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11 महीने बाद MP में घरेलू LPG सिलेंडर ₹60 महंगा

नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर 60 रुपए महंगा कर दिया है। वहीं, 19 KG वाले कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम में 115 रुपए का इजाफा किया गया है। बढ़ी हुई कीमतें आज 7 मार्च से ही लागू हो गई हैं। मध्य प्रदेश के 5 बड़े शहरों की बात करें तो अब भोपाल में 918 रुपए, इंदौर में 941 रुपए, ग्वालियर में 996 रुपए, जबलपुर में 919 रुपए और उज्जैन में 972 रुपए में एलपीजी सिलेंडर मिलेगा। सबसे महंगी घरेलू गैस नर्मदापुरम में 1035 रुपए की मिलेगी। इससे पहले 8 अप्रैल 2025 को घरेलू एलपीजी सिलेंडर के रेट बढ़ाए गए थे। हालांकि, 8 मार्च 2024 को महिला दिवस पर केंद्र सरकार ने इसके दाम में 100 रुपए की कटौती भी की थी। इसी महीने बढ़े थे कॉमर्शियल गैस के रेट इससे पहले 1 मार्च 2026 को कॉमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम 31 रुपए तक बढ़ाए गए थे। अब घरेलू गैस सिलेंडर के रेट भी बढ़ गए हैं। सरकार ने एलपीजी गैस सिलेंडर के दामों में बढ़ोतरी ऐसे वक्त की है, जब अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग के चलते देश में गैस किल्लत की आशंका जताई जा रही है। किल्लत रोकने LPG उत्पादन बढ़ाने का आदेश केंद्र सरकार ने 5 मार्च को इमरजेंसी पावर इस्तेमाल करते हुए देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का आदेश दिया था। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने यह आदेश जारी किया। इसमें कहा गया है कि अब रिफाइनरियां प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल सिर्फ रसोई गैस बनाने के लिए करेंगी। सभी कंपनियों को प्रोपेन और ब्यूटेन की सप्लाई सरकारी तेल कंपनियों को करनी होगी। सरकारी तेल कंपनियों में इंडियन ऑयल (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) शामिल है। इसका मकसद कंज्यूमर्स को बिना रुकावट गैस सिलेंडर की सप्लाई है। एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 1955 क्या है सरकार ने यह आदेश आवश्यक वस्तु अधिनियम यानी एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 1955 (ESMA) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करके जारी किया है। इससे पहले सरकार ने यूक्रेन युद्ध के बाद तेल क्षेत्र में ESMA के नियमों को लागू किया था। तब रिफाइनिंग कंपनियों से कहा गया था कि वे देश में फ्यूल की कमी न होने दें और इसे बाहर एक्सपोर्ट न करें, क्योंकि उस समय भारी मार्जिन मिलने की वजह से तेल बाहर बेचना काफी फायदे का सौदा बन गया था। कैसे तय होती है गैस सिलेंडर की कीमत तेल कंपनियां हर महीने पिछले महीने के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों, एक्सचेंज रेट और अन्य लागतों के आधार पर LPG की बेस प्राइस तय करती हैं। इसके बाद टैक्स, ट्रांसपोर्ट और डीलर कमीशन जोड़कर खुदरा मूल्य निकाला जाता है। सब्सिडी वाले सिलेंडर के लिए सरकार अंतर की भरपाई करती है जबकि गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर की पूरी कीमत ग्राहक चुकाता है।

