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संजू देवी की जीत पर गदगद छत्तीसगढ़, डिप्टी CM साव ने कहा- बढ़ाया मान

रायपुर : उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने एशियन गेम्स की कबड्डी गोल्ड मेडलिस्ट संजू देवी से बात कर दी बधाई, कहा आपने छत्तीसगढ़ का बढ़ाया मान संजू देवी ने राज्य सरकार के सहयोग और प्रोत्साहन के लिए जताया आभार रायपुर उप मुख्यमंत्री तथा खेल एवं युवा कल्याण मंत्री अरुण साव ने जापान में इन दिनों चल रहे एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय महिला कबड्डी टीम की सदस्य संजू देवी से वीडियो कॉल पर बात कर बधाई दी। साव ने बातचीत के दौरान संजू देवी की स्वर्णिम सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए उनसे कहा कि आपने देश के साथ छत्तीसगढ़ को भी गौरवान्वित किया है। आपकी मेहनत, संघर्ष और खेल के प्रति जुनून प्रदेश की बेटियों और युवा खिलाड़ियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगा। उप मुख्यमंत्री साव ने संजू देवी को आगे भी इसी तरह शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रदेश और देश का नाम रोशन करने के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेश को अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर गर्व है। बातचीत के दौरान संजू देवी ने आगे बढ़ने और अपने खेल को निखारने के लिए राज्य शासन तथा खेल विभाग की ओर से मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए  आभार जताया। साव ने कहा कि संजू देवी की यह सफलता उनके समर्पण और लगातार संघर्ष का परिणाम है। खेल के प्रति उनका जुनून प्रदेश के उभरते खिलाड़ियों के लिए प्रेरणादायी है। खासकर खेलों में आगे बढ़ने का सपना देख रही बेटियों को उनकी उपलब्धि नई प्रेरणा देगी। बिलासपुर के बहतराई खेल अकादमी में प्रशिक्षण ले रही कोरबा की संजू देवी भारतीय कबड्डी टीम की महत्वपूर्ण सदस्य है। भारत की ओर से खेलते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों में तीसरी स्वर्णिम सफलता हासिल की है। उन्होंने कबड्डी विश्वकप और एशियन चौंपियनशिप में भी भारत को विजेता बनाने में उम्दा प्रदर्शन किया था।

स्व. अशोक सिंघल की राष्ट्रसेवा को हमेशा याद रखा जाएगा: CM यादव

राष्ट्रसेवी स्व. अशोक सिंहल की सेवाएं याद रखी जाएंगी : मुख्यमंत्री डॉ. यादव स्व. सिंहल के जन्म शताब्दी वर्ष आयोजन और परिषद के सामाजिक समरसता कार्यक्रम में राज्य सरकार करेगी सहयोग भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि राष्ट्रसेवी, विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेता और सामाजिक समरसता, एकात्मकता की भावना सशक्त बनाने वाले स्व. अशोक सिंहल की सेवाएं सदैव याद रखी जाएंगी। मध्यप्रदेश सरकार विश्व हिंदू परिषद को स्व. सिंहल के जन्म शताब्दी वर्ष के आयोजन और सामाजिक समरसता कार्यक्रम के लिए समुचित सहयोग प्रदान करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव नए रविन्द्र भवन सभाकक्ष में परिषद के पुरोधा और राष्ट्रवादी विचारधारा के वरिष्ठ नेता स्व. अशोक सिंहल के जन्म शताब्दी समारोह के शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि स्व. सिंहल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी राष्ट्रसेवा और सुशासन के लिए आशीर्वाद दिया था।  जब हमारा राष्ट्र विभिन्न सामाजिक विसंगतियों से जूझ रहा था और एक समरस वातावरण की आवश्यकता थी, तब स्व. अशोक सिंहल ने एकात्मकता के भाव को सशक्त बनाने के ठोस प्रयास किए। भारतीय संस्कृति, राष्ट्रनीति और जातिगत सद्भाव को बढ़ाने में राष्ट्र के नागरिकों ने भी पूरा सहयोग दिया। आज  धारा 370 की समाप्ति और आतंकवाद, नक्सलवाद की समाप्ति जैसे कार्य हुए हैं। देश में तीव्र विकास का वातावरण बना है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश में एक राष्ट्र, एक विधान, एक निशान की अवधारणा को जमीन पर उतारते हुए समान नागरिक संहिता लागू करने की पहल की गई। इसमें सभी समुदायों का व्यापक समर्थन मिला है। गौशालाओं को सहयोग, उन्नत नस्ल की बछिया देंगे, मथुरा में भगवान कृष्ण मुस्कराएंगे मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश में घर-घर गोपाल का विचार लोकप्रिय हो रहा है। बड़ी गोशालाओं की स्थापना, शहरों में कांजी हाउस समाप्त कर देखभाल केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। वृद्ध गोवंश के लिए आहार की व्यवस्था की गई है। पंचायत स्तर तक गौपालक और गोवंश संरक्षण का कार्य हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश में प्रतिवर्ष उन्नत नस्ल की देसी बछिया वितरित करने का लक्ष्य है। गिर नस्ल के पशुधन से दूध के उत्पादन को बढ़ाने में सफलता मिलेगी। किसानों और पशुपालकों को इस समृद्धि का लाभ मिलेगा।  अयोध्या में भगवान राम मुस्करा रहे हैं। आने वाले समय में मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराएंगे। प्रदेश में जन्माष्टमी और गोवर्धन जयंती जैसे तीज त्यौहार मिलजुल कर मनाए जा रहे हैं। कार्यक्रम को रामप्रवेश देवाचार्य महाराज, गुफा मंदिर धाम, भोपाल और सुदेश शांडिल्य महाराज पीठाधीश्वर करुणाधाम आश्रम,विनायक राव देशपांडे, केंद्रीय सह संगठन महामंत्री,  चौधरी ओ.पी. गोदिया, राष्ट्रीय कार्यवाह अध्यक्ष, वाल्मीकि महासभा  और स्व. सिंहल के निकट सहयोगी परिषद के पूर्व पदाधिकारी और म.प्र. वित्त आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया ने संबोधित किया। कार्यक्रम में अशोक पांडे प्रान्त संघ संचालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पूज्य बुद्ध भूषण भदंत, रानी कमलापति बुद्ध विहार, विधायक रामेश्वर शर्मा के अलावा भोपाल की महापौर श्रीमती मालती राय भी उपस्थित थीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संगठनों के पदाधिकारी और नागरिक मौजूद थे।  

