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ट्रेड वॉर का अल्टीमेटम! चीन से समझौते पर कनाडा पर 100 फीसदी टैरिफ की धमकी

वॉशिंगटन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को धमकी दी है कि अगर वह चीन के साथ ट्रेड डील करता है, तो अमेरिका उसके सभी एक्सपोर्ट पर 100 फीसदी टैरिफ लगा देगा। इससे अमेरिका और कनाडा के बीच फिर से तनाव बढ़ गया है। ट्रंप ने इससे पहले रूस से तेल आयात करने को लेकर भारत समेत कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया हुआ है। ट्रंप ने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को गवर्नर कार्नी कहते हुए कहा कि चीन को इलेक्ट्रिक वाहनों का इंपोर्ट बढ़ाने की इजाजत देकर कनाडा ने बहुत बड़ी गलती की है। ट्रंप ने कनाडा का मजाक उड़ाते हुए कहा है कि वह चाहते हैं कि कनाडा अमेरिका का 51वां राज्य बन जाए। ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "चीन कनाडा को जिंदा खा जाएगा, उसे पूरी तरह निगल जाएगा, जिसमें उनके बिजनेस, सामाजिक ताना-बाना और आम जीवन शैली का विनाश भी शामिल है। अगर कनाडा चीन के साथ कोई डील करता है, तो अमेरिका में आने वाले सभी कनाडाई सामानों और प्रोडक्ट्स पर तुरंत 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया जाएगा।" चीन और कनाडा ने पिछले हफ्ते ट्रेड बाधाओं को कम करने और संबंधों को फिर से बनाने के लिए एक व्यापक समझौते पर सहमति जताई, जो कनाडाई विदेश नीति में एक बड़े बदलाव और ट्रंप के ट्रेड एजेंडा से अलग होने का संकेत है। कार्नी ने कहा कि शुक्रवार को चीनी नेता शी जिनपिंग से मिलने के बाद उन्हें उम्मीद है कि चीन कैनेडियन रेपसीड, जिसे कैनोला भी कहा जाता है, पर टैरिफ कम करेगा। यह आठ साल में किसी कैनेडियन नेता का बीजिंग का पहला दौरा था। इसके साथ ही, कनाडा अपने बाजार में 49,000 चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लगभग 6 फीसदी की टैरिफ दर पर आने देगा, जिससे 100 फीसदी सरचार्ज हट जाएगा। कार्नी ने कहा कि चीन कनाडाई लोगों को वीज़ा-फ्री यात्रा की सुविधा भी देगा। डील साइन होने के तुरंत बाद, कैनेडियन नेता ने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में एक तीखा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने बड़ी शक्तियों द्वारा जबरदस्ती के खिलाफ चेतावनी दी – जो ट्रंप के नेतृत्व की एक अप्रत्यक्ष निंदा थी।

डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी पर बनने वाली फिल्म, रिलीज डेट और कहानी के बारे में जानें

वाशिंगटन अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप व्हाइट हाउस में एक नई फिल्म की स्क्रीनिंग की मेजबानी करेंगी। फिल्म को 'मेलानिया' नाम दिया गया है। यह उनके जीवन के उन 20 दिनों की डॉक्यूमेंट्री है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के उद्घाटन से ठीक पहले के हैं। उनकी सलाहकार और एजेंट मार्क बेकमैन ने बताया कि यह स्क्रीनिंग राष्ट्रपति, उनके परिवार और करीबी दोस्तों के लिए होगी, जहां वे पहली बार पूरी फिल्म देखेंगे। फिल्म में मेलानिया ट्रंप की निजी जिंदगी, फैशन चॉइस, कूटनीतिक गतिविधियां और सीक्रेट सर्विस की सुरक्षा व्यवस्था जैसी दुर्लभ झलकियां दिखाई गई हैं। ट्रेलर में उद्घाटन दिवस पर मेलानिया की नेवी रंग की चौड़ी टोपी पहनने की तस्वीर और राष्ट्रपति को उनके उद्घाटन भाषण में शांतिदूत वाली सलाह देने का क्षण भी शामिल है। फिल्म का ग्लोबल रिलीज 30 जनवरी को होगा। यह अमेजन की एमजीएम स्टूडियोज के साथ 40 मिलियन डॉलर के सौदे के तहत बनी है। बेकमैन ने कहा कि यह कोई राजनीतिक फिल्म नहीं है, बल्कि मेलानिया ट्रंप ने खुद इसके क्रिएटिव डायरेक्शन का नेतृत्व किया है। फिल्म में राष्ट्रपति ट्रंप के हास्य पलों को भी जगह दी गई है। फॉलो-अप डॉक्यूमेंट्री सीरीज भी आएगी इसके अलावा, अगले साल एक फॉलो-अप डॉक्यूमेंट्री सीरीज रिलीज होगी। इसे मेलानिया ट्रंप की प्राथमिकताओं जैसे फोस्टर केयर में बच्चों पर केंद्रित रखा जाएगा। व्हाइट हाउस स्क्रीनिंग के बाद, राष्ट्रपति और पहली महिला जॉन एफ. केनेडी सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स में प्रीमियर में शामिल होंगे। फिल्म को प्रमोट करने के लिए मेलानिया ट्रंप न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज की ओपनिंग बेल बजाएंगी। यह फिल्म उनके दूसरे कार्यकाल में कम सार्वजनिक उपस्थिति वाली पहली महिला की छवि को नई दिशा देती है। इसमें मेलानिया न केवल फैशन और कूटनीति में सक्रिय दिखती हैं, बल्कि राष्ट्रपति के सलाहकार के रूप में भी काम करती हैं।

