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कक्षा 1 से 12वीं तक मप्र में सरकारी स्कूलों के नामांकन में लगातार गिरावट दर्ज

भोपाल  मप्र के सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार कम हो रहा है। 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा 1 से 12वीं तक के नामांकन में 22.03 लाख तक कमी दर्ज की गई है। विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने बताया कि नामांकन में गिरावट की वैज्ञानिक जांच के लिए 8 मई 2025 को 'अटल बिहारी सुशासन संस्थान' को पत्र लिखा गया था। हैरानी की बात यह है कि विभाग द्वारा रिमाइंडर के बावजूद 10 महीने बीत जाने पर भी संस्थान ने अब तक कार्ययोजना पेश नहीं की है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि विभाग 'कागजी छात्र' दिखाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है और असली आंकड़ों को छिपाकर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। दस साल में 22 लाख बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी जीतू पटवारी ने कहा है कि पिछले 10 सालों में सरकारी स्कूलों से 22 लाख से अधिक बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं, जिससे नामांकन में भारी गिरावट आई है। उन्होंने इसे सरकार की शिक्षा नीति की पूरी नाकामी करार देते हुए दावा किया कि जहां दुनिया के विकसित देशों में बच्चे अंतरिक्ष और मंगल ग्रह पर पानी की खोज कर रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चे बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षक, ब्लैकबोर्ड, किताबें और ठीक-ठाक भवन ढूंढने को मजबूर हैं। जीतू पटवारी ने सरकार से किए सवाल बता दें कि विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल के जवाब में स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने जानकारी दी है कि 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के स्टूडेंट्स के नामांकन में 22.03 लाख की कमी आई है। इसे लेकर पिछले साल मई में सरकार ने अटल बिहारी सुशासन संस्थान को पत्र लिखकर नामांकन मे गिरावट की वैज्ञानिक जांच करने को कहा था। लेकिन लगभग दस महीने बीत जाने पर भी संस्थान की तरफ से इसे लेकर कोई एक्शन प्लान प्रस्तुत नहीं किया गया है जबकि इस बीच स्कूल शिक्षा विभाग उन्हें रिमाइंडर भी दे चुका है। इसी मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इन बच्चों को “लापता” की श्रेणी में रखते हुए सरकार से सवाल किया कि इतने बड़े पैमाने पर बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘प्रदेश में लाड़ली बहनें लापता होने के बाद अब स्कूल के बच्चे भी लापता हो रहे हैं।’ विपक्ष का आरोप है कि गिरावट का खेल साल 2008-09 से ही शुरू हो गया था, लेकिन सरकार केवल 2015-16 के बाद के समय की जांच करा रही है। आंकड़ों के अनुसार, 2008 से 2015 के बीच ही 40.62 लाख बच्चे कम हो चुके थे, जिसे जांच में शामिल नहीं किया गया है। विधायक ने इस पूरे मामले को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े 'घोटाले' से जोड़ते हुए इसकी सीबीआई जांच और सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। एक साल में ही एक लाख छात्रों का अंतर… जानकारी में सबसे बड़ा खुलासा आंकड़ों की विसंगति को लेकर हुआ है। जानकारी में सामने आई अलग-अलग सूचियों में छात्र संख्या मेल नहीं खा रही है। वर्ष 2015-16 के लिए ही एक सूची में संख्या 22.62 लाख है, तो दूसरी में 23.57 लाख बताई गई है। एक ही साल के डेटा में एक लाख बच्चों का अंतर आया है। आंकड़े छिपाकर करोड़ों का भ्रष्टाचार हैरानी की बात यह है कि विभाग ने बार-बार संस्थान को याद दिलाया है। इसके बाद भी 10 महीने से ज्यादा का वक्त गुजरने के बाद भी संस्थान ने अब तक अपनी योजना नहीं दी है। विपक्ष का कहना है कि विभाग सिर्फ कागजों पर काम दिखाकर वाह-वाही लूट रहा है। असली आंकड़े छिपा कर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। शिक्षा के नाम पर हो रहा घोटाले विपक्ष का कहना है कि बच्चों की संख्या में गिरावट का सिलसिला 2008-09 से ही शुरू हुआ था। सरकार केवल 2015-16 के बाद के आंकड़ों की ही जांच कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक 2008 से 2015 तक ही 40.62 लाख बच्चे कम हो गए थे। इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। विधायक ने इस मुद्दे को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े घोटाले से जोड़ा है। साथ ही सीबीआई से जांच कराने और सरकार से श्वेत पत्र* जारी करने की मांग की है। एक साल में एक लाख बच्चों का फर्क जानकारी में एक बड़ा खुलासा हुआ है जो आंकड़ों की गलती को लेकर है। अलग-अलग सूचियों में बच्चों की संख्या मैच नहीं कर रही है। जैसे कि 2015-16 के लिए एक सूची में 22.62 लाख बच्चों की संख्या दी गई है। वहीं दूसरी सूची में यह संख्या 23.57 लाख बताई गई है। यानी एक ही साल के आंकड़ों में एक लाख बच्चों का फर्क है।     *श्वेत पत्र क्या होता है।     श्वेत पत्र एक तरह का दस्तावेज होता है, जिसे किसी खास समस्या को समझने या उसका समाधान बताने के लिए तैयार किया जाता है। ये दस्तावेज सरकार, कंपनियां या गैर-लाभकारी संगठन उस मुद्दे पर अपने विचार और आंकड़े लोगों तक पहुंचाने के लिए जारी करते हैं। इसमें किसी नीति या समस्या का विश्लेषण किया जाता है, और अक्सर इसमें कोई समाधान या सुझाव भी दिए जाते हैं।     इस दस्तावेज को 'श्वेत पत्र' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पहले इसके कवर का रंग सफेद होता था। यह दस्तावेज सार्वजनिक जानकारी और पारदर्शिता को दिखाता है, यानी कि यह जानकारी लोगों के लिए खुली होती है।

