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737 MAX विमानों में सॉफ्टवेयर खामी का खुलासा, FAA ने शुरू की सुरक्षा जांच

 वॉशिंगटन  विमान बनाने वाली अमेरिकी कंपनी बोइंग के 737 MAX विमानों में सॉफ्टवेयर गड़बड़ी का पता चला है। इसकी वजह से लैंडिंग के दौरान पायलटों को ऑटोमेटेड फ्लाइट गाइडेंस नहीं मिल पाता है। कंपनी के डॉक्यूमेंट्स का हवाला देते हुए वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट दी है कि यह समस्या कॉकपिट सॉफ्टवेयर अपडेट से जुड़ी है और तब हो सकती है जब पायलट मिस्ड अप्रोच (लैंडिंग की कोशिश नाकाम होने) के बाद विमान का तय रूट बदलते हैं। ऐसी स्थिति में अगली बार लैंडिंग की कोशिश के दौरान ऑटोमेटेड नेविगेशन फीचर काम करना बंद कर सकता है। बोइंग ने क्या कहा? बोइंग ने कहा कि उसने पिछले महीने ही ऑपरेटर्स को इस समस्या के बारे में बता दिया था और वह इसके स्थायी समाधान पर काम कर रही है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को भेजे एक ईमेल बयान में बोइंग ने कहा, "हमने ऑपरेटर्स के साथ ऐसी स्थितियों को सुरक्षित रूप से संभालने के लिए मौजूदा पायलट प्रक्रियाओं को मजबूत करने वाली जानकारी साझा की। हमारे इंजीनियर इस समस्या को हमेशा के लिए ठीक करने के लिए एक सॉफ्टवेयर अपडेट पर काम कर रहे हैं।" फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) सुरक्षा से जुड़ी संभावित समस्या की समीक्षा कर रहा है। एफएए ने कहा कि उसे कुछ 737 MAX विमानों में लगे फ्लाइट कंप्यूटर के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट से जुड़ी समस्या के बारे में जानकारी है। एजेंसी ने कहा, "एफएए एक सुधारात्मक कार्रवाई समीक्षा बोर्ड बुलाएगा और अगर सुरक्षा से जुड़ी कोई चिंता सामने आती है तो तुरंत कार्रवाई करेगा।" एफएए, बोइंग और एयरलाइंस अब यह पता लगा रहे हैं कि प्रभावित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कितनी बड़े पैमाने पर हो रहा है और क्या इस समस्या से सुरक्षा को कोई व्यापक खतरा है। विमानों की डिलीवरी पर रोक लगाने की मांग वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, साउथवेस्ट एयरलाइंस और यूनाइटेड एयरलाइंस ने बोइंग से कहा है कि वे उस सॉफ्टवेयर वाले नए 737 MAX विमानों की डिलीवरी रोक दें, जिनमें यह समस्या है। इसके बजाय उन्होंने पुराने सॉफ्टवेयर वर्शन वाले विमानों की मांग की है। इस नई समस्या के कारण MAX विमानों की जांच और बढ़ गई है। अभी यह साफ नहीं है कि इस सॉफ्टवेयर वाले कितने विमान अभी उड़ान भर रहे हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब बोइंग के 737 MAX प्रोग्राम की रेगुलेटरी और सुरक्षा के लिहाज़ से कड़ी जांच हो रही है।

अस्पताल पर हमले के बाद मलबे में दबे थे मोजतबा खामेनेई? ईरानी धर्मगुरु के दावे से हलचल

