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मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा- नक्सल-मुक्त मध्यप्रदेश, अब विकास को मिलेगी नई रफ्तार

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश ने लगभग 35 साल नक्सलवाद का दंश झेला। यह एक बड़ी चुनौती थी, पर राज्य सरकार की पुनर्वास नीति और नक्सल विरोधी अभियान में शामिल जवानों की प्रतिबद्धता से 11 दिसंबर 2025 को नक्सलवाद प्रदेश के नक्शे से पूरी तरह मिटा दिया गया। यह दिन प्रदेश में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में लिखा जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश की धरती से नक्सलवाद को समूल खत्म करना हमारी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। नक्सलवाद और लाल आतंक देश के हर हिस्से में विकास आधारित गतिविधियों में बाधक था। इससे आम नागरिकों में इसके कारण भय का माहौल होता था। ऐसे में नक्सलियों और नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही। पुलिस के अधिकारी-कर्मचारियों ने बालाघाट में अंतिम दो नक्सलियों का आत्मसमर्पण कराया और मध्यप्रदेश ने लाल सलाम को आखिरी सलाम कर दिया। अब इससे प्रभावित क्षेत्रों में विकास को एक नई दिशा और एक नई रफ्तार मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राज्य में विकास को गति देने के लिए मध्यप्रदेश में दशकों से चली आ रही नक्सलवाद की समस्या से खत्म करना अति आवश्यक था। मध्यप्रदेश ने केंद्रीय गृह मंत्री श्री शाह द्वारा देश से नक्सलवाद के खात्मे के लिए तय डेडलाइन से करीब साढ़े तीन महीने पहले ही यह ऐतिहासिल उपलब्धि हासिल कर ली है। नक्सलवादियों के एमएमसी जोन (महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़) में 42 दिन में 42 नक्सलवादियों ने समर्पण कर विकास की धारा से जुड़ना स्वीकार किया है। वहीं, प्रदेश में वर्ष 2025 में 10 हार्डकोर माओवादियों को मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस सफलता का श्रेय राज्य के बहादुर पुलिस अधिकारी और केंद्रीय सुरक्षाबलों को दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले सभी नक्सलियों के पुनर्वास के लिए विशेष योजना बनाई है। साथ ही प्रदेश में अब एक ऐसा तंत्र भी विकसित किया जाएगा, जिससे दोबारा मध्यप्रदेश की धरती पर नक्सलवादी या अन्य अतिवादी मूवमेंट खड़े न हो पाएं। इसके लिए सभी पड़ोसी राज्यों के साथ भी जरूरी समन्वय किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में वर्ष 1988-90 से नक्सली गतिविधियों की शुरुआत हुई थी। नक्सलियों ने आम नागरिकों को डरा-धमकाकर परेशान किया और सरकार के विकास कार्यों में भी रुकावटें डालीं। नक्सली पुलिस की बसों को भी आग के हवाले कर देते थे। नक्सलियों ने विपक्षी दल की सरकार में मंत्री रहे श्री लिखीराम कावरे की बालाघाट जिले में उनके घर से निकालकर सरेआम हत्या कर दी थी। प्रदेश में 35 सालों के लंबे समय तक नक्सलियों से संघर्ष जारी रहा, जिसमें कई आम नागरिक और पुलिस व सुरक्षाबलों के जवानों को अपने प्राण गंवाने पड़े। नक्सलवाद उन्मूलन अभियान के कुछ प्रमुख तथ्य     मध्यप्रदेश में वर्ष 1988 से 1990 के बीच नक्सल गतिविधियों की शुरुआत हुई थी। प्रदेश में मंडला, डिंडौरी और बालाघाट नक्सल प्रभावित जिले रहे।     राज्य सरकार ने नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट, मंडला और डिंडौरी के लिए विशेष सहयोगी  दस्ते के 850 पद स्वीकृत किए।     नक्सलियों को हथियार डालकर जीवन से जुड़ने का अवसर देने के लिए राज्य सरकार ने 'पुनर्वास  से पुनर्जीवन' अभियान प्रारंभ किया।     सरकार की इसी पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर दिसंबर 2025 में करीब 2.36 करोड़ रुपए की इनामी राशि वाले 10 नक्सलियों ने पुलिस लाईन, बालाघाट में सरेंडर कर दिया।     11 दिसंबर 2025 को मध्यप्रदेश ने 35 वर्षों से चले आ रहे लाल आतंक को समाप्त कर नक्सल मुक्त बनने की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।     वर्ष 2025 में नक्सल विरोधी अभियानों में 16 मुठभेड़ों/एक्सचेंज ऑफ फायर में 13 हार्डकोर नक्सली मारे गए और एक की गिरफ्तारी हुई।     जून 2025 में बालाघाट में हुई मुठभेड़ में 4 नक्सली मारे गए, इनमें 3 महिलाएं शामिल थीं। इनके  कब्जे से ऑटोमैटिक हथियार और भारी मात्रा में गोला-बारूद भी बरामद किया गया।     मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बालाघाट पहुंचकर नक्सलियों का खात्मा करने वाले पुलिस के सिपाहियों और अधिकारियों को पदोन्नति देकर सम्मानित किया।     नक्सल विरोधी अभियान में राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों ने अदम्य साहस और वीरता का प्रदर्शन कर नक्सलवाद की दशकों से चली आ रही समस्या का सफाया कर दिया।  

