हैं, तो संसद में ममता बनर्जी की पार्टी का ग्राफ और नीचे गिर जाएगा.फिलहाल इन इस्तीफों के पीछे के स्पष्ट कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन विपक्षी दल इसे टीएमसी के भीतर बढ़ती कलह और असंतोष के रूप में देख रहे हैं।  आ गई TMC के बागी सांसदों की लिस्ट! कुछ नाम तो चौंका देंगे अब तक कयास लगाए जा रहे थे क‍ि ममता का साथ क‍ितने सांसद छोड़ने वाले हैं. कोई 10 कह रहा था तो कोई 20… लेकिन अब 19 सांसदों की ल‍िस्‍ट सामने आ गई है. इसमें काकोली घोष दस्‍तीदार के साथ यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई चौंकाने वाले नाम हैं. गौर करने वाली बात है क‍ि इसमें सयानी घोष जैसे कई नाम भी हैं, ज‍िनकी अटकलें लगाई जा रही थीं।  1. यूसुफ पठान (बहरामपुर) क्रिकेटर से नेता बने यूसुफ पठान ने कांग्रेस के गढ़ बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था. लेकिन राजनीति की पिच पर यूसुफ को दीदी के लोकल नेताओं से वैसी मदद नहीं मिल रही थी, जैसी उम्मीद थी. बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब खुलकर सामने आ रही है।  2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार) कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की राजनीति का केंद्र रही है. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया यहां टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरा माने जाते हैं. लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और स्थानीय गुटबाजी के कारण उनके सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. क्षेत्र में अपनी पकड़ के बावजूद संगठन से अनबन की खबरें हैं।  3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर) मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबारी से राजनेता बने हैं. मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आने और स्थानीय लीडरशिप से तालमेल की कमी के चलते उनके टीएमसी से दूर जाने की चर्चाएं तेज हैं।  4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद) मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता अबू ताहेर खान का इस लिस्ट में होना चौंकाता है. कांग्रेस से टीएमसी में आए अबू ताहेर का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है. पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही उपेक्षा और नए नेताओं को तरजीह दिए जाने से वह काफी नाराज बताए जा रहे हैं।  5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर) बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा प्रभावित सीट से जीतने वाले पार्थ भौमिक ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे. लेकिन अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली अंदरूनी खींचतान और पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों के बदलने से पार्थ भौमिक का मोहभंग होता दिख रहा है, जिससे बगावती सुर उठे हैं।  6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद सीनियर और तेजतर्रार नेता हैं. संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज महसूस कर रही हैं, जिससे दूरियां बढ़ी हैं।  7. बापी हलदार (मथुरापुर) मथुरापुर (SC) सीट से चुनकर आए बापी हलदार जमीनी स्तर के नेता हैं. दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी अनबन अब बगावत के मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।  8. सायोनी घोष (जादवपुर) टीएमसी की युवा विंग की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की फेवरेट रही हैं. जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं. बताया जा रहा है कि संगठनात्मक फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह खुश नहीं हैं।  9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं. माला रॉय का नाम इस लिस्ट में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका है. कोलकाता नगर निगम और सांसद फंड के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं।  10. मिताली बाग (आरामबाग) आरामबाग की बेहद करीबी मुकाबले वाली सीट से जीत दर्ज करने वाली मिताली बाग एक साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने क्षत्रपों ने उन्हें काम नहीं करने दिया. इसी आंतरिक कलह और उपेक्षा के कारण मिताली ने अपने रास्ते अलग करने का मन बनाया है।  11. देव अधिकारी (घाटाल) बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर नए नहीं हैं. वह पहले भी राजनीति छोड़ने की इच्छा जता चुके थे. ममता के मनाने पर वह माने तो थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं।  12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और प्रतिष्ठित चेहरा हैं. टीएमसी ने इन्हें आदिवासी कार्ड के तौर पर उतारा था. लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैए और वादों से मुकरने के कारण कालीपद सोरेन ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।  13. जून मालिया (मेदिनीपुर) मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा … Read more

विपक्षी दलों में बढ़ती खींचतान का BJP को फायदा? जानिए परिसीमन बिल पर क्या बन रहे समीकरण

