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पंजाब में नए सत्र के अप्रैल से ही खुलेंगे स्कूल

लुधियाना. शिक्षा विभाग को निजी स्कूलों की मनमानियों के खिलाफ लिखित आदेश जारी करने पड़ गए। मामला कुछ निजी स्कूलों द्वारा अप्रैल की बजाय मार्च में ही नया सैशन शुरू करने को लेकर जुड़ा है। सी.बी.एस.ई. ने भी जहां स्कूलों को पत्र जारी करने की तैयारी कर ली थी, वहीं जिला शिक्षा विभाग ने सरकार की हिदायतों का हवाला देते हुए सभी निजी स्कूलों चाहे किसी भी बोर्ड से संबंधित हो, को आदेश जारी कर दिया है कि विद्यार्थियों के लिए कक्षाएं 1 अप्रैल से ही शुरू की जाएं. कोई भी स्कूल मार्च में किसी भी क्लास के विद्यार्थियों को नए सैशन की क्लासों के लिए नहीं बुलाएगा। बता दें कि कई स्कूलों ने 1 अप्रैल से पहले ही सैशन ख़त्म करते हुए नए सैशन की क्लासेज अभी से शुरू कर दी थीं। इस बारे डी.ई.ओ. डिम्पल मदान ने बाकायदा पत्र भी जारी कर दिया है। अब देखना है कि निजी स्कूल डी.ई.ओ. की बात को कितनी गंभीरता से लेते हैं और डी.ई.ओ. अपने आदेश लागू करवाने के लिए क्या कदम उठाएंगी? यही नहीं डी.ई.ओ. की ओर से जारी पत्र में शिक्षा के क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों और अभिभावकों के आर्थिक शोषण को रोकने के लिए शिक्षा विभाग ने कड़ा रुख अपनाया है। आदेश में निजी स्कूल प्रबंधकों द्वारा किताबों और वर्दी के नाम पर की जा रही मनमानी पर नकेल कसने की तैयारी की है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा की आड़ में पब्लिशर्स के साथ मिलकर किए जा रहे 'कमीशन के खेल' को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विभाग ने जिले के सभी निजी स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि वे शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कक्षा-वार किताबों और वर्दी की पूरी सूची अपनी आधिकारिक वैबसाइट के होम पेज पर अनिवार्य रूप से अपलोड करें। स्कूलों को इस आदेश के पालन के लिए केवल 3 दिन का समय दिया गया है। इस सूची में किताबों का शीर्षक (टाइटल), लेखक और प्रकाशक का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए, ताकि अभिभावक अपनी पसंद और बजट के अनुसार खुले बाजार से सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र रहें। विभाग ने चेतावनी दी है कि इन आदेशों का अक्षरश: पालन सुनिश्चित कर दफ्तर को सूचित किया जाए। गैर-जरूरी किताबों का बोझ और अभिभावकों का शोषण विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों के अध्यापकों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि निजी स्कूलों द्वारा विद्यार्थियों पर ऐसी अनेक किताबों का बोझ डाल दिया जाता है, जिनका मुख्य पाठ्यक्रम (सिलेबस) से कोई सीधा संबंध नहीं होता। उदाहरण के तौर पर कई स्कूलों में छठी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस, फाइनैंशियल लिटरेसी, मार्कीटिंग, जनरल नॉलेज और मोरल साइंस जैसी महंगी किताबें अनिवार्य कर दी गई हैं। ये किताबें न केवल विद्यार्थियों के बैग का बोझ बढ़ा रही हैं, बल्कि अभिभावकों की जेब पर भी भारी पड़ रही हैं। अभिभावकों का आरोप है कि जब तक सभी बच्चे किताबें नहीं खरीद लेते, तब तक स्कूलों में इन्हें लाने का दबाव बनाया जाता है लेकिन एक बार बिक्री पूरी होने के बाद पूरे साल इन किताबों से कोई ठोस पढ़ाई नहीं करवाई जाती। वर्दी की मोनोपॉली होगी ख़त्म किताबों के साथ-साथ वर्दी बेचने के मामले में भी स्कूलों और चुनिंदा वैंडर्स की मिलीभगत सामने आती रही है। कई स्कूल हर साल वर्दी के रंग, डिजाइन या लोगो में मामूली बदलाव कर देते हैं जिससे अभिभावक पुरानी वर्दी का उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें नए सैट खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसके अलावा स्कूलों द्वारा कुछ खास दुकानों को ही अधिकृत किया जाता है जहां वर्दी और अन्य सहायक सामग्री बाजार दर से कहीं अधिक कीमतों पर बेची जाती है। विभाग के नए आदेशों का उद्देश्य इस प्रकार की व्यापारिक एकाधिकार (मोनोपॉली) को समाप्त करना है। स्कूलों के अंदर काऊंटर लगाकर किताबें बेचने पर विशेष नजर विभागीय आदेशों के बावजूद कई स्कूल परिसरों के अंदर ही निजी काऊंटर लगाकर ऊंचे दामों पर किताबें और वर्दी बेची जा रही हैं। पिछले वर्ष भी इस संबंध में शिकायतें प्राप्त हुई थीं, परंतु समय की कमी के कारण ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी थी। इस बार शिक्षा विभाग ने ऐसे स्कूलों पर अपनी पैनी नजर रखी हुई है जो नियमों का उल्लंघन कर स्कूल के भीतर व्यावसायिक गतिविधियां चला रहे हैं। “अभिभावकों की ओर से किताबों और वर्दी को लेकर लगातार शिकायतें प्राप्त हो रही थीं जिसका संज्ञान लेते हुए यह आदेश जारी किए गए हैं। स्कूलों को तीन दिनों के भीतर अपनी वैबसाइट पर किताबों का पूरा विवरण सार्वजनिक करना होगा। किसी भी स्कूल को अभिभावकों पर किसी खास दुकान से सामग्री खरीदने के लिए दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि कोई स्कूल इन आदेशों का उल्लंघन करता पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”