तेहरान 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हुए भीषण अमेरिकी और इजरायली हमलों में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की कमान संभालने वाले नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई (56) को लेकर एक और सनसनीखेज खुलासा सामने आया है। ईरान की असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य और वरिष्ठ धर्मगुरु मोहसिन हैदरी ने कतरी टीवी चैनल 'अल अरबी' को दिए इंटरव्यू में दावा किया है कि शुरुआती हमले में घायल होने के बाद मोजतबा को इलाज के लिए तेहरान के एक अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन इसके बाद तीन अस्पतालों को निशाना बनाया गया और मोजतबा को तीसरी बार मलबे से जिंदा निकाला गया। इस खुलासे के बाद 56 साल के नए सुप्रीम लीडर की सेहत, उनकी सार्वजनिक अनुपस्थिति और उनके सीक्रेट लोकेशन को लेकर दुनिया भर में फिर से चर्चा छिड़ गई है। अस्पताल पर बमबारी के बाद मलबे से बचाया गया ईरानी धर्मगुरु मोहसिन हैदरी के अनुसार, 28 फरवरी को अली खामेनेई के तेहरान स्थित परिसर पर हुए हमले में मोजतबा गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हैदरी ने बताया, "जब दुश्मनों को पता चला कि वे घायल होकर अस्पताल में भर्ती हैं, तो तेहरान के तीन अलग-अलग अस्पतालों पर बमबारी की गई। मोजतबा खामेनेई तीसरे अस्पताल में मौजूद थे और उन्हें मलबे के नीचे से बाहर निकाला गया।" इस हमले के बाद से ही मोजतबा किसी अज्ञात स्थान पर चले गए हैं और तब से अब तक न तो उन्हें सार्वजनिक रूप से देखा गया है और न ही उनका कोई ऑडियो-वीडियो संदेश जारी हुआ है। गुप्त कमरे में वोटिंग और 8 मार्च का चुनाव असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स का सचिवालय खुद अमेरिकी और इजरायली हमलों का शिकार बना था, जिसमें 8 लोग मारे गए थे और नए सुप्रीम लीडर से जुड़ी कई गोपनीय रिपोर्ट जलकर खाक हो गई थीं। हमले के बाद असेंबली के सदस्यों को बिना जगह बताए एक गुप्त कमरे में बुलाया गया। वहां सदस्यों ने कागज की पर्चियों पर अपने वोट लिखे। मोहसिन हैदरी ने बताया कि उन्होंने ही सबसे पहले मोजतबा खामेनेई के नाम का प्रस्ताव रखा था, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को अली खामेनेई के बेटे को चुनने पर अंजाम भुगतने की चेतावनी दी थी। मोजतबा को 59 में से 50 वोट मिले, जबकि 8 वोट अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को पड़े और 1 सदस्य ने मतदान में भाग नहीं लिया। हैदरी के मुताबिक, मोजतबा को खुद भी यह अंदाजा नहीं था कि उन्हें चुना जा रहा है। उन्हें टीवी पर आधिकारिक ऐलान देखने के बाद ही अपने सुप्रीम लीडर बनने का पता चला। क्या वाकई जिंदा और स्वस्थ हैं मोजतबा खामेनेई? मोजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर अमेरिका और ईरान की ओर से अलग-अलग विरोधी दावे किए जा रहे हैं। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि वे मानते हैं कि मोजतबा मरे नहीं हैं, लेकिन वे बेहद गंभीर रूप से घायल और अधमरे हो चुके हैं। ट्रंप के मुताबिक उनके शरीर का बायां हिस्सा (हाथ और पैर) बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दौरान न्यू यॉर्क पहुंचे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में इन दावों को खारिज किया। पेजेशकियान ने दावा किया कि उन्होंने हाल ही में मोजतबा खामेनेई के साथ 7 घंटे लंबी बैठक की है और वे पूरी तरह से स्वस्थ और शासन चलाने में सक्षम हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता संभालने से पहले किसी भी औपचारिक पद पर न रहने वाले और "शैडो मैन" कहे जाने वाले मोजतबा खामेनेई की लंबे समय से जारी गुमनामी ईरान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संशय को और बढ़ा रही है।

देशभर में निकोटीन पाउच पर शिकंजा, अवैध बिक्री रोकने राज्यों को भेजा गया पत्र

नई दिल्ली देशभर में खुलेआम बिक रहे 'निकोटीन पाउच' को लेकर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। बिना मंजूरी के ऑनलाइन और दुकानों पर निकोटीन पाउच बेचने के मामलों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र ने सभी राज्यों को आधिकारिक पत्र भेजा है। सरकार ने इन अवैध उत्पादों की बिक्री तुरंत रोकने, इन्हें जब्त करने और बेचने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी के अनुसार, ये निकोटीन पाउच सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह हैं। इन पैकेटों में अत्यधिक मात्रा में लत लगाने वाला निकोटीन होता है। बच्चों को जल्दी लग जाती है लत बता दें कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये बच्चों तक आसानी से पहुंच रहे हैं, जिससे कम उम्र में ही युवाओं को इसकी खतरनाक लत लगने का बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए सलाहकार बोर्ड ने साफ सिफारिश की है कि निकोटीन के ऐसे किसी भी नए उत्पाद को बाजार में बेचने की अनुमति न दी जाए। गौर करने वाली बात यह है कि लोगों के मन में अक्सर यह सवाल आता है कि अगर सिगरेट छोड़ने के लिए 'निकोटीन गम' का इस्तेमाल किया जा सकता है, तो 'निकोटीन पाउच' पर पाबंदी क्यों है? आइए हम आपको बताते हैं। क्या है निकोटीन गम और निकोटीन पाउच में फर्क? इस बात को ऐसे समझिए मंजूरी प्राप्त निकोटीन गम शरीर को निकोटीन की एक नियंत्रित और सुरक्षित खुराक देते हैं, जिससे धीरे-धीरे सिगरेट या तंबाकू की लत छूटने में मदद मिलती है। अमेरिकी दवा नियामक संस्था (FDA) ने इनकी सुरक्षा और असरशीलता की पूरी जांच करने के बाद इन्हें सिगरेट छुड़ाने के एक वैध इलाज के तौर पर मंजूरी दी है। इसके साथ यदि डॉक्टर या काउंसलर की सलाह ली जाए, तो सिगरेट छोड़ने की सफलता दर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाती है। निकोटीन पाउच असुरक्षित और गैर-कानूनी क्यों? इसके ठीक उलट, निकोटीन पाउच में  के इन पाउच में भी निकोटीन होता है, लेकिन इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि ये सिगरेट छुड़ाने में असरदार हैं। यही वजह है कि अमेरिकी एफडीए या अन्य प्रमुख स्वास्थ्य नियामकों ने इन्हें इलाज के रूप में कोई मंजूरी नहीं दी है।  