US Visa अपॉइंटमेंट में लंबा वेटिंग टाइम, हैदराबाद में 12 महीने तो मुंबई में 11.5 महीने इंतजार

नई दिल्ली अमेरिका घूमने, कारोबार या रिश्तेदारों से मिलने की योजना बना रहे भारतीय यात्रियों के लिए वीजा अपॉइंटमेंट को लेकर बड़ी चुनौती सामने आई है। US विजिटर वीजा के लिए पहली बार आवेदन करने वालों को प्रमुख भारतीय शहरों में इंटरव्यू स्लॉट के लिए कई महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के ब्यूरो ऑफ कॉन्सुलर अफेयर्स (Bureau of Consular Affairs) के ताजा वेट-टाइम डाटा के अनुसार, कुछ जगहों पर अगला उपलब्ध स्लॉट करीब एक साल दूर है। ऐसे में यात्रा की योजना बनाने वालों के लिए वीजा प्रॉसेस को काफी पहले शुरू करना जरूरी हो गया है। हैदराबाद के लोगों के लिए सबसे लंबा इंतजार पहली बार आवेदन करने वालों के लिए सबसे लंबा इंतजार हैदराबाद में दर्ज किया गया है, जहां अगला उपलब्ध इंटरव्यू स्लॉट करीब 12 महीने बाद मिल रहा है। मुंबई में यह इंतजार लगभग 11.5 महीने और नई दिल्ली में करीब 10 महीने है। चेन्नई में आवेदकों को लगभग 7.5 महीने इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि कोलकाता में करीब 6.5 महीने का वेटिंग टाइम है, यानी शहर के आधार पर US विजिटर वीजा के लिए अपॉइंटमेंट मिलने में काफी अंतर है। कहां कितना वेटिंग पीरियड? US में छुट्टी मनाने जाने वाले पर्यटक और बिजनेस विजिट पर जाने वाले लोगों के लिए सामान्यतः B1/B2 विजिटर वीजा कैटेगिरी लागू होती है। इसी वजह से कॉर्पोरेट मीटिंग, बिजनेस इवेंट या ट्रेड समिट के लिए जाने वाले लोगों और घूमने या परिवार से मिलने जाने वाले यात्रियों के लिए इंटरव्यू स्लॉट की यही साझा व्यवस्था है। अमेरिकी विदेश विभाग के रेट्रोस्पेक्टिव डाटा में भी पिछले महीने इंटरव्यू पूरा करने वाले आवेदकों के वास्तविक औसत वेटिंग पीरियड में हैदराबाद 11.5 महीने, मुंबई 11 महीने, नई दिल्ली 7.5 महीने, चेन्नई 7 महीने और कोलकाता 6 महीने रहा। स्टूडेंट और वर्क वीजा के लिए स्थिति अलग विजिटर वीजा की तुलना में स्टूडेंट और वर्क वीजा के लिए स्थिति अपेक्षाकृत अलग है। स्टूडेंट और एक्सचेंज विजिटर वीजा के लिए चेन्नई में दो सप्ताह से भी कम, हैदराबाद में करीब 1.5 महीने, नई दिल्ली और कोलकाता में लगभग दो महीने व मुंबई में करीब 2.5 महीने का इंतजार बताया गया है। पिटीशन-बेस्ड टेंपररी वर्क वीजा के मामले में हैदराबाद में लगभग 5.5 महीने का इंतजार है, जबकि नई दिल्ली में तीन महीने, चेन्नई और मुंबई में करीब 1.5 महीने और कोलकाता में लगभग एक महीने का समय है। हालांकि, ये वेटिंग टाइम किसी निश्चित अपॉइंटमेंट की गारंटी नहीं हैं। अमेरिकी दूतावास और कॉन्सुलेट समय-समय पर नए इंटरव्यू स्लॉट खोलते हैं और कैंसिल हुए अपॉइंटमेंट भी दोबारा उपलब्ध हो सकते हैं। इसलिए जिन यात्रियों को दूर की तारीख मिली है, वे नियमित रूप से वीजा पोर्टल पर स्लॉट चेक करके पहले की तारीख मिलने पर बिना अतिरिक्त शुल्क के रीशेड्यूल कर सकते हैं। यह लंबा इंतजार मुख्य रूप से उन आवेदकों के लिए है, जिन्हें इन-पर्सन इंटरव्यू देना जरूरी है। वहीं, मौजूदा वीजा को एलिजिबल एप्लीकेंट्स के लिए रिन्वेल या इंटरव्यू-वेवर प्रॉसेस के तहत रिनोवेटेड कराने वालों की स्थिति अलग है। ऐसे मामलों में पासपोर्ट वापस मिलने में लगभग दो से 6 सप्ताह लग सकते हैं। इसलिए, अमेरिका जाने की योजना बना रहे नए आवेदकों को यात्रा की तारीख तय करने से पहले अपने शहर का मौजूदा वेटिंग टाइम जरूर चेक कर लेना चाहिए।  

