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बिजली उपभोक्ताओं को राहत: यूपी में टली 10% बिजली महंगाई, आयोग ने UPPCL को दिया झटका

लखनऊ उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी खुशखबरी है. यूपी पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा फ्यूल सरचार्ज के नाम पर बिजली के दाम बढ़ाने के प्रयासों पर रोक लग गई है. विद्युत नियामक आयोग ने 10% टैरिफ को अवैध बताया है. नियामक आयोग ने बढ़े टैरिफ पर रोक लगा दी है. UPPCL ने इसी महीने से 10 फीसदी फ्यूल सरचार्ज वसूली की योजना बनाई थी. हर 100 रुपये पर 10 रुपये तक बढ़ोतरी की आशंका थी. उपभोक्ता परिषद की आयोग की दलीलों पर आयोग ने ये आदेश सुनाया है।  यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने बिजली की कीमतें बढ़ाने का पिछले हफ्ते फैसला किया था. UPPCL ने फ्यूल सरचार्ज 10 प्रतिशत जून से वसूलने का आदेश दिया था. मार्च में 10 प्रतिशत बकाया वसूली शुरू होनी थी. यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने प्रति 100 रुपये के बिजली बिल पर बिजली ग्राहकों को 10 रुपये अतिरिक्त चुकाने की बात थी. ये शुल्क हर महीने बिजली के बिल में ऐड करना होता है. इस बार जून महीने में ये शुल्क 10 फीसदी आएगा. UPPCL जून के बाद के महीनों में भी शुल्क बढ़ा सकता है।  यूपीपीसीएल का कहना था कि मार्च 2026 महीने के लिए 10% ‘फ्यूल एंड पावर परचेस एडजस्टमेंट सरचार्ज' (FPPAS) अब जून के बिल में जोड़ा जाएगा. उसका कहना था कि उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने अधिसूचना के जरिये नियम बनाया था कि किसी एक महीने का फ्यूल सरचार्ज चौथे महीने के बिल में जोड़ा जाएगा।  किस आधार पर बढ़ाया गया है बोझ? बता दें कि बीते सोमवार को विद्युत नियामक आयोग ने यूपी पावर कारपोरेशन लिमिटेड से जवाब तलब किया था. आयोग ने प्रारंभिक तौर पर इस शुल्क वृद्धि पर सवाल उठाते हुए इस फैसले को नियमों के विपरीत बताया था. साथ ही यूपीसीएल को सात दिन के अंदर स्पष्ट करने को कहा गया था कि आखिर किस आधार पर उपभोक्ताओं पर यह अतिरिक्त बोझ डाला गया है।  हर हाल में यूपीपीसीएल को यह फैसला लेना होगा वापस भीषण गर्मी के बीच बढ़े हुए बिजली बिलों को लेकर पहले से ही उपभोक्ताओं में नाराजगी थी. ऐसे में आयोग की इस सख्त टिप्पणी के बाद करोड़ों उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है. हालांकि आयोग की इन टिप्पणियों के बाद यह तो साफ हो गया है कि यूपीपीसीएल को अपना यह फैसला वापस लेना होगा।  हालांकि उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन का कहना है कि पावर टैरिफ यानी बिजली की दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई थी. यह फ्यूल सरचार्ज है और इसका ज्यादा अंतर बिजली के बिल में नहीं पड़ेगा।  उत्तर प्रदेश विद्युत उपभोक्ता परिषद ने फ्यूल सरचार्ज को चुनौती देते हुए जनहित में एक प्रस्ताव पेश किया था. उसने इसे उपभोक्ताओं पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ अनुचित है. परिषद ने नियामक आयोग से दखल देने की मांग की थी. उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) को अब 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज लगाने के अपने फैसले को वापस लेना होगा. इस फैसले से पूरे राज्य में लाखों बिजली उपभोक्ताओं को फायदा होगा। 

MP कैबिनेट विस्तार को दिल्ली से हरी झंडी, अगले महीने बदल सकता है कई मंत्रियों का समीकरण

भोपाल  मुख्यमंत्री मोहन यादव के दिल्ली दौरों और केंद्रीय नेतृत्व से लगातार मुलाकातों के बाद आखिरकार कैबिनेट विस्तार और फेरबदल का रास्ता साफ हो गया है। 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद बनने जा रही इस नई कैबिनेट में बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि 23 से 30 जून के बीच यह विस्तार हो सकता है। इस बड़े फेरबदल में बेहतर परफॉर्मेंस न देने वाले 5 से 6 मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है, जबकि 7 से 8 नए विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। फिलहाल मुख्यमंत्री समेत कैबिनेट की संख्या 31 है, जबकि 4 पद खाली चल रहे हैं। वरिष्ठ मंत्रियों को मिल सकती है नई जिम्मेदारी सियासी गलियारों में चर्चा है कि मोहन यादव कैबिनेट के कुछ बेहद सीनियर मंत्री मुख्यमंत्री से ज्यादा अपनी वरिष्ठता के कारण असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसे में पूर्व राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजा जा सकता है, जबकि पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल को केंद्र में संगठन की कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसके अलावा, सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी करने वाले जनजातीय कल्याण मंत्री विजय शाह की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कई बार सरकार को फटकार लगा चुका है। विभाग की समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार, राधा सिंह और प्रतिमा बागरी पर भी गाज गिर सकती है। मंत्रिमंडल का विस्तार और फेरबदल करना पूरी तरह से मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। वे जब चाहें अपनी कैबिनेट का विस्तार कर सकते हैं। संगठन हमेशा सरकार के फैसलों के साथ खड़ा रहता है, क्योंकि जिसे भी जिम्मेदारी मिलेगी, उसका मुख्य काम केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाना है।: अजय सिंह यादव, प्रदेश प्रवक्ता, बीजेपी इन नए चेहरों की हो सकती है एंट्री नए चेहरों की बात करें तो सागर से शैलेंद्र जैन या प्रदीप लारिया में से किसी एक को मौका मिल सकता है। बुंदेलखंड से पूर्व मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह का नाम भी रेस में आगे चल रहा है। वहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी की भी कैबिनेट में वापसी की पूरी उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार केवल मंत्रियों के चेहरे ही नहीं बदलेंगे, बल्कि लगभग सभी मंत्रियों के विभागों में भी भारी फेरबदल किया जाएगा।