ट्रंप बदल सकते हैं फैसला! भारत से 25% टैरिफ हटाने के मिल रहे संकेत

 नई दिल्ली अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि भारत पर लगाया गया यह टैरिफ अमेरिका के लिए "काफी सफल" रहा है. बेसेंट के मुताबिक, इस टैरिफ के बाद भारत द्वारा रूस से तेल की खरीद में भारी गिरावट आई है. फिलहाल यह टैरिफ लागू है, लेकिन अमेरिका इसे स्थायी नहीं मानता. स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया कि आने वाले समय में भारत पर लगाया गया 25% टैरिफ हटाया भी जा सकता है. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि अब इसे हटाने का एक रास्ता बन सकता है." यानी अगर हालात अनुकूल रहे और बातचीत आगे बढ़ी, तो अमेरिका भारत को टैरिफ में राहत दे सकता है. यह बयान ऐसे समय आया है, जब वैश्विक स्तर पर तेल व्यापार और रूस से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर लगातार चर्चा चल रही है. भारत पर अमेरिका ने कितना टैरिफ लगाया है? अमेरिका ने भारत से आने वाले कई सामानों पर फिलहाल कुल मिलाकर 50% तक का टैरिफ लगा रखा है. इसमें से करीब 25% सामान्य टैरिफ है, जो भारत के लगभग 55% निर्यात पर लागू होता है. इसके अलावा अगस्त 2025 से एक अतिरिक्त 25% "ऑयल से जुड़ा पेनल्टी टैरिफ" लगाया गया, जो रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर दबाव बनाने के लिए है. अमेरिका, G7 और यूरोपीय देशों का रूसी तेल पर प्राइस कैप रूस के तेल को लेकर अमेरिका, G7 और यूरोपीय देशों ने एक प्राइस कैप सिस्टम भी लागू किया है. जनवरी 2026 तक यह कैप लगभग 47.60 डॉलर प्रति बैरल है, जिसे 1 फरवरी 2026 से घटाकर 44.10 डॉलर किया जाएगा. नियम यह है कि अगर रूसी तेल तय कीमत से ऊपर बेचा गया, तो उस पर बीमा, शिपिंग और फाइनेंस जैसी सेवाएं नहीं दी जाएंगी. अमेरिका का 500% टैरिफ का बिल अमेरिका का दावा है कि इस दबाव के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रिलायंस जैसी बड़ी भारतीय रिफाइनरियों ने जनवरी 2026 में रूसी तेल लेना रोक दिया. वहीं भारत का कहना है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें राष्ट्रीय हित और किफायती दामों के आधार पर तय करता है, लेकिन 500% टैरिफ वाले नए अमेरिकी बिल पर वह नजर बनाए हुए है.

WHO सबसे ताजा… एक साल में 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ट्रंप का नाता टूटा, US ने किया औपचारिक अलगाव