बालेन शाह की RSP की ‘सुनामी’ में उड़े नेपाल के कई दिग्गज

नई दिल्ली. नेपाल के संसदीय चुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझानों ने दक्षिण एशिया की राजनीति को स्तब्ध कर दिया है। 150 निर्वाचन क्षेत्रों में जारी मतगणना में रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली RSP ने अभूतपूर्व बढ़त बना ली है। नेपाल की युवा पीढ़ी ने पारंपरिक पार्टियों नेपाली कांग्रेस (NC) और UML को पूरी तरह नकारते हुए बदलाव के पक्ष में वोट दिया है। 275 सीटों वाली प्रतिनिधि सभा राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी 108 सीटों पर आगे है। नेपाली कांग्रेस (NC) और CPN-UML 12-12 सीटों पर आगे है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (NCP – संयुक्त मोर्चा) के खाते में फिलहाल सिर्फ 9 सीटें जाती दिख रही हैं। सबसे बड़ी खबर झापा-5 निर्वाचन क्षेत्र से आ रही है, जहां 35 वर्षीय रैपर से नेता बने बालेन शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री और UML अध्यक्ष के.पी. शर्मा ओली पर एक मजबूत बढ़त बना ली है। के.पी. ओली के अलावा, शेर बहादुर देउबा की कांग्रेस के शेखर कोइराला, अरबपति विनोद चौधरी, विष्णु पौडेल, राजेंद्र लिंगदेन और पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल जैसे दिग्गज अपनी सीटों पर पिछड़ रहे हैं। पुराने नेताओं में केवल पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ही अपनी साख बचाते दिखे हैं। उन्हें पूर्वी रुकुम सीट से विजयी घोषित किया गया है। RSP की जीत के मायने भारत सरकार के रणनीतिक गलियारों में इस जीत को बहुत बारीकी से देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल संबंध सीमा विवाद और चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण तनावपूर्ण रहे हैं। बालेन शाह और रवि लामिछाने की जोड़ी को व्यावहारिक और राष्ट्रवादी माना जाता है। भारत यह देखेगा कि क्या बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल अपनी "पड़ोसी पहले" नीति को फिर से संतुलित करेगा या चीन के साथ अपने संबंधों को और गहरा करेगा। नेपाल की संसद की 165 सीटें 'फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट' (प्रत्यक्ष चुनाव) के तहत आती हैं, जिनके परिणाम शनिवार तक स्पष्ट हो जाएंगे। शेष 110 सीटें 'समानुपातिक प्रतिनिधित्व' प्रणाली के माध्यम से भरी जाएंगी, जहां पार्टियों को मिलने वाले कुल वोटों का प्रतिशत उनकी अंतिम ताकत तय करेगा।

मोजतबा खामेनेई नहीं बनेंगे सुरक्षा कारणों से ईरान के सुप्रीम लीडर?

तेहरान. ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि जल्द ही उनके बेटे मोजतबा खामेनेई की इसी पद पर ताजपोशी हो जाएगी। हालांकि अब इसमें देरी होती दिख रही है। जानकारों का कहना है कि सुरक्षा कारणों से फिलहाल ईरान की सुरक्षा परिषद ऐसा करने से बच रही है। अमेरिकी की निगाह इसी पर है कि जैसे ही कोई सुप्रीम लीडर नियुक्त किया जाए, वह उसके पीछे पड़ जाए। ईरान के अधिकारियों के मुतबिक मोजतब खामेनेई अयातुल्लाह अली खामेनेई के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। कुछ अधिकारियों ने कहा कि उन्हें एक सुरक्षित जगह पर रखा गया है। इजरायल ने भी कहा है कि खामेनेई की जगह जिसे भी नेता चुना जाएगा, पहला लक्ष्य वही होगा। बता दें कि ईरान के सुप्रीम लीडर के अलावा कई कमांडर भी मारे गए हैं। कौन हैं मोजतबा खामेनेई मोजतबा खामेनेई एक धर्मगुरु हैं, जिन्होंने अपने अधिकतर राजनीतिक जीवन में कोई औपचारिक सरकारी पद नहीं संभाला, लेकिन वह सर्वोच्च नेता के कार्यालय के भीतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें अक्सर सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली 'पावर ब्रोकर' और 'गेटकीपर' के रूप में देखा जाता रहा है। समय के साथ उनकी पहचान दो प्रमुख पहलुओं से जुड़ी रही है। पहला, ईरान की सुरक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और उससे जुड़े कट्टरपंथी नेटवर्क के साथ उनके करीबी संबंध। दूसरा, सुधारवादी राजनीति और पश्चिमी देशों के साथ करीबी संबंधों के प्रति उनका कड़ा विरोध। साल 2019 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध लगाए थे और आरोप लगाया था कि वे बिना किसी औपचारिक सरकारी पद के भी सर्वोच्च नेता की ओर से प्रभावी भूमिका निभा रहे थे। ईरान के संविधान के अनुसार, देश के सर्वोच्च नेता का चयन 88 सदस्यीय धार्मिक निकाय 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' करती है। यह निकाय संभावित उम्मीदवारों की धार्मिक, राजनीतिक और नेतृत्व संबंधी योग्यता का मूल्यांकन करता है। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि व्यवहार में यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र नहीं मानी जाती और सत्ता प्रतिष्ठान का इसमें महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।

बस्तर में संकटग्रस्त महिलाओं के लिए सहारा बना ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’