MP: प्राइवेट स्कूलों को मान्यता का अंतिम अवसर, 10 मार्च तक 20 हजार लेट फीस के साथ आवेदन संभव

 ग्वालियर  लोक शिक्षण विभाग यानि डीपीआई हाईस्कूल व हायरसेकेण्डरी स्कूलों की नवीन मान्यता व नवीनीकरण की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। बिना विलंब शुल्क के ऑनलाइन आवेदन के करने की तिथि निकल चुकी है। लेकिन विभाग ने 20 हजार विलंब शुल्क के साथ मान्यता के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीक्ष 10 मार्च रखी है। आवेदन के बाद 25 मार्च तक संयुक्त संचालक शिक्षा के नेतृत्व में गठित टीम आवेदन वाले स्कूलों की छानबीन करेगा। इसके बाद जिन स्कूलों के आवेदन को समिति निरस्त करेगी, उसके लिए 25 अप्रैल तक अपील की जा सकती है। इन अपीलों का निराकरण डीपीआई 25 मई को करेगा। इसके बाद स्कूलों की मान्यता जारी कर दी जाएगी। ऑनलाइन आवेदन और पोर्टल की जानकारी डीपीआई ने मान्यता की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन पोर्टल https://manyta.dpimp.in/ शुरू किया है। सीबीएसई, आईसीएसई और अन्य बोर्डों से संबद्ध स्कूलों को भी इसी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन करना अनिवार्य है। सामान्य शुल्क के साथ आवेदन की समय-सीमा 15 फरवरी को समाप्त हो चुकी है, लेकिन स्कूलों को डीपीआई ने विलंब शुल्क के साथ 10 मार्च तक का आवेदन करने का समय दिया है। आवेदन करने के बाद इस तरह चलेगी प्रक्रिया     ग्वालियर चंबल क्षेत्र से स्कूलों की जांच संभागीय संयुक्त संचालक द्वारा गठित दल ऑनलाइन आवेदनों की छानबीन की जाएगी। नवीन मान्यता, नवीनीकरण और अपग्रेडेशन के प्रकरणों पर निर्णय लेने की अंतिम तिथि 25 मार्च 2026 तय की गई है।     यदि किसी स्कूल का आवेदन संयुक्त संचालक स्तर पर निरस्त कर दिया जाता है, तो संबंधित संस्था 25 अप्रैल तक आयुक्त, लोक शिक्षण के समक्ष ऑनलाइन अपील प्रस्तुत कर सकती है।     प्राप्त अपीलों का अंतिम निराकरण 25 मई तक कर दिया जाएगा। इसके बाद ही स्कूलों की मान्यता की अंतिम सूची और प्रमाण पत्र जारी किए जाएंगे। स्कूलों को यह रखना होगा ध्यान डीपीआई के संचालक केके द्विवेदी द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि स्कूल प्रबंधन समय-सीमा का विशेष ध्यान रखें। ग्वालियर संभाग के संयुक्त संचालक ने भी जिले के सभी अशासकीय स्कूलों को निर्देशित किया है कि वे तकनीकी त्रुटियों से बचने के लिए अंतिम तारीख का इंतजार न करें और पोर्टल पर सभी प्रविष्टियों को सावधानीपूर्वक अपलोड करें।  