 नई दिल्ली केंद्र की बीजेपी सरकार को विधानसभा चुनावों के बीच बड़े जोर का झटका लगा था. लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल गिर गया था. कांग्रेस के विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण राहुल गांधी भले ही क्रेडिट लें, लेकिन असल बात तो यह है कि तब तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका थी।  तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के नए सिरे से जिक्र की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि दोनों ही दल अपने अपने राज्यों में सत्ता से बेदखल हो गए हैं. और, बेदखल ही नहीं हुए हैं. विधायकों के बाद टीएमसी के सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मॉनसून सत्र में मिल सकता है।  रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी मॉनसून सत्र में फिर से महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक संसद में पेश कर सकती है – सवाल यह है कि बदले राजनीतिक हालात में दोनों विधेयकों के पास होने की कितनी संभावना है।  मॉनसून सेशन में महिला आरक्षण – परिसीमन बिल की संभावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते 12 साल के कार्यकाल में पहला मौका था जब केंद्र सरकार की तरफ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो. संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक के समर्थन में 298 मत पड़े, जबकि बिलों के विरोध में 230 मत पड़े थे. दरअसल, महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के मकसद से लाया गया परिसीमन विधेयक भी महिला आरक्षण संशोधन के साथ जुड़ा हुआ था।  बीजेपी वैसे तो विधानसभा चुनावों के बीच मिले जोरदार झटके की पूरी तरह भरपाई कर चुकी है, लेकिन नेतृत्व को मिशन तब तक अधूरा लग रहा होगा, जब तक कि दोनों विधेयक संसद से पास नहीं हो जाते – और यही वजह है कि बीजेपी सरकार मॉनसून सत्र में फिर से दोनों बिल लाने और उन्हें पास कराने के लिए प्रयासरत है।  पश्चिम बंगाल की चुनावी जीत का तो बीजेपी को लंबे समय से इंतजार था. कई बार के गंभीर प्रयासों के बाद जीत संभव भी हो पाई. तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के साथ भले ही थलपति विजय की सरकार बन गई हो, लेकिन डीएमके की हार तो बीजेपी को सुकून देने वाली ही है. AIADMK अगर सत्ता में लौट पाती तो गठबंधन पार्टनर बीजेपी के लिए और अच्छी बात होती. डीएमके ने तो संसद में बिल गिर जाने को वोटिंग से पहले ही जीत की तरह जश्न मनाया था, और चुनाव कैंपेन की स्ट्रैटेजी तक बदल डाली थी।  तृणमूल कांग्रेस में जो तबाही का दौर शुरू हुआ, चल ही रहा है. डीएमके नेतृ्त्व भी सशंकित है. वैसे भी आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के छोड़कर चले जाने के बाद तो विपक्षी खेमे के शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जो डरा हुआ न हो. खबर है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों से नए सिरे से संपर्क किया है. और, इस मामले में डीएमके की तरफ से भी नरम रुख अपनाए जाने की बात सामने आई है. वैसे भी गठबंधन तोड़कर कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय की टीवीके के साथ चले जाने के बाद डीएमके नए रास्ते और समीकरण तलाशने के लिए आजाद भी हो गई है. सुनने में आया है कि डीएमके केंद्र सरकार के बिल के नए ड्राफ्ट और लिखित प्रस्ताव का इंतजार कर रही है. अचानक डीएमके के लिए पलटना तो संभव भी नहीं होगा, लेकिन बीच का रास्ता तो निकाला ही जा सकता है।  राज्यसभा चुनाव से कितना फर्क पड़ेगा देश के 10 राज्यों में राज्यसभा की 24 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होने जा रहे हैं. और, इनमें से 10 सीटों पर पहले से ही बीजेपी की जीत पक्की मानी जा रही थी. अब इसमें मध्य प्रदेश से एक सीट और भी जुड़ रही है. मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश से बीजेपी को राज्यसभा की 3 सीटें मिलना पक्का माना जाने लगा है. गुजरात से राज्यसभा की चारों सीटें बीजेपी को मिलना पक्का है. राजस्थान से 2 सीटें मिल सकती हैं. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से 1-1 सीटें मिलने वाली हैं. झारखंड में नंबर कम होने के कारण बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर रखी है।  राज्यसभा में बीजेपी के पास 113 सांसद हैं. और, पूरे एनडीए की बात करें तो ये नंबर 148 है. फिर भी दो तिहाई बहुमत के लिए 15 सीटें कम पड़ रही हैं. राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 163 सांसदों की जरूरत पड़ती है. मुद्दे की बात यह है कि टीएमसी के दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, फिर तो बहुमत का आंकड़ा भी घट जाएगा. टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बाद सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा दे दिया है. सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात भी की है, जिससे आगे का प्लान स्पष्ट हो गया है।  लोकसभा में बदल रहा नंबर गेम बदले माहौल में लोकसभा में नंबर गेम भी बदल रहा है. तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की बगावत के बाद तो पक्का ही हो गया है. टीएमसी के बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में स्पीकर को अलग बैठने और अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र भी दे दिया है।  काकोली घोष दस्तीदार को नेता मानने वाले ऐसे ही 19 सांसदों की लिस्ट सामने आई है, जिनमें यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा  के साथ सयानी घोष का नाम भी शामिल है. जिस तरह से काकोली घोष प्रशासनिक मीटिंग में इलाके के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ शामिल हुई थीं, इरादे तभी साफ हो गए थे।  अब अगर डीएमके सपोर्ट के लिए तैयार हो जाए, और टीएमसी के बागी सांसदों का साथ हो जाए तो बीजेपी के लिए दोनों बिल पास कराना आसान हो जाएगा. अगर कुछ कम पड़ा तो उसे भी मैनेज करने की कोशिश हो ही सकती है। 