सियासी समीकरण बदलते ही केंद्र का बड़ा प्लान, परिसीमन और One Nation One Election पर बढ़े कदम

नई दिल्ली ONOE यानी एक देश एक चुनाव और परिसीमन विधेयक जल्द ही एक बार फिर संसद में पेश किया जा सकता है। खबर है कि पहली बार परिसीमन बिल पर चोट के बाद भारतीय जनता पार्टी अब बड़ी प्लानिंग कर रही है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। खास बात है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम जैसे बड़े क्षेत्रीय दलों को चुनावी हार का सामना करना पड़ा है।  रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि सरकार 2029 लोकसभा चुनाव से पहले एक देश एक चुनाव बिल पेश कर सकती है। खास बात है कि अप्रैल में संविधान संशोधन बिल फेल होने के बाद अब भाजपा नए सिरे से तैयारी कर रही है। सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि केंद्रीय गृहमंत्रालय नया परिसीमन बिल तैयार कर रहा है। पहले क्या हुआ था जब संसद में लोकसभा की सीटों की सीमाएं दोबारा तय करने वाला परिसीमन बिल लाया गया, तो कांग्रेस, डीएमके और टीएमसी जैसी सभी विपक्षी पार्टियों INDIA गठबंधन के 230 सांसदों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया। विपक्ष का मुख्य ऐतराज इस बात पर था कि सरकार ने महिलाओं को आरक्षण देने वाले कानून को लोकसभा की सीटें बढ़ाने के विवादित मुद्दे से जोड़ दिया है। साथ ही, विपक्ष को यह बड़ा डर भी था कि आबादी के हिसाब से सीटें तय होने पर उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें कम हो जाएंगी। क्षेत्रीय दल निभाएंगे बड़ी भूमिका रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा की ये कोशिशें हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के बाद तेज हुईं हैं। सूत्रों ने अखबार को बताया कि तमिलनाडु में हार और कांग्रेस के साथ छोड़ने के बाद DMK यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम 'कुछ मुद्दों' पर भाजपा के साथ बातचीत के लिए तैयार है। कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा की नजरें टीएमसी में जारी गतिविधियों पर भी हैं। ये अटकलें ऐसे समय पर सामने आईं हैं, जब बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी नेताओं में जमकर मतभेद की खबरें सामने आ रही हैं। वहीं, पार्षद स्तर के नेता इस्तीफा सौंप रहे हैं। संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि कुछ सांसद टीएमसी छोड़कर भाजपा में जा सकते हैं। ONOE पर भी बड़े ऐक्शन की तैयारी फिलहाल, संसदीय समिति की तरफ से एक देश एक चुनाव विधेयक की समीक्षा की जा रही है। अखबार से बातचीत में जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा था, 'कानून में जल्द ही संशोधन किया जाएगा। रिपोर्ट के मामले में हम अच्छी प्रगति कर रहे हैं और हम समय पर रिपोर्ट जमा कर देंगे।' अखबार से बातचीत में भाजपा नेता ने कहा कि राज्यों में चुनावों को देखते हुए कानून को चरणों में लागू किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव का हवाला दिया है। इन राज्यों में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। DMK किस मूड में रिपोर्ट के अनुसार, DMK के एक बड़े नेता ने कहा, 'परिसीमन सीटें बढ़ाने का काम और एक देश, एक चुनाव जैसे मुद्दों पर हमारी पार्टी का फैसला सिर्फ किसी राजनीतिक विचारधारा पर नहीं, बल्कि हमेशा तमिलनाडु के हक और फायदे को देखकर तय होता है। अगर केंद्र सरकार इस बात का पक्का भरोसा दे कि जिन राज्यों ने आबादी रोकने में अच्छा काम किया है, उन्हें संसद में सीटें कम करके सजा नहीं दी जाएगी। साथ ही सबकी सहमति से एक ऐसा फॉर्मूला बनाया जाए जिससे हमारी मौजूदा सीटों का हिस्सा सुरक्षित रहे, तो इस प्रस्ताव को ठुकराने की कोई वजह नहीं है। हमारी सबसे बड़ी चिंता बस यही है कि संसद में तमिलनाडु की आवाज कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। DMK के एक पूर्व मंत्री ने अखबार से कहा, 'अभी हम गठबंधन करने के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहे हैं। बीजेपी के साथ हमारे मतभेद सबको अच्छे से पता हैं। लेकिन राजनीति में चीजें कभी हमेशा के लिए एक जैसी नहीं होतीं। भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा पहले भी हुआ है जब पार्टियों ने खास मुद्दों पर सरकार का साथ दिया है या देश को संभालने के लिए मदद की है, जैसे वाजपेयी जी के समय में हुआ था। भविष्य का कोई भी फैसला उस समय के राजनीतिक हालात पर निर्भर करेगा और इस बात पर तय होगा कि तमिलनाडु के हक और राज्यों के अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं।' खास बात है कि कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि सरकार को प्रक्रिया का पालन करना होगा। साथ ही कोई भी कदम उठाने से पहले सभी पार्टियों के साथ बात करनी होगी।