प्राथमिक वा माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों को नही है बात करने की तजुर्बा मुंह से निकालते आग

प्राथमिक वा माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों को नही है बात करने की तजुर्बा मुंह से निकालते आग  राजेंद्रग्राम  कार्यालय विकासखंड पुष्पराजगढ़ अंतर्गत आने वाली एकीकृत माध्यमिक विद्यालय नगमला वा शासकीय प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के द्वारा किसी संस्था से आए हुए अधिकारी कर्मचारी वा पत्रकारो के आने से सिक्षको में खलबली मच जाती है।और सभी शिक्षक एक जगह आए हुए अधिकारी कर्मचारी वा पत्रकार बंधुओ को घेर कर उसका इंटरव्यू लेने के कगार में होते है।कहा जाता है की आप लोगों से हमारा कोई लगाओ नही है क्यू आए और किस लिए आए हो शिक्षकों का इंटरव्यू पत्रकारों को लेने की बजाय पत्रकारों का इंटरव्यू शिक्षकों के द्वारा लिया जाता है।और कहा तो जितना प्रधाना ध्यापक का अधिकार नही होता है उससे कई ज्यादा अधिकार दो दिनों का मेहमान अतिथि शिक्षको को बोलने का अधिकार दिया जाता है।और अतिथि शिक्षको के पास इतना भी तजुर्बा नही होता की को कोई परिचय पूछते है तो उनका नाम पूछने से नाम वा परिचय नही बताया जाता है क्या शिक्षा विभाग के द्वारा यही संस्कार विद्यार्थियों को दिलाए जाने की सलाह अपने शिक्षा कर्मियों  को सिखाया जाता है और अगर ऐसे शिक्षको को आने वाले टाइम में भर्ती करेगी सरकार तो विद्यार्थियों का उज्वल भविष्य क्या कभी साकार हो सकेगी। अतिथि शिक्षक के द्वारा बनाया गया वीडियो रिकॉर्डिंग एकीकृत माध्यमिक विद्यालय नगमला के अतिथि शिक्षक को नाम पूछने पर नाम नही बताया गया और अपने मोबाइल का कैमरा चालू कर वीडियो बनाने में लग जाते है अगर बच्चो से कोई उनके ही किताब से कोई प्रश्न पूंछ लिया जाता है तो बच्चे उस प्रश्न का जवाब नही दे पाते है अगर वीडियो बनाने की जगह विद्यार्थियों को पढ़ाया लिखाया जाता तो सही तरीके से विद्यार्थियों अपना शिक्षा ग्रहण कर पाते और कभी कोई भी प्रश्न पूछने पर सही सही जवाब जरूर दे पाते ना की सिर नीचे कर लिया करते और सभी विभागों से अच्छा शिक्षा विभाग को माना गया है,जहां शिक्षा मिलती है ,लेकिन ऐसे शिक्षको के द्वारा शिक्षा विभाग वा अच्छा शिक्षा  कर्मचारियों को बदनाम करने के लिए तुले बैठे हैं।और सासन प्रशासन को भी बदनाम किया जाता है। समय से नही खुलता है, विद्यालय नही आते शिक्षक जानकारी के अनुसार बताया गया की शिक्षक अपने मनमानी से विद्यालय खोलते है और मनमानी से बंद किया जाता है और समय से विद्यालय में उपस्थित ही नही होते है और सौचालय मेंशिक्षको के द्वारा ताला लगाकर विद्यार्थियों को सौच के लिए नदी तालाब में भेजने के लिए मजबूर किया जाता है ,और बच्चों को डांट फटकार व प्रताड़ित भी किया जाता है।ग्रामीणों का कहना है की उचित व्यवस्था कराकर विद्यार्थियों की उज्ज्वल भविष्य की कामना करते है।