जिस लेफ्ट से दशकों तक लड़ीं ममता, अब उसी से बातचीत; SIR मुद्दे पर साथ आने की तैयारी

नई दिल्ली ममता बनर्जी की राजनीति एक ही सूत्र पर चलती दिखती है। जरूरत पड़ी तो भाजपा के साथ खड़ी हो गईं, जरूरत पड़ी तो कांग्रेस के साथ चली गईं। अब जरूरत पड़ने पर लेफ्ट की ओर हाथ बढ़ा रही हैं। बंगाल में दशकों तक लेफ्ट को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताने वाली नेता आज उसी लेफ्ट से बात कर रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। सीपीआई(एम) महासचिव एमए बेबी ने चुनाव आयोग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के मुद्दे पर विपक्षी नेताओं को पत्र लिखा। पत्र में संयुक्त रणनीति बनाने की बात कही गई। इसके बाद ममता बनर्जी ने उनसे संपर्क किया। दोनों ने फोन पर बात की। चर्चा विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की संभावना पर हुई। सेरामपुर की जनसभा में ममता बनर्जी ने कहा कि अब यह देखने की जरूरत नहीं कि कौन लाल है, कौन नीला है या कौन पीला है। अब हम सब एक हैं। उन्होंने 30 सितंबर की प्रस्तावित इंडिया ब्लॉक बैठक का भी जिक्र किया और विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने को कहा। बयान साफ है। रंग अब मायने नहीं रखते। लेकिन बंगाल की राजनीति में यह बात नई है। तृणमूल कांग्रेस बनी ही लेफ्ट को हराने के वादे पर थी। ममता बनर्जी सालों तक सीपीआई(एम) की सबसे बड़ी विरोधी रहीं। अब वही नेता लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं। लेफ्ट विरोध से बनी पहचान बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान लेफ्ट फ्रंट के विरोध से बनी। 1998 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और तृणमूल कांग्रेस बनाई। इसके बाद पार्टी लेफ्ट की मुख्य चुनौती बन गई। 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन ने 34 साल पुरानी लेफ्ट सरकार को हराया। ममता मुख्यमंत्री बनीं। लेफ्ट को भारी हार मिली। उसके बाद लंबे समय तक ममता बनर्जी लेफ्ट को बंगाल की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट बताती रहीं। सीपीआई(एम) तृणमूल पर हिंसा, मौकापरस्ती और असहिष्णुता के आरोप लगाती रही। दोनों पक्ष सड़क से विधानसभा तक एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे। अब उन्हीं दो ताकतों को साथ आने के लिए कहा जा रहा है। पुराने आरोपों का कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं हुआ। दशकों की दुश्मनी कैसे खत्म हुई, इसका कोई साफ जवाब भी नहीं दिया गया। जब बंगाल में लेफ्ट पर हमला करना होता है, पुराने आरोप काम आते हैं। जब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत होती है, तो लाल, नीला और पीला रंग एक हो जाते हैं भाजपा के साथ भी गईं, कांग्रेस के साथ भी राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी का सफर बार-बार रुख बदलने का रहा है। 1999 में तृणमूल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हुई। ममता रेल मंत्री बनीं। 2001 में एनडीए छोड़ दिया। 2003 में वाजपेयी सरकार में वापस आईं। 2004 में कोयला और खान मंत्री रहीं। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में शामिल हुईं और फिर रेल मंत्री बनीं। 2012 में मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई, डीजल की कीमतें बढ़ाने और एलपीजी सब्सिडी सीमित करने जैसे मुद्दों पर समर्थन वापस ले लिया। यानी भाजपा कभी गठबंधन साथी रही, कभी दुश्मन। कांग्रेस कभी सहयोगी रही, कभी निशाना। लेफ्ट कभी मुख्य दुश्मन था, अब विपक्षी एकता के नाम पर उससे संपर्क हो रहा है। लेफ्ट के सामने उलझन सीपीआई(एम) ने साफ कहा है कि यह तृणमूल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं है। पार्टी इसे चुनाव आयोग और एसआईआर जैसे मुद्दों पर विपक्ष को जोड़ने की कोशिश बता रही है। लेकिन बंगाल में लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के लिए यह आसान नहीं। दशकों से वे तृणमूल के खिलाफ लड़ते रहे हैं। ऐसे में किसी भी सहयोग से उनके समर्थकों में भ्रम फैल सकता है। पार्टी के वैकल्पिक राजनीति के दावे पर भी असर पड़ सकता है। सीपीआई(एम) नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा है कि लेफ्ट का भाजपा विरोध नया नहीं है। पार्टी अकेले भी भाजपा से लड़ती रही है। उनके बयान से साफ है कि बंगाल लेफ्ट तृणमूल के साथ किसी समझ को लेकर सतर्क है। यह सतर्कता स्वाभाविक है। तृणमूल की पहचान लेफ्ट को हराकर बनी थी, उसके साथ हाथ मिलाकर नहीं। जो पार्टी खुद को लेफ्ट शासन का विकल्प बताती थी, अब लेफ्ट का सहयोग मांग रही है क्योंकि उसे बड़े राजनीतिक कवर की जरूरत है। शुभेंदु अधिकारी का हमला बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस नए समीकरण पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जो पार्टी कभी सीपीएम के खिलाफ लड़ती थी, अब उसी की दोस्त बन रही है। तृणमूल कांग्रेस का जन्म सीपीएम के लंबे शासन के खिलाफ हुआ था। आज वही सीपीएम उसकी राजनीतिक साझेदार बन गई है। इस दौरान उन्होंने विधानसभा की एक घटना का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, वोटिंग के दौरान तृणमूल के एक हिस्से और सीपीआई(एम) के अकेले विधायक का रुख एक जैसा रहा। उन्होंने इसे दोनों पक्षों के बीच बनती समझ का संकेत बताया। सिद्धांत या मौजूदा जरूरत? अभी तृणमूल और सीपीआई(एम) के बीच कोई पक्का चुनावी गठबंधन घोषित नहीं हुआ है। बातचीत हो रही है। चुनिंदा मुद्दों पर साथ काम करने की अपील की जा रही है। लेकिन बड़ा संदेश पहले से साफ है। ममता बनर्जी की राजनीति में कल के सिद्धांत आज की जरूरत के हिसाब से बदल सकते हैं। जब भाजपा चाहिए थी, एनडीए में गईं। जब कांग्रेस चाहिए थी, यूपीए में गईं। जब लेफ्ट को हराना था, एंटी-लेफ्ट राजनीति को आंदोलन का आधार बनाया। अब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत है, तो लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं। यह ममता बनर्जी की सुविधा की राजनीति का एक और अध्याय है। इसमें वफादारी बदलती है, दुश्मन साथी बन जाते हैं और सत्ता की जरूरत के हिसाब से विचारधारा को ढाल लिया जाता है।