जगदलपुर. जगदलपुर में संचालित ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’ संकट में घिरी महिलाओं के लिए सुरक्षा और सहायता का अहम केंद्र बनकर उभरा है। 31 जनवरी 2026 से शुरू हुई इस सेवा के तहत अब तक 1862 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 1849 मामलों का समाधान कर पीड़ित महिलाओं को राहत दिलाई गई है। केंद्र की सबसे महत्वपूर्ण सुविधा अस्थायी सुरक्षित आश्रय है। घर या समाज में खुद को असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं को यहां सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था दी जाती है। अब तक 763 महिलाओं को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया जा चुका है। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) भी महिलाओं के लिए बड़ी मदद साबित हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक 1225 महिलाओं की काउंसलिंग की गई है, जिससे वे मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव से बाहर निकलने में सफल रही हैं। जिला महिला संरक्षण अधिकारी के अनुसार घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवाद से जूझ रही महिलाओं के लिए भावनात्मक सहारा बेहद जरूरी होता है। यही कारण है कि यह केंद्र अब महिलाओं के लिए सुरक्षा, न्याय और आत्मविश्वास की नई उम्मीद बनकर सामने आया है।

दिल्ली के उत्तम नगर मर्डर मामले में 4 और गिरफ्तार

नई दिल्ली. दिल्ली के उत्तम नगर में एक युवक की हत्या करने के मामले में पुलिस ने 4 और लोगों को गिरफ्तार किया है। इस मामले में अब तक कुल 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और एक नाबालिग को हिरासत में लिया गया है। घटना को लेकर इलाके में तीसरे दिन भी तनाव जारी रहा। पुलिस ने बताया कि उत्तम नगर की जेजे कॉलोनी में होली के दौरान एक नाबालिग लड़की द्वारा फेंके गए पानी से भरे गुब्बारे को लेकर दो अलग-अलग समुदायों के दो परिवारों के बीच हुई झड़प में 26 साल के एक युवक की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के दो दिन बाद शुक्रवार को चार और लोगों को गिरफ्तार कर हत्या के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में अब तक 8 लोगों की गिरफ्तारी हुई है और एक नाबालिग को भी हिरासत में लिया गया है। दो वाहनों में आग लगाई इस बीच, इलाके में तीसरे दिन भी तनाव जारी रहा। पुलिस ने बताया कि प्रदर्शनकारियों ने दो वाहनों में आग लगा दी और दो अन्य वाहनों की खिड़कियां तोड़ दीं। अधिकारियों के अनुसार, बुधवार को एक हिंदू परिवार की 11 साल की लड़की अपनी छत पर होली मना रही थी और नीचे खड़े लोगों पर पानी के गुब्बारे फेंक रही थी। इनमें से एक गुब्बारा एक मुस्लिम महिला को लगा, जिसने आपत्ति जताई। जांचकर्ताओं के अनुसार, कहासुनी हिंसक झड़प में बदल गई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हमला किया। झड़प में हिंदू परिवार के तीन सदस्यों समेत कम से कम चार लोग घायल हो गए। 26 साल के तरुण कुमार ने गुरुवार सुबह दम तोड़ दिया। उनके परिवार ने पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया कि पड़ोसियों ने उन्हें घेर लिया और बल्ले, लाठी और पत्थरों से उन पर हमला किया। हिंदू राजनीतिक संगठन का प्रदर्शन शुक्रवार को उस समय सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया जब एक हिंदू राजनीतिक संगठन के सदस्यों ने कथित तौर पर विरोध प्रदर्शन करते हुए इलाके में आगजनी की। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दोपहर करीब 2 बजे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नारे लगा रहे प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने दो वाहनों में आग लगा दी। दिल्ली अग्निशमन सेवा के अधिकारियों ने घटनास्थल से मिली सूचना की पुष्टि की जहां एक कार और एक मोटरसाइकिल जलकर खाक हो गई थी। उत्तम नगर मेट्रो स्टेशन, थाना और हस्तसाल कॉलोनी के बाहर लगातार दूसरे दिन भी विरोध प्रदर्शन जारी रहा। लोगों ने सड़कों को जाम कर दिया। कई स्थानीय दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद रखीं। आरोपियों के घर पर हमला करने की कोशिश एक दिन पहले तरुण कुमार के परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों ने एक हिंदू राजनीतिक संगठन के सदस्यों के साथ उत्तम नगर थाने के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था। बाद में प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर मुस्लिम परिवार के घर पर हमला करने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर ऐक्शन की मांग मृतक के चाचा रमेश ने बताया कि 11 साल की लड़की ने परिवार के सदस्यों पर गुब्बारे फेंके, लेकिन एक गुब्बारा जमीन पर फट गया और एक महिला के बुर्के पर छींटे पड़ गए। मैंने माफी मांगी और लड़की से भी माफी मंगवाई। हम और क्या कर सकते थे? उन्होंने पहले हमें पीटा। मेरे सिर, छाती और हाथों पर गंभीर चोटें आईं। डॉक्टरों ने 8 टांके लगाए। मुझे अभी भी दर्द हो रहा है। उन्होंने बताया कि तरुण आधे घंटे बाद आया। इससे पहले कि वह अपनी बाइक पार्क कर पाता, उन्होंने उस पर हमला कर दिया। अब वह आरोपियों के खिलाफ बुलडोजर ऐक्शन की मांग करते हैं। उन्होंने पहले भी इसी परिवार के साथ झड़पों का आरोप लगाया। कहा कि यह पहली बार नहीं है। उन्होंने करीब 12 साल पहले भी होली के दौरान हम पर हमला किया था। दोनों परिवार मूलरूप से राजस्थान के तरुण के घायल दादा मान सिंह ने बताया कि दोनों परिवार 1960 के दशक से एक-दूसरे को जानते हैं। वे उत्तम नगर के पास की झुग्गियों में साथ रहते थे, फिर हस्तसाल कॉलोनी में रहने लगे। दोनों परिवार मूलरूप से राजस्थान के रहने वाले हैं। नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि ये परिवार दशकों से एक-दूसरे को जानते हैं। उनके बीच अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़े और मारपीट होती रहती है। डिजिटल मार्केटिंग में डिप्लोमा कर रहा था तरुण अधिकारी ने कहा कि यह पूरी तरह से सांप्रदायिक मामला नहीं है। ये परिवार हमेशा से कूड़े, पानी, पार्किंग और अन्य छोटी-मोटी बातों पर लड़ते रहे हैं। वे आपस में हाथापाई भी करते हैं और फिर बाद में मामले सुलझा लेते हैं। हम हर पहलू से जांच कर रहे हैं। तरुण के चाचा मेमराज ने बताया कि तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा तरुण इंटीरियर डिजाइनिंग और डिजिटल मार्केटिंग में डिप्लोमा कर रहा था। वह महत्वाकांक्षी था। वह गुरुग्राम की किसी कंपनी में काम करना चाहता था।