एक अप्रैल से जबलपुर में स्कूली वाहनों में एलपीजी किट का उपयोग होगा बंद

जबलपुर  शहर की सड़कों पर स्कूली बच्चों को एलपीजी (LPG) किट लगे असुरक्षित वाहनों में ढोना अब स्कूल प्रबंधकों और वाहन स्वामियों को भारी पड़ेगा। जिला प्रशासन ने छात्र सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए एक बड़ा निर्णय लिया है। कलेक्टर कार्यालय सभागार में आयोजित इस बैठक में जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गेहलोत, आरटीओ संतोष पॉल और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (यातायात) अंजना तिवारी सहित शिक्षा विभाग के अधिकारी व स्कूलों के प्राचार्य मौजूद रहे। एलपीजी वाहनों से छात्रों का परिवहन पूर्णतः प्रतिबंधित कलेक्टर राघवेंद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई महत्वपूर्ण बैठक में यह तय किया गया है कि एक अप्रैल से जिले के किसी भी शासकीय या अशासकीय विद्यालय में एलपीजी संचालित वाहनों से विद्यार्थियों का परिवहन पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। गैस किट वाले वाहन बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बैठक में स्कूली परिवहन की सुरक्षा समीक्षा के दौरान यह बात सामने आई कि गैस किट वाले वाहन बच्चों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं। सड़कों पर होगा औचक निरीक्षण: आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए पुलिस अधीक्षक और यातायात पुलिस को स्कूल समय के दौरान औचक निरीक्षण के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी को जिले के समस्त सीबीएसई, आइसीएसई और माध्यमिक शिक्षा मंडल से संबद्ध स्कूलों को इस आदेश से अवगत कराने और उनसे अनुपालन प्रतिवेदन लेने को कहा गया है। डेडलाइन तय एक अप्रैल के बाद यदि कोई स्कूल एलपीजी वाहन का उपयोग करता पाया गया, तो उसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा और संबंधित संस्था व वाहन स्वामी पर दंडात्मक कार्रवाई होगी। वैकल्पिक व्यवस्था स्कूल प्रबंधकों को निर्देशित किया गया है कि वे समय रहते इन वाहनों के स्थान पर वैधानिक रूप से अनुमन्य और फिटनेस प्रमाणित (पेट्रोल/डीजल/सीएनजी) वाहनों की व्यवस्था सुनिश्चित करें। सत्यापन अभियान आरटीओ को जिम्मेदारी दी गई है कि वे स्कूली वाहनों का भौतिक सत्यापन कर गैस किट वाले वाहनों की पहचान करें।     विद्यार्थियों का सुरक्षित परिवहन हमारी प्राथमिकता है। एक अप्रैल के बाद अवैध गैस किट वाले वाहन सड़कों पर नहीं दिखने चाहिए। उल्लंघन करने वाले स्कूलों और वाहन मालिकों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।     – राघवेंद्र सिंह, कलेक्टर  

भोपाल में प्राइवेट स्कूलों पर शिकंजा, कलेक्टर ने 8 जांच टीमें बनाई, शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई

भोपाल   मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नए शैक्षणिक सत्र से पहले ही प्रशासन ने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर बड़ा एक्शन ले लिया है। भोपाल कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह ने स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा है कि कोई भी निजी स्कूल अब अभिभावकों पर किसी एक तय दुकान से यूनिफॉर्म, किताबें, कॉपियां या जूते खरीदने का दबाव नहीं बना सकेगा। कलेक्टर के निर्देश के बाद जिलेभर में निगरानी के लिए 8 विशेष टीमों का गठन किया गया है, जो शिकायत मिलते ही संबंधित स्कूल प्रबंधन पर तुरंत कार्रवाई करेंगी। एक दुकान से खरीदने की बाध्यता खत्म कलेक्टर द्वारा जारी आदेश में साफ कहा गया है कि प्राइवेट स्कूल किसी भी छात्र या पैरेंट्स को किसी विशेष दुकान से यूनिफॉर्म या किताबें खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अगर किसी स्कूल द्वारा नियमों का उल्लंघन किया गया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर आर्थिक दबाव बनाने की शिकायतें सामने आ रही थीं, जिस पर प्रशासन ने यह कड़ा फैसला लिया है। शिकायत मिलते ही होगी कार्रवाई प्रत्येक अनुभाग में एसडीएम के नेतृत्व में पांच सदस्यीय टीम बनाई गई है। इन टीमों में तहसीलदार और सरकारी स्कूलों के प्राचार्य शामिल हैं। कलेक्टर ने निर्देश दिए हैं कि जैसे ही किसी अभिभावक की शिकायत मिले, तुरंत जांच कर दोषी स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाए। भोपाल में गठित 8 विशेष टीमें कोलार – एसडीएम पी.सी. पांडेय शहर वृत्त – एसडीएम दीपक पांडेय एमपी नगर – एसडीएम एल.के. खरे गोविंदपुरा – एसडीएम भुवन गुप्ता टीटी नगर – एसडीएम अर्चना शर्मा बैरागढ़ – एसडीएम रविशंकर राय बैरसिया – एसडीएम आशुतोष शर्मा हुजूर – एसडीएम विनोद सोनकिया (हर टीम में तहसीलदार और शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल हैं) पैरेंट्स के लिए बड़ी राहत इस फैसले से भोपाल के हजारों अभिभावकों को राहत मिलेगी। अब स्कूल मनमाने तरीके से महंगी किताबें या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगे। अगर कहीं भी दबाव बनाया जाता है तो पैरेंट्स सीधे प्रशासन से शिकायत कर सकते हैं।