भारतीयों की स्मार्टफोन की लत: ये काम करते वक्त सबसे अधिक होता है फोन का उपयोग

 नई दिल्ली  Vivo ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि माता-पिता और बच्चों में स्मार्टफोन चलाने की आदत इतनी ज्यादा बढ़ चुकी हैं कि अब वे साथ में खाना खाने के दौरान भी मोबाइल का यूज करते हैं. कंपनी ने अपनी एनुअल स्विच ऑफ रिपोर्ट का 7वां एडिशन जारी किया है. रिसर्च के बाद कंपनी ने स्विच ऑफ इनिसिएट की शुरुआत की है.   इस पहले के तहत लोगों को डिजिटल की बजाय रियल लाइफ लाइफ के रिश्ते को ज्यादा मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा. रिपोर्ट में बताया है कि 72 पेरेंट्स और 30 परसेंट बच्चे माता-पिता से बात करने की बजाय खाने की टेबल पर स्मार्टफोन में बिजी रहना पसंद करते हैं. रिपोर्ट में बताया है कि 72 परसेंट बच्चे ऐसे होते हैं, जो डिनर के समय अपने पेरेंट्स के साथ होते हैं.  Vivo के रिसर्च में हुआ खुलासा  Vivo  के रिसर्च में यह समझने की कोशिश हुई है कि परिवार बदलते डिजिटल दुनिया के साथ कैसे तालमेल बैठा रहे हैं. रिसर्च में दो अहम रिजल्ट सामने आए हैं कि पहला खाने का समय परिवार के लिए जरूरी समय बन गया है, जब वे एक दूसरे से बातचीत कर सकते हैं. दूसरा बच्चे अब ये महसूस करते हैं कि उनके माता-पिता बहुत बिजी रहते हैं.      खाना-खाने के दौरान 72 परसेंट पेरेंट्स और 30 परसेंट चिल्ड्रन अपने स्मार्टफोन को चेक करते हैं.        पेरेंट्स 4.4 घंटेऔर बच्चे 3.5 डेली स्मार्टफोन का यूज करते हैं.      पेरेंट्स और बच्चों दोनों अलग-अलग प्रकार से स्मार्टफोन में बिजी रहते हैं, जहां पेरेंट्स थोड़े-थोड़े समय के लिए मोबाइल को चेक करते हैं. वहीं बच्चे इसको एंटरटेनमेंट के लिए यूज करते हैं.      67 परसेंट बच्चे ऐसे हैं, जो अपने माता-पिता के बिजी होने की वजह से AI का यूज करते हैं. AI से बातचीत करते हैं.   रिसर्च में पाया गया है कि 72 परसेंट बच्चे ऐसे हैं जो अपने पेरेंट्स के साथ खाना खाते हैं, लेकिन ज्यादातर समय वे फोन चलाते हुए नजर आते हैं. वहीं, 91% किड्स का कहना है कि जब फोन एक तरफ रख दिए जाते हैं, तो बातचीत ज्यादा आसान और अच्छी हो जाती है. ये समय ऐसा बन जाता है जब परिवार के लोग एक दूसरे पर ध्यान देते हैं और बातचीत करते हैं.  AI टूल्स के प्रति बच्चों का झुकाव  रिपोर्ट में इस साल एक बच्चों का AI टूल्स के प्रति झुकाव भी देखा गया है. बदलते एजुकेशन जरूरतों को देखते हुए 10–16 साल के 54 परसेंट बच्चे AI को डेली यूज में खुलकर यूज कर रहे हैं. इसका यूज वे होमवर्क और खुद के डेवलपमेंट में यूज कर रहे हैं.  बच्चे ले रहे हैं AI चैटबॉट का सहारा आजकल के समय में बच्चे माता-पिता की जगह AI चैटबॉट का सहारा लेने लगे हैं क्योंकि बच्चों के लगता है कि उनके माता-पिता बहुत बिजी रहते हैं और उनके पास समय नहीं है.  4 में से 1 बच्चा साफ-तौर पर कहता है कि AI की वजह से वे अपने माता-पिता से कम बात करते हैं.  वीवो इंडिया के कॉर्पोरेट स्ट्रैटेजी हेड ने बताया है कि उनका मानना है कि तकनीक को रिश्तों को मजबूत करना चाहिए ना कि उनको दूर करने का काम करना चाहिए.  इस साल की Switch Off स्टडी बताती है कि परिवार संतुलन बनाना चाहते हैं.

CM योगी आदित्यनाथ का बड़ा टास्क, पंकज चौधरी ने चार करोड़ वोटरों को साधने की दी चुनौती

लखनऊ उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल गया. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री और महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी को निर्विरोध रूप से पार्टी की प्रदेश इकाई की कमान सौंपी गई. लखनऊ में पार्टी मुख्यालय पर आयोजित समारोह में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने उनकी नियुक्ति की औपचारिक घोषणा की, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. हालांकि, यूपी के कप्तान के रूप में उनके सामने कई चुनौतियां भी हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पहले ही दिन उन्हें SIR को लेकर टास्क थमा दिया है. इसके अलावा 2026 में होने वाले पंचायत चुनाव को सेमीफइनल की तौर पर देखा जा रहा है. दरअसल, बीजेपी ने पंकज चौधरी को यूपी बीजेपी का नया कप्तान बनाया है. पंकज चौधरी कुर्मी समुदाय से आते हैं, जो ओबीसी वर्ग का नेतृत्व करते है. उनकी नियुक्ति को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की जातीय समीकरण मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. नए अध्यक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी को हुए नुकसान से उबरना, संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना और आगामी 2026 पंचायत चुनावों की तैयारी करना होगी. लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें SIR को लेकर नया टास्क दे दिया है. SIR में बीजेपी वोटर्स के नाम कटे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पार्टी के विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और संगठन पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान पर विशेष जोर दिया. उन्होंने दावा किया कि SIR प्रक्रिया में करीब चार करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं या शामिल नहीं हो पाए हैं, जिनमें से अधिकांश भाजपा समर्थक हैं. SIR की मेहनत 2027 में दिखेगी योगी ने कहा कि राज्य की आबादी को देखते हुए मतदाताओं की संख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन यह घट गई है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि बूथ स्तर पर मेहनत करें, फर्जी नामों पर आपत्ति दर्ज कराएं और योग्य मतदाताओं के नाम जोड़ें. मुख्यमंत्री ने भरोसा जताया कि SIR में की गई यह मेहनत 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत से जीत दिलाएगी. पंकज चौधरी के लिए पहला टास्क पंकज चौधरी की नियुक्ति को मिशन-2027 से पहले एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, नए अध्यक्ष के नेतृत्व में संगठनात्मक मजबूती और OBC वोट बैंक को एकजुट करने पर फोकस रहेगा. निवर्तमान अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने नए अध्यक्ष को पार्टी का झंडा सौंपकर शुभकामनाएं दीं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए हैट्रिक का मौका है, लेकिन विपक्ष के PDA गठजोड़ और लोकसभा में मिले झटके के बाद संगठन को नई ऊर्जा देने की जरूरत है. पंकज चौधरी के सामने यह सेमीफाइनल जैसी चुनौती होगी.

