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सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से पूछा- राइफल से खुद को गोली मारना कैसे संभव?

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस से कड़ा सवाल पूछा। कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई व्यक्ति राइफल से अपने सीने में गोली मार सकता है? शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश से पुलिस से यह सवाल पूछा है। यह मामला मौत के मामले को सुसाइड की तरह पेश करने से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या क्या सभी एंगल पर जांच हो चुकी है? क्या यह एंगल भी देखा जा चुका है कहीं यह मामला मर्डर का तो नहीं है? सुनवाई के वक्त बेंच ने क्या कहा जस्टिस मनोज मिश्रा और उज्जल भुयान की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी समझ से यह जांच का विषय है कि क्या कोई व्यक्ति अपने सीने में राइफल से गोली मारने में सक्षम है? अभियोजन पक्ष के अनुसार, ऐसा प्रतीत हुआ कि मृतक ने राइफल से अपनी छाती में गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। इस पर, हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आरोपी-प्रतिवादी नंबर 2 को अग्रिम जमानत दे दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर संदेह था कि क्या कोई व्यक्ति राइफल से अपनी छाती में खुद को गोली मार सकता है। इसलिए उसने राज्य के हलफनामे, मृतक की ऑटोप्सी रिपोर्ट और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री को तलब किया। अदालत ने कहा कि हलफनामे में राइफल की जब्ती और उसकी लंबाई के बारे में जानकारी का खुलासा होना चाहिए। यह है पूरा मामला यह मामला याचिकाकर्ता के 17 वर्षीय बेटे से संबंधित है। उसके बेटे ने भोपाल की एक अकादमी में शॉटगन शूटिंग प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। यहां पर प्रतिवादी नंबर दो ने बेटे के ऊपर 40 हजार रुपए चुराने का आरोप लगाया। आरोपों के अनुसार, प्रतिवादी नंबर 2 और अकादमी के अन्य छात्रों ने याचिकाकर्ता के बेटे को अपना अपराध स्वीकार करने की धमकी दी। उन्होंने उसका फोन छीन लिया और अपराध स्वीकार करने वाले संदेश भेजे, साथ ही उसकी पिटाई भी की। उनके इस व्यवहार से दुखी और असमर्थ होकर, याचिकाकर्ता के बेटे ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। घटना से पहले मृतक ने क्या किया इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से पहले, मृतक ने अपने एक दोस्त और अपनी बहन को बताया था कि वह आत्महत्या कर रहा है। उसने अपने दोस्त के पास एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था, जिसमें उसने अकादमी के छात्रों (प्रतिवादी नंबर 2 सहित) को दोषी ठहराया था। लगभग एक महीने के बाद, भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। शुरुआत में, सत्र न्यायालय ने प्रतिवादी नंबर 2 की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने उसे यह राहत प्रदान कर दी। उम्र के संबंध में भी गलती याचिकाकर्ता के अनुसार, हाई कोर्ट ने न केवल उसके बेटे की आत्महत्या की घटना को मामूली बना दिया, बल्कि मृतक को दबाव न झेल पाने का दोषी ठहराया और आरोपी के कृत्यों का बचाव किया। यह दावा किया गया है कि हाई कोर्ट ने मृतक की उम्र 18 मानकर गलती की, जबकि घटना के समय वह 17 साल का था, और इस प्रकार, एक नाबालिग को आत्महत्या के लिए उकसाने का गंभीर अपराध लागू होता है। याचिकाकर्ता का यह भी तर्क है कि प्रतिवादी नंबर 2 एक प्रभावशाली परिवार से संबंधित है। उसकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है क्योंकि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी उसने जांच में सहयोग नहीं किया।  