भारत-अमेरिका समझौता अंतिम चरण में, निर्णायक बैठकों का दौर आज से शुरू

 नई दिल्ली भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बड़ा अपडेट आया है, इसे लेकर अब फाइनल निर्णय हो सकता है. अमेरिका का एक हाई लेवल प्रतिनिधिमंडल सोमवार 1 जून को भारत की चार दिवसीय यात्रा पर दिल्ली पहुंचे और इसका उद्देश्य India-US अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देना है. द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर 4 जून तक बैठकों का दौर चलेगा. अमेरिकी वार्ताकारों की टीम का नेतृत्व ब्रेंडन लिंच करेंगे, जबकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन के नेतृत्व में बात आगे बढ़ाएगा।  ट्रेड डील पर 99% बातचीत पूरी इस बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सोमवार को कहा कि भारत और अमेरिका अपने प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने के करीब हैं और 99% बातचीत पूरी हो चुकी है, जबकि छोटी-मोटी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि भारत बहुत जल्द अमेरिका के साथ पहले BTA पर साइन करेगा. गोयल के मुताबिक, इस समझौते की औपचारिक घोषणा से पहले बचे हुए कुछ मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के बीच आज 2 जून से 4 जून तक चर्चा जारी रहेगी।  4 जून तक भारत में US अधिकारी India-US ट्रेड पर बातचीत 7 फरवरी को जारी संयुक्त बयान के बाद शुरू हो रही है, जिसमें दोनों देशों ने बीटीए के पहले चरण के ढांचे या एक अंतरिम व्यापार समझौते पर सहमति व्यक्त की थी. अब दोनों देशों को उस समझौते के कानूनी मसौदे को अंतिम रूप देना है. नई दिल्ली में 4 जून तक अमेरिकी अधिकारी रहेंगे और बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाएंगे।  गौरतलब है कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने पिछले सप्ताह एक बयान में कहा था कि दोनों पक्षों ने भारत-अमेरिका अंतरिम समझौते के ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने और बाजार पहुंच, नॉन-टैरिफ उपायों, सीमा शुल्क और व्यापार सुविधा, निवेश प्रोत्साहन और आर्थिक सुरक्षा जैसे तमाम क्षेत्रों पर व्यापक बीटीए के तहत बातचीत को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है।  भारत को लेकर टैरिफ पर बात  ड्राफ्ट को देखें, तो अमेरिका ने भारत पर टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने पर सहमति जताई थी. इसके अलावा रूसी तेल खरीदने पर भारतीय वस्तुओं पर लगने वाले 25% अतिरिक्त टैरिफ को हटा दिया था. हालांकि, इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा था और उनके टैरिफ को अवैध घोषित किया गया था. इस कानूनी झटके के बाद, ट्रंप ने 24 फरवरी से 150 दिनों के लिए सभी देशों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया था. टैरिफ की इस बदली स्थिति पर भी दोनों पक्ष बातचीत के दौरान पुनर्विचार कर सकते हैं।  भारत ने अगले पांच सालों में 500 अरब डॉलर मूल्य के अमेरिकी एनर्जी, प्रोडक्ट्स से लेकर विमान और विमान के पुर्जे, कीमती धातुएं, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला आयात करने की योजना के संकेत भी दिए हैं।  US राजदूत ने दिए ये सिग्नल एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते शुक्रवार को भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी संकेत दिया था कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. उन्होंने IIT Delhi में यूएस-इंडिया ट्रस्ट इनिशिएटिव कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि पिछले हफ्ते ही भारत ने उस ट्रेड डील के अंतिम 1% को अंतिम रूप देने के लिए वाशिंगटन डीसी में एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था और अब यहां एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करेंगे. गोर ने आगे कहा था, 'हमें पूरी उम्मीद है कि अगले कुछ हफ्तों और महीनों में व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। 