वाशिंगटन अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया पूरी कर ली है. संघीय अधिकारियों ने गुरुवार को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले दिन इस 78 साल पुरानी सदस्यता को खत्म करने का ऐलान किया था, और अब यह फैसला पूरी तरह लागू हो गया है. हालांकि, यह अलगाव पूरी तरह साफ नहीं माना जा रहा है. इसी के साथ अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ट्रंप लगभग 70 ग्लोबल संस्थाओं या अंतरराष्ट्रीय समझौतों से नाता तोड़ चुके हैं. बीमारियों से निपटने की क्षमता पर पड़ेगा असर WHO के मुताबिक अमेरिका पर अभी भी संगठन के 130 मिलियन डॉलर से ज्यादा बकाया हैं. ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने भी माना है कि कई अहम मुद्दे अभी सुलझे नहीं हैं, जैसे अन्य देशों से मिलने वाला हेल्थ डेटा, जिससे अमेरिका को किसी नई महामारी की शुरुआती चेतावनी मिल सकती थी.  विशेषज्ञों का कहना है कि WHO से बाहर निकलने का असर वैश्विक स्तर पर नई बीमारियों से निपटने की क्षमता पर पड़ेगा और इससे अमेरिकी वैज्ञानिकों व दवा कंपनियों के लिए नए टीके और दवाएं विकसित करना भी मुश्किल हो जाएगा. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन ने इसे 'अपने जीवनकाल का सबसे विनाशकारी राष्ट्रपति फैसला' बताया है. अमेरिका से WHO को मिलती है बड़ी फंडिंग WHO संयुक्त राष्ट्र की विशेष स्वास्थ्य एजेंसी है, जो एमपॉक्स, इबोला और पोलियो जैसी बीमारियों से निपटने के वैश्विक प्रयासों का कोऑर्डिनेशन करती है. यह गरीब देशों को तकनीकी सहायता देती है, वैक्सीन और दवाओं के वितरण में मदद करती है और मानसिक स्वास्थ्य व कैंसर समेत सैकड़ों बीमारियों के लिए दिशानिर्देश तय करती है.  दुनिया के लगभग सभी देश इसके सदस्य हैं. अमेरिका WHO की स्थापना में अग्रणी रहा है और लंबे समय तक इसका सबसे बड़ा दानदाता भी रहा है. अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, अमेरिका हर साल औसतन 111 मिलियन डॉलर सदस्य शुल्क और करीब 570 मिलियन डॉलर स्वैच्छिक योगदान देता रहा है. कई यूएन और नॉन-यूएन संस्थाओं से रिश्ता खत्म WHO से अलगाव के साथ ही ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका को 66 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का फैसला किया है. इनमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाएं और 35 गैर-यूएन संगठन शामिल हैं. व्हाइट हाउस का कहना है कि इनमें से कई संस्थाएं जलवायु, लेबर, प्रवासन और विविधता से जुड़े ऐसे मुद्दों पर काम कर रही थीं, जिन्हें प्रशासन ने ‘वोक एजेंडा’ करार देते हुए अमेरिका के हितों के खिलाफ बताया है. संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी जिन 31 संस्थाओं से अमेरिका बाहर निकल रहा है, उनमें आर्थिक और सामाजिक मामलों का विभाग, अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया के लिए आर्थिक आयोग, अंतरराष्ट्रीय कानून आयोग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र, पीसबिल्डिंग कमीशन और फंड, UN Women, UNFCCC यानी जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन, UN Population Fund, UN Water, UN University समेत कई अहम इकाइयां शामिल हैं. इसके अलावा 35 गैर-यूएन संगठनों से भी अमेरिका अलग हो रहा है. इनमें इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC), इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी, इंटरनेशनल सोलर अलायंस, इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर, ग्लोबल फोरम ऑन माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस और कई क्षेत्रीय व पर्यावरण से जुड़े संगठन शामिल हैं. पेरिस जलवायु समझौते से बनाई दूरी जनवरी 2025 में सत्ता में लौटने के तुरंत बाद ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को दूसरी बार बाहर निकालने का भी ऐलान किया था. यह फैसला 27 जनवरी 2026 से लागू होगा, जिसके बाद अमेरिका कार्बन कटौती से जुड़े किसी भी कानूनी दायित्व से मुक्त हो जाएगा. इतना ही नहीं, प्रशासन ने पेरिस समझौते की बुनियाद माने जाने वाले UNFCCC से भी बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. चूंकि यह एक सीनेट-स्वीकृत संधि है, इसलिए इस फैसले को कानूनी चुनौती मिलने की संभावना भी जताई जा रही है. हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और शरणार्थी एजेंसी UNHCR का सदस्य बना रहेगा, क्योंकि इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय हितों के लिए जरूरी माना गया है.

स्वास्थ्य को लेकर उठे सवाल, हाथ के निशान पर ट्रंप की सफाई—क्या है पूरा मामला?