‘दहेज प्रताड़ना के आरोप बेबुनियाद’, सुप्रीम कोर्ट ने बहू की सास को दी राहत

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर दहेज के लिए बहू के साथ क्रूरता करने के 24 साल पुराने केस में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दोषी करार दी गई एक सास को बरी कर दिया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ससुराल वालों द्वारा बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित की बातें हवा से भी अधिक तेज फैलती हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ शुक्रवार को एक याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें महिला की दोषसिद्धि और तीन साल की सजा बरकरार रखी गई थी। आरोपी सास को आईपीसी की धारा 498ए के तहत इस आधार पर दोषी ठहराया गया था कि उसकी मृत बहू ने अपने मायके वालों को दहेज उत्पीड़न होने की बातें बताई थीं।आईपीसी की धारा 498-ए, विवाहित महिला के प्रति उसके पति या उसके ससुरालवालों द्वारा की गई क्रूरता के अपराध से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने पड़ोसन की गवाही को माना अहम सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि ने इस बात पर गौर किया कि केस में गवाह के तौर पर पेश हुई आरोपी महिला की पड़ोसी ने दावा किया कि बहू से कभी दहेज की मांग नहीं की गई थी। बेंच ने कहा, ‘‘सास के साक्ष्य को निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह दहेज की मांग के संबंध में कोई तथ्य पेश नहीं कर सकी थी, क्योंकि यह चारदीवारी के भीतर होता है, जो एक गलत निष्कर्ष है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जब सास-ससुर द्वारा दहेज के लिए बहू को परेशान किए जाने की बातें हवा से भी तेज फैलती हैं।" जून 2001 में दर्ज कराई गई थी शिकायत मृतक बहू के पिता ने जून 2001 में दर्ज कराई अपनी शिकायत में बताया था कि उनकी बेटी ससुराल में मृत पाई गई थी। पिता ने आरोप लगाया था कि मौत के समय उनकी बेटी गर्भवती थी और वह अक्सर मायकेवालों को बताती थी कि उसकी सास दहेज के लिए उसे ताने ताने मारती है। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि घटना के वक्त उसका दामाद शहर में नहीं था। मृतका के सास-ससुर और देवर को इस मामले में आरोपी बनाया गया था। हालांकि, निचली अदालत ने ससुर और देवर को बरी कर दिया, लेकिन यह माना कि सास के उत्पीड़न के कारण बहू ने जान दी थी। दोषी करार दी गई सास ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में दहेज की मांग अपने आप में आईपीसी की धारा 498ए के तहत केस दर्ज करने के लिए काफी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इसी प्रकार, किसी विवाहित महिला को या उसके रिश्तेदार को किसी अवैध मांग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से परेशान करना भी 'क्रूरता' की श्रेणी में आएगा।'' बेंच ने आरोपी महिला की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और उसे बरी कर दिया।  

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में रह रहे पाकिस्तानी हिंदुओं को हटाने के मामले में सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रह रहे पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उन्हें बेदखल करने पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट के 30 मई के फैसले पर रोक लगाते हुए दिया गया, जिसमें शरणार्थियों की याचिका को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शरणार्थियों की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और एक-पक्षीय अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। विष्णु शंकर जैन के मुताबिक, दिल्ली के 'मजनू का टीला' इलाके में एक हजार से अधिक पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी रह रहे थे। डीडीए ने इन परिवारों को हटाने के लिए नोटिस जारी किया था। शरणार्थियों ने डीडीए के नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की थी, लेकिन राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने शरणार्थियों की याचिका को खारिज कर दिया था। उन्होंने बताया, "पहले सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकार इस मामले में कोई स्पष्ट नीति नहीं बना पा रही है और नीति निर्माण कोर्ट का कार्यक्षेत्र नहीं है, इसलिए अदालत कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं कर सकती।" अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि यह सबसे अहम है कि जब यह मामला पहली बार हाईकोर्ट पहुंचा था, तो कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। अब केंद्र सरकार की नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत यह स्पष्ट नीति है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान से भारत आए सभी विस्थापित हिंदुओं को भारतीय नागरिकता दी जाएगी। जैसे ही किसी को नागरिकता मिलती है, संविधान का अनुच्छेद 21, जीवन और सम्मान का अधिकार, उन पर लागू हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का दावा- बंगाल में सुनियोजित घुसपैठ का खेल