संजय झा के घर जेडीयू की मीटिंग में दिखे निशांत कुमार

पटना. बिहार सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ऐक्शन में आ गए हैं। पहली बार वे जदयू के बड़े नेताओं की बैठक में नजर आए। यह बैठक राज्यसभा सांसद और जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा के घर पर बुलाई गई थी जिसमें मंत्री, सांसद और विधायक शामिल हुए। निशांत ने पार्टी नेताओं के साथ खुलकर बात की। नीतीश कुमार से हरी झंडी मिलने के बाद निशांत के जदयू में विधिवत शामिल होने का रास्ता साफ हो गया है। सियासत की पीच पर औपराचिक एंट्री से पहले निशांत ने अपना मैसेज साफ कर दिया है। इस बैठक में युवा ब्रिगेड के साथ अनुभवी राजनेता भी मौजूद थे। मीटिंग का वीडियो फोटो सामने आया है जिसमें संजय झा के अलावे, मंत्री श्रवण कुमार,जेडीयू एमएलसी संजय गांधी मौजूद दिख रहे हैं। इनके साथ-साथ जेडीयू विधायकों में कोमल सिह, चेतन आनंद, राहुल सिंह, अतिरेक कुमार, ललन सर्राफ, रूहेल रंजन, शुभानंद मुकेश, एम मृणाल, समृद्ध वर्मा शामिल हुए। मीटिंग में जदयू के 20 से अधिक नेताओं ने भाग लिया जिनके साथ निशांत कुमार ने भविष्य की योजनाओं पर विमर्श किया। मीटिंग के बाद जदयू नेताओं के साथ निशांत कुमार बैठक को लेकर मंत्री श्रवण कुमार ने बताया कि निशांत कुमार की पार्टी में जरूरत है। कोई बैठक नहीं थी, बातचीत थी। विधायकों ने उनसे मुलाकात की। आने वाले दिनों में पार्टी को मजबूत बनाने में उनकी भूमिका पर चर्चा हुई। वहां मौजूद सभी जदयू सदस्यों ने निशांत कुमार का स्वागत किया। पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं को लंबे समय से इस दिन का इंतजार था। नीतीश कुमार जी से भी सहमति मिल गई है कि निशांत पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि निशांत राजनीति में बेहतर परफॉर्मेंस दिखाएंगे। इधर, निशांत के स्वागत में पटना के चौक चौराहों पर पोस्टर लगना शुरू हो गया है। जदयू के साथ-साथ बीजेपी कार्यालय के पास भी निशांत के समर्थन में पोस्टर लगाए गए हैं जिनमें उन्हें नीतीश कुमार के साथ दिखाया गया है। निशांत के लिए सरकार और पार्टी में बड़ी भूमिका की मांग की गयी है। हालाकि, यह तय माना जा रहा है कि राज्य की नई सरकार में निशांत की भूमिका होगी। उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। बताया जा रहा है कि 8 मार्च(रविवार) को दोपहर बाद निशांत औपचारिक तौर पर जनता दल यू की सदस्यता हासिल करेंगे। इससे पहले शुक्रवार की शाम को नीतीश कुमार के आवास पर जदयू की हाईलेवल मीटिंग हुई जिसमें नीतीश कुमार ने औपचारिक तौर पर अपने निर्णय से पार्टी जनों को अवगत कराया। राज्यसभा जाने की बात सुनकर कई नेता भावुक हो गए। नीतीश कुमार ने उन्हें ढाढस बंधाया कि वह हमेशा बिहार से जुड़े रहेंगे। मीटिंग में निशांत कुमार को पार्टी में शामिल कराने पर सहमति बनी।