नई दिल्ली दुनिया भर के दिग्गज नेताओं के बीच दावोस में 'बोर्ड ऑफ पीस' के गठन में जुटे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी सेहत को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। समारोह के दौरान उनके बाएं हाथ पर गहरे नीले रंग के निशान देखे गए, जिससे सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में उनकी सेहत को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए इसे एक मामूली घटना बताया है। हाथ पर मौजूद निशानों को लेकर उठ रहे सवालों पर जवाब देते हुए ट्रंप ने कहा कि यह चोट केवल एक दुर्घटना का परिणाम है। उन्होंने पत्रकारों से कहा, "मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं। मेरा हाथ टेबल के कोने से टकरा गया था। मैंने इस पर थोड़ा सा मरहम लगाया है। डॉक्टर कहते हैं कि मुझे कुछ भी लेने की जरूरत नहीं है, लेकिन मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।" ट्रंप ने इन निशानों का संबंध अपनी नियमित दवाओं से भी जोड़ा। उन्होंने बताया कि वह अपने दिल की सेहत के लिए रोजाना 325 मिलीग्राम की बड़ी एस्पिरिन लेते हैं। ट्रंप के अनुसार, इस दवा की वजह से त्वचा संवेदनशील हो जाती है और हल्का सा टकराने पर भी नीला निशान पड़ जाता है। उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा, "मैं चाहता हूं कि मेरे दिल में खून का बहाव अच्छा और पतला रहे। अगर आप अपना दिल अच्छा रखना चाहते हैं तो एस्पिरिन लें, लेकिन इसके साथ थोड़े नीले निशान सहने के लिए भी तैयार रहें।" वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने भी राष्ट्रपति के बयान का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि 'बोर्ड ऑफ पीस' कार्यक्रम के दौरान ट्रंप का हाथ मेज के कोने से टकरा गया था। अधिकारियों ने राष्ट्रपति की पहले और बाद की तस्वीरें साझा करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि यह निशान अचानक लगी चोट का ही हिस्सा है। ट्रंप के निजी चिकित्सक डॉ. सीन बारबाबेला ने पुष्टि की है कि राष्ट्रपति प्रतिदिन 325 मिलीग्राम एस्पिरिन लेते हैं। मेयो क्लिनिक जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के अनुसार, दिल की सुरक्षा के लिए आमतौर पर 75 से 100 मिलीग्राम की खुराक पर्याप्त मानी जाती है। अधिक खुराक से रक्त अधिक पतला हो जाता है, जिससे चोट लगने पर निशान पड़ने का खतरा बढ़ जाता है।

अमेरिका का नया ‘पीस बोर्ड’, पर भारत सतर्क! ट्रंप के प्रस्ताव पर दिल्ली क्यों नहीं दिखा रही जल्दबाज़ी?

नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को दावोस में बोर्ड ऑफ पीस के गठन का ऐलान कर दिया। उनकी ओर से इसका जो प्रस्ताव दिखाया गया, उसमें 8 मुसलमान मुल्कों समेत कई देशों की ओर से सहमति का पत्र था। गाजा को फिर से खड़ा करने के लिए तैयार इस बोर्ड को लेकर मुसलमान देश तो जुड़ गए हैं, लेकिन यूरोपियन यूनियन के देश हिचक रहे हैं। इसके अलावा भारत, रूस और चीन जैसे बड़े देशों ने भी अब तक इससे दूरी ही बनाकर रखी है। इस बीच सवाल है कि आखिर भारत की इस संबंध में क्या रणनीति है और वह डोनाल्ड ट्रंप के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने से हिचक क्यों रहा है। इसकी तीन वजहें हैं।   पहला कारण तो यही है कि भारत की नीति देखो और इंतजार करो की है। भारत चाहता है कि पहले यह देखा जाए कि दुनिया के कौन-कौन से देश इससे जुड़ने को तैयार हैं। अब तक रूस और चीन इसका हिस्सा नहीं बने हैं। इसके अलावा फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे देश भी दूर ही हैं। ऐसी स्थिति में भारत नहीं चाहता कि वह आगे बढ़कर इसकी मेंबरशिप ले। इसके अलावा गाजा का मसला भारत की आंतरिक राजनीति के लिहाज से भी संवेदनशील रहा है। इसीलिए भारत तुरंत इससे जुड़ने से बच रहा है और फिलहाल इंतजार करने के मूड में है। UN को कमजोर होते नहीं देखना चाहते ये देश दूसरा कारण, अब तक इस समूह से इजरायल, जॉर्डन, इंडोनेशिया, मिस्र, बुल्गारिया, बेलारूस, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात जुड़े हैं। ये ज्यादातर ऐसे देश हैं, जो इस्लामी मुल्क हैं। गाजा में शांति और वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कराने में इनकी दिलचस्पी है। लेकिन यूरोप के देश तो दूर ही रहे हैं। असल में इसकी वजह यह है कि अमेरिका के करीबी रहे यूरोप के देशों को भी डर है कि कहीं अमेरिका का ही वर्चस्व ना हो जाए। विशेष तौर पर संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने वाले डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने भी आशंकाएं बढ़ा दी हैं। कोई देश नहीं चाहता कि यूएन जैसे बहुदेशीय संगठन की जगह अमेरिका के एकतरफा वर्चस्व वाले बोर्ड ऑफ पीस को ताकत मिले। डोनाल्ड ट्रंप हट जाएंगे तो बोर्ड ऑफ पीस का क्या होगा? तीसरा यह कि इसके अलावा बोर्ड ऑफ पीस के भविष्य को लेकर भी भारत में चिंता है। वजह यह कि डोनाल्ड ट्रंप इसके लिए जुनून रखते हैं, लेकिन उनके राष्ट्रपति पद से हटने के बाद इसका भविष्य क्या रहेगा। इसे लेकर अनिश्चितता की स्थिति है। डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल तो तीन साल के बाद खत्म हो जाएगा। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप की विश्वसनीयता को लेकर भी भारत में चिंताएं हैं। भारत ने हमेशा ही संयुक्त राष्ट्र संघ और बहुपक्षीयवाद को महत्व दिया है। ऐसे में भारत नहीं चाहता कि डोनाल्ड ट्रंप की पहल शुरू हुआ कोई संगठन संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने की स्थिति में आए।  