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते कुछ सप्ताह में लगातार यह आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार के द्वारा बंगाली भाषाओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने इसे ‘भाषाई आतंकवाद’ का नाम भी दिया है। इस बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा दावा किया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि पश्चिम बंगाल और आस-पास के कुछ क्षेत्रों में व्यवस्थित तरीके से घुसपैठ करवाया जा रहा है और इस काम के लिए कई एजेंट भी सक्रिय हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के नागरिक ना होने के संदेह में बंगाली भाषी मुस्लिम प्रवासियों को हिरासत में लिए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। इस दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुक्रवार को कहा कि सिर्फ बंगाल में ही नहीं बल्कि कई इलाकों में घुसपैठ हो रहा है। उन्होंने रोहिंग्याओं का भी जिक्र किया। तुषार मेहता ने आगे बताया," रोहिंग्याओं के साथ-साथ एक व्यवस्थित गिरोह भी है। कई आतंकवादी भी घुसपैठ कर रहे हैं।" वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान कहा कि एक महिला को बिना जांच किए देश से बाहर निकाल दिया गया। उन्होंने कहा, “वह गर्भवती है। सिर्फ इसलिए कि वह बंगाली बोलती है, सरकार कह रही है कि वह एक बांग्लादेशी है। इस देश में कोई भी अधिकारी किसी व्यक्ति को बिना यह जांच किए सीमा पार कैसे धकेल सकता है कि वह विदेशी है या नहीं? ऐसा करना अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है।” केंद्र सरकार से सवाल इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या लोगों को भाषा के आधार पर उठाया जा रहा है। पर एसजी मेहता ने जवाब दिया कि भाषा के आधार पर किसी को निशाना नहीं बनाया जा रहा है। कोर्ट ने केंद्र से पूछा, "दो महत्वपूर्ण मसले हैं। एक राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता, और यह सर्वोपरि है। दूसरा प्रश्न विरासत और संस्कृति का है। पंजाब और बंगाल दोनों जगह भाषा एक ही है पर सीमा पर विभाजन है। हम चाहते हैं कि आप अपना रुख स्पष्ट करें।" इस पर जवाब देते हुए SG मेहता ने कहा कि फिर प्रभावित लोगों के बजाय कोई समूह ही सुप्रीम कोर्ट क्यों आते हैं? लोग व्यक्तिगत रूप से लोग क्यों नहीं आते? यह एक समस्या है। भारत दुनिया के अवैध प्रवासियों की जगह नहीं है। एक व्यवस्था होती है। उन्हें बताना होगा कि वे भारत में क्यों रह रहे हैं।"  

रणवीर-रैना को सुप्रीम कोर्ट की नसीहत, कहा- दूसरों की कीमत पर मत कमाओ

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक लहजे में कहा है कि किसी को भी कमाई करने के मकसद से किसी का भी मजाक उड़ाने की आजादी नहीं दी सकती और उसे अभिव्यक्ति की आजादी के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता है। कोर्ट ने इस मामले में तल्ख टिप्पणी की कि जब आप अपने भाषण का व्यवसायीकरण कर रहे हैं, तो आप इसके जरिए किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचा सकते। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही कॉमेडिन समय रैना और अन्य हास्य कलाकारों को विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने वाले चुटकुलों के लिए कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ क्योर एसएमए फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से प्रभावित मरीजों और परिवारों की मदद करता है। याचिका में विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने वाले चुटकुलों की ओर अदालत का ध्यान आकृष्ट कराया गया था। अदालत ने जिन हास्य कलाकारों की आलोचना की है, उनमें समय रैना, विपुन गोयल, बलराज परमजीत सिंह घई, सोनाली ठक्कर और निशांत जगदीश तंवर शामिल हैं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन कॉमेडियन ने अपने शो में दिव्यांगों और दुर्लभ बीमारियों का मजाक उड़ाया है, जिससे पीड़ितों की भावनाएं आहत हुईं हैं। कोर्ट ने उन्हें दिव्यांगों (PwDs) और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों का मजाक उड़ाने वाले असंवेदनशील चुटकुले सुनाने के लिए बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। सद्बुद्धि की जीत हुई इस याचिका को इंडियाज गॉट लेटेंट विवाद से जुड़े मामलों के साथ जोड़ दिया गया, जिसमें यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया पर आरोप लगाए गए थे। फाउंडेशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कहा कि "सद्बुद्धि की जीत हुई है" और सभी हास्य कलाकारों ने माफी मांग ली है। कोर्ट ने इन कलाकारों से कहा है कि वे अपने चैनल पर माफीनामा प्रसारित करें। केंद्र को गाइडलाइंस बनाने का निर्देश कोर्ट में सुनवाई के दौरान समय रैना समेत सभी कॉमेडियन मौजूद थे। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सभी ने माफी मांग ली है।इस दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "मजाक जीवन का हिस्सा है और हम अपने ऊपर बने मजाक को स्वीकार कर सकते हैं लेकिन जब आप दूसरों का मजाक बनाना शुरू करते हैं, तो यह संवेदनशीलता का उल्लंघन है।" सुप्रीम कोर्ट ने उनसे यह भी पूछा है कि इस अमानवीय अपराध के लिए उन पर कितना जुर्माना लगाया जाना चाहिए? कोर्ट ने इस मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को गाइडलाइंस बनाने का भी निर्देश दिया।