बस्तर में मलेरिया से निपटने के कार्यशाला में बताए उपाय

जगदलपुर. बस्तर संभाग में मलेरिया की चुनौती से निपटने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। 7 मार्च को होने वाले इस कार्यक्रम में देशभर के वरिष्ठ चिकित्सक और विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। यह कार्यशाला एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया और शासकीय मेडिकल कॉलेज जगदलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है। मलेरिया के बदलते स्वरूप, जटिल मामलों की पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों के बारे में चिकित्सकों को अपडेट करना कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है। विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर क्षेत्र में मलेरिया, विशेष रूप से फैल्सीफेरम मलेरिया के मामले अधिक देखने को मिलते हैं, जो गंभीर रूप ले सकते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कई बार बिना स्पष्ट लक्षण वाले मलेरिया और दस्त के मरीजों में भी मलेरिया के संकेत मिलते हैं, जो चिंता का विषय है। कार्यशाला में मलेरिया की एपिडेमियोलॉजी, आधुनिक जांच तकनीक, समय पर निदान और गंभीर मरीजों के उपचार पर विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञ अपने शोध और अनुभव साझा करेंगे। इस पहल से बस्तर के डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों को मलेरिया प्रबंधन की आधुनिक पद्धतियों को समझने और मरीजों के बेहतर उपचार में मदद मिलेगी।