एलिवेटेड रोड के पास सड़क धंसी, ग्वालियर में 4 मकानों में दरारें पड़ीं

ग्वालियर. ढोली बुआ के पुल वाले क्षेत्र में एलिवेटेड रोड के पिलर खुदाई के चलते स्वर्ण रेखा की दीवार के बेस में डले रैंप को तोड़ दिया गया है। इसके बाद नाले की दीवार के साथ लगी सड़क 100 फीट तक फटने के साथ ही सड़क किनारे के 4 मकानों में दरारें आ गई है। वहीं दरारों के लगातार बढ़ने से लोगों में दहशत का माहौल है। हालांकि निगम अधिकारियों ने देर रात ही मौके पर पहुंचकर मोर्चा संभाल लिया, लेकिन लोगों को किसी तरह की राहत नहीं मिल सकी। शुक्रवार से हुई थी सड़क फटने की शुरुआत मौके पर पहुंचे तकनीकी अधिकारियों ने बताया कि दो दिन पहले ही एलिवेटेड रोड के पिलर डालने के लिए स्वर्ण रेखा की दीवार तोड़ कर ग्राउंड बेस रैंप बनाया गया था और इसके बाद क्षेत्र में सड़क की स्थिति प्रभावित हुई । शुक्रवार को सड़क फटने की शुरुआत हो गई थी, जो शनिवार की रात तक दरारें चौड़ी होने से पुन: बढ़ती दिखी। देर शाम तक सड़क में लंबी दरारें आने के साथ ही 04 मकान भी चटकने व दरारें आने से प्रभावित हुए।  इस मामले में नगर निगम ग्वालियर के कमिश्नर संजीव झा ने कहा- सड़क फटने व मकानों में दरारें आने की सूचना पर तत्काल मौके पर आ गया हूं, अभी दरार आने के लिए मौके की स्थिति का आंकलन जारी है।  इनके मकानों आई है दरारें – गणेश शाक्य – कमरे/किचन में  लीला शाक्य – आंगन/किचन/बाथरूम में  नारायण कन्नौजिया –  आंगन/लैट-बाथ में शालिनी ढेरे – दीवार की बाउंड्री