ईरान को ट्रंप की धमकी, US ने भेजी बड़ी सेना, शिया देश ने किया कड़ा जवाब

तेहरान: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को धमकी दी है. उन्होंने घोषणा की है कि अमेरिका का नौसैनिक ‘आर्माडा’ ईरान की ओर बढ़ रहा है, वहीं ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि उनकी उंगली भी ट्रिगर पर है. दोनों तरफ से यह बयान तब आया जब बड़े पैमाने पर ईरान में विरोध प्रदर्शन हुए हैं. ट्रंप ने जोर देते हुए कहा कि वह नहीं चाहते कि बल प्रयोग करना पड़े, लेकिन यह तैनाती ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए है, क्योंकि देश के अंदर की घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रही हैं. ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, ‘हमारे पास एक विशाल सैन्य बेड़ा है जो ईरान की ओर बढ़ रहा है. देखते हैं आगे क्या होता है. हम उन पर बहुत करीब से नजर रख रहे हैं.’ एक अन्य मौके पर उन्होंने कहा, ‘हमारे पास एक आर्माडा है, जो उस दिशा में जा रहा है, और शायद हमें इसका इस्तेमाल न करना पड़े.’ न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन और कई गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर्स आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट पहुंच सकता है. अपने एयरबेस को बचाने के लिए क्या करेगा अमेरिका? एक अधिकारी ने कहा कि मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर संभावित ईरानी हमले से बचाव के लिए अतिरिक्त एयर-डिफेंस सिस्टम पर भी विचार किया जा रहा है. एशिया-प्रशांत क्षेत्र से पिछले हफ्ते शुरू हुई ये गतिविधियां US को अमेरिकी बलों की रक्षा और किसी भी तनाव की स्थिति का जवाब देने के लिए विकल्प देती हैं. ट्रंप ने ईरान को प्रदर्शनकारियों की हत्या या परमाणु कार्यक्रम फिर से शुरू करने के खिलाफ चेतावनी दोहराई, उन्होंने कहा कि अगर ईरान ने अमेरिकी हमलों के बाद अपने परमाणु क्षमता को फिर से बनाने की कोशिश की तो अमेरिका कार्रवाई करेगा. उन्होंने कहा, ‘अगर वे फिर से ऐसा करने की कोशिश करते हैं, तो हम वहां भी उतनी ही आसानी से हमला करेंगे.’ 'वैध लक्ष्य' वाली चेतावनी बता दें कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका सहित कई देशों ने एक आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्हित किया है और इस पर प्रतिबंधित भी लगाए गए हैं। ईरान में जारी हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स द्वारा क्रूरता की खबरें सामने आई हैं। इस बीच एक अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, जनरल अली अब्दुल्लाही अलीबादी, जो ईरानी संयुक्त कमान मुख्यालय का नेतृत्व करते हैं, ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो अमेरिका के सभी ठिकाने ईरान के सशस्त्र बलों के लिए वैध लक्ष्य होंगे। बहुत बड़ी सेना ईरान की ओर इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह कहकर हलचल मचा दी है कि एक बहुत बड़ी सेना ईरान की ओर बढ़ रही है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से लौटते समय, ट्रंप ने एयर फॉर्स वन पर पत्रकारों से कहा कि अमेरिका सिर्फ एहतियात के तौर पर ईरान की ओर एक विशाल बेड़ा भेज रहा है। उन्होंने कहा, "मैं नहीं चाहता कि कुछ भी हो लेकिन हम उन पर बहुत करीब से नजर रख रहे हैं।” धमकियों का दौर जारी इससे पहले दोनों देशों के बीच धमकियों का दौर जारी है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की धमकी के बाद बीते मंगलवार को कहा है कि अगर ईरान ने उनकी हत्या कराई तो अमेरिका ईरान का नामोनिशान मिटा देगा। ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘मेरे बहुत सख्त निर्देश हैं कि अगर कुछ होता है तो वे उन्हें नक्शे से मिटा देंगे।’’ इससे पहले ईरान ने ट्रंप को देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई करने पर चेतावनी दी थी। ईरान के सशस्त्र बलों के प्रवक्ता जनरल अबुलफजल शेकारची ने कहा, ‘‘ट्रंप जानते हैं कि अगर हमारे नेता की ओर हाथ भी बढ़ाया गया तो हम न केवल उस हाथ को काट देंगे बल्कि उनकी दुनिया में आग लगा देंगे।’’ ईरान में प्रदर्शन के बाद सैन्य तैनाती ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी धमकियों के चलते ईरान ने प्रदर्शनकारियों की फांसी रोक दी, उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने करीब 840 फांसी रद्द कर दीं. रॉयटर्स के मुताबिक ट्रंप ने कहा, ‘मैंने कहा, अगर आप उन लोगों को फांसी देंगे, तो आपको पहले से भी ज्यादा जोरदार झटका लगेगा. यह आपके परमाणु कार्यक्रम पर किए गए हमारे हमले के मुकाबले कुछ भी नहीं होगा.’ अमेरिका की यह सैन्य तैनाती ईरान में उस अशांति के बीच हो रही है, जो दिसंबर के अंत में शुरू हुई थी और देशभर में फैल गई थी, हालांकि सख्त कार्रवाई के बाद यह कम होती दिख रही है. अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी के मुताबिक कम से कम 5,002 लोगों की मौत हुई है, जबकि ईरान सरकार ने 3,117 मौतों की पुष्टि की है.