ईरान के हाथ लगा अमेरिकी ‘ड्रोन पनडुब्बी’ REMUS 600, होर्मुज में कर रहा था निगरानी

तेहरान ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसेना के एक ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (ड्रोन पनडुब्बी) को पकड़ा है। इसका नाम REMUS 600 ऑटोनॉमस अंडरवॉटर व्हीकल है। यह होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के बिछाए बारूदी सुरंगों का पता लगा रही थी। इस दौरान ईरानी नौसेना ने उसकी गतिविधियों को ट्रैक किया और उसे वापस लौटने से पहले पकड़ लिया। इसे अमेरिकी नौसेना के लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है। इससे होर्मुज को वैश्विक नौवहन के लिए खोलने के अमेरिका की कोशिशों पर भी पानी फिर सकता है। अमेरिकी नौसेना का 'रेमस 600' ईरान के कब्जे में ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कहना है कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका के एक ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (पानी के नीचे चलने वाले बिना चालक के वाहन) को पकड़ा है। उन्होंने इस बिना चालक वाले वाहन को "रेमस 600 नाम का एक एडवांस्ड सबमर्सिबल" बताया और कहा कि "अब यह फोर्स के विशेषज्ञों के पास है ताकि इससे जानकारी निकाली जा सके।" IRGC ने बताया- कैसे पकड़ी अमेरिकी 'पनडुब्बी' अर्ध-सरकारी फार्स समाचार एजेंसी ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के बयान का हवाला देते हुए कहा, "IRGC नेवी के नाविकों ने खुफिया जानकारी और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम की मदद से किए गए एक जटिल ऑपरेशन में, अमेरिका की 'आतंकवादी सेना' के एक एडवांस्ड ड्रोन को रोका, जो होर्मुज जलडमरूमध्य में जासूसी का काम कर रहा था।" उन्होंने आगे कहा, "IRGC नेवी साफ तौर पर कहती है कि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद है, और हम खतरनाक गतिविधियों और बिना इजाज़त आवाजाही के खिलाफ सख्त और लगातार कार्रवाई कर रहे हैं।" रेमस 600 ऑटोनॉमस अंडरवॉटर व्हीकल क्या है? REMUS 600 ऑटोनॉमस अंडरवॉटर व्हीकल को कोंग्सबर्ग मैरीटाइम की सहायक कंपनी हाइड्रॉइड ने अमेरिकी नौसेना अनुसंधान कार्यालय के सहयोग से डिजाइन और विकसित किया है। इसका मकसद अमेरिकी नौसेना को महासागरीय और उथले जल दोनों क्षेत्रों में मिशनों में सहायता करना है। रेमस 600 उथले और गहरे पानी में समुद्री बारूदी सुरंगों का पता लगाने, निगरानी और टोही मिशन, जल सर्वेक्षण और जासूसी अभियानों को अंजाम दे सकता है। REMUS 600 AUV की लंबाई 4.3 मीटर और व्यास 0.7 मीटर है। तटस्थ रूप से तैरने की स्थिति में इसका वजन 320 किलोग्राम है। रेमस 600 2 मीटर/सेकंड की गति से 150 किमी से 200 किमी की दूरी तय कर सकता है और अधिकतम 600 मीटर की गहराई पर काम कर सकता है।

चीन की अपैरल हिस्सेदारी 10% घटी, बांग्लादेश-वियतनाम ने मारी बाजी; भारत के सामने बड़ा अवसर