वाहन चालकों के लिए खुशखबरी! ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल पर अब नहीं देनी होगी एक्साइज ड्यूटी

  नई दिल्ली पश्चिम एशिया में जारी जंग के कारण सप्लाई लाइन प्रभावित हुई है. पेट्रोल-डीजल की सप्लाई प्रभावित होने का असर कीमतों पर नजर भी आ रहा है. पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इस बीच अब भारत सरकार ने ईंधन को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने एथेनॉल के अधिक मिश्रण वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी समाप्त कर दी है. अब अधिक एथेनॉल वाले पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी नहीं लगेगी।  भारत सरकार ने इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी है. सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक 22 से 30 फीसदी तक एथेनॉल के मिश्रण वाला पेट्रोल अब एक्साइज ड्यूटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है. यानी अब ई-22, ई-25, ई-27 और ई-30 श्रेणी के पेट्रोल पर कोई एक्साइज ड्यूटी नहीं देनी होगी।  सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि इस फैसले का तेल कंपनियों से लेकर आम किसान और उपभोक्ता तक, सभी को फायदा होगा. सरकार के इस कदम को पेट्रोल की कीमतें स्थिर रखने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. एथेनॉल के ज्यादा मिश्रण से पेट्रोल की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने में भी सहायता मिल सकेगी।  एथेनॉल का मिश्रण अधिक होने को किसानों के लिए भी लाभदायक बताया जा रहा है. एथेनॉल का कनेक्शन कृषि क्षेत्र से है. सरकार के इस फैसले का तत्कालिक प्रभाव जो भी रहे, इसके पीछे दीर्घकालिक रणनीति बताई जा रही है. ज्यादा एथेनॉल के मिश्रण वाले पेट्रोल एक्साइज ड्यूटी शून्य हो जाने के बाद ई-20 या प्रीमियम पेट्रोल के मुकाबले कहीं सस्ते होंगे।  इससे इसकी मांग बढ़ेगी. हालांकि, ये पेट्रोल सभी वाहनों में अभी से ही इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे, लेकिन वाहन बनाने वाली कंपनियां ऐसे इंजन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी जो ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल पर चल सकें. बता दें कि हाल ही में ई-85 पेट्रोल भी लॉन्च कर दिया गया था. हालांकि, यह पेट्रोल केवल फ्लेक्स फ्यूल वाहनों में ही इस्तेमाल हो सकेगा।   

US Inflation Crisis: ईरान संघर्ष ने बढ़ाई ट्रंप की टेंशन, महंगाई पर काबू पाना हुआ मुश्किल

वाशिंगटन मिडिल ईस्ट में युद्ध एक बार फिर तेज हो गई है. लगातार दूसरे दिन अमेरिका-ईरान के बीच हमलों का सिलसिला जारी है. इस बीच कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है. ईरान युद्ध न सिर्फ दुनिया के तमाम अन्य देशों के लिए, बल्कि खुद अमेरिका के लिए भी बड़ी सिरदर्दी बनता जा रहा है और अमेरिकियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।  ईरान युद्ध के चलते तेल-गैस की सप्लाई में रुकावट और एनर्जी प्राइस में तगडी़ बढ़ोतरी से अमेरिका भी पीड़ित है और यहां महंगाई की तगड़ी मार पड़ रही है. मई महीने में अमेरिका में महंगाई दर के आंकड़े आ गए हैं और ये डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ाने वाले हैं. दरअसल, US Inflation मई में तीन साल के हाई पर पहुंच गई।  4 फीसदी के पार US में महंगाई रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में जंग के चलते पेट्रोल और अन्य पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिका में महंगाई के रूप में देखने को मिला है. अमेरिकी लेबर स्टेटिस्टिक्स ब्यूरो ने बुधवार को बताया कि रिटेल महंगाई (CPI) मई में सालाना आधार पर बढ़कर 4.2% हो गई, जो कि अप्रैल 2023 के बाद सबसे ज्यादा है. उस समय ये 3.8 फीसदी पर पहुंची थी।  अब अमेरिकियों की सेविंग पर संकट  अमेरिका में महंगाई दर के ये अनुमान इकोनॉमिस्ट के सर्वे और अनुमानों के अनुरूप ही रहे हैं. महंगाई में लगातार तीसरे महीने मजबूत उछाल ने अमेरिकी परिवारों पर बढ़ते दबाव को उजागर किया है. साक्ष्य बताते हैं कि ज्यादातर लोग अब अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी बचत का भी उपयोग कर रहे हैं. ये लगातार दूसरा महीना है, जबकि महंगाई दर वेतन वृद्धि से अधिक रही, जिससे आर्थिक ग्रोथ पर भी दबाव पड़ सकता है।  युद्ध, महंगाई और अमेरिकी बाजार क्रैश  ईरान के साथ एक बार फिर शुरू हुए युद्ध ने ग्लोबल टेंसन को चरम पर पहुंचा दिया है, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में फिर से आग लगने लगी है और खबर लिखे जाने तक ये 95 डॉलर पर ट्रेड कर रहा था. इस बीच अमेरिका में पड़ी महंगाई की मार का सीधा अमेरिकी शेयर बाजार पर भी देखने को मिला है. US Inflation Data आते ही यहां कोहराम सा मच गया. Dow Jones 953 अंक की बड़ी गिरावट लेकर बंद हुआ।  ट्रंप की राजनीति पर पड़ेगा असर  अमेरिका में बढ़ती महंगाई राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक राजनीतिक बोझ बनती जा रही है, जो नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है. बता दें कि ट्रंप ने 2024 का राष्ट्रपति चुनाव के दौरान महंगाई को कम करने के वादे किए थे और इसका फायदा उन्हें मिला था। 