महिलाओं के लिए खुशखबरी! अन्नपूर्णा योजना के तहत मिलेगा 3000 रुपये महीना

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की महिलाओं के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। मध्यप्रदेश की लाड़ली बहना योजना की तर्ज पर अब बंगाल सरकार ने भी महिलाओं को आर्थिक सहायता देने के लिए ‘अन्नपूर्णा योजना’ शुरू करने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कल्याणी में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए बताया कि 27 मई से इस योजना के आवेदन फॉर्म बांटने शुरू कर दिए जाएंगे। इस योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे प्रदान की जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह योजना खासतौर पर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए शुरू की गई है। सरकार का लक्ष्य है कि जरूरतमंद महिलाओं को समय पर आर्थिक सहयोग मिले, ताकि वे अपने दैनिक खर्च और परिवार की आवश्यकताओं को आसानी से पूरा कर सकें।  कौन-कौन महिलाएं होंगी पात्र अन्नपूर्णा योजना का लाभ लेने के लिए महिला आवेदक को कुछ जरूरी पात्रता शर्तों को पूरा करना होगा। योजना के अनुसार आवेदक महिला भारत की नागरिक होनी चाहिए और पश्चिम बंगाल की निवासी होना आवश्यक है। महिला की आयु सामान्यतः 18 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए। इसके अलावा आवेदक के परिवार की आय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर होनी चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर, विधवा, परित्यक्ता, बेरोजगार और निम्न आय वर्ग की महिलाओं को इस योजना में प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है। हालांकि अंतिम पात्रता मानदंड आवेदन फॉर्म के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से दिए जाएंगे। कहां मिलेगा अन्नपूर्णा योजना का आवेदन फॉर्म मुख्यमंत्री के अनुसार अन्नपूर्णा योजना के आवेदन फॉर्म राज्य सचिवालय और संबंधित सरकारी कार्यालयों से प्राप्त किए जा सकेंगे। इसके अलावा जिला प्रशासन, ब्लॉक विकास कार्यालय (BDO ऑफिस), नगर निकाय कार्यालय और पंचायत कार्यालयों में भी फॉर्म उपलब्ध कराए जाने की संभावना है। सरकार जल्द ही एक आधिकारिक सूचना जारी कर फॉर्म वितरण केंद्रों की पूरी सूची सार्वजनिक करेगी, ताकि महिलाओं को आवेदन लेने में किसी तरह की परेशानी न हो।  आवेदन के लिए कौन-कौन से दस्तावेज होंगे जरूरी योजना का लाभ लेने के लिए महिलाओं को आवेदन फॉर्म के साथ कुछ जरूरी दस्तावेज संलग्न करने होंगे। इनमें आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, बैंक पासबुक की कॉपी, पासपोर्ट साइज फोटो और आय प्रमाण पत्र शामिल हो सकते हैं। यदि आवेदक विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्ता हैं तो संबंधित प्रमाण पत्र भी जमा करना पड़ सकता है। दस्तावेजों की सत्यता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होगा, क्योंकि गलत जानकारी देने पर आवेदन निरस्त किया जा सकता है।  फॉर्म कैसे भरें और कहां जमा करें महिलाओं को आवेदन फॉर्म सावधानीपूर्वक भरना होगा। फॉर्म में नाम, पता, आधार नंबर, बैंक खाता विवरण, मोबाइल नंबर और पारिवारिक आय से जुड़ी जानकारी सही-सही भरनी होगी। फॉर्म भरने के बाद इसे संबंधित ब्लॉक कार्यालय, नगर निगम कार्यालय, पंचायत कार्यालय या जिला प्रशासन के निर्धारित केंद्रों पर जमा करना होगा। कुछ जिलों में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी शुरू की जा सकती है।  फॉर्म भरते समय इन बातों का रखें ध्यान आवेदन करते समय सभी जानकारी स्पष्ट और सही दर्ज करें। बैंक खाता नंबर और IFSC कोड भरते समय विशेष सावधानी बरतें, क्योंकि इसी खाते में योजना की राशि भेजी जाएगी। फॉर्म जमा करने से पहले सभी दस्तावेजों की स्वप्रमाणित प्रतियां संलग्न करें और आवेदन की एक कॉपी अपने पास सुरक्षित रखें। गलत जानकारी या अधूरे दस्तावेज आवेदन खारिज होने का कारण बन सकते हैं।  महिलाओं के लिए बड़ी राहत साबित होगी योजना पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि अन्नपूर्णा योजना महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करेगी। हर महीने मिलने वाली 3,000 रुपये की सहायता से महिलाएं घरेलू जरूरतें पूरी करने के साथ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी। यह योजना राज्य की लाखों महिलाओं के लिए राहत और सम्मानजनक जीवन का नया आधार बन सकती है। 

राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने तेज की तैयारी, इन नेताओं के नाम सबसे आगे

नई दिल्ली राज्यसभा की 24 सीटों और कुछ राज्यों की विधान परिषद सीटों के चुनाव को लेकर भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर बैठक की। बैठक में उम्मीदवारों के चयन और सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे पर चर्चा हुई। पार्टी ने महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी। दिग्गजों का जमावड़ा प्रधानमंत्री आवास पर दो घंटे से ज्यादा चली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा समेत चुनाव समिति के सदस्य मौजूद रहे। सूत्रों के अनुसार, बैठक में राज्यसभा की 24 सीटों में भाजपा को मिलने वाली लगभग एक दर्जन सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा की गई। राज्यों से आए नामों को लेकर केंद्रीय चुनाव समिति ने मंथन किया और कई सीटों पर अपनी राय बना ली है। बैठक में महाराष्ट्र और बिहार में विधान परिषद की सीटों को लेकर भी चर्चा की गई। क्या हुई चर्चा आंध्र प्रदेश में राज्यसभा की चार सीटों में भाजपा एक सीट की मांग कर रही है। हालांकि, पार्टी ने संकेत दिए हैं कि इस मामले में राज्य में गठबंधन के प्रमुख सहयोगी मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की राय को प्रमुखता दी जाएगी। गौरतलब है कि टीडीपी भाजपा के बजाय दूसरी सहयोगी जन सेना को एक सीट देना चाहती है। बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह के साथ अलग से भी बैठक की है। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में राज्यसभा उम्मीदवारों, विधान परिषद के उम्मीदवार और सहयोगी दलों के साथ सीटों के तालमेल को अंतिम रूप दिया गया। साथ ही पश्चिम बंगाल में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भी चर्चा की गई। इन नेताओं को टिकट मिलने के आसार सूत्रों के अनुसार, मणिपुर से पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को पार्टी टिकट दे सकती है, जबकि रिटायर हो रहे दो केंद्रीय मंत्रियों जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को भी टिकट दिए जाने की संभावना है। संगठन की अहम बैठक आज भाजपा की एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक सोमवार को पार्टी मुख्यालय में होगी। पार्टी के केंद्रीय पदाधिकारी के साथ इस बैठक में प्रदेशों के अध्यक्ष और संगठन महामंत्री भी शामिल रहेंगे। बैठक में केंद्र सरकार के सत्ता में 12 साल पूरे होने और मौजूदा कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर देशभर में किए जाने वाले कार्यक्रमों पर चर्चा होगी। साथ ही, संगठन के विभिन्न मुद्दों पर देशभर के संगठन मंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों से राष्ट्रीय अध्यक्ष अद्यतन राजनीतिक और संगठनात्मक जानकारी हासिल करेंगे। इन राज्यों में फैली हैं 24 सीटें चुनावी दौर से गुजरने वाली 24 सीटों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक से 4-4, मध्य प्रदेश, राजस्थान से 3-3, झारखंड से 2 और अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम से 1-1 सीट है।