नई दिल्ली  साल 2025 में ग्लोबल अपैरल एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी लगभग 3 फीसदी पर जस की तस रही। वहीं, 2010 में अपने पीक (सबसे ऊंचे स्तर) से चीन की हिस्सेदारी में लगभग 10 फीसदी की गिरावट आई। इससे सोर्सिंग का एक बड़ा मौका बना है। भारत 'चाइना+1' स्ट्रैटेजी और बेहतर ट्रेड एक्सेस के जरिए इस मौके का फायदा उठा सकता है। पीएल कैपिटल की सेक्टर रिपोर्ट से इसका पता चलता है। दुनियाभर में अपैरल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी 2010 में 36.9 फीसदी थी। यह घटकर 2025 में 27.3 फीसदी रह गई। जबकि इसी दौरान भारत की हिस्सेदारी 3.2 फीसदी से मामूली रूप से घटकर 3 फीसदी रह गई। वहीं, बांग्लादेश और वियतनाम ने अपनी संयुक्त हिस्सेदारी को लगभग 7 फीसदी से बढ़ाकर 13 फीसदी से ज्‍यादा कर लिया। बांग्‍लादेश को अब तक सबसे ज्‍यादा फायदा पीएल कैपिटल ने अपनी टेक्सटाइल सेक्टर रिपोर्ट में कहा, 'China+1 लहर के कारण इस हिस्सेदारी में करीब 9.6% की कमी आई है। चीनी एक्सपोर्ट के दबदबे में आई इस कमी से ग्लोबल सोर्सिंग मैट्रिक्स में 50-60 अरब डॉलर का फ्लोटिंग वॉल्यूम (बाजार में उपलब्ध व्यापार का अवसर) आया है।' रिपोर्ट में कहा गया है कि कम प्रोडक्शन कॉस्ट, ट्रेड एग्रीमेंट और इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की वजह से बांग्लादेश और वियतनाम को अब तक इस बदलाव का सबसे ज्‍यादा फायदा मिला है। भारत ने इसलिए गंवाया मौका रिपोर्ट के अनुसार, 'इसके उलट, भारत में अभी भी एक ही जगह पर फाइबर, फैब्रिक और फैशन को जोड़ने वाले इंटीग्रेटेड हब की कमी है। यहां कैपिटल की लागत भी काफी ज्‍यादा है। नतीजतन, भारत की हिस्सेदारी मोटे तौर पर स्थिर रही है।' हालांकि, पीएल कैपिटल ने कहा कि अब कई फैक्‍टर भारत की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर रहे हैं। इनमें चीन से हटकर सप्लाई-चेन में विविधता लाना, PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम और PM MITRA जैसी स्कीम के तहत पॉलिसी सपोर्ट और ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए बड़े एक्सपोर्ट बाजारों तक बेहतर पहुंच शामिल है। कंपनियों को बराबर नहीं मिलेगा फायदा वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का टेक्सटाइल और कपड़ों का एक्सपोर्ट लगभग 37 अरब डॉलर था। इसमें रेडीमेड गारमेंट्स की हिस्सेदारी सबसे ज्‍यादा 44 फीसदी थी। 2025 में दुनियाभर में टेक्सटाइल और कपड़ों के कुल एक्सपोर्ट में देश की हिस्सेदारी लगभग 4 फीसदी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मौके का फायदा सभी टेक्सटाइल कंपनियों को बराबर नहीं मिलेगा। कारण है कि ग्लोबल ब्रांड्स अब कम और बड़े सप्लायरों को ही ज्‍यादा ऑर्डर दे रहे हैं। PL कैपिटल ने कहा, 'खरीदार उन पार्टनर्स के साथ अपनी वेंडर लिस्ट को सीमित कर रहे हैं जो कैपेसिटी, रिलायबिलिटी, ट्रेसेबिलिटी, ESG नियमों का पालन और कई देशों से सप्लाई की मजबूती दे सकते हैं।' भारत के सामने ये हैं सबसे बड़ी चुनौतियां इसमें यह भी कहा गया है कि भारत के लिए बड़े पैमाने पर काम करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। कारण है कि यहां कपड़ों के उत्पादन की क्षमता बिखरी हुई है। काम पूरा होने में ज्‍यादा समय लगता है। मैन-मेड फाइबर की सीमित उपलब्धता है। चीन, वियतनाम और बांग्लादेश की तुलना में टेक्नोलॉजी को अपनाने की रफ्तार धीमी है। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि इसलिए ग्रोथ के अगले दौर में उन बड़े, संगठित और काम को सही ढंग से पूरा करने पर ध्यान देने वाले अपैरल मैन्‍युफैक्‍चरर्स को फायदा होने की संभावना है जो बड़े पैमाने पर उत्पादन, तेजी से डिलीवरी और इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन की सुविधा दे सकते हैं।

‘युद्ध हुआ ही नहीं तो यही सबसे बड़ी जीत’, चीन-ताइवान तनाव के बीच चर्चा में एडमिरल पापारो