ममता को एक और बड़ा झटका? देर रात बागी नेताओं ने शुभेंदु से की मुलाकात, सायोनी घोष की मौजूदगी से बढ़ी चर्चा

नई दिल्‍ली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस तिनका-तिनका होती नजर आ रही है. विधायकों के एक बड़े ग्रुप के ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाने के बाद अब टीएमसी लोकसभा सांसदों का एक ग्रुप भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ने जा रहा है, जल्‍द ही इसका ऐलान हो सकता है. बीती रात टीएमसी सांसद प्रतिमा मंडल, माला रॉय, मिताली बाग और सायोनी घोष केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे. इस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी पहुंचे, जिससे नई अटकलों का दौर शुरू हो गया है. क्‍या टीएमसी के बागी लोकसभा सदस्‍य बीजेपी का हाथ थामने जा रहे हैं? भूपेंद्र यादव के घर एक घंटा चली बागी TMC सांसदों की बैठक  भूपेंद्र यादव के घर मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ हुई बागी टीएमसी सांसदों की बैठक में क्‍या बात हुई, ये तो सामने नहीं आई है. लेकिन इतने जरूर संकेत मिल रहे हैं कि टीएमसी बिखर रही है और जल्‍द ही कोई बड़ा ऐलान हो सकता है. बताया जा रहा है कि सायोनी घोष समेत 4 से 5 टीएमसी सांसद इस बैठक में शामिल हुए. ये बैठक लगभग एक घंटे तक चली. हैरानी की बात ये रही कि इस बैठक में टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों का नेतृत्‍व करने का दावा कर रहीं काकोली घोष इस बैठक में नहीं पहुंचीं. सूत्रों की मानें तो अब टीएमसी के बागी ग्रुप में ज्‍यादा से ज्‍यादा समर्थन जुटाने पर जोर है. टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 19 बागी हो गए हैं।  बागियों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम!   सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में बीजेपी संग टीएमसी नेताओं की और भी बैठकें हो सकती हैं. बता दें कि बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को हस्ताक्षर करके एक पत्र भी सौंपा है, जिसमें 19 सांसदों के नाम हैं. इन नामों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम है. काकोली घोष इस बागी सांसदों के ग्रुप का नेतृत्‍व कर रही हैं. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई लिस्‍ट जारी नहीं की गई है, जिसमें ये कहा गया हो कि उनकी पार्टी के सांसद बागी हो रहे हैं।  ममता बनर्जी ने 1 जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. उन्होंने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व पर पश्चिम बंगाल में तत्कालीन सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ आंदोलन संगठित करने में अनिच्छा का आरोप लगाया था।  क्‍या TMC का कांग्रेस में होने जा रहा विलय? ममता बनर्जी की दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से हुई मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों के संभावित गठजोड़ को लेकर चर्चा तेज हो गई हैं. इसी बीच टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने इन चर्चाओं पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि अभी हमारे पास 64 विधायक है और आगे ये संख्या बढ़ेगी, लेकिन कोई भी कांग्रेस में शामिल होने वाले नहीं है. ममता बनर्जी की कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से हुई बैठक और बुधवार को नई दिल्ली में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से अभिषेक बनर्जी की अलग से हुई बैठक के बाद टीएमसी के कांग्रेस में पुनर्विलय की अटकलों को बल मिला. ममता बनर्जी के कोलकाता लौटने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों ने उनसे तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में पुनर्विलय की संभावना के बारे में पूछा. हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री बिना कुछ कहे जल्दी से अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से चली गईं। 

एक-एक कर छूटते गए साथी, क्या ममता बनर्जी की पकड़ TMC पर कमजोर पड़ गई है?