लाड़ली बहनों के लिए 3 हजार की सहायता, विधानसभा चुनाव से पहले राशि बढ़ाने की योजना, 60+ महिलाओं के लिए नई स्कीम भी

भोपाल  एक तरफ मप्र के कैबिनेट मंत्री विजय शाह का लाड़ली बहनों को लेकर दिया बयान सुर्खियों में है तो दूसरी तरफ बीजेपी आने वाले तीन सालों में महिलाओं को साधने के लिए एक डिटेल रोडमैप बना रही है। बीजेपी की कोशिश है कि 2027 में होने वाले निकाय चुनाव तक कुछ राशि को और भी बढ़ाया जायेगा।  वहीं सूत्रों का कहना है कि 60 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए सरकार एक नई स्कीम लॉन्च कर सकती है। इस स्कीम में महिलाओं को कितना पैसा मिलेगा अभी इस पर विचार किया जा रहा है। साथ ही महिलाओं के स्व सहायता समूहों को भी सशक्त करने की तैयारी है। दरअसल, राजनीतिक दलों को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने में महिलाएं एक नया पावर सेंटर बनकर उभरी हैं। मप्र, महाराष्ट्र, दिल्ली के बाद अब बिहार का चुनाव इसका ताजा उदाहरण है जहां एनडीए ने महिलाओं को स्वरोजगार के लिए 10 हजार रु. देने का वादा किया । बिहार में एनडीए की जीत में इस स्कीम को गेमचेंजर माना गया है। जानकार भी मानते हैं कि अब बीजेपी के लिए अब सत्ता की चाबी किसानों से कहीं ज्यादा महिलाओं के हाथ में है। जो राजनीतिक रूप से ज्यादा वफादार मानी जाती हैं। यही कारण है कि सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा भी महिलाओं के लिए ही है। आखिर किस तरह से आने वाले दिनों में महिलाएं राजनीति की दिशा बदलने वाली है।  1.सप्लीमेंट्री बजट का 28 फीसदी महिला-किसानों को किसी भी सरकार की वास्तविक प्राथमिकताएं उसकी घोषणाओं में नहीं, बल्कि उसके बजट आवंटन में सबसे साफ रूप से झलकती हैं। मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने शीतकालीन सत्र में जो 13,476 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बजट पेश किया, वह इस नई रणनीति का पहला और सबसे बड़ा सबूत है। इस भारी-भरकम राशि का लगभग 28% हिस्सा सिर्फ दो योजनाओं पर केंद्रित था। पहला, महिलाओं के लिए 'लाड़ली बहना योजना' जिसके लिए बजट में 1,794 करोड़ रु. का प्रावधान किया और दूसरा किसानों के लिए समर्थन मूल्य पर खरीदी, जिसके लिए 2,001 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया। हालांकि, यह तो सिर्फ एक बानगी है। जब कुल बजट के आंकड़े देखते हैं, तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है-     महिला एवं बाल विकास (जेंडर बजट): इस क्षेत्र का कुल बजट 1.23 लाख करोड़ का है। इसमें से 49,573 करोड़ सीधे तौर पर योजनाओं पर खर्च हो रहे हैं। इस विशाल राशि का सबसे बड़ा हिस्सा 'लाड़ली बहना योजना' का है, जिस पर अकेले 22 हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। यह वह राशि है जो प्रदेश की 1.26 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में हर महीने सीधे पहुंचती है। इसके अलावा लाड़ली लक्ष्मी योजना (1,183 करोड़ रु.) और अन्य योजनाएं भी शामिल हैं, जो महिला केंद्रित हैं।     कृषि एवं किसान कल्याण: पहली नजर में इस सेक्टर का कुल बजट 1.27 करोड़ रुपए है, जो महिलाओं के बजट से थोड़ा अधिक दिखता है। मगर, जब हम योजनाओं पर सीधे खर्च की बात करते हैं, तो यह आंकड़ा घटकर 20,426 करोड़ रुपए रह जाता है। इसमें भी अटल कृषि ज्योति योजना (13,909 करोड़ रुपए) जैसी योजनाएं शामिल हैं, जो किसानों को सीधे नकद फायदा देने के बजाय बिजली सब्सिडी जैसी अप्रत्यक्ष सहायता प्रदान करती हैं। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के तहत किसानों को 5,220 करोड़ रुपए की सीधी आर्थिक सहायता दी जाती है। यह तुलना साफ करती है कि भले ही कृषि का कुल बजट बड़ा दिखे, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर, सीधा नकद हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से महिलाओं पर किया जा रहा निवेश कहीं अधिक बड़ा, टारगेटेड और राजनीतिक रूप से असरदार है। जानकारों के मुताबिक बीजेपी यह समझ चुकी है कि सब्सिडी का अप्रत्यक्ष फायदा अक्सर राजनीतिक वफादारी में तब्दील नहीं होता, लेकिन खाते में आने वाली नकदी एक सीधा और भावनात्मक संबंध बनाती है। 2. जब 'लाड़ली बहनों' ने ईवीएम में किया कमाल महिलाओं के लिए बजट बढ़ाने के पीछे चुनाव में अप्रत्याशित फायदा भी है। यह केवल राजनीतिक पंडितों का अनुमान नहीं, बल्कि विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की एक विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट 'लाड़ली बहना योजना' को मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत का सबसे प्रमुख और निर्णायक फैक्टर बता चुकी है। SBI ने अपनी रिपोर्ट में 2 पॉइंट्स को महत्वपूर्ण बताया है..     गेम-चेंजर इफेक्ट: रिपोर्ट के अनुसार, जिन सीटों पर जीत का अंतर 10,000 वोटों से कम था, वहां बीजेपी की जीत की संभावना केवल 28% थी। लेकिन 'लाड़ली बहना इफेक्ट' के कारण यह संभावना बढ़कर 100% हो गई। यानी, इस योजना ने हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया।     महिला वोटर ही भविष्य: रिपोर्ट ने यह भी भविष्यवाणी की है कि 2029 के बाद भारत के सभी चुनावों में महिला मतदाता ही निर्णायक भूमिका निभाएंगी। चुनाव आयोग के आंकड़े भी इसी कहानी की पुष्टि करते हैं। 2018 की तुलना में 2023 में महिला मतदाताओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।     महिला मतदान में उछाल: 2018 में जहां 74.03% महिलाओं ने वोट दिया था, वहीं 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 76.03% हो गया। यह 2% की वृद्धि उन सीटों पर निर्णायक साबित हुई जहां जीत-हार का अंतर कम था।     बढ़ता लिंगानुपात: चुनावी मैदान में महिला मतदाताओं का लिंगानुपात 2018 में प्रति 1000 पुरुषों पर 917 था, जो 2023 में बढ़कर 945 हो गया। लोकनीति-CSDS का सर्वे इस चुनावी व्यवहार की और भी गहरी परतें खोलता है। सर्वे के अनुसार, बीजेपी को 47% महिलाओं ने वोट दिया, जबकि कांग्रेस को 43%। लेकिन सबसे दिलचस्प आंकड़ा योजना के लाभार्थियों का है-     'लाड़ली बहना' की लाभार्थी: योजना का लाभ पाने वाली 81% महिलाओं में से 48% ने बीजेपी को वोट दिया।     योजना से वंचित महिलाएं: जिन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिला, उनमें से 53% ने कांग्रेस को वोट दिया। यह आंकड़ा साबित करता है कि यह योजना सीधे तौर पर वोटों में तब्दील हुई। इतना ही नहीं, जिन 29% महिलाओं ने आखिरी समय में अपना वोटिंग का फैसला किया, उनमें से 48% ने ईवीएम पर बीजेपी का बटन दबाया। यह दर्शाता है कि चुनाव से ठीक पहले खाते … Read more