अमृतसर में बम धमकी से हड़कंप, स्कूलों और शताब्दी एक्सप्रेस के परिसरों में की गई सघन तलाशी

अमृतसर  अमृतसर में स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से हड़कंप मच गया। शहर के एक या अधिक स्कूलों को धमकी भरा ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें स्कूल को बम से उड़ाने की बात कही गई है। साथ ही शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन को भी बम से उड़ाने की धमकी दी गई। पुलिस सूत्रों के अनुसार, अमृतसर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है। ईमेल भेजने वाले की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्कूल प्रशासन को सूचना मिलते ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। कई जगहों पर छात्रों को सुरक्षित निकाला गया और परिसर की जांच के लिए बम निरोधक दस्ता (बम स्क्वॉड) बुलाया गया। अभिभावकों को सूचित किया गया कि वे अपने बच्चों को घर ले जाएं, जिससे स्कूलों के बाहर भीड़ जमा हो गई। यह पहली बार नहीं है जब अमृतसर के स्कूलों को ऐसी धमकियां मिली हैं। इससे पहले भी कई बार शहर के विभिन्न स्कूलों को इसी तरह के बम धमकी वाले ईमेल प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर मामलों में जांच के बाद धमकियां झूठी साबित हुईं। पंजाब के अन्य शहरों जैसे चंडीगढ़, जालंधर और पटियाला में भी हाल के महीनों में स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी भवनों को इसी तरह की धमकियां मिली हैं, जो अक्सर होक्स (झूठी) निकलती हैं। इन घटनाओं से लोगों में दहशत फैलती है और सुरक्षा बलों को भारी संसाधन लगाने पड़ते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, हर धमकी को गंभीरता से लिया जा रहा है। भले ही पहले के मामले फर्जी साबित हुए हों। साइबर सेल सक्रिय रूप से ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी है। लोगों से अपील की गई है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और जांच जारी है। ऐसी घटनाएं बच्चों की सुरक्षा और अभिभावकों की चिंता को बढ़ाती हैं, इसलिए प्रशासन हरसंभव कदम उठा रहा है ताकि कोई अनहोनी न हो।