UP फतह के लिए BJP का बड़ा प्लान, आधी टीम बदलने की चर्चा; कई नेताओं की छुट्टी तय?

लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव अभी भले दूर दिखाई देता हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उसकी तैयारी लगभग युद्धस्तर पर शुरू कर दी है। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं और हालिया संगठनात्मक गतिविधियों से संकेत मिल रहे हैं कि यूपी बीजेपी में बड़ा फेरबदल होने वाला है। चर्चा यह भी है कि संगठन की लगभग आधी टीम बदली जा सकती है और ऐसे नेताओं को हटाया जा सकता है जो लंबे समय से एक साथ कई पदों पर बने हुए हैं। यह बदलाव केवल चेहरे बदलने का मामला नहीं है, बल्कि 2024 लोकसभा चुनाव में मिले झटके के बाद बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके जरिए वह 2027 में सत्ता की हैट्रिक लगाने की तैयारी कर रही है।  आखिर बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुआ था। 80 सीटों वाले राज्य में बीजेपी और उसके सहयोगियों का प्रदर्शन अपेक्षा से कमजोर रहा, जबकि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन ने बड़ी बढ़त हासिल की। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने महसूस किया कि केवल सरकार के कामकाज के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता, संगठन को भी उतना ही मजबूत करना होगा। हालांकि बाद के उपचुनावों में बीजेपी ने वापसी की, लेकिन पार्टी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि 2027 की लड़ाई कहीं ज्यादा कठिन होगी। इसी वजह से बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन की समीक्षा की जा रही है। दोहरे पदों पर बैठे नेताओं पर क्यों है नजर? बीजेपी की संगठनात्मक संस्कृति हमेशा "एक व्यक्ति, एक जिम्मेदारी" की बात करती रही है। लेकिन समय के साथ कई नेता ऐसे हो गए हैं जो संगठन और सत्ता दोनों में प्रभावशाली पदों पर बने हुए हैं। सूत्रों के अनुसार पार्टी अब ऐसे नेताओं की सूची तैयार कर रही है जो एक से अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। पार्टी का मानना है कि चुनावी तैयारी के दौर में संगठन को पूरा समय देने वाले नेताओं की जरूरत होगी। ऐसे में कुछ नेताओं को संगठन से और कुछ को सरकार से हटाकर नई जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। क्या आधी टीम बदल सकती है? हालिया रिपोर्टों में संकेत मिले हैं कि प्रदेश संगठन में 50 प्रतिशत तक बदलाव संभव है। क्षेत्रीय अध्यक्षों, मोर्चा अध्यक्षों और कई प्रमुख पदाधिकारियों को बदला जा सकता है। जिला स्तर पर इसकी शुरुआत भी दिखाई देने लगी है, जहां लगातार नए जिला अध्यक्षों की नियुक्तियां हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी 2027 से पहले संगठन में "एंटी-इन्कम्बेंसी" नहीं आने देना चाहती। लंबे समय से एक ही पद पर बैठे नेताओं को हटाकर नए चेहरों को मौका देना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सभी 6 क्षेत्रीय अध्यक्ष भी बदले जा सकते हैं। ब्रज, अवध, काशी, गोरखपुर आदि क्षेत्रों के अध्यक्षों में बदलाव संभावित है। नए क्षेत्रीय अध्यक्षों को अपनी टीम खुद चुनने की छूट मिलेगी, ताकि स्थानीय स्तर पर नई ऊर्जा आए। युवा मोर्चा, महिला मोर्चा, किसान मोर्चा, OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक मोर्चे सहित सातों मोर्चों के अध्यक्ष बदले जा सकते हैं। पंकज चौधरी के अध्यक्ष बनने के बाद करीब 70-95 जिलों में जिलाध्यक्ष बदले जा चुके हैं। गोरखपुर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी री-शफल हुआ है। यह राज्य स्तर के बदलाव की तैयारी माना जा रहा है। 61 'कठिन' सीटों पर सबसे ज्यादा फोकस बीजेपी ने 2027 के चुनावों के लिए एक खास रणनीति बनाई है। पार्टी सबसे पहले उन 61 विधानसभा सीटों पर काम कर रही है, जहां उसे 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है। इन 61 सीटों का भौगोलिक बंटवारा कुछ इस तरह है: इनमें से पूर्वी और पश्चिमी यूपी की 35 सीटों में से 27 सीटें 2022 में समाजवादी पार्टी (SP) ने जीती थीं। हालांकि, स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसे मुश्किल माने जाने वाले इलाकों में हुए उपचुनावों में जीत मिलने के बाद से बीजेपी का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है। क्षेत्र                         कुल कठिन सीटें          प्रमुख जिले पूर्वी उत्तर प्रदेश             22                   आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर, मिर्जापुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश         13                    सहारनपुर, मुरादाबाद, बिजनौर अन्य क्षेत्र                       26                   पूरे प्रदेश में फैली अन्य सीटें मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी नेताओं को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे चुनाव प्रचार के शुरुआती चरण में इन्हीं 61 मुश्किल सीटों को प्राथमिकता दें। इनमें से पूर्वी और पश्चिमी यूपी की 35 सीटों में से 27 सीटें 2022 में समाजवादी पार्टी (SP) ने जीती थीं। हालांकि, स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसे मुश्किल माने जाने वाले इलाकों में हुए उपचुनावों में जीत मिलने के बाद से बीजेपी का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है। जातीय समीकरण भी बड़ी वजह बीजेपी का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट केवल संगठनात्मक नहीं, सामाजिक भी है। 2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने "PDA" (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए कई वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत की थी। इसके बाद बीजेपी ने भी सामाजिक समीकरणों पर नए सिरे से काम शुरू किया है। हालिया कैबिनेट विस्तार और संगठनात्मक चर्चाओं में ओबीसी, दलित और गैर-यादव पिछड़े वर्गों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने पर जोर देखा गया है। योगी सरकार और संगठन में तालमेल पर फोकस बीजेपी नेतृत्व की एक बड़ी चिंता संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय भी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के साथ हुई बैठकों के बाद कैबिनेट विस्तार और संगठनात्मक फेरबदल की चर्चाएं तेज हुई हैं। माना जा रहा है कि सरकार और संगठन के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा किया जाएगा ताकि चुनावी तैयारियों में कोई भ्रम न रहे।