असिस्टेंट प्रोफेसर की सैलरी पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतराज, गाने को भी बताया बेकार

नईदिल्ली  देश में शिक्षकों की स्थिति पर बड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्हें सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिल पा रहा है तो फिर 'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा' गाना ही बेकार है। गुजरात सरकार की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्चुअल असिस्टेंट प्रोफेसर को मात्र 30 हजार रुपये की सैलरी दी जा रही है, जबकि ऐड हॉक और रेग्युलर असोसिएट प्रफेसर का वेतन 1.2 से 1.4 लाख रुपये के बीच है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, जो शिक्षक हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करते हैं और उन्हें आने वाले समय के लिए तैयार करते हैं, उनके साथ ही इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा, किसी भी देश के लिए शिक्षक रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं जो कि हमारे बच्चों को भविष्य की चुनौतियों और अच्छा जीवन जीने के लिए तैयार करते हैं। शिक्षक ही इस समाज में अपनी रिसर्च, विचारों और मूल्यों के जरिए प्रगति का रास्ता दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बड़ी ही चिंता की बात है कि समाज में शिक्षक के अमूल्य योगदान को पहचाना नहीं जा रहा है। कोर्ट ने कहा, अगर शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिलेगा तो देश में ज्ञान और बौद्धिक सफलता को भी सही स्थान नहं मिल पाएगा। बता दें कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को निर्देश दिया था कि इस मामले में 'समान कार्य, समान वेतन' के सिद्धांत का पालन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह बड़ी ही चिंता की बात है कि असिस्टेंट प्रोफेसर को पिछले दो दशक से इतनी कम सैलरी दी जा रही है। हमें जानकारी मिली है कि 2720 रिक्तियां थीं जिनमें से अब तक 923 पोस्ट पर ही स्थायी भर्ती हुई है। शिक्षकों की कमी से शिक्षा का कार्य भी बाधित हो रहा है। जानकारी के मुताबिक 158 ऐड हॉक और 902 कॉन्ट्रैक्चुअल असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्तियां हुई थीं। वहीं 737 पोस्ट अब भी खाली हैं। कोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में जगहें खाली होने के बावजूद केवल ऐड हॉक और कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर शिक्षक रखे जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों को वापस छोड़ने पर लगी रोक हटाई, लेकिन खाना हर जगह न देने की शर्त रखी