मुख्यमंत्री ने उज्जैन को दी 173 करोड़ के विकास कार्यों की सौगात

भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि हमारी सरकार प्रदेश के समान विकास के लिए संकल्पित होकर कार्य कर रही है। उज्जैन (अवंतिका) एक प्राचीन नगर है। यहां का व्यापार व्यवसाय और इसका वैभव ही सदियों से इस नगर का गौरव और पहचान रही है। उज्जैनवासियों ने हर काल में शहर के विकास में सहयोग दिया है और आज भी यहां के लोग विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए स्वैच्छिक योगदान दे रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव रविवार को महाकाल महालोक, उज्जैन में विकास कार्यों के भूमिपूजन एवं लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने यहां 173 करोड़ रुपये लागत के 15 विकास कार्यों का भूमिपूजन एवं लोकार्पण किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि उज्जैन को जल्द ही मेट्रो ट्रेन की सौगात भी मिलेगी। भोपाल के मास्टर प्लान का ड्रॉफ्ट प्रकाशित कर दिया गया है। ग्वालियर नई मेट्रोपॉलियन सिटी के रूप में विकसित होगा साथ ही इसे टेलीकॉम सिटी के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि इंदौर-भोपाल-जबलपुर तक औद्योगिक गलियारा बनने जा रहा है। इससे पूरे प्रदेश में औद्योगिक विकास को गति मिलेगी। हमारी सरकार सेवा भाव से समान रूप से कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सुगम परिवहन सेवा से प्रदेश में नई परिवहन सेवाएं प्रारंभ की गई हैं। इसके अन्तर्गत यात्री बसें एक नगर से दूसरे नगर तक ही नहीं, बल्कि एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाएंगी। उज्जैन में श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों की सुविधा के लिए उज्जैन दर्शन हेतु 10 नई पीएम ई-बस सेवाओं का शुभारंभ किया गया है। कार्यक्रम को उज्जैन सांसद  अनिल फिरोजिया, राज्यसभा सदस्य बालयोगी  उमेशनाथ महाराज, सांसद डॉ. लता वानखेड़े एवं महापौर  मुकेश टटवाल ने भी संबोधित किया।जनप्रतिनिधियों ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में उज्जैन का चौमुखी विकास हो रहा है तथा सिंहस्थ के दृष्टिगत नगर को सजाया-संवारा जा रहा है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश गृह एवं अधोसंरचना निर्माण मंडल के अध्यक्ष  ओम जैन, सिंहस्थ प्राधिकरण के अध्यक्ष  जगदीश अग्रवाल, पूर्व विधायक  राजेन्द्रध भारती,  संजय अग्रवाल,  जगदीश पांचाल एवं बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित थे। आरंभ में मुख्यमंत्री डॉ. यादव एवं अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। उज्जैन में होंगे 173 करोड़ रुपए के विकास कार्य मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने रविवार को उज्जैन में हुए कार्यक्रम में 15 विकास कार्यों का भूमि -पूजन और लोकार्पण किया। इसमें 12 कार्यों का भूमि-पूजन और 3 कार्यों का लोकार्पण शामिल है। भूमि-पूजन कार्यों में मुख्य रूप से नगर निगम उज्जैन के 8 बड़े कार्य हैं, जिनमें गौशाला मार्ग से शिप्रा विहार मार्ग निर्माण, महाकाल लोक क्षेत्र में पार्किंग सुविधा,  महाकाल मंदिर परिसर का विकास एवं क्षिप्रा नदी के घाटों का जीर्णोद्धार जैसे कार्य शामिल हैं। इसके साथ ही उज्जैन स्मार्ट सिटी द्वारा महाकाल मंदिर के पीछे लैंडस्केपिंग, पुलिस विभाग द्वारा चिंतामण जवासिया में पुलिस आवास और उन्हेल में थाना भवन तथा पर्यटन विभाग द्वारा 45 नगरीय वनों का विकास कार्य शामिल है, जिनकी कुल लागत 153.31 करोड़ रुपये है। लोकार्पित किए गए कार्यों में पुलिस आवास अधोसंरचना विकास निगम द्वारा नीलगंगा और उन्हेल में निर्मित पुलिस आवास एवं थाना भवन तथा ऊर्जा विभाग द्वारा बड़नगर में निर्मित 33/11 के.व्ही. उपकेन्द्र शामिल हैं, जिनकी कुल लागत 19.56 करोड़ रुपये है। इन सभी कार्यों से उज्जैन के नागरिकों को अधोसंरचना, सुरक्षा और पर्यटन विकास की बेहतर सुविधाएं प्राप्त होंगी।    