गैस सिलेंडर उपभोक्ताओं के लिए अलर्ट, LPG को लेकर बदले नियम; 30 दिन का मिला समय

 नई दिल्ली देश में जून महीने की शुरुआत कई बड़े बदलावों (Rule Change From 1st June) के साथ हुई है और इसमें एलपीजी सिलेंडर से जुड़े नियम में चेंज सबसे अहम है. वेस्ट एशिया संघर्ष के चलते देश में पैदा हुए गैस संकट से निपटने के लिए मोदी सरकार ने पहले ही कई बड़े कदम उठाए हैं. वहीं अब 1 जून 2026 के एलपीजी को लेकर नया नियम लागू किया जा रहा है, जो घरेलू उपभोग के लिए सिलेंडर की पर्याप्त आपूर्ति जारी रखने के उद्देश्य से लाया गया है।  दरअसल, देश में पाइप्ड नेचुरल गैस यानी PNG कनेक्शन बढ़ाए जा रही है, लेकिन इसके बाद भी एलपीजी का इस्तेमाल कम नहीं हो रहा है. इसे देखते हुए अब सरकार ने दोहरे गैस कनेक्शन को खत्म करने के लिए कमर कसी है. पहली तारीख से पीएनजी कनेक्शन रखने वाले उपभोक्ताओं के लिए 30 दिन की डेडलाइन तय की गई है, अगर इस समयसीमा में एलपीजी सिलेंडर सरेंडर नहीं किया जाता है, तो फिर उसे कैंसिल किया जा सकता है।  PNG कनेक्शन के साथ LPG  अमेरिका-ईरान में युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से गहराई एलपीजी किल्लत के बीच सरकार ने पीएनजी कनेक्शन बढ़ाने पर जोर दिया और इसका आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. मार्च तक 6.5 लाख नए पीएनजी कनेक्‍शन दिए गए हैं, लेकिन इसके बाद भी LPG सिलेंडर का उपयोग कम नहीं हो रहा है. इससे साफ है कि कई परिवारों ने स्विच किए बिना ही नया पीएनजी कनेक्‍शन ले लिया है, जबकि सरकार ने साफ कहा था कि अगर पीएनजी और एलपीजी दोनों कनेक्‍शन हैं, तो एलपीजी को सरेंडर करना होगा. इसके बावजूद भी लोग इसे सरेंडर नहीं कर रहे हैं।  30 दिन की डेडलाइन, फिर सिलेंडर कैंसिल  इस समस्या को देखते हुए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय एक बड़ा बदलाव कर रहा है. इसका उद्देश्य उन इलाकों में दोहरे-ईंधन (dual-fuel) कनेक्शन को धीरे-धीरे खत्म करना है, जहाँ गैस ग्रिड चालू हैं यानी पीएनजी कनेक्शन उपलब्ध हैं. LPG रेगुलेशन ऑर्डर में हाल ही में हुए संशोधनों के बाद, जिन उपभोक्ताओं को PNG का कनेक्शन मिलता है, उनके लिए अब 30 दिनों की अनिवार्य टाइमलाइन तय कर दी गई है. 1 जून 2026 से, परिवारों को PNG कनेक्शन चालू होने के 30 दिनों के अंदर अपने मौजूदा LPG Cylinder ks कनेक्शन को आधिकारिक तौर पर खत्म करके सरेंडर  करना होगा. ऐसा न किए जाने की स्थिति में इस कनेक्शन को कैंसिल किया जा सकता है।  नई प्रणाली के तहत होगा सरेंडर 'एक घर एक कनेक्शन' के टारगेट के साथ किए जाने वाले इस बदलाव को आसान बनाने में मदद के लिए, Indane, Bharat Gas और HP Gas जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों यानी OMCs एक कनेक्शन ट्रांसफर वाउचर सिस्टम शुरू कर रही हैं. यह पॉलिसी शहरी निवासियों को अपने एलपीजी सिलेंडर सुरक्षित रूप से अभी वापस करने की अनुमति देती है, साथ ही उन्हें बाद में अपना LPG कनेक्शन फिर से शुरू करने का कानूनी अधिकार भी इसके तहत दिया जाता है. इसका मतलब है कि अगरे वे आगे किसी ऐसे इलाके में चले जाते हैं जहां पर PNG की सुविधा नहीं है, तो वे अपने इस एलपीजी कनेक्शन को वापस पा सकते हैं।  जून के पहले दिन LPG सिलेंडर महंगा यहां बता दें कि जून महीने की शुरुआत होते ही पहले दिन एलपीजी सिलेंडर पर महंगाई का बम फूटा है. हालांकि, LPG Cylinder Price Hike कमर्शियल यूज वाले 19 किलोग्राम के सिलेंडर पर किया गया है, जबकि 14 किलोग्राम वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों को यथावत रखा गया है. दिल्ली में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर (Delhi LPG Cylinder Price) 42 रुपये महंगा होकर 3113.50 रुपये का हो गया है. जबकि घरेलू एलपीजी सिलेंडर 7 मार्च के दाम 913 रुपये पर मिल रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, सहमति से सेक्स वर्क को लेकर पुलिस को दी नसीहत