कक्षा 1 से 12वीं तक मप्र में सरकारी स्कूलों के नामांकन में लगातार गिरावट दर्ज

भोपाल  मप्र के सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन लगातार कम हो रहा है। 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा 1 से 12वीं तक के नामांकन में 22.03 लाख तक कमी दर्ज की गई है। विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने बताया कि नामांकन में गिरावट की वैज्ञानिक जांच के लिए 8 मई 2025 को 'अटल बिहारी सुशासन संस्थान' को पत्र लिखा गया था। हैरानी की बात यह है कि विभाग द्वारा रिमाइंडर के बावजूद 10 महीने बीत जाने पर भी संस्थान ने अब तक कार्ययोजना पेश नहीं की है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि विभाग 'कागजी छात्र' दिखाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है और असली आंकड़ों को छिपाकर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। दस साल में 22 लाख बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी जीतू पटवारी ने कहा है कि पिछले 10 सालों में सरकारी स्कूलों से 22 लाख से अधिक बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं, जिससे नामांकन में भारी गिरावट आई है। उन्होंने इसे सरकार की शिक्षा नीति की पूरी नाकामी करार देते हुए दावा किया कि जहां दुनिया के विकसित देशों में बच्चे अंतरिक्ष और मंगल ग्रह पर पानी की खोज कर रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चे बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षक, ब्लैकबोर्ड, किताबें और ठीक-ठाक भवन ढूंढने को मजबूर हैं। जीतू पटवारी ने सरकार से किए सवाल बता दें कि विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल के जवाब में स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने जानकारी दी है कि 2015-16 से 2024-25 के बीच कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के स्टूडेंट्स के नामांकन में 22.03 लाख की कमी आई है। इसे लेकर पिछले साल मई में सरकार ने अटल बिहारी सुशासन संस्थान को पत्र लिखकर नामांकन मे गिरावट की वैज्ञानिक जांच करने को कहा था। लेकिन लगभग दस महीने बीत जाने पर भी संस्थान की तरफ से इसे लेकर कोई एक्शन प्लान प्रस्तुत नहीं किया गया है जबकि इस बीच स्कूल शिक्षा विभाग उन्हें रिमाइंडर भी दे चुका है। इसी मामले पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इन बच्चों को “लापता” की श्रेणी में रखते हुए सरकार से सवाल किया कि इतने बड़े पैमाने पर बच्चे स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ‘प्रदेश में लाड़ली बहनें लापता होने के बाद अब स्कूल के बच्चे भी लापता हो रहे हैं।’ विपक्ष का आरोप है कि गिरावट का खेल साल 2008-09 से ही शुरू हो गया था, लेकिन सरकार केवल 2015-16 के बाद के समय की जांच करा रही है। आंकड़ों के अनुसार, 2008 से 2015 के बीच ही 40.62 लाख बच्चे कम हो चुके थे, जिसे जांच में शामिल नहीं किया गया है। विधायक ने इस पूरे मामले को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े 'घोटाले' से जोड़ते हुए इसकी सीबीआई जांच और सरकार से श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। एक साल में ही एक लाख छात्रों का अंतर… जानकारी में सबसे बड़ा खुलासा आंकड़ों की विसंगति को लेकर हुआ है। जानकारी में सामने आई अलग-अलग सूचियों में छात्र संख्या मेल नहीं खा रही है। वर्ष 2015-16 के लिए ही एक सूची में संख्या 22.62 लाख है, तो दूसरी में 23.57 लाख बताई गई है। एक ही साल के डेटा में एक लाख बच्चों का अंतर आया है। आंकड़े छिपाकर करोड़ों का भ्रष्टाचार हैरानी की बात यह है कि विभाग ने बार-बार संस्थान को याद दिलाया है। इसके बाद भी 10 महीने से ज्यादा का वक्त गुजरने के बाद भी संस्थान ने अब तक अपनी योजना नहीं दी है। विपक्ष का कहना है कि विभाग सिर्फ कागजों पर काम दिखाकर वाह-वाही लूट रहा है। असली आंकड़े छिपा कर हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। शिक्षा के नाम पर हो रहा घोटाले विपक्ष का कहना है कि बच्चों की संख्या में गिरावट का सिलसिला 2008-09 से ही शुरू हुआ था। सरकार केवल 2015-16 के बाद के आंकड़ों की ही जांच कर रही है। आंकड़ों के मुताबिक 2008 से 2015 तक ही 40.62 लाख बच्चे कम हो गए थे। इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। विधायक ने इस मुद्दे को शिक्षा के नाम पर हो रहे बड़े घोटाले से जोड़ा है। साथ ही सीबीआई से जांच कराने और सरकार से श्वेत पत्र* जारी करने की मांग की है। एक साल में एक लाख बच्चों का फर्क जानकारी में एक बड़ा खुलासा हुआ है जो आंकड़ों की गलती को लेकर है। अलग-अलग सूचियों में बच्चों की संख्या मैच नहीं कर रही है। जैसे कि 2015-16 के लिए एक सूची में 22.62 लाख बच्चों की संख्या दी गई है। वहीं दूसरी सूची में यह संख्या 23.57 लाख बताई गई है। यानी एक ही साल के आंकड़ों में एक लाख बच्चों का फर्क है।     *श्वेत पत्र क्या होता है।     श्वेत पत्र एक तरह का दस्तावेज होता है, जिसे किसी खास समस्या को समझने या उसका समाधान बताने के लिए तैयार किया जाता है। ये दस्तावेज सरकार, कंपनियां या गैर-लाभकारी संगठन उस मुद्दे पर अपने विचार और आंकड़े लोगों तक पहुंचाने के लिए जारी करते हैं। इसमें किसी नीति या समस्या का विश्लेषण किया जाता है, और अक्सर इसमें कोई समाधान या सुझाव भी दिए जाते हैं।     इस दस्तावेज को 'श्वेत पत्र' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पहले इसके कवर का रंग सफेद होता था। यह दस्तावेज सार्वजनिक जानकारी और पारदर्शिता को दिखाता है, यानी कि यह जानकारी लोगों के लिए खुली होती है।

अमृतसर में बम धमकी से हड़कंप, स्कूलों और शताब्दी एक्सप्रेस के परिसरों में की गई सघन तलाशी