स्कूलों की लापरवाही नहीं होगी बर्दाश्त, पंजाब शिक्षा विभाग का सख्त आदेश

लुधियाना पंजाब के स्कूल शिक्षा महानिदेशक-सह-राज्य परियोजना निदेशक, समग्र शिक्षा अभियान प्राधिकरण (पंजाब) ने स्कूलों में चल रहे विभिन्न निर्माण और विकास परियोजनाओं की धीमी प्रगति को लेकर जिलों के शिक्षा अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। विभाग ने बताया कि साल 2024-25 और 2025-26 के तहत स्वीकृत सभी प्रोजेक्ट्स, जैसे ACR, LARS, लाइब्रेरी, आर्ट एंड क्राफ्ट रूम, लड़के/लड़कियों के टॉयलेट और मेजर/माइनर रिपेयर, का निर्माण तेजी से पूरा किया जाना चाहिए। 10 फरवरी 2025 को माननीय सेक्रेटरी स्कूल एजुकेशन ने सभी डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर्स (DEOs) के साथ समीक्षा बैठक की थी, जिसमें कई जिलों में धीमी प्रगति और फंड के इस्तेमाल में कमी को गंभीरता से लिया गया। निर्देशों के अनुसार, साल 2024-25 के तहत स्वीकृत सभी कार्य अगले एक हफ्ते में पूरा करने होंगे। इसके साथ ही फिजिकल और फाइनेंशियल प्रगति का प्रमाण-पत्र और पोर्टल पर डिपॉजिट कर फंड का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना अनिवार्य है। विभाग ने चेतावनी दी कि अगर 2025-26 के बचे हुए कार्य समय पर पूरे नहीं हुए, तो फंड रिलीज़ नहीं किया जाएगा। इसलिए जिलों के स्कूलों में चल रहे निर्माण कार्यों पर नियमित निगरानी रखने और समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश भी दिया गया है।

बड़वानी में शिक्षा की दुर्दशा:गाय-बकरियों के तबेले में ठूंसे गए 40 आदिवासी बच्चे!

बड़वानी नरेश रायक सरकार करोड़ों रुपये शिक्षा पर खर्च करने के दावे करती है, मगर हकीकत यह है कि जिले में 40 आदिवासी बच्चों का भविष्य पशुबाड़े में दम तोड़ रहा है। जिस जगह गाय-बकरियां बांधी जाती हैं, वहीं बच्चों की कक्षाएं लग रही हैं। गोबर की बदबू, गंदगी से भरी जमीन और संक्रमण का खतरा—यही है इस ‘तबेला स्कूल’ की असली तस्वीर। क्या यही है “शिक्षा का अधिकार”? बच्चे जमीन पर ठूंसे हुए बैठते हैं। बरसात में कीचड़, गर्मी में असहनीय दुर्गंध। सवाल सीधा है—  क्या आदिवासी बच्चों की शिक्षा की कीमत इतनी सस्ती है? क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी अपने बच्चों को ऐसे माहौल में पढ़ने भेजेंगे? जिम्मेदार कौन? जर्जर/अपर्याप्त भवन की आड़ में पशुबाड़े में स्कूल चलाना किसकी अनुमति से? शिक्षा विभाग और प्रशासन की निगरानी कहां है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज की? ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद सिर्फ “अस्थायी व्यवस्था” का बहाना दिया गया। मगर यह अस्थायी इंतजाम कब तक चलेगा? महीनों से बच्चे तबेले में बैठकर पढ़ रहे हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह भविष्य के साथ खिलवाड़ है बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिले में यदि बच्चों को सम्मानजनक कक्षा कक्ष भी नसीब न हो, तो विकास के दावे खोखले साबित होते हैं। अब देखना है—  क्या प्रशासन तुरंत वैकल्पिक भवन की व्यवस्था करेगा? या फिर ‘तबेला स्कूल’ ही जिले की शिक्षा व्यवस्था का स्थायी प्रतीक बन जाएगा? बच्चों की पढ़ाई पशुबाड़े में और भाषण स्मार्ट क्लास के—यह दोहरी तस्वीर आखिर कब बदलेगी?