रायपुर: विशेष लेख – छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष: संघर्ष, संकल्प और समग्र विकास की स्वर्णिम यात्रा

रायपुर : विशेष लेख : छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष: संघर्ष, संकल्प और समग्र विकास की स्वर्णिम यात्रा रायपुर 1 नवंबर 2000 को भारत के मानचित्र पर छत्तीसगढ़ एक नए राज्य के रूप में उभरा। मध्यप्रदेश से पृथक होकर बने इस राज्य ने 25 वर्षों की यात्रा में न केवल अपनी पहचान गढ़ी, बल्कि विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन के कई नए प्रतिमान भी स्थापित किए। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, आदिवासी संस्कृति से समृद्ध और कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ की यह यात्रा चुनौतियों से शुरू होकर आत्मविश्वास और उपलब्धियों तक पहुँची है। राज्य गठन और प्रारंभिक चुनौतियाँ राज्य गठन के समय छत्तीसगढ़ के सामने अनेक समस्याएँ थीं, कमजोर अधोसंरचना, सीमित औद्योगिक आधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की चुनौती। ग्रामीण और आदिवासी बहुल अंचलों में सड़क, बिजली, पानी और प्रशासनिक पहुंच का अभाव स्पष्ट था। ऐसे में शुरुआती वर्षों में सरकार का प्रमुख लक्ष्य मजबूत प्रशासनिक ढांचा खड़ा करना और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार रहा। नई राजधानी नवा रायपुर (अटल नगर) की परिकल्पना, जिलों और तहसीलों का पुनर्गठन, पंचायत और नगरीय निकायों को सशक्त बनाना, इन प्रयासों ने विकास की नींव रखी। विकेंद्रीकरण के माध्यम से योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाया गया। कृषि: छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहा जाता है और कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। पिछले 25 वर्षों में सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार, उन्नत बीज, कृषि यंत्रीकरण और किसान हितैषी नीतियों ने खेती को अधिक उत्पादक और लाभकारी बनाया। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी, डिजिटल पंजीकरण और समय पर भुगतान जैसी व्यवस्थाओं ने किसानों को आर्थिक सुरक्षा दी। इससे न केवल किसान की आय बढ़ी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिली। आज छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था देशभर में एक मॉडल के रूप में देखी जाती है। आदिवासी विकास और सामाजिक न्याय छत्तीसगढ़ की आत्मा उसके आदिवासी समाज में बसती है। राज्य गठन के बाद अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के सर्वांगीण विकास के लिए विशेष प्रयास किए गए। वन अधिकार अधिनियम के तहत पट्टों का वितरण, छात्रावास और छात्रवृत्ति योजनाएं, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रम-इन सबने सामाजिक न्याय को मजबूत किया। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका ऐतिहासिक रही है। लाखों ग्रामीण महिलाएं आज आर्थिक गतिविधियों से जुड़कर आत्मनिर्भर बनी हैं और ग्रामीण विकास की धुरी बन चुकी हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में परिवर्तन शिक्षा के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ ने उल्लेखनीय प्रगति की है। नए प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय, कॉलेज, आईटीआई और विश्वविद्यालय स्थापित हुए। नवोदय, एकलव्य और आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों ने ग्रामीण और वंचित वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर दिया। स्वास्थ्य सेवाओं में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों तक सुविधाओं का विस्तार हुआ। मातृ-शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, कुपोषण उन्मूलन और आपातकालीन सेवाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। औद्योगिक विकास और अधोसंरचना खनिज संपदा से समृद्ध छत्तीसगढ़ ने औद्योगिक क्षेत्र में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इस्पात, बिजली, सीमेंट और एल्युमिनियम उद्योगों ने राज्य की आर्थिक ताकत बढ़ाई। साथ ही एमएसएमई, फूड प्रोसेसिंग और आईटी जैसे नए क्षेत्रों को भी प्रोत्साहन मिला। सड़क, रेलवे, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार ने विकास को गति दी। गांव-गांव तक बिजली और सड़क पहुंचने से शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार को नया आधार मिला। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की रोशनी नक्सलवाद छत्तीसगढ़ की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक रहा है। लेकिन सुरक्षा उपायों के साथ-साथ विकास को प्राथमिक हथियार बनाकर सरकार ने बड़ा बदलाव किया। सड़कों, मोबाइल नेटवर्क, स्कूलों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार ने उन क्षेत्रों में भी उम्मीद जगाई, जहां कभी भय का माहौल था। विकास और संवाद ने शांति की राह खोली। सुशासन, तकनीक और पारदर्शिता पिछले 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ ने सुशासन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए। ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन सेवाएं, जनदर्शन और समयबद्ध सेवा गारंटी जैसी पहलों ने प्रशासन को जनता के करीब लाया। पारदर्शिता और जवाबदेही से योजनाओं का वास्तविक लाभ लोगों तक पहुंचा। सांस्कृतिक पहचान और छत्तीसगढ़ी अस्मिता छत्तीसगढ़ की लोककला, नृत्य, संगीत, तीज-त्योहार और भाषा को राज्य स्तर पर संरक्षण और प्रोत्साहन मिला। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण विकास के साथ-साथ पहचान और गर्व का प्रतीक बना। राज्य ने यह सिद्ध किया कि आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं। युवा, रोजगार और भविष्य की दिशा आज का छत्तीसगढ़ युवा राज्य है। कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा और स्वरोजगार योजनाओं ने युवाओं को नए अवसर दिए हैं। स्टार्टअप, डिजिटल सेवाएं और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ ज्ञान, तकनीक और सतत विकास के नए केंद्र के रूप में उभर सकता है। छत्तीसगढ़ के 25 वर्ष केवल समय की गणना नहीं, बल्कि एक परिवर्तनकारी यात्रा हैं, जहां संघर्ष से संकल्प और संकल्प से सफलता की कहानी लिखी गई। यह विकास केवल इमारतों, सड़कों और आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि किसान की समृद्धि, आदिवासी के अधिकार, महिला की आत्मनिर्भरता और युवा के सपनों में दिखाई देता है। रजत जयंती के इस पड़ाव पर छत्तीसगढ़ आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर देख रहा है। एक ऐसा भविष्य, जो समावेशी, टिकाऊ और उज्ज्वल है। यही 25 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि और आने वाले कल की सबसे मजबूत नींव है। लोकेश्वर सिंह डॉ. ओमप्रकाश डहरिया, सहायक जनसंपर्क अधिकारी