दुनिया में शांति की नई पहल! ट्रंप ने बनाया ‘बोर्ड ऑफ पीस’, PAK शामिल—उठे कई सवाल

दावोस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को बोर्ड ऑफ पीस के पहले चार्टर का औपचारिक ऐलान कर दिया। यूनाइटेड नेशन के तर्ज पर बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस का शुरुआती फोकस गाजा पर होगा, लेकिन इसका विस्तार दुनियाभर के विवादों को सुलझाने के लिए हो सकता है। इसमें पाकिस्तान समेत कई देशों ने सदस्य बनने के लिए सहमति दी है। बोर्ड ऑफ पीस के लॉन्च पर ट्रंप ने कहा कि गाजा सीजफायर डील के तहत हमास को हथियार छोड़ने होंगे, नहीं तो यह फिलिस्तीनी आंदोलन का अंत होगा।   ट्रंप ने कहा, "उन्हें अपने हथियार छोड़ने होंगे, और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह उनका अंत होगा।'' उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी समूह हाथों में राइफल लेकर पैदा हुए थे। स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोर्ड ऑफ पीस के ऐलान के समय एक दर्जन से ज्यादा देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और टॉप डिप्लोमैट मौजूद रहे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, पैराग्वे के कंजर्वेटिव राष्ट्रपति सैंटियागो पेना, उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ियोयेव आदि की मौजूदगी रही। 'हम लोग कुछ भी कर सकते हैं जो करना चाहते हैं' ट्रंप ने आगे कहा, "एक बार जब यह बोर्ड पूरी तरह से बन जाएगा, तो हम लगभग कुछ भी कर सकते हैं, जो हम करना चाहते हैं। और हम इसे यूनाइटेड नेशंस के साथ मिलकर करेंगे।'' उन्होंने आगे कहा कि यू.एन. में बहुत ज्यादा पोटेंशियल है जिसका पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है। ट्रंप, जो इस बोर्ड की अध्यक्षता करेंगे, ने दर्जनों दूसरे वर्ल्ड लीडर्स को इसमें शामिल होने के लिए इनवाइट किया और कहा कि वह चाहते हैं कि यह गाजा में लड़खड़ाते सीजफायर से परे की चुनौतियों का सामना करे, जिससे यह आशंका पैदा हो रही है कि यह ग्लोबल डिप्लोमेसी और कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के मुख्य प्लेटफॉर्म के तौर पर यूएन की भूमिका को कमजोर कर सकता है। सदस्यों को देना होगा एक बिलियन डॉलर का फंड दूसरी बड़ी ग्लोबल पावर और अमेरिका के पारंपरिक पश्चिमी सहयोगी भी इस बोर्ड में शामिल होने से हिचकिचा रहे हैं, जिसके बारे में ट्रंप कहते हैं कि स्थायी सदस्यों को हर एक को $1 बिलियन का पेमेंट करके फंड देना होगा। अमेरिका के अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई भी दूसरा स्थायी सदस्य – दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति पर सबसे ज्यादा दखल रखने वाले पांच देश – अभी तक इसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुआ है। देशों के प्रमुखों ने दस्तावेजों पर किया साइन बोर्ड ऑफ पीस में बतौर सदस्य शामिल होने के लिए मंच पर उपस्थित कई देशों के प्रमुखों ने दस्तावेजों पर साइन किया। इसके बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लेविट ने कहा कि इस तरह बोर्ड का चार्टर पूरी तरह से लागू हो गया है और यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन बन गया है। हस्ताक्षर समारोह स्विट्जरलैंड के दावोस में हुआ, जहां सालाना वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम हो रहा है, जिसमें ग्लोबल राजनीतिक और बिजनेस लीडर्स एक साथ आते हैं।