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से ममता बनर्जी का सियासी संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. टीएमसी विधायक से लेकर सांसद तक एक-एक कर ममता बनर्जी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. अब हालत यह हो गई है कि सयानी घोष से लेकर युसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बड़े सितारे भी बागी खेमे के साथ खड़े हो गए हैं।  15 साल तक बंगाल में एकछत्र राज करने के बाद सत्ता हाथ से निकलते ही टीएमसी में असंतोष फूट पड़ा है. टीएमसी में तमाम बड़े सिपहसलार अलग राह पर चल पड़े हैं, जिससे ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी निकलती जा रही है।      टीएमसी के 19 बागी सांसदों के नाम सामने आ गए हैं, जो काकोली घोष दस्तीदार के अगुवाई में अलग गुट बनाने का फैसला किया है. इस फेहरिश्त में उन सभी नेताओं के नाम है, जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि बंगाल में ममता के पास कितनी ताकत बची है?  TMC के बड़े सितारे छोड़ गए ममता का साथ बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी ने एक जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. इसके बाद 13 साल तक ममता बनर्जी संघर्ष कर साढे तीन दशक से सत्ता पर काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेका था. ममता के इस सियासी संघर्ष के रहे तमाम टीएमसी नेता धीरे-धीरे साथ छोड़ गए. अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी ने कई नए चेहरों को सियासत में लाए और सियासी पहचान दी, लेकिन सत्ता बदलते ही उनके मोहभग हो गए।  काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले बागी गुट में शत्रुघ्न सिन्हा, जगदीश चंद्र बसुनिया, खलीउर रहमान, यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान, पार्थ मौमिक, बापी हलधर, सायोनी घोष, माला रॉय, मिताली बाग, दीपक अधिकारी, कालीपद सोरेन, जून मालिया, अरूप चक्रवर्ती, शर्मिला सरकार, असित कुमार मल्ल, शताब्दी रॉय और रचना बनर्जी शामिल है. ये ऐसे नाम है, जिनकी राजनीतिक को ममता बनर्जी ने सियासी पहचान दी, लेकिन अब बीजेपी खेमे के साथ खड़े होने के लिए बेताब है।  ममता बनर्जी के पास कितने सांसद बचे 2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी ने राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में 29 पर जीत हासिल की थी. बीजेपी 12 और कांग्रेस को एक सीट मिली थी, चुनावों के बाद टीएमसी के बशीरहाट से ससद हाजी नुरुल इस्लाम की मौत हो गई थी. टीएमसी के पास 28 लोकसभा सांसद है, जिसमें से 19 सांसद बागी हो गई है. इसके बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 9 लोकसभा सांसद ही बचे हैं।  ममता बनर्जी के पास बचे टीएमसी लोकसभा सांसदों में फिलहाल कीर्ति आजाद, अभिषेक बनर्जी, सौगात राय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मोंडल, सुदीप बंधोपाध्याय, महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी और सजदा अहमद हैं।  टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसद हैं, जिसमें  दो सांसदों ने इस्तीफा दिया है. सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव ने राज्यसभा सदस्यता के साथ-साथ टीएमसी से भी इस्तीफा दे दिया है. इन दोनों के अब बीजेपी से राज्यसभा जाने की चर्चा. इस तरह 11 राज्यसभा सांसद बच रहे हैं, लेकिन उनसे में से भी कितने सांसद ममता के साथ रहेंगे, ये कहना मुश्किल है।  ममता बनर्जी के पास कितने विधायक बचे पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव चुनाव में टीएमसी के टिकट पर 80 विधायक जीतकर आए, जिसमें से ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को ममता बनर्जी ने बाहर कर दिया था. इसके बाद  टीएमसी के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया और अगुवाई ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया. टीएमसी के कुछ अन्य विधायकों ने भी साथ छोड़ा है।  ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि अब उनके पास 64 विधायकों का समर्थन है और एक विधायक के हमारे साथ जुड़ने के बाद संख्या 65 हो जाएगी. इस तरह 80 में से 65 विधायक अब ममता बनर्जी से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया है और  ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मान लिया है. टीएमसी के 65 विधायकों के बागी होने के बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 15  विधायक ही बच रहे हैं. इसके अलावा बंगाल के तमाम बड़े शहरों के मेयर अपना इस्तीफा दे दिए हैं। 

चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती? भारत की नई परमाणु रणनीति को लेकर तेज हुई चर्चाएं