वाशिंगटन जब दुनिया जंग के मैदान में फतह हासिल करने को ही सबसे बड़ी कामयाबी मानती है, तब एक चार सितारा अमेरिकी सैन्य कमांडर की सोच बिल्कुल अलग नजर आती है। यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख एडमिरल सैमुअल पापारो का मानना है कि एक सच्चे फौजी की असली जीत युद्ध लड़ने में नहीं, बल्कि उसे होने से रोकने में है। आज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन की आक्रामकता को थामना और ताइवान पर मंडराते युद्ध के बादलों को छांटना है। मावेरिक नहीं, शांत और अनुशासित आइसमैन बने प्रेरणा बात 1986 की है, जब सैमुअल पापारो पेंसिल्वेनिया में अपनी कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे। एक रोज वह अपनी मंगेतर मॉरीन के साथ मशहूर हॉलीवुड फिल्म टॉप गन देखने पहुंचे। उस दौर में टॉम क्रूज का बेपरवाह और आक्रामक किरदार मावेरिक हर नौजवान का हीरो था। मगर दिलचस्प बात यह रही कि पापारो को मावेरिक नहीं, बल्कि उसका प्रतिद्वंद्वी आइसमैन भा गया। पापारो का मानना था कि आइसमैन हवा-हवाई बातों पर नहीं, बल्कि अनुशासन, कड़ी मेहनत और सही फैसलों पर भरोसा करता था। यही सोच आगे चलकर उनके पूरे सैन्य जीवन की रीढ़ बनी। पापारो का वर्दी से पुश्तैनी नाता सैन्य सेवा का संस्कार पापारो को विरासत में मिला था, हालांकि उनका पारिवारिक परिवेश बेहद सादगी भरा था। उनके पिता सैमुअल सीनियर मरीन कोर में रहे और यूएसएस जॉन एफ. कैनेडी और किट्टी हॉक जैसे विशालकाय एयरक्राफ्ट कैरियर्स की देखरेख का काम किया। वहीं उनके दादा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नौसेना के निर्माण दस्ते का हिस्सा रहे। उनकी मां ने दक्षिण फिलाडेल्फिया के हेयर सैलून में बाल धोने और स्टोर में मेकअप काउंटर पर काम करके घर संभाला। पापारो अपने परिवार की पहली पीढ़ी थे जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की। विलेनोवा कैथोलिक कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उन्होंने टॉपगन फाइटर वेपन्स स्कूल से फाइटर पायलट की ट्रेनिंग ली और अमेरिकी नौसेना की अग्रिम कतार में शामिल हो गए। पापारो कैसे करते है आधी दुनिया पर निगरानी? एडमिरल पापारो आज दुनिया की सबसे विशाल सैन्य कमान की अगुवाई कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में करीब 4 लाख सैन्य व असैन्य कर्मी, 5 एयरक्राफ्ट कैरियर, लगभग 200 युद्धपोत और 1,000 से अधिक आधुनिक लड़ाकू विमान तैनात हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का दबदबा रहा है, लेकिन अब शी जिनपिंग के नेतृत्व वाला चीन इस प्रभुत्व को सीधी चुनौती दे रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, चीनी राष्ट्रपति ने अपनी सेना को 2027 तक ताइवान पर नियंत्रण करने लायक ताकत हासिल करने का लक्ष्य दे रखा है। ऐसे में पापारो का दायित्व सिर्फ सीमाएं संभालना नहीं, बल्कि बीजिंग को यह अहसास कराना है कि ताइवान पर किसी भी सैन्य दुस्साहस का अंजाम कितना भयावह हो सकता है। पापारो विवादों से रखते दूरी एडमिरल पापारो सुर्खियों और गैर-जरूरी बयानों से दूर रहना पसंद करते हैं। बताया जाता है कि उन्होंने ईरान संकट के समय भी एयरक्राफ्ट कैरियर्स और विध्वंसकों से हवाई हमलों को लेकर अपनी स्वतंत्र सैन्य राय रखी थी और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के सामने भी स्थिति का सटीक आकलन पेश किया था। पापारो साफ कहते हैं कि वे जंग जीतकर कोई महान नायक बनने की होड़ में नहीं हैं। उनका एकमात्र मकसद प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना और शांति की रक्षा करना है। उनकी सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि वे जिस जंग की तैयारी दिन-रात कर रहे हैं, दुनिया को वह जंग कभी लड़नी ही न पड़े।

1965 का पटना विश्वविद्यालय: अनुशासन, बोटिंग क्लब और अशोक राजपथ की चाय में बसती थी छात्र जिंदगी