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन (अवकाश) बेंच ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी वरिष्ठ वकील इस बेंच के सामने मामलों की जल्द सुनवाई (अर्जेंट मेंशनिंग) के लिए पेश नहीं होगा।  बेंच ने कहा कि वरिष्ठ वकीलों को कोर्ट के सामने मौखिक या लिखित रूप से अर्जेंसी दिखाते हुए मामले को जल्द सूचीबद्ध करने की मांग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मर्जी से सेक्स वर्क अपराध नहीं सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना गैरकानूनी नहीं है। वहीं वेश्यालय या कोठे चलाना गैरकानूनी है। बता दें कि इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन ऐक्ट 1956 में बनाया गया था। इसके तहत कई धाराएं हैं और कोठे और वेश्यालय चलाने का अपराध बताया गया है। इस ऐक्ट की धारा 3 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति देह व्यापार के लिए अपनी जगह को किराए पर देता है या फिर उपयोग की अनुमति देता है तो उसे 1 से 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में अवकाश के दौरान मामलों की सुनवाई कर रही जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली दो अलग-अलग जजों की पीठ ने सोमवार को एक बड़ा निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मामलों पर जल्द सुनवाई या किसी भी प्रकार की अर्जेंट मेंशनिंग के लिए कोई भी वरिष्ठ वकील (सीनियर एडवोकेट) अब सीधे बेंच के सामने पेश नहीं होगा।  दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में आमतौर पर सीनियर वकील अर्जेंट मामलों में बेंच के सामने मेंशनिंग करते हैं और अर्जेंसी यानी अति आवश्यकता का हवाला देकर किसी भी मामले को तय समय से पहले सुनने की गुहार लगाते हैं. इस प्रक्रिया को मेंशनिंग कहा जाता है, जिसे अमूमन वरिष्ठ वकील कोर्ट रूम में मौखिक या लिखित रूप से जजों के सामने उठाते थे, जिसके बाद कोर्ट मामले की गंभीरता को तय कर जल्द सुनवाई या आदेश पारित करने पर विचार करता है।  सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस पूरी व्यवस्था पर फिलहाल के लिए रोक लगा दी है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वरिष्ठ वकीलों को मामलों की जल्द सुनवाई के लिए पीठ के सामने आने की इजाजत नहीं होगी, जिसके बाद अब वह मेंशनिंग नहीं कर पाएंगे  ITPA में क्या है इसकी धारा 4 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सेक्स वर्कर की कमाई का इस्तेमाल करता है तो यह अपराध है। यह धारा सेक्स वर्कर के परिवार के लोगों पर भी लागू होती है। धारा 5 में कहा गया है कि जबरदस्ती, बहलाकर या फिर मजबूर करके किसी को देह व्यापार के लिए मजबूर करना भी अपराध है। धारा 7 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्थान या किसी धार्मिक स्थान के 200म ीटर के दायरे में सेक्स वर्क करना अपराध है। हालांकि इस कानून में कहीं भी सहमतिसे सेक्स का जिक्र नहीं किया गया है। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने बुद्धदेव कर्माकर बनाम बंगाल सरकार के मामले में भी बड़ा फैसला सुनाया था। यह मामला सेक्स वर्करों के पुनर्वास और अधिकारों को लेकर था। कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 में हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है उसी तरह सेक्स वर्कर भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की जांच में कई बार सामने आया है कि सेक्स वर्कर्स के साथ पुलिस का रवैया ठीक नहीं होता है। यह उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। कोर्ट कई बार कह चुका है कि सहमित से सेक्स वर्क करना अपराध नहीं है। ऐसे में अगर कोई आईटीपीए की बाकी धाराओं का उल्लंघन नहीं कर रहा है तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए। इस फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि अगर कोई अपनी मर्जी से सेक्स वर्क कर रहा है तो उसे हिरासत में रखने, सुधार गृह बेजने की जरूरत नहीं है।