रतलाम का सरकारी स्कूल छाया खास, बच्चों में बैग नहीं और मुंहजबानी से 40 तक के पहाड़े याद

रतलाम  सरकारी स्कूलों का जब जिक्र आता है, तब ज्यादातर समय दिमाग में पहली तस्वीर बदहाल व्यवस्था की बनती है लेकिन मध्य प्रदेश के रतलाम में एक ऐसा अनूठा स्कूल है, जो इसके विपरीत एक नजीर पेश कर रहा है. यह स्कूल अपने आप में एक मिसाल है. इसके बारे में यह कहना हरगिज गलत नहीं होगा कि यह सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों को मात दे रहा है. स्कूल की अपनी कार्यशैली के चलते इसे ‘समस्या मुक्त विद्यालय’ नाम दिया गया है. यहां के प्रधानाध्यापक ने अपने खर्च पर स्कूल को सजाया-संवारा है. वहीं उनका शिक्षा की गुणवत्ता पर भी खासा फोकस रहता है. हम बात कर रहे हैं रतलाम के जावरा स्थित रूपनगर के सरकारी प्राथमिक स्कूल की. प्राथमिक स्कूल को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया है. स्कूल में बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ वह तमाम जानकारी मुहैया करवाई जा रही है, जो उनके सर्वांगीण विकास में सहायक है. स्कूल में इस तरह हरियाली छाई हुई है कि एक बार के लिए लगता है कि आप किसी गार्डन में आ गए हों. स्कूल की साफ-सफाई पर बहुत ध्यान दिया जाता है ताकि बच्चे अभी से स्वच्छता के महत्व को समझ सकें और इसे अपने जीवन में अपना सकें. खाली हाथ स्कूल आते हैं बच्चे पहली से पांचवीं क्लास तक यह स्कूल पूरी तरह से एक बैगलेस स्कूल है. बच्चे घर से बैग लेकर स्कूल नहीं आते हैं ताकि उनके नाजुक कंधों पर वजनी बोझ न पड़े. स्कूल में पढाई के साथ-साथ होमवर्क भी करवाया जाता है. बच्चों की यूनिफॉर्म पूरी तरह से व्यवस्थित है. इन नन्हे-मुन्ने स्टूडेंट्स की छोटी-छोटी बातों पर पूरा ध्यान दिया जाता है ताकि वे भी अच्छी बातें सीख सकें. बच्चों को 40 तक के पहाड़े मुंहजबानी याद स्कूल से प्रधानाध्यापक की मेहनत का ही यह नतीजा है कि उन्होंने इस सरकारी स्कूल की तस्वीर बदल दी. यहां बच्चों को 40 तक के पहाड़े मुंहजबानी याद हैं. जावरा के रूपनगर का यह सरकारी स्कूल रतलाम ही नहीं बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में मिसाल पेश करता नजर आ रहा है.

Ahmedabad में कई स्कूलों को धमकी भरा मेल, जांच एजेंसियां सतर्क, अभिभावकों में चिंता