पटना  पटना विश्वविद्यालय को सिर्फ कक्षाओं, परीक्षाओं और डिग्रियों से समझना मुश्किल है। इसका असली संसार उन घंटों में भी बसता था, जो कक्षा में शिक्षक छात्र-छात्राओं को विषय के बारे में विस्तृत जानकारी देते थे। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए शिक्षकों द्वारा दी गई जानकारी ही सबसे बड़ा दस्तावेज होता था। गंगा गंगा की ओर खुलती खिड़कियों से आती हवा, पुराने बरामदों में चलती बहसें, पुस्तकालय में देर तक खुली किताबों ने यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को आकार दिया। विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी शायद उसके भवन नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी हजारों स्मृतियां हैं। पटना विवि के पूर्व छात्र और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. आलोक कुमार ने यादें साझा की। बताया कि यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों में अनुशासन के साथ शिक्षकों के प्रति सम्मान बहुत था। पढ़ाई के दौरान कोई भी विद्यार्थी कक्षा से बाहर इधर-उधर नहीं घूम सकता था। इसके लिए सख्त मनाही थी। विद्यार्थी पुस्तकालय में बैठ कर पुस्तकों का अध्ययन करते थे। पटना विश्वविद्यालय में एडमिशन होना बड़ी बात थी 1965 में यहां मेरा नामांकन हुआ था। ज्यादातर छात्र-छात्राएं गांव देहात के होते थे। जो पारिवारिक रूप से कमजोर होते थे लेकिन पढ़ाई के मामले में इनका कोई जोर नहीं होता था। पटना विश्वविद्यालय में नामांकन होना ही बड़ी बात होती थी। अच्छे अंकों के आधार और प्रतियोगिता लेकर नामांकन होता था। यहां स्नातक करने वाले बच्चों का सपना सिविल सर्विस में जाने का होता था। पढ़ाई के साथ विद्यार्थी सिविल सेवा की तैयारी साथ में करते थे। इसका परिणाम हुआ कि प्रतिवर्ष यहां के छात्र-छात्राएं सिविल सेवा के लिए चयनित होकर विश्वविद्यालय का नाम बढ़ाते रहे। वहीं जो सिविल सेवा में नहीं गए वे प्रोफेसर बनते थे। खेल के प्रति रहता था उत्साह पढ़ाई के साथ यहां पढ़ने वाले बच्चों में खेल के प्रति काफी लगाव रहता था। उन दिनों फुटबाल काफी लोकप्रिय खेलों में से एक होता था। वैसे तो कालेज परिसर में टेनिस, बैंडमिंटन का भी महत्व था। यहां पर बोटिंग क्लब हुआ करता था। विश्वविद्यालय परिसर से गंगा नजदीक होने के कारण बच्चे कुशल प्रशिक्षकों के निर्देशन में गंगा की लहरों पर बोटिंग का आनंद उठाते थे। वहीं बच्चों के बीच वाद-विवाद प्रतियोगिता होती थी। इसके लिए बच्चों में काफी उत्साह होता था। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बच्चे पूरी तैयारी करके आते थे। यहां पर वार्षिक खेलकूद काफी रोमांच और आनंद के साथ मनाया जाता था। इसके लिए काफी तैयारी होती थी। इस दौरान दानापुर से बिहार मिलिट्री का बैंड आता था। जीत के साथ बैंड धुन बजाता था। बच्चे भी अनुशासन के साथ कार्यक्रम का आनंद उठाते थे। वहीं एक वर्ष बाद प्रो. महेंद्र प्रसाद प्राचार्य बने। वे अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। जिस क्लास में शिक्षक देर से आते थे वे वहां जाकर पढ़ाने लगते थे। नोटिस बोर्ड पर सूचना दी जाती थी। कालेज का ऐसा माहौल था कि सभी शिक्षक और कर्मचारी समय से पहले आ जाते थे। पिंटू होटल का रसगुल्ला था लोकप्रिय उन दिनों पिंटू होटल में भोजन करना बड़ी बात होती थी। वहां का समोसा और रसगुल्ला काफी लोकप्रिय होता था। कालेज में पढ़ने वाले बच्चे अपना पैकेट मनी बचा कर यदा-कदा यहां समोसा और रसगुल्ला का आनंद उठाते थे। वहीं मनोरंजन के लिए उन दिनों शहर में छह सिनेमाघर हुआ करता था। रिजेंट, एलिफिस्टिन, पर्ल, वीणा, रुपक, अशोक आदि थे। कालेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं मनोरंजन के लिए सिनेमा का भी आनंद उठाते थे। ऐतिहासिक फिल्मों को देखने का आनंद कुछ और होता था। दशहरा में होता था सांस्कृतिक कार्यक्रम दशहरा के समय उन दिनों हर जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम की धूम रहती थी। गोविंद मित्रा रोड, लंगर टोली, हार्डिंग पार्क, पटना जंक्शन के सामने आदि स्थानों पर शास्त्रीय संगीत और नृत्य का शानदार आयोजन होता था। देश के नामचीन कलाकारों में पंडित बिरजू महाराज, गिरिजा देवी, लच्छू महाराज आदि नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुति से लोगों को पूरी रात आनंदित करते थे। दशहरा पर तीन से चार दिनों तक लगातार कार्यक्रम होता था। पूरा शहर जागता था। उन दिनों सुरक्षा व्यवस्था के साथ लोगों में एक दूसरे के प्रति भाईचारे और प्रेम का वातावरण था। मेले घूमने के दौरान महिलाएं परिवार के साथ रात भर घूमते थे। कहीं कोई घटना नहीं होती थी। उन दिनों रिक्शा यातयात का प्रमुख साधन हुआ करता था। मेले में पांच एवं 10 रुपये घंटे के हिसाब से रिक्शे की बुकिंग होती थी। रिक्शा वाला पूरी रात लोगों को मेले का सैर कराता था। अशोक राजपथ पर रहती थी चहल-पहल पटना विश्वविद्यालय की कहानी अशोक राजपथ के बिना अधूरी है। विश्वविद्यालय से निकलते ही सड़क का संसार जैसे परिसर का विस्तार बन जाता था। किताबों की दुकानें, चाय की प्यालियां, दोस्तों की मंडलियां और आने-जाने वाले विद्यार्थियों की भीड़। मानो अशोक राजपथ खुद एक खुली पाठशाला होती थी।किसी दुकान पर परीक्षा की तैयारी पर चर्चा होती तो कहीं साहित्य की नई किताब पर बहस। चाय के छोटे से गिलास के साथ बड़ी-बड़ी योजनाएं बनतीं। किसी को प्रशासनिक सेवा में जाना था, किसी को साहित्य में पहचान बनानी थी तो कोई शोध की दुनिया में जाना चाहता था। इन सपनों का कोई औपचारिक पाठ्यक्रम नहीं था, लेकिन विश्वविद्यालय जीवन उन्हें दिशा देता था। गंगा भी इस पूरे संसार की मौन साक्षी थी। शाम ढलते ही कई विद्यार्थी नदी किनारे पहुंच जाते। दिनभर की भाग दौड़ के बाद वहां बैठना, बातचीत करना और भविष्य के बारे में सोचना विद्यार्थी जीवन का हिस्सा था। गंगा की धारा और विश्वविद्यालय की हलचल के बीच जैसे एक पूरा शहर अपनी युवा ऊर्जा के साथ सांस लेता था।  