ट्रंप के सनकी इरादों से घबराए पीएम मार्क कार्नी, ग्रीनलैंड के बाद कनाडा को लेकर भी उठीं चिंताएं

ओटावा/दावोस  डोनाल्ड ट्रंप ने  एक नया मैप सोशल मीडिया पर डाला है, जिसमें कनाडा, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला को अमेरिका का हिस्सा दिखाया गया है। ये नक्शा एडिटेड है, लेकिन ट्रंप का इरादा नहीं। कनाडा इस बात को जान गया है कि ग्रीनलैंड के बाद अगला नंबर उसका है। डोनाल्ड ट्रंप के बयान से कनाडा के आम लोगों में भारी गुस्सा है, वो अपमान महसूस कर रहे हैं और वो धीरे धीरे अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत संकल्प के साथ नई तैयारी में जुट गये हैं। कनाडा, ट्रंप प्रशासन की तरफ से आने वाले नई खतरनाक मांगों का सामना करने की तैयारी में जुट गया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 'अमेरिकी दबदबा खत्म हो गया' कहकर शुरूआत कर दी है। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने कनाडा के आगे के रास्तों के बारे में बताया और चेतावनी दी और कहा कि "मजबूत देश इकोनॉमिक इंटीग्रेशन को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, टैरिफ को दबाव बनाने के लिए और सप्लाई चेन को शोषण करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।" लेकिन स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में मार्क कार्नी ने अमेरिका का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उन्होंने अपने भाषण में इसे 'ग्लोबल टूट' करार दिया और कहा कि "बीच की ताकतों को मिलकर काम करना होगा क्योंकि अगर हम टेबल पर नहीं होंगे, तो हम मेन्यू में होंगे।" यानि, कनाडा और यूरोपीय देशों को अब समझ में आ रहा है, जो भारत वर्षों से कहता आया है। लेकिन अभी तक ये देश अमेरिकी दबदबे का फायदा उठा रहे थे और जब ट्रंप ने चाबी कसी है, तो उन्हें 'ग्लोबल ऑर्डर, दूसरे देशों की संप्रभुता, अमीर और गरीब देशों का फर्क' समझ में आ रहा है। अमेरिका से लड़ने की तैयारी में कनाडा? कनाडा ने अपनी दक्षिणी सीमा को मजबूत करने में लगभग एक अरब डॉलर खर्च किए हैं। अब वह आने वाले सालों में अपनी उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए अरबों डॉलर और खर्च करेगा। जबकि प्रधानमंत्री कार्नी ने फिर से दोहराया कि "कनाडा, ग्रीनलैंड के साथ मजबूती से खड़ा है और ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला करने के उनके खास अधिकार का समर्थन करता है।" हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि "रूस आर्कटिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।" उन्होंने कहा, "हम अपने NATO सहयोगियों के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें नॉर्डिक बाल्टिक के 8 देश भी शामिल हैं, ताकि गठबंधन के उत्तरी और पश्चिमी किनारों को और सुरक्षित किया जा सके, जिसमें ओवर-द-होराइजन रडार, पनडुब्बियों, विमानों और जमीन पर, बर्फ पर सैनिकों में अभूतपूर्व निवेश शामिल है।" हाल के महीनों में कनाडा ने रक्षा, और खासकर आर्कटिक की सुरक्षा को लेकर अपनी नई प्रतिबद्धता को दिखाने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने आर्कटिक में खतरों के लिए शुरुआती चेतावनी रडार कवरेज देने के लिए "ओवर-द-होराइजन" रडार सिस्टम के लिए 4 अरब डॉलर से ज्यादा का फंड देने का वादा किया है। उन्होंने आने वाले सालों में आर्कटिक में एक विशाल सेना से लगातार मिलिट्री मौजूदगी बढ़ाने का भी वादा किया है। लेकिन कनाडा के साथ दिक्कत ये है कि जिस अमेरिका के साथ अपनी सबसे ज्यादा लगने वाली सीमा का वो अभी तक सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा था, वो सीमा उसके लिए सबसे मुश्किल बन चुकी है। कनाडा, अमेरिका के साथ दुनिया की सबसे बड़ी जमीनी सीमा को साझा करता है, इसके अलावा वो दूसरी तरफ ग्रीनलैंड के साथ दुनिया की सबसे बड़ी समुद्री सीमा को शेयर करता है। कनाडा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ग्रीनलैंड? ग्रीनलैंड, कनाडा और अमेरिका दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। पिछले कई दशकों से ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए कनाडा ने NATO देशों और NORAD (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) के साथ मिलकर ऑपरेशनल डिफेंल प्लानिंग किए हैं, जिसमें इसी हफ्ते ग्रीनलैंड में एक NORAD मिशन भी शामिल है। NORAD ने एक बयान में पुष्टि की है, कि कॉन्टिनेंटल यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा के बेस से ऑपरेट होने वाले एयरक्राफ्ट, ग्रीनलैंड में "अलग-अलग लंबे समय से प्लान की गई NORAD एक्टिविटीज को सपोर्ट करने के लिए" होंगे, जो यूनाइटेड स्टेट्स और कनाडा, साथ ही किंगडम ऑफ डेनमार्क के बीच स्थायी डिफेंस सहयोग पर आधारित है।कनाडा के अधिकारी फिलहाल ये तय नहीं कर पाए हैं कि ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए सैनिक भेजे जाए या नहीं। वो अभी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि प्रतीकात्मक तौर पर सैनिकों को ग्रीनलैंड भेजने का फैसला सही रहेगा या नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस भाषण से साफ हो गया है कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ कनाडा के रिश्ते काफी ज्यादा खराब होने वाले हैं। इसके अलावा उन्होंने इस महीने चीन की भी यात्रा की है। उन्होंने अमेरिका को संदेश और संकेत दोनों दे दिया है कि कनाडा के पास विकल्प हैं। ऐसे में अगर डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा आगे बढ़ते हैं, तो अमेरिका अपने पड़ोसी देश को खो सकता है।  