अहमदाबाद  अहमदाबाद के तीन स्कूलों को एक धमकी भरा ईमेल मिला है, जिसमें परिसर को बम से उड़ाने की बात कही गई है. स्कूल को प्राप्त हुए ईमेल में स्कूल को 1:11 बजे बम से उड़ाने की चेतावनी दी गई है. पुलिस ने मामला गंभीरता से लेते हुए तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है और स्कूलों में डॉग स्क्वाड, बॉम्ब डिस्पोजल स्क्वाड (बॉम्ब स्क्वाड) की टीमों के साथ व्यापक जांच शुरू की गई है. पुलिस-प्रशासन ने बताया कि कुछ स्कूलों ने धमकी भरे ईमेल मिलने की शिकायत मिली है. इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए तुरंत एक्शन शुरू कर दिया गया है और सतर्कता बरतते हुए स्कूल प्रशासन ने स्कूलों की छुट्टी कर दी है और बच्चों को सुरक्षित घर भेजना शुरू कर दिया है. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां पूरे परिसर की तलाशी ले रही हैं. अभी तक किसी भी स्कूल से कोई संदिग्ध वस्तु या विस्फोटक सामग्री नहीं मिली है, लेकिन जांच जारी है. अधिकारी ये पता लगाने में जुटे हैं कि ईमेल किसने और कहां से भेजा गया. विशेषज्ञों का मानना है कि ये धमकी होक्स (झूठी) हो सकती है, जैसा कि पिछले कुछ महीनों में दिल्ली-एनसीआर, नोएडा और अहमदाबाद में कई बार हुआ है, लेकिन सुरक्षा के मद्देनजर कोई रिस्क नहीं लिया जा रहा.  

हरियाणा के सरकारी स्कूलों में चार लाख फर्जी दाखिलों के नहीं मिले सुबूत: CBI

चंडीगढ़. हरियाणा के सरकारी स्कूलों में चार लाख फर्जी दाखिलों के मामले में सीबीआइ को ठोस सुबूत नहीं मिले हैं। 12 हजार 924 स्कूलों के रिकार्ड की जांच में सिर्फ 50 हजार 687 छात्र संदिग्ध मिले। हालांकि जांच के दौरान रिकार्ड में बड़ी गड़बड़ियां मिलीं, लेकिन किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक साजिश के पुख्ता सबूत नहीं मिले। ऐसे में सीबीआइ ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। सीबीआइ की विशेष अदालत ने यह रिपोर्ट फिलहाल स्वीकार नहीं की है। सीबीआइ कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर सामने आई अनियमितताओं के बाद मामले को सीधे बंद नहीं किया जा सकता। कोर्ट पहले पूरी फाइल का अध्ययन करेगी, उसके बाद ही अगला फैसला लिया जाएगा। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी, जब अतिथि अध्यापकों की याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने 22 लाख छात्रों का रिकार्ड पेश किया। जब इनमें से कुछ नामों की जांच की गई तो कई नाम संदिग्ध पाए गए। इसी आधार पर आशंका जताई गई कि स्कूलों में फर्जी दाखिले दिखाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लिया जा रहा है। बाद में मामला सीबीआइ को सौंप दिया गया। इसके बाद सीबीआइ ने राज्य के 12 हजार 924 सरकारी स्कूलों का रिकार्ड खंगाला। प्रवेश रजिस्टर, हाजिरी, मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, यूनिफार्म और परीक्षा रिकार्ड तक की जांच की गई। जांच में 50 हजार 687 छात्र संदिग्ध पाए गए। कुछ जिलों में गड़बड़ी का प्रतिशत पांच प्रतिशत था, जबकि कुछ में यह 40 प्रतिशत तक पहुंच गया। कई बच्चों की शत प्रतिशत हाजिरी दर्ज थी, जबकि वे स्कूल छोड़ चुके थे। मामलों में स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट जारी होने के बाद भी नाम रिकार्ड से नहीं हटाया गया। अब सीबीआई अदालत पर निगाहें सीबीआइ की स्पेशल कोर्ट ने फिलहाल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की है। अदालत पूरी जांच रिपोर्ट पढ़ेगी और जरूरत पड़ी तो जांच का दायरा बढ़ाने या दोबारा जांच के आदेश भी दे सकती है। इस तरह मामला अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अंतिम फैसला अदालत के अध्ययन और सुनवाई के बाद ही सामने आएगा। सात जिलों में मिली अधिक अनियमितताएं मेवात के नूंह, गुरुग्राम, सोनीपत, झज्जर, फतेहाबाद और यमुनानगर समेत सात जिलों में सबसे ज्यादा गड़बड़ी सामने आई। सीबीआइ के मुताबिक रिकार्ड में खामियां हैं, लेकिन जानबूझकर धोखाधड़ी या व्यक्तिगत लाभ के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले। कई एंट्री जिला स्तर पर बदली गईं, लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि किसने और किस मकसद से बदलाव किया। एजेंसी के अनुसार लापरवाही और प्रशासनिक स्तर की गलतियां तो दिखीं, पर आपराधिक मामला बनता नहीं दिखा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 2019 के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि स्कूल रिकार्ड से जुड़े प्रशासनिक फैसलों पर सीधे आपराधिक मुकदमा नहीं बनाया जाए।