सिंहस्थ 2028 के लिए बिजली सप्लाई होगी बेहतरीन, यूपी की विशेषज्ञ टीम ने व्यवस्थाओं का किया दौरा

उज्जैन  उज्जैन जिले में सिंहस्थ 2028 के लिए अभी से तैयारियां की जा रही है। देश के सबसे बड़े आयोजन में किसी तरह की अव्यवस्था ना हो इसके लिए अभी से पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के पावर डिपार्टमेंट की एक एक्सपर्ट टीम पहुंची हुई है। यह टीम सिंहस्थ 2028 के दौरान बिजली की सुचारू सप्लाई के लिए प्लान बनाने के लिए जमीनी इंतजामों का अध्ययन करेगी और जानकारी शेयर करेगी। दरअसल, यूपी की यह एक्सपर्ट टीम शिप्रा नदी के किनारे मेला क्षेत्र में बिजली प्रबंधन से जुड़े व्यावहारिक अनुभव साझा करेगी। साथ ही आवश्यक प्लानिंग तैयार करेगी। ताकि कार्यक्रम के समय बिना अड़चन के बिजली की सप्लाई बंद नहीं हो। 30 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान आपको बता दें कि उज्जैन में आयोजित होने वाला सिंहस्थ हर 12 साल में होने वाला एक बड़ा धार्मिक आयोजन है। इसमें लगभग 30 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। यह आयोजन गर्मियों के पीक सीजन में आयोजित होगा। इसके चलते बिजली की मांग बहुत ज्यादा बढ़ने का अनुमान है। खासकर एयर कंडीशनर जैसे ज्यादा पावर वाले उपकरणों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के कारण बिजली की खपत बढ़ जाएगी। अधिकारियों का अनुमान है कि उज्जैन शहर और मेला क्षेत्र में सिंहस्थ के दौरान बिजली की मांग लगभग 100 करोड़ यूनिट तक पहुंच जाएगी, जो पिछले सिंहस्थ के दौरान दर्ज की गई 60-70 करोड़ यूनिट से काफी ज्यादा है। 3 दिवसीय दौरे पर आई टीम उत्तर प्रदेश से आई टीम का यह दौरा  19 दिसंबर 2025 तक तय है। विशेषज्ञ के आने उद्देश्य मध्य प्रदेश वेस्टर्न रीजन पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के साथ जानकारी और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान करना है। डिस्कॉम वेस्टर्न रीजन के मैनेजिंग डायरेक्टर अनूप कुमार सिंह ने कहा, 'इस दौरे का मकसद डिस्कॉम को गर्मियों के पीक महीनों के दौरान स्थिर बिजली बनाए रखने में व्यावहारिक जानकारी और विशेषज्ञता हासिल करने में मदद करना है, जब एयर कंडीशनर जैसे हाई-लोड उपकरण बड़े पैमाने पर चलते हैं। 24 घंटे एक्टिव रहेगा कॉल सेंटर विश्वसनीयता और रिस्पॉन्स टाइम को बेहतर बनाने के लिए, मेला क्षेत्र में 24×7 कॉल सेंटर की योजना बनाई गई है। एक्सपर्ट्स के सुझावों के साथ एक विस्तृत रोडमैप तैयार किया जा रहा है, जिसमें शिकायतों का तेजी से समाधान और बिजली कटौती या खराबी को ठीक करने के लिए जमीनी स्तर पर तेजी से टीम भेजने पर ध्यान दिया जाएगा। अधिकारियों ने बताया कि रियल-टाइम फॉल्ट का पता लगाने और तेजी से बिजली बहाल करने के लिए मेला नेटवर्क में सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन सिस्टम लगाए जाएंगे। व्यापक योजना में लोड फोरकास्टिंग, फीडर-लेवल ऑग्मेंटेशन, महत्वपूर्ण नोड्स पर रिडंडेंसी और बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी शामिल होने की उम्मीद है ताकि लाखों तीर्थयात्रियों के लिए एक सुचारू त्योहार का अनुभव सुनिश्चित किया जा सके।  