नई दिल्ली दिल्ली-एनसीआर से आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें शेल्टर होम में स्थायी रूप से रखने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि हम पिछले आदेश में कुछ संशोधन कर रहे हैं. जस्टिस विक्रम नाथ ने आदेश पढ़ते हुए कहा कि हमने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्ष बनाया है ताकि राष्ट्रीय पॉलिसी पर बात हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि कुत्तों को वापस छोड़ने पर लगी रोक को हटा दिया है. कोर्ट ने कहा कि रेबीज और खतरनाक कुत्तों को न छोड़ा जाए. अदालत ने ये भी कहा कि जिन कुत्तों को पकड़ा गया था उन्हें वैक्सिनेट कर वापस छोड़ा जाए. इसके अलावा बीमार और आक्रामक कुत्तों को शेल्टर होम में ही रखा जाएगा. कोर्ट ने कहा कि कहीं भी कुत्तों को खाना न दें इसके लिए हर इलाके में एक तय जगह बने. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने पर कार्रवाई की जाएगी. कुत्तों को पकड़ने वाली टीम के काम में बाधा डालने वाले व्यक्ति पर 25 हजार और एनजीओ पर 2 लाख जुर्माना लगेगा. कोर्ट ने नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए हेल्पलाइन शुरू करने का निर्देश दिया. पशु प्रेमी कुत्तों को गोद लेने के लिए एमसीडी के समक्ष आवेदन कर सकते हैं. ये जिम्मेदारी उनकी होगी कि एक बार गोद लिए गए कुत्तों को दोबारा सड़कों पर नहीं छोड़ा जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आवारा कुत्तों को लेकर नेशनल पॉलिसी बनाई जाएगी. कोर्ट ने आदेश का दायरा बढाते हुए कहा कि अब जो भी निर्देश दिए जाएंगे वो पूरे देश के लिए लागू होगा. सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को दिल्ली-NCR के आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में रखने का निर्देश पारित किया था, जिसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर हईं थी. इंडिया गेट पर पशु प्रेमियों ने कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कैंडल मार्च भी निकाला था. करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.  आवारा कुत्तों पर क्या फंसा है पेंच? कुत्तों को छोड़ने पर प्रतिबंध स्थगित कर दिया गया है। नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को छोड़ा जा सकता है, सिवाय उन कुत्तों के जिनमें रेबीज होने का संदेह है या जो आक्रामक व्यवहार दिखा रहे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि जिन आवारा कुत्तों को पकड़ा जाता है, उन्हें नसबंदी, कृमिनाशक और टीकाकरण के बाद उसी क्षेत्र में वापस छोड़ दिया जाना चाहिए, जहां से उन्हें उठाया गया था। पूरे देश में लागू होगा यह फैसला अदालत ने मामले का दायरा दिल्ली-एनसीआर से आगे बढ़ाकर पूरे भारत में लागू कर दिया। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया गया। न्यायालय ने यह भी कहा कि वह इस मुद्दे पर राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए उच्च न्यायालयों में लंबित इसी तरह की याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करेगा। सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला 11 अगस्त को जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे तुरंत सड़कों से कुत्ते उठाकर शेल्टर होम्स में रखें और शुरुआती तौर पर कम से कम 5000 कुत्तों के लिए आश्रय गृह बनाएं. अदालत ने चेतावनी भी दी थी कि इस काम में बाधा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी. देशभर में हुआ व्यापक विरोध कोर्ट ने ये आदेश एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पारित किया. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने से, खासकर बच्चों में रेबीज के मामले बढ़ रहे हैं. अदालत ने इस मामले की सुनवाई 28 जुलाई को शुरू की थी. हालांकि देशभर में इस आदेश का व्यापक विरोध हुआ और कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट से इसे रोकने की अपील की. अब 22 अगस्त को विशेष पीठ इस मामले पर अपना आदेश सुनाएगी.  

सैफ अली खान पैतृक संपत्ति मामला: सुप्रीम कोर्ट ने MP हाईकोर्ट के आदेश पर लगाई अस्थायी रोक