BJP ने अजेय कुमार को सौंपी बड़ी जिम्मेदारी, राजस्थान की राजनीति में बढ़ी हलचल

जयपुर  राजस्थान भाजपा को आखिरकार नया संगठन महामंत्री मिल गया है और इस जिम्मेदारी के लिए जिस नाम की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, वह है अजेय कुमार. आम लोगों के बीच भले ही उनका चेहरा बहुत ज्यादा परिचित न हो, लेकिन भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक ढांचे में उन्हें लंबे समय से एक मजबूत रणनीतिकार माना जाता रहा है. यही वजह है कि राजस्थान जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से अहम राज्य में उनकी संभावित भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा तेज हो गई है. राजस्थान भाजपा में यह पद लंबे समय से खाली चल रहा था. इससे पहले चंद्रशेखर अगस्त 2017 में राजस्थान भाजपा के संगठन महामंत्री बनाए गए थे और जनवरी 2024 तक करीब 6 साल 5 महीने इस जिम्मेदारी को संभालते रहे. बाद में उन्हें राजस्थान से हटाकर तेलंगाना भाजपा में संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी दे दी गई थी. तब से संगठन स्तर पर नए चेहरे को लेकर चर्चाएं चल रही थीं. संघ की पृष्ठभूमि से निकला संगठन का चेहरा अजेय कुमार उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी पहचान मंचों और भाषणों से कम, संगठन और रणनीति से ज्यादा रही है. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं और लंबे समय तक संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रहे हैं. भाजपा में संगठन महामंत्री का पद वैसे भी बेहद अहम माना जाता है. यह केवल राजनीतिक पद नहीं होता, बल्कि संघ और भाजपा के बीच समन्वय का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है. उनकी जिम्मेदारियों में बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना, चुनावी रणनीति में समन्वय स्थापित करना, कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना, सदस्यता अभियान को आगे बढ़ाना और प्रदेश नेतृत्व व केंद्रीय नेतृत्व के बीच संवाद बनाए रखना शामिल रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ बड़ा सफर उत्तराखंड जाने से पहले अजेय कुमार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक काम किया. मेरठ, बिजनौर और मुरादाबाद जैसे क्षेत्रों में उन्होंने संगठन को मजबूत करने का काम संभाला. बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और चुनावी नेटवर्क तैयार करने में उनकी खास भूमिका रही. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में काम करने का अनुभव बाद में उनके लिए बड़ी ताकत साबित हुआ. यही अनुभव उन्हें आगे बड़े राज्यों की जिम्मेदारी तक ले गया. 2019 में मिला सबसे बड़ा मौका वर्ष 2018 में उत्तराखंड भाजपा के तत्कालीन संगठन महामंत्री संजय कुमार को पद से हटाए जाने के बाद यह पद कुछ समय तक खाली रहा. भाजपा और संघ दोनों संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश में जुटे थे. इसी क्रम में सितंबर 2019 में अजेय कुमार को उत्तराखंड भाजपा का संगठन महामंत्री नियुक्त किया गया. इसे उनके राजनीतिक और संगठनात्मक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है. उनकी नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू की गई थी. इससे पहले वे मेरठ क्षेत्र में भाजपा के संगठन मंत्री के रूप में काम कर रहे थे. बूथ से लेकर चुनाव तक दिखाई पकड़ 2020 और 2021 के दौरान उन्होंने उत्तराखंड में बूथ समितियों के पुनर्गठन, मंडल स्तर की सक्रियता, युवा कार्यकर्ताओं को जोड़ने और सोशल मीडिया नेटवर्क को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया. उनकी कार्यशैली का सबसे खास पहलू यह माना गया कि वे बिना ज्यादा प्रचार के जमीन पर संगठन को मजबूत करने में विश्वास रखते हैं. भाजपा के भीतर उन्हें लो-प्रोफाइल लेकिन प्रभावशाली संगठनकर्ता कहा जाने लगा. 2022 चुनाव बना सबसे बड़ी परीक्षा अजेय कुमार के संगठनात्मक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में हुई. उस समय राज्य में राजनीतिक चुनौतियां थीं और मुख्यमंत्री बदलने जैसी परिस्थितियां भी सामने आई थीं. इसके बावजूद भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की. हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी सीट हार गए थे, लेकिन पार्टी ने बहुमत बरकरार रखा. राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे भाजपा संगठन की बड़ी उपलब्धि माना. इस चुनाव के बाद अजेय कुमार की पकड़ और प्रभाव दोनों बढ़ते हुए दिखाई दिए. 2024 के बाद भी बनी रही चर्चा 2023 और 2024 के दौरान उन्हें भाजपा के रणनीतिक संगठनकर्ताओं में गिना जाने लगा. इस दौरान कुछ राजनीतिक विवादों और मीडिया चर्चाओं में उनका नाम भी सामने आया, लेकिन आधिकारिक स्तर पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ और न ही कोई कार्रवाई हुई. इसी समय भाजपा और संघ के बीच बेहतर समन्वय को लेकर भी उनकी भूमिका की चर्चा होती रही. संगठन के भीतर उन्हें शांत स्वभाव लेकिन मजबूत निर्णय क्षमता वाले नेता के रूप में देखा जाता है. क्यों कहा जाता है पर्दे के पीछे का रणनीतिकार अजेय कुमार की पहचान उन नेताओं में है जो सुर्खियों से दूर रहकर काम करना पसंद करते हैं. उनकी कार्यशैली में अनुशासन, बूथ आधारित राजनीति, कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और माइक्रो लेवल प्लानिंग को खास महत्व दिया जाता है. हाल के वर्षों में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स में उन्हें भाजपा का “राइजिंग चाणक्य” तक कहा गया. इसकी वजह उत्तराखंड में संगठनात्मक सफलता, चुनावी प्रबंधन और बिना शोर किए परिणाम देने वाली कार्यशैली को माना गया. अब अगर राजस्थान जैसे बड़े राज्य में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है तो उनकी अगली परीक्षा भी कम बड़ी नहीं होगी. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तराखंड में संगठन को मजबूत करने वाले अजेय कुमार राजस्थान भाजपा के लिए किस तरह की नई रणनीति लेकर आते हैं.