दिल्ली के 9 स्कूलों को बम धमकी, जांच में जुटी बम स्क्वाड और पुलिस

 नई दिल्ली दिल्ली के कई इलाकों में सोमवार सुबह अफरा-तफरी मच गई, जब सुबह करीब 8.30 से 9 बजे के बीच शहर के 9 बड़े स्कूलों को बम की धमकी वाली कॉल मिली. स्कूलों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. इसके बाद दिल्ली पुलिस, फायर ब्रिगेड और बम स्क्वॉड मौके पर पहुंचे और जांच शुरू की. सुरक्षा के लिए बच्चों और स्टाफ को बाहर निकालकर स्कूल की पूरी तलाशी ली गई. बताया जा रहा है कि सभी कॉल लगभग एक ही समय पर आईं, इसलिए एजेंसियां सतर्क हैं. फिलहाल पुलिस कॉल करने वाले की पहचान करने की कोशिश कर रही है. जिन 9 स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी मिली है, उनमें दिल्ली कैंट का लॉरेटो कॉन्वेंट स्कूल, श्रीनिवासपुरी का केम्ब्रिज स्कूल, रोहिणी का वेंकटेश्वर स्कूल, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी का केम्ब्रिज स्कूल, सादिक नगर का इंडियन स्कूल, रोहिणी का CM श्री स्कूल, आईएनए का DTA स्कूल, रोहिणी का बाल भारती स्कूल और न्यू राजेंद्र नगर का वनस्थली स्कूल शामिल हैं. इन सभी स्कूलों में सुरक्षा एजेंसियों ने जांच शुरू कर दी है और एहतियाती कदम उठाए गए हैं. ईमेल में क्या लिखा है? धमकी भरे ईमेल में उकसावे और भड़काऊ संदेश लिखे गए हैं, जिसमें "दिल्ली बनेगा खालिस्तान", "अफजल गुरु की याद में" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया. मेल में यह भी दावा किया गया कि 13 फरवरी को दोपहर 1:11 बजे स्कूल में धमाका होगा और अंत में खुद को "खालिस्तान नेशनल आर्मी" के नाम से जोड़ा गया. हालांकि इस तरह के संदेशों को सुरक्षा एजेंसियां बेहद गंभीरता से लेते हुए जांच करती हैं और आमतौर पर लोगों से अपील की जाती है कि ऐसे दावों पर घबराने के बजाय आधिकारिक जानकारी का इंतजार करें. जनवरी से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली-एनसीआर में स्कूलों को बम की धमकियों का सिलसिला लगातार देखा गया है. 7 फरवरी को बड़े पैमाने पर भेजे गए एक ईमेल के बाद 50 से अधिक स्कूलों को खाली कराया गया था, जिसे बाद में गृह मंत्रालय ने फर्जी बताया. इससे पहले 28-29 जनवरी को सरदार पटेल विद्यालय, लॉरेटो कॉन्वेंट और डॉन बॉस्को समेत पांच स्कूलों को धमकियां मिली थीं, लेकिन जांच में कुछ संदिग्ध नहीं मिला और कुछ ही घंटों में परिसर सुरक्षित घोषित कर दिए गए.