बेंगलुरु  भारत की परमाणु रणनीति को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने बड़ा दावा किया है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ईयरबुक 2026 के मुताबिक भारत ने पहली बार अपने कुछ परमाणु हथियारों को ऑपरेशनल रूप से तैनात किया है. अगर यह आकलन सही साबित होता है तो इसे भारत की परमाणु नीति और सैन्य तैयारियों में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।  रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब SIPRI ने दुनिया को चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर एक नई परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो चुकी है. भू-राजनीतिक तनाव, सैन्य आधुनिकीकरण और हथियार नियंत्रण समझौतों के कमजोर पड़ने के कारण परमाणु जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं।  भारत ने बदली परमाणु नीति? SIPRI के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत के पास अनुमानित 190 परमाणु हथियार थे, जबकि एक साल पहले यह संख्या 180 बताई गई थी. रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से करीब 12 परमाणु वारहेड अब ऑपरेशनल फोर्स के साथ तैनात हो सकते हैं. अब तक माना जाता रहा है कि भारत शांति काल में अपने परमाणु हथियार और मिसाइल सिस्टम को अलग-अलग रखता है, ताकि किसी भी परमाणु कार्रवाई पर अंतिम नियंत्रण राजनीतिक नेतृत्व के पास रहे ।  विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संख्या में वारहेड की तैनाती भारत की अधिक तेज और प्रभावी प्रतिरोध क्षमता की दिशा में उठाया गया कदम हो सकता है. खासकर तब, जब भारत अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।  आक्रमण नहीं, हिफाजत के लिए परमाणु हथियार भारत की परमाणु नीति लंबे समय से ‘नो फर्स्ट यूज’ और ‘क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस’ यानी विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध क्षमता के सिद्धांत पर आधारित रही है. इसका मतलब यह है कि भारत परमाणु हथियारों को आक्रमण के लिए नहीं, बल्कि दुश्मन को हमले से रोकने के लिए रखता है. SIPRI की रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि भारत की आधिकारिक परमाणु नीति में बदलाव हुआ है, लेकिन यह जरूर संकेत दिया गया है कि रणनीतिक बलों की तैयारियों का स्तर पहले से अधिक मजबूत हुआ है।  चीन भी तेजी से बढ़ा रहा परमाणु जखीरा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की परमाणु आधुनिकीकरण प्रक्रिया पर सबसे बड़ा प्रभाव चीन की तेजी से बढ़ती सैन्य और परमाणु क्षमता का है. SIPRI के मुताबिक चीन दुनिया में सबसे तेजी से अपना परमाणु जखीरा बढ़ा रहा है. इसी वजह से भारत ने ऐसी नई मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं जो चीन के भीतर दूर तक स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम हैं. इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत की रणनीतिक सोच अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही है।  हालांकि पाकिस्तान भी भारत की सुरक्षा गणनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है. पिछले एक दशक में दोनों देशों ने नई मिसाइल प्रणालियों और परमाणु हथियारों को ले जाने वाले प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं. ऐसे में दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना भारत की प्राथमिकता बना हुआ है।  दुनियाभर में कितने परमाणु हथियार? वैश्विक स्तर पर भी परमाणु हथियारों का महत्व बढ़ता दिखाई दे रहा है. SIPRI के अनुसार दुनिया के नौ परमाणु संपन्न देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 12,187 परमाणु वारहेड हैं. इनमें से लगभग सभी देश अपने परमाणु शस्त्रागार के आधुनिकीकरण में जुटे हुए हैं. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सुरक्षा रणनीतियों में परमाणु हथियारों की भूमिका लगातार बढ़ रही है और दुनिया धीरे-धीरे एक नए न्यूक्लियर आर्म्स रेस की ओर बढ़ रही है।  इसी व्यापक वैश्विक परिदृश्य में भारत की कथित ऑपरेशनल तैनाती को भी देखा जा रहा है. भले ही इसकी संख्या सीमित हो, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की प्रतिरोध क्षमता को अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. खासकर ऐसे दौर में जब चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। 

गर्भवती महिलाओं के लिए हीट अलर्ट! गर्मी और उमस से प्रभावित हो सकता है शिशु का विकास