₹2000 करोड़ लागत से पीएम मित्र पार्क, 10 हजार करोड़ निवेश और 2 लाख नौकरियों का वादा

 धार मध्य प्रदेश के धार जिले में पीएम मित्र पार्क से जिले की प्रगति को नई रफ्तार मिलने जा रही है. सरकार का दावा है कि करीब 2 हजार करोड़ की लागत से बनने वाला इस प्रोजेक्ट में 10 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश होगा. नगरीय विकास और धार जिले के प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया, इससे 50 हजार लोगों को सीधे और 1.50 लाख से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा. पीएम मित्र पार्क में धागा, कपड़ा, कताई-बुनाई, रंगाई, डिजाइन और वस्त्र निर्माण से जुड़ी हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध होगी. मंत्री विजयवर्गीय ने कहा कि पिछले 2 वर्षों में जिले ने धार्मिक, पर्यटन, औद्योगिक, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, नगरीय एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है. उन्होंने बताया कि इस समिति में सभी क्षेत्रों के विशेषज्ञों को स्थान दिया गया है, जो जिले के तेजी से विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. बैठक में कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने बताया कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में वर्ष 2024-25 में 122 सड़कों के नवीनीकरण से 362 किलोमीटर, वर्ष 2025-26 में 45 सड़कों के नवीनीकरण से 118 किलोमीटर मार्गों में सुधार हुआ है. जल जीवन मिशन में 3 लाख 3 हजार 690 घरों में नल कनेक्शन दिए जा चुके हैं. शहरी क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना में 16 हजार 250 आवासों का निर्माण पूरा हो चुका है. बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष सरदार सिंह मेडा और समिति के सदस्यों ने जिले के विकास के संबंध में उपयोगी सुझाव दिए.

नितिन नवीन बने वर्किंग प्रेसिडेंट, बीजेपी की नई परंपरा और प्रमोशन के बीच क्या है बड़ा संकेत?

नई दिल्ली बीजेपी ने 45 साल के नितिन नबीन को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर एक ऐसा रिकॉर्ड बना दिया है, जिसने पार्टी के भीतर और बाहर सभी को चौंका दिया है. 1980 में जन्मे नितिन नबीन अब बीजेपी के इतिहास के सबसे युवा अध्यक्ष हैं. लेकिन उनकी यह नियुक्ति सिर्फ युवा होने के कारण खास नहीं है. अगर आप बीजेपी के मौजूदा मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों की सूची देखें, तो पता चलता है कि नितिन नबीन का कद और उम्र का समीकरण सबसे अलग क्यों है. किसी भी बीजेपी मुख्यमंत्री से छोटे हैं नबीन नितिन नबीन की उम्र महज 45 साल है. अगर हम देश भर में बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सूची देखें, तो एक भी मुख्यमंत्री ऐसा नहीं है जो उम्र में उनसे छोटा हो. बीजेपी के सबसे युवा मुख्यमंत्री अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू हैं, जिनकी उम्र 46 वर्ष है. नितिन नबीन उनसे भी एक साल छोटे हैं. उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ (53), उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी (50) और असम के हिमंत बिस्वा सरमा (56) जैसे फायरब्रांड नेता भी उम्र में नबीन से बड़े हैं. त्रिपुरा के सीएम मणिक साहा (72) और गुजरात के भूपेंद्र पटेल (63) तो उनसे एक पीढ़ी आगे हैं.यह आंकड़ा साबित करता है कि बीजेपी ने नेतृत्व की कमान अब पूरी तरह से ‘नेक्स्ट जेन’ (Next Gen) को सौंप दी है. प्रदेश अध्यक्षों की भीड़ में भी सबसे अलग सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं, देश के प्रमुख राज्यों में बीजेपी की कमान संभालने वाले प्रदेश अध्यक्ष भी नितिन नबीन से उम्रदराज हैं. राजस्थान के अध्यक्ष मदन राठौड़ (71) और झारखंड के बाबूलाल मरांडी (67) उम्र में उनसे काफी बड़े हैं. यहां तक कि उनकी खुद की होम स्टेट बिहार के अध्यक्ष दिलीप जायसवाल (62) और उत्तर प्रदेश के भूपेंद्र चौधरी (57) भी वरिष्ठ हैं. केवल तमिलनाडु के के. अन्नामलाई (41) ही ऐसे नेता हैं जो नबीन से छोटे हैं, लेकिन बीजेपी ने उनकी जगह अब नैनार नागेंथिरन को प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया है. लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर 45 साल की उम्र में पहुंचना अपने आप में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है. कर्नाटक के युवा चेहरा माने जाने वाले बी.