शिकायतकर्ता शिक्षक पर गिरी गाज, दो वेतनवृद्धियाँ रोकी

बड़वानी   नरेश रायक मिली जानकारी बताया कि जिस शिक्षक ने खुद को “न्याय का योद्धा” बताकर मोर्चा खोला था, वही अब प्रशासन की फाइलों में आरोपी बनकर दर्ज हो चुका है। शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय क्रमांक-01 बड़वानी में छात्र से मारपीट का आरोप लगाने वाले शिक्षक जगदीश गुजराती अब खुद फर्जी पत्राचार, दबाव बनाने और अधिकारों के दुरुपयोग के गंभीर आरोपों में घिर चुके हैं। कहते हैं — जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वही पहले उसमें गिरता है। बड़वानी में यह कहावत अब सरकारी कागज़ों में दर्ज हो चुकी है।  शिकायत से शुरू हुआ खेल शिक्षक जगदीश गुजराती ने सहायक आयुक्त जनजातीय विभाग में शिकायत दर्ज कराई कि 18 जुलाई को कक्षा 9वीं ‘सी’ में अतिथि शिक्षक पंकज गुर्जवार ने छात्रों सहित उनकी पुत्री को लकड़ी के डंडे से पीटा, जिससे हाथ में “फ्रैक्चर” हो गया। मामला सुर्खियों में आया, पर जब जांच शुरू हुई तो कहानी की परतें खुद ही उखड़ने लगीं।  जांच में फिसली शिकायत की ज़मीन सहायक आयुक्त द्वारा गठित जांच दल ने विद्यार्थियों, स्टाफ, तत्कालीन प्राचार्य आर.एस. जाधव सहित सभी पक्षों के बयान लिए। प्रतिवेदन दिनांक 06 नवंबर 2025 में साफ लिखा गया — घटना उतनी गंभीर नहीं है जितनी दिखाई गई। रिपोर्ट में दर्ज है कि यदि हाथ में फ्रैक्चर होता तो छात्रा नियमित रूप से विद्यालय नहीं आती, हाथ में प्लास्टर होता और चिकित्सकीय प्रमाण सामने आते। यानि शिकायत की नींव ही कमजोर निकली।  फर्जी आदेश बनवाकर प्रशासन को गुमराह करने की कोशिश मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। जांच बंद होते ही शिक्षक जगदीश गुजराती पर सबसे बड़ा आरोप लगा — सहायक आयुक्त के नाम से फर्जी पत्र जारी करवा कर जावक तक कराने का। सहायक आयुक्त बड़वानी ने पत्र क्रमांक 11755 दिनांक 10 दिसंबर 2025 में साफ लिखा कि शिकायतकर्ता ने अपने प्रभाव से कूट रचित पत्र क्रमांक 11555 दिनांक 08 दिसंबर 2025 जारी कराया, जिसे तत्काल प्रभाव से निरस्त किया गया। यह सिर्फ अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि सीधा-सीधा प्रशासनिक विश्वासघात है।  निलंबन की तलवार, नोटिस की चोट फर्जीवाड़ा सामने आते ही संभागीय उपायुक्त जनजातीय कार्य विभाग इंदौर ने कारण बताओ नोटिस जारी किया। पत्र में उल्लेख है कि प्रकरण के आधार पर निलंबन की कार्रवाई प्रस्तावित है और शिक्षक को इंदौर तलब किया गया। अब शिक्षक की कुर्सी डगमगा रही है और फाइलें तेजी से ऊपर बढ़ रही हैं।  पर्दे के पीछे संरक्षण का खेल सूत्र बताते हैं कि जैसे ही कार्रवाई की आहट हुई, कुछ नेता और अफसर शिक्षक के बचाव में मैदान में उतर आए। जिले के एक बीईओ तक इंदौर पहुँच गए। यानी सवाल उठता है — क्या नियम सबके लिए समान हैं या सिफारिश से गुनाह धुल जाते हैं? उत्कृष्ट स्कूल की चमक पर दाग शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय-01 बड़वानी जिले का सबसे प्रतिष्ठित स्कूल है, जहाँ प्रवेश परीक्षा से चयन होता है। यहाँ “क्रीमी लेयर” विद्यार्थी आते हैं, इसलिए परिणाम भी चमकदार रहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि यहाँ के शिक्षक इतने ही काबिल हैं, तो उन्हें सामान्य स्कूलों में भेजकर क्यों नहीं परखा जाता? कागज़ों की तारीफ और ज़मीन की हकीकत में फर्क साफ दिख रहा है।  गिरी सज़ा —  दो वेतनवृद्धियाँ जब्त सूत्रों के अनुसार पूरे मामले में शिक्षक जगदीश गुजराती की दो वेतनवृद्धियाँ रोकने का आदेश जारी हो चुका है। यह कार्रवाई फर्जी पत्राचार और विभागीय अनुशासनहीनता के आधार पर की गई। यह सिर्फ शुरुआत है या अंतिम फैसला — अब सबकी निगाहें प्रशासन पर हैं।   अब असली सवाल क्या शिक्षक कानून से ऊपर हैं? क्या फर्जी पत्र बनवाना “न्याय” कहलाता है? क्या संरक्षण से सच्चाई दबाई जा सकती है? बड़वानी का यह मामला अब सिर्फ स्कूल का नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी की खुली परीक्षा बन चुका है।