अमृतसर  अमृतसर में स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से हड़कंप मच गया। शहर के एक या अधिक स्कूलों को धमकी भरा ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें स्कूल को बम से उड़ाने की बात कही गई है। साथ ही शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन को भी बम से उड़ाने की धमकी दी गई। पुलिस सूत्रों के अनुसार, अमृतसर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी है। ईमेल भेजने वाले की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। स्कूल प्रशासन को सूचना मिलते ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। कई जगहों पर छात्रों को सुरक्षित निकाला गया और परिसर की जांच के लिए बम निरोधक दस्ता (बम स्क्वॉड) बुलाया गया। अभिभावकों को सूचित किया गया कि वे अपने बच्चों को घर ले जाएं, जिससे स्कूलों के बाहर भीड़ जमा हो गई। यह पहली बार नहीं है जब अमृतसर के स्कूलों को ऐसी धमकियां मिली हैं। इससे पहले भी कई बार शहर के विभिन्न स्कूलों को इसी तरह के बम धमकी वाले ईमेल प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर मामलों में जांच के बाद धमकियां झूठी साबित हुईं। पंजाब के अन्य शहरों जैसे चंडीगढ़, जालंधर और पटियाला में भी हाल के महीनों में स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी भवनों को इसी तरह की धमकियां मिली हैं, जो अक्सर होक्स (झूठी) निकलती हैं। इन घटनाओं से लोगों में दहशत फैलती है और सुरक्षा बलों को भारी संसाधन लगाने पड़ते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, हर धमकी को गंभीरता से लिया जा रहा है। भले ही पहले के मामले फर्जी साबित हुए हों। साइबर सेल सक्रिय रूप से ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी है। लोगों से अपील की गई है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को दें। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और जांच जारी है। ऐसी घटनाएं बच्चों की सुरक्षा और अभिभावकों की चिंता को बढ़ाती हैं, इसलिए प्रशासन हरसंभव कदम उठा रहा है ताकि कोई अनहोनी न हो।

स्कूलों की लापरवाही नहीं होगी बर्दाश्त, पंजाब शिक्षा विभाग का सख्त आदेश

लुधियाना पंजाब के स्कूल शिक्षा महानिदेशक-सह-राज्य परियोजना निदेशक, समग्र शिक्षा अभियान प्राधिकरण (पंजाब) ने स्कूलों में चल रहे विभिन्न निर्माण और विकास परियोजनाओं की धीमी प्रगति को लेकर जिलों के शिक्षा अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। विभाग ने बताया कि साल 2024-25 और 2025-26 के तहत स्वीकृत सभी प्रोजेक्ट्स, जैसे ACR, LARS, लाइब्रेरी, आर्ट एंड क्राफ्ट रूम, लड़के/लड़कियों के टॉयलेट और मेजर/माइनर रिपेयर, का निर्माण तेजी से पूरा किया जाना चाहिए। 10 फरवरी 2025 को माननीय सेक्रेटरी स्कूल एजुकेशन ने सभी डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर्स (DEOs) के साथ समीक्षा बैठक की थी, जिसमें कई जिलों में धीमी प्रगति और फंड के इस्तेमाल में कमी को गंभीरता से लिया गया। निर्देशों के अनुसार, साल 2024-25 के तहत स्वीकृत सभी कार्य अगले एक हफ्ते में पूरा करने होंगे। इसके साथ ही फिजिकल और फाइनेंशियल प्रगति का प्रमाण-पत्र और पोर्टल पर डिपॉजिट कर फंड का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना अनिवार्य है। विभाग ने चेतावनी दी कि अगर 2025-26 के बचे हुए कार्य समय पर पूरे नहीं हुए, तो फंड रिलीज़ नहीं किया जाएगा। इसलिए जिलों के स्कूलों में चल रहे निर्माण कार्यों पर नियमित निगरानी रखने और समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश भी दिया गया है।

बड़वानी में शिक्षा की दुर्दशा:गाय-बकरियों के तबेले में ठूंसे गए 40 आदिवासी बच्चे!