 नई दिल्ली ज्यादा गर्मी और उमस भरा मौसम गर्भ में पल रहे बच्चे को भी नुकसान कर सकता है. इसका सीधा असर उसके शारीरिक विकास पर पड़ने का खतरा है. इससे बच्चा ठिगनेपन का शिकार हो सकता है. जर्नल Science Advances में पब्लिश हुई स्टडी में यह दावा किया गया है. स्टडी में कहा गया है कि केवल बढ़ती गर्मी ही नहीं बल्कि उमस भी होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बड़ा खतरा है. अगर इसको काबू करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2025 तक दक्षिण एशिया में होने वाले बच्चों में ठिगनेपन के मामले लाखों में बढ़ सकते हैं।  यह रिसर्च दक्षिण एशिया के लगभग दो लाख बच्चों पर की गई है. इसमें अधिकतर बच्चे भारत के थे. रिसर्च में प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा गर्मी और उमस का संबंध बच्चों में होने वाली स्टंटिंग ( ठिगनेपन) से पाया गया है। . क्या है स्टंटिंग? ये क्यों होती है  दिल्ली AIIMS में पीडियाट्रिक विभाग में डॉ. हिमांशु भदानी बताते हैं कि जब किसी बच्चे का शारीरिक विकास ठीक तरीके से नहीं होता है तो इसको स्टंटिंग कहते हैं. इसमें बच्चे की लंबाई उसके उम्र के हिसाब से कम रह जाती है. इसको आम भाषा में ठिगनापन भी कहते हैं. ये समस्या सिर्फ शारीरिक विकास तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि इसमें बच्चे की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है और उसकी सीखने की क्षमता भी सामान्य बच्चों की तुलना में कम रहती है. इसका कारण कुपोषण होता है।  गर्मी और उमस का प्रेग्नेंसी पर असर रिसर्च में बताया गया है कि जब कोई गर्भवती महिला बहुत उमस और गर्मी वाले तापमान में रहती है तो उसके शरीर पर इसका असर पड़ता है. इससे डिहाइड्रेशन से लेकर हीट स्ट्रोक का रिस्क होता है. लंबे समय तक गर्म तापमान में रहने पर शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए काफी मेहनत करता है.इससे शरीर पर ज्यादा प्रेशर पड़ने लगता है।  इसका एक असर महिला के प्लेसेंटा पर होता है. शरीर पर बढ़े प्रेशर के कारण प्लेसेंटा में ब्लड सर्कुलेशन सामान्य की तुलना में कम होने लगता है. इससे गर्भ में पल रहे बच्चे तक जरूरी पोषण नहीं पहुंच पाता और ऑक्सीजन भी कम जाता है. इससे उसकी ग्रोथ पर असर पड़ता है क्योंकि बच्चे को जरूरत के हिसाब से पोषण नहीं मिल पाता है।  गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में सबसे ज्यादा खतरा इस रिसर्च में दावा किया गया है कि प्रेग्नेंसी की आखिरी तीमाही यानी 28 वें हफ्ते से लेकर 40 वें हफ्ते तक गर्मी का असर बच्चे पर ज्यादा होता है. क्योंकि ये वो समय होता है जब बच्चे को पोषण की जरूरत ज्यादा होती है और उसका विकास हो रहा होता है.अगर इसी समय जरूरत के हिसाब से पोषण न मिले तो इसका असर बच्चे पर होता है।  भारत के इन राज्यों पर ज्यादा असर स्टडी में पाया गया कि भारत में बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में रहने वाली महिलाओं में ये रिस्क अधिक है.ऐसा इसलिए क्योंकि इन इलाकों में उमस और गर्मी अधिक रहती है. रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अभी तक जलवायु परिवर्तन का असर केवल आम लोगों पर देखा जा रहा था, लेकिन अब गर्भ में पल रहे बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।  इस समस्या से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान भी बताया है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस समस्या से बचने के लिए पहला कदम यह है कि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा गर्म और उमस भरे वातावरण से बचाएं, साथ ही तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर ऐसा न किया गया तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर होगा. साल 2025 तक दक्षिए एशिया में ठिगनेपन के लाखों मामले बढ़ जाएंगे। 

ओरछा के हरदौल बैठका से जुड़ा है महेश केवट का परिवार, अब राज्यसभा उम्मीदवार बनकर चर्चा में