भोपाल  सुप्रीम कोर्ट ने बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान के के पूर्वजों से जुड़े संपत्ति विवाद में शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खान की शाही संपत्ति से जुड़े दशकों पुराने संपत्ति विवाद को नए सिरे से सुनवाई के लिए निचली अदालत को वापस भेज दिया था। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया‌‌। बेंच ने नवाब हमीदुल्ला खान के बड़े भाई के वंशजों उमर फारुक अली और राशिद अली की याचिका पर नोटिस जारी किया, जो हाईकोर्ट के 30 जून के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें 14 फरवरी, 2000 के निचली अदालत के फैसले को खारिज कर दिया गया था, जिसमें नवाब की बेटी साजिदा सुल्तान, उनके बेटे मंसूर अली खान (पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान) और उनके कानूनी उत्तराधिकारियों, अभिनेता सैफ अली खान, सोहा अली खान, सबा सुल्तान और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के संपत्ति पर विशेष अधिकार बरकरार रखे गए थे। हाईकोर्ट ने कहा था कि निचली अदालत का फैसला 1997 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर आधारित था, जिसे बाद में 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया था। हालांकि, 2019 के उदाहरण को लागू करने और मामले का निर्णायक रूप से फैसला करने के बजाय, हाईकोर्ट ने मामले को पुनर्मूल्यांकन के लिए वापस भेज दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत उल्लिखित प्रक्रियात्मक मानदंडों के विपरीत है। यह मामला 1999 में नवाब के विस्तारित परिवार के सदस्यों द्वारा दायर दीवानी मुकदमों से जुड़ा है, जिनमें दिवंगत बेगम सुरैया राशिद और उनके बच्चे, महाबानो (अब दिवंगत), नीलोफर, नादिर और यावर के साथ ही नवाब की एक और बेटी नवाबजादी कमर ताज रबिया सुल्तान शामिल हैं। वादियों ने नवाब की निजी संपत्ति के बंटवारे, कब्जे और न्यायसंगत निपटान की मांग की थी। निचली अदालत ने साजिदा सुल्तान के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि संपत्ति मुस्लिम पर्सनल लॉ के अधीन नहीं है और संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें हस्तांतरित की गई थी। सन 1960 में नवाब की मृत्यु के बाद, भारत सरकार ने 1962 का एक प्रमाण पत्र जारी किया, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 366(22) के तहत साजिदा सुल्तान को शासक और निजी संपत्ति की वास्तविक उत्तराधिकारी दोनों के रूप में मान्यता दी गई। हालांकि, वादी पक्ष ने तर्क दिया कि नवाब की निजी संपत्ति मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सभी कानूनी उत्तराधिकारियों में बांटी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि 1962 के प्रमाण पत्र पर औपचारिक रूप से कोई विवाद नहीं था, लेकिन दावा किया कि यह न्यायसंगत विभाजन को नहीं रोकता। अभिनेता सैफ अली खान और उनके परिवार सहित प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि उत्तराधिकार में ज्येष्ठाधिकार के नियम का पालन किया गया और साजिदा सुल्तान को शाही गद्दी और निजी संपत्ति, दोनों का वंशानुगत उत्तराधिकार प्राप्त हुआ था। निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए, हाईकोर्ट ने मामले को वापस भेज दिया था। याचिकाकर्ताओं ने मामले को वापस भेजने के आदेश को पलटने की मांग करते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: घरेलू हिंसा के मामलों में गिरफ्तारी से पहले 2 माह की मोहलत