वाई. विजयेंद्र भी 50 साल के हैं. युवा जोश और अनुभव का अनोखा संगम नितिन नबीन की खासियत यह है कि 45 साल की उम्र में उनके पास वो अनुभव है जो कई 60 साल के नेताओं के पास भी नहीं होता. इतनी कम उम्र में लगातार 5 बार विधायक (MLA) बनना यह दिखाता है कि वे जनता के बीच कितने लोकप्रिय हैं. उन्होंने बांकीपुर जैसी सीट को अपना गढ़ बना लिया है. वे बिहार सरकार में पथ निर्माण जैसे भारी-भरकम मंत्रालयों को संभाल चुके हैं. यानी उनके पास संगठन के साथ-साथ सरकार चलाने का भी हुनर है. वे रातों-रात नेता नहीं बने. उन्होंने 2 दशक संगठन को दिए हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा के बिहार अध्यक्ष से लेकर छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रभारी बनने तक का उनका सफर संघर्ष और सफलता का रहा है. बीजेपी की इस खास परंपरा के नायक बनेंगे नितिन नवीन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बार फिर अपनी ‘युवा चेहरों को प्रमोट करने’ की रणनीति को मजबूत करते हुए बिहार के कैबिनेट मंत्री नितिन नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष (नेशनल वर्किंग प्रेसिडेंट) नियुक्त किया है. यह फैसला पार्टी के संसदीय बोर्ड द्वारा मंजूर किया गया है और वर्तमान राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) अरुण सिंह द्वारा जारी आदेश से यह निर्णय सार्वजनिक किया गया है. नितिन नबीन वर्तमा में बिहार सरकार में पथ निर्माण एवं नगर विकास मंत्री हैं, अब वह इस पद (राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष) पर जेपी नड्डा की जगह लेंगे. यह नियुक्ति न केवल बिहार में भाजपा की मजबूती को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करती है, बल्कि पार्टी की उस पुरानी परंपरा को भी जोड़ती है जहां राष्ट्रीय महासचिव या कार्यकारी अध्यक्ष जैसे पदों पर रहते हुए नेता बाद में पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाते हैं. युवा चेहरा, बड़ा संदेश 45 वर्ष के नितिन नबीन का यह प्रमोशन युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने का संकेत है, लेकिन सवाल उठ रहा है- क्या वे अगले पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने की दौड़ में हैं? नितिन नबीन का BJP में सफर संघर्षपूर्ण और तेजी से ऊपर उठने वाला रहा है. पार्टी ने उन्हें हमेशा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं जो उनकी संगठनात्मक क्षमता और चुनावी सफलता का प्रमाण हैं. वे दो बार राष्ट्रीय महामंत्री (युवा मोर्चा) रह चुके हैं जहां उन्होंने युवाओं को पार्टी से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई. बिहार में वे प्रदेश अध्यक्ष (युवा मोर्चा) के रूप में सक्रिय रहे, जिससे राज्य स्तर पर BJP की युवा शाखा मजबूत हुई. इसके अतिरिक्त वे सिक्किम के प्रभारी और वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रभारी के रूप में भी काम कर चुके हैं जहां उन्होंने पूर्वोत्तर और मध्य भारत में पार्टी का विस्तार किया. संगठन से सत्ता तक का संतुलन चुनावी मोर्चे पर नितिन नबीन का रिकॉर्ड भी शानदार है. 2006 में वे पहली बार विधायक बने जब बिहार विधानसभा चुनाव में बांकीपुर (पटना शहर का एक विधानसभा क्षेत्र) जीत दर्ज की. तब से वे लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं-2010, 2015 और 2020 में भी बांकीपुर से ही BJP के टिकट पर सफल रहे. 2021 में नीतीश कुमार सरकार में उन्हें पहली बार पथ निर्माण मंत्री बनाया गया और अब वे पथ निर्माण के साथ-साथ नगर विकास विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इन उपलब्धियों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और आज यह नियुक्ति उनके संगठनात्मक कौशल का इनाम है. BJP की ‘अध्यक्ष परंपरा’ का पैटर्न बिहार के नितिन नबीन की नियुक्ति BJP की उस परंपरा से जुड़ती है जहां राष्ट्रीय महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) या कार्यकारी अध्यक्ष जैसे पदों पर रहते हुए कई नेता बाद में पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं. पार्टी के इतिहास में यह एक साफ पैटर्न दिखता है, जहां RSS पृष्ठभूमि वाले या संगठन प्रबंधक नेता इस ‘ट्रांजिशन’ से गुजरते हैं. प्रमुख उदाहरणों की बात करें तो अमित शाह (Amit Shah) बीजेपी के वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह 2010 में राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बने. इस पद पर रहते हुए उन्होंने 2014 लोकसभा चुनावों में पार्टी को 282 सीटें दिलाने में अहम भूमिका निभाई. उसी वर्ष जुलाई 2014 में वे पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए और … Read more