पत्रकार हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम HC से बरी

नई दिल्ली. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने शनिवार को सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बरी कर दिया है। यह फैसला विशेष सीबीआई (CBI) अदालत द्वारा राम रहीम को दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के करीब सात साल बाद आया है। यह अहम फैसला मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की खंडपीठ ने 2019 की सजा को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई करते हुए सुनाया। अदालत ने राम रहीम की सजा को रद्द करते हुए उन्हें इस मामले के सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। जेल में ही रहेगा गुरमीत राम रहीम हालांकि अन्य तीन दोषियों कुलदीप, निर्मल सिंह और किशन लाल की सजा बरकरार रखी गई है। इन सभी को इस मामले में सीबीआई अदालत ने दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। गुरमीत राम रहीम व अन्य दोषियों ने 2019 के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े साक्ष्यों और दलीलों पर विस्तृत विचार करते हुए डेरा प्रमुख के खिलाफ आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित न होने के आधार पर उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया। वह फिलहाल रोहतक की सुनारिया जेल में दो साध्वियों के साथ दुष्कर्म मामले में 20 साल की सजा काट रहा है। यानी इस मामले में बरी होने के बावजूद, राम रहीम बलात्कार सहित अन्य मामलों में मिली सजा के कारण फिलहाल जेल में ही रहेगा। क्या था पूरा मामला? अक्टूबर 2002 में सिरसा में अपना स्थानीय समाचार पत्र 'पूरा सच' चलाने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के बाहर गोली मार दी गई थी, जिससे बाद में उनकी मौत हो गई थी। इस हत्याकांड ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। दरअसल, पत्रकार छत्रपति ने अपने अखबार में डेरा प्रमुख के खिलाफ लगे आरोपों से संबंधित खबरें प्रमुखता से छापी थीं। इन रिपोर्टों में एक ऐसा गुमनाम पत्र भी शामिल था जिसमें डेरा के भीतर साध्वियों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए थे। इसी के बाद राम रहीम के खिलाफ जांच का दायरा बढ़ा था। शुरुआती जांच के बाद यह हाई-प्रोफाइल मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था। जनवरी 2019 में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम और अन्य को हत्या की साजिश रचने का दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट के इस फैसले पर पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के 46 वर्षीय बेटे अंशुल छत्रपति ने गहरी निराशा व्यक्त की है और इसे एक बड़ा झटका करार दिया है। अंशुल ने स्पष्ट किया कि वे हार नहीं मानेंगे। उन्होंने कहा- हम शीर्ष अदालत का रुख करेंगे। हमारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमारी कानूनी लड़ाई जारी रहेगी और हम सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे। अदालत द्वारा अन्य आरोपियों की सजा बरकरार रखने पर अंशुल ने कहा- हमारी लड़ाई डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ थी। मेरे पिता की दुश्मनी उन शूटरों या डेरा मैनेजर से नहीं थी। उस समय मेरे पिता केवल राम रहीम की ही पोल खोल रहे थे। अगर मुख्य आरोपी को ही बरी कर दिया गया है, तो निश्चित रूप से यह हमारे लिए बहुत बड़ा झटका है। 25 साल का संघर्ष अपनी लंबी कानूनी लड़ाई को याद करते हुए उन्होंने कहा- पिछले लगभग 25 वर्षों से मैं यह कानूनी लड़ाई लड़ रहा हूं। इतने प्रभावशाली व्यक्ति से टक्कर लेना कभी आसान नहीं होता। ट्रायल शुरू होने से पहले भी हमने ऐसे झटके सहे थे। हालांकि निचली अदालत ने हमें राहत दी थी, लेकिन अब हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ हम अपनी लड़ाई आगे भी जारी रखेंगे; मेरी उम्मीदें अभी भी कायम हैं। 

रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US

नई दिल्ली. वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है। अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी। बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, 'हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।' उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है। अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं। भारत को मिली विशेष छूट इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है। अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? (अमेरिका की मजबूरी) अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है। रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है? अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके। खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे? इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा। भारत ने इस पूरे संकट में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की 'आधिकारिक मंजूरी' से खरीदेगा।

सुरक्षा एजेंसियों के खौफ से बस्तर में नक्सलियों के TCOC पर सन्नाटा

बस्तर. देश के सबसे बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में इस बार एक अलग स्थिति देखने को मिल रही है। करीब दो दशक में पहली बार ऐसा लग रहा है कि नक्सली अपने अहम सैन्य अभियान TCOC (Tactical Counter Offensive Campaign) की शुरुआत तय समय पर नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर यह अभियान हर साल 8 मार्च के बाद शुरू होकर जून तक चलता है, जिसका उद्देश्य सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करना और बस्तर जैसे क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाना होता है। यह अभियान उनके गुरिल्ला युद्ध का हिस्सा है, जिसमें वे सूखे और पतझड़ के मौसम का फायदा उठाते हैं। लेकिन इस बार शुरुआती दिनों में किसी बड़ी गतिविधि के संकेत नहीं मिले हैं। बता दें कि सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सल संगठन पर बढ़ते दबाव और कमजोर होती संरचना का परिणाम मान रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लगातार चलाए गए ऑपरेशन में कई बड़े कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इसके साथ ही जंगलों में नए सुरक्षा कैंप, सड़कों का तेजी से विस्तार और ड्रोन सर्विलांस ने नक्सलियों की गतिविधियों को काफी सीमित कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों के खौफ से अब नक्सली बड़ी संख्या में एकत्र होकर रणनीति बनाने में भी मुश्किल महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बड़े हमलों की योजना बनाना उनके लिए पहले जितना आसान नहीं रह गया है।हालांकि सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं। आशंका है कि नक्सली छोटे या मध्यम स्तर के हमलों के जरिए अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। इसे देखते हुए बस्तर संभाग के सभी जिलों में सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। यदि इस साल भी टीसीओसी प्रभावी रूप से शुरू नहीं हो पाता, तो यह नक्सली आंदोलन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका साबित हो सकता है।