बड़वानी नरेश रायक सरकार करोड़ों रुपये शिक्षा पर खर्च करने के दावे करती है, मगर हकीकत यह है कि जिले में 40 आदिवासी बच्चों का भविष्य पशुबाड़े में दम तोड़ रहा है। जिस जगह गाय-बकरियां बांधी जाती हैं, वहीं बच्चों की कक्षाएं लग रही हैं। गोबर की बदबू, गंदगी से भरी जमीन और संक्रमण का खतरा—यही है इस ‘तबेला स्कूल’ की असली तस्वीर। क्या यही है “शिक्षा का अधिकार”? बच्चे जमीन पर ठूंसे हुए बैठते हैं। बरसात में कीचड़, गर्मी में असहनीय दुर्गंध। सवाल सीधा है—  क्या आदिवासी बच्चों की शिक्षा की कीमत इतनी सस्ती है? क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी अपने बच्चों को ऐसे माहौल में पढ़ने भेजेंगे? जिम्मेदार कौन? जर्जर/अपर्याप्त भवन की आड़ में पशुबाड़े में स्कूल चलाना किसकी अनुमति से? शिक्षा विभाग और प्रशासन की निगरानी कहां है? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज की? ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद सिर्फ “अस्थायी व्यवस्था” का बहाना दिया गया। मगर यह अस्थायी इंतजाम कब तक चलेगा? महीनों से बच्चे तबेले में बैठकर पढ़ रहे हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह भविष्य के साथ खिलवाड़ है बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिले में यदि बच्चों को सम्मानजनक कक्षा कक्ष भी नसीब न हो, तो विकास के दावे खोखले साबित होते हैं। अब देखना है—  क्या प्रशासन तुरंत वैकल्पिक भवन की व्यवस्था करेगा? या फिर ‘तबेला स्कूल’ ही जिले की शिक्षा व्यवस्था का स्थायी प्रतीक बन जाएगा? बच्चों की पढ़ाई पशुबाड़े में और भाषण स्मार्ट क्लास के—यह दोहरी तस्वीर आखिर कब बदलेगी?

रतलाम का सरकारी स्कूल छाया खास, बच्चों में बैग नहीं और मुंहजबानी से 40 तक के पहाड़े याद

रतलाम  सरकारी स्कूलों का जब जिक्र आता है, तब ज्यादातर समय दिमाग में पहली तस्वीर बदहाल व्यवस्था की बनती है लेकिन मध्य प्रदेश के रतलाम में एक ऐसा अनूठा स्कूल है, जो इसके विपरीत एक नजीर पेश कर रहा है. यह स्कूल अपने आप में एक मिसाल है. इसके बारे में यह कहना हरगिज गलत नहीं होगा कि यह सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों को मात दे रहा है. स्कूल की अपनी कार्यशैली के चलते इसे ‘समस्या मुक्त विद्यालय’ नाम दिया गया है. यहां के प्रधानाध्यापक ने अपने खर्च पर स्कूल को सजाया-संवारा है. वहीं उनका शिक्षा की गुणवत्ता पर भी खासा फोकस रहता है. हम बात कर रहे हैं रतलाम के जावरा स्थित रूपनगर के सरकारी प्राथमिक स्कूल की. प्राथमिक स्कूल को बहुत सुंदर तरीके से सजाया गया है. स्कूल में बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ वह तमाम जानकारी मुहैया करवाई जा रही है, जो उनके सर्वांगीण विकास में सहायक है. स्कूल में इस तरह हरियाली छाई हुई है कि एक बार के लिए लगता है कि आप किसी गार्डन में आ गए हों. स्कूल की साफ-सफाई पर बहुत ध्यान दिया जाता है ताकि बच्चे अभी से स्वच्छता के महत्व को समझ सकें और इसे अपने जीवन में अपना सकें. खाली हाथ स्कूल आते हैं बच्चे पहली से पांचवीं क्लास तक यह स्कूल पूरी तरह से एक बैगलेस स्कूल है. बच्चे घर से बैग लेकर स्कूल नहीं आते हैं ताकि उनके नाजुक कंधों पर वजनी बोझ न पड़े. स्कूल में पढाई के साथ-साथ होमवर्क भी करवाया जाता है. बच्चों की यूनिफॉर्म पूरी तरह से व्यवस्थित है. इन नन्हे-मुन्ने स्टूडेंट्स की छोटी-छोटी बातों पर पूरा ध्यान दिया जाता है ताकि वे भी अच्छी बातें सीख सकें. बच्चों को 40 तक के पहाड़े मुंहजबानी याद स्कूल से प्रधानाध्यापक की मेहनत का ही यह नतीजा है कि उन्होंने इस सरकारी स्कूल की तस्वीर बदल दी. यहां बच्चों को 40 तक के पहाड़े मुंहजबानी याद हैं. जावरा के रूपनगर का यह सरकारी स्कूल रतलाम ही नहीं बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में मिसाल पेश करता नजर आ रहा है.