ओरछा  निवाड़ी जिले के ओरछा कस्बे के वार्ड नंबर 12 स्थित हरिशंकरी मुहल्ले में रहने वाले महेश केवट के राज्यसभा जाने का रास्ता लगभग साफ है। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद यदि कांग्रेस को कोर्ट से राहत नहीं मिलती है तो महेश केवट मध्य प्रदेश से केवट, माझी, मल्लाह, रैकवार, भोई समाज के पहले राज्यसभा सांसद होंगे। पत्नी हार गई थी नगर परिषद अध्यक्ष का चुनाव महेश केवट 2000 से लेकर 2005 तक ओरछा नगर परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे। महेश की पत्नी ने ओरछा नगर परिषद के अध्यक्ष का चुनाव भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। बीजेपी ने कर दिया था निष्कासित, 2022 के नगर परिषद ओरछ़ा के चुनाव में उस समय स्थानीय बीजेपी नेतृत्व ने महेश केवट पर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोपों में उन्हें निष्कासित कर दिया था। महेश के साथ उन कार्यकर्ताओं को निष्कासित किया गया था जिन्होंने भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ा था। महेश के साथ करीब दर्जन भर भाजपाई और पार्टी से बाहर किए गए थे। लेकिन, महेश और निवाड़ी विधायक अनिल जैन ने भोपाल में भाजपा के प्रदेश कार्यालय में महेश केवट के निष्कासन की फाइल निकलवाई तो यहां कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। महेश ने पार्टी को यह जानकारी दी कि उन्होंने और उनके परिवार के किसी सदस्य ने बागी होकर चुनाव नहीं लड़ा है। बल्कि सोशल मीडिया में कई ऐसे पत्र वायरल हुए जिनमें महेश के निष्कासन के आदेश में कुछ और नाम जोड़कर उन्हें भी बीजेपी से निष्कासित बताया गया। इसके बाद पार्टी ने अधिकारिक तौर पर 2023 में महेश के निष्कासन को समाप्त करने का आदेश तत्कालीन प्रदेश महामंत्री भगवानदास सबनानी की तरफ से जारी किया गया। हरदौल बैठका पर सेवा करता है परिवार महेश केवट के परिवार के सदस्य ओरछा के फूलबाग में स्थित हरदौल बैठका की सेवा करते हैं। लाला हरदौल बुन्देलखंड के लोकदेवता हैं। महेश के छोटे भाई हरदौल बैठका में आज भी नियमित सेवा कार्य करते हैं। महेश सीमेंट व्यवसायी हैं। ऐसे बीजेपी की नजर में आए महेश केवट हेमंत खंडेलवाल के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी के संगठन और सरकार के विभिन्न बोर्ड, निगम मंडलों में नए ऐसे चेहरों को शामिल करने पर मंथन चल रहा था कि ऐसे कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाए जो अब तक किसी अहम जिम्मेदारी पर न रहे हों। यह भी तय हुआ कि उन जातियों में से नेताओं को छांटा जाए जिन वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बहुत कम रही हो। ऐसे में मल्लाह, केवट, मांझी समाज से शिवपुरी भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष राजू बाथम और महेश केवट के नाम सामने आए। सीताराम बाथम पहले कई पदों पर रह चुके थे। ऐसे में महेश केवट को मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष के लिए चुना गया। जैसे ही महेश मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष बने उसके तुरंत बाद उनके विरोधी भाजपाई एक्टिव हुए और उन्हें भाजपा से निष्कासित नेता बताते हुए उनके निष्कासन के आदेशों को सोशल मीडिया पर शेयर कराना शुरु कर दिया। इसके बाद भोपाल में एक दिन निवाड़ी भाजपा के नेताओं, विधायक, जिलाध्यक्ष सहित चुनिंदा पदाधिकारियों की भोपाल में प्रदेश अध्यक्ष ने बैठक ली। इस बैठक में तत्कालीन जिलाध्यक्ष अखिलेश अयाची से कहा गया कि आप महेश के निष्कासन के मामले का पटाक्षेप कीजिए। सोशल मीडिया पर पूरी जानकारी विस्तार से लिखिए। उसके बाद तत्कालीन जिलाध्यक्ष ने अपने फेसबुक पर सिर्फ लेटर पोस्ट कर दिया। राज्यसभा के लिए कैसे चुने गए बीजेपी ने एमपी में बीजेपी के कब्जे वाली दो सीटों पर राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुग और प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल को घोषित किया। रजनीश को वीडी शर्मा की सिफारिश पर उम्मीदवार बताया गया। इसके बाद सीएम डॉ मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल ने यह तय किया कि उम्मीदवार सामाजिक जातिगत समीकरणों के हिसाब से उतारा जाएगा। कई नामों पर विचार-मंथन हुआ लेकिन, जब जीत के लिए जरूरी 58 विधायकों के आंकड़े को लेकर टेंशन दिखी तो तय किया गया कि ऐसे केंडिडेट को उतारा जाए जिसकी उम्मीदवारी मात्र से बड़ा संदेश जाए। यूपी चुनाव में महेश की भूमिका होगी अहम अगले साल फरवरी- मार्च में यूपी में विधानसभा के चुनाव होने हैं। चूंकि ओरछा तीन तरफ से एमपी-यूपी के बॉर्डर पर लगा हुआ है। बुन्देलखंड के मुख्य शहर झांसी की ओरछा से दूरी मात्र 15 किलोमीटर है। ओरछा में धार्मिक स्थल के साथ ही बडे़ होटल भी हैं। ऐसे में यूपी सरकार और राजनीतिक दलों की बैठकें और नेताओं का आना-जाना होता रहता है। यूपी की राजनीति में अकेले भाजपा ही नहीं, सपा बसपा में भी केवट निषाद समाज के नेता बडे़ पदों पर रहे हैं। ऐसे में अब महेश केवट का उपयोग पार्टी यूपी के चुनाव में करेगी। झांसी से लेकर पूरे गंगा किनारे केवट समाज में महेश भाजपा के प्रचारक के तौर पर काम करेंगे। यूपी में केवट समाज की राजनीतिक पकड़ समझिए सबसे पहले बीजेपी में निषाद समाज का दबदबा देखिए     डॉ संजय निषाद : निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, वर्तमान में योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।     साध्वी निरंजन ज्योति: फतेहपुर से लोकसभा सांसद और केंद्र सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री रह चुकी हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की अध्यक्ष हैं।     जयप्रकाश निषाद: पूर्वांचल (गोरखपुर क्षेत्र) में भाजपा संगठन के बेहद मजबूत स्तंभ हैं। भाजपा में क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न दायित्वों को संभालने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री (मत्स्य एवं पशुधन विभाग) के पद पर रह चुके हैं। वे बीजेपी के राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं।     बाबूराम निषाद : बाबूराम निषाद हमीरपुर से जिला अध्यक्ष, भाजयुमो क्षेत्रीय अध्यक्ष, भाजपा उत्तर प्रदेश के प्रदेश उपाध्यक्ष, बुंदेलखंड के क्षेत्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष (दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री) रहने के बाद वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं।     भगवान दास निषाद: बुंदेलखंड और कानपुर क्षेत्र के पुराने भाजपा नेता हैं। पार्टी संगठन में विभिन्न जिला व क्षेत्रीय पदों पर रहने के साथ-साथ इन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के तहत मत्स्य विकास बोर्ड का अध्यक्ष (दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री) बनाकर समाज के संगठनात्मक प्रतिनिधित्व को मजबूत किया गया था। अब सपा में समाज की हिस्सेदारी     रामभुआल निषाद: … Read more