8th Pay Commission: कर्मचारियों-पेंशनर्स के लिए जरूरी खबर, सैलरी हाइक पर अभी नहीं हुआ फैसला

नई दिल्ली 8th सेंट्रल पे कमीशन (8th Central Pay Commission) को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की नजर अब इसकी आगामी बैठकों और राज्यों के दौरों पर है। आयोग ने अक्टूबर 2026 में मुंबई और बेंगलुरु में स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन का प्रोग्राम तय किया है। इसके अलावा कंसल्टेंट इंगेजमेंट गाइडलाइंस में बदलाव और जयपुर व चंडीगढ़ से जुड़े पुराने नोटिस भी आयोग के हालिया अपडेट का हिस्सा हैं। हालांकि, इन गतिविधियों को वेतन बढ़ोतरी या फिटमेंट फैक्टर के अंतिम ऐलान से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) का गठन 3 नवंबर 2025 को किया गया था। आयोग की अध्यक्षता जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। प्रोफेसर पुलक घोष सदस्य और पंकज जैन मेंबर-सेक्रेटरी हैं। आयोग का मुख्य काम केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के पे, अलाउंसेस, पेंशन और दूसरी सेवा शर्तों की समीक्षा कर सरकार को अपनी सिफारिशें देना है। फिलहाल, आयोग अलग-अलग कर्मचारी संगठनों, यूनियनों, पेंशनर एसोसिएशनों और अन्य हितधारकों से सुझाव ले रहा है। मुंबई दौरा इस प्रॉसेस में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है। आयोग 22 और 23 अक्टूबर 2026 को मुंबई में स्टेकहोल्डर मीटिंग्स करेगा। योग्य कर्मचारी यूनियन, प्रतिनिधि संगठन, पेंशनर एसोसिएशन, फेडरेशन और अन्य संबंधित ग्रुप आयोग से मुलाकात के लिए एप्वाइंटमेंट रिक्वेस्ट भेज सकते हैं। इसके लिए 10 अक्टूबर 2026 तक आवेदन किया जा सकता है। बैठक का स्थान और विस्तृत कार्यक्रम बाद में जारी किया जाएगा। इससे पहले आयोग का बेंगलुरु दौरा 7 और 8 अक्टूबर 2026 को निर्धारित है। इसके लिए एप्वाइंटमेंट रिक्वेस्ट भेजने की अंतिम तारीख 18 सितंबर 2026 थी, जो अब समाप्त हो चुकी है। इसी तरह जयपुर में 31 अगस्त और 1 सितंबर को प्रस्तावित बैठक तथा चंडीगढ़ में 16 से 18 सितंबर तक हुए प्रोग्राम भी स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन का हिस्सा थे। इन दौरों का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों की राय और सुझाव समझना है। आयोग ने 11 अगस्त 2026 को कंसल्टेंट की नियुक्ति से जुड़ी गाइडलाइन्स में भी आंशिक बदलाव किया था। यह एक प्रशासनिक अपडेट है और इसका सीधा मतलब कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन या अलाउंसेस में बदलाव नहीं है। इसी तरह अलग-अलग कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर, मिनिमम बेसिक पे या सैलरी हाइक को लेकर कई मांगें सामने आ सकती हैं, लेकिन इन्हें आयोग की अंतिम सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए। फिलहाल, 8th पे कमीशन के ताजा अपडेट में किसी निश्चित फिटमेंट फैक्टर, मिनिमम बेसिक सैलरी या सैलरी हाइक की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। आयोग की राज्यवार बैठकें अभी कंसल्टेशन प्रॉसेस का हिस्सा हैं। आगे आयोग विभिन्न सुझावों और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन करके अपनी सिफारिशें तैयार करेगा। इसके बाद सरकार इन सिफारिशों पर फैसला लेगी। इसलिए सोशल मीडिया या अन्य जगहों पर चल रहे वेतन बढ़ोतरी के आंकड़ों को आधिकारिक फैसला मानने से पहले सरकारी घोषणा का इंतजार करना जरूरी है।

IAS छोड़ने के बाद क्या करेंगी दिव्या मित्तल? 29 सितंबर सुबह 8:30 बजे करेंगी बड़ा खुलासा