निवेश नीति का असर: हापुड़ बना यूपी में औद्योगिक विस्तार और शहरी विकास का उभरता केंद्र

लखनऊ  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार उत्तर प्रदेश को निवेश और औद्योगिक विकास का बड़ा गंतव्य बनाने की ओर अग्रसर है। इसी क्रम में अब दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में एक नया निवेश केंद्र तेजी से उभर रहा है और वह हापुड़ है। हापुड़-पिलखुवा विकास प्राधिकरण द्वारा हाल ही में आयोजित 'इन्वेस्ट इन हापुड़ समिट 2025' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में हापुड़ भी गाजियाबाद, नोएडा और गुरुग्राम की तर्ज पर बड़े निवेश केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाएगा। समिट के दौरान कुल 1,300 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। इस समिट का उद्देश्य हापुड़-पिलखुवा क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को निवेशकों के सामने प्रस्तुत करना और क्षेत्र में बड़े स्तर पर निवेश को आकर्षित करना रहा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, उत्तर प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना रहे। उन्होंने समिट का उद्घाटन करते हुए कहा कि योगी आदित्यनाथ सरकार की पारदर्शी नीतियां, सुदृढ़ कानून-व्यवस्था और निवेश अनुकूल वातावरण के कारण उत्तर प्रदेश आज देश के शीर्ष निवेश गंतव्य स्थलों में शामिल हो गया है। वित्त मंत्री ने 100 से अधिक निवेशकों के समक्ष कहा कि दिल्ली-एनसीआर का विकास अब केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। हापुड़ जैसे क्षेत्र अब नए विकास इंजन के रूप में उभर रहे हैं। उन्होंने हापुड़-पिलखुवा विकास प्राधिकरण (एचपीडीए) के वाइस चेयरमैन डॉ. नितिन गौड़ (आईएएस) के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि प्राधिकरण ने सीमित समय में वित्तीय मजबूती और नियोजित विकास का प्रभावी मॉडल प्रस्तुत किया है। समिट में प्रस्तुत आंकड़ों ने निवेशकों का भरोसा और मजबूत किया है। पिछले दो वर्षों में हापुड़-पिलखुवा विकास प्राधिकरण का कुल लाभ 172 करोड़ से बढ़कर 435 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। वहीं, नक्शों और विभिन्न स्वीकृतियों से होने वाली आय 5.3 करोड़ रुपए से बढ़कर 26.32 करोड़ रुपए हो गई है। यह वृद्धि प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था और तेज निर्णय प्रक्रिया को दर्शाती है। समिट के माध्यम से निवेशकों को यह संदेश दिया गया कि हापुड़ अब केवल ग्रामीण छवि वाला क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह दिल्ली से लगभग 15 मिनट की दूरी पर स्थित एक उभरता हुआ शहरी और औद्योगिक केंद्र है। हापुड़ का मास्टर प्लान वर्ष 2024 में स्वीकृत हो चुका है। क्षेत्र की रोड कनेक्टिविटी मजबूत है और यह दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ से कुछ मिनटों की दूरी पर स्थित है। समिट में उद्योगपति, बिल्डर्स, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज और ग्रुप हाउसिंग से जुड़े निवेशकों को आमंत्रित किया गया। निवेशकों को आवासीय और औद्योगिक भूमि की जानकारी ग्रामवार खसरे सहित उपलब्ध कराई गई है, ताकि उन्हें भूमि खोजने में किसी प्रकार की असुविधा न हो। यह योगी आदित्यनाथ सरकार के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस मॉडल का व्यावहारिक उदाहरण है। समिट के दौरान कुल 1,300 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव सामने आए। यशोदा ग्रुप सहित कई बड़े निवेशकों ने हापुड़ में निवेश का आश्वासन दिया। इसमें मैक्स, मेदांता हॉस्पिटल, न्यूट्रिमा, भारती, यशोदा समूह शामिल रहे। यशोदा हॉस्पिटल ग्रुप ने 300 करोड़ रुपए, एस्पायर 150 करोड़ रुपए, दिव्यांश ग्रुप 200 करोड़ रुपए, आनंतम 150 करोड़ रुपए, आईटी पार्क बाई विशाल त्यागी 200 करोड़ रुपए, एमएंडएम 100 करोड़ रुपए, वी मैप्स 150 करोड़ रुपए और पार्क सिटी ने 100 करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा की है। हापुड़-पिलखुवा विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन डॉ. नितिन गौड़ ने बताया कि यह पहली बार है, जब प्राधिकरण स्तर पर इन्वेस्टर समिट का आयोजन किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश पर हरिपुर आवासीय योजना के अंतर्गत 30 हेक्टेयर का नया लैंड बैंक विकसित किया जा रहा है। इसमें से 21 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण अब तक पूरा हो चुका है। हापुड़ की कनेक्टिविटी नेशनल हाईवे-9, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और गंगा एक्सप्रेसवे से है।

एक क्लिक में 160 करोड़ की मदद: मुख्यमंत्री डॉ. यादव करेंगे अनुग्रह सहायता योजना की राशि का वितरण

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 16 दिसम्बर 2025 को मंत्रालय, भोपाल में संबल योजना अंतर्गत, अनुग्रह सहायता के 7 हजार 227 प्रकरणों में राशि रुपये 160 करोड़ सिंगल क्लिक के माध्यम से वितरित करेंगे। कार्यक्रम में पंचायत एवं ग्रामीण विकास एवं श्रम मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल एवं विभिन्न स्थानों पर माननीय मंत्री गण एवं स्थानीय जन प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे। संबल योजना, प्रदेश में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लाखों श्रमिकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण योजना है। इसमें अनुग्रह सहायता योजना के अंतर्गत दुघर्टना में मृत्यु होने पर 4 लाख रुपये एवं सामान्य मृत्यु होने पर 2 लाख रूपये प्रदान किये जाते हैं। इसी प्रकार स्थायी अपंगता पर 2 लाख रुपये एवं आंशिक स्थायी अपंगता पर 01 लाख रूपये तथा अंत्येष्टि सहायता के रूप में 5 हजार रूपये प्रदान किये जाते हैं। संबल योजना के अंतर्गत जहाँ एक ओर महिला श्रमिक को प्रसूति सहायता के रूप में 16 हजार रूपये दिये जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर श्रमिकों के बच्चों को महावि‌द्यालय शिक्षा प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत उच्च शिक्षा में शिक्षा के लिए सम्पूर्ण शिक्षण शुल्क राज्य सरकार ‌द्वारा वहन किया जाता है। भारत सरकार के नीति आयोग की पहल पर प्रदेश के गिग एवं प्लेटफार्म वर्कर्स को भी संबल योजना के अंतर्गत सम्मिलित किया जाकर इनका पंजीयन प्रारम्भ किया गया है। इन्हें भी संबल योजना के अंतर्गत समस्त लाभ प्रदान किये जा रहे हैं। संबल हितग्राहियों को खा‌द्यान्न पात्रता पर्ची भी प्राप्त होती है जिससे वे केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा रियायती दरों पर राशन प्राप्त कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि संबल योजना प्रदेश में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लाखों श्रमिकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण योजना है। इसमें श्रमिक को जन्म से लेकर मृत्यु तक आर्थिक सहायता प्राप्त होती है वास्तविक अर्थों में यह श्रमिकों का संबल है। मध्यप्रदेश की यह योजना देश के सभी राज्यों के लिए अनुकरणीय है। प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश के लाखों निर्माण श्रमिकों के लिये भी निर्माण मंडल के माध्यम से कई योजनायें संचालित की जाती है। इनमें निर्माण श्रमिकों की मृत्यु होने पर अनुग्रह सहायता तथा स्थायी एवं आंशिक अपंगता पर सहायता भी सम्मिलित है। सभी संबल हितग्राहियों को आयुष्मान भारत निरामय योजना अंतर्गत पात्र श्रेणी में चिन्हित किया गया है।अब वे भी 5 लाख रूपये वार्षिक निःशुल्क चिकित्सा प्राप्त कर रहे है। प्रदेश सरकार द्वारा योजना प्रारंभ 1 अप्रैल 2018 से अब तक 1 करोड़ 83 लाख श्रमिकों का संबल योजना के अंतर्गत पंजीयन किया गया है।पंजीयन प्रक्रिया निरंतरित है। श्रम विभागीय योजनांतर्गत वर्तमान तक 7 लाख 76 हजार से अधिक प्रकरणों में राशि रूपये 7 हजार 383 करोड़ से अधिक के हितलाभ दिये जा चुके हैं।