किसानों का धान भी अब सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि किसानों को सिंचाई के लिए दिन में 10 घंटे बिजली उपलब्ध कराई जाएगी। प्रदेश सरकार किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। इस वर्ष सरकार ने पहली बार शहडोल के किसानों का  अन्न कोदो, कुटकी समर्थन मूल्य पर खरीदा है। इस बार भी किसानों का धान भी सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी, किसान किसी प्रकार की चिंता न करें। दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पशुपालन को प्रोत्साहित किया जाएगा। किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराकर आधुनिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि पशुपालन, बकरी पालन, कुक्कुट पालन और मछली पालन से भी किसानों को जोड़कर किसानों की आय में वृद्धि की जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने रविवार को शहडोल में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव कार्यक्रम को उज्जैन से वर्चुअली संबोधित किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने किसानों से संवाद करते हुए कहा कि राज्य सरकार किसानों के कल्याण के लिए निरंतर प्रयासरत है। किसानों और कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों के माध्यम से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सरकार द्वारा सिंचाई का रकबा बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे। हर एक खेत तक पानी उपलब्ध करवाया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि शहडोल जिले के ओडीपी उत्पाद क्षेत्र की पहचान हल्दी को जियोटैग मिला है, क्षेत्र में हल्दी का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है। क्षेत्र की कृषि क्षमता को देखते हुए मसाला फसलों की खेती को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। हल्दी की प्रोसेसिंग और बाजार उपलब्ध करवाया जा रहा है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकें। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जैविक खेती करने वाले किसानों से संवाद किया और शहडोल क्षेत्र के राजाबाग अमरूद, मूंगा, कोदो, कुटकी की प्रसिद्धि का जिक्र करते हुए किसानों को उद्यानिकी फसलों का उत्पादन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की दुर्लभ वनस्पतियों के संग्रहण, प्रसंस्करण एवं बाजार की उपलब्धता सुनिश्चित की जायेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों की मदद के लिए हर कदम पर खड़ी है। अब तक सरकार किसानों को बिना ब्याज का ऋण साल में दो बार भरने की सुविधा दे रही थी। अब सरकार ने इसे साल में एक ही बार करने का निर्णय लिया है। अब किसान अपनी सुविधा अनुसार साल में कभी भी ऋण की राशि जमा कर सकेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि शहडोल क्षेत्र में होम-स्टे भी बनाए जायेंगे। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये प्रदेश के जनजातीय बहुल ग्रामों में होम-स्टे विकसित किये जायेंगे। होम-स्टे के लिये राज्य सरकार ने अनुदान की व्यवस्था भी की है, जिससे युवाओं को रोजगार एवं आय के नये अवसर मिलेंगे और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। सरकार पर्यटन विभाग के माध्यम से होम-स्टे का संचालन भी करवाएगी, जिससे क्षेत्र के लोगों को अतिरिक्त आमदनी होगी। मुख्यमंत्री ने किसानों का उत्साहवर्धन करते हुए जैविक एवं प्राकृतिक कृषि को अधिक से अधिक अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, आधुनिक खेती के तौर-तरीकों और विभिन्न कृषि योजनाओं से संबंधित साहित्य का वितरण भी किया गया। महोत्सव के माध्यम से किसानों को कृषि के साथ पशुपालन, उद्यानिकी एवं अन्य गतिविधियों को अपनाकर आय के विविध स्रोत विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कार्यक्रम में एपेक्स बैंक के अध्यक्ष  महेन्द्र सिंह यादव, विधायक जय सिंह नगर विधानसभा क्षेत्र मती मनीषा सिंह, विधायक ब्यौहारी  शरद कोल, विधायक जैतपुर  जयसिंह मरावी, सीईओ जिला पंचायत  शिवम् प्रजापति, जयपाल सिंह चावड़ा, विन्ध्य विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष  पंचूलाल प्रजापति, कप्तान सिंह,  ब्रजेश प्रताप सिंह,  सुरेश चतुर्वेदी, जिला योजना समिति की सदस्य मती अमिता चपरा,  संतोष लोहानी,  रविकांत त्रिपाठी,  भूपेंद्र मिश्रा, संयुक्त संचालक कृषि  के.एस. यादव, कृषि वैज्ञानिक  मृगेन्द सिंह, डॉ. बी.के. प्रजापति,  भानू प्रताप सिंह, सहित जिले के किसान, कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, उद्यानिकी विभाग के अधिकारी सहित गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।  