टैरिफ केस में ट्रंप फंसे, कोर्ट के एक आदेश से अमेरिका पर भारी आर्थिक मार

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट उनके प्रशासन के खिलाफ फैसला देता है, तो अमेरिका को लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) की रकम वापस करनी पड़ सकती है। उन्होंने माना कि ऐसा करना आसान नहीं होगा और इससे कई लोगों को नुकसान भी हो सकता है। ट्रंप ने कहा,“मुझे नहीं पता सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देगा। अब तक हमने टैरिफ के जरिए सैकड़ों अरब डॉलर की कमाई की है। अगर हम केस हार गए, तो हमें पूरी कोशिश करनी पड़ेगी कि वह पैसा वापस किया जाए।” राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा कि टैरिफ सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं हैं, बल्कि इससे अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा में भी बड़ा फायदा मिला है। उन्होंने कहा कि टैरिफ के कारण देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और अमेरिका की स्थिति दुनिया में बेहतर हुई है। यह मामला इस समय अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अगर अदालत यह तय करती है कि ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर टैरिफ लगाए, तो सरकार को अरबों डॉलर वापस करने पड़ सकते हैं। इसी बीच ट्रंप अपने 2026 के पहले विदेशी दौरे पर स्विट्ज़रलैंड के डावोस जा रहे हैं, जहां वे विश्व आर्थिक मंच (WEF) में वैश्विक नेताओं और बड़े उद्योगपतियों से मुलाकात करेंगे। वहां वे अमेरिका की व्यापार नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भूमिका पर अपनी बात रखेंगे। टैरिफ, ग्रीनलैंड को लेकर बयान और वेनेजुएला के तेल से जुड़े फैसलों के कारण ट्रंप पहले ही कई देशों और सहयोगियों के निशाने पर हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ट्रंप की आर्थिक और व्यापार नीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।