लखनऊ उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की पूर्व जिलाधिकारी (DM) और चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने 30 अगस्त को प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया था। इसके 14 दिन बाद 14 सितंबर को उनका इस्तीफा स्वीाकर कर लिया गया। उन्होंने इसकी जानकारी एक्स हैंडल पर दी थी। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद सोशल मीडिया पर उनके भविष्य को लेकर तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं, इन दावों पर विराम लगाते हुए दिव्या मित्तल ने अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट शेयर की है। जिसमें उन्होंने संकेत दिया है कि वह 29 सितंबर को सुबह अपने भविष्य के प्लान का एलान करने वाली हैं। सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे कयासों का किया जिक्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए पोस्ट में पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने अपनी पोस्ट में उन तमाम अटकलों और कयासों का जिक्र किया, जिसको लेकर उनके इस्तीफे के बाद से कयास लगाए जा रहे थे। उन्होंने लिखा, "आगे क्या करना है? मैंने पढ़ा: बच्चे छोटे हैं। अब घर। अच्छा पैकेज मिलेगा। वापस विदेश। IAS पर किताब लिखी है। कोचिंग। टिकट पक्का हो गया होगा। राजनीति। 29 सितंबर, सुबह 8:30 बजे बताऊंगी।" दिव्या मित्तल के इस पोस्ट के बाद उनके अगले कदम को लेकर उत्सुकता काफी बढ़ गई है और लोग उन्हें आगे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दे रहे हैं। कुछ लोगों ने लिखा है कि हमें इंतजार है। ऐसे में अब सभी 29 सितंबर को सुबह 8:30 बजे का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जब दिव्या मित्तल स्वयं अपने अगले कदम का खुलासा करेंगी। कौन हैं पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल? गौरतलब है कि पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल का जन्म हरियाणा राज्य के रेवाड़ी जिले में हुआ है। दिव्या मित्तल ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए की पढ़ाई की है। शादी के बाद वह अपने पति गगनदीप के साथ लाखों के पैकेज पर लंदन चली गईं। कुछ समय बाद वह लंदन की नौकरी छोड़ वापस अपने देश भारत लौट आईं। यहां आकर वह यूपीएससी की तैयारी में जुट गई। इसके बाद साल 012 में दिव्या मित्तल यूपीएससी ने क्रैक किया। उनका सेलेक्शन आईपीएस के लिए हुआ, लेकिन वह आईएएस बनना चाहती थी। दूसरे प्रयास में 2013 में आईएएस बन गईं। दिव्या मित्तल अपने कार्यकाल के दौरान मिर्जापुर, बस्ती, देवरिया जिले में डीएम रहीं। इसके अलावा उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर जिम्मेदारी संभाली।  

बेल्जियम से यूपी पहुंचा 200 टन का विशाल वेसल, 308 पहियों वाले ट्रक ने मचाई हलचल

लखनऊ  Balrampur News बेल्जियम देश से समुद्र के रास्ते भारत पहुंचे विशालकाय वेसल की देश भर में चर्चा है। हर किसी को इसके बारे में जानने की इच्छा है। लगभग 200 टन वजनी इस वेसल को 308 पहियों वाला ट्रक लेकर यूपी के बलरामपुर की तरफ बढ़ रहा है।  ये ट्रक जिस भी शहर से गुजर रहा है वहां इसे देखने वालों का हुजूम उमड़ रहा है। कोई सेल्फी ले रहा तो कोई वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहा है। आइए यहां जानते हैं कि इस ट्रक और इसपर लदे इस विशालकाय वेसल के बारे में पूरी डिटेल। कैसे भारत पहुंचा वेसल जानकारी के अनुसार, ये वेसल ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पर उतरा और फिर इसे 308 पहियों वाले विशालकाय ट्रेलर पर क्रेन की मदद से रखा गया। इसके बाद ये ट्रक झारखंड और बिहार के रास्ते उत्तर प्रदेश पहुंचा। अब तक किन शहरों से होकर गुजरा वायरल ट्रक ओडिशा से शुरू हुई इस ट्रक की यात्रा झारखंड और बिहार से होते हुए उत्तर प्रदेश पहुंची है। सफर के दौरान ये ट्रक झारखंड की राजधानी रांची के पास नगड़ी टोल प्लाजा और पिस्का रेलवे क्रॉसिंग से होते हुए गुजरा। इसके बाद इस ट्रक ने बिहार में प्रवेश किया जहां ये औरंगाबाद, रोहतास और कैमूर के रास्ते आगे बढ़ा। आखिर में ये ट्रक अब यूपी में प्रवेश कर चुका है। जहां ये चंदौली और वाराणसी के रास्ते अपने गंतव्य बलरामपुर चीनी मिल की और बढ़ रहा है। रोजाना केवल 10 से 12 किलोमीटर की दूरी हो रही तय इस वेसल के भारी वजन को सड़क पर संतुलित करने के लिए ट्रक में 308 पहिये लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि अत्यधिक वजन के कारण यह महाट्रक रोजाना केवल 10 से 12 किलोमीटर की ही दूरी तय कर पा रहा है। इस ट्रक ने अभी तक के सफर में लगभग 2 करोड़ रुपए का डीजल इस्तेमाल किया है। किस काम आएगा ये 200 टन का वेसल बेल्जियम से आया ये 200 टन का बाहूबली वेसल बलरामपुर चीनी मिल से जुड़े एथनॉल प्लांट के लिए ले जाया जा रहा है। इस वेसल में वैक्यूम बॉयलर जैसे इंटस्ट्रियल बॉयलर उपकरण हैं। 308 पहियों वाले ट्रक के लिए बनाना पड़ा स्पेशल रूट इसका बड़ा आकार होने के कारण आम सड़कों से निकालने के लिए स्पेशल रूट बनाने की जरूरत पड़ी। कई शहरों में कई मार्गों को बंद करना पड़ा तो कहीं बिजली के खंभे और तारों को हटाना भी पड़ा। कैमूर में इसे निकालने के लिए पुल तोड़ने की भी जरूर पड़ी। इस ट्रक के साथ पुलिस प्रशासन की टीम भी लगातार चल रही है। बता दें कि ये ट्रक अब वाराणसी से होते हुए गाजीपुर की तरफ बढ़ रहा है और जल्दी ही बलरामपुर पहुंचाया जाएगा।