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया कितनी मुश्किल? 5 चरणों में समझें पूरा नियम

 नई दिल्ली  भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाना इतना आसान नहीं है और सरकार भी चाहे तो सीधे तौर पर सीईसी को नहीं हटा सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जजों की तरह ही विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। सीईसी को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज में सरकार के सीधे दखल को रोकने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। आजाद भारत के इतिहास में कभी भी किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया गया है। हालांकि, इसकी कोशिशें तो हुईं लेकिन ऐसा हो न सका। आइए पीछे के पन्नों को पलटकर देखते हैं… 1992… टीएन शेषन के खिलाफ मांग 1992 में वामपंथी दलों ने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को हटाने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू करने की मांग की। यह कोशिश किसी औपचारिक प्रस्ताव के रूप में आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि इसे पेश करने के लिए जरूरी संसदीय समर्थन नहीं मिल पाया। 2006… चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ एनडीए की याचिका मार्च 2006 में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) ने राष्ट्रपति को याचिका देकर चुनाव आयुर्त नवीन चावला को हटाने की मांग की। 2009… नवीन चावला के खिलाफ मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने पक्षपातपूर्ण व्यवहार और राजनीतिक झुकाव के आरोपों का हवाला देते हुए चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की औपचारिक सिफारिश की। बाद में तत्कालीन यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) सरकार ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया सीईसी को हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से उन संवैधानिक प्रावधानों के तहत होती है जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। अनुच्छेद 324(5) संविधान का अनुच्छेद 324(5) यह तय करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। अनुच्छेद 124(4) अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जज को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि राष्ट्रपति का आदेश न हो। यह आदेश संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित प्रस्ताव के बाद ही जारी किया जा सकता है। इस प्रस्ताव के लिए सदन के कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन जरूरी है। साथ ही, यह प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति को सौंपा जाना चाहिए और यह साबित होना चाहिए कि जज ने दुर्व्यवहार किया है या वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ है। सीईसी को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने और उसे पूरा करने के काम में पांच अलग-अलग चरण शामिल हैं। पहला चरण… नोटिस जमा करना मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राज्यसभा के चेयरमैन या लोकसभा के स्पीकर को एक औपचारिक नोटिस दिया जाता है। इस नोटिस को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सदस्य या राज्यसभा में कम से कम 50 सदस्य का समर्थन जरूरी है। दूसरा चरण… जांच समिति का गठन अगर नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो पीठासीन अधिकारी हटाने के खास आधारों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक खास समिति बनाता है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज या चीफ जस्टिस, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और पीठासीन अधिकारी की राय में कानून के एक जाने-माने जानकार शामिल होने चाहिए। तीसरा चरण… जांच और रिपोर्टिंग गठित समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी औपचारिक जांच रिपोर्ट चेयरमैन या स्पीकर को सौंपती है। चौथा चरण… संसदीय वोटिंग अगर जांच समिति मुख्य चुनाव आयुक्त को साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता का दोषी पाती है तो मामले को वोटिंग के लिए संसद में लाया जाता है। इस प्रस्ताव को पास करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है- सदन के कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन और दोनों सदनों में मौजूद और वोट करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई का बहुमत। पांचवां चरण… राष्ट्रपति का आदेश अगर हटाने का बिल या प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों से सफलतापूर्वक पास हो जाता है तो इसे राष्ट्रपति के सामने पेश किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं। संसद में मौजूदा संख्या-बल मौजूदा संसदीय समीकरणों के तहत संसद के दोनों सदनों में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल करना किसी भी एक विपक्षी गुट के लिए एक ऐसी गणितीय बाधा है जिसे पार करना नामुमकिन है। क्यों है असंभव? लोकसभा में 360 का आंकड़ा छूने के लिए विपक्ष की मौजूदा कुल संख्या से कहीं ज्यादा सीटों की जरूरत है। अगर हम बीजेपी की 240 सीटों को भी हटा दें तो सिर्फ 300 सदस्य ही बचते हैं। इसलिए 360 तक पहुंचना मुमकिन नहीं है। इसी तरह राज्यसभा में 162 के आंकड़े तक पहुंचना गणितीय रूप से सीमित है। अगर हम बीजेपी की 116 सीटों को भी हटा दें तो सिर्फ 127 गैर-बीजेपी सदस्य बचते हैं। डीएमके (22 लोकसभा, 8 राज्यसभा) को विपक्षी गठबंधन इंडी के बजाय अन्य की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि संख्याबल में कमी के बावजूद विपक्ष हटाने का प्रस्ताव क्यों ला रहा है?