फीस कानून पर बड़ा अपडेट! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दिया स्पष्टीकरण, अगले सत्र में नहीं होगा लागू

नई दिल्ली   दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की फीस नियंत्रित करने वाले नए कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली स्कूल एजुकेशन (ट्रांसपेरेंसी इन फिक्सेशन एंड रेगुलेशन ऑफ फीस) एक्ट, 2025 को वर्तमान शैक्षणिक सत्र 2025-26 में लागू नहीं किया जाएगा। यह कानून अब अगले शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू होगा। शिक्षा निदेशालय की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने यह जानकारी दी। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कानून को शैक्षणिक सत्र के बीच में जल्दबाजी से लागू करने पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने कहा था कि ऐसा करने से स्कूलों और अभिभावकों को परेशानी हो सकती है और यह व्यावहारिक नहीं होगा। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने माना कि कानून का उद्देश्य अच्छा है। लेकिन, इसे सही समय पर लागू करना जरूरी है। सरकार के इस फैसले के बाद कोर्ट ने कहा कि अब इस पर दखल देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार ने समझदारी दिखाई है। यह कानून प्राइवेट स्कूलों में फीस की मनमानी बढ़ोतरी रोकने के लिए बनाया गया है। इसके तहत हर स्कूल को फीस तय करने के लिए एक स्कूल लेवल कमेटी बनानी होगी। इस कमेटी में स्कूल प्रबंधन का प्रतिनिधि, प्रधानाचार्य, तीन शिक्षक, पांच अभिभावक और शिक्षा निदेशालय का एक प्रतिनिधि शामिल होगा। कमेटी फीस के प्रस्ताव पर विचार करेगी और पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी। इसके अलावा जिला स्तर पर अपील कमेटी भी होगी। कानून कैपिटेशन फीस वसूलने पर रोक लगाता है और अतिरिक्त शुल्क पर भी नियंत्रण रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की वैधता से जुड़ा मामला दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है। अब आगे की सुनवाई और फैसला हाई कोर्ट ही करेगा। प्राइवेट स्कूल एसोसिएशंस ने इस कानून को चुनौती दी है। लेकिन, कोर्ट ने फिलहाल इसे लागू करने के तरीके पर ही ध्यान दिया। अभिभावक संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है, क्योंकि इससे फीस में अचानक बढ़ोतरी पर लगाम लगेगी। अगले साल से लागू होने पर स्कूलों को भी तैयारी का समय मिलेगा। यह कदम दिल्ली में शिक्षा की पहुंच और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।