नई दिल्ली घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो साल पुराने दिशा-निर्देशों को अपनाते हुए कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत दर्ज मामलों में पुलिस आरोपियों को दो महीने तक गिरफ्तार न करे। कोर्ट ने कहा कि जब कोई महिला अपने ससुराल वालों के खिलाफ 498A के तहत घरेलू हिंसा या दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराए तो पुलिस वाले उसके पति या उसके रिश्तेदारों को दो महीने तक गिरफ्तार न करे। कोर्ट ने दो महीने की अवधि को शांति अवधि कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह आदेश एक महिला IPS अधिकारी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने उस महिला अधिकारी को उससे अलग हुए पति और उसके रिश्तेदारों के उत्पीड़न के लिए अखबारों में माफीनामा प्रकाशित कर माफी मांगने का भी आदेश दिया है। दो माह तक पुलिस कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2022 के दिशानिर्देशों के मुताबिक, दो महीने की शांति अवधि पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी सहित कोई भी कार्रवाई करने से रोकता है। HC के दिशानिर्देशों के अनुसार, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत दर्ज मामलों को पहले संबंधित जिले की परिवार कल्याण समिति (FWC) को निपटारे के लिए भेजा जाना चाहिए, और इस दौरान यानी पहले के दो महीनों तक पुलिस कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मंगलवार को इन दिशानिर्देशों को पूरे भारत में लागू करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा, "इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा 13 जून 2022 को क्रिमिनल रिवीजन नंबर 1126/2022 के विवादित फैसले में अनुच्छेद 32 से 38 के तहत 'आईपीसी की धारा 498ए के दुरुपयोग से बचाव के लिए परिवार कल्याण समितियों के गठन' के संबंध में तैयार किए गए दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे और उपयुक्त अधिकारियों द्वारा लागू किए जाएंगे।" सुप्रीम कोर्ट ने पहले कर दिया था निरस्त बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा जारी यह दिशानिर्देश 2017 में राजेश शर्मा एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में दिए गए फैसले पर आधारित हैं। दिलचस्प बात यह है कि 2018 में सोशल एक्शन फॉर मानव अधिकार बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इसे संशोधित कर दिया था बल्कि इसे निरस्त भी कर दिया था। इस वजह से FWC निष्क्रिय हो गए थे। बहरहाल, कल के फैसले के साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट का वे दिशानिर्देश अब लागू हो गए हैं। प्रत्येक जिले में FWC को भेजा जाएगा मामला उन दिशा निर्देशों के मुताबिक, प्राथमिकी या शिकायत दर्ज होने के बाद, "शांति अवधि" (जो कि प्राथमिकी या शिकायत दर्ज होने के दो महीने बाद तक है) समाप्त हुए बिना, नामजद अभियुक्तों की कोई गिरफ्तारी या पुलिस कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस "शांति अवधि" के दौरान, मामला तुरंत प्रत्येक जिले में FWC को भेजा जाएगा। दिशा निर्देशों में कहा गया है कि केवल वही मामले FWC को भेजे जाएँगे, जिनमें IPC की धारा 498-A के साथ-साथ, कोई क्षति न पहुँचाने वाली धारा 307 और IPC की अन्य धाराएँ शामिल हैंऔर जिनमें कारावास 10 वर्ष से कम है।

रियल एस्टेट घोटाले में फंसे बिल्डर-बैंक अफसर, CBI को सुप्रीम कोर्ट से मिली छानबीन की अनुमति

नई दिल्ली बिल्डर-बैंक गठजोड़ के मामले में दर्ज मुकदमों की सुनवाई के दौरान सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह दिल्ली-एनसीआर में 22 केस दर्ज करने जा रही है. कई बिल्डरों और बैंक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों में शिकंजा कस सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को हरी झंडी दे दी है. सीबीआई की सीलबंद रिपोर्ट मिलने के बाद कोर्ट ने कहा कि यह रिपोर्ट आंखें खोल देने वाली है. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को मुकदमे दर्ज करने के बाद प्रारंभिक जांच के निर्देश दिए थे. कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि कुछ रियल एस्टेट कंपनियां बैंकों के साथ मिलीभगत कर घर खरीदारों को अपनी परियोजनाओं के लिए कर्ज दिलाती हैं. ये प्रोजेक्ट कभी पूरे नहीं होते, जिससे आम आदमी कर्ज लेकर फंस जाता है, क्योंकि बैंक और बिल्डर मिलकर धन हड़प लेते हैं. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की जांच पर संतोष जताया और आगे की जांच के लिए समय भी दिया. और बिल्डरों के खिलाफ हो सकती है कार्रवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने आदेश दिया कि अगर जांच में कोई बाधा आती है, तो सीबीआई को कभी भी अदालत आने की छूट है. घर खरीदारों को परेशान करने और उनसे धन ऐंठने के लिए बैंकों के साथ साठगांठ के मामले में सीबीआई की जांच के दायरे में और भी बिल्डर आ सकते हैं. केंद्रीय एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह दिल्ली-एनसीआर में विभिन्न बिल्डरों के खिलाफ 22 मामले दर्ज करने की योजना बना रही है. इसके अलावा, अन्य शहरों के बिल्डरों की जांच के लिए भी उसने और समय मांगा है. सीबीआई की पैरवी करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि जांच को आगे बढ़ाकर निष्कर्ष तक पहुंचाने में और समय लगेगा. उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि सीबीआई ने अब तक 58 से अधिक संपत्तियों की जांच की है और एक हजार से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की है. सीबीआई ने पूरे मामले की सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी है. बेंच ने सीबीआई की जांच पर संतुष्टि जताते हुए जांच पूरी करने के लिए 6 हफ्ते का समय दिया है.