अवैध खनन को लेकर बालाघाट में भिड़े ग्रामीण, लाठी-डंडों से 15 घायल

बालाघाट. भरवेली थाना क्षेत्र के ग्राम रट्टा में रविवार को दो गुटों में खूनी संघर्ष हो गया। गांव से होकर बहने वाले नाले से रेत और गिट्टी के अवैध खनन के खिलाफ ग्रामीणों ने गांव के दमाहे परिवार के खिलाफ धावा बोल दिया। इसमें 15 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिन्हें उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजा गया है। ग्रामीणों के आक्रोश और खूनी संघर्ष की सूचना मिलते ही पूरा गांव छावनी में बदल गया। मौके पर एएसपी निहित उपाध्याय, सीएसपी मयंक तिवारी, भरवेली टीआई भूपेंद्र पंद्रो, कोतवाली टीआई अजय गुर्जर सहित भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा। देर तक माहौल तनावपूर्ण रहा। मौके पर 300 से अधिक पुलिसबल रहा। इसमें एसएएफ की फोर्स भी तैनात की गई। दरअसल, मामला गांव के दमाहे परिवार द्वारा लंबे समय से रेत और गिट्टी के अवैध खनन करने से जुड़ा है। इसके खिलाफ ग्रामीण वर्षों से विरोध दर्ज करा रहे हैं।

18 साल की अनाहत सिंह का कमाल, एशियन गेम्स स्क्वैश फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय बनीं

नागोया  भारत की 18 वर्षीय स्कॉश खिलाड़ी अनाहत सिंह ने रविवार को विमेंस सिंगल्स में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। इसी के साथ जूनियर वर्ल्ड चैंपियन अनाहत, भारत की पहली विमेंस सिंगल्स सिल्वर मेडलिस्ट बनीं। हालांकि, उन्हें फाइनल में मलेशिया की मौजूदा चैंपियन शिवसंगरी सुब्रमण्यम के हाथों 4-11, 4-11, 7-11 से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के साथ अनाहत ओलंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई करने का पहला मौका भी चूक गईं, क्योंकि सिंगल्स इवेंट के विजेता को 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए कोटा मिलना तय था, जहां स्कॉश पहली बार शामिल हो रहा है। मलेशिया की खिलाड़ी से हारीं अनाहत नागोया किंजो फुतो एरिना में प्रतिभाशाली भारतीय खिलाड़ी का मुकाबला मलेशिया की कहीं ज्यादा अनुभवी खिलाड़ी से था। अनाहत को अपनी प्रतिद्वंद्वी के शानदार खेल का मुकाबला करने में मुश्किल हुई और उन्होंने पहला गेम 4-11 से गंवा दिया। इसके बाद मलेशियाई खिलाड़ी ने अपने मजबूत अटैक और डिफेंस से अगले दो गेम पर भी अपना दबदबा बनाए रखा। अनाहत को कोई खास मौका नहीं मिला और वह दूसरा गेम भी 4-11 के अंतर से हार गईं, जबकि मौजूदा चैंपियन ने शानदार खेल दिखाते हुए तीसरा गेम 11-7 से जीता। सेमीफाइनल में किया था कमाल अनाहत ने सेमीफाइनल में वर्ल्ड नंबर 6 सतोमी वातानाबे को दो गेम से पिछड़ने के बाद हराया था, जिसके साथ वह एशियन गेम्स के विमेंस सिंगल्स स्कॉश फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय बनी थीं। इससे पहले, भारत के अभय सिंह को भी सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा था। मलेशिया के मौजूदा चैंपियन ईन यो एनजी ने शानदार खेल दिखाते हुए मेंस सिंगल्स स्कॉश फाइनल में भारतीय खिलाड़ी को 11-9, 11-5, 11-5 से मात दी। अभय ने जीता सिल्वर मेडल रविवार को यह स्कॉश में भारत का दूसरा पदक रहा। अभय, सौरव घोषाल के बाद इस इवेंट में सिल्वर मेडल जीतने वाले दूसरे भारतीय पुरुष खिलाड़ी बने। हालांकि, फाइनल में हारने की वजह से अभय एलए 2028 ओलंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